Monday, June 24, 2019

खानदान पुराना और खानसामा नया



मणि नाम का साँप वापस अपने बिल से निकला, चारों तरफ देखा कि बाढ़ का पानी उतर तो गया है ना? कहीं जंगल में मोर तो नाच नहीं रहें हैं ना? आश्वस्त हुआ फिर बिल से बाहर आया। नहीं, कोई खतरा नहीं। जैसे ही बिल से थोड़ा दूर ही चला था कि पता लगा, मालिक पर संकट गहराया है। मालिक सिंहासन खाली करने की जिद पर अड़े हैं। वह सरपट दौड़ लगाकर दरबार तक पहुँचा, देखा कि सन्नाटा पसरा है। सारे ही जीव फुसफुसा रहे हैं, सभी के मुँह पर चिन्ता पसरी है। मालिक ने एक माह का समय दिया था, वह पूरा होने में है। सारे देश में मुनादी फिरा दी गयी है कि मालिक के पैर की जूती सिंहासन के लिये चाहिये लेकिन लोग पैर की जूती बनकर भी सिंहासन पर बैठना नहीं चाहते! डरते हैं कि कहीं सीताराम केसरी जैसा हाल ना हो जाए! भला किसकी औकात है जो मालिक की बराबरी कर सके? आखिर कहा तो यही जाएगा ना कि मालिक की जगह ये बैठे हैं सिंहासन पर! नहीं बराबरी तो बिल्कुल भी नहीं। लेकिन मालिक है कि मान ही नहीं रहे हैं। असल में मालिक बोर हो गये हैं, कब तक एक ही मोदी को गाली देते रहें! वे हवा परिवर्तन को जाना चाहते हैं। मणि नाम के साँप को मालिक का उठाया हर कदम ऐसा ही लगता है जैसे प्रभु ने कदम उठाया हो! लेकिन मणि को गुस्सा भी बहुत  है कि मालिक के सिवाय किसी भी ऐरे-गैरे-नत्थू-गैरे को मालिक तो नहीं कहा जाएगा! वह सोच में पड़ गया, क्या बोले समझ नहीं आ रहा था। तभी दरबार से आवाज आयी, अरे देखो, अपना परम विषधर मणि साँप आ गया है! सारे दरबारी नाचने लगे, इसके जहर का तो तोड़ नहीं है तो बता मणि ऐसी परिस्थिति में क्या किया जाए?
मणि बोला कि करना क्या है, याद करो, पहले मालिक के प्रति वफादारी किसने निभायी थी। एक ने कहा कि सर, नेहरू के बाद ऐसा ही संकट पैदा हुआ था, इन्दिरा जी सिंहासन  पर बैठने में झिझक रही थी तो एक बौने से नेता को हमारे पूर्वजों ने सिंहासन पर बिठा दिया था। अभी बात भी पूरी नहीं हुई थी कि चारों तरफ से शोर उठ गया, नाम मत लो, ऐसे .... का। वह तो इन्दिरा जी का ऐसा प्रताप था कि उनको दूसरे देश में भेजकर हमेशा के लिये सुला दिया गया था, नहीं तो उसने इस खानदान को ही उलटने की तैयारी कर ली थी! चारों तरफ खामोशी छा गयी। तभी एक ओर से आवाज आयी कि एक जमाने में हमारे मालिक के ही वंशज हमारे प्रदेश की यात्रा पर आए थे, हमारे मुख्यमंत्री ने अपना कंधा आगे कर दिया था कि हुकुम आप इसपर पैर रखकर नीचे उतरें! इतनी वफादारी निभायी थी हमारे प्रदेश ने। इसलिये हमें अवसर मिले और हम मालिक के वफादार बनकर सिंहासन की रक्षा कर सकें। मणि साँप ने कहा कि बात तो उचित है। हम किसी को सिंहासन पर बिठा तो सकते हैं लेकिन सिंहासन का स्थान 10, जनपथ ही रहेगा और इसकी डोरी हमारे मालिक के पास ही रहेगी। बोलो मंजूर है? हम जैसे पालतू लोगों के लिये एक ठिकाना होना ही चाहिये, हम ठोर नहीं बदल सकते। अब कोई मुझ से कहे कि मैं बिल की जगह खुले खेत में रहने लगूँ तो कितने दिन जीवित रह सकूंगा? इसलिये तलाश करिये किसी अमचे-चमचे की, जो सदैव भगोने में रहने को बाध्य रहे। साँस भी लेनी हो तो मालिक से पूछकर ले। बस कुछ दिनों की बात है, मालिक तफरी से लौट जाएंगे और फिर ड्यूटी खत्म। फटी जेब का कुर्ता पहनकर मालिक बोर हो चले हैं, उन्हें नया कुछ चाहिये। जाने दीजिए उन्हें बैंकाक या लन्दन, जहाँ उनका मन करे, बस तरोताजा होने दीजिए। जब वापस लौटेंगे तब देखना उनके पास गालियों का भरपूर भण्डार होगा। मैं भी मालिक के साथ ही रहूँगा, उन्हें रोज थोड़ा-थोड़ा विष का सेवन कराऊंगा, जिससे वे अधिक जहर उगल सके। आप लोग चिन्ता ना करें, अब मैं आ गया हूँ. सब ठीक कर दूंगा। बस ध्यान रहे कि भूलकर भी नये व्यक्ति को थोड़ी सी भी स्वतंत्रता मत देना। हमारे मालिक और हमारे मालिक का खानदान जब तक सूरज-चाँद रहेगा, तब तक रहना चाहिये। मैं साँप का वंशज, वचन देता हूँ कि मैं पृथ्वी पर अनादि काल से रहता आया हूँ, आगे भी रहूँगा, मेरे जहर से ना कोई बचा है और ना आगे भी बचेगा। लेकिन, लेकिन हकलाता सा एक कार्यकर्ता बोला कि आपके जहर से यह मोदी नामका नेता तो मरता नहीं हैं! आपके जहर में तो असर है ही नहीं, आप तो केवल फूंफकारते हो! मणि साँप धीरे से खिसक लिया, बोला कि मेरे विश्राम का समय हो गया है। जय मालिक, जय मालिक कहता हुआ वह वहीं अपने पुराने बिल में घुस गया। बस जाते-जाते कहता गया कि किसी को भी बिठा दो, लेकिन मालिक के खानदान पर आँच नहीं आनी चाहिये। बस खानदान पुराना और खानसामा नया।

Tuesday, May 14, 2019

साम्प्रदायिकता बिल में और राष्ट्रवाद परचम में


मेरे देश में साम्प्रदायिकता कहीं खो गयी है, मैं उसे हर बिल में खोज चुकी हूँ, गली-मौहल्ले में भी नहीं मिली, आखिर गयी तो गयी कहाँ? यह तो छिपने वाली चीज थी ही नहीं, देश की राजनीति में तो यह शाश्वत बन गयी थी! भला ऐसा कौन सा चुनाव होगा जब यह शब्द ही ब्रह्मास्त्र ना बनो हो! सारे ही मंचों से चिल्ला-चिल्लाकर आवाजें आती थी कि साम्प्रदायिकता के खिलाफ हमें एकत्र  होना है। एक तो नारा हमने सुना था – इस्लाम खतरे में हैं, एकत्र हो जाओ और दूसरा सुना था कि साम्प्रदायिकता के खिलाफ एकत्र हो जाओ। साँप-नेवले सारे ही एक छत के नीचे आ जाते थे। लेकिन इस बार तो यह नारा सिरे से ही खारिज हो गया! हमने आजादी के पहले से ही इस नारे को गढ़ लिया था और संगठनों पर प्रतिबन्ध की परम्परा को जन्म दे दिया था। आजादी के बाद भी यह नारा खतरे की घण्टी की तरह चला, जैसे ही सरकारों पर खतरा मंडराता, साम्प्रदायिकता का नारा जेब से निकल आता और फिर प्रतिबन्ध की आँधी के कारण लोकतंत्र के दरवाजे  बन्द  हो जाते।
हम जैसों ने इस नारे का ताण्डव खूब झेला, हम सरकार का हिस्सा नहीं थे तो झेलना पड़ा। लेकिन जो खुद को सरकार का  हिस्सा मानते थे वे हमारे खिलाफ कभी भी इस बिच्छू को निकाल देते थे और एकाध डंक लगाकर वापस जेब में रख लेते थे। लेकिन अचानक ही इस चुनाव में यह बिच्छू जैसा नारा गायब हो गया। बस हाय तौबा सी मची रही कि मोदी हटाओ, मोदी हटाओ। हमारे लिये तो दोहरी खुशी लेकर आया यह चुनाव। एक तो बिच्छू गायब हो गया, हम डंक से बच गये, दूसरी तरफ मोदीजी ने राष्ट्रवाद का परचम लहरा दिया। कहाँ हम पीड़ित होते रहे हैं और कहाँ अब इस राष्ट्रवाद के परचम को लपेटे हम, इतराकर चल रहे थे। सामने वाले कह रहे थे कि नहीं हम भी राष्ट्रवादी हैं। जैसे पहले हम कहते थे कि हम साम्प्रदायिक नहीं हैं लेकिन वे कहते थे कि नहीं तुम हो, हमारी सुनते ही नहीं थे। अब वे कह रहे हैं कि हम भी राष्ट्रवादी हैं लेकिन उनकी कोई नहीं सुन रहा है। वे कहते थे कि तुम साम्प्रदायिक नहीं हो तो लो यह टोपी पहनो! जैसे ही हमने मना किया कि नहीं टोपी तो नहीं पहनेंगे, वे झट से उछल पड़ते, ताली बजाकर चिल्लाते कि देखो तुम साम्प्रदायिक हो। इस बार उनकी भी टोपी उतर गयी। अब हम कह रहे हैं कि बोलो – भारतमाता की जय, वे चुप हो जाते हैं और हम ताली बजा लेते हैं कि नहीं, तुम नहीं हो राष्ट्रवादी।
सारे ही धर्मनिरपेक्षता की चौकड़ी वाली चादर ओढ़े नेता, बिना चादर के ही घूम रहे हैं, कोई तिलक लगाकर घूम रहा है तो कोई सूट के ऊपर जनेऊ दिखा रहा है! राम नवमी धूमधाम से मनी, रोजे पर दावतें दिख नहीं रही हैं! हम तो बेहद खुश हैं कि हमारे ऊपर लगा साम्प्रदायिकता का दाग, राष्ट्रवाद की साबुन के एकदम धुल गया है। अब हमारी चादर झकाझक चमक रही है। मैं अक्सर कहा करती हूँ कि परिवर्तन की प्रकिया में समय लगता होगा लेकिन परिवर्तन पलक झपकते ही आ जाता है। गुलाब के पौधे पर फूल जब लगता है, तब ना जाने कितना समय लगता होगा लेकिन जब फूल खिलता है तो पलक झपकते ही खिल जाता है। मोदीजी ने पाँच साल तक कठोर तपस्या की, हमें पता ही नहीं चला की यह साम्प्रदायिकता वाला जहरीला बिच्छू कब बिल में चला गया, लेकिन जब इस चुनावी बरसात में बाहर नहीं आया तब पता लगा कि हमने क्या पाया है! मोदी-काल का सबसे बड़ा परिवर्तन यही है। साम्प्रदायिकता का दंश गायब और राष्ट्रवाद का परचम हमारे हाँथ में। कल तक हम सफाई दे रहे थे, अब वे सफाई दे रहे हैं। मैं हमेशा से कहती हूँ कि प्रतिक्रिया मत करो, हमेशा क्रिया करने के अवसर ढूंढो। प्रतिक्रिया सामने वाले को करने पर मजबूर कर दो। मोदीजी आपको नमन! आपने इतनी बड़ी गाली से हमें निजाद दिला दी। अब हम साम्प्रदायिक नहीं रहे अपितु राष्ट्रवादी बन गये हैं। साम्प्रदायिकता बिल में चले गयी है और राष्ट्रवाद परचम में लहरा रहा है।

Sunday, May 12, 2019

तीन पीढ़ी की माँ


आज सुबह से ही मन अपने अन्दर बसी माँ को ढूंढ रहा है। ढूंढते-ढूंढते कभी अपनी माँ सामने खड़ी हो जाती है, कभी अपनी बेटी सामने होती है तो कभी अपनी बहु सामने आ जाती है। तीन पीढ़ियों की तीन माँ की कहानी मेरे अन्दर है। एक माँ थी जिसे पता ही नहीं था कि दुलार क्या होता है! बस वह काम में जुती रहकर, बेटी को डर सिखाती थी। पिता का डर, भाइयों का डर, समाज का डर, दुनिया का डर, हव्वे का डर, भूत का डर। जितने डर माँ ने सिखाए उतने डर तो समय ने भी नहीं सिखाए। इस डर में दुलार कहीं खो जाता था। बस हम ही कभी उसके पेट  पर तो कभी पल्लू से लिपट जाया करते थे और हो जाता था दुलार। वह दौर ही डर का था, पिता घर में आते और सारा घर अनुशासन में आ जाता। ऐसा पता ही नहीं चलता कि अभी कुछ समय पहले तक यहाँ कितनी धमाल हुई है, लेकिन पिता के आने पर सबकुछ शान्त। आज की माँ और तब की माँ में कोई समानता नहीं है। प्यार चुप था, मुखर नहीं था। लड्डू बनते थे, हलुआ बनता था लेकिन ढिंढोरा नहीं पिटता था कि तेरे लिये बनाया है। ना माँ रोटी का कौर लेकर हमारे पीछे भागती थी और ना ही सोते समय लौरी सुनाती थी, बस कहानियाँ खूब थी। कभी राजकुमार की कहानी तो कभी चिड़िया की कहानी तो कभी ढोंगी बाबा की कहानी। बस जो भी दुलार था, यही था।
एक पीढ़ी गुजर गयी, मेरी पीढ़ी आ गयी। कुछ ज्यादा शिक्षित। बच्चों का मन समझने की पैरवी करती शिक्षा और प्रयोगों से लैस। तब नौकरी करती माँ सामने खड़ी थी, कितना समय किसको देना है, हिसाब-किताब रखती माँ थी। बच्चों की दुनिया माँ के इर्द-गिर्द रहने लगी, अब माँ  ही दोस्त थी, माँ ही शिक्षक भी थी। मेरे जैसी माँ सबकुछ सुनती, बच्चे स्कूल से आते ही ढेर सारी बातों का पिटारा साथ लाते, एक-एक बातों को बताने की जल्दी करते, माँ चुपके से उनका मन पढ़ लेती। हमने माँ से कुछ नहीं मांगा था लेकिन अब मुझसे बहुत कुछ मांगा जाता था। यही अन्तर में देख रही थी। कितना देना है, कितना नहीं देना है, अब मुझे यह अघिकार मिलने लगा था। मेरी माँ के पास भोजन का अधिकार था, कितना मिष्ठान्न देना है, कितना नहीं देना लेकिन मेरी पीढ़ी के पास बाजार के अधिकार भी आ गये थे। पूर्ण अधिकार वाली माँ के रूप में मैं खड़ी थी। मैं खुश थी कि मैं बच्चों को संस्कारित कर रही हूँ, उनके पीछे माँ का साया खड़ा है, इसलिये कोई डर उनके जीवन में आ ही नहीं सकता। मेरी माँ डर से परिचय करा रही थी और मैं डर को भगा रही थी। शायद दो पीढ़ियों का यही मूल अन्तर है।
आज तीसरी पीढ़ी मेरे सामने खड़ी है, मेरी बेटी के रूप में और मेरी पुत्रवधु के रूप में। माँ का गौरवगान बढ़ने लगा है, मातृदिवस भी मनने लगा है। मेरी माँ को पता ही नहीं था कि वही सबकुछ है, लेकिन मुझे समझ आने लगा था कि मैं भी कुछ हूँ, लेकिन आज माँ ही सबकुछ है, यह स्पष्ट होने लगा है। मेरी माँ से हम कुछ नहीं मांगते थे, मुझसे थोड़ा मांगा जाता था लेकिन अब मांग बढ़ गयी है। मांग बढ़ी है तो जिद भी बढ़ी है। डर जीवन से एकदम से रफूचक्कर हो गया है। अपने जीवन को अपने मन की इच्छाओं से मेल का समय है। संतान अपने मन के करीब जा रही है और माँ से दूर हो रही है। अब रिश्ते को बताना पड़ रहा है, पहले का मौन सा दुलार अब मुखर हो रहा है और मुखर होते-होते प्रखर वार करने लगा है।  माँ को बताना पड़ रहा है कि मैं तुम्हारी माँ हूँ, संतान से अपने रिश्ते की दुहाई देनी पड़ रही है। कभी लगने लगा है कि मनुष्य के बच्चे से अधिक अब गाय के बछड़े बन गये हैं, पैदा होते ही अपने पैरों पर खड़े हैं। अब बच्चे को माँ का पल्लू पकड़कर बैठने की फुर्सत नहीं है, वह कहानी भी नहीं सुनना चाहता, उसके पास मोबाइल है। मेरी माँ को याद करते-करते मैं खुद को देख लेती हूँ और फिर बेटी और पुत्रवधु को देख लेती हूँ। तीन पीढ़ियों की तीन माँ मेरे सामने हैं। कभी हम माँ से शिकायत करते थे कि माँ तुम हमें समय क्यों नहीं देती? फिर हम सीमित समय देने लगे लेकिन अब माँ पूछने लगी है कि बेटा क्या मेरे लिये कुछ समय है तुम्हारे पास! कल तक माँ के लिये कोई चर्चा नहीं थी लेकिन माँ परिवार में शीर्ष पर बैठी थी, आज मातृ-दिवस मनाती माँ, परिवार में कहीं नहीं है! कल दुलार मौन था और आज दुलार का दिखावा मुखर है! कल तक रिश्ते सहज थे और आज रिश्ते असहज हैं। फिर भी माँ तो है, संतान भी है, दुलार भी है, अनुशासन भी है, बस जो नाभिनाल से जुड़ाव के कारण संतान और माँ एकरूप थे आज मातृदिवस पर एक दिखायी देते हैं। लेकिन प्यार मुखर होकर खड़ा है, माँ भी खूब प्यार कर रही है और संतान भी मुखरता से कह रही है कि माँ मैं तुम्हें प्यार करता हूँ। यह मुखरता कम से कम एक दिन तो मुखर होकर सुख दे ही जाती है, पहले तो एक दिन भी नहीं था।
बस आज मेरा मन ये सब ही देख पाया, तो आपको बता दिया। मैं खुश हूँ कि मैं माँ हूँ, मैं खुश हूँ कि जो भी स्त्री माँ है, वह जिम्मेदारी से पूर्ण है। यह जिम्मेदारी ही दुनिया को जिम्मेदार बनाती है। हे माँ तेरा वंदन है, अभिनन्दन है।

Friday, May 10, 2019

गाँधीजी का देश के साथ झूठ का प्रयोग!


सत्य के प्रयोग – गाँधी इन्हीं प्रयोगों के नाम से प्रसिद्ध हैं। वे सत्य के प्रयोग अपने ऊपर करते रहे लेकिन वे देश के ऊपर झूठ के प्रयोग कर बैठे। मैं गाँधी की प्रशंसक रही हूँ लेकिन जब गाँधी उपनाम को लेकर चर्चा चली तब एक बात ध्यान में आयी कि यह गाँधीजी का उपनाम देने का प्रयोग तो झूठ और झांसा देने का प्रयोग था। इन्दिरा नेहरू फिरोज गंधी ( खान ) से निकाह करती है, कुछ लोग कहते हैं कि फिरोज पारसी मुसलमान थे और कहते हैं कि उनकी माँ के पीहर का व्यवसाय इत्र का था तो उनको गंधी कहते थे। लेकिन पिता का गोत्र क्या था? खैर मैं इस विवाद में नहीं पड़ती, बस फिरोज मुस्लिम थे, यह निर्विवाद सत्य है। इन्दिरा और फिरोज का निकाह हुआ, सभी जानते हैं कि मुस्लिम गैर मुस्लिम युवती से निकाह नहीं करते। इसके लिये वे पहले युवती का धर्म परिवर्तन कराते हैं. उसका नाम बदलते हैं फिर निकाह करते हैं। यहाँ भी ऐसा ही हुआ, इन्दिरा नेहरू का नाम बदल गया, मेमूना बेगम। जब गाँधीजी को इसकी खबर लगी, तब उन्होंने नेहरू को समझाया कि देश की आजादी सर पर है और तुम्हें प्रधानमंत्री बनना है, ऐसे में इन्दिरा का मुस्लिम हो जाना देश की प्रजा में असंतोष भर देगा। गाँधीजी ने फरेब किया, जनता को झांसा दिया और इन्दिरा व फिरौज का विवाह अपने समक्ष कराया। इतना ही नहीं उन्होंने अपना उपनाम भी उन्हें भेंट स्वरूप दिया। अब फिरोज गंधी या खान से बदलकर गाँधी हो गये और इन्दिरा जी भी मेमूना बेगम से हटकर इन्दिरा गाँधी हो गयी।
सत्य के प्रयोग करने वाले गाँधीजी ने देश के साथ इतना बड़ा झूठ का प्रयोग कर डाला। यह मुस्लिमों के साथ भी छल था और हिन्दुओं के साथ भी छल था। जो सच है उसे क्यों छिपाया जा रहा था? क्या गाँधीजी की नजर में मुस्लिम होना ठीक नहीं था? क्या गाँधीजी की नजर में देश में हिन्दू और मुस्लिम के बीच सौहार्द नहीं था? यदि वे इस कटु सत्य को जानते थे और उस पर पर्दा डाल रहे थे तो यह देश की जनता के साथ छल था। उन्होंने जो भ्रम की स्थिति बनाई उसका फायदा अनेक लोगों ने उठाया और लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ किया। अनेक अभिनेताओं ने यही किया, वे वास्तव में मुस्लिम थे लेकिन उन्होंने हिन्दू नाम रख लिया। लोग उन्हें श्रद्धा की नजर से देख रहे थे, उनकी पूजा कर रहे थे लेकिन वे देश को धोखा दे रहे थे। गाँधीजी का यह झूठ के साथ प्रयोग देश के लिये खतरनाक खेल  बन गया। हिन्दू और मुसलमान दोनों ही एक दूसरे के प्रति बैर भाव रखने लगे क्योंकि गाँधीजी ने मुस्लिम को देशहित में छोटा सिद्ध किया था और हिन्दू के साथ छल किया था। अधिकांश हिन्दू समाज भी मुस्लिमों के साथ अविश्वास का भाव रखने लगा और जह किसी भी कौम पर अविश्वास पैदा होने लगे तब वह कौम भी आक्रामक बनकर खड़ी हो जाती है। मुस्लिम अपनी कट्टरता के कारण पहले ही देश के टुकड़े करवा चुके थे और अब अविश्वास का वातावरण उन्हें सुख की नींद नहीं लेने दे रहा था। परिणाम निकला कि वे कांग्रेस को ब्लेकमेल करने लगे। यदि तुम हमारे धार्मिक स्थलों पर जाकर सर झुकाओ तो तुम्हें वोट दें, नहीं तो नहीं दें। यदि तुम हमारी पहचान के परिधान पहनों तो तुम्हें वोट दें नहीं तो नहीं दें। ऐसे कितनी ही रोजमर्रा की ब्लेकमेलिंग  शुरू हो गयी।
इसलिये आज जो कुछ देश में हो रहा है वे सब गाँधीजी के झूठ के प्रयोग के कारण हो रहा है। उनके सारे ही श्रेष्ठ कार्य मिट्टी में मिल गये बस शेष रह गयी एक दूसरे के प्रति नफरत। जो जैसा है उसे वैसा ही स्वीकार करो, क्यों नाम बदलते हो, क्यों उपनाम बदलते हो और क्यों धर्म बदलते हो? मैंने कल भी यही कहा था कि यदि राहुल गाँधी खुद को ईसाई मानते हैं तो खुलकर कहें कि वे ईसाई हैं, यदि मुस्लिम मानते हैं तो खुलकर कहें कि मुस्लिम हैं और यदि हिदू मानते हैं तो खुलकर कहें कि हिन्दू हैं। लेकिन कभी नाम बदल लेना, कभी खुद को जेनुऊधारी बता देना, कभी टोपीधारी बता देना, यह उचित नहीं लगता। इस देश में अनेक धर्म के लोग रहते हैं, सभी को किसी भी पद पर आने का हक है तो यह छल क्यों! भावनाओं से खेलकर यदि आप गद्दी पर बैठ भी गये तो आप कैसे लोगों का दिल जीत पाएंगे! इसलिये गाँधीजी के सत्य के साथ प्रयोग ही कीजिये, झूठ के साथ प्रयोग मत करिये।

Thursday, May 9, 2019

यह ब्लेकमेलिंग नहीं तो क्या है?


यह ब्लेकमेलिंग नहीं तो क्या है? खुले आम हो रही है ब्लेकमेलिंग, सबसे ज्यादा मीडिया कर रहा है ब्लेकमेलिंग। कई दिन पुराना साक्षात्कार कल सुना, मीडिया की एक पत्रकार मोदीजी से प्रश्न करती है कि आपने मुस्लिमों के लिये क्या किया, क्यों आपसे मुस्लिम दूरी बनाकर रखते हैं?
मोदीजी ने उत्तर दिया – एक घटना बताता हूँ जब मैं मुख्यमंत्री था – सच्चर कमेटी के बारे में मीटिंग थी। मुझसे यही प्रश्न पूछा गया। मैंने कहा कि मैंने मुस्लिमों के लिये कुछ नहीं किया, लेकिन साथ में यह  भी बता देता हूँ कि मैंने हिन्दुओं के लिये भी कुछ नहीं किया। मैंने गुजरात के 5 करोड़ नागरिकों के लिये किया है।
यह प्रश्न बार-बार दोहराया जाता है, अब मुझे बताइये कि ये ब्लेकमेल नहीं है तो क्या है? अकेले किसी के लिये कोई भी शासक क्यों कुछ करेगा? यदि किसी के लिये करना पड़े तो वह कोई दवाब है जैसे बलेकमेल में होता है। यह दर्शाता है कि शासक हमें विशेष घोषित करे, यह सिद्ध करे कि उनका सम्प्रदाय शेष सम्प्रदाय से विशेष है। कोई भी शासक किसी भी सम्प्रदाय का सम्मान करे लेकिन उसका वेश धारण करके दूसरे सम्प्रदायों को गौण बताने की कोशिश करने की बाध्यता ब्लेकमेल नहीं है तो क्या है?
आखिर यह ब्लेकमेल की परम्परा कहाँ से और कब विकसित हुई? इकबाल और जिन्ना के सम्मिलित प्रयासों से यह शुरू हुई। अंग्रेज देश को 565 रियासतों में बांटना चाहते थे लेकिन सरदार पटेल के कारण यह सम्भव नहीं हो पा रहा था तो दो भागों में ही बाँट दिया। जिन्ना और इकबाल ने ब्लेकमेल की परम्परा शुरू की और इसे गाँधी और नेहरू ने अंजाम दिया।
एक बार धर्म के नाम पर ब्लेकमेलिंग शुरू होकर देश का बँटवारा हो गया तो यह परम्परा मुस्लिमों की विरासत बन गयी। हम विशेष है, केवल हमारे लिये ही सोचो, हम हज यात्रा पर जाएं तो हमें सब्सिडी दो, हमें नवाज पढ़ने की विशेष छुट्टी मिले, हमें जनसंख्या वृद्धि की छूट मिले, हमें टीकाकरण से छूट मिले, हमें बहुविवाह की छूट हो, आदि आदि अनन्त छूट इसी का हिस्सा रही। प्रशासन ब्लेकमेल होता रहा और ब्लेकमेलिंग की आदत सुरसा के मुँह की तरह बढ़ती रही। आखिर मोदीजी ने लगाम लगाई। वे बोले कि मैं यदि गैस कनेस्शन दे रहा हूँ तो सभी को दे रहा हूँ, मैं यदि जनधन योजना में खाते खोल रहा हूँ तो सभी के खोल रहा हूँ, मैं यदि आयुष्मान योजना में स्वास्थ्य बीमा कर रहा हूँ तो सभी के लिये कर रहा हूँ तो ऐसे में किसी एक सम्प्रदाय के लिये ही करूँ यह स्वीकार नहीं। यह देश यदि धर्मनिरपेक्ष है तो एक सम्प्रदाय के लिये किसी योजना को इंगित करना संविधान के विरोध में जाएगा।
इसी ब्लेकमेलिंग के चलते रौल विंसी की हालत ना घर की रही और ना घाट की रही। उसे कभी अपना नाम राहुल रखना पड़ता है कभी रौल विंसी। वह आखिर दम ठोक कर क्यों नहीं कह पाता कि वह फिरोज खान का पोता है, उसकी माँ ईसाई है। वह कभी जनेऊ धारण कर लेता है, कभी टोपी पहन लेता है। रौल विंसी की ही तरह हर नेता इस ब्लेकमेलिंग का शिकार होता है। उसे मजबूर किया जाता है कि तुम्हें हमारे लिये ही बोलना होगा, हमारे परिधान पहनने होंगे।
मुझे गर्व है कि देश में एक नेता तो ऐसा आया जिसने इस ब्लेकमेलिंग को सिरे से नकार दिया। उसने कहा कि मेरे लिये सारे देशवासी एक हैं। ना मैं किसी का लिबास पहनूगा और ना ही किसी के लिये विशेष रियायत घोषित करूंगा। बस इस देश को ऐसा ही नेता चाहिये था। जिस दिन विशेष-विशेष का खेल और उससे उपजा ब्लेकमेल इस देश से मिट जाएगा, सारे देश में अमन चैन आ जाएगा। इसलिये मुझे मोदी पसन्द है, जो सीना चौड़ा करके कहते हैं कि ना मैं मुस्लिम के लिये काम करता हूँ और ना ही हिन्दू के लिये काम करता हूँ, मैं तो देश की समस्त जनता के लिये काम करता हूँ। सबका साथ – सबका विकास।

Sunday, May 5, 2019

देगची खदबदा रही है, फूटने का इंतजार भर

सेकुलर बिरादरी और मुस्लिम बुद्धिजीवी दोनों ही होच-पोच होने लगे हैं। अन्दर ही अन्दर देगची में ऐसा कुछ पक रहा है जिससे इनकी नींद उड़ी हुई है। महिलाएं आजाद होने की ओर कदम बढ़ाने लगी हैं। कभी तीन तलाक सुर्खियों में आता है तो कभी बुर्का! पुरुषों का अधिपत्य पर पत्थर फेंकना ही बाकी रह गया है बाकि तो उनके खिलाफ बगावत का बिगुल बज ही उठा है। आप कहेंगे कि मैं क्या बिना सिर-पैर की हाँक रही हूँ! लेकिन यह सच है कि महिलाएं संकेत देने लगी हैं। सऊदी अरब जैसे मुल्क में महिलाओं को आजाद किया जा रहा है तो भारत जैसे सेकुलर और हिन्दू बहुसंख्यक देश में तो देगची में से खदबदाने की आवाज आ ही जाएगी! हिन्दू दुनिया में सर्वाधिक स्वतंत्र धर्म है, यहाँ महिलाओं के ऊपर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। क्या कहा कि आप नहीं मानते! यदि प्रतिबन्ध होता तो बॉलीवुड से लेकर राजनैतिक और धार्मिक लोगों के परिवार की युवतियाँ इतनी आसानी से मुस्लिम सम्प्रदाय में निकाह नहीं कर सकती थीं। हर शिक्षित और समृद्ध युवक का निकाह हिन्दू युवती के साथ हुआ है और हो रहा है। ऐसे में मुस्लिम युवती भी बेचैनी महसूस कर रही है, वह भी आजाद होना चाहती है। लेकिन जैसे ही कोई तस्लीमा नसरीन आजादी की ओर बढ़ती हैं, उसपर परम्पराओं की बेड़ी पहनाने का काम ये प्रगतिशील बुद्धिजीवी करने लगते हैं। बॉलीवुड में मुस्लिम भरे पड़े हैं लेकिन जावेद अख्तर सरीखी मानसिकता ही सबकी है। वे सारे ही हिन्दू युवतियों से निकाह करते हैं और मुस्लिम युवतियों को मौलानाओं के रहम पर छोड़ देते हैं।
लेकिन जैसे ही मोदी ने कहा कि मैं किसी भी महिला के साथ अन्याय नहीं होने दूंगा। सभी को देश में समान आजादी होगी, बस फिर क्या था, महिलाओं को आशा की किरण दिखायी देने लगी और इन धर्म के आकाओं को अपना वजूद खतरे में पड़ता दिखायी दिया। बस रोज ही कोई ना कोई मुद्दा उछाल दिया जाता है कि हम मुस्लिम सम्प्रदाय की परम्पराओं पर आँच नहीं आने देंगे, फिर चाहे वे परम्पराएं दुनिया में कहीं भी अपना अस्तित्व नहीं बचा पायी हों! जब सारी दुनिया बुरके को प्रतिबंधित करना चाहती है, तब ऐसे में सर्वाधिक प्रगतिशील माने जाने वाले जावेद अख्तर कहते हैं कि बुरका और घूंघट दोनों ही बराबर हैं! अपने सम्प्रदाय की महिला की आजादी की बात इतने बड़े प्रगतिशील को भी नहीं भायी! यदि बुरके की आड़ में आतंकवादी अपना खेल खेल रहे हैं तो समय की मांग को देखते हुए उस पर प्रतिबंध से महिला को भी आजादी मिल जाएगी और आतंक पर भी चोट लगेगी। अब ये प्रगतिशील बुद्धिजीवी महिला को आजादी नहीं देना चाहते या आतंक को चोट नहीं देना चाहते! उन्हें इस बात का उत्तर तो देना ही होगा। तीन तलाक का मुद्दा भी ऐसे ही लोगों ने लटकाया हुआ है। जावेद अख्तर जैसी शख्सियत अपने सम्प्रदाय की वकालात तो करते हैं लेकिन महिलाओं को इंसाफ दिलाना तो दूर उनकी आजादी पर खुलेआम चोट करते हैं। ऐसे लोग डरे हुए लोग हैं, चार विवाह की सौगात जो मिली है इनको! कहीं कुछ पुरुषों का छिन ना जाए, इस बात से दहशत में हैं।
महिला समझ रही है, बगावत के लिये निकल भी पड़ी है। बस अभी देगची खदबदा रही है, पता नहीं लग रहा है कि देग में क्या पक रहा है? लेकिन बहुत जल्दी पकेगा भी और देगची को फोड़कर बाहर आएगा भी। अन्दर की बात ये लोग सब जानते हैं, इसलिये डरे हुए हैं। दबाकर रखो, मुँह सिल दो, महिला की जुर्रत नहीं होनी चाहिये कि वह जुबान खोल दे। कट्टर मौलाना ही नहीं आजाद ख्याल जावेद को भी बोलना ही पड़ेगा तभी पुरुषों की हैवानियत बच सकेगी। ये लोग महिला पर इस धरती पर तो अत्याचार कर ही रहे हैं और उस धरती पर भी 72 हूरों का ही ख्वाब दिखा रहे हैं! मतलब औरत पर अत्याचार उनकी मानसिकता में पुख्ता जम गया है। जावेद अख्तर हो या फिर कोई और, सब अपने लिये गुलाम रखने की आजादी के लिये मुस्तैद दिखायी दे रहे हैं। लेकिन जितना शोर ये मचाएंगे उतनी ही देगची पर पक रही महिलाओं की आजादी, फूटकर बाहर आएगी। ये जावेद अख्तर के रूप में सम्पूर्ण सम्प्रदाय के आकाओं का डर बाहर निकलकर आ रहा है। बस देखना यह है कि देगची फूटती कब है? जिस दिन देगची फूटेगी, उस दिन जावेद अख्तर जैसे लोग सबसे पहले लहुलुहान होंगे। बस इंतजार करिये। 

Saturday, May 4, 2019

रौल विंसी इमेज खत्म करने के अखाड़े में

कौन कहता है कि राहुल गाँधी उर्फ रौल विंसी कमअक्ल हैं? हो भी सकता है कि कमअक्ल हों लेकिन इस गुड्डे में चाबी भरने वाला जरूर अक्लवान है। मतलब यह है कि दोनों में से एक तो चतुर है ही। अब रौल विंसी कह रहे हैं कि मोदी की ताकत उनकी इमेज है, मैं इसे खत्म कर दूंगा! व्यक्ति में क्या रखा है, व्यक्ति तो हम भी है लेकिन हमारी इमेज क्या है? नक्कारखाने में तूती के समान! लेकिन मोदी की इमेज क्या है, सारे विश्व को प्रकाशित करने वाले सूर्य के समान। अब यदि रौल विंसी सूर्य के सामने बादल बनकर खड़े हो जाएं तो क्या सूर्य की इमेज खत्म हो जाएगी? कभी नहीं होगी। लेकिन उनकी सोच ठीक है, वे समझ चुके हैं कि उनकी इमेज बहुत बड़ी है और इसे कम करने के लिये झूठ दर झूठ बोलना ही होगा। वे लगातार झूठ बोल रहे हैं, अपने हर भाषण में निम्न स्तर का झूठ बोल रहे हैं, कभी ना कभी तो पत्थर पर लकीर पड़ेगी ही ना! इस चक्कर में उनकी खुद की इमेज दो कौड़ी की हो गयी है लेकिन बन्दे को चिन्ता नहीं। क्योंकि वह जानता है कि उसकी इमेज तो दौ कौड़ी की ही है तो अब और क्या कम होगी! लेकिन यदि मैंने मोदी की इमेज को दो-चार प्रतिशत भी कम कर दिया तो वाद-विवाद का विषय तो रहेगा ही और मेरे चेले-चामटों को तो भौंकने का मकसद बना ही रहेगा।
भारत में रामायण और महाभारत ऐसे ग्रन्थ हैं जिनका सानी आजतक कोई नहीं है। लेकिन इनके पात्र राम और कृष्ण साक्षात महापुरुष थे तो इनकी छवि दुनिया में सूर्य जैसी ही थी। अब उस दौर में भी रौल विंसी पैदा हो गये और उनने कहा कि राम और कृष्ण की इतनी बड़ी इमेज होना घातक है, कोई दूसरा धर्म इनके आगे पनपेगा ही नहीं तो इमेज को कम करो। रामायण में सीता की अग्नि परीक्षा और वनवास जोड़ दिया और महाभारत में कृष्ण की रासलीला जोड़ दी। बस हो गया वाद-विवाद का सिलसिला शुरू। व्यक्ति सबसे पहले इमेज पर ही वार करता है। घर में देख लीजिए, कोई अच्छा व्यक्ति है तो सुनने में आ जाएगा कि क्या खाक अच्छा है, उसने ऐसा किया और वैसा किया! कोई बन्दा अच्छा रहना ही नहीं चाहिए। समाज में ऐसे निन्दक लाखों मिल जाएंगे जो बस केवल निन्दा ही करते हैं। जो किसी की इमेज खराब करने निकल पड़ा है, समझो वह शिशुपाल के अतिरिक्त कुछ नहीं है। उसने खुद सिद्ध कर दिया है कि मोदीजी का व्यक्तित्व इतना बड़ा है कि उस पर प्रायोजित प्रहार करने की जरूरत है। कुछ लोग कहते हैं कि नेहरू-गाँधी वंश की इमेज को भी खत्म करने का प्रयास निरन्तर किया गया और परिणाम स्वरूप आज कांग्रेस दूसरों की उड़ती पतंग पर केवल लंगर डाल रही है!
नेहरू-गाँधी खानदान की इमेज और मोदी की इमेज में अन्तर क्या है? जबरन कब्जाई गयी इमेज और स्वत: बनी इमेज में जो अन्तर होता है बस वही अन्तर दोनों की इमेज में है। नेहरू की अचानक ही लोटरी निकल आती है और वह भारत का चक्रवर्ती सम्राट घोषित हो जाता है, तब नेहरू के संघर्ष की कोई इमेज नहीं थी, बस अंग्रेजों और गाँधी के कारण देश की बागडोर मिल गयी थी। तब प्रारम्भ हुआ था नेहरू के द्वारा सुभाष की इमेज खत्म करने का खेल, सरदार पटेल की इमेज खत्म करने का खेल। देश के सारे ही क्रांतिकारियों की इमेज खत्म करने का खेल। इतिहास में जब भी कमजोर राजा शासन पर बैठा है तब यही खेल शुरू हुआ है। नेहरू ने यह खेल खेला, फिर अचानक ही लाल बहादुर शास्त्री पिक्चर में आ गये। उनकी इमेज बड़ी दिखने लगी। इन्दिरा जी ने फिर इमेज धोने का प्रयास प्रारम्भ कर दिया। मोरारजी देसाई की इमेज बड़ी दिखने लगी तो उनकी खराब करने का खेल खेला गया। यह क्रम लगातार चलता रहा। बीच-बीच में शासक आते गये और नरसिंहाराव जैसे मौनी शासक ने भी अपनी थोड़ी बहुत इमेज बना ली तो उसे भी सोनिया गाँधी ने मिटाने के लिये रबर अपने हाथ में ले लिया। देश में चारों तरफ एक ही नाम सुनाई पड़ता है नेहरू-गाँधी खानदान।
लेकिन कब तक बौना शासक गद्दी पर बैठकर राज करता रहेगा, कभी ना कभी तो सुदृढ़ शासक आएगा ही। बस इस बार मोदी का नम्बर था। मोदी ने सारे ही रिकोर्ड तोड़ दिये। उनकी इमेज देश से निकलकर विश्व में छा गयी, सारी दुनिया उन्हें मानने लगी। यह चुनाव एकतरफा लगने लगा तो भला अमरबेल सा फलता फूलता गाँधी परिवार कैसे अपनी चाल से विलग हो जाता। उनके पास एक ही चाल है कि दूसरे की इमेज खराब करो, बस तुम्हारा काम चलता रहेगा। रौल विंसी उतर आए अखाड़े में, रोज नये झूठ के साथ। एक टोली बना ली गयी कि मैं एक झूठ उछालूंगा और तुम सारे ही जोर लगाकर हयस्या बोलना। रोज-रोज पत्थर पर रस्सा घिसोगे तो निशान पड़ेगा ही। बस जुट गये हैं रौल विंसी। लेकिन वे यह भूल गये हैं कि इमेज खऱाब करते-करते कब उनका असली चेहरा देश के सामने आ गया! वे कल तक राहुल गाँधी बनकर देश को भ्रमित कर रहे थे लेकिन अचानक ही उनके चेहरे से नकाब उतर गया और वे रौल विंसी के असली रूप में प्रकट हो गये! मोदी की इमेज तो सूर्य जैसी है लेकिन तुम्हारे पूरे खानदान की इमेज तो छद्म आवरण में लिपटी है, कभी दुनिया के एकमात्र नेहरू तुम बन जाते हो और कभी गाँधी बन जाते हो। बहुरूपिया भी संन्यासी की इमेज खत्म करने को चला है! तुम्हारा खेल तो अच्छा है लेकिन मोदी की इमेज तुम्हारे जैसी उधार की नहीं है जो खत्म हो जाए। तुम जितना पत्थर फेंकोगे आगला उन पत्थरों की सीढ़ी बनाता हुआ ऊपर चढ़ता ही जाऐगा। तुम अपना खेल जारी रखो और मोदी आकाश छूने का प्रयोग जारी रखेंगे। तुम्हारे नाम का नकाब तो उतर ही चुका है देखना कहीं नागरिकता का नकाब भी नहीं उतर जाए?

Thursday, May 2, 2019

यह कंकर वाली दाल है

मुझ जैसी महिला के लिये हर रोज सुबह एक नयी मुसीबत लेकर आती है, आप पूछेंगे कि ऐसा क्या है जो रोज आती है! सुबह नाश्ते में क्या बनेगा और दिन में खाने में क्या बनेगा, एक चिन्ता तो वाजिब ही है, क्योंकि इस चिन्ता से हर महिला गुजरती है लेकिन मेरी दूसरी चिन्ता भी साथ-साथ ही चलती है कि लेपटॉप पर क्या पकाया जाए और पाठकों को क्या परोसा जाए? राजनीति पर लिखो तो वह कढ़ी जैसी होती है, कब बासी हो जाए और कब बासी कढ़ी में उफान आ जाए? सामाजिक मुद्दे पर क्या लिखो, लोग कहने लगे हैं कि समाज माय फुट! परिवार तो मैं और मेरा बुढ्ढा में ही सिमट गया है! रोज-रोज ना खिचड़ी बनती है और ना ही मटर-पुलाव बनाया जाता है। कल एक मित्र ने लिख दिया कि मुड़-मुड़कर ना देख, मुड़-मुड़कर। अब हमारी उम्र तो मुड़-मुड़कर देखने की ही है, आगे देखते हैं तो पैरों के नीचे से धरती खिसक जाती है तो पीछे देख लेते हैं और कभी हँस देते हैं और कभी दो बूंद आँसू बहा लेते हैं। आज का सच तो यह है कि वास्तविक दुनिया लगातार हम से कुछ ना कुछ छीन रही है और यह फेसबुकीय दुनिया जिसे देख तो सकते हैं लेकिन छू नहीं सकते हैं, बहुत कुछ दे जाती है। कभी ऐसे लगता है कि हम क्रिकेट खेल रहे हैं, बल्ला हमारे हाथ में है, दुनिया के समाचार रूपी बॉल हमारे पास आती है और हम झट से बैट सम्भाल लेते हैं, कभी बॉल एक रन दे जाती है तो कभी चार और कभी पूरे छ। कभी ऐसा भी होता है कि किसी ने बॉल पकड़ ली और जोर से दे मारी विकेट पर। हम आऊट तो नहीं हुए लेकिन सामने वाले का गुस्सा टिप्पणी के रूप में हमारे विकेट को उड़ाने की हिम्मत कर लेता है। कभी प्यार से ही हमें कैच कर बैठता है तो कभी पास खड़ा विकेटकीपर ही हमारी गिल्लियां उड़ा देता है। कभी कोई ताली बजा देता है तो कभी कोई शाबासी दे देता है। कोई ऐसा भी होता है जो मन ही मन खुंदक खाता रहता है कि इसका खेल एक दिन चौपट जरूर करूंगा।
तो फेसबुकी या सोशल मीडिया की इस दुनिया में आसान कुछ नहीं है। कब अपने ही दूर हो जाते हैं और कब दूर के लोग नजदीक आ जाते हैं। जानते किसे भी नहीं लेकिन लड़ भी पड़ते हैं और लाड़ भी लड़ा लेते हैं। जिन्हें जानते हैं वे तो दूरी बनाकर ही चलते हैं और बेगाने लोग नजदीक आ जाते हैं। हम से कुछ लोग पूछ लेते हैं कि क्या करते हो? हम क्या बताएं कि हम क्या करते हैं! कह देते हैं कि कुछ-कुछ पकाते हैं। लोग समझ लेते हैं कि महिला हैं तो खाना ही पकाती होगी, उन्हें क्या पता कि ये और क्या पका रही हैं! लेकिन उनका काम भी चल गया और हमारा भी। आज भी जब कुछ पकाने का नहीं था तब भी हमने आपको पकाने का सामान ढूंढ ही लिया है। कहते हैं कि जब पकाने को कुछ ना हो तो पत्थर की भी सब्जी बना दो, बस मसाले भरपूर हों तो स्वाद आ ही जाता है। अरे, अरे, मैंने क्या लिख दिया! पत्थर की सब्जी, नहीं बाबा, पत्थर के लड्डू पर तो मोमता दीदी का अधिकार है, भला मैं पत्थर की कोई चीज कैसे पका सकती हूँ! माफ करना। लेकिन एक आराम तो हो गया हम जैसी गृहणियों को, कंकर अगर निकल आए दाल में तो कह देंगे कि मोमता दीदी की है, हमारी नहीं। यह पोस्ट रास्ते से भटकती जा रही है, कभी दाल आ जाती है हमारी बात में तो कभी कंकर। सुना है कि दाल भी
आजकल फेसबुकियों का पसंदीदा विषय है। हम तो अब परीक्षा देकर बैठे हैं, परिणाम 23 मई को आएगा तो कुछ सूझ नहीं रहा है, बस खाली बैठकर कुछ भी ठेले जा रहे हैं। आप लोग कतई मत पढ़ना। पढ़ लिया तो कंकर भी आप ढूंढ लेना और दाल का निर्णय भी आप ही कर लेना। राम-राम जी।

Monday, April 29, 2019

मेरी अंगुली की स्याही ही मेरा लोकतंत्र है

एक जमाना था जब अंगुली पर स्याही का निशान लगने पर मिटाने की जल्दी रहती थी लेकिन एक जमाना यह भी है कि अंगुली मचल रही है, चुनावी स्याही का निशान लगाने को! कल उदयपुर में वोट पड़ेंगे, तब जाकर कहीं अंगुली पर स्याही का पवित्र निशान लगेगा। देश में लोकतंत्र है, इसी बात का तो सबूत है यह निशान! सदियों से मानवता लोकतंत्र के लिये तड़पी है, कभी राजाशाही तो कभी तानाशाही और कभी गुलामी! अब जाकर कहीं लोकतंत्र आया है। विवाहित महिलाओं के पास सिंदूर होता है, बताने को की हम विवाहित हैं और अंगुली की स्याही बताती है कि हम ना केवल स्वतंत्र है अपितु हमारे देश में लोकतंत्र हैं। हमारे पास भी वे सारे ही अधिकार हैं जो कभी एक राजा के पास हुआ करते थे। जब भगवान के मन्दिर जाते हैं तो माथे पर कुमकुम जरुर लगाते हैं, बाहर निकलकर हमारा कुमकुम ही इतराकर बता देता है कि हम मन्दिर गये थे। बस ऐसी ही चुनाव की स्याही है, जो हमारे हाथ में लगती है और इतराती है। कभी मन्दिर जाने का अधिकार छीनकर देख लो, मन कैसे छटपटाता है? राजा रवि वर्मा बहुत बड़े चित्रकार हुए, उन्होंने अपने चित्रों की छपाई करा दी। देवी-देवता के चित्र अब बाजार में मिलने लगे थे। करोड़ों ऐसे लोग थे जिन्हें मन्दिर में प्रवेश नहीं मिला था। उन लोगों ने पहली बार चित्र के माध्यम से भगवान को देखा और अपने घर में लगाकर पूजा की। लोग भाव विह्वल हो रहे थे, अपने जीवन को धन्य मान रहे थे। ऐसे ही जब पहली बार लोगों को राजा की जगह अपना नेता चुनने का अवसर मिला तो लोग भाव विह्वल हो गये थे। वे अपनी अंगुली पर लगी स्याही को देख रहे थे, उसे चूम रहे थे और लोगों को दिखा रहे थे कि देखो हमारे पास भी अब अधिकार है।
जरा सोचिये, यदि मन्दिर प्रवेश का अधिकार सभी को होता तो क्या राजा रवि वर्मा की पेंटिंग को लोग खरीदते? क्या उन पेंटिंग को अपने घर में लगाकर पूजते? नहीं कभी नहीं करते। सभी को अधिकार मिलते ही अधिकार की चाहत ही समाप्त हो जाती है। जैसे लोकतंत्र मिला और सभी को वोट का अधिकार मिला तो चाहत ही समाप्त हो गयी। कुछ लोग बेपरवाह हो गये, जैसे मन्दिर में नहीं जाना फैशन बन गया है वैसे ही वोट नहीं डालना भी फैशन बन गया है। मन्दिर से दूर हो गये, भगवान से दूर हो गये, हमारी स्लेट कोरी होती गयी और फिर किसी ने कहा कि यहाँ चादर चढ़ा दो तो चादर चढ़ा दी। हमें पता ही नहीं कि हम कहाँ चादर चढ़ा आए। किसी ने कहा कि इस चर्च में जाकर आ जाओ, हम जा आए। हमें पता ही नहीं हम वहाँ क्यों गये थे! बस हमारी स्लेट खाली थी तो हम चले गये और फिर सेकुलर बनकर अपनों का ही कत्ल करने लगे। श्रीलंका का ताजा उदाहरण है हमारे सामने। ऐसे ही वोट डालने में हुआ। वोट नहीं डालना फैशन बन गया, बड़ी ठसक से कहते हैं कि हम वोट नहीं डालते! हम मन्दिर नहीं जाते - हम वोट नहीं डालते। तुम चादर तो चढ़ा आते हो, फिर मन्दिर क्यों नहीं? ठीक है हम वोट डालने जाएंगे लेकिन नोटा दबाकर आएंगे। हमें तुम्हारे लोगों पर विश्वास ही नहीं है, हम तुम्हारी किसी व्यवस्था पर विश्वास ही नहीं रखते।
मुगल काल में मन्दिर तोड़ने और एक-एक मूर्ति को विध्वंस करने में कितना समय लगा था? कितना विरोध हुआ था? जब भगवान को मानते ही नहीं और मन्दिर जाते ही नहीं तो तोड़ने दो, हमारा क्या जाता है? ऐसे ही जब तानाशाही या राजशाही पुन: लोकतंत्र पर शिकंजा कस लेगी तब कहेंगे कि हमें क्या? कोई नृप हो, हमें का हानि! स्वतंत्रता और परतंत्रता का जिन्हें अन्तर नहीं पता वे वोट देने का मखौल उड़ाते हैं, नोटा दबाने की बात करते हैं। कैसा भी नेता है, तुम्हारे देश का और लोकतंत्र का प्रहरी है, लेकिन यदि लोकतंत्र ही नहीं रहेगा तो चाहे ईस्ट इण्डिया कम्पनी वापस आए या फिर मुगल साम्राज्य? लेकिन कुछ लोगों को अपनी अंगुली पर स्याही का निशान फबता नहीं है, लोकतंत्र का निशान उन्हें जँचता नहीं है। ये शायद गुलाम वंश के लोग हैं, जो हमेशा गुलामी में रहने को ही सुख कहते हैं। लेकिन हमारे लिये तो यह स्याही अमूल्य स्याही है, इसे लगाकर कुमकुम के तिलक जैसा अनुभव करेंगे। स्याही को भगवान को भी दिखाएंगे और कहेंगे कि हे भगवान! हमें और हमारी पीढ़ियों को कभी भी इस स्याही से वंचित मत करना। स्याही ही लोकतंत्र का प्रतीक है। मेरी अंगुली पर लगी स्याही मेरा अभिमान है, मेरा स्वाभिमान है, मेरी स्वतंत्रता है और मेरा लोकतंत्र है। जो भी इस स्याही की इज्जत नहीं करता वह हमारे स्वाभिमान का हन्ता है, हमारे लोकतंत्र का नाशक है। प्रभु इनको सद्बुद्धि देना और हमारी रक्षा करना।

Sunday, April 28, 2019

सौगात किस-किस ने भेजी!

मैं चोरी-छिपे तुझे सौगात भेजूँ और तू है कि सबको ढोल बजाकर बता दे कि दीदी ने सौगात भेजी है! तू देख, अब मैं तुझे कंकर वाले लड्डू भेजूंगी।
दीदी नाराज क्यों होती हो? कोई भी सौगात भेजे तो उसे बताने पर तो उसका सम्मान ही बढ़ता है ना! कहीं ऐसा तो नहीं है कि एक तरफ तुम मंचों से गाली देती हो और अन्दर ही अन्दर रिश्ता बनाकर भी रखना चाहती हो! मोदीजी भी गजब करते हैं, क्या जरूरत थी पोल खोलने की! हँसते-हँसते इतनी बड़ी पोल खोल दी। हम तो समझते थे कि मोमता दीदी केवल गाली ही भेजती हैं, हमें क्या पता था कि चुपके-चुपके मिष्ठी दही भी भेजती हैं। गाली गिरोह का सरगना ही सौगात भेज रहा है तो फिर बाकि क्या करते होंगे जी! मोदीजी के घर की तलाशी लेनी चाहिये, उनकी सौगातों पर भी निगाह रखनी चाहिये। राहुलवा क्या भेजता है, जरा यह भी बता ही देते, लगे हाथ! वो कंजरवाल भी कुछ भेजता है या वह शुद्ध फोकटवा ही है! देखो मोदीजी छिपाना मत, लालू ने तो जरूर ही कुछ भेजा होगा, वह बेचारा तो जैल में पड़ा है। अखिलेश क्या भेज सकता है? आम के टोकरे भेज रहा होगा, सुना है उत्तर प्रदेश में आम खूब होता है। शरद पँवार तो एलफेंजो भेजते ही होंगे। मोदीजी एक बात बताओ कि जब आपके दुश्मन इतनी सौगातें भेजते हैं तो मित्र कितनी भेजते होंगे!
आपके पीएमओ में तो बहार छायी रहती होगी, तभी सारे अधिकारी खुश हैं, कोई बात नहीं 18 घण्टे काम करना पड़ता है तो क्या, कभी रसोगुल्ला तो कभी आम और कभी लीची मिलती ही रहती है। आप तो खिचड़ी खाकर काम चला लेते हैं लेकिन आपका स्टाफ तो मोमता दीदी के रसगुल्ले खा रहा है! लेकिन क्या सच में दीदी अब कंकर के लड्डू बनाकर भेजेगी? चुनाव परिणाम आने के बाद बता ही देना कि क्या सच में कंकर के लड्डू आए या गणपति के मोदक आए? राहुलवा शिकायत कर रहा था कि मोदीजी मुद्दे को भटका रहे हैं। यह क्या बात हुई जो मुद्दे को सौगात पर ले आए? हमारी दादी और हमारे नाना के पास भी बहुत सौगातें आती थी। मेरे पास क्या आता है? यही पूछ रहे हैं ना आप? यही तो मैं कह रहा हूँ कि मोदीजी मुद्दे को भटका रहे हैं। मुझे चिढ़ा रहे हैं कि मेरा कुर्ता फटा हुआ होने के बाद भी मोमता जी ने मुझे कुर्ता नहीं भेजा और आपका मंहगा सूट होने के बाद भी आपको कुर्ता सौगात में मिला! मैं कैसे मुश्किल से दिन निकाल रहा हूँ, यह उन्हें पता नहीं है। भारत में एक बार चार हजार रूपये बैंक से निकाले थे, अब बैंक में रूपये भी नहीं है और कुर्ता भी फटा हआ है, मुझे भाग-भागकर लंदन जाना पड़ता है, पैसों का जुगाड़ करने। इतना कड़की होने के बाद भी कोई सौगात नहीं भेजता। कंजरीवाल का तो रो-रोकर बुरा हाल है कि मुझे तो सौगात के रूप में थप्पड़ ही मिलते हैं, मुझे तो बर्बाद ही कर डाला इस मोदी ने! युवा ब्रिगेड़ के तीसरे रत्न अखिलेश तो अपने पिताजी से ही सौगात नहीं पा रहे, बुआ के आसरे रह रहे हैं और बुआ को तो सारा जगत जानता है कि वहाँ चढ़ावा चढ़ता ही है, प्रसाद तक नहीं बँटता।
चारों तरफ अफरा-तफरी मची है, कौन-कौन सौगात भेज रहा है, जरा पता लगाओ। वह इमरान पाकिस्तान में बैठकर कोई खेल तो नहीं खेल रहा है। साला यहाँ कौम के नाम पर उकसा रहा है और अन्दर ही अन्दर डर के मारे सौगात भेज रहा हो! सऊदी अरब वाले तो मन्दिर ही बनवा के दे रहे हैं, सौगात में! चीन ने अरूणाचल से हाथ खेंच लिये, कश्मीर से भी हरे झण्डे उतार लिये। यह हो क्या रहा है? सही कह रहा है राहुलवा कि चुनाव मुद्दों से भटक गया है! यह भी कोई चुनाव है! जब सारे ही प्रतिद्वंद्वी सौगात भेज रहे हैं, तो फिर कैसा चुनाव! राहुलवा ने अपनी बहन से कहा कि हट जा पगली तू भी मैदान से। हमने दस साल तक खेत के बेजूबान बिजुका को खड़ा रखकर पीएमओ चलाया है तो काशी में भी एक बिजुका खड़ा कर देंगे। लेकिन तू अपनी नाक बचा। बहना बोली की भाई मैं तो पतली गली से सरक लूंगी लेकिन तू अमेठी से कैसे सरकेगा? वहाँ तो शेरनी ताक में बैठी है। थोड़ी सौगात तू भी भेज दे ना! कुछ राहत तो मिले। वायनाड़ से भी पता नहीं क्या होगा? वहाँ भी कौन-कौन और क्या-क्या सौगात भेज रहे होंगे। चल माँ के पास चलते हैं। राहुलवा चीखकर बोला कि क्या होगा माँ के पास जाने से! वह तो कहेगी ही ना कि मैं तो पहले ही कह रही थी कि सत्ता जहर है, तू सौगात समझ बैठा! न हो तो चल नानी के घर ही चलते हैं। रूक जा, कुछ दिन बाद तो जाना ही है। देश में जब न्याय बँट रहा होगा तब चलेंगे।

Saturday, April 27, 2019

भारत की नाक तेरी जय हो

भारत की नाक और दादी की नाक का संघर्ष होते-होते रह गया! नाक को नापने जितना भी समय नहीं दिया गया! हमने तो अरमान पाल रखे थे कि दो नाकों का महायुद्ध होगा और भारत की नाक भारी पड़ेगी या फिर दादी की नाक! लेकिन हाय री किस्मत ऐसा कुछ नहीं हुआ! दिल के अरमां आँसुओं में बह गये! कल वाराणसी में भारत की नाक का दम-खम देखा जा सकता था, बस उसी को देखकर दादी की नाक कहीं पल्लू में छिप गयी। नाक को बचाना लाजिमी हो गया, नाक है तो सबकुछ है नाक नहीं तो कुछ नहीं। आज बचा लो, कल फिर काम आ जाएगी। लेकिन यदि आज ही कट गयी तो कल क्या रहेगी! नाक बड़ी चीज होती है, वाराणसी में तो गंगा किनारे खड़े होकर नापने का काम किया गया। गंगा में नाव में बैठकर नाक नापने का अग्रिम काम किया गया। कहा गया कि मेरी नाक खानदानी है, रईस है, यह माँ पर नहीं जाकर सीधे दादी पर चले गयी है। हनुमानजी की पूछ की तरह दादी की नाक ने लम्बा होना शुरू किया लेकिन वह एकाध फुट पर ही अटक गयी। एक कोने में दुबक कर देखने लगी कि मेरी नाक भला कहाँ अटक गयी है? देखती क्या है कि भारत की नाक श्रीकृष्ण के मुख की तरह विशाल रूप ले रही है, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड समा जाए इतना विस्तार ले रही है। पूरी काशी की नाक इसी नाक में विलीन हो गयी है। दादी की नाक धीरे से खिसक ली। बोली कि नहीं जाऊंगी अखाड़े में! कुछ लोगों ने धकेलने की कोशिश भी की लेकिन वह तो अड़ गयी, बोली की ज्यादा परेशान करोगे तो अय्यर की तरह गायब हो जाऊँगी लेकिन अखाड़े में तो नहीं उतरूंगी।
अखाड़े में उतरने में एक और कठिनाई आ गयी। अखाड़े के नियमानुसार अपनी कद-काठी का हिसाब भी देने पड़ता है, जिससे बराबर की लड़ाई हो। नाक बोल उठी कि हम परदे वाले खानदान से हैं, भला अपनी नाप कैसे दे सकते हैं! हमारी माँ विदेश गयी थीं, हमने अभी तक नहीं बताया कि क्यों गयी थी, कहाँ गयी थी और कहाँ रही थी! मेरे पति व्यापार करते हैं, कल तो तुम पूछ लोगों की कितना कमाते हैं, भला यह कोई बात हुई। हम परदे वाले खानदान से हैं और तुम हमें बेपर्दा करना चाहते हो! नहीं हम नहीं लड़ेंगे। अखाड़ेवालों का भारी नुकसान हो रहा है, वे बोले कि ऐसा करते हैं कि एक बकरी बांध देते हैं, उसे देखकर शेर जरूर आएगा, शिकार करने। आनन-फानन में एक बकरी ढूंढ ली गयी और बाँध दिया अखाड़े के पास। चारो ओर मुनादी घुमा दी कि होशियार, सावधान, जैसे ही बकरी का शिकार करने शेर आए इशारा कर देना हम पर्दे की ओट से शेर का शिकार कर लेंगे और फिर हमारी नाक जीत जाएगी। लेकिन दादी की नाक तो इस पर भी तैयार नहीं हुई। बेचारी बकरी पेड़ से बंध गयी है, मिमिया रही है लेकिन उसके सामने एक पुली चारा डालने वाला भी कोई नहीं है। शेर तो पता नहीं कब आएगा बस डर है कि बकरी पहले ही भूख से दम ना तोड़ दे। दादी की नाक तो पतली गली से निकल गयी लेकिन बेचारी बकरी मिमिया रही है, बचा लो, बचा लो। दादी की नाक भाग रही है, उसे रोकने को लोग भाग रहे हैं, काशी खाली हो रही है, भारत की नाक विस्तार ले रही है। सारी दुनिया कह रही है, देखो भारत की नाक को देखो। इसी नाक से जाना जाएगा भारत। जय हो तेरी भारत की नाक, तेरी जय हो- जय हो।

Friday, April 26, 2019

राजनीति से भी बाहर आ जाओ ना

टीवी रूम में रिमोट के लिये हर घर में उठापटक मची रहती है, घर के मर्द के पास रिमोट ना हो तो मानो मर्दानगी ही रुक्सत हो गयी हो, ऐसे में घर की स्त्री भी किसी ना किसी बहाने आँख दिखाकर रिमोट पर कब्जा करती दिख ही जाती है, बच्चे तो रिमोट पर अपना हक ही जमा बैठते हैं और नहीं मिले तो ऐसा कोहराम मचा देते हैं कि फिर कैसा टीवी और कैसे चैनल? लेकिन कल मैं हतप्रभ रह गयी, इतनी हतप्रभ हुई की ईवीएम मशीन तक जा पहुँची। सोचने लगी कि जब रिमोट किसी ओर से संचालित होता है तो ईवीएम भी हो सकती है! हुआ यूँ कि मेरा टाट स्काई का रिमोट ढंग से काम नहीं कर रहा था, इंस्टाल करने वाले बन्दे ने टीवी और सेटअप बॉक्स के रिमोट को पेयर बना दिया था और हम एक ही रिमोट से काम चला रहे थे। लेकिन अचानक ही यह गठबन्धन टूट गया। कहाँ तो चुनावी मौसम में गठबन्धन हो रहे हैं लेकिन मेरे रिमोट का टूट गया। कई महिनों से टीवी का रिमोट अल्मारी में बन्द पड़ा ऑक्सीजन की तलाश में था तो उसे नसीब हो गयी। लेकिन केवल ऑन-ऑफ का मसला नहीं था, सेटअप बाक्स का रिमोट तो ठुमक-ठुमक कर चलने लगा, शत्रुघ्न सिन्हा की तरह हर पल नाराज रहने लगा, कभी चैनल ना बदले जाएं और कभी वोल्यूम बन्द हो जाए। गूगल के सारे प्रयोग भी फैल हो गये। आखिर मौहल्ले में स्थित टाट स्काई के डीलर से सहायता की अपील की। उसने दोनों रिमोट को पास बुलाया, बातचीत कराने की कोशिश की लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी, लगा कि दिल्ली में केजरीवाल और कांग्रेस का मेल-मिलाप नहीं हो सकता। डीलर ने हाथ झटक लिये। अब सोचा कि टाटा स्काई हेल्प का सहारा लिया जाए। हेल्प का फोन लग गया और बन्दे से बात होने लगी।
बन्दा बोल रहा था कि मैं चेक करके बताता हूँ, अरे रिमोट तो मेरे हाथ में है, भला तू कैसे चेक कर सकेगा! खैर दीमाग को शान्त किया और वह बोलता गया और मैं सुनती गयी। उसने भी दोनों रिमोट का मेल-मिलाप कराने का अथक प्रयास किया, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा। अब बोला की मैंने आपकी शिकायत नोट कर ली है और शीघ्र ही आपको एक फोन आएगा और समस्या सुलझ जाएगी। मेसेज भी आ गया कि शिकायत बुक हो गयी है। लेकिन बुद्धीजीवी चुपचाप नहीं बैठ सकता, उसे लगता है कि मैं क्यों नहीं ठीक कर सकता! इस बार मैंने यू-ट्यूब खोली और एक वीडियो मिल गया, कैसे पेयर बनाये। दिखाया जा रहा था कि दोनों रिमोट को आमने-सामने बिठाएं फिर यह बटन दबाये और फिर यह। लो अब बन गया पेयर। सप्तपदी की रस्म पूरी हुई लेकिन मेरे रिमोट को यह आर्यसमाजी विवाह पसन्द नहीं आया और उसने फिर नकार दिया। मैं भी हार-थककर चुप हो गयी। कुछ देर में ही फिर एक मेसेज आया कि आपकी समस्या निवारण के लिये शीघ्र ही आपसे फोन पर वार्ता की जाएगी। एकाध घण्टा बीत गया, हमारे यहाँ भी रिमोट को हाथ में पकड़कर अधिकार रखने की आदत नेपथ्य में चले गयी थी। पतिदेव को तो समझ ही नहीं आ रहा था कि किस रिमोट से टीवी चलेगा और किस से बन्द होगा तो हमेशा मर्दानगी दिखाने का मौका नहीं चूकने वाले आज रिमोट से दूर ही थे। लेकिन कुल मिलाकर दो-तीन घण्टे बाद आदत से लाचार मैंने जब रिमोट का मुआयना किया तो वह चल उठा, मैं भी उछलकर बैठ गयी कि अरे यह चल गया! मैंने सोचा कि मेरे प्रयोग से ही चला होगा लेकिन तभी फोन के मेसेज पर निगाह पड़ी, उसमें मेसेज था कि आपकी समस्या का निवारण कर दिया गया है। लो कर लो बात रिमोट मेरा, लेकिन संचालित हो रहा है टाटा स्काई को दफ्तर से! हम घर में बिना बात ही झगड़ते हैं कि रिमोट मेरे पास या तेरे पास, लेकिन यह मरा तो किसी और के पास है। न जाने कितना कुछ है दुनिया में जिनके लिये हम हर पल लड़ते हैं लेकिन हमारे हाथ खाली हैं, डोर तो न जाने किसके पास है! हम रंगमंच की कठपुतली हैं जी, डोर तो विधाता के पास ही है। आपने भी न जाने क्या सोचकर यहाँ तक पढ़ लिया क्योंकि मेरे लेखन की डोर भी आपके पास ही है, आप पढ़ेंगे तो ही मैं लिख सकूंगी नहीं तो क्या रखा है इस लेखन में। और हाँ, वोट जरूर डालना।

Sunday, April 21, 2019

तेरा अब न्याय होगा


कोई किसी महिला से पूछे कि तेरा नाम क्या है? तेरा उपनाम क्या है? तेरा देश क्या है? तो महिला सोचने का समय लेगी। क्यों लेगी! इसलिये लेगी कि विवाह के बाद उसका कहीं नाम बदल जाता है, उपनाम तो बदल ही जाती है और कभी देश भी बदल जाता है। इसलिये वह सोचती है कि कौन सा नाम बताऊँ, कौन सा उपनाम बताऊँ और कौन सा देश बताऊँ! लेकिन कल अचानक ही एक पुरुष की बेबसी देखी, अरे पुरुष होकर भी ऐसी बेबसी से गुजर रहा है! मन को थोड़ा सुकून भी मिला कि चलो, पुरुषों के पास भी ऐसी बेबसी आ जाती है, हम तो सोचते थे कि मासिक धर्म की तरह यह समस्या केवल हमारी ही है। सम्भ्रान्त राजपुरुष के सामने यह प्रश्न सुरसा के मुँह की तरह विकराल रूप लेने लगा, बता तेरा नाम क्या है? बता तेरा उपनाम क्या है? बता तेरा देश क्या है? पुरुष ने सीना चौड़ा नहीं किया अपितु सिकुड़ लिया, मिमियां कर बोला की दो दिन दो, सोचकर बताता हूँ। अबे इसमें सोचना क्या है, तेरी शादी नहीं हुई जो कह दे कि घर जमाई हूँ और नाम-उपनाम-देश सब बदल गया है! ना तो किसी के गोद गया है जैसे तेरे दादा ने गोद का उपनाम ले लिया था! फिर समस्या क्या है?
समस्या भारी है, कौन देश का तू है, तेरा नाम भी उसी देश का है, तेरी शिक्षा भी उसी देश की है लेकिन तू राजनीति धमाचौकड़ी इस देश में कर रहा है! महिने में दस दिन इस देश में और बीस दिन अपने देश में रहता है लेकिन तेरा सुरक्षा कवच इतना मजबूत है कि कोई तुझ से प्रश्न नहीं पूछता! जैसे ही तुझसे किसी ने कुछ पूछा तेरे पालतू सारे कुत्ते एक साथ भौंकने लगते हैं और उस शोर में प्रश्न दब जाता है। तू ने आजतक कई चुनाव भी लड़ लिये, अपनी शिक्षा का दस्तावेज भी दिखाया ही होगा लेकिन किसी ने नहीं पूछा कि भारत में तेरा नाम और दस्तावेजों में तेरे नाम में अन्तर क्यों हैं? हमारे बच्चे भी विदेश पढ़े हैं लेकिन उनका एक ही नाम है, फिर क्या वे दूसरे नाम से यहाँ चुनाव लड़ सकते हैं। दोहरी नागरिकता से जब वोट तक नहीं डाल सकते तो तू तो चुनाव लड़ भी रहा है और प्रधानमंत्री तक के सपने देख रहा है। फिर चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है कि इस देश का प्रधानमंत्री चोर है। अपनी चोरी छिपाने को तू देवता को चोर कह रहा है! जैसे एक लम्पट पति अपनी सती-सावित्री पत्नी को कुल्टा कहता है वैसा ही आचरण तेरा है। तेरे पास भौंकने वाले कुत्ते हैं तो तू कुछ भी करेगा! नहीं, अब ऐसे नहीं चलेगा। देश को बताना ही होगा कि तेरा नाम क्या है? तेरी असलियत क्या है? यदि इस बार भी तू बच निकला तो समझ ले कि गेंद प्रकृति के पास जाएगी और फिर प्रकृति का न्याय होगा। क्योंकि शाश्वत प्रकृति ही है, ना संस्कृति शाश्वत है और ना ही विकृति शाश्वत है। किसी भी झंझावात में सबकुछ विनष्ट हो जाएगा बस मूल स्वरूप में प्रकृति ही शेष रहेगी। बहुरूपिये का जीवन ज्यादा दिन नहीं टिकता, फिर तूने तो ऐसे व्यक्ति पर कीचड़ उछाला है जो पूजनीय  है। साध्वी का उदाहरण भी देख ले, किरकिरे की कैसी किरकिरी हो रही है। दिग्गी की भी और तेरी भी ऐसी मिट्टी पलीद होगी की तू ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। जब कोई किसी एक व्यक्ति पर कीचड़ उछालता है तो प्रकृति थोड़ा रुष्ट होती है लेकिन जब कोई किसी कौम को ही बदनाम करने की ठान लेता है तब जलजला आने लगता है, अब जलजले का समय शुरू हो गया है। इस जलजले में तेरा न्याय भी होगा और दिग्गी समेत तेरे सारे भौंकने वालों का न्याय होगा। आखिर समय कब तक तेरा साथ देगा। तू ने पाप ही इतने कर डाले हैं कि अब न्याय होकर रहेगा। तू न्याय का ठेकेदार बनना चाहता है ना, अब देख ना तेरा न्याय क्या होगा!

Thursday, April 18, 2019

अब न्याय होगा?


किसी ने न्याय को देखा है क्या? विकास को भी तो नहीं देखा था ना! प्रजा के किसी अदने से बंदे ने राजा को ललकार दिया, तत्काल सर कलम कर दिया गया, राजा ने कहा कि हो गया न्याय! न्याय का निर्धारण राजा की पसन्द से होता है। जो राजा के हित में हो बस वही न्याय है। 1975 याद है ना, शायद नौजवानों को खबर नहीं लेकिन हम जैसे लोगों के तो दिलों में बसा है, भला उस न्याय को कैसे भूल सकते हैं! न्यायाधीश ने न्याय किया कि तात्कालीन प्रधानमंत्री ने चुनाव गलत तरीकों से जीता है लेकिन प्रधानमंत्री तो खुद को राजा मानती थी तो आपातकाल लगाकर, सारे विपक्ष को जैलों में ठूसकर, मीडिया की बोलती बन्द कर के न्याय हुआ। तब भी कहा गया कि अब न्याय हुआ। 1984 भी याद होगा! पेड़ के गिरने से धरती हिल जाती है और राजा की मृत्यु से निरपराध कौम का सरेआम कत्लेआम भी न्याय ही कहलाया था, तब भी कहा गया था कि अब न्याय हुआ। न्याय के कितने ही किस्से हैं जब एक वंश ने अपने हित में न्याय किया। लेकिन न्याय करते-करते प्रजा को समझ आने लगा कि यह न्याय एकतरफा है। जैसे ही प्रजा की समझ बढ़ी, वंश का शासन नेपथ्य में चले गया। अब फिर चुनाव आया है और नारा दिया है – अब न्याय होगा! मुझे एक-एक कर सारे ही न्याय याद आने लगे हैं। सीताराम केसरी के प्रति भी न्याय याद आ रहा है, मेनका गाँधी के प्रति भी न्याय याद आ रहा है, लाल बहादुर शास्त्री के प्रति भी न्याय याद आ रहा है। सरदार पटेल, राजेन्द्र प्रसाद, नरसिंह राव, सुभाष चन्द्र बोस, सावरकर न जाने कितने नाम है वे सारे ही न्याय याद आ रहे हैं।
खुली चेतावनी दी गयी है, अब न्याय होगा! खुली चेतावनी दी जा रही है कि एक सम्प्रदाय एकत्र हो जाए और बहुसंख्यक समाज को न्याय दें सकें। पाकिस्तान से हाथ मिलाया जा रहा है, चीन के भी फेरे लगाये जा रहे हैं, बस इसी न्याय के लिये। आतंकवाद को पनाह दी जा रही है, मासूम प्रजा को न्याय देने के लिये। कभी चायवाला तो कभी दलित तो कभी महिला को निशाना बनाया जा रहा है कि सत्ता पर इनकी जुर्रत कैसे हुई बैठने की, अब न्याय होगा। खुले आम कहा गया कि देश को सेवक नहीं शासक चाहिये क्योंकि शासक ही तो न्याय कर सकता है। सैना को भी औकात बतायी जा रही है कि हम जैसे शासकों के साथ रहो, जो हम चाहते हैं उसी  पक्ष में खड़े रहो, हम ही तय करेंगे कि देश की सीमा क्या हो! हमने ही पहले देश की सीमा तय की थी, हमने ही पाकिस्तान बनाया था, हम चाहेंगे कि कश्मीर भी अलग देश बने इसलिये सैना को हमारे ही पक्ष में खड़ा रहना है, अब सैना का न्याय भी हम करेंगे।
अब न्याय होगा! प्रजा को समझ लेना है कि कैसा न्याय होगा! लोकतंत्र के खोल में राजाशाही का खेल होगा। राजवंश पूर्णतया सुरक्षित रह सके, इसके लिये न्याय होगा। राजवंश एक ही समय में ब्राहण बने या मुस्लिम बने या फिर ईसाई, किसी को प्रश्न पूछने का अधिकार नहीं होगा, यदि कोई पूछेगा तो फिर न्याय होगा। जनता को हर पल अनुभव कराया जाएगा कि वह गुलाम प्रजा है, उसे चौबीस घण्टे बिजली और पानी की जरूरत नहीं है, उसे गुलाम प्रजा की तरह रहना सीखना ही होगा, नहीं तो न्याय होगा। सबके लिये विकास की बात करने वालों के प्रति न्याय होगा। हमारे वंश के चिरागों को ही प्रथम परिवार मानना होगा, नहीं तो न्याय होगा। हम शासक हैं यह बात सम्पूर्ण जनता को माननी ही होगी, नहीं तो न्याय होगा। राजा के दरबारी खुश हैं कि अब हमें भी लूट का माल मिलेगा, झूठन मिलेगी, गाड़ी में ना सही, गाडी के पीछे लटकने का अवसर मिलेगा, तो दरबारी खुश हैं। वे भी चिल्ला रहे हैं कि अब न्याय होगा। सब खुश हो रहे हैं, नाच रहे हैं कि अब न्याय होगा! हम राजस्थान में बैठकर घण्टों जाती बिजली को देखकर समझ गये हैं कि अब न्याय हो रहा है। हमें समझ आने लगा है कि प्रजा क्या होती है और राजा क्या होता है। हम भी अब न्याय होगा के मंत्र को दोहराने लगे हैं और खुद को गुलाम बनाने की ओर मुड़ने लगे हैं। चुनाव के नतीजे बताएंगे कि अब न्याय होगा या फिर जनता सबल बनकर राजा को सेवक धर्म का स्मरण कराती रहेगी!

Friday, April 5, 2019

इस बार वोट पकौड़ों के नाम

कहावत है कि दिल्ली दिलवालों की है, जब दिलवालों की ही है तो चटपटी होना लाजमी है। चटपटी कहते ही चाट याद आती है और चाट के नाम से ही मुँह में पानी आता है। मुँह में पानी आता है मतलब आपकी स्वाद ग्रन्थियाँ सक्रिय हो रही हैं। स्वाद ग्रन्थियाँ सक्रिय होती है तो जो भी खाया जाता है उसका पाचन आसान हो जाता है। अब इतिहास देखते हैं – दिल्ली साठ बार उजड़ी और इतनी बार ही बसी। कल एपिक चैनल देखते हुए बताया गया कि जब शाहजहाँ ने वापस दिल्ली को बसाया तो एक मंत्री ने उन्हें कहा कि आपने दिल्ली को बसा तो दिया है लेकिन यमुना का पानी तो पेट के लिये बहुत भारी है। अब! कोई उपाय शेष नहीं था, दिल्ली तो बस चुकी थी, लोगों के पेट भी खराब होने लगे थे। तब अनुभवी लोगों ने कहा कि यमुना के पानी से बचाव का एक तरीका है, हमारे खाने में चटपटे मसालों का समावेश होना चाहिये साथ में ढेर सारा घी। बस फिर क्या था, खट्टी-मीठी चटनियाँ बनने लगी, सब्जियाँ घी में बनने लगी। धीरे-धीरे चाट का स्वाद दिल्लीवालों की जुबान पर चढ़ने लगा। पुरानी दिल्ली चाटवालों से भर गयी, खोमचेवाले आबाद हो गये। यहाँ तक की पराँठेवाली गली तक बन गयी। आलू के पकौड़े, गोभी के पकौड़े, प्याज के पकौड़े, पनीर के पकौड़े, बस पकौड़े ही पकौड़े! हर खोमचेवाला कहता कि मेरी चाट नायाब है, बात सच भी थी क्योंकि सभी की चाट में कुछ ना कुछ अलग था। गली-गली में खोमचें वाले बिछ गये, जहाँ देखो वहाँ ठेले सज गये।
शाहजहाँ के दरबार में यमुनाजी के पानी को लेकर जो चिन्ता थी वह दूर हो गयी थी। लोगों को चाट का स्वाद इतना भा गया था कि अब बिना चाट के गुजारा ना हो। आज की दुनिया में जहाँ पानी के शुद्धिकरण के कई उपाय हैं लेकिन चाट को अपने जीवन के हटाने का कोई उपाय शेष नहीं है। दिल्ली जाइए, आप कितना भी कह दें कि सुबह नाश्ते में पकौड़े नहीं चाहिये लेकिन पकौड़े तो बनेगें ही और आप खाएंगे ही। लेकिन एक दिन अचानक ही एक बात हवा में तैरने लगी कि पकौड़े बनाना तो काम-धंधे की श्रेणी में ही नहीं आता। दिल्ली का वजूद तो पकौड़े के कारण ही है, यहाँ न जाने कितने परिवार इसी धंधे में करोड़पति हो गये, अब कहा गया कि यह तो धंधा ही नहीं है। तो धंधा क्या होता है सिरफिरे भाइयों? राजा द्वारा बांटी गयी मुफ्त की खैरात पर पलने का नाम धंधा है जो अभी तुम्हारे आका ने घोषित किया है कि मेरा राज आएगा तो सभी को खैरात मिलेगी। अरे छोड़िये राजनीति की बात, कहाँ चाट का मजा आ रहा था और कहाँ पकौड़े याद आ गये और पकौड़े याद आते ही लोगों की जहर बुझी बातो याद आ गयी। बस जुबान का स्वाद ही खराब हो गया। अभी कुछ दिन पहले की ही बात है, एक रेस्ट्रा में गये, स्टार्टर देखे, लेकिन कोई भी पसन्द का नहीं था। पूछा कि पकौड़े टाइप कुछ है क्या? मासूम सा मुँह बनाकर मना कर दिया, मुझे लगा कि यह कमबख्त भी पकौड़े को लेकर दुश्मनी निकालने वालों में से दिखता है! अब भारत में तो पकौड़े ही चलते हैं, भाँत-भाँत के पकौड़े, हर मौसम में खिला लो, पसीने बहते जाएंगे लेकिन पकौड़े के लिये कोई मना नहीं करेगा। भारी पानी की ऐसी की तैसी, पकौड़े के साथ खट्टी-मीठी चटनी तो पेट सही ही सही।
अब राजनीति करने वालों देख लो तुम्हारे आका कितने ज्ञानवान हैं! जिस दिल्ली की बुनियाद ही चाट-पकौड़े पर पड़ी हो, वहाँ यह कहना कि पकौड़े बनाना भी कोई धंधा होता है, है ना बेवकूफी की पराकाष्ठा! लेकिन चुनाव आ गये हैं, ऐसे अक्ल के पैदल लोगों को जवाब देने का समय आ गया है। पकौड़े खाइए, पकौड़े को धंधा बनाइए और जो पकौड़ों की खिल्ली उड़ाए उसे लात मारिये। समझ गये ना। दिल्ली दिलवालों की ही है, दिलजलों की नहीं है। यमुनाजी का पानी पीना है तो पकौड़े खाना ही होगा। इस बार वोट पकौड़ों के नाम। 

Thursday, April 4, 2019

भेड़िये ने खाल उतार दी है

कल कांग्रेस का घोषणा पत्र घोषित हुआ, बहुत आलोचना हो रही है लेकिन मुझे नया कुछ नहीं लग रहा है। कांग्रेस की राजनीति स्पष्ट है, उनके समर्थक भी भलीभांति समझते हैं इसलिये ही दृढ़ता के साथ उनके पीछे खड़े रहते हैं। राजनीति का अर्थ होता है राज करने की नीति। एक राजनीति होती है – जनता को सुखी और सुरक्षित करने की और दूसरी होती है – स्वयं को सुखी और सुरक्षित करने की। पहली राजनीति लोकतांत्रिक होती है तो दूसरी राजाशाही की ओर इंगित करती है। कांग्रेस की राजनीति दूसरे प्रकार की रही है, स्वयं को सुखी और सुरक्षित करने की। लोकतंत्र में यदि आप राजाशाही घुसाना चाहोंगे तब आपको अपने लिये ऐसे लोगों की आवश्यकता हमेशा रहती है जो शक्तिशाली हों। गुण्डे, मवाली, अराजक तत्व आपके चहेते होने ही चाहिये जिससे आप किसी भी क्रान्ति को कुचल सकें। जैसे आपातकाल में किया गया था या फिर सिखों का नरसंहार कर किया गया था। भारत में लोकतंत्र है और लोकतंत्र में चुनाव होते हैं। अन्दर कैसा भी राजाशाही भेड़िया बैठा हो लेकिन लोकतंत्र में खाल तो भेड़ की ही पहननी पड़ती है। 2019 के चुनाव विस्मयकारी हैं, इस बार भेड़िये ने भेड़ की खाल नहीं पहनी, अपितु स्पष्ट ऐलान किया कि हम भेड़िये हैं और हम केवल स्वयं के लिये राज करना चाहते हैं। इससे पूर्व भी वे संकेत दे चुके थे जब देश के प्रधानमंत्री ने कहा कि मैं देश का चौकीदार हूँ तब काग्रेंस ने कहा था कि ये देश को चौकीदार देना चाहते हैं जबकि हम प्रधानमंत्री देना चाहते हैं। मतलब उनकी राजनीति स्पष्ट थी।
पूर्व के चुनावों में राहुल गाँधी कभी जनेऊ पहन रहे थे, कभी यज्ञ कर रहे थे लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं किया। बस सीधे केरल गये और वहाँ से उम्मीदवारी की घोषणा कर दी। अपनी पुरानी खाल को उतार फेंका। अपने समर्थकों को स्पष्ट ऐलान कर दिया कि हम राज करने आए हैं और राज करने में तुम्हारा भी हिस्सा होगा। इसलिये यदि तुम देश के टुकड़े करना चाहोगे तो तुम पर कोई कानूनी कार्यवाही नहीं होगी, यदि तुम देश के एक वर्ग को लूटना चाहोगे तो हमारी स्वीकृति होगी। वे सारे अधिकार दिये जाएंगे जो कभी लुटेरे शासक अपनी सेना को देते आए थे। जैसे ही कांग्रेस ने घोषणा पत्र जारी किया, अराजक तत्व और जिनकी मानसिकता सामान्य जनता पर राज करने की रहती है, वे सारे ही खुशी का इजहार करने लगे। उन्होंने भी अपने चोगे उतार डाले। चारों तरफ एक ही शोर मचा है कि राजा हम तुम्हारे साथ हैं, तुम्हें हम सुखी और सुरक्षित रखेंगे और तुम हमें रखना। यह गरीब जनता हमारी सेवा के लिये है, इसलिये राज करना आपका पुश्तैनी अधिकार है और साथ देना हमारा। पड़ोसी देशों को भी कहा गया कि आपको भी इच्छित प्रदेश मिल जाएगा बस हमारा साथ दो। इतना कहर मचा दो कि देश का प्रधानमंत्री का ध्यान चुनाव से हटकर देश की सुरक्षा की ओर लग जाए। सारे पहलवान अखाड़े में आ जुटे हैं, अपनी ताकत से जनता को गुलाम बनाने निकल पड़े हैं। ये कल तक भी यही कर रहे थे, बस कल तक इनके चेहरे पर लोकतंत्र का नकाब था लेकिन आज यह स्पष्ट घोषणा के साथ अखाड़े में उतर आए हैं। सारे देश के अराजक तत्व एकत्र हो जाओ। तुम हमें राजा बनाओ हम तुम्हें लूटने का अधिकार देंगे। सारा धन, सारा वैभव राजमहल में सीमित करने की घोषणा है। जिसने भी कल तक अपराध किये थे, वे सभी राजाशाही का हिस्सा होंगे, उनपर कोई कानून नहीं लागू होगा। सभी बुद्धिजीवी, कलाकार आदि को खुला निमंत्रण मिल गया है कि तुम हमारे चारण-भाट और हम तुम्हारें रक्षक बन जाएंगे। बस इस अफरा-तफरी के माहौल में कौन टुकड़ों पर मोहताज होना चाहेगा और कौन सर ऊँचा करके जीवन यापन करना चाहेगा, फैसला जनता को करना है। 

Wednesday, April 3, 2019

अब भगीरथ की बारी

टाटा स्काई और नेटफ्लेक्स ने समानान्तर फिल्में बनाकर अपनी दुनिया खड़ी की है। नेटफ्लेक्स का तो मुझे अनुभव नहीं है लेकिन टाटा स्काई की बॉलीवुड प्रीमियर को काफी दिनों से देख रही हूँ। छोटे बजट की छोटी फिल्में बना रहे हैं और कहानी भी हमारी जिन्दगी के आसपास ही घूमती है। परसो एक फिल्म आ रही थी, दस मिनट की ही देख पायी थी लेकिन शुरुआत में ही ऐसा कुछ था जो मेरे कान खड़े करने को बाध्य कर रहा था। माता-पिता को अपनी बेटी की चिन्ता है और उन्हें शक है कि आधुनिक चलन के कारण उनकी बेटी भी लेस्बियन जीवन तो नहीं जी रही है? बेटी बोलती है कि नहीं मेरा ऐसा कुछ नहीं है, माँ लेस्बियन का अर्थ नहीं समझ पाती है तो बेटी समझाती है कि गंगा को धरती पर लाने वाले भगीरथ थे ना! राजा सगर की दो पत्नियाँ थी और वे जो थी उसी की बात कह रही हूँ। माँ भगीरथ के नाम से ही श्रद्धा से गीत गाने लगती है और बेटी को भी गीत गाने को कहती है लेकिन ना माँ समझ पायी कि बेटी क्या कहना चाहती है और ना ही दर्शक समझ पाए होंगे कि धीरे से फिल्म निर्माता ने हमारे पुराण पर प्रहार कर दिया है। ऐसे प्रहार रोज ही किये जाते हैं, कभी हम समझ पाते हैं और कभी नहीं। लेकिन देखते ही देखते कथाएं नवीन स्वरूप लेने लगती हैं और नयी पीढ़ी को भ्रमित करने का सफल प्रयोग किया जाता है।
एक तरफ साहित्य हमें सभ्यता और संस्कृति से जोड़ता है वही फिल्मी साहित्य हमें फूहड़ता और असभ्यता से जोड़ने की ओर धकेल रहा है। गालियों का प्रयोग इतना भरपूर हो रहा है कि लगने लगा है कि हम किस दुनिया में आ गये हैं! गालियों का प्रभाव तो हम सोशल मिडिया पर देख ही रहे हैं, किसी एक ने गालियों का प्रयोग लेखन में किया और गाली-प्रिय लोग एकत्र होने लगे। देखते ही देखते गालीबाज लोग प्रसिद्ध होने लगे, उनकी देखादेखी दूसरे लोग भी गाली पर उतर आए। अब तो गालियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है, सभ्यता को तो हमने किनारे कर दिया है। नेटफ्लेक्स में भी गालियों की भरमार है और टाटा स्काई पर भी। कथानक हमारी जिन्दगी के हर पहलू को छू रहे हैं लेकिन असभ्य तरीके से, इनमें सौंदर्यबोध कहीं नहीं है। ऐसी फिल्मों पर समाज को दृष्टि रखनी होगी। मैं समझ सकती हूँ कि हमारे पुराणों ने सैकड़ों कहानियाँ दी है, हमारा इतिहास भी गौरव गाथाओं से भरा है और टीवी के भी सैकड़ों चैनल आ गये हैं। कौन सा चैनल कब किस चरित्र का चरित्र हनन कर दे, उन पर लगाम लगाना परिश्रम साध्य काम है। लेकिन यह हमें करना ही होगा। हम पहले भी बहुत कुछ बर्बाद कर चुके हैं, तब तो हम कह देते हैं कि हम गुलाम थे इसलिये ऐसा हुआ लेकिन आज तो स्वतंत्र हैं! हम जागरूक भी हैं तो क्यों नहीं अपने विवेक को जागृत करते हैं और ऐसा कुछ फिल्माया गया है तो उस पर निगाह रहे। मैंने केवल दस मिनट की फिल्म देखी थी, नाम भी कुछ अजीब सा था, दोबारा जरूर देखूंगी और फिर समझ पाऊंगी कि फिल्मकार क्या चाहता है? लेकिन यह तय है कि हमारे सीरियल और फिल्में धीरे से वार कर रही हैं, बहुत ही सोची-विचारी रणनीति के अनुरूप ऐसा हो रहा है। एक सीरियल आ रहा है चन्द्रगुप्त मौर्य – इसमें तो पुरातन इतिहास की धज्जियां उड़ा दी गयी है लेकिन समाज का कोई स्वर नहीं उठता है! हम लोग इस विषय में क्या कर सकते हैं, इस पर विचार आवश्यक है। कल तक राम और कृष्ण इनके निशाने पर थे आज गंगा को माँ और पवित्र नदी मानने के कारण भगीरथ पर प्रहार शुरू हुआ है, अभी केवल कंकर फेंका गया है, धीरे-धीरे हमारे पैरों से जमीन ही खिसका दी जाएगी। सावधान!

Saturday, March 30, 2019

अभी तोते आजाद हैं

फतेहसागर की पाल पर खड़े होकर आकाश में विचरते पक्षियों का कलरव सुनने का आनन्द अनूठा है, झुण्ड के झुण्ड पक्षी आते हैं और रात्रि विश्राम के स्थान पर चले जाते हैं। कल मैंने ध्यान से देखा, तोते ही तोते थे, हजारों की संख्या में तोते स्वतंत्र होकर उड़ रहे थे। हम तो सुनते आए थे कि तोता स्वतंत्र नहीं है! शायद अभी चुनाव के चलते तोते स्वतंत्र हो गये हैं। खैर गाड़ी उठायी और अपन भी चल दिये घर की ओर। रास्ते में पुलिसियाँ तोतों का झुण्ड, सड़क घेरकर खड़ा था। सघन तलाशी ली जा रही थी। मैंने पूछ लिया कि माजरा क्या है? पता लगा कि चुनाव है। चुनाव है तो तोते स्वतंत्र हैं, अपनी मर्जी और अपनी ताकत दिखा रहे हैं। अब तोतों की मर्जी चलेगी, गाडी की डिक्की खोलो, हुकम आया। कहीं नोटों की गड्डियाँ तो इधर-उधर नहीं हो रही है! मन ही मन विचार आया कि यदि देश में इतने तोते हैं तो यह जाते कहाँ हैं! रोज तो दिखायी नहीं देते, चुनाव के समय कैसे झुण्ड के झुण्ड दिखायी दे रहे हैं! आकाश में भी हजारों दौड़ रहे हैं और धरती पर भी! घर के नजदीक आ गये, वहाँ भी देखा तोतों ने पकड़-धकड़ मचायी हुई है। शायद यही मौका है, पैसा कमाने का। आदमी को स्वतंत्र छोड़ दो, पैसा कमा ही लेगा, पक्षी को भी स्वतंत्र छोड़ दो, पेट भर ही लेगा।
चुनाव भी क्या अजीब खेल है! भगवान को एक तरफ बिठा दिया जाता है, बस सारे मंत्री और संतरी ही न्याय करते हैं। भगवानों की ऐसी की तैसी करने के लिये चुनाव कारगर सिद्ध होते हैं। कल तक यस सर कहने वाला नौकरशाह, सर को उठाकर कोठरी में बन्द कर देता है, जैसे ही चुनाव खत्म, फिर से यस सर! चुनाव नहीं हुए मानो पतझड़ आ गयी, सारे पत्ते झड़कर ही दम लेंगे, सबको कचरे में जाना ही है। कल तक जो पेड़ पर राज करते थे आज जमीन पर पड़े हुए धूल खा रहे होते हैं। तोते भी पेड़ों से चुन-चुनकर इन पत्तों को नीचे धकेलते रहते हैं। मैंने आकाश में उड़ते तोते से पूछ लिया कि भाई लोगों कल तक कहाँ थे? आज अचानक ही कहाँ से अवतरित हो गए? उन्होंने अपनी गोल-गोल आँखे मटकायी और कहाँ कि बताएं क्या कि कहाँ थे? तुम्हें भी वहीं सीखचों के पीछे धकेल दें? तोबा-तोबा, नहीं पूछना जी। तुम्हारा खेल दो महिने का है फिर तुम्हें पिंजरे में ही रहना है, दिखा दो अपनी ताकत। लेकिन अभी तो आकाश में दौड़ लगाते, अपना वजूद तलाशते तोते आजादी से घूम रहे हैं, अच्छा लग रहा है।
धरती के भगवान नेतागण भी घूम-घूमकर अपनी प्रजा को घेरे में ले रहे हैं, कहीँ कोई दूसरे पाले में नहीं चले जाएं! देव और असुरों का संग्राम जारी है, बस यही बात समझ नहीं आ रही है कि देव कौन हैं और असुर कौन हैं? चारों तरफ से बाण ही बाण चल रहे हैं। कुछ लोग काम तो असुरों जैसा करते हैं लेकिन चुनाव की इस घड़ी में खुद को देवता बताते हैं। कल तक खुलकर गौ-माता को सरेआम काटकर खा रहे थे, आज तिलक लगाकर मन्दिरों में ढोक लगा रहे हैं! मतलब कि कोई भी असुर दिखना नहीं चाहता है! कभी-कभी लगता है कि चित्तौड़ में लाखों लोगों का कत्ल करने वाला अकबर तिलक लगाकर प्रजा के सम्मुख हाथ जोड़कर खड़ा है। हम सब जय-जयकार कर रहे हैं। अकबर महान है का जयघोष कर रहे हैं। कश्मीर में कंकर फेंकने की पवित्र रस्म जारी है और इस कंकर से घायल हुए फौजी को खदेड़ने की मुहिम भी जारी है। हम वहाँ भी जय-जयकार कर रहे हैं। लेकिन देव भी डटे हुए हैं, वे सतयुग की कल्पना को रूप देने में जुटे हैं। बस देखते रहिये कि देव जीतते हैं या असुर। तोतों का राजपाट भी देख लेते हैं, इनकी आकाश में उड़ान भी देख लेते हैं। तोतों का तो यह हाल है कि लोग कहने लगे हैं कि बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी! लेकिन अभी तो तोते की आजादी आनन्द दे रही है। 

Thursday, March 28, 2019

31 रूपये में क्या नहीं आता?


हाथ में टीवी का रिमोट होना ही महसूस करा देता है कि घर की सत्ता हमारे हाथ में है। कभी घर की दादी पूजा कर रही होती थी, पूजा की घण्टी बजाते-बजाते भी निर्देश देती थी कि बहू दूध देख लेना, कहीं उफन ना जाए, पोते को कहती कि बेटा जरा मेरा चश्मा पकड़ा जाना, फिर जोर से बेटे को आवाज लगाती कि जाते समय मेरी दवा लाना भूल मत जाना। दादी पूजा घर में है लेकिन पूरे घर का रिमोट उनके हाथ में है, सभी को हर पल चौकन्ना रखती थी। अब दादी वाले घर तो कम होते जा रहे हैं लेकिन मन बहलाने को रिमोट हाथ आ गया है, जैसे ही पतिदेव के हाथ लगता है, बटन दबते ही जाते हैं और जब तक 100-50 चैनल बदल लिये नहीं जाते तब तक समाचार देखना सम्भव नहीं होता। पतिदेव रिमोट से चैनल बदल रहे होते हैं और पत्नी अल्मारी में से साड़ियों को हाथों से सरका रही होती है, यह नहीं, यह भी नहीं! 10-20 को जब तक परे धकेल नहीं देती तब तक साड़ी का चयन नहीं होता। बच्चे खिलौनों में उलझे हैं, सारे ही खिलौने कमरे में फैले हैं, लेकिन मजा नहीं आ रहा और छोटा बच्चा रसोई में जा पहुँचता है, कटोरी-चम्मच को बजाने से जो आवाज आती है, बस वही उसका आनन्द है। ढेर सारी चीजों में से अपनी पसन्द चुनना हमारी आदत है। यदि चुनने का अधिकार नहीं मिला तो लगता है जीवन ही बेकार गया। किसी युवा को यदि 10-20 लड़कियाँ या लड़के देखने को नहीं मिलें हो तो वह कभी ना कभी कह ही देंगे कि जिन्दगी में हमने क्या किया! सब्जी वाले की दुकान जब तक सब्जी से भरी ना हो तो क्या खाक सब्जी खरीदने का आनन्द है!
इन दिनों ट्राई ने यह आनन्द छीन लिया है, कहते हैं कि जो चैनल देखने हो, बस उतने ही रखो और पैसे बचाने के मजे लो। हुआ यूँ कि कुछ बुजुर्गवारों ने कहा कि हम तो केवल दाल-रोटी ही खाते हैं, चपाती भी कम से कम होती जा रही हैं तो भला 56 भोगों वाली पूरी थाली के पैसे क्यों दें! दूसरे ने कहा कि सच कह रहे हो, मैं तो टीवी पर केवल समाचार ही देखता हूँ, तो भला 1000 चैनल के पैसे क्यों दूँ! पहुँच गये ट्राई के दरबार में, मुकदमा दर्ज करा दिया। न्याय तो पैरवी करने वाले के हिसाब से मिलता है, ट्राई ने कहा कि सच है आप पूरे पैसे क्यों देंगे! फरमान जारी हो गया कि जितने चैनल देखते हो, बस उतने का ही पैसा दो। बड़ा अच्छा लगा, सुनने में। अब दो दो-चार चैनल के ही पैसे देंगे। लेकिन यह क्या! जो रिमोट घुमाते थे, उनका तो खेल ही समाप्त हो गया! ऐसे लगने लगा जैसे बोईंग विमान की जगह हेलीकोप्टर में यात्रा कर रहे हों। अभी रिमोट हाथ में लिया ही था कि मन ही मन सोच रहे थे और निर्देश दे रहे थे कि बीबी – दाएं घूम, बीबी बाएं घूम, लेकिन चैलन तो वहीं अटक गया। अब घुमा लो अपनी अंगुलियों पर दुनिया को! सारा मिजाज ही ठण्डा पड़ गया। पति बड़बड़ा रहा है, पत्नी बड़बड़ा रही है, बच्चे भी बड़बड़ा रहे हैं कि हमने भूसें के ढेर में से सुई खोज ली है, ऐसा आनन्द ही समाप्त हो गया। माना कि अपने घर का ही खाना खाना है लेकिन आसपास के घरों में ताक-झांक करके खाने का आनन्द ही कुछ और है। ऐसा लग रहा है कि टीवी पुराने दूरदर्शन का डिब्बा हो गया। समाचार देख लो और कृषिदर्शन देख लो। एचडी चैनल लेते हैं तो एसडी नहीं ले सकते और एसडी भी ले लेते हैं तो बजट तो लिमिट से बाहर हो जाता है। देखना हमें चार ही है लेकिन भरी पूरी दुकान से ही सौदा खरीदेंगे ना! भाई ट्राई वालों हमारे रिमोट चलाने का आनन्द हमसे मत छीनो, हम तो इसी के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं। जैसे ही हमारे हाथ में भूले भटके से रिमोट आता था हम कहीं की महारानी बन जाते थे, हमें भी रिजेक्ट करने का और चयन करने का सुख मिल जाता था। लेकिन हाय! घर में ही पुस्तकालय बना रखा था, जब मन करता किताब उठाकर पढ़ लेते थे लेकिन अब कहा जा रहा है कि आप सीमित रूप से ही किताबें रख सकेंगे, कौन सी किताब छाटूं और कौन सी नहीं, समझ ही नहीं आ रहा है। छाँटना भी टेढ़ी खीर है, कोई कह रहा है कि 31 रूपये में क्या नहीं आता है? लेकिन जब 31 रूपये ढूंढते हैं तो कहीं नहीं मिलते। कभी सोनी में अच्छा सीरियल आ जाता है तो कभी जी पर, कभी कौन सी फिल्म किस पर आ जाएगी, कुछ कह नहीं सकते, तो भाई वाट लग गयी है हमारी तो। सबसे बड़ी वाट तो चैनल छांटने में लगी है, किस को छांटे और कैसे छांटे, किसी के पास सरल रास्ता हो तो बता दो नहीं तो हम पैसे भी देते जाएंगे और भूखे ही रह जाएंगे। हमें तो लग रहा है कि भूसे में से सुई ढूंढना जैसा काम हो गया है। सत्ता का सुख भी गया और सुई ढूंढने की मुसीबत सर पड़ी वो अलग।

Wednesday, March 27, 2019

हे मोदी! साँपों को सुड़क जा

घर में यदि छिपकली आ जाए तो हड़कम्प मच जाता है, मानो दुश्मन का सिपाही ही घर में घुस आया हो! कल ऐसा ही हुआ, हड़कम्प तो नहीं मचा क्योंकि बहादुर युवा पीढ़ी घर में नहीं है, बस हम ही पुरातनपंथी लोग रहते हैं। आजकल नूडल्स का बड़ा फैशन है और वह भी उसके खाने के तरीके का। बच्चे लोग एक नूडल लेते हैं और उसे लम्बा करके सीधे ही मुँह से खींचते हैं और सड़ाक से नूडल अन्दर हो जाती है। मोर को तो देखा ही होगा आप सभी ने, हमारे देश का राष्ट्रीय पक्षी भी है, बहुत ही कमसिन और हसीन होता है। लेकिन साँप को नूडल्स की तरह सीधे की सुड़क लेता है। छिपकली भी साँप प्रजाति की ही है और एक ही पूर्वज की वंशज है, तो वह भी मोर से क्या उसके पंख से भी डरकर भाग जाती है। कल यही हुआ, बाथरूम में एक छिपकली आ गयी। मैंने तत्काल बाजार की ओर प्रस्थान किया, मुझे मालूम था कि शहर में सूरजपोल चौराहे पर मोरपंख बिकते है। मोरपंख खरीदे और बाथरूम में लगाया, मैंने देखा कि छिपकली चुपचाप देख रही थी। लेकिन यह क्या! दो मिनट में ही छिपकली गायब! देखा मोरपंख की ताकत। केवल सुन्दरता के लिये ही मोर को राष्ट्रीय पक्षी नहीं घोषित किया था, यह आस्तीन के छिपे साँपों को भी सुड़ुक कर जाता है। छिपकली तो मोरपंख से ही भाग जाती है।
श्रीकृष्ण ने मोरपंख को धारण किया था, श्रीकृष्ण की शक्ति का तो पता ही है। आजकल लोग कहते हुए मिल जाएंगे कि मोदी ने साँपों के बिल में गर्म तैल डाल दिया है, साँप निकल-निकलकर भाग रहे हैं। मोरों को चारों तरफ तैनात कर दो, सारे साँप सुड़ुक! लेकिन कल ऐसा हुआ कि मेरे घर में तो छिपकली ही निकली लेकिन देश में मणिधारी साँप निकल आया। अफवाह उड़ी की हमारे पास मणिधारी साँप है, हम कितना भी धन-दौलत उगल सकते हैं। देश में चारों तरफ जनता के मोर तैनात हो चुके थे लेकिन मोरों को कहा गया कि हमारे पास मणिधारी साँप है। अब कल से ही मोर सोच में पड़े हैं कि इस साँप को छोड़ दें या इसे ही सुड़ुक कर जाएं! क्योंकि कोई और जाने या ना जाने, मोर तो जानता ही है कि मणिधारी साँप कुछ नहीं होता। लेकिन जनता तो ऐसे ही सपनों में जीती आयी है तो वह भी मणि के सपनों में खोने लगी है। सोने की मुर्गी हर घर में रोज सोने का अण्डा देगी तो भला किसका ईमान नहीं डोलेगा!
सात फण फैलाए, बगल में मणि दबाए, साँप का जलवा अब पूरे देश में दिखाया जाएगा, साँप के जहर से मत डरो, यह साँप तो धन-दौलत देने वाला है। यह बहुत ही शुभ साँप है, इसे हर घर में पनाह दो, इसका आह्वान करो, इसे दूध पिलाओ। अब मोरों को भगाने का काम होगा, साँपों को न्यौता जाएगा। बस देखना यह है कि कैसे मोदी इस साँप की मणि का सच जनता के सामने रखते हैं और साँप को विष रहित करते हैं? हर घर में साँप नहीं होंगे लेकिन कहीं उन्हीं के वंश की छिपकली होगी तो कहीं दूसरी प्रजाति होगी। हमने मोरपंख लगा लिये हैं, हम किसी मणि के भ्रम में नहीं है। हमें पता है कि साँप के पास कोई मणि नहीं है, है तो केवल विष है। यदि हम सजग नहीं हुए तो धन-दौलत की जगह विष पीना पड़ेगा। सावधान पार्थ! श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि मैंने ऐसे ही मोरपंख को धारण नहीं किया है! हे मोदी! तू भी मोरपंख का धारण कर और इन साँपों को सुड़क जा। 

चूहा भाग – बिल्ली आयी

खबरे आ रही हैं कि लोग भाग रहे हैं, जहाँ सींग समाए वहीं भाग रहे हैं। उत्तर से दक्षिण तक की दौड़ लगाने की योजना है, बस छिपने की जगह मिल जाए। चूहे के पीछे बिल्ली पड़ी है, बिल्ली झपट्टा मारने को तैयार है। चूहे के गाँव में पहले कभी बिल्ली नहीं आयी, चूहा निर्भीक होकर घूम रहा था, अचानक कि एक बिल्ली ने म्याऊँ-म्याऊँ का राग अलाप दिया, चूहे को लगा कि बिल में दुबकना ही ठीक है। लेकिन चूहा हमेशा दूसरे के खेत में ही कुतर-कुतर करता है, खुद का उसके पास कुछ नहीं है तो खेत ढूंढने के लिये दौड़ लगा रहा है। सुना है सुदूर दक्षिण में उसकी बिरादरी वालों की भरमार है तो अनाज मिलता रहेगा और वहाँ आसानी से फुदकता भी रहेगा। वहाँ भी पैर नहीं जमे तो समुद्र किनारे से भागना भी आसान रहेगा। लोग पूछने लगे हैं कि चौकीदार चोर है तो तू क्यों भाग रहा है! चौकीदार और चोर की बात छोड़ो, अभी तो बिल्ली पीछे दौड़ रही है, चूहा भागते-भागते हाँफ रहा है।
चौकीदार खम्ब गाड़कर खड़ा हो गया है, काशी में खम्ब गड़ा है, किसी की हिम्मत नहीं की चौकीदार की लाठी के पास भी पहुँच जाए। चोरों की टोली से कहा कि जाओ चौकीदार से मुकाबला करो, उसे भ्रमित करो और घुस जाओ घर के अन्दर। लेकिन सारे ही चोर पीछे हट गये कि अंगद का पैर उखाड़ने की हमारी औकात नहीं, किसी को खाँसी आ गयी और किसी को हाँसी आ गयी। सभी की माया दाँव पर लगी है तो ममता भी किनारे बैठ गयी है। चोरों का खानदानी कुनबा भी मारा-मारा फिर रहा है। कोई गंगाजी में डुबकी लगा रहा है तो कोई छिप-छिपकर हनुमान चालीसा पढ़ रहा है। जमानती चोर को डर है कि जमानत ही रद्द ना हो जाए। चारों तरफ शोर है, भागो – भागो – भागो। अरब सागर तक भागो।
एक चोर बोल रहा है कि यह चौकादार नहीं कोई तांत्रिक है, जादू-टोना कर दिया है सभी पर। कृष्ण बांसुरी बजा रहे हैं और उनके पीछे सारे चूहे सम्मोहित से जा रहे हैं और अपने आप समुद्र में गिर रहे हैं। कैसा अद्भुत दृश्य है! प्रमुख चौकीदार ने हर चौकी पर चौकीदार तैनात कर दिये हैं, फिर चाहे सीमा की चौकी हो या फिर थाणे की चौकी। चारों ओर चौकीदार ही चौकीदार दिख रहे हैं, चोर को घुसने की कहीं जगह नहीं मिल रही! चोरों की रानी ने नाव की सवारी कर ली कि गंगा मैया के सहारे से घर में घुस जाऊंगी, लेकिन कामयाबी नहीं मिली अब खुद चोरों का सरदार समुद्र किनारे से घुसपैठ करने की सोच रहा है। लोग बता रहे हैं कि वहाँ उसकी बिरादरी वालों का हुजूम है, जैसे-तैसे उसे घर में घुसा ही देंगे। कोई बात नहीं, घर में आने से क्या होगा, बिल्ली को वहाँ पर भी रहेगी! बहुत चोर-चोर खेल लिया तूने, अब खुद ही भागा-भागा फिर रहा है। अब सभी ताली बजा रहे हैं, कह रहे हैं कि भाग – भाग – भाग, देख तेरे पीछे बिल्ली आ रही है। अब देखना है कि कल तक चोर-सिपाही का खेल खेला जा रहा था लेकिन अब चूहे और बिल्ली का खेल बन गया है। बिल्ली ने चूहे को भगा दिया है, वह उसके बिल के पास आसन डालकर बैठ गयी है। गाँव वालो भी बिल्ली को दूध-मलाई खिला रहे हैं, कह रहे हैं कि इस चूहे ने हमारी फसल बर्बाद की है। सारे खेतों को खोद डाला है, सारा ही गाँव उजाड़ सा पड़ा है। देखते हैं कि इस चूहे-बिल्ली की लड़ाई में किस की जीत होती है, बस देखते रहिये इस भागमभाग का नतीजा क्या होगा! 

Saturday, March 23, 2019

मोदी ने वास्तव में बर्बाद कर दिया


दिल बार-बार रस्सी तोड़कर भागने की कोशिश कर रहा है, कभी कहता है कि यह लिख और कभी कहता है कि वह लिख! चारों तरफ विषय बिखरे पड़े हैं लेकिन सारी मशक्कत बेकार सी लग रही है। ऐसा लग रहा है जैसे किसी भरे पेट वाले के सामने भोजन परोसने का प्रयास किया जा रहा हो। राजनीति में लोग आकंठ डूबे हैं, चारों तरफ से एक ही आवाज आ रही है कि हमें "सबका साथ – सबका विकास" ही करना है। लेकिन दूसरी तरफ से एक आवाज और आ रही है कि हम तुम्हारे माई-बाप रहे हैं, हमें फिर से देश का माई-बाप बनाओ। लोग तराजू के पलड़े में झूल रहे हैं, माई-बाप के टुकड़ों पर पलें या सबका साथ-सबका विकास के साथ आत्मनिर्भर बने? एक मन करता है कि अजगर करे ना चाकरी, पंछी करे ना काज, दास मलूका कह गये, सबके दाता राम, इस बात पर चलकर माई-बाप के टुकड़ों पर पलने में क्या बुराई है! इस कहावत में राम की जगह अल्लाह लगाने को भी तैयार हैं, लेकिन मन के एक कोने से दबी सी आवाज आती है कि नहीं, मुझे स्वाभिमान के साथ जीना है। मन तभी चिंघाड़ता है कि नहीं होगी मुझ से ईमानदारी! मैं जन्म-जन्मान्तर से आकण्ठ बेईमानी में डूबा रहा हूँ, अब कौन भला मुझे ईमानदारी की रोटी की सीख दे रहा है! क्यों हिन्दुस्थान, पाकिस्तान किया जा रहा है? भला बेईमान को किसने रोका है, यह तो हर युग में फला-फूला है। क्या औरंगजेब के काल में हम बेईमान मर गये थे? मरते और टूटते तो पत्थर के भगवान है, औरंगजेब ने सारे ही भगवानों को नेस्तनाबूद कर दिया था लेकिन  हम जैसे बेईमानों और चाटुकारों को तो खूब इज्जत बख्शी थी। आप नहीं मान रहे हैं मेरी बात! क्या कह रहे हैं? आपको प्रमाण चाहिये! अभी देखा नहीं कि पाकिस्तान ने कैसे सिद्धू, अय्यर, राहुल जैसे चाटुकारों के लिये पलक-पाँवड़े बिछाये थे जबकि अपने जन्म के साथ ही उसका एक ही मंसूबा रहा है कि हिन्दुस्थान को मटियामेट करना है और अखण्ड पाकिस्तान का निर्माण करना है। भई वह पाकिस्तान ही बनाएगा ना! हमें क्या! हम तो जन्मजात बेईमान और चाटुकार लोग हैं, हमें तो वहाँ भी कठिनाई नहीं होगी, सच पूछो तो हमें यहाँ घुटन हो रही है। ईमानदारी से जीना हमें रास नहीं आ रहा है और सबसे खराब बात तो यह है कि गरीब आदमी भी हमारे सामने छाती चौड़ा करके खड़ा हो जाए यह तो हम देख ही नहीं सकते। सब कुछ बर्बाद कर दिया है मोदी ने। घोड़ों और गधों को बराबर करने का प्रयास किया जा रहा है। अब यदि सभी अपने  पैरों पर खड़े हो गये तो हमारी सेवा कौन करेगा?
सभी के बैंक अकाउण्ट खुलवा दिये, साहूकारों पर कितना जुर्म है! हम सदियों से भरपूर ब्याज लेकर इन्हें लूटते आये थे। हर गाँव में साहूकार यह सेवा देता रहा है, हमें ही जनता माई-बाप मानती रही है और आज कहा जा रहा है कि तुम अपने माई-बाप खुद ही हो! सबको एक कार्ड थमा दिया है, एक नाचीज की भी पहचान हो गयी, कल तक केवल हमारी ही पहचान थी! सबकुछ बर्बाद कर दिया मोदी ने। इतनी चमचमाती सड़कें भला कोई बनाता है क्या? हर गाँव वाले ने मोटर सायकिल ले ली! गरीबी हटाओ का नारा केवल दिया जाता है, वास्तव में कोई हटाता है क्या! सब कुछ बर्बाद कर दिया मोदी ने। क्या-क्या लिखूँ, कैसे लिखूं! कल तक मंहगाई का रोना रोकर जीतते आए थे, आलू-प्याज की कद्र ही नहीं रही! पेट्रोल भी बेभाव मारा गया! टमाटर का रोना पाकिस्तान को भेज दिया! पाकिस्तान के नाम से याद आया, अब हमारे सैनिक भी घुस जाते हैं और मार आते हैं, कबड्डी-कबड्डी का खेल रोज ही खेल आते हैं और जब वे कबड्डी बोलने की सोचते भी हैं तो सीमा रेखा पर ही दबोच लेते हैं। हम जनता को अब पाकिस्तान के नाम से भी डरा नहीं पा रहे हैं, हमने कई नेता पाकिस्तान में ही तैनात कर दिये, न जाने कितने पत्रकार उनकी भाषा बोलते-बोलते थक गये हैं लेकिन मोदी ने ऐसा बर्बाद किया है कि अब पाकिस्तान का नाम लेने से भी डर लगने लगा है। हमने न जाने कितने रिश्ते पक्के कर रखे थे, कितनी बेटियों के दामाद ढूंढ रखे थे लेकिन अब वहाँ कंगाली छायी है तो क्या करेंगे रिश्ता कर के! मोदी ने वास्तव में बर्बाद कर दिया।

Friday, March 22, 2019

देश का बागवां सशक्त है

सखी! चुनाव ऋतु आ गयी। अपने-अपने दरवाजे बन्द कर लो। आँधियां चलने वाली है, गुबार उड़ने वाले हैं। कहीं-कहीं रेत के भँवर बन जाएंगे, यदि इस भँवरजाल में फंस गये तो कठिनाई में फँस जाओंगे। पेड़ों से सूखे पत्ते अपने आप ही झड़ने लगेंगे। जिधर देखों उधर ही पेड़ पत्रविहीन हो जाएंगे। सड़के सूखे पत्तों से अटी रहेगी, चारों तरफ सांय-सांय की आवाजें आने लगेगी। पुष्प कहीं दिखायी नहीं देंगे, बस कांटों का ही साम्राज्य स्थापित होगा। इस ऋतु को देश में पतझड़ भी कहते हैं, लेकिन चुनाव की घोषणा के साथ ही देश में पतझड़ रूपी यह चुनाव-ऋतु सर्वत्र छाने लगती है। पेड़ रूपी राजनैतिक दल सारे ही पत्ते रूपी वस्त्र त्याग देते हैं, निर्वस्त्र हो जाते हैं। जिसने धारण कर रखे होते हैं, उनके भी दूसरे दल खींच लेते हैं। तू-तू, मैं-मैं का शोर हवाओं की सांय-सांय से भी तेज होने लगता है। आंधियों के वेग के कारण हवा किस ओर से बह रही है, भान ही नहीं होता। रेत के टीले उड़कर इधर से उधर चले जाते हैं, रातों-रात धरती का भूगोल बदल जाता है। लेकिन इस चुनाव ऋतु में मनुष्य घबराता नहीं है, उसे पता है कि पतझड़ के बाद ही नवीन कोपलें फूंटेंगी, बस वह उन्हीं का इंतजार करता है।
अपने-अपने पेड़ों पर सभी की दृष्टि टिकी होती है, सभी चाहते हैं कि हमारे पेड़ पर ज्यादा से ज्यादा पत्ते आएं और नवीन फूल खिलें। लेकिन आजकल का चलन विदेशी पेड़ लगाने का भी हो गया है, कुछ लोग बिना सुगन्ध के विदेशी फूल लगाने लगे हैं, उनकी पैरवी भी खूब करते हैं, उन्हें वे सुन्दर लगते हैं। अपने गुलाब को उखाड़कर विदेशी गुलाब लगाने का चलन हो गया है। लेकिन इस बार लोग सतर्क हो गये हैं। फूल लगेगा तो देशी ही लगेगा, लोग कहने लगे हैं। लेकिन देश में एक नहीं अनेक समस्याएं हैं। कोई कह रहा है कि गुलाब नहीं चमेली लगाओ, कोई कह रहा है कि मोगरा लगाओ, कोई रातरानी तो कोई सदाबहार के पक्ष में है। देश में जितनी गलियाँ हैं उतने ही फूल हैं। इस ऋतु में हर आदमी के पास अपना फूल है, कोई विदेशी फूल लिये खड़ा है तो कोई देशी। हम तो देख रहे हैं कि अपने आंगन में एक तुलसी की पौध ही लगा दें, बारह मास काम आएगा। पतझड़ में इसके पत्ते भी झड़ गये थे, हमने बीज बचाकर रख लिये थे, बस गमले में डाला और उगने लगे हैं अंकुर।
सखी! पतझड़ में अपना ध्यान रखना। किसी भँवरजाल में मत फंसना। यह पतझड़ बस कुछ दिन ही रहने वाली है, फिर तो चारों तरफ सारे ही रंग बिखरे होंगे। सखी! तुम यही भी पता नहीं कर पाओगी कि किस पेड़ पर कौन सा फल लगेगा, लोग कह देंगे कि मेरे पेड़ पर आम लगेगा, लेकिन तुम पूरी जानकारी रखना, इसके बाद ही विश्वास करना। मेरे घर के बाहर शहतूत का पेड़ है लेकिन उसमें बोगनवेलिया की बेल चढ़ जाती है, दूर से पता ही नहीं चलता कि पेड़ शहतूत का है। यहाँ बहुत सी बेलें अमरबेल बनकर चढ़ी दिखायी देंगी, उनसे भी सावधान रहना। चुन-चुनकर अपने बगीचे में सुगन्धित फूल ही लगाना। हमारे देश में खऱपतवार भी बहुत उग आयी है, इस ऋतु में लगे हाथ उन्हें भी उखाड़ बाहर करना। मैं तो निश्चिंत हूँ, मुझे पता है कि अभी देश का बागवां सशक्त है। उनका पेड़ बरगद का पेड़ बन चुका है, जहाँ बारहों मास हरियाली रहती है, फल लगते हैं और सारे ही पक्षी शरण पाते हैं। इसलिये मेरे घर के दरवाजे खुले हैं, मैं चैन की बंसी बजा रही हूँ, मुझे पता है कि कितना ही गुबार उठे लेकिन मेरा बागवां सब कुछ सम्भाल लेगा। मैं तो अभी से चिड़ियाओं की चहचहाट सुन रही हूँ, फूलों की अंगड़ाई देख रही हूँ और वातावरण में सर्वत्र फैल रही सुगन्ध को अपने अन्दर समेट रही हूँ। सखी! तुम भी निश्चिंत रहो, बस अपना कर्तव्य पूर्ण करते रहो। ये आंधियां तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगी।

Friday, March 8, 2019

महिला होना चाहती हूँ


हमारे पिता बड़े गर्व से कहते थे कि मेरी बेटियाँ नहीं हैं, बेटे ही हैं। हमारा लालन-पालन बेटों की ही तरह हुआ, ना हाथ में मेहँदी लगाने की छूट, ना घर के आंगन में रंगोली बनाने की छूट, ना सिलाई और ना ही कढ़ाई, बस केवल पढ़ाई। हम सारा दिन लड़कों की तरह खेलते-कूदते, क्रिकेट से लेकर कंचे तक खेलते और पढ़ाई करते। रसोई में घुसने का आग्रह भी नहीं था, बस खाना बनाना आना चाहिये, इतना भर ही था। मुझ से कहते कि तर्क में प्रवीण बनो, हम बन गये लेकिन हमारे अन्दर जो महिला बैठी थी उसका दम निकल गया। पिताजी ने नाम भी रख दिया था "अजित" लेकिन साथ में एक पुछल्ला भी जोड़ दिया था – दुलारी। मेरे बड़े भाई मुझे रोज उकसाते कि केवल अजित ही ठीक लगता है और एक दिन स्कूल बदलते समय मैंने पुछल्ला अपने नाम से हटा ही दिया। अपने अन्दर की महिला को दूर कर, मेरे कार्य पुरुषों से होने लगे। अपने निर्णय खुद लेना, स्वतंत्र होकर रहना अच्छा लगने लगा। लेकिन जिस महिला को पिताजी ने दूर किया था और हमने जिसे अंगीकार किया था, वही महिला रोज हमारे सामने आकर खड़ी हो जाती। जीवन संघर्षमय हो गया। हम पुरुषों के बीच धड़ल्ले से घुस जाते लेकिन थोड़ी देर में ही आभास होने लगता कि हम कुछ और हैं! लेकिन हम हार नहीं मानते। विवाह हुआ और गम्भीर समस्या में फंस गये, पत्नी रूप में महिला ने चुनौती दे डाली कि अब दूर करो मुझको। सबकुछ कर डाला, सारी जिम्मेदारी निभा डाली लेकिन महिला बनकर, सर झुकाकर नहीं रहना, सारी अच्छाइयों पर पानी फेर देता। महिला को क्या करना होता है, समझ ही नहीं आता रहा। कैसे साधारण पुरुष को महान माना जाता है, यह समझ ही नहीं आया। जिन्दगी का बहुत बड़ा पड़ाव पार कर लिया, सामाजिक क्षेत्र हो या साहित्य क्षेत्र, सभी में पिताजी के अनुरूप खुद को सिद्ध भी कर डाला लेकिन एक दिन एक जज ने फरमान सुना डाला, महिला को महिला की तरह, पुरुष की अनुगामिनी बनकर ही रहना होगा। तब समझ आया कि हमने क्या खो दिया था। जिस मरीचिका के पीछे पिताजी ने भगा दिया था और अपना स्वरूप भी भूल बैठे थे वह तो केवल मरीचिका ही है। तब खोजना शुरू हुआ खुद को, महिला के सुख को।
मैंने महिला पर नजर डालनी शुरू की, उसे उन्मुक्त होकर हँसते देखा, उसे निडर होकर सजते देखा, उसे बिना छिपे रोते देखा, फिर खुद पर नजर डाली। मैं ना हँस पा रही थी ना सज पा रही थी और ना ही रो पा रही थी। मैंने अपने अन्दर की महिला को आवाज दी, उसे बाहर निकालने का प्रयास किया, वह डरी हुई थी, सहमी हुई थी, झिझकी हुई थी। मैंने कहा कि डर मत, सहम मत, झिझक मत, खुलकर हँस, खुलकर सज और खुलकर रो। लेकिन महिला हारती रही, मैं प्रतिपल प्रयास करती हूँ, महिला को पाने का इंतजाम करती हूँ लेकिन फिर हार जाती हूँ। क्यों हार जाती हूँ? क्योंकि दोहरी जिन्दगी हमें हरा देती है, हम महिला होने का सुख और उसकी सुख पाने की जद्दोजेहद से खुद को जोड़ ही नहीं पाते। लेकिन आज महिला दिवस पर सच में मैं महिला होना चाहती हूँ। अपने को कमजोर बताकर रोना चाहती हूँ, अपने वैभव के लालच को बताकर साड़ी-जेवर में सिमटना चाहती हूँ, मैं कुछ नहीं हूँ कहकर केवल जीना चाहती हूँ। सच में, मैं महिला होने का सुख पाना चाहती हूँ। अपने पिताजी की इच्छा से परे केवल महिला होना चाहती हूँ। अपने चारों ओर फैल गये पुरुषों के साम्राज्य को धकेलना चाहती हूँ, महिलाओं के रनिवास में पैर रखना चाहती हूँ। मैं नासमझ बनना चाहती हूँ, जिससे कोई भी पुरुष आहत ना हो पाए। मुझे नहीं चाहिये निर्णय का अधिकार, बस जीने और रोने के अधिकार से ही खुश रहना चाहती हूँ। मैं बस महिला बनना चाहती हूँ।

Thursday, March 7, 2019

घर वापसी


कहावत है कि गंगा में बहुत पानी बह गया। हमारा मन भी कितने भटकाव के बाद लेखन के पानी का आचमन करने के लिये प्रकट हो ही गया। न जाने कितना कुछ गुजर गया! कुम्भ का महामिलन हो गया और सरहद पर महागदर हो गया। राजनैतिक उठापटक भी खूब हुआ और सामाजिक चिंतन भी नया रूप लेने लगा। कई लोग सोचते होंगे कि आखिर हम कहाँ गायब थे, क्या नीरो की तरह हम भी कहीं बांसुरी बजा रहे थे? या इस दुनिया की भीड़ में हमारा नाम कहीं खो गया था! लेकिन ना हम बांसुरी बजा रहे थे और ना ही अपने नाम को खोने दे रहे थे, बस मन को साध रहे थे। मन बड़ा विचित्र है, खुशी मिले तो वहीं रम जाता है और दुख मिले तो वहीं गोते खाने लगता है, जब समाज का ऐसा कोई रूप जो मन को झिंझोड़ कर रख देता है तो मन कुछ टूटता ही है और कभी ऐसा भी होता है कि मन अंधेरे में डूब जाना चाहता है। देश से लेकर अपने मन तक की उथल-पुथल को महसूस करती रही हूँ मैं। सब कुछ विभ्रम पैदा करने वाला है, सत्य को सात तालों के बीच छिपाने का जतन हो रहा है। जो सत्य है उसे भ्रम बताया जा रहा है और जो मृग-मरीचिका है उसके पीछे भागने को मजबूर किया जा रहा है। लोग धर्म के नाम पर अपने शरीर में बम बांधकर खुशा-खुशी मर रहे हैं कि उन्हें ऐसे किसी लोक में सारे काल्पनिक सुख मिलेंगे जो कभी किसी ने नहीं देखे! चारों तरफ मार-काट मची है, जितना मारोंगे उतना ही कल्पना-लोक के सपने दिखाये जा रहे हैं और लोग वास्तविकता से आँख मूंदकर मरने को तैयार बैठे हैं।
नासमझी हर मोर्चें पर झण्डे गाड़े बैठी है, मेरी सत्ता – मेरी सत्ता करते हुए लोग घर-परिवार से लेकर देश-दुनिया तक तबाह करने पर तुले हैं। पहले लोग आराधना करते थे, श्रेष्ठ आचरण करते थे कि श्रेष्ठ पुत्र हो और वह परिवार और राज्य पर श्रेष्ठ शासन करे लेकिन अब श्रेष्ठ को हटाने की मुहिम छिड़ी है। सुख के लिये पुरूषार्थ के स्थान पर दुख को न्यौता जा रहा है। सूर्य निकलता है और पृथ्वी के सारे रोग हर लेता है, रोग हरता है साथ ही शक्ति प्रदान करता है लेकिन अब लोग सूर्य की चाहत नहीं रखते, वे अंधेरे की कामना कर रहे हैं। खुद को शक्तिशाली बनाने के स्थान पर दूसरे की शक्ति के पक्षधर बन रहे हैं। हमने मान लिया है कि हम कमजोर हैं और हम किसी के अधीन रहने से ही सुखी हो सकते हैं। जैसे स्त्री खुद को कमजोर मान बैठी है और पुरुष के अधीन रहने में ही सुरक्षित महसूस करती है ऐसे ही कुछ लोग देश और समाज को पराधीन करने में ही सुख मान रहे हैं। आततायियों को खुला निमंत्रण दिया जा रहा है, उनका समर्थन हो रहा है, अपने रक्षकों के विरोध में लामबन्द होने का प्रयास किया जा रहा है। यही तो है सुख के स्थान पर दुख के लिये पुरुषार्थ करना।
अपने मन को टटोलने का प्रयास कर रही हूँ, कुछ सार्थक लिखना हो जाए, बस यही प्रयास है। बहुत दिनों बाद की-बोर्ड पर खट-खट की है, रफ्तार आगे ही बन पाएगी। शुरूआत के लिये इतना ही। लग रहा है जैसे घर वापसी हो रही है, अपने लोगों से मिल रही हूँ, अपने मन को परत दर परत खोल रही हूँ। जहाँ अपना मन खुल सके, वही तो अपने लोग और अपना घर होता है। मैं ही खुद का अपने घर में स्वागत कर लेती हूँ, पता नहीं कितने लोग भूल गये होंगे और कितने याद कर रहे होंगे। लेकिन अब क्रम जारी रहने का प्रयास रहेगा।