लगभग 15 वर्ष पूर्व की बात होगी जब दो-तीन सांसदों के पास नोटों से भरे ब्रीफकेस प्राप्त हुए थे। जब उनपर कानून का शिकंजा कसने की बात आयी थी तब उन्होंने कहा था कि हम सांसद हैं और हमपर कार्यवाही नहीं की जा सकती। इस खबर को पढ़कर मैं चौंक गयी थी। हम कितने भी शिक्षित हो जाएं लेकिन हमारी शिक्षा केवल अपने कार्य क्षेत्र से ही जुड़ी होती है और इस कारण आम जनता को नहीं मालूम की हमारे यहाँ कानून व्यवस्था क्या है? तब मैंने सरसरी तौर पर इस कानून को जानने की कोशिश की। मैं सरसरी तौर पर इसलिए लिख रही हूँ कि मैंने कानून की पढ़ाई नहीं की बस बुद्धि का प्रयोग करते हुए थोड़ी बहुत जानकारी एकत्र की, इसलिए देश का प्रत्येक नागरिक थोडी सी जागरूकता रखते हुए बहुत सारी जानकारी प्राप्त कर सकता है।
इस देश में अंग्रेजों ने कई कानून बनाए। चूंकि वे राजा थे और हम प्रजा, इसलिए उन्होंने ऐसे कानून बनाए जिससे राजा सुरक्षित रहे और प्रजा को कभी भी सींखचों के अन्दर किया जा सके। दुर्भाग्य से आज तक हमारे देश में वही कानून लागू हैं। कानून के अन्तर्गत राजनेता और नौकरशाहों [bureaucracy ] पर सीधी कानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती है। इसके लिए उनके शीर्ष अधिकारी की सहमति आवश्यक है। जैसे एक इंजिनियर के ऊपर आरोप लगे तो उसके चीफ इंजिनीयर की सहमति के बाद ही उस पर कार्यवाही होगी। इसी प्रकार सांसद member of parliament या मंत्री पर मुख्यमंत्री या प्रधान मंत्री की सहमति आवश्यक है। इस कारण कोई भी राजनेता और नौकरशाह सजा नहीं पाते और खुलकर भ्रष्टाचार करते हैं।
इस कारण देश में लोकपाल विधेयक की बात आयी। इसके अन्तर्गत इन लोगों पर सीधी कार्यवाही की जा सकती थी लेकिन इसके दायरे में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को मुक्त रखा गया। यह कानून पास नहीं होने दिया गया। अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधान मंत्री थे तब उन्होंने कानून के दायरे में प्रधान मंत्री को भी सम्मिलित कराया लेकिन विधेयक पास नहीं हो पाया। अब्दुल कलाम जब राष्ट्रपति बने तब उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति भी विधेयक के दायरे में आने चाहिए लेकिन विधेयक फिर भी पास नहीं हुआ। इसलिए आज आवश्यकता है कि सर्वप्रथम लोकपाल विधेयक पारित हो जिससे रातनेता और नौकरशाहों पर सीधी कार्यवाही हो सके। इसलिए मैंने एक टिप्पणी में लिखा था कि जिस दिन हमारा कानून बदल जाएगा उस दिन भ्रष्टाचार कपूर की तरह उड़ जाएगा।
भ्रष्टाचार का दूसरा बड़ा कारण है विलम्बित न्याय व्यवस्था। इसके लिए भी अंग्रेजों का कानून ही आड़े आ रहा है। पूर्व में हमारे यहाँ ग्रामीण पंचायती कानून था, और व्यक्ति को अविलम्ब न्याय मिलता था लेकिन इस व्यवस्था को समाप्त कर न्यायालयों की स्थापना की गयी। जहाँ आज लाखों केस बरसों से प्रतीक्षारत हैं। इसलिए इस कानून में बदलाव कर पुन: पंचायती राज की स्थापना करनी चाहिए और लम्बित प्रकरणों को शिविर लगाकर समाप्त करना चाहिए। इसके लिए जनता को ही दवाब बनाना होगा। हम जागरूकता का प्रसार करें। जिस दिन जनता को भ्रष्टाचार का मूल कारण समझ आ गया उस दिन से भ्रष्टाचार समाप्त होना प्रारम्भ हो जाएगा। अभी हम समझते हैं कि हमारा कानून पुख्ता है और भ्रष्ट लोगों को निश्चित रूप से सजा होगी, लेकिन यह हमारी भूल है। मैं इसलिए अंग्रेजों का जिक्र करती हूँ कि उन्होंने हमारे यहाँ जो व्यवस्थाएं स्थापित की वे भारत के विपरीत थी। मैं आत्म-मुग्ध भी नहीं हूँ बस इतना जानती हूँ कि जो निरापद व्यवस्थाएं हमारी थी उन्हें हम पुन: लागू करवाएं। व्यवस्था में परिवर्तन ही हमारी समस्याओं का हल है।
श्रीमती अजित गुप्ता प्रकाशित पुस्तकें - शब्द जो मकरंद बने, सांझ की झंकार (कविता संग्रह), अहम् से वयम् तक (निबन्ध संग्रह) सैलाबी तटबन्ध (उपन्यास), अरण्य में सूरज (उपन्यास) हम गुलेलची (व्यंग्य संग्रह), बौर तो आए (निबन्ध संग्रह), सोने का पिंजर---अमेरिका और मैं (संस्मरणात्मक यात्रा वृतान्त), प्रेम का पाठ (लघु कथा संग्रह) आदि।
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Sunday, July 25, 2010
Wednesday, July 21, 2010
पता नहीं हम अपने देश भारत से नफरत क्यों करते हैं?
एक सुन्दर राजकुमार था, उससे विवाह करने के लिए देश-विदेश की राजकुमारियां लालायित रहती थीं। एक दिन एक विदेशी राजकुमारी ने उस राजकुमार से विवाह कर लिया। राजकुमारी ने उसे लूटना शुरू किया और धीरे-धीरे वह राजकुमार जीर्ण-शीर्ण हो गया। राजकुमारी छोड़ कर चले गयी और राजकुमार अनेक रोगों से ग्रसित हो गया। अब उसे कोई प्यार नहीं करता, बस सब नफरत ही करते हैं और उससे दूर कैसे रहा जाए, बस इसी बारे में चिन्तन करते हैं। इस राजकुमार को हम भारत मान लें और राजकुमारी को इंग्लैण्ड। कल तक भारत एक राजकुमार था तो उसे लूटने कई राजवंश चले आए और आज जब लुटा-पिटा शेष रह गया है तब उसके अपने भी उससे नफरत कर रहे हैं?
अभी एक किताब पढ़ी थी, पढ़ी क्या थी बस कुछ पन्ने पलटे थे। Indian Summer: The Secret History of the End of an Empire - Alex Von Tunzelmann इस पुस्तक का प्रारम्भ जिन शब्दों में किया गया है उसका भावार्थ कुछ ऐसा है – 1577 में जब इंग्लेण्ड की गद्दी पर महारानी ऐलिजाबेथ बैठी उस समय दुनिया में दो ही देश थे, एक देश था एकदम असभ्य, अविकसित और धार्मिक उन्माद से ग्रस्त और वह देश था इंग्लैण्ड। दूसरा देश था पूर्ण समृद्ध, विकसित और धार्मिक सहिष्णुता से परिपूर्ण। यह देश था भारत। इस कारण महारानी एलिजाबेथ ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी बनायी और भारत के साथ व्यापार करने को कहा। तब तक वास्कोडिगामा 1498 में भारत की खोज कर चुका था और यहाँ के वैभव के बारे में यूरोप को बता चुका था।
भारत में अंग्रेजों के आने से पूर्व अति विकसित कुटी उद्योग थे, यहाँ की रेशम दुनिया में जाती थी। मेरे पास इसके भी ढेर सारे आँकड़े है कि उस समय हम कितना उत्पादन करते थे। लेकिन मैं केवल यह कहना चाह रही हूँ कि इस देश को 250 वर्षों तक अंग्रेजों ने बेदर्दी से लूटा और लूटा ही नहीं हमारे सारे उद्योग धंधों को चौपट किया, हमारी शिक्षा पद्धति, चिकित्सा पद्धति, न्याय व्यवस्था, पंचायती राज व्यस्था आदि को आमूल-चूल नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इतना लूटने के बाद भी स्वतंत्रता के समय हमारे पास अपना कहने को बहुत कुछ था। लेकिन दुर्भाग्य से हमने उन सबको नजर अंदाज किया और शासन में अंग्रेजों के स्थान पर स्वयं को आसीन कर लिया। बस और कोई परिवर्तन नहीं। अपनी प्रत्येक पद्धति को गाली देना हमारा ध्येय बन गया और पश्चिम की प्रत्येक वस्तु को अपनाना फैशन बन गया।
आज कुछ पोस्ट पढ़ने को मिली, जैसे दिव्या की एक पोस्ट थी - श्रेष्ठ चिकित्सक कौन?": इस पोस्ट में एक भारतीय चिकित्सक का दर्द निकलकर आता है। एक अन्य पोस्ट थी - 'आई हेट पॉलिटिक्स' मगर क्यों...?": रवीश कुमार जी की एक पोस्ट थी - बारिश एक भयंकर इमेज संकट से गुज़र रही है": इन सारी ही पोस्टों में भारत के लिए चिन्ता हैं। दिव्या स्वयं एक चिकित्सक हैं और वे इस बात से दुखी हैं कि लोग मुझसे पूछ रहे हैं कि तुम ऐलोपेथी की चिकित्सक होने के बाद भी आयुर्वेद और होम्योपेथ की वकालात क्यों कर रही हो? रवीशजी स्वयं एक मीडियाकर्मी हैं लेकिन उनका दर्द है कि आज मीडिया बरसात को भी विलेन बनाने पर तुला है। ऐसे ही राजनीति को भ्रष्ट बताकर श्रेष्ठ युवा पीढ़ी को राजनीति से दूर किया जा रहा है।
ऐसा लगता है कि हमारे स्वाभिमान को सोच-समझकर नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। कोई राजनीति से घृणा करना सिखा रहा है तो कोई मीडिया से। कोई हमारी शिक्षा पद्धति को खराब बता रहा है तो कोई बारिश से ही बेहाल हो रहा है। हमारी चिकित्सा प्रणाली को तो कूड़े के ढेर में डालने की पूरी कोशिश है। इसलिए आप सभी के चिंतन का विषय है कि क्या भारत को हम उस राजकुमार की तरह त्याग दें या फिर उसे पुन: स्वस्थ और सुंदर बनाने में सहयोगी बने।
अभी एक किताब पढ़ी थी, पढ़ी क्या थी बस कुछ पन्ने पलटे थे। Indian Summer: The Secret History of the End of an Empire - Alex Von Tunzelmann इस पुस्तक का प्रारम्भ जिन शब्दों में किया गया है उसका भावार्थ कुछ ऐसा है – 1577 में जब इंग्लेण्ड की गद्दी पर महारानी ऐलिजाबेथ बैठी उस समय दुनिया में दो ही देश थे, एक देश था एकदम असभ्य, अविकसित और धार्मिक उन्माद से ग्रस्त और वह देश था इंग्लैण्ड। दूसरा देश था पूर्ण समृद्ध, विकसित और धार्मिक सहिष्णुता से परिपूर्ण। यह देश था भारत। इस कारण महारानी एलिजाबेथ ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी बनायी और भारत के साथ व्यापार करने को कहा। तब तक वास्कोडिगामा 1498 में भारत की खोज कर चुका था और यहाँ के वैभव के बारे में यूरोप को बता चुका था।
भारत में अंग्रेजों के आने से पूर्व अति विकसित कुटी उद्योग थे, यहाँ की रेशम दुनिया में जाती थी। मेरे पास इसके भी ढेर सारे आँकड़े है कि उस समय हम कितना उत्पादन करते थे। लेकिन मैं केवल यह कहना चाह रही हूँ कि इस देश को 250 वर्षों तक अंग्रेजों ने बेदर्दी से लूटा और लूटा ही नहीं हमारे सारे उद्योग धंधों को चौपट किया, हमारी शिक्षा पद्धति, चिकित्सा पद्धति, न्याय व्यवस्था, पंचायती राज व्यस्था आदि को आमूल-चूल नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इतना लूटने के बाद भी स्वतंत्रता के समय हमारे पास अपना कहने को बहुत कुछ था। लेकिन दुर्भाग्य से हमने उन सबको नजर अंदाज किया और शासन में अंग्रेजों के स्थान पर स्वयं को आसीन कर लिया। बस और कोई परिवर्तन नहीं। अपनी प्रत्येक पद्धति को गाली देना हमारा ध्येय बन गया और पश्चिम की प्रत्येक वस्तु को अपनाना फैशन बन गया।
आज कुछ पोस्ट पढ़ने को मिली, जैसे दिव्या की एक पोस्ट थी - श्रेष्ठ चिकित्सक कौन?": इस पोस्ट में एक भारतीय चिकित्सक का दर्द निकलकर आता है। एक अन्य पोस्ट थी - 'आई हेट पॉलिटिक्स' मगर क्यों...?": रवीश कुमार जी की एक पोस्ट थी - बारिश एक भयंकर इमेज संकट से गुज़र रही है": इन सारी ही पोस्टों में भारत के लिए चिन्ता हैं। दिव्या स्वयं एक चिकित्सक हैं और वे इस बात से दुखी हैं कि लोग मुझसे पूछ रहे हैं कि तुम ऐलोपेथी की चिकित्सक होने के बाद भी आयुर्वेद और होम्योपेथ की वकालात क्यों कर रही हो? रवीशजी स्वयं एक मीडियाकर्मी हैं लेकिन उनका दर्द है कि आज मीडिया बरसात को भी विलेन बनाने पर तुला है। ऐसे ही राजनीति को भ्रष्ट बताकर श्रेष्ठ युवा पीढ़ी को राजनीति से दूर किया जा रहा है।
ऐसा लगता है कि हमारे स्वाभिमान को सोच-समझकर नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। कोई राजनीति से घृणा करना सिखा रहा है तो कोई मीडिया से। कोई हमारी शिक्षा पद्धति को खराब बता रहा है तो कोई बारिश से ही बेहाल हो रहा है। हमारी चिकित्सा प्रणाली को तो कूड़े के ढेर में डालने की पूरी कोशिश है। इसलिए आप सभी के चिंतन का विषय है कि क्या भारत को हम उस राजकुमार की तरह त्याग दें या फिर उसे पुन: स्वस्थ और सुंदर बनाने में सहयोगी बने।
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