Sunday, November 13, 2016

मैं कब नये कपड़े पहनूंगा?

मैं कब नये कपड़े पहनूंगा?
70 साल से देश रो रहा है, फटेहाल सा दर-दर की ठोकरे खा रहा है। जब सारे ही देश इकठ्ठा होते हैं तब मैं अपनी फटेहाली छिपाते-छिपाते दूर जा खड़ा होता हूँ। कोई भी अन्य देश मेरे साथ भी खड़ा होना नहीं चाहता क्योंकि मेरे अन्दर गन्दगी की सड़ांध भरी है, टूटी-फूटी सड़कों से मेरा तन उघड़ा पड़ा है। मेरी संतानें भीख मांग रही हैं, मेरे युवा नशे के आदी हो रहे हैं। महिला शारीरिक शोषण की शिकार हो रही हैं। मैं न जाने कितने टुकड़ों में बँटा हूँ, मुझे भी नहीं पता कि मैं कहाँ खड़ा हूँ।
सरकारे आती हैं और जाती हैं लेकिन मुझ पर पैबंद लगाने के अलावा कुछ नहीं कर पाती हैं। मेरी जनता मुझे सजा-धजा देखना ही नहीं चाहती, जब भी मैं उससे पैसा मांगता हूँ वह नालायक बेटे की तरह आपना ही रोना रो देती है और मैं एक माता-पिता की तरह सूखी रोटी खाकर  ही गुजारा करने  पर मजबूर हो जाता  हूँ। मैं दुनिया के सामने लाईन में खड़ा रहता हूँ कि कोई मुझे दान में कुछ दे दे, आखिर कब तक मांग-मांग कर अपना पेट भरूंगा!

आज दिन आया  है जब मेरे अन्दर का जहर बाहर निकाला जा रहा है तब कुछ लोग रो रहे हैं कि नहीं जहर मत निकालो, हमे परेशानी हो रही है। हमें दर्द हो रहा है। मेरे अन्दर इतना जहर है कि उसे बाहर निकलने में कुछ दिन लगेंगे ही, तब तक मेरी जनता को सब्र तो करना ही होगा। मेरे अन्दर जब स्वस्थ रक्त बहेगा तो मेरी गंदगी दूर होगी, मेरी टूट-फूट सुधरेगी, इसे होने दो। जब मैं स्वस्थ हो जाऊंगा तब मुझे दुनिया के देशों के सामने लाईन में नहीं लगना होगा, दान के पैसे के लिये। मैं भी अन्य देशों के साथ हाथ मिलाकर खड़ा रह सकूंगा। आज दिन आया है, मेरी दीवाली मनाने का, मुझे भी मना लेने दो। यदि आज भी तुमने इन लुटेरों की ही बात सुनना जारी रखा तो मैं कब नये कपड़े पहनूंगा? अब मुझे सभ्य दिखने दो, मेरे लिये तुम सब सोचो और जब मैं सभ्य दिखूंगा तब तुम भी तो सभ्य दिखोंगे ना। इस जहर को निकल जाने दो, कुछ ही समय लगेगा, फिर तुम सदा स्वस्थ रहोगे।

Saturday, November 12, 2016

तुम मिट गयी सभ्यताओं में शामिल हो जाओंगे


भविष्य की गर्त में छिपा है अमेरिका का भविष्य। ट्रम्प को भारतीय नहीं जानते लेकिन भारतीय एक बात को सदियों से जानते आए हैं और वह है – अपमान। भारतीय अपमान के मायने जानते हैं, वे जानते हैं कि जब चाणक्य का अपमान होता है तो चन्द्र गुप्त पैदा होता है, गाँधी का अपमान  होता है तब भारत स्वतंत्र  होता है, मोदी का अपमान होता है तब भारत में पुनःजागरण होता है। अपमान के किस्से यहाँ भरे पड़े हैं और इस अपमान से निकला सम्मान के उदाहरणों से इतिहास भरा हुआ है।
5 वर्ष पूर्व ट्रम्प व्हाइट हाउस के एक कार्यक्रम में बैठे हैं, उनका ओबामा के सान्निध्य में ही जमकर मजाक उड़ाया जाता है और परिणाम 5 वर्ष बाद निकलकर आता है। जब हम किसी का अपमान कर रहे होते हैं तब  हम उसके मान को रौंद रहे होते हैं, उसके मान को अस्वीकार कर रहे होते हैं। रौंदने और अस्वीकार करने की प्रक्रिया में यह परिलक्षित कर देते हैं कि हमारे अन्दर उस व्यक्ति के मान से उपजा डर है। हम डरे हुए रहते हैं उस व्यक्ति की सम्भावनाओं से, कहीं ये सम्भावनाएं वास्तविकता का रूप ना ले ले। अंकुर फूटने से पहले ही रौंद दो। ट्रम्प में भी कहीं सम्भावनाएं छिपी होगी और जैसे ही वास्तविकता का रूप लेने लगी, अपमान शुरू हो गया। सार्वजनिक अपमान की पीड़ा बहुत होती है, व्यक्ति को हाशिये से खेंचकर बाहर ले आती है। परिणाम दुनिया के सामने हैं। अब अपमान और सम्मान का युद्ध चलेगा, जितना गहरा अपमान होगा उतना ही गहरा सम्मान होता जाएगा। यदि ट्रम्प बर्दास्त नहीं तो शान्त हो जाओ, प्रतिक्रिया से वह और मजबूत होता चला जाएगा। यदि उसमें सम्भावनाएं छिपी हैं तो उन्हें उजागर होने का अवसर दो, जनता का मौन सिद्ध करेगा कि सम्भावनाएं हैं या नहीं। जनता का शोर तो सम्भावनाओं को अक्सर प्रबल ही करता है, कमजोर व्यक्ति में  भी प्राण फूंक देता है। तुम्हारा शोर दुनिया को बता रहा है कि तुम परिवर्तन से चिंतित हो, तुम लीक से हटकर कार्य करने में डरे  हुए हो और सबसे बड़ी बात की तुम पुराने शासन में कहीं न कहीं अपनी सहूलियत तलाश रहे थे और अब तुम्हारी चाहते कहीं पीछे ना धकेल दी जाएं, इस बात से भी डरे  हुए हो।
तुम परिवर्तन से डर रहे हो, तुम आतंकियों की धमकी से डर  रहे हो, तुम्हें डर है कि कहीं आतंक का हमला तेज ना हो जाए।

लेकिन खरगोश के आँख बन्द करने से बिल्ली का डर कम नहीं होता। डरो मत, साथ खड़े हो जाओ, साथ रहने से ट्रम्प भी तुम्हारे जैसा भला होने की कोशिश करेगा। आतंक के लिये कहते हो कि बैर से बैर नहीं कटता और अपने व्यक्ति से बैर करते हो! कहीं तुम आतंक को बढ़ावा देने का प्रयास तो नहीं कर रहे? अमेरिका सीरिया बन जाये वह चलेगा लेकिन ट्रम्प नहीं चलेगा। कौन लोग हैं जिनके कहने से तुम ट्रम्प का विरोध कर रहे हो? अपने व्यक्ति पर विश्वास करना सीखो, नहीं तो तुम मिट गयी सभ्यताओं में शामिल हो जाओंगे।

Tuesday, November 8, 2016

मन में रेंगते कीड़े को अनुभूत कीजिए

कल एक फिल्म कलाकार का साक्षात्कार टीवी पर आ रहा था, वे कहते हैं कि मैं जब छोटा था तब मैंने अनेक महापुरुषों की जीवनी पढ़ी और पाया कि सभी लोग दिल्ली में रहकर बड़े बने। मुझे भी दिल्ली जाने की धुन सवार हो गयी और उसी धुन के तहत दिल्ली गया, थियेटर कलाकार बना और फिर मुम्बई जा पहुँचा और आज यहाँ आपके सामने हूँ।
मेरे पिता भी एक छोटे से गाँव के वासी थे और वे भी जिद करके दिल्ली गये। हमारे परिवार का जीवन और हमारे चाचा-ताऊ के परिवार के जीवन में रात-दिन का अंतर है। मेरे पति भी गाँव छोड़कर शहर आए और आज हमारे जीवन और जो गाँव में रह गये उनके जीवन में अंतर है।
जो भी व्यक्ति कुछ नया करना चाहता है वह अपनी परिस्थितियों से समझौता नहीं करता, वह सम्भावनाओं के द्वार तलाशता है। कई बार हम अपना क्षेत्र बदलते हैं तो कई बार कार्य। लेकिन जो ऐसा करने का साहस नहीं जुटा पाते वे सृजन के नवीन द्वार नहीं खोल पाते। मेरे पति ने अपना क्षेत्र बदला था और मैंने अपना कार्य बदल लिया। वे अपने कार्य से खुश हैं और मैं अपने सृजन से।
जीवन का आनन्द सृजन में हैं। यदि हम इच्छित सृजन कर पाते हैं तो जीवन में सफलता का अनुभव करते हैं और यदि जीवन में सृजन नहीं है तो हम इस संसार से रिक्त से चले जाते हैं। अपनी दुनिया का नवीन सृजन करने वाला व्यक्ति हमेशा संतुष्ट रहता है, जो ऐसा नहीं कर पाते वे निराशा का वातावरण बनाते हैं।

लेकिन केवल सम्भावनाओं के द्वार तलाशना ही पर्याप्त नहीं होता, उससे पहले स्वयं को तलाशने की जरूरत होती है। आपके अंदर का रेशम का कीड़ा आपको तलाशना है, वो अंदर नहीं है तो आप कहीं भी चले जाइए, आप उस कीड़े के वगैर सृजन कर ही नहीं सकते। सिल्क का कपड़ा तभी बुन पाएंगे जब आपके पास रेशम का कीड़ा होगा। यदि आपके पास वह कीड़ा है तो आपको वह बैचेन कर देगा और वह बैचेनी आपको इच्छित मंजिल तक ले जाने में सहायक बन जाएगी। यही बैचेनी एक दिन जुनून में बदल जाएगी और आप सृजन के साथ खड़े होंगे। यदि यह कीड़ा आपके अंदर नहीं है तो आप भागकर अमेरिका ही क्यों ना चले जाएं लेकिन आप संतुष्ट नहीं हो सकते। इसलिये मन में रेंगते कीड़े को अनुभूत कीजिए, फिर सम्भावनाओं के द्वार तलाश कीजिए। सृजन के साथ आप संतुष्ट से खड़े दिखायी देंगे।

Friday, November 4, 2016

आप टोकरा भर मित्र बना लेंगे

कल बेटे से फोन पर बात हो रही थी, वह अपनी नौकरी बदल रहा है तो उसे अपना काम सौंपकर जाना है। कल तक वह कह रहा था कि मेरे पास कोई काम ही नहीं है इसलिये नौकरी बदलना जरूरी हो गया है लेकिन आज कहने लगा कि अपना काम जब दूसरों को सौंप रहा हूँ तब मुझे अपने काम का पता चल रहा है और मुझे ही नहीं सभी को पता चल रहा है कि अरे यह काम कितना जरूरी था। अब इसे कौन और कैसे किया जाएगा इसका चिंतन लाजिमी था। बंदा तो छोड़कर जा रहा है तो ऐसा करो कि इसके काम की रिकोर्डिंग कर लो जिससे कठिनाई नहीं आये। जब हम काम छोड़ते हैं तब पता चलता है कि कितना मूल्यवान काम हम कर रहे थे।
हम से भी यदाकदा लोग पूछ बैठते हैं कि आप क्या काम करते हैं? अपना काम समझाना कई बार कठिन सा हो जाता है। फिर मन को लगने लगता है कि नहीं, हम कुछ नहीं कर रहे, निराशा सी मन में छाने लगती है। जीवन का भी ऐसा ही है, एक उम्र के बाद लगता है कि अब हमारा काम खत्म। हिन्दू दर्शन में कहते हैं कि जीवन का उद्देश्य होता है, हम अपना उद्देश्य पूरा करने के  बाद संसार से पलायन की सोचने लगते हैं। यह पलायन यदि कठिन हो तो संन्यासी  ही बन जाते  हैं लोग।
मैं जब भी कुछ देर के लिये घर से बाहर होती हूँ, घर में अफरा-तफरी का माहौल बन जाता है। छोटे-छोटे काम अपना वजूद बताने लगते हैं, लेकिन ना मुझे और ना  ही घर में किसी को उनकी अहमियत पता होती है! हम एक रफ्त में काम करते हैं और फिर उस काम की आदत सी हो जाती है, ना हमें पता लगता है कि हम काम कर रहे हैं और ना ही दूसरों को पता लगता  है कि हम काम कर रहे  हैं। जमाना हमें ताना मारता है कि भला तुम क्या करते हो और हम नजरे चुराये चुपचाप सुन लेते हैं। फिर किसी नये काम की तलाश शुरू करते हैं कि शायद लोगों को और खुद को लगे कि हम काम कर रहे हैं।
मैं एक बार सोचने लगी की मेरे बाद इनका जीवन कैसे चलेगा, सोचकर ही सायं-सायं होने लगी। तभी माँ याद आ गयी, वह कहती थी कि भगवान मुझे पहले मत उठाना, नहीं तो इनका जीवन किसके सहारे कटेगा? अक्सर पत्नियों को कहता सुना था कि हे भगवान! मुझे सुहागन ही उठाना लेकिन पहली बार माँ को उल्टी बात कहते सुना। उनकी तो भगवान ने सुन ली थी और वे साथ-साथ ही चले गये इसलिये उन्हें एकदूजे के काम की महत्ता ही पता नहीं चली। लेकिन जब मैंने अपने जीवनसाथी के काम के लिये चिंतन किया तब मेरी दुनिया भी पंगु नजर आने लगी। यह जो काम नाम की चीज है वह दिखती नहीं है, इसकी कद्र भी हम नहीं करते हैं लेकिन इसका महत्व हमारे जाने के बाद पता लगता है।

इसलिये हमें एक-दूसरे के काम को समझना भी चाहिये और बताते भी रहना चाहिये कि तुम्हारा काम कितना महत्व का है। जब कोई हमें हमारे काम का महत्व बताता है तब हमें भी अपने काम का महत्व पता लगता है। फिर निराशा हमें नहीं घेरती है और ना ही पलायन की सोच दिमाग पर हावी होती है। एक-एक रिश्ते का महत्व बार-बार बताओ, तुम हमारे लिये कितने उपयोगी  हो बताते रहो फिर देखो जीवन कितना खुशहाल हो जाएगा। बस लग जाओ काम पर आज से  ही। बस कहते रहो कि यह काम केवल तुम ही कर सकते थे। छोटे-छोटे कामों को ढूंढो और बताओ अपने आत्मीयों को कि यह काम तुम करते  हो तो हम कितना खुश हो लेते हैं।  सच मानिये आप टोकरा भर मित्र बना लेंगे।
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Wednesday, November 2, 2016

अब हम तो दोस्त हो गये ना भाई!


अपने साहित्यिक और सामाजिक जीवन को जीते-जीते अपना आस-पड़ोस कब दूर चले गया पता ही नहीं चला। लेकिन भगवान ने रास्ता दिखाया और कहा कि इस आनन्द को अनुभूत करो, यह भी विलक्षण है। जैसे ही घर ही चौखट से पैर बाहर पड़े और कोई चेहरा आपके सामने होता  है, आप धीरे से मुस्करा देते हैं, छोटी-छोटी बाते होने लगती हैं। कभी घर में आलू-प्याज समाप्त हो जायें तो यही चेहरा याद आता है और आपकी दरकार पूरी हो जाती  है। बस इसे ही आस-पड़ोस कहते हैं। अपने जीवन में इस सुख को समेटने की चाह पैदा हुई और बस महिलाओं को एक सूत्र में बांधने का निश्चय कर लिया। दीपावली आ गयी और हम से भी अधिक बच्चों में दोस्ती बनाने की पहल दिखायी दी। आस-पड़ोस के बच्चे मिठाई लिये हमारे घर आ गये, अब तो बड़ी शर्म महसूस हुई, हमारे पास इन्हें देने को ऐसा कोई उपहार नहीं था, जो इन्हें पसन्द आता। लेकिन पहला पाठ इन्होंने मुझे पढ़ा दिया था कि उपहार कितनी जरूरी चीज है। मैं तो उपहार तले दब चुकी थी इसलिये उपहार बेमानी से लगने लगे थे लेकिन नयी पौध को तो उपहार अच्छे लगेंगे ही ना। खैर आगे से ध्यान रखा जाएगा।
मन भी क्या है, न जाने कब कैसा देख लेता  है और एक नवीन दर्शन उपज जाता है। छोटी सी आम बात कब मन को छू ले, धीरे से दीमाग में अपना घर बसा ले और सोते-जागते बस लगे कि इस बात में जीवन का मर्म छिपा है। आप रात-दिन करवटे बदलने लगते हैं, सोच का सिरा ढूंढने लगते हैं और अकस्मात ही दीमाग की बत्ती जल जाती है कि इस बात में यह दर्शन मेरे मन को दिखायी दे रहा है। बचपन चाहे कितना ही लाड़-दुलार वाला क्यों ना हो, लेकिन बच्चे को उपेक्षित ही नजर आता है। अभी तुम बच्चे हो, गाहे-बगाहे उसे सुनने को मिलता ही रहता है। बड़ो की दुनिया उन्हें परायी सी लगने लगती है, वे अपने लिये संगी-साथी की खोज शुरू करते हैं। इस दुनिया में उनके अपने फैसले होते हैं, वहाँ उनको कोई नहीं कहता कि चुप रहो – अभी तुम बच्चे हो। वे घर से दूर भागते  हैं और अपने संगी-साथियों की एक दुनिया बसा लेते हैं।
नन्हें बच्चों को जब हाथ में हाथ डाले मस्ती में घूमते देखती हूँ तो बचपन याद आता है, हम भी तब अपनी दुनिया ऐसे ही बना रहे थे। किशोर और युवा होने तक तलाश जारी रहती है, घर से मिली उपेक्षा इन्हें घर के बाहर संगी-साथियों से मिला विश्वास इनकी अपेक्षा बन जाता है। बचपन में खेल के अलावा कुछ नहीं होता और लेकिन उनके हर खेल में बड़े होने का अहसास होता  है। खेल-खेल में वे माता-पिता बनते हैं और अपने बड़प्पन को जीते हैं। उस खेल में बच्चे भी होते हैं और वहाँ भी उन्हें यही सुनने को मिलता है कि तुम चुप रहो, तुम अभी बच्चे हो। मतलब कि बच्चे हमसे अधिक संगी-साथी बनाते  हैं। हम तो अपनी दुनियादारी में दुनिया ही भूला देते हैं लेकिन ये अपनी दुनिया बसाने की पहल करते रहते हैं।

बच्चे बड़े  होने का नाटक खेलते हैं और हम बड़े, बच्चे होने का सुख इन बच्चों में तलाशते हैं। ये हमें जीवन का पाठ पढ़ा जाते हैं और हम सोचते हैं कि हम बच्चों को कुछ सिखा देंगे। ये हमें सम्पूर्ण बना जाते  हैं और हम सोचते हैं कि हम इन्हें बड़ा कर रहे हैं। ये हमें सिखा जाते हैं कि संगी-साथी कैसे बनाते हैं और हम सोचते हैं कि हम इन्हें जीना सिखा रहे हैं। छोटी सी चिड़िया जब घर की मुंडेर पर चहचहाती है तब फूल खिल उठते हैं, ऐसे ही घर की चौखट पर जब कोई बच्चा दस्तक देता है तब बचपन लौट आता है। बच्चों के हम कह देते हैं कि तुम चुप रहो, तुम अभी बच्चे हो और अब हम बड़ों को भी सुनने को मिलता है कि आप चुप रहो, आपको इस नयी दुनिया का कुछ पता नहीं। तो  हम भी तलाश रहे हैं उस दुनिया को जहाँ कोई हमें नासमझ ना कहे और बच्चे भी ढूंढ रहे  हैं इसी दुनिया को। तुम भी नासमझ और हम भी नासमझ! ये युवा तुम्हें भी चुप करा देते हैं और हमें  भी! अब हम तो दोस्त हो गये ना भाई!

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Wednesday, October 26, 2016

परशुराम को डिगा दे उसे मन की चाहतें कहते हैं।

मन को परत दर परत खोल दो, पता लगेगा कि न जाने कितनी ख्वाइशें यहाँ सोई पड़ी हैं, जिन ख्वाइशों को हम समझे थे कि ये हमारे मन का हिस्सा ही नहीं हैं, वे तो अंदर ही अंदर अपना अस्तित्व बनाने में जुटी हैं बस जैसे ही किसी ने उन्हें थपकी देकर जगाया वे सर उठाकर बाहर झांकने लगी। अपने अन्दर झांकिये तो सही, दुनिया भर की ख्वाइशों का यहाँ बसेरा मिलेगा। सभी कुछ चाहिये इस तन को और मन को भी। बस बचपन से ही हमने इन्हें खाद-पानी नहीं दिया तो समझ बैठे कि ये अब हमारे अन्दर विद्यमान ही नहीं है, लेकिन ऐसा नहीं है, जैसे ही हम इनके नजदीक जाते हैं ये हमे सुहाने लगती हैं।
बचपन में पिताजी का बहुत सख्त पहरा था, शौक के लिये स्थान नहीं था। बस जीवन एक रस से ही चले जा रहा था। जिन्दगी में छः रस भी होते हैं जीभ को पता ही नहीं लगा, लेकिन जीभ किसी भी रस को भूलती नहीं हैं, उसे सभी का भान है। सारी जिन्दगी मधुर रस को जीभ पर मत रखिये लेकिन जिस दिन भी रखेंगे, वह तत्काल बता देगी कि यह मधुर रस है। जिन्दगी की सारी ही चाहते इस मन को पता हैं, आप कितनी ही दूरी बना लें लेकिन मन जानता है इन चाहतों की दरकार को।
मेहंदी हाथों में जब भी लगी तब चोरी-छिपे ही लगी या कभी कभार शादी-ब्याह के अवसर पर, मन ने मान लिया कि मेहँदी की चाहत रंग नहीं लाती इसलिये गाहे-बगाहे कह भी दिया कि नहीं, मेहँदी लगाने में रुचि नहीं है तो लोगों ने भी मान लिया कि इन्हें मेहँदी की चाहत नहीं। मन की कसक का पता तब लगा जब ससुराल गये और वहाँ यह कहकर हमें मेहँदी वाले हाथों के बिना ही पीहर भेज दिया गया कि इन्हें शौक नहीं है। अरे ऐसा कैसे हुआ, मन ने आखिर पूछ ही लिया और तब जाकर पता चला कि ख्वाइशें मन में अपनी जगह बनाकर रहती ही हैं।
यह सभी मानते हैं कि हमारे पिताजी कठोर स्वभाव के थे, लेकिन प्रेम और सम्मान उन्हें भी हिला ही देता था। हमारा एक चचेरा भतीजा था, वह उनसे कभी कभार पैसे ले जाता था। यह बात किस बेटे-बहु को सुहाती है जो हमारे यहाँ सुहाती। मेरे पास जब बात आयी तो मैंने पिताजी से पूछा कि आप उसे पैसे क्यों देते हैं? तो वे बोले कि वह सम्मान के साथ बाबा-बाबा कहकर बुलाता है। अब बताये कि जो परशुराम को डिगा दे उसे मन की चाहतें ही कहते हैं।

ये चाहते अपना बसेरा तो बना कर रखती ही हैं लेकिन जब खाद-पानी नहीं मिलता है तब धीरे-धीरे रिसती भी हैं और यह रिसाव एकत्र हो जाता है, आँखों के पास। जब भी कहीं ऐसी ही संवेदना सुनायी या दिखायी पड़ती हैं. यह रिसाव अँखों से होने लगता है। जैसे-जैसे उम्र का तकाजा होने लगता है, यह रिसाव छलकने लगता है। रिसाव छलके तो समझो कि चाहतें अन्दर कुलबुला रही हैं और इन्हें धूप देने की जरूरत आन पड़ी है। बे झिझक इन्हें बाहर निकालो, अपनी चाहतों को पूरा करों और सच में सुखी होने का अहसास करो। ढूंढ लो इन्हें, ये चाहे किसी भी कोने में दुबकी क्यों ना हो. आपको ये ही सुखी करेंगी और तभी पता लगेगा कि आपके मन का असली सुख क्या है?
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Saturday, October 8, 2016

शेष स्मृति चिह्न है नाभि

शेष स्मृति चिह्न है नाभि
संतान के जन्म के साथ ही हम माँ से संतान को अलग करने के लिये नाभिनाल को काट देते हैं लेकिन नाभि का चिह्न हमें याद दिलाता है कि हमारा शरीर किसी सांचे में रहकर ही निर्मित हुआ है। नाभि-दर-नाभि पीढ़ियों का निर्माण होता है और अदृश्य कड़ियां विलुप्त होती जाती हे, बस रह जाती है तो यह केवल नाभि। हम अपने माता-पिता की सप्त धातुओं यथा रस, रक्त, मांस, मज्जा आदि से निर्मित होकर अपने व्यक्तित्व को बनाते हैं और फिर नवीन व्यक्तित्व को गढ़ने के लिये कदम बढ़ा देते हैं। यही जीवन है। हम जिन कड़ियों से बने हैं वे हमारे अंदर विलीन हो जाती है, एकरस हो जाती है, केवल हमारे आचरण में ही इनकी झलक मिल पाती है। बस हिसाब शेष रह जाता है कि नाक माँ जैसी है और ठोड़ी पिता जैसी है, बोलता है तो पिता की झलक आती है और हँसता है तो माँ दिखायी देती है। ऐसे ही बनते हैं हम सब।
हम सब का व्यक्तित्व तीन हिस्सों में बंटा होता है और उसका निर्माण भी तीन हिस्सों में ही होता है। एक फल जब पकता है तब हम कहते हैं कि किस बीज से बना है, इसका खुद का निर्माण कैसा हुआ है और क्या इसका बीज फलदायी होगा? इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति तीन तरह से निर्मित होता है। पहला हिस्सा होता है उसके माता-पिता दूसरा होता है स्वयं का निर्माण और तीसरा होता है उसने किस व्यक्तित्व का निर्माण किया अर्थात संतान। हम इन तीनों से यावत्जीवन बंधे रहते हैं। किसी एक को भी अपने से अलग करने पर हमारा जीवन बिखर जाता है। हम पूर्ण तभी रहते हैं जब हमारे अंदर इन तीनों का वास हो।
हमारा व्यक्तित्व हमारे माता-पिता से निर्मित होता है, हमारा स्वभाव का एक हिस्सा उनके जीन्स से ही बनता है, कहीं न कहीं हमारे अन्दर हमारे माता-पिता परिलक्षित होते ही हैं। शिक्षा, काल, परिस्थिति से हमारा वह व्यक्तित्व बनता है जो सर्वसामान्य को दिखायी देता है, जिसे हम अपने बुद्धि से प्राप्त होना बताते हैं। जबकि इसमें भी हमारे माता-पिता का ही अंश रहता है। जब हमारा व्यक्तित्व का निर्माण हो जाता है तब हम अपने जीवन साथी के साथ मिलकर अपनी संतान के व्यक्तित्व को आकार देते हैं। इसलिये जो हमारे अन्दर है उसी अंश को हम अपनी संतान को देते हैं और हमारी संतान में वह परिलक्षित भी होता है।
जीवन की ये तीनों कड़ियाँ जब तक साथ रहती हैं जीवन सुगम बना रहता है। लेकिन कड़िया बिखरने पर जीवन एकाकी हो जाता है। हम कहते हैं कि हमारे माता-पिता और संतान से आत्मीय सम्बंध हैं अर्थात् हमारी आत्मा के समान ही हमें अपने माता-पिता और संतान के दुख-दर्द की अनुभूति होती है। इसलिये ये तीनों अलग-अलग शरीर होते हुए भी एक प्राण होते हैं। इस आत्मीयता की अनुभूति प्रेम के प्राकट्य से होती है, जितना प्रेम और सम्मान हम इन सम्बंधों को देते हैं उतनी ही आत्मीयता की अनुभूति बनी रहती है लेकिन यदि हमने प्रेम और सम्मान के भाव को समाप्त कर दिया तब अनुभूति का भाव भी तिरोहित होता चला जाएगा। जिस दिन आत्मीयता की अनुभूति समाप्त हो जाएगी उसी दिन हमारा व्यक्तित्व भी बिखर जाएगा। हमारे अन्दर मैं का भाव प्रबल होने लगेगा और हम का भाव निर्बल होने लगेगा। मैं किसी से निर्मित हूँ यह भाव खो जाएगा और केवल यह भाव रह जाएगा कि मैंने किसी को बनाया है। अहंकार के आगे सब कुछ तिरोहित हो जाएगा।
हमारे यहाँ हर पल अपने व्यक्तित्व निर्माता को स्मरण किया जाता रहा है हम अपने माता-पिता को अपने नाम के साथ जोड़कर याद करते हैं जैसे – दशरथ नंदन राम, कौशल्या नंदन राम, वासुदैव कृष्ण या देवकी नंदन कृष्ण। वर्तमान में भी कई जगह अपने पिता का नाम संयुक्त करके ही अपना नाम लिखा जाता है, जैसे नरेन्द्र दामोदर दास मोदी। हम अपने व्यक्तित्व से चाहे कैसे भी अपने माता-पिता का नाम हटा दें लेकिन प्रकृति ने इसे अमिट बनाया है। जैसे नाभिनाल काटने के बाद भी नाभि का चिह्न हमेशा हमारे शरीर पर रहता है वैसे ही हमारे व्यक्तित्व में हमारे माता-पिता और हमारी संतान का व्यक्तित्व मिला होता है। हम इनसे दूरी तो बना सकते हैं लेकिन इन्हें समाप्त नहीं कर सकते हैं। अब तो विज्ञान ने भी सिद्ध कर दिया है कि जीन्स हमेशा बने रहते हैं। इसलिये भूत-वर्तमान-भविष्य की तरह है हमारा व्यक्तित्व। 
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