एक सुन्दर राजकुमार था, उससे विवाह करने के लिए देश-विदेश की राजकुमारियां लालायित रहती थीं। एक दिन एक विदेशी राजकुमारी ने उस राजकुमार से विवाह कर लिया। राजकुमारी ने उसे लूटना शुरू किया और धीरे-धीरे वह राजकुमार जीर्ण-शीर्ण हो गया। राजकुमारी छोड़ कर चले गयी और राजकुमार अनेक रोगों से ग्रसित हो गया। अब उसे कोई प्यार नहीं करता, बस सब नफरत ही करते हैं और उससे दूर कैसे रहा जाए, बस इसी बारे में चिन्तन करते हैं। इस राजकुमार को हम भारत मान लें और राजकुमारी को इंग्लैण्ड। कल तक भारत एक राजकुमार था तो उसे लूटने कई राजवंश चले आए और आज जब लुटा-पिटा शेष रह गया है तब उसके अपने भी उससे नफरत कर रहे हैं?
अभी एक किताब पढ़ी थी, पढ़ी क्या थी बस कुछ पन्ने पलटे थे।
Indian Summer: The Secret History of the End of an Empire - Alex Von Tunzelmann इस पुस्तक का प्रारम्भ जिन शब्दों में किया गया है उसका भावार्थ कुछ ऐसा है –
1577 में जब इंग्लेण्ड की गद्दी पर महारानी ऐलिजाबेथ बैठी उस समय दुनिया में दो ही देश थे, एक देश था एकदम असभ्य, अविकसित और धार्मिक उन्माद से ग्रस्त और वह देश था इंग्लैण्ड। दूसरा देश था पूर्ण समृद्ध, विकसित और धार्मिक सहिष्णुता से परिपूर्ण। यह देश था भारत। इस कारण महारानी एलिजाबेथ ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी बनायी और भारत के साथ व्यापार करने को कहा। तब तक वास्कोडिगामा 1498 में भारत की खोज कर चुका था और यहाँ के वैभव के बारे में यूरोप को बता चुका था।
भारत में अंग्रेजों के आने से पूर्व अति विकसित कुटी उद्योग थे, यहाँ की रेशम दुनिया में जाती थी। मेरे पास इसके भी ढेर सारे आँकड़े है कि उस समय हम कितना उत्पादन करते थे। लेकिन मैं केवल यह कहना चाह रही हूँ कि इस देश को 250 वर्षों तक अंग्रेजों ने बेदर्दी से लूटा और लूटा ही नहीं हमारे सारे उद्योग धंधों को चौपट किया, हमारी शिक्षा पद्धति, चिकित्सा पद्धति, न्याय व्यवस्था, पंचायती राज व्यस्था आदि को आमूल-चूल नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इतना लूटने के बाद भी स्वतंत्रता के समय हमारे पास अपना कहने को बहुत कुछ था। लेकिन दुर्भाग्य से हमने उन सबको नजर अंदाज किया और शासन में अंग्रेजों के स्थान पर स्वयं को आसीन कर लिया। बस और कोई परिवर्तन नहीं। अपनी प्रत्येक पद्धति को गाली देना हमारा ध्येय बन गया और पश्चिम की प्रत्येक वस्तु को अपनाना फैशन बन गया।
आज कुछ पोस्ट पढ़ने को मिली, जैसे दिव्या की एक पोस्ट थी -
श्रेष्ठ चिकित्सक कौन?": इस पोस्ट में एक भारतीय चिकित्सक का दर्द निकलकर आता है। एक अन्य पोस्ट थी - 'आई हेट पॉलिटिक्स' मगर क्यों...?": रवीश कुमार जी की एक पोस्ट थी -
बारिश एक भयंकर इमेज संकट से गुज़र रही है": इन सारी ही पोस्टों में भारत के लिए चिन्ता हैं। दिव्या स्वयं एक चिकित्सक हैं और वे इस बात से दुखी हैं कि लोग मुझसे पूछ रहे हैं कि तुम ऐलोपेथी की चिकित्सक होने के बाद भी आयुर्वेद और होम्योपेथ की वकालात क्यों कर रही हो? रवीशजी स्वयं एक मीडियाकर्मी हैं लेकिन उनका दर्द है कि आज मीडिया बरसात को भी विलेन बनाने पर तुला है। ऐसे ही राजनीति को भ्रष्ट बताकर श्रेष्ठ युवा पीढ़ी को राजनीति से दूर किया जा रहा है।
ऐसा लगता है कि हमारे स्वाभिमान को सोच-समझकर नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। कोई राजनीति से घृणा करना सिखा रहा है तो कोई मीडिया से। कोई हमारी शिक्षा पद्धति को खराब बता रहा है तो कोई बारिश से ही बेहाल हो रहा है। हमारी चिकित्सा प्रणाली को तो कूड़े के ढेर में डालने की पूरी कोशिश है। इसलिए आप सभी के चिंतन का विषय है कि क्या भारत को हम उस राजकुमार की तरह त्याग दें या फिर उसे पुन: स्वस्थ और सुंदर बनाने में सहयोगी बने।