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Sunday, December 5, 2010

एक और लघुकथा - घर - अजित गुप्‍ता

आज किसी भी घर में दस्‍तक दीजिए, एक साफ-सुथरा सा बैठक खाना एकान्‍त में उदास सा बैठा हुआ मिलेगा। उसके सोफे को पता नहीं कि उस पर कितने दिन पहले कोई बैठा था और ना ही कालीन को पता होगा कि आखिरी पैर किसके यहाँ पड़े थे। बस नौकर ही रोज झाड़-पोछकर कमरे को बुहार देता है और दो जोड़ी बूढ़ी आँखे अपने साफ-सुथरे से करीने से सजे ड्राइंग रूम को देखकर कभी खुश हो लेते हैं और कभी दुखी। 
बरामदे में एक झूला लगा है, कभी-कभी कोई चिड़िया आकर चीं-चीं कर जाती है तब घर की मालकिन बड़े ही अरमानों से घर का दरवाजा खोलकर देख लेती है कि शायद कोई आया हो। बस यही है आज अधिकांश घरों की दास्‍तान। 
एक वृद्ध आदमी से एक दिन किसी ने पूछ लिया कि क्‍यों मियां घर में सब खैरियत से तो हैं। बस इतना पूछना था कि मियांजी भड़क गए। बोले कि क्‍या मतलब है तुम्‍हारा खैरियत से? पोते-पोती वाला आदमी हूँ, भरा-पूरा कुनबा है तो कभी कोई बीमार तो कभी कोई। क्‍या अकेला हूँ जो खैरियत पूछ रहे हो? परिवार वाला हूँ तो खैरियत कैसी?
परिवार में रहते हुए बच्‍चों की धमाचौकड़ी से कितना तो गुस्‍सा आता है लेकिन जब ये नहीं होते तब क्‍या घर, घर रह जाता है। एक लघुकथा पढिये और अपनी टिप्‍पणी दीजिए। 

घर
कमला ने आज अपनी सहेलियों को चाय पर आमंत्रित किया है। दिन में उसकी सभी अभिन्न सहेलियां समय पर ही घर आयी थीं लेकिन कमला का बैठक-खाना तितर-बितर देखकर उन्हें अजीब सा लगा।
अरे कमला ने अपना घर कैसा फैला रखा हैं? दोनों ही अकेले रहते हैं फिर भी इतना फैलावड़ा? सुमित्रा ने ताना कसा।
हो सकता है कि आज नौकरानी नहीं आयी हो, कुमुद बोली।
अरे क्या हुआ तो? जब हमें बुलाया है तो सफाई भी करनी ही चाहिए थी।
इतने में ही कमला इठलाती हुई, खुश-खुश बैठक-खाने में प्रवेश करती है। सभी उसे प्रश्नभरी निगाहों से देखती हैं।
देखो न बच्चों ने कैसा घर फैला दिया है, आज बहुत दिनों बाद इस घर में बच्चों ने उधम मचाया है। कितना अच्छा लग रहा है न यह घर। नहीं तो यह एक मकान ही बना हुआ था, एक होटल जैसा, सब कुछ सजा हुआ। कमला चहकती हुई बोले जा रही थी।
लघुकथा संग्रह - प्रेम का पाठ - अजित गुप्‍ता 

Thursday, December 2, 2010

लघुकथा - पूजनीय- अजित गुप्‍ता

पूजनीय
प्रसिद्ध साहित्यकार रामबल्लभजी का आज उद्बोधन है। मंच पर एक राजनेता, एक पूँजीपति भी बैठे हैं। रामवल्लभजी अपने उद्बोधन से पूर्व मंच को सम्बोधित करते हुए बोल रहे हैं कि पुज्यनीय नेता जी, पूज्यनीय सेठजी.......। लोग आश्चर्य में पड़ गए। रामवल्लभजी एक राजनेता और काली कमाई से बने सेठ को पुज्यनीय सम्बोधित कर रहे हैं! कार्यक्रम समाप्त हुआ, उनके शिष्य ने प्रश्न किया कि आप का सम्बोधन कितना उचित था? क्या आप भी राजनेता और पूँजीपतियों को पूजनीय मानते हैं?
हाँ। क्योंकि भारत में हम साँपों की भी पूजा करते हैं।

Monday, March 29, 2010

लधुकथा - नकली मुठभेड़

डी.आई.जी. सुधांशु अपने कक्ष में आज अकेले बैठे हैं। तभी डी.वाय.एस.पी. शर्मा ने उनके कमरे में प्रवेश किया। शर्माजी आज बहुत खुश थे। उनकी प्रसन्नता छिपाए नहीं छिप रही थी। वे उत्साह में भरकर डी.आई.जी को बता रहे थे कि सर! आज हमें बहुत बड़ी सफलता हाथ लगी है। हमारी टीम ने दो आतंककारियों को पकड़ने में सफलता हासिल की है। इतना ही नहीं हमने उन्हें सारे सबूतों के साथ पकड़ा है।

सुधांशु एकदम से अपनी कुर्सी से खड़े हो गए। वे इतनी जोर से चिल्लाए जैसे एकदम ही फट पड़ेंगे। तुमने कैसे सिद्ध कर दिया कि वे आतंककारी हैं? किसी आतंककारी के चेहरे पर लिखा होता है क्या कि वो आतंककारी है?

लेकिन वो सर कुख्यात है और उसकी हमें कई दिनों से तलाश थी। शर्मा ने विनम्रता से अपनी बात कही।

मैं कहता हूँ कि उन्हें अभी तत्काल छोड़ दो, यह मैं तय करूंगा कि कौन आतंककारी है और कौन नहीं।

शर्मा ने फिर अपनी बात कहनी चाही लेकिन उनकी लाल सुर्ख आँखों के सामने वे कुछ नहीं बोल पाए और कक्ष से बाहर आ गए। श्रीवास्तव ने उन्हें धीरज बंधाया और कहा कि सर छोड़ दीजिए आप भी उन आतंककारियों को। क्या पता उनके पास किसी बड़े नेता को फोन आ गया हो या फिर पेटी पहुंचा दी गयी हो। सभी का यहाँ दोगला चारित्र है। दिखते कुछ है और अन्दर से कुछ और होते हैं। हम तो हमेशा सर की ही कसमें खाते थे और आज इनका भी असली चेहरा देख लिया।

अभी कुछ ही समय व्यतीत हुआ था कि पड़ौसी प्रान्त के दो अधिकारी शर्मा और श्रीवास्तव के कक्ष में उपस्थित हुए। उन्होंने पूछा कि क्या मि. सुधांशु अपने कक्ष में हैं।

शर्मा ने कहा कि वे अपने कक्ष में ही हैं लेकिन आप लोग कैसे आए हैं?

हम उन्हें गिरफ्तार करने आए हैं।

शर्मा और श्रीवास्तव दोनों ही अवाक उन अधिकारियों का मुँह तकने लग गए। वे समझ नहीं पा रहे थे कि ऐसा क्या हुआ है? फिर उन्होंने अपने आपको सम्भालते हुए प्रश्न किया कि किस कसूर में आप उन्हें गिरफ्तार करने आए हैं?

उन पुलिस अधिकारियों ने बताया कि अभी एक महिने पहले ही हमारे प्रांत की पुलिस के साथ मिलकर आपके इन डीआईजी ने दो कुख्यात आतंककारियों को एक मुठभेड़ में मार गिराया था।

तो?

उस मुठभेड़ को आतंककारियों के वकील ने नकली मुठभेड़ सिद्ध कर दिया है। अब हम क्या सुधांशु को भगवान भी नहीं बचा सकते।

Wednesday, March 24, 2010

अपराधी को सजा हुई और सारा परिवार ही भूख की चपेट में आ गया

कानून और इंसाफ की हम सभी प्रतिदिन दुहाई देते हैं। लेकिन जिसे न्‍याय करना है उसके सामने कई बाद चुनौतियां खड़ी हो जाती हैं। एक तरफ कानून कहता है कि अपराधी को सजा दो, तो दूसरी तरफ उसकी सजा सारे परिवार की सजा बन जाती है। कई बार हम समाचार पत्रों में पढ़ते हैं कि महिला ने अपराध किया, उसे जेल की सजा हुई और उसके साथ उसके गोद का बच्‍चा भी जेल गया। चोरी या अन्‍य अपराध में एक व्‍यक्ति को सजा हुई और सारा ही परिवार भूख की चपेट में आ गया। तब हमारे समाज के कानून पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगता है। क्‍या केवल कानून से ही समाज को सही मार्ग दिखाया जा सकता है? या कोई ऐसा भी मार्ग है जिससे अपराधी व्‍यक्ति का अपराध भी समाप्‍त हो और समाज और परिवार की समस्‍या भी सुलझ जाए। कई बार ऐसी ही समस्‍याएं पुलिस वालों के सामने और न्‍यायालय में आती हैं, उनके साथ मानवीय व्‍यवहार करने पर वे बदनाम भी होते हैं और समाचार पत्र उनके चरित्र को बदनाम करने का अवसर नहीं छोड़ते। ऐसे में क्‍या अन्‍य मार्ग भी है कानून के पास? इसी समस्‍या से जन्‍मी है मेरी यह लघुकथा। आप इसे पढ़िए और अपना परामर्श दीजिए।

लघुकथा - चोर

मजिस्ट्रेट कीर्तिवर्धन जी सर झुकाए अपने ड्रांइग-रूम में बैठे हैं। सामने समाचार-पत्रों की सुर्खियाँ उन्हें सर नहीं उठाने दे रही हैं - ‘मजिस्ट्रेट कीर्तिवर्धन ने रिश्वत लेकर एक चोर को छोड़ दिया’, ‘मजिस्ट्रेट कीर्तिवर्धन का कैसा इंसाफ’?, ‘चोर उनका रिश्तेदार तो नहीं’ ऐसे ही अनेक शीर्षकों से समाचार-पत्र रंगे पड़े हैं। उनकी पत्नी चाय का प्याला लेकर आयीं और बोली कि आपने यह क्या किया? बरसों की तपस्या को आखिर आपने क्यों भंग कर दिया? आप और रिश्वत यह बात तो गले ही नहीं उतरती! ये समाचार-पत्र वाले अपकी इज्जत मिट्टी में मिला देंगे। आपकी नौकरी भी खतरे में पड़ सकती है। आखिर आपने उस चोर को क्यों छोड़ दिया?

क्या करता? उसके दो छोटे-छोटे बच्चे थे और कमाई का कोई साधन नहीं था। यदि मैं उसे सजा दे देता और उसे जेल भेज देता तो या तो वे बच्चे भी चोर बन जाते या फिर भिखारी। आज से वह हमारे यहाँ काम पर आएगा।

Thursday, March 18, 2010

हमारे लेखन का भविष्‍य?

हम रोज ही कितना कुछ लिखते हैं। अपने लिखे को लेकर झगड़ा भी करते हैं। कभी कोई हमारे साहित्‍य की चोरी कर लेता है तो हम उसे धमकाते भी हैं। कभी कोई कागज उड़कर इधर-उधर हो जाता है तो कितना नाराज होते हैं अपने घर वालों पर? एक-एक शब्‍द को सहेज कर रखते हैं। अपनी किताबों को बैठक में सजाते भी हैं। प्रकाशित आलेखों को काट-काटकर फाइल बना देते हैं, उन पत्रिकाओं को भी सहेज कर रखते हैं। कम्‍प्‍यूटर में भी वेबसाइट पर ज्‍यादा से ज्‍यादा अपने लेखन को डालने का प्रयास रहता है। कोई घर का सदस्‍य हमारा लिखे को नहीं पढ़े तो मन कुंद हो जाता है। हमारा परिचय लेखक के रूप में ना हो तो उदासी छा जाती है। लेकिन ... इसी लेकिन पर अटकी है मेरी लघुकथा। आपकी अनुशंसा चाहिए।

लघुकथा - लेखक

पूर्णाशंकर जी श्रेष्ठ साहित्यकार थे, कई पुस्तकें प्रकाशित हुई थीं और कई पाण्डुलिपियां अभी जिल्द को तलाश रही थी। घर में सर्वत्र पुस्तकों एवं कागजों का साम्राज्य स्थापित था। अधिकारी पुत्र को इन सबसे लगाव नहीं था। प्रतिदिन की खट-पट से ऊकता कर एक दिन पूर्णाशंकर जी ने सारी पुस्तकें और पाण्डुलिपियां बेच दी। कमरा खाली हो चुका था, अब वह कक्ष एक अधिकारी-पुत्र का बैठक-खाना था। पूर्णाशंकर जी कुछ दिनों बाद ही स्वर्ग सिधार गए।

शोक-सभा चल रही थी, एक गाड़ी आकर रुकी, उसमें से एक प्रकाशक उतरा। प्रकाशक ने सर्वप्रथम पूर्णाशंकर जी को श्रद्धांजलि दी, फिर उनके बेटे की ओर उन्मुख हुआ। प्रकाशक ने कहा कि एक दिन पूर्णाशंकर जी अपनी समस्त दौलत मेरे पास छोड़ गए थे, उनकी इच्छा थी कि मैं अपनी जमा-पूँजी को नाम दूं।

अधिकारी पुत्र असमंजस में था, दिल धड़क रहा था, कि पिताजी के पास कौन सी जमा-पूंजी थी?

तभी प्रकाशक ने कहा कि पूर्णशंकर जी ने मुझसे आग्रह किया था कि मैं उनकी शेष पाण्डुलिपियों को प्रकाशित करूं। मेरे लिए यह सौभाग्य की बात थी। लेकिन उन्होंने एक शर्त रख दी थी, जिसे पूरा करना कठिन था। आज उनकी मृत्यु के बाद मैं उनकी अंतिम इच्छा पूर्ण करना चाहता हूँ क्योंकि वे बहुत ही श्रेष्ठ साहित्यकार थे।

सारे ही लोग और अधिकारी पुत्र उनके चेहरे की ओर देख रहे थे। एक अनजाना डर पुत्र के चेहरे पर देखा जा सकता था। पता नहीं अंतिम इच्छा क्या हो? कहीं मुझे समाज के समक्ष स्वीकार करने पर मजबूर तो नहीं होना पड़ेगा?

प्रकाशक ने कहा कि वे चाहते थे कि मेरी पुस्तकों पर लेखक के जगह मेरे पुत्र का नाम लिखा जाए। जिससे मेरे कक्ष में पुनः मेरी पुस्तके सज सकें। अतः मैं आपसे आज्ञा प्राप्त करने आया हूँ।

Monday, March 15, 2010

कभी कुटिल व्‍यक्ति भी आपको सफलता दिला देते हैं

कभी आप किसी महत्‍वपूर्ण पद पर कार्यरत हैं और आप अपने कार्य द्वारा मंजिल प्राप्‍त करना चाहते हैं। लेकिन देखते हैं कि कोई एक व्‍यक्ति आपके पीछे पड़ जाता है। सारी कुटिलता लिए वह आपके हर अच्‍छे फैसलों को भी बेकार सिद्ध करने पर उतारू हो जाता है। अधिकतर ऐसा राजनैतिक पदों में होता है। जब राजनैतिक दृष्‍टि से ही हर कार्य को देखा जाता है। उस समय आपका सारा ध्‍यान उस कुटिल व्‍यक्ति पर केन्द्रित हो जाता है। कितनी ही अन्‍य बाधाएं, कितने ही प्रलोभन आपके मार्ग में खड़े होते हैं लेकिन आपका उनपर ध्‍यान नहीं जाता। आपका सारा ध्‍यान उस कुटिल व्‍यक्ति से स्‍वयं को मुक्‍त करने में लग जाता है। अंत में आप देखते हैं कि जो काम बहुत ही दुरुह था, अनेक बाधाओं से भरा था, वो काम आप पूर्ण कर लेते हैं। क्‍योंकि आपका लक्ष्‍य उस कुटिल व्‍यक्ति ने निर्धारित कर दिया था। आप पूर्ण उर्जा के साथ उसके द्वारा उत्‍पन्‍न की गयी बाधाओं को दूर करने में जुट जाते हैं और तब अन्‍य बाधाओं को आप देखते भी नहीं। क्‍या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है? हम साहित्‍य से जुड़े लोग कुछ न कुछ समाज से प्रेरणा प्राप्‍त करके लिखते हैं। ऐसी ही प्रेरणा से एक लघुकथा का जन्‍म हुआ, आपके लिए यहाँ प्रस्‍तुत कर रही हूँ। आप बताएं लघुकथा उपयोगी है या निरर्थक? क्‍योंकि मैं शीघ्र ही एक लघुकथा-संग्रह प्रकाशित कराना चाहती हूँ तो कुछ लघुकथाओं के बारे में आप सब का विचार जानने के बाद ही इसे प्रकाशक के हाथों में दूंगी।



लघुकथा-गन्दी मक्खी

मुझे शाम तक पहाड़ी पर बने मन्दिर तक पहुँचना था। अभी कदम बढ़े ही थे कि एक गंदगी में बैठने वाली बड़ी मक्खी, सिर के पास आकर भिन-भिनाने लगी। मेरा सारा प्रयास उसे अपने शरीर से दूर रखना था। क्योंकि वो अपने साथ नाना प्रकार के किटाणु लेकर आयी थी। कभी चाल धीमी हो जाती और कभी तेज। आखिरकार मैं अपने गंतव्य तक समय रहते पहुँच ही गयी।

मन्दिर में एक मित्र ने पूछा कि रास्ते का आनन्द कितना आया?

मुझे तो एक मक्खी के कारण रास्ता दिखा ही नहीं, बस केवल मंजिल मेरे सामने थी और मैं यहाँ तक पहुँच ही गयी।

अर्थात् आपने रास्ते में कुछ नहीं देखा?

नहीं।

अच्छा हुआ, क्योंकि रास्ते में जगह-जगह कीचड़ भरे गड्डे भी थे। इस गन्दी मक्खी के कारण आप का ध्यान उस ओर गया ही नहीं और आप उसकी बदबू से बच गयीं।

Tuesday, January 12, 2010

तीन लघुकथाएं

 रोटी और कुत्ते

झबरा कुत्ता आराम से सो रहा था। तभी कालू कुत्ता उसके पास आया और बोला कि अरे झबरे तू बड़े आराम से सो रहा है, अभी मालिक देखेंगे तो तुझे रोटी भी नहीं देंगे और दो लात भी लगाएँगे।
मैं अब उनकी रोटी पर नहीं पलता। मुझे उनकी चिन्ता भी नहीं। मुझे लात मारकर तो देखें, मैं उनकी टंगड़ी को ही चबा डालूँगा।
अरे भाई ऐसा क्या हो गया? मालिक तो बड़े भले हैं!
अरे कुछ नहीं, शहर के बहुत लोग रोज यहाँ घूमने आते हैं और हमें मुफ्त में ही रोटियां डालते हैं तो फिर हम काम क्यों करें?

 दुश्मन
यार सुधांशु! तुम इतने कठोर क्यों हो? अपने किसी भी कर्मचारी की पदोन्नति नहीं करते। पदोन्नति तो उनका अधिकार है। तुम्हारे कार्यालय में बेचारे तीन र्कचारी दस वर्ष से अपनी सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन वे अभी भी अस्थायी ही हैं। ये सारे ही निम्न वर्ग के लोग हैं। इनका भला करो, तुम्हें दुआएं देंगे।
हाँ राजेन्द्र तुम सत्य कहते हों। मैं अभी इस विभाग में दो वर्ष पूर्व ही आया हूँ और शायद एक वर्ष बाद मेरा स्थानान्तरण दूसरे विभाग में हो जाएगा। मैं पदोन्नति और स्थायीकरण करके किसी को भी अपना दुश्मन नहीं बनाना चाहता।


 अशिक्षित माँ
एक आत्मा एक दिन भगवान के सामने हाथ जोड़े खड़ी थी। भगवान मुझे माँ चाहिए। माँ के माध्यम से ही मैं शरीर धारण कर सकूंगा, धरती का उपभोग कर सकूंगा।
तथास्तु। भगवान ने कहा। लेकिन साथ ही एक प्रश्न भी कर दिया।
तुमको कैसी माँ चाहिए?
मेरे पास एक माँ है जो शिक्षित है और दूसरी है अशिक्षित।
शिक्षित तुम्हें ममता देगी, संस्कार देंगी, अच्छे, बुरे की समझ देगी।
अशिक्षित केवल ममता देगी। तुम जो भी मांगोंगे बस वो देगी।
अच्छा और बुरा सबकुछ उसकी ममता के सामने टिक नहीं पाएगा।
बोलो तुम्हें शिक्षित माँ चाहिए या अशिक्षित?
कलियुग की आत्मा बोली कि अशिक्षित।