Sunday, November 9, 2014

63वें जन्‍मदिन पर - अपने मन की बात

63 बार मैं कार्तिक/नवम्‍बर के मास से गुजर चुकी हूँ। कितना कुछ बदल गया है, ना अब वह पथ है और ना ही वह पथिक है। जिन तंग गलियों में पहली बार आँखें खोली, वे कब की बिसरा दी गयी। जिसे खुले मैदान में बचपन दौड़ा, अब वह भी दूर हो चला है।http://sahityakar.com/wordpress/ 

6 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत-बहुत बधायी हो।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (10-11-2014) को "नौ नवंबर और वर्षगाँठ" (चर्चा मंच-1793) पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Kavita Rawat said...

जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें!

अजित गुप्ता का कोना said...

शास्‍त्रीजी और कविताजी आपका आभार।

संजय भास्‍कर said...

जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें!

दिगंबर नासवा said...

जनम दिन की हार्दिक बधाई ...
पता नहीं आपका ब्लॉग मेरे कम्पूटर पर खुलता ही नहीं है ... वंचित रह जाता हूँ आपके आलेक से ...

Unknown said...

बहुत-बहुत बधायी हो।
मैं एक Social worker हूं और समाज को स्वास्थ्य संबंधी जानकारियां देता हुं। मैं Jkhealthworld संस्था से जुड़ा हुआ हूं। मेरा आप सभी से अनुरोध है कि आप भी इस संस्था से जुड़े और जनकल्याण के लिए स्वास्थ्य संबंधी जानकारियां लोगों तक पहुचाएं। धन्यवाद।
HEALTHWORLD