बरसात का मौसम है, चहुतरफा हरियाली ने मन मोह रखा है। बारिश टूटकर तो नहीं बरसी लेकिन कभी फुहारें तो कभी कुछ मध्यम दर्जे की बारिश ने सरोबार अवश्य किया है। नमी वातावरण में घुली है। कभी दीवारों में दिखायी दे जाती है तो कभी दरवाजों से अनुभूत होती है। दरवाजे आम जन की तरह अकड़ने लगे हैं और सरकार जैसी अर्गलाओं के सारे प्रयासों को धता बताते हुए चौखट के अन्दर जाने से मना कर बैठे हैं। हम भी पुलिसिया लातों के साथ उसे धकियाते रहते हैं और कभी हमारी जीत हो जाती है और कभी जनतानुमा दरवाजे की। दिन की रौशनी में तो चिन्ता नहीं रहती इन दरवाजों की अकड़ की, लेकिन रात को लगता है कि इनकी अकड़ को ठीली छोड़ दिया गया तो ये अन्य लोगों को भी आमन्त्रित कर देंगे। इसलिए रात को चाक-चौबन्द रहना पड़ता है और सारे ही सरकारी हथकण्डों की तरह हम भी इन्हें चौखट में सीमित कर ही देते हैं। लेकिन फिर प्रश्न उगता है कि आखिर कब तक चौखट में बन्द रखे जाएंगे? कब तक लातों के सहारे इनकी अकड़ को काबू में रखा जाएगा? ये तो अपनी स्वतंत्रता चाहेंगे ही ना। अब देखो ना ये कहते हैं कि हमें स्वतंत्रता दो और अर्गलाएं कहती हैं कि तुम स्वतंत्रता नहीं स्वच्छन्दता मांग रहे हो।
हमारी वर्तमान सरकार की भी यही स्थिति है। आम जनता और सरकार के बीच यही कसमकस मची है। अन्ना हजारे रूपी बौछारे आ रही हैं और आम आदमी को लग रहा है कि आजादी के बाद पहली बार किसी ने आम आदमी के लिए प्रेम की बरसात की है। उसे बताया है कि तुम इस देश के मालिक हो। अभी तक तो हम यही समझे थे कि जनता तो बेचारी गुलाम ही रहती है, कभी परायों की और कभी अपनों से। हम भी मालिक हैं, यह सुनकर तो शरीर में झुरझुरी सी होने लगी। वैसे जब भी देश में चुनाव होते हैं, नेता लोग कहते हैं कि हमें सेवा का अवसर दीजिए। लेकिन यह नहीं सुना था कि आप मालिक हैं और हमें आपकी सेवा का अवसर दीजिए। वे तो इतना कहते थे कि देश की सेवा का अवसर दीजिए। अब देश का तो मूर्त स्वरूप दिखायी देता नहीं तो बेचारे किस की सेवा करते, स्वयं की सेवा को ही उन्होंने कर्तव्य समझ लिया। लेकिन अब तो समझ आ रहा है कि देश की मूर्त स्वरूप जनता रूपी हम है और हमारी सेवा के लिए ही ये नियुक्त हैं। घर के बाहर झांककर भी देखा कि देखें तो सही कि आखिर कौन नियुक्त है हमारी सेवा को? एक बार हमारे शहर में देश के सबसे बड़े सेवक पधारे। लगा कि आज तो जनता दरबार लगेगा। जनता के दरवाजे जाकर पूछा जाएगा कि आपको कोई तकलीफ तो नहीं है? लेकिन उस दिन तो सारा शहर ही मानो कर्फ्यूग्रस्त हो गया। लाट साहब नहीं वर्तमान में लाट साहिबा है कि सवारी निकलेगी इसलिए सभी रास्ते, चौराहे बन्द कर दिये गए। जनता को मुनादी करा दी गयी कि कोई सड़क पर नहीं निकले। दिन भर शहर में गस्त चलती रही, और बेचारी जनता को समझाया जाता रहा कि आज तुम्हारी मालकिन आयी है। अब आप ही बताइए कि अन्ना जी की बात पर विश्वास करें तो कैसे करें? दिन में कई बार चिकौटी काटकर देख लेते हैं कि सपना तो नहीं है? लेकिन अभी तक तो सच ही लग रहा है। अभी कुछ दिन पहले भी बहुत खुश हुए थे कि देश का खजाना जो बाहर जमा है, आने वाला है लेकिन रातों-रात सपनों को तोड़ दिया गया। देश में ऐसा गदर मचाया गया और ठोक-ठोक के बता दिया गया कि तुम जनता ही हो, मालिक नहीं अत: अपनी औकात में रहो। इसलिए अब देखों कि आम जनता कब ठुकती है बस इसी बात का इन्तजार है।
मैं तो मेरे नमी से सरोबार दरवाजे को देख रही हूँ, उसकी अकड़ को समझा भी रही हूँ कि अपनी औकात में आ जाओ नहीं तो अभी लातों के सहारे तुम्हें चौखट में बन्द किया जाता है नहीं मानोंगे तो आरी से छील दिए जाओगे। थोड़ी सी छिलाई हुई और सारी अकड़ समाप्त। मालिक बनने का भ्रम पालने का नतीजा जल्दी ही समझ आ जाएगा, मुझे तो समझ आ गया है। अभी जनता जनार्दन को भी आ ही जाएगा। फिर भी आशा तो लगी ही है शायद कुछ चमत्कार हो जाए? आप लोग क्या कहते हैं?