हर रोज ऐसी सुबह हो - अठखेलियां करता झील का किनारा
हो, पगडण्डी पर गुजरते हुए हम हो, पक्षियों का कलरव हो, सूरज मंद-मंद मुस्कराता
हुआ पहाड़ों के मध्य से हमें देख रहा हो, हवा के झोंकों के साथ पक रही सरसों की
गंध हो, कहीं दूर से रम्भाती हुयी गाय की आवाज आ रही हो, झुण्ड बनाकर तोते अमरूद
के बगीचे में मानो हारमोनियम का स्वर तेज कर रहे हों, कोई युगल हाथ में हाथ डाले
प्रकृति के नजदीक जाने का प्रयास कर रहा हो - कल्पना के बिम्ब थमने का नाम ना ले
ऐसी कौन सी जगह हो सकती है? आलेख को पूरा पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें -
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63 बार मैं कार्तिक/नवम्बर के मास से गुजर चुकी हूँ।
कितना कुछ बदल गया है, ना अब वह पथ है और ना ही वह पथिक है। जिन तंग गलियों में
पहली बार आँखें खोली, वे कब की बिसरा दी गयी। जिसे खुले मैदान में बचपन दौड़ा, अब
वह भी दूर हो चला है।http://sahityakar.com/wordpress/
अब आते हैं अपने दिन और रात पर। केलिफोर्निया के सेनोजे
शहर में सुबह जल्दी ही हो जाती थी। भारत में जून महिना भरपूर गर्मी भरा रहता है लेकिन
यहाँ मौसम बेहतर था। सुबह की भोर ठण्डक लिए होती थी तो जैसे-जैसे दिन चढ़ता था,
धूप में तेजी आती जाती थी। लेकिन रात होते ही गर्मी फिर से अपनी कोठरी में जा
दुबकती थी और ठण्डक अपने पैर पसारने लगती थी। सुबह छ: बजे से रात को नौ बजे तक
दिन बना रहता था। पोस्ट को सम्पूर्ण पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - http://sahityakar.com/wordpress/wp-admin/post.php?post=498&action=edit&message=1
हम बगीचा भूल गए, बगीचे के फूल भूल गए, फूलों की
सुगंध भूल गए, बस स्मरण रहा कि मकरंद कैसे बनता है। हम सभी इसी मकरंद की तलाश में
लगे रहे, कुछ बच्चों ने बनाया, कुछ हमने बनाया और बस प्याला भर लाए।
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