श्रीमती अजित गुप्ता प्रकाशित पुस्तकें - शब्द जो मकरंद बने, सांझ की झंकार (कविता संग्रह), अहम् से वयम् तक (निबन्ध संग्रह) सैलाबी तटबन्ध (उपन्यास), अरण्य में सूरज (उपन्यास) हम गुलेलची (व्यंग्य संग्रह), बौर तो आए (निबन्ध संग्रह), सोने का पिंजर---अमेरिका और मैं (संस्मरणात्मक यात्रा वृतान्त), प्रेम का पाठ (लघु कथा संग्रह) आदि।
Thursday, May 30, 2013
Old Age Home - वृद्धाश्रम
Saturday, May 18, 2013
आखिर माँ लौट आयी
सूरज ढल चुका था, सारे ही पक्षी अपने बसेरों में आ
चुके थे। बोगेनवेलिया से चीं-ची की आवाजें तेज होने लगी, मुझे लगा कि माँ लौट आयी
है। सारा दिन बच्चे अकेले रहे थे। ना दाना और ना पानी। अपनी सुरक्षा भी
बोगेनवेलिया के पत्तों के बीच छिपकर की थी। आज सुबह ही मेरे बगीचे में दो गौरैया
के बच्चे अपनी माँ के साथ आए थे।
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Wednesday, May 15, 2013
नानी का घर या सैर-सपाटा
हम सभी के बचपन की यादों में नानी का घर है। जैसे ही
गर्मियों की शुरुआत हुई, स्कूल-कॉलेज बन्द हुए और चल पड़े नानी के घर। एक महिना
या दो महिना, बस सारी ही नानियों के घर आबाद रहते थे। मामा के बच्चे, मौसी के बच्चे
सभी मिलकर एक-दो महिना जो धूमधड़ाका करते थे वह यादें किसी के भी जेहन से जाती
नहीं। भरी गर्मी में ना पंखे थे और ना ही कूलर, एसी क्या होता है तब तक नाम भी
नहीं पैदा हुआ था।
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Saturday, April 27, 2013
लेखन और पठन का अपना ही मिजाज होता है
लेखन का भी जैसे एक मिजाज होता है वैसे ही पढ़ने का भी
अपना ही मिजाज होता है। हमारी सुबह तय करती है कि आज क्या लिखा जाएगा या क्या
हमारा मन पढ़ने को करेगा। इंटरनेट खोलने पर अनेक लेख, कविता, कहानी आदि हमारे सामने
आकर बिखर जाते हैं लेकिन हमारा मन बस कभी कहीं पर अटकता है तो कभी कहीं पर।
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Saturday, April 20, 2013
समाज भेड़िये पैदा कर रहा है और समाज के ठेकेदार जनता से सुरक्षा-कर वसूल रहे हैं
एक घना और फलदार वृक्ष था, उसमें सैंकड़ों पक्षी अपना
बसेरा बनाए हुए थे। उसमें इतने फल लगते थे कि उन सभी पक्षियों का पेट भर जाता था।
पास में ही एक नदी बहती थी, वृक्ष की जड़े उसी नदी से पानी लेती थी और पेड़ को हरा-भरा
रखती थी। नदी जिस शहर से होकर गुजरती थी, वहाँ एक रसायन उत्पाद करने वाला कारखाना
था। उस कारखाने का रसायन युक्त पानी उसी नदी में आकर मिलता था। शहर की अन्य सारी
गन्दगी भी उसी नदी में समाती थी। पेड़ उसी नदी का पानी लेने को मजबूर था।
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Saturday, April 13, 2013
मधुमक्खी शहद बनाती हैं और मनुष्य जहर बनाता है
प्रकृति अपने यौवन पर है, बगीचों में जहाँ तक नजर
जाती है, फूल ही फूल दिखायी देते हैं। भारतीय त्योहार प्रकृति पर आधारित हैं इसी
कारण यह मौसम त्योहारों का भी रहता है। अभी होली गयी, फिर नया साल आ गया और अब
गणगौर। त्योहारों के कारण परिवारों में प्रेम भी फल-फूल रहा है। और जब मन में
केवल प्रेम ही हो, सब कुछ सकारात्मक हो तब लिखने की बेचैनी मन में नहीं होती है।
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Sunday, March 31, 2013
अब तो भईया बूढ़े हो गए, रंग नहीं बस गुलाल ही मल दो
होली आकर चले गयी। इसबार हम दुनिया जहान से दूर लेकिन
अपनों के बीच चले गए। ना फेसबुक और ना ही ब्लाग। वापस आकर देखा तो पोस्टों का
मेला लगा है, सभी अपने तरीके से होली मना रहे हैं। इस होली पर हमने काफी पहले ही
कार्यक्रम बना लिया था कि अपनी बहन के साथ या यू कहूं कि जीजाजी के साथ होली
मनाएंगे लेकिन ऐन वक्त पर जीजाजी तो धोखा दे गए और वे अमेरिका उड़ गए। पोस्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - http://sahityakar.com/wordpress/%E0%A4%85%E0%A4%AC-%E0%A4%A4%E0%A5%8B-%E0%A4%AD%E0%A4%88%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%AC%E0%A5%82%E0%A4%A2%E0%A4%BC%E0%A5%87-%E0%A4%B9%E0%A5%8B-%E0%A4%97%E0%A4%8F-%E0%A4%B1%E0%A4%82%E0%A4%97-%E0%A4%A8/
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