Friday, January 25, 2019

हुकूमत इनके खून में बहती है


यदि आप ध्यान से सुने और गौर करें तो टीवी के चैनल बदलते-बदलते न जाने कितने ऐसे बोल सुनाई दे जाएंगे जो आपको सोचने पर विवश करते हैं। कल ऐसा ही हुआ, टीवी से आवाज आयी – हुकूमत इनके खून में बहती है। तभी मेरे दिल ने कहा – गुलामी हमारे खून में बसती है। हमारे देश में कौन राजा होगा और कौन उसका सेवक बनेगा, यह भी हमारे खून में ही बहता रहता है। हमने राजवंशों को कितना ही दरकिनार किया हो लेकिन आज भी प्रजा उन्हें अपना मालिक मानती ही है। उनके दोष नहीं देखे जाते अपितु वे अनिवार्य सत्य होते हैं। इस देश में जिसने भी कहा कि मैं राजा हूँ, तुम्हारा शासक हूँ और उसी के अनुरूप अपना वैभव दिखाया बस प्रजा ने उसे ही अपना राजा मान लिया, लेकिन जिसने भी त्याग किया उसे सम्मान तो पूरा मिला लेकिन राजवंश के अधिकारी वे नहीं हुए। गांधी, पटेल, गोखले, राजेन्द्र प्रसाद आदि सैकड़ों नाम हैं। लेकिन नेहरू खानदान ने अपना वैभव कायम रखा और उन्हें राजवंशों की श्रेणी में रख लिया गया। हर ओर से यही आवाज आती रही कि हुकूमत इनके खून में बहती है। आपातकाल लगाना, सिक्खों का कत्लेआम करना, भ्रष्टाचार से अपनी तिजौरियाँ भर लेना जैसे अनगिनत काम करने पर भी उनपर अंगुली तक नहीं उठाना, उनके राजवंशी होने का प्रमाण है। जनता बस एक ही बात मानती है कि हुकूमत किसके खून में बहती है। अब तो साहित्यकार और इतिहासकार तक इसी सत्य को स्थापित करने में जुट गये हैं।
हम सबने इतिहास में यही पढ़ा था कि चन्द्रगुप्त मौर्य बचपन में एक गड़रिया था, उसकी विलक्षण बुद्धि को देखकर उसे चाणक्य ने अपना शिष्य बनाया और फिर मगध का राजा बनाया। लेकिन विगत कुछ सालों से टीवी पर यह सिद्ध करने का सफल प्रयास चल रहा है कि चन्द्रगुप्त गड़रिया नहीं था अपितु वह राजपुत्र था। कहने का तात्पर्य है कि हुकूमत इनके खून में बहती है, इसी बात को स्थापित किया जा रहा है। जिनके खून में हुकूमत है बस वही हुकूमत करने योग्य हैं। हमारे देश ने लोकतंत्र जब अपनाया तब चन्द्रगुप्त को आदर्श माना कि एक गड़रिये में भी राजा बनने के सारे गुण होते हैं। लेकिन जब इतिहास को ही बदलने का प्रयास किया जा रहा हो तब वर्तमान तो स्थापित स्वत: ही हो जाएगा। इसलिये तो बड़ी ही विद्रूपता से साथ कहा जाता है कि चायवाला हमारे देश का प्रधानमंत्री कैसे हो सकता है? यह तुम्हारा प्रधानमंत्री है, हमारा नहीं। यह सूट पहनता है तो चोर है, विदेश जाता है तो फरेबी है। हमारे खून में हुकूमत है, हम प्रधानमंत्री तक को संसद में भी चोर बोल देते हैं और हम पर कोई अंगुली भी नहीं उठा पाता!  
लेकिन देश की मानसिकता में फिर बदलाव आ गया, राजवंश के राजकुमार की हरकते राजवंशीय नहीं दिखायी दी और जनता मजबूरन उनके साथ खड़े रहने पर बाध्य होने लगी। भला राजा मंचों पर गाली देता हुआ, झूठ बोलता हुआ, चिल्लाता हुआ शोभा देता है! नहीं, कदापि नहीं, यह राजवंश के लक्षण ही नहीं हैं, लोकप्रियता में गिरावट आ गयी। अब फिर से राजवंशी तौर तरीके की तलाश शुरू की गयी और एक चेहरा मिल गया। चेहरा-मोहरा, हाव-भाव, सभी कुछ राजवंशी लगने लगा और जनता के सामने लाकर खड़ा कर दिया की यह लो, हमारा राजवंशी चेहरा, हुकूमत इनके खून में बहती है। हमने अपनी ओर देखा और कह उठे कि गुलामी हमारे खून में बसती है। इतिहास बदल दिया और सिद्ध कर दिया कि कोई भी सामान्य व्यक्ति हुकूमत के काबिल नहीं होता, बस राजवंशीय व्यक्ति ही हुकूमत के काबिल होता है। तुम चन्द्रगुप्त का उदाहरण दोंगे और हम इतिहास ही बदल देंगे। जिस कौम के पास अपने इतिहास को सुरक्षित रखने का भी माद्दा नहीं हो, वह कौम कैसे जीवित रह सकती है? वह तो गुलाम रहने योग्य ही होती है और उसके समक्ष तो किसी ने किसी राजवंशीय को ही लाकर खड़ा किया जाता रहेगा। जनता तुम्हारो कार्य से प्रभावित तो होगी लेकिन सर तो राजवंशीय के समक्ष ही झुकेगा। जनता को सिद्ध करना है कि वे लोकतंत्र में जी रहे हैं या फिर अभी भी राजवंश की गुलामी को ओढ़कर जी रहे हैं? हुकूमत इनके खून में बहती है इसे ही मान्यता मिलेगी या हमारे खून में गुलामी नहीं बहती, यह हम सिद्ध कर पाएंगे!

Saturday, January 19, 2019

हीन भावना से ग्रस्त हैं हम

कल मैंने एक आलेख लिखा था - पाई-पाई बचाते हैं और रत्ती-रत्ती मन को मारते हैं । हम भारतीयों का पैसे के प्रति ऐसा ही अनुराग है। लेकिन इसके मूल में हमारी हीन भावना है। दुनिया जब विज्ञान के माध्यम से नयी दुनिया में प्रवेश कर रही थी, तब हम पुरातन में ही उलझे थे। किसी भी परिवार का बच्चा अपने माता-पिता पर विश्वास नहीं करता, वह उन्हें पुरातन पंथी ही मानता है और हमेशा असंतुष्ट रहता है। परिवार में जो भी आधुनिक दिखता है, सभी बच्चों का झुकाव उसकी तरफ रहता है। अंग्रेज हमारे यहाँ आये, उनकी आधुनिकता और खुले विचारों के कारण युवा पीढ़ी उनकी कायल हो गयी। उन्होंने हमें गुलाम बनाया लेकिन हम आजतक भी उन्हें अपना आदर्श मानते हैं। हम कभी भी अंग्रेजों से घृणा नहीं कर पाए। उनकी भाषा, उनकी वेशभूषा, उनका खान-पान, उनका नाचना-गाना सभी कुछ हमारे लिये आकर्षण के केन्द्र रहे। वे जन्मदिन पर केक काटते हैं, हमारे हर बच्चे ने कहा कि मुझे केक ही काटना है। हवन करना, मन्दिर जाना, दान देना सभी कुछ पुरातनपंथी सोच हो गये और हमारे अन्दर हीनभावना को जन्म देने लगे। क्लब जाना फैशन हो गया, जो नहीं जा पाया वे हीन भावना का शिकार होने लगे। अंग्रेजी का ज्ञान विद्वता की निशानी बन गया और संस्कृत व हिन्दी या कोई भी स्थानीय भाषा पुरातन पंथी हो गयी। पति और पत्नी में आपस में हीन भावना हो गयी, बाप और बेटे में हीन भावना हो गयी, सास और बहु में हीन भावना हो गयी, मित्र मित्र में हीन भावना हो गयी, गुरु शिष्य में हीन भावना हो गयी। इन सारी हीन भावना को समाप्त करने के लिये पैसा ढाल बन गया। लोगों को लगा कि जिसके पास पैसा है, वह समाज में सम्मान पा लेता है, नहीं तो उसे उच्च शिक्षा, उच्च ज्ञान से गुजरना होता है।
पैसे से सम्मान खरीदने की होड़ लग गयी और कैसे भी पैसा आए, लोग इस बात में जुट गये। अपने गुणों को बढ़ाने का प्रयास नहीं हुआ बस प्रयास हुआ तो पैसा एकत्र करने का। लोग सरल मार्ग ढूंढने लगे पैसा एकत्र करने का, सट्टा, शेयर, ब्याज आदि ऐसे ही मार्ग थे। लोग काल्पनिक दुनिया में जीने लगे। पैसे से स्वाभिमान खरीदने की सोचने लगे, लेकिन पैसे से स्वाभिमान नहीं आता, स्वाभिमान तो आता है, अपने पर विश्वास कायम रखने में। हम जैसे भी हैं, हमारे पास मुठ्ठी भर ही ज्ञान है लेकिन इस मुठ्ठी भर ज्ञान से ही हम दुनिया में सुख पूर्वक रह लेंगे, यह सोच बिसरा दी। सूर्य के पास अपार प्रकाश है, लेकिन मैं एक अंजुली भर ही प्रकाश अपने पास संचित कर पाती हूँ, बस सभी को इतना ही मिलता है। मैं मुठ्ठी भर से खुश हूँ लेकिन दूसरा मुठ्ठी भर से खुश ना होकर दुखी है, बस यहीं हीन भावना घर करने लगती है और हम कृत्रिम तरीकों को अपनाने लगते हैं। हम भारतीय संतुष्ट हो ही नहीं पाते क्योंकि हमने खुशी के प्रतिमान खुद को देखकर नहीं बनाए अपितु दूसरों को देखकर बनाए हैं। जैसे ही सामने वाला हँसता हुआ दिखायी देता है, हमें लगता है कि यह खुश क्यों हैं? हम हँसना छोड़ देते हैं, खुश रहना छोड़ देते हैं, मानसिक अवसाद में घिर जाते हैं और असंतुष्टि का भाव इस कदर हावी हो जाता है कि किसी परिस्थिति में भी संतुष्ट नहीं हो पाते। बस सबकुछ बदलना चाहते हैं। हमारे देश के पास क्या नहीं है? हमारे युवा में ज्ञान भरा हुआ है, बुद्धिमत्ता की कमी नहीं है लेकिन हम हमेशा विदेश को बड़ा मानता है, उनके हर त्योहार को अपनाना चाहता है, उनकी भाषा, उनकी वेशभूषा, उनका खानपान, उनका आचरण, सबकुछ की नकल करना चाहते हैं, लेकिन जो अपना नहीं है, वह खुशी नहीं दे पाता। भारत में राजनैतिक अस्थिरता का भी यही कारण है, हीनभावना से ग्रसित समाज अच्छा होने पर सबसे ज्यादा विचलित होता है। भारतीयता उसे फूटी आँख नहीं सुहाती, उसे तो लगता है कि विदेशी ही अच्छे हैं, वे ही हमें नयेपन की ओर ले जाएंगे। ये भारतीय तो हमें शुद्ध सात्विक बना देंगे। भारत का गौरव लौट आएगा का अर्थ है कि हम पुराने युग जैसे हो जाएंगे। हमें मांसाहार, खुला यौनाचार, घर-परिवार को छोड़कर दुनिया नापने का शौक, भारतीय होने पर सम्भव नहीं होगा। बस हमें भ्रष्टाचार की भाषा समझ आने लगती है, दबंगई की भाषा समझ आने लगती है, पैसे की भाषा समझ आने लगती है। हम जनता को समझाने में सफल हो जाते हैं कि कौवा चला हंस की चाल, याने की हैं तो भारतीय और होड़ कर रहे हैं विदेश की। लोग कहने लगते हैं कि विकास-विकास सब फिजूल की बात हैं, हम भला उनका मुकाबला कर सकते हैं? हमें तो केवल पैसा चाहिये जिससे हम भी हमारे बच्चों को विदेश भेज सकें। हमारा बच्चा भी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ सके, हमारा बच्चा भी जन्मदिन पर केक काट सके, हमारा बच्चा भी क्लब में जा सके। हम खुद अंग्रेजों से बड़े बन सकते हैं, यह सोच हमारे अन्दर घुसती ही नहीं, बस उन जैसा बनने की ही होड़ में हम लगे रहते हैं। इसलिये कभी अटलजी फैल हो जाते हैं और अब मोदी को फैल करने पर हम सब उतारू हैं। क्योंकि हमारे सामने विदेशी विकल्प खड़ा है, ज्ञान शून्य होने पर भी विदेशी विकल्प हमारे मन में बसा है। जिसके भी ऊपर विदेश का ठप्पा लग जाता है वह हमारे लिये आराध्य हो जाता है। गाँधी, नेहरू विदेश का ठप्पा लगाकर हमारे बीच आए, बस फिर क्या था, वे हमारे आराध्य बन गये। इसलिये आज हम हीन भावना से ग्रसित होकर केवल संचय की ओर झुक रहे हैं। आगामी चुनाव की राह आसान नहीं है, क्योंकि हम हीन भावना से भरे हैं।

Thursday, January 17, 2019

पाई-पाई बचाते हैं और रत्ती-रत्ती मन को मारते हैं


कल ज्वैलर की दुकान पर खड़ी थी, छोटा-मोटा कुछ खरीदना था। मुझे जब कुछ खरीदना होता है तब मैं अपनी आवश्यकता देखती हूँ, भाव नहीं। मुझे लगता है कि भाव देखकर कुछ खरीदा ही नहीं जा सकता है। अपना सामान खरीदते हुए ऐसे ही सोने के आज के भाव पर बात आ गयी, क्योंकि सोने के भाव रोज ही घटते-बढ़ते रहते हैं। सेल्स-गर्ल ने एक मजेदार बात बतायी कि जब सोना सस्ता होता है तब हमारे यहाँ ग्राहकी कम होती है लेकिन जब सोना महंगा होता है तब ग्राहकी बढ़ जाती है। कारण है कि लोग सोचते हैं कि आज सस्ता हुआ है तो अभी और सस्ता होगा, इसलिये रूक जाओ लेकिन जब महंगा होने लगता है तब चिन्ता हो जाती है कि खरीद लो नहीं तो और महंगा हो जाएगा। एक हम जैसे  लोग हैं कि ना सस्ता देखते हैं और ना ही महंगा देखते हैं बस अपने मन की जरूरत देखते हैं। जब मन किया तब खरीद लो, दुनिया के भाव तो चढ़ते-उतरते ही रहते हैं लेकिन मन के भाव स्थिर रहने चाहिये। आज मन कर रहा है तो खरीद लो, मन की सुनने में ही सार है। कई बार लोग सेल में चीजे खऱीदते हैं और सस्ती के चक्कर में ना जाने कितनी बेकार की चीजें खरीद लाते हैं। मेरा मन तो हमेशा यही कहता है कि जब जरूरत हो और जितनी जरूरत हो उतना ही खऱीदो, ना भाव की चिन्ता करो और ना मुहुर्त की। भाव की चिन्ता करने पर हम कभी भी अपने मन को खुश नहीं रख पाते।
दुनिया पाई-पाई का हिसाब रखने से चलती है और मैं मन की मौज का हिसाब रखना चाहती हूँ। जो लोग भी पाई-पाई का हिसाब रखते हैं वे अक्सर महंगा ही खऱीदते हैं, जैसे मुझे सेल्स-गर्ल ने बताया कि हमारे यहाँ हर आदमी महंगे के डर से महंगे भाव में ही खऱीदता है। एक पुरानी बात याद आ गयी, जब बच्चे पढ़ ही रहे थे तब एक विवाह समारोह में जाने के लिये बिटिया को हवाई जहाज से जाना आवश्यक था क्योंकि उसकी परीक्षा थी। अब या तो परीक्षा ही दो या फिर विवाह में ही जाओ, लेकिन हवाई यात्रा से दोनों सम्भव हो रहा था। मैंने पतिदेव को समझाया कि अभी समय की मांग है कि हवाईजहाज का टिकट लिया जाए, क्योंकि यह समय लौटकर नहीं आएगा। आज इसे हम टिकट दिला रहे हैं और कल इसे हमारी जरूरत नहीं होगी। लेकिन यदि हमने आज नहीं दिलायी तो इसके मन की कसक हम ताजिन्दगी नहीं मिटा सकेंगे। इसलिये पैसे को मत देखो, केवल जरूरत और मन को देखो। लेकिन इस देश में लोग मन को मारे बैठे हैं, केवल पैसा ही उनकी प्रमुखता में है। प्याज के भाव बढ़ गये, पेट्रोल के भाव बढ़ गये तो उनका सबकुछ लुट गया, महिने में शायद 100-200 रू. अन्तर आया होगा लेकिन हमने ऐसा शोर मचाया कि ना जाने क्या हो गया! हमारा मन सबके सामने खुलकर बाहर आ गया कि हम केवल पैसे से ही संचालित होते हैं और फिर इस बात का जमकर फायदा उठाया गया। पैसा-पैसा कर-करके हमने खुद को पैसे का दास बना लिया। चारों तरफ एक ही बात की पैसा कैसे बटोरा जाए, लोगों ने लाखों-करोड़ों बटोरने शुरू कर दिये और सस्ते-महंगे के चक्कर में खर्च भी नहीं कर पाए। आज किसी भी वरिष्ठ नागरिक से पूछ लीजिए, वह यही कहेगा कि पैसा बहुत है, खर्च ही नहीं होता, यही छोड़कर जाना होगा। लेकिन पैसा एकत्र करने का मोह तब भी समाप्त नहीं होता। हमें रोजमर्रा की जरूरतों के लिये भी रोज ही संघर्ष करना पड़ता है, घर में समझाना पड़ता है कि मन की जरूरतें पूरी कर लो नहीं तो मन मर जाएगा और फिर हम भी मर जाएंगे। लेकिन हम पैसे को सहलाते रहते हैं और मन को मारते रहते हैं। ज्वैलर से लेकर आलू-प्याज तक वाला व्यापारी हमारे मन को जान चुका है, राजनैतिक दल जान चुके हैं कि हम केवल पैसे से ही संचालित होते हैं। बस तूफान खड़ा होता है और राजनीति बदल जाती है। सदियों से हमें चन्द चांदी के सिक्कों से खऱीदा गया है और हम पर राज किया है। हमने पैसे के लिये घर-परिवार सबको छोड़ दिया। हमारे सामने हरा नोट लहरा दिया जाता है और हमारा मन डोल जाता है। सारी दुनिया कहती है कि भारतीयों को गुलाम बनाना बहुत सरल है, बस उन्हें पैसा दिखाओ, वे बिक जाएंगे। पाई-पाई बचाते हैं और रत्ती-रत्ती मन को मारते हैं, सस्ता ढूंढते हैं और महंगे में सौदा खऱीदते हैं, यही हमारी नियति बनकर रह गयी है। कभी पैसे से इतर मन के भाव को देखना सीख लो, दुनिया अपनी सी लगेगी। लोग कहते हैं कि मोदी अच्छा कर रहा है लेकिन हमारी जमीन के भाव सस्ते हो गये हैं इसलिये मोदी के हटाना जरूरी है। हम यदि रिश्वत नहीं लेंगे तो हमारा रूआब कम हो जाएगा, इसलिये मोदी को हटाना जरूरी है, हम बिल काटकर देंगे तो टेक्स देना पड़ेगा, इसलिये मोदी को हटाना जरूरी है। न जाने कितने तर्क हैं जो हमने पैसे के कारण मोदी को हटाने के लिये गढ़ लिये हैं। हमारे भ्रष्टाचार पर आंच नहीं आए तो मोदी अच्छा है, हमारे सारे काम बेईमानी से हों लेकिन दुनिया ईमानदारी से चले तो मोदी अच्छा है, मुझे एक पैसा भी टेक्स में नहीं देना पड़े और देश अमेरिका जैसा वैभव युक्त बन जाए तो मोदी अच्छा है। भारतवासी पैसे के दास हैं, भारतवासी पैसे के लिये संतान का सौदा भी कर लेते हैं, भारतवासी आलू-प्याज के कारण सत्ता बदल देते हैं, ऐसे कितने ही सत्य दुनिया जानती है और व्यापार करती है। कब भाव बढ़ाने हैं और कब घटाने हैं, व्यापार जगत का व्यक्ति जानता है। हम पैसे को दिल में बसाकर रखते हैं और मन को मारते रहते हैं, यही पैसा वे चुपके से हमसे निकलवा लेते हैं और हमारा मन भी मार देते हैं और पैसा भी लूट लेते हैं।

Saturday, January 5, 2019

कष्ट के बाद ही सुख है


यदि मैं आप से पूछूं कि जिन्दगी के किस कार्य में सबसे बड़ा कष्ट है? तो आप दुनिया जहान का चक्कर कटा लेंगे अपने दीमाग को लेकिन यदि यही प्रश्न में किसी महिला से पूछूं तो झट से उत्तर दे देगी कि माँ बनने में ही सबसे बड़ा कष्ट है। अब यदि मैं पूछूं कि सबसे बड़ा सुख क्या है? तब भी वही बात होगी कि पुरुष का ध्यान कई सुखों की तरफ जाएगा लेकिन महिला खटाक से कहेगी कि माँ बनना ही सबसे बड़ा सुख है। जिस क्रिया में सबसे बड़ा कष्ट है उसी से होने वाली प्राप्ति में सबसे बड़ा सुख है। लेकिन हम यह बात भूलते जा रहे हैं, हमने इस सत्य को सदियों से भुलाना शुरू कर दिया था। जब भी हम पर कष्ट आया हमने सरल मार्ग चुन लिया, कष्ट से समझौता कर लिया। सदियों से देश पर संकट आते रहे हैं, लेकिन हमने संघर्ष के स्थान पर सुख का मार्ग चुन लिया। कभी हम बिना लड़े ही गुलाम बन गये, कभी हमने अपने धर्म को ही बेच दिया, कभी हमने अपनी बेटियों के बदले सुख का सौदा कर लिया। वर्तमान में नयी पीढ़ी ने देश ही छोड़ दिया। देश में कष्ट ही कष्ट हैं, यह कहकर दूसरे देश में शरण ले ली। जब हमने मातृत्व जैसा कष्ट ही नहीं उठाया तब हम मातृत्व का सुख कैसे पा सकेंगे? हम वास्तविक सुख से ही अनभिज्ञ हो गये। क्योंकि जितना कष्ट उठाओंगे उसके बाद ही जो सुख मिलेगा वह अमृत जैसा लगेगा।
समाज ने हमें एक अनुशासन में बांधा लेकिन हमने ना तो उस कष्ट को सहा और ना ही उसमें परिवर्तन के लिये संघर्ष किया बस पलायन कर लिया। सामूहिक परिवारों में अनेक कष्ट थे तो हमने सामूहिक परिवार तोड़ दिये और उस सुख से वंचित हो गये। फिर परिवारों में भी कष्ट लगने लगा तो परिवार तोड़ दिये, पति-पत्नी में कष्ट हुआ तो विवाह संस्था को तोड़ दिया। मातृत्व और पितृत्व की जिम्मेदारी से कष्ट हुआ तो लिंग भेद को तोड़ दिया। हम कष्टों से  भागते रहे लेकिन कष्ट तो प्रकृति का उपहार है, कष्ट हमारे साथ लगे रहे। अब यह स्थिति हो गयी है कि व्यक्ति अकेला खड़ा है, ना उसके पास देश बचा है, ना उसके पास समाज बचा है और ना उसके पास परिवार बचा है। अब तो जीवनसाथी भी नहीं बचा और ना बचे हैं बच्चे। चारों तरफ से संकटों में घिर गये हैं हम। कोई चिल्ला रहा है – देश बचाओ, कोई चिल्ला रहा है - धर्म बचाओ, कोई चिल्ला रहा है - समाज बचाओ, कोई चिल्ला रहा है - परिवार बचाओ। चारों तरफ चिल्ल पौ मची है लेकिन कोई भी महिला की तरह कष्ट को धारण करने को तैयार नहीं। सृष्टि को रचने के लिये महिला कितना कष्ट सहती है, यह समझने को भी कोई तैयार नहीं।
एक महिला संतान को जन्म देने के लिये कष्ट उठाती है, आप कहेंगे कि हाँ नौ माह कष्ट उठाती है। मैं कहूँगी कि आप यहीं पर गलत हैं। एक माँ जीवन देने के लिये लगभग 30 से 40 वर्ष लगातार कष्ट उठाती है। इस कष्ट के समय वह अकेली खड़ी होती है। उसके साथ हमदर्दी भी नहीं होती अपितु अस्पर्श्य का दंश उसके समक्ष खड़ा होता है। माँ बनने की प्रथम प्रक्रिया से वह जब गुजरती है तब उसे जो कष्ट सहना पड़ता है, वह कष्ट शायद ही किसी पुरुष ने कभी झेला हो! हर माह इसी कष्ट से लगातार 30-40 साल तक गुजरना पड़ता है तब जाकर वह सृजन करती है। सृजन का फल जब शिशु रूप में उसकी गोद में आता है तब संसार का सबसे बड़ा सुख उसे प्राप्त होता है और इस सुख को भी कोई भी पुरुष प्राप्त नहीं कर सकता।
इसलिये कष्ट तो जीवन का अनिवार्य अंग हैं, कष्ट से होकर ही सुख निकलता है। हमारे देशवासियों को कष्ट से डर लगने लगा है। हमने आसान रास्ते चुन लिये हैं। सत्ता के करीब रहने के आसान तरीके। इसके लिये मन के पोर-पोर को मारना पड़े तो मार देंगे लेकिन कष्टों भरे जीवन को कभी अंगीकार नहीं करेंगे। संघर्ष की ओर बढ़े सारे ही कदम राजनीति की ओर मुड़ जाते हैं, बस सत्ता मिल जाए तो सारे कष्ट दूर हो जाएं। महिला भी यही सोचने लगी है कि सृजन में बहुत कष्ट हैं, नहीं अब नवीन सृजन नहीं। समाज भी नवीन चिंतन से भाग रहा है और देश भी नये कलेवर के साथ खड़ा नहीं हो पा रहा है। सब कष्टों से डर गये हैं। मेरे ऊपर भी अभी सात दिन पहले एक डर हावी हुआ, दुनिया से कट गयी लेकिन फिर सुबह हुई और मैंने सोचा कि महिला हूँ तो कष्टों से क्या डरना? कष्टों को धारण कर लो फिर सुख का कोई मार्ग निकल ही जाएगा। चार साल पहले भी दुनिया ने मुझे ठोकर मारने का प्रयास किया था, मैंने भी ठोकर मार दी। पहले भी मैं 25 सालों से लिख रही थी लेकिन जब दुनिया ने कष्ट दिया तब मैंने अपने मन का, अपनी संवेदना का लिखना शुरू किया और मैं आप लोगों से जुड़ गयी। अब जो सुख मुझे मिल रहा है, वह जीवन का सबसे हसीन सुख है। कष्ट आते हैं, मैं प्यार से उन्हें अपनी झोली में भर लेती हूँ और निकल पड़ती हूँ नवीन सृजन की ओर, बस कष्ट कब सुख में बदल जाते हैं, मुझे भी पता नहीं लगता। आप भी सच्चे कष्ट से रूबरू होने की पहल कीजिये, आपको भी अपना देश मिलेगा, समाज मिलेगा, परिवार मिलेगा और जब अपना मिलेगा तो सच्चा सुख मिलेगा। राजनीति की ओर देखना ही सरल मार्ग की तलाश है, सरल मार्ग से कभी सृजन का सुख नहीं मिलता। उत्तिष्ठ भारत:।   

Thursday, January 3, 2019

यह लड़ाई है गड़रियों की ना की भेड़ों की


कभी हम यह गीत सुना करते थे – यह लड़ाई है दीये की और तूफान की, लेकिन मोदीजी ने कहा कि यह लड़ाई है महागठबंधन और जनता की। मैं पहली बार मोदी जी के कथन से इत्तेफाक नहीं रखती, क्योंकि भारत में जनता है ही नहीं! यहाँ तो भेड़ें हैं, जो अपने-अपने गड़रियों से संचालित होती हैं। गड़रिया जिस किसी कुएं में गिरने को कहता है, भेड़े लाइन बनाकर उस कुएं में कूद जाती हैं। देश का नम्बर एक गड़रिया है – धार्मिक नेता। एक धर्म के गड़रिये ने कहा कि महिला पुरुष के पैर की जूती है, पुरुष का अधिकार है कि उसे तलाक बोलकर घर से धक्का मारने का। गड़रिये की बात सारी भेड़ों ने मानी, यहाँ तक की महिला भेड़ों ने भी मानी और खुद के ही खिलाफ तख्ती लेकर खड़ी हो गयी कि हम वाकयी में पैर की जूती है, हम किसी भी कानून के बदलाव की पैरवी नहीं करते। दूसरे धर्म के गड़रिये ने कहा कि महिला अपवित्र है, उसे रसोई, बिस्तर, मन्दिर कहीं भी जाने का अधिकार नहीं है। महिला ने खुद स्वीकार किया कि हम अपवित्र हैं, हमें वाकयी में कोई अधिकार नहीं है। बहस अपवित्रता पर नहीं हुई, बहस हुई केवल महिला पर, बहस तलाक के कारण पर नहीं हुई, बहस हुई केवल महिला पर। इन गड़रियों के पास थोक की भेड़े एकत्र हो गयीं, मोदी जी कहते हैं कि ये भेड़ें लोकतंत्र की रक्षा करेंगी! भेड़ों का  भी कहीं लोकतंत्र है? ये भेड़ें तो गड़रियों की तान पर कुएं में गिरने को तैयार हो जाती हैं, इनके  पास ना लोकतंत्र हैं ना स्वयं का कोई तंत्र है।
देश में दूसरे गड़रिये हैं, जो जातिगत भेड़ों को एकत्र करते हैं। कुछ राजनैतिक गड़रिये ऐसे गड़रियों को समय-समय पर पैदा भी करते रहते हैं। ये गड़रिये अपनी भेड़ों से कहते हैं कि तुम्हारे गड़रिये शक्तिशाली होने चाहिये, इसके लिये इन्हें विशेष अधिकार मिलने चाहिये और सारी भेड़ें इन्हें शक्तिशाली बनाने में जुट जाती हैं। कहीं आरक्षण के नाम पर विशेष अधिकार मांगते हैं तो कभी विशेष दर्जा। अभी बीते 5-7 सालों में ऐसे ही कुछ गड़रियों को पैदा किया गया, जिसने जाति के नाम पर, भ्रष्टाचार के नाम पर अपनी-अपनी भेड़ों का झुण्ड बनाया। भेड़ें वहां भी नाक बहने वाली ही थी, बस गड़रियों की नयी खेप राजनैतिक सौदेबाजी करने के नये पैतरों के साथ उपस्थित थी। एक सबसे खतरनाक गड़रिया जो पहले से ही देश में जड़े जमाए बैठा था, वह नये कलेवर के साथ आ गया और उसका दायरा बढ़ गया। यह गड़रिया झूठ को सच और सच को झूठ बताकर समाचारों की मण्डी लगाने लगा, इसके प्रभाव में अच्छी-अच्छी भेड़ें आ गयी, मानो उनके लिये ये गड़रिये भगवान बन गये। शेष गड़रियों की दुकानें समय-समय पर ही खुलती लेकिन इनकी दुकान चौबीसों घण्टे खुली रहती, भेड़े आती, चरती और इनके ही खेत में मींगनी करके बहुमूल्य खाद देती। ऐसे ही अनेक गड़रिये इस देश में फल-फूल रहे हैं।
राजनेता क्या करता है? अभी तक यह होता आया है कि जिसके पास जितने गड़रिये, उसे ही सत्ता का सिंहासन मिल जाता था। मोदीजी ने कहा कि नहीं हम भेड़ों को ही जागृत करेंगे, कुछ भेड़ों ने मिमियांकर उनका समर्थन भी कर दिया लेकिन जैसे ही चुनाव आते गड़रिये लामबन्द हो जाते और अपनी-अपनी भेड़ों को हांककर ले जाते। मोदीजी ने सारी भेड़ों के लिये व्यवस्थाएं देनी शुरू की लेकिन भेड़ों को अच्छा रहना और अच्छा खाने की समझ नहीं थी, वे तो केवल गड़रिये की बंसी की आवाज ही पहचानती थी, बस जैसे ही बंसी बजती और भेड़े नरम-नरम घास छोड़कर भाग जातीं। अब तो यह हालात हो गये हैं कि नये-नये गड़रिये पैदा हो रहे हैं, कोई कहता है कि मेरे पास इतनी लाख भेड़े हैं तो कोई कहता है कि मेरे पास इतनी हजार भेड़े हैं, मुझे सुविधा दो, मुझे विशेष अधिकार दो, बस मेरी सारी भेड़ें तुम्हारे ही कुएं में आकर गिरेंगी। गड़रियों का गठबंधन बन रहा है। आपके गड़रियों का भी गठबंधन बना लीजिये, भेड़ों के भरोसे मत रहिये, ये खुद की भी नहीं होती। ये तो बस गड़रिये की ही होती हैं। भेड़ों के अधिकारों की बात मत करिये, क्योंकि इनको तो खुद ही नहीं पता कि इनके अधिकार क्या हैं! दुनिया में ऐसा कोई प्राणी है जो खुद के ही खुलाफ तख्ती लेकर खड़ा हो जाए! इसलिये गड़रियों को एकत्र कीजिए और जरूरत पड़ने पर नये पैदा कीजिये।

Thursday, December 27, 2018

पधारो म्हारा देश या?


आखिर हमारे छोटे शहर सैलानियों का बढ़ता आवागमन क्यों नहीं झेल पाते हैं? अब आप मेरे शहर उदयपुर को ही ले लीजिए, शहर में बीचों-बीच झीलें हैं तो झीलों से सटी पहाड़ियों पर भी बसावट है। पुराने शहर में सड़के संकरी भी हैं और पार्किंग की जगह ही नहीं है। उदयपुर के पैलेस तक जाना हो तो शहर के संकरे से रास्ते से गुजरना पड़ता है, झील तक जाने के लिये भी रास्ते संकरे ही हैं, ऐसे में सैलानियों की एक ही बस रास्ता जाम करने में काफी है। अभी दीवाली पर मैंने जैसलमेर के बारे में लिखा था कि वहाँ किले तक पहुँचना हमारे लिये नामुमकिन हो गया था और ऐसा ही नजारा उदयपुर का हो गया है। कल पैदल चलते हुए फतेहसागर जा पहुँचे, वहाँ फूलों की प्रदर्शनी लगी थी तो उसे भी देख लिया लेकिन अब लगा कि वापसी भी पैदल नहीं की जा सकती है तो उबर की सेवा लेने के लिये केब बुक की लेकिन भीड़ और शिल्पग्राम जाती गाड़ियों के कारण टेक्सी को आने में 45 मिनट लग गये। उदयपुर के लिये यह सैलानियों का मौसम है, दीवाली पर भी था और शायद फरवरी तक तो रहेगा ही। सारे रास्ते गाड़ियों, बसों से जाम रहेंगे, होटल की कीमते आसमान छूने लगेगी, दुकानदार भी आपको घास नहीं डालेंगे। यदि एक किलोमीटर के रास्ते को पार करने में आपको आधा घण्टा लगने लगे तो समझ सकते हैं कि रोजर्मरा के काम करने में कितनी कठिनाई का सामना करना पड़ता होगा।
मेरे जैसे ना जाने कितने लोग अब गाड़ी नहीं चला पाते, क्योंकि एक तो भीड़ और फिर पार्किंग की समस्या। केब लो और चल दो, लेकिन जब केब मिलना भी मुश्किल हो जाए तो खीज होने लगती है। झील के चारों तरफ बढ़ते जा रहे ठेले, फूड-ट्रक आदि भी पार्किंग की समस्या को बढ़ा रहे हैं। पैदल चलने वाले, घूमने वालों के लिये कोई पगडण्डी भी सुरक्षित नहीं है। या तो वहाँ कोई भुट्टे वाला आकर बैठ गया है या फिर किसी ने अपनी गाड़ी ही खड़ी कर दी है। सैलानी बढ़ रहे हैं लेकिन शहर का वासी घरों में कैद होकर रह गया है। प्रशासन भी सड़कों को विस्तार नहीं दे सकता है, क्योंकि जगह ही उतनी है। शहर के कुछ होटल बहुत प्रसिद्ध हैं, उनके रूफ-टॉप रेस्ट्रा से पिछोला झील का नजारा बेदह खूबसूरत होता है, लेकिन वहाँ तक पहुंचने के लिये 10 फीट की संकरी गली को पार करना होता है। इसका कोई इलाज प्रशासन के पास नहीं है, सिवाय इसके की पैदल जाओ और मस्त रहो। सैलानी तो पैदल चले जाएगा लेकिन जो बाशिन्दे उन गलियों में रह रहे हैं, उनके लिये तो मुसीबत आ जाती है। हम शहर के बाहर रहते हैं लेकिन हमारे चारों तरफ फाइव स्टार होटलों का जमावड़ा है, ऐसे में सारे रास्ते गाड़ियों और बसों की आवाजाही से जाम रहते हैं। सड़क पार करना तो भारी मशक्कत का काम है।
जहाँ भी कुछ चौड़े रास्ते हैं, वहाँ घरों के बाहर लोगों ने 6-6 फीट घेरकर रोक रखा है, इसे देखने वाला कोई नहीं है। यहाँ तक की फाइव स्टार होटलों तक ने पूरे रास्ते घेर रखे हैं। हमारे पास के एक होटल ने तो सड़क को आधी कर दिया है। चालीस फीट से चली सड़क, होटल आते-आते बीस फीट से भी कम रह गयी है। सैलानी भी परेशान होते हैं और शहर के बाशिंदे भी। सैलानी रोज बढ़ रहे हैं लेकिन शहर तो अपनी सीमा में ही रहेगा, इसलिये कम से कम गैरकानूनी कब्जों पर तो प्रशासन को अनदेखी नहीं करनी चाहिये। सारा व्यवसाय सड़क पर करने की छूट तो नहीं मिलनी चाहिये। एक दिन ऐसा आएगा जब शहर ही बदरंग होने लगेगा और फिर रात-दिन बढ़ते होटल खाली रहने पर मजबूर हो जाएंगे। कम से कम बसों को शहर में दौड़ने पर पाबन्दी तो लगानी ही होगी, उसके लिये वैकल्पिक व्यवस्था करनी होगी। उदयपुर जैसे शहरों को बचाना तो होगा ही नहीं तो पधारो म्हारा देश कहने की जगह पर कहना पड़ेगा कि मत पधारों म्हारा देश।   

Saturday, December 22, 2018

रूमाल ढूंढना सीख लो


न जाने कितनी फिल्मों में, सीरियल्स में, पड़ोस की ताकाझांकी में और अपने घर में तो रोज ही सुन रही हूँ, सुबह का राग! पतियों को रूमाल नहीं मिलता, चश्मा नहीं मिलता, घड़ी नहीं मिलती, बनियान भी नहीं मिलता, बस आँखों को भी इधर-उधर घुमाया तक नहीं कि आवाज लगा दी कि मेरा रूमाल कहाँ है, मोजा कहा है? 50 के दशक में पैदा हुए न जाने कितने पुरुषों की यही कहानी है। पत्नी हाथ में चमचा लिये रसोई में बनते नाश्ते को हिला रही है और उधर पति घर को हिलाने लगता है। पत्नी दौड़कर जाती है और सामने रखे रूमाल को हाथ पर धर देती है, सामने ही रखा है, दिखता नहीं है! जिस पुरुष ने सूरज से लेकर धऱती के गर्भ के अनगिनत रहस्य खोज लिये, दूसरी तरफ उसी के भाई से अपना रूमाल भी नहीं खोजा जा रहा। ऐसे पुरुष की सारी खोज बन्द हो गयी और दीमाग में जंग लग गयी। पहले उसने कामचोरी की फिर दीमाग ने कामचोरी शुरू कर दी। पहले रूमाल भूला अब वह खुद को भी भूलने लगा। कभी कहते थे कि पेड़ के सहारे बेल चलती है लेकिन अब बेल पेड़ को खड़े रहने में सहायता कर रही है।
सुबह-सुबह चुगली नहीं खा रही, आप बीती सुना रही हूँ। घोड़ा भी जब तक लौट-पोट नहीं कर लेता, उसमें दौड़ने का माद्दा पैदा नहीं होता, पेट की आंतों को जब तक गतिशील नहीं कर लेंगे अपने अन्दर के मलबे को नीचे धकेलती नहीं। लेकिन पति नामक प्राणी लगा पड़ा है अपने दीमाग को कुंद करने में। पत्नी को नाच नचाने के चक्कर में अपने दीमाग को नचाना भूलता जा रहा है और बुढ़ापा आते-आते दीमाग रूठकर बैठ जाता है, जाओ मुझे कुछ याद नहीं। पहले पत्नी का गुप्त खजाना आसानी से ढूंढ लिया जाता था लेकिन अब दीमाग पर जोर मारने पर भी खुद का खजाना भूल बैठे हैं! न जाने कितनी बार पत्नी के पर्स की तलाशी ली गयी होगी कि कहीं इसमें कोई प्रेम पत्र तो नहीं है लेकिन अब अपना पर्स ही नहीं मिलता! मैं अक्सर कहती हूँ कि खोयी चीज केवल आँखों से नहीं ढूंढी जाती उसके लिये दीमाग को काम लेना होता है और दीमाग का काम लेने की लिये उसे रोज रियाज कराया जाता है। कभी पहेलियां बूझते हैं तो कभी-कभी हाथ में गेम पकड़ा दिया जाता है कि इसे तोड़ों फिर जोड़ो। सारे दिन की अपनी रामायण को हम कभी भाई-बहनों को सुनाते हैं तो कभी दोस्तों-सखियों को। महिलाएं रोज नये-नये पकवान बनाती हैं और पुराने में नया छौंक लगाती हैं। पुरुष कभी अपनी बाइक के कलपुर्जे के साथ खिलवाड़ करता है तो कभी रेडियो को ही खोलकर बैठ जाता है। बस एक ही धुन रहती है कि दीमाग चलना चाहिये।
शिक्षा के कुछ विषय ऐसे होते हैं, जिनमें केवल रटना ही होता है, बस सारी गड़बड़ यहीं होती है, जो भी रटकर पास होते हैं, वे दीमाग को कुंद करने लगते हैं। लेकिन जहाँ दीमाग को समझ-समझकर समझाते हैं, वे दीमाग की धार लगाते रहते हैं। बाते करना, गप्प ठोकना, अपनी अभिव्यक्ति को लेखन के माध्यम से उजागर करना ये सारे ही प्रकार दीमाग की रियाज के लिये हैं, लेकिन जो लोग मौन धारण करने को ही पुरुषोचित बात मान लेते हैं वे अपने दीमाग के साथ छल करने लगते हैं और फिर दीमाग उनसे रूठ जाता है, अब बैठे रहो शान्ति से। मेरी एक मित्र थी, जीवन का उल्लास भरा था उसके अन्दर, सारा दिन बतियाना लेकिन पति महाराज मौनी बाबा। मैं समझ नहीं पाती थी कि कैसा है इनका जीवन लेकिन अब समझने लगी हूँ कि घर-घर में ऐसे स्वनाम धन्य पुरुषों की श्रृंखला खड़ी है। वे मौन रहकर ही खुद को बड़ा मान रहे हैं, रूमाल नहीं ढूंढ पाने को पति मान रहे हैं, उन्हें यह पता नहीं कि यही आदत उन्हें लाचार बना देगी। वे खुद को भी भूल जाएंगे। इसलिये खुद को याद रखना है तो बतियाओ, दीमाग को सतत खोज में लगाकर रखो। दीमाग के सारे न्यूरोन्स को सोने मत दो, बस घाणी के बैल की तरह जोत दो। बुढ़ापा आराम से कटेगा नहीं तो पूछते रह जाएंगे कि कौन आया है! मैंने तुम्हें पहचाना नहीं! चाय पीने के बाद भी पूछते रहेंगे कि मैंने चाय पी ली क्या! सावधान हो जाओ, दीमाग को भी सावधान कर दो और जीवन को जीने योग्य बना लो। जीवन दूसरों पर हुकुमत करने का नाम नहीं है, जीवन खुद पर हुकुमत करने का नाम है। इसलिये एक बार नहीं, बार-बार कहती हूँ कि खुद को साध लो, सारी दुनिया सध जाएगी। दीमाग को गतिशील रखो और खुद का रूमाल ही नहीं पत्नी का रूमाल भी ढूंढना सीख लो।