Wednesday, January 27, 2010

गाँव में गणतन्‍त्र दिवस

गणतन्‍त्र दिवस का उत्‍सव मनाया जा रहा है। बच्‍चे चबूतरे पर बैठे हैं, गाँव वाले पेड़ों के नीचे और महिलाएं अपने झोपड़े के आगे घूंघट निकालकर बैठी हैं। कुछ बच्‍चे पास के पक्‍के मकान की छत पर भी चढ़ गए हैं। विद्यालय के बच्‍चे आज प्रस्‍तुति देंगे। कोई कविता पाठ करेगा तो कोई नृत्‍य। सामूहिक नृत्‍य करने को भी बालिकाएं सज-धज कर तैयार हैं। कल तक गंदे कपड़ों में आकर बैठने वाले बच्‍चों के तन पर अब स्‍कूल की साफ धुली हुई यूनिफार्म है। कुछ छोटे बच्‍चों ने जरूर गंदी ही ड्रेस पहन रखी है, वो ड्रेस उसके बड़े भाई या बहन की होगी। पूरे गाँव में उत्‍सव का सा माहौल है।

मेरे शहर से मात्र 12 कि मी की दूरी पर बसा है एक गाँव ‘नयाखेड़ा’। इसे हमारी संस्‍था भारत विकास परिषद ने गोद ले रखा है और वहाँ वर्तमान में एक सिलाई केन्‍द्र संचालित हैं। हम स्‍वतंत्रता दिवस और गणतन्‍त्र दिवस वहाँ प्रतिवर्ष मनाते हैं। सिलाई केन्‍द्र के पूर्व संस्‍था वहाँ विद्यालय संचालित करती थी लेकिन अब वहाँ सरकारी विद्यालय खुल गया है तो हमने विद्यालय के स्‍थान पर सिलाई केन्‍द्र संचालित करने का निश्‍चय किया। इन दोनों राष्‍ट्रीय पर्वों पर हम विद्यालय के बालक-बालिकाओं को माध्‍यम बनाकर वहाँ उत्‍सव मनाते हैं। इस उत्‍सव में सारा गाँव ही भागीदारी करता है। इस वर्ष गाँव में पंचायत के चुनाव हो रहे हैं तो इस गणतन्‍त्र दिवस पर गाँव में गहमा-गहमी थी। वर्तमान सरपंच हमारे साथ मंच पर बैठे थे। मुझे बताया गया कि इस बार उनकी पत्‍नी सरपंच का चुनाव लड़ रही है। मैंने उनसे पूछा कि कहाँ है आपकी पत्‍नी? उन्‍होंने दूर बैठी, लम्‍बा घूंघट निकाले एक महिला की तरफ इशारा किया।

इतने में ही संचालक ने घोषणा की कि अब पूजा आपके सामने कविता पाठ करेगी। ग्‍यारहवीं कक्षा में पढ़ने वाली पूजा का काव्‍य पाठ प्रारम्‍भ हुआ। पूजा ने एक लम्‍बी कविता बड़े ही जोश के साथ बोली। कभी यही लड़की हमारे विद्यालय में ही पढ़ती थी और आज इतने जोश के साथ कविता पाठ कर रही थी। अटक-अटक कर पढ़ने वाले बच्‍चे कब इतने होशियार हो गए? लेकिन मन को बहुत अच्‍छा लगा। मैंने गाँव वालों को अपने संदेश में यही कहा कि हमें हर घर में पूजा चाहिए।

कुछ ही देर में बिजली चले गयी। नृत्‍य करने को तैयार बच्‍चे मायूस होने लगे। हमने हमारे पति से कहा कि आप गाड़ी को आगे लगाकर उसका टेप रिकार्डर चालू कर दीजिए। काम हो गया और बच्‍चों ने अपना नृत्‍य प्रारम्‍भ कर दिया। लेकिन इस सबमें नृत्‍य करने का स्‍थान बदल गया। एक दस वर्षीय बच्‍ची मेरे पास आ खड़ी हुई। हमारी ही एक सदस्‍य ने मुझे बताया कि यह नन्‍हीं बच्‍ची सिलाई मशीन चला लेती है और बड़ी अच्‍छी सिलाई करती है। एक और लड़की भी पास आ गयी, उसने घाघरा, ब्‍लाउज पहन रखा था और उसने बताया कि उन सबकी उसने ही सिलाई की है। मन को तृप्ति सी होने लगी इस नन्‍हीं बालिकाओं को देखकर।

तीन विभिन्‍न आयु की स्‍त्री-शक्ति मेरे सम्‍मुख थी। एक सरपंच का चुनाव लड़ रही थी लेकिन वो घूंघट में थी, दूसरी अठारह साल की नौजवान लड़की, जो धडल्‍ले से कविता पाठ कर रही थी और तीसरी दस वर्ष की बालिका जो अपनी अदम्‍य इच्‍छा शक्ति के बल पर सिलाई सीख रही थी। आज गमेरा लाल की पत्‍नी सरपंच बनेगी, सारे ही काम गमेरा लाल ही करेगा लेकिन शहर से जब अफसर आएंगे तब पेमली बाई ही उनसे बात करेगी। धीरे-धीरे गमेरा की जगह पेमली ले लेगी। घूंघट चले जाएगा और महिला में हिम्‍मत का संचार होगा। जब पूजा बड़ी हो जाएगी और वह नन्‍हीं सी बच्‍ची कुसुम बड़ी हो जाएगी तब तो गाँव की तस्‍वीर ही बदल जाएगी, महिलाओं का स्‍वरूप ही बदल जाएगा।

गाँव तेजी से करवट बदल रहे हैं। महिलाएं तेजी से सोपान चढ़ रही हैं। आत्‍मविश्‍वास लौट रहा है। अब पढ़ी-लिखी पत्‍नी के सामने पति शराब पीकर आने की हिम्‍मत नहीं करेगा और ना ही उसपर हाथ उठाने की जुर्रत। पत्‍नी के हाथ में भी पैसा होगा। वह भी शहर जाकर मीटींग में भाग लेगी। आज पेमली सरपंच बनेगी तो कल पूजा विधायक और कुसुम शायद मुख्‍यमंत्री, प्रधानमंत्री या शायद राष्‍ट्रपति भी।

Friday, January 22, 2010

जमाखोरों के विरोध में आम जनता को जागृत होना होगा

कहते हैं कि सुधार सरकारे नहीं समाज करता है। लेकिन आज हम सब सरकारों के मुँह की ओर ताक रहे हैं। सरकारों को वे लोग संचालित कर रहे हैं जिनके पास शक्‍कर की ‘मिले’ हैं, हजारों बीघा जमीन हैं। क्‍या ऐसी सरकार और ऐसे मंत्री जमाखोरों को सबक सिखा सकते हैं?


उदयपुर में सहकारी बाजार संचालित है। वहाँ रोजमर्रा की आवश्‍यकताएं पूरी की जा सकती है। आप सभी के शहरों में भी संचालित ही होगा। हमारे यहाँ अभी दो-तीन वर्ष से एक स्‍कीम आयी कि आप दस हजार रूपए जमा कराएं और प्रतिमाह 100 रूपए के कूपन लें ले समान खरीदने के लिए। आज जहाँ बैंक में ब्‍याज के नाम पर कुछ नहीं मिलता है, वहीं यह स्‍कीम अच्‍छी लगी। हमनें भी तीस हजार रूपए जमा करा दिए। अब हमें तीन सौ रूपए के कूपन प्रतिमास मिल जाते हैं। हम घर में दो ही प्राणी हैं तो हमारा तैल, साबुन, चावल, दाल आदि का छोटा-मोटा खर्चा इस कूपन से चल ही जाता था। लेकिन अभी दो माह पहले हमें लगा कि यहाँ पैसा जमा कराना लाभ का सौदा है तो हमने पचास हजार रूपए और जमा करा दिए। अब हमारे पास आठसौ रूपए के कूपन हो गए। हमें लगा कि अरे ये तो खूब हैं। इनका तो हम सामान ला ही नहीं पाएंगे। लेकिन जैसे ही इस महिने सहकारी बाजार गए तो हमें जिन्‍दगी में पहली बार आटे-दाल का भाव मालूम पड़ा। ये क्‍या? आठ सौ के कूपन तो फुर्र से उड़ गए। बीस रूपए आने वाली शक्‍कर पचास रूपए हो चुकी थी और दालें तो सौ के भाव से बिक रही थी। इन बढ़ती कीमतों से आज एक मजदूर का दर्द सामने आ गया। सौ रूपए प्रतिदिन कमाने वाला मजदूर अब कैसे खा पाएगा दाल और रोटी? दूध तो उसके नसीब में था ही नहीं, बस छंटाक भर दूध से सारे घर की चाय बना लेता था तो अब तो शरद पँवार जी ने दूध की कीमत बढ़ाने की भी मुनादी करा दी है। आखिर ऐसा क्‍या हो गया, रातों-रात की कीमतें आसमान छू रही हैं? माना की सरकार के बस की नहीं है जमाखोरों पर लगाम लगाना। क्‍योंकि इन्‍हीं के पैसे से तो वे चुनाव लड़ते हैं। लेकिन जमाखोर भी तो जनता के ही व्‍यक्ति हैं, क्‍या वे लोगों का निवाला छीनकर अपनी सुख की सेज सजाना चाहते हैं? हम सुबह उठने से लेकर रात सोने तक प्रतिपल स्‍वर्ग में जाने की इच्‍छा रखते हैं और जैसे भी बने पुण्‍यों का संचय करने का प्रयास करते हैं। जमाखोर कौन से पुण्‍यों का संचय कर रहे हैं? आम जनता से निवाला छीनकर ये जमाखोर मन्दिर बनवाते हैं, धर्मशालाएं बनवाते हैं। सारे ही संन्‍यासियों को दान देते हैं। राजनेता तो इनसे नहीं पूछते लेकिन संन्‍यासियों को तो इनसे पूछना ही चाहिए कि तुम जमाखोरी तो नहीं कर रहे हो? कहीं ऐसा न हो कि जनता ही इनके गोदामों को लूट ले और एक समग्र क्रांति का सूत्रपात इस देश में हो जाए। हम सब ब्‍लागरर्स को ऐसे जमाखोरों के प्रति निन्‍दा प्रस्‍ताव पारित करना चाहिए और जहाँ भी कोई परिचित हो उससे अवश्‍य पूछना चाहिए कि क्‍या तुम भी जमाखोरी कर रहे हो? आज सरकारें बेबस हैं लेकिन जनता को अब जागरूक होना पड़ेगा। वो ही देश फलता-फूलता है जहाँ की जनता जागरूक होती है।

Friday, January 15, 2010

सुकून आता जाएगा

अभी समीरलाल जी की पोस्‍ट आयी, "दूर हुए मुझसे वो मेरे अपने थे"। मन में कहीं उथल-पुथल सी हुई, रिश्‍तों को लेकर। मेरा यह आलेख समीर जी के लिए -
सुकून आता जाएगा

कई दिनों से मन में एक उद्वेग उथल पुथल मचा रहा है, लेकिन समझ नहीं आ रहा कि क्या है? तभी डॉक्टर पति के पास एक बीमार आया, उसे फूड पोइजनिंग हो गयी थी और वह लगातार उल्टियां कर रहा था। मुझे मेरी उथल पुथल भी समझ आ गयी। दिन रात मनुष्यता को समाप्त करने वाला जहर हम पीते हैं, शरीर और मन थोड़ा तो पचा लेता है लेकिन मात्रा अधिक होने पर फूड पोइजनिंग की तरह ही बाहर आने को बेचैन हो जाता है। मन से निकलने को बेचैन हो जाता है यह जहर। कुछ लोग गुस्सा करके इसे बाहर निकालते हैं, कुछ लोग झूठी हँसी हँसकर बाहर निकालने का प्रयास करते हैं और हम स्याही से खिलवाड़ करने वाले लोग स्याही को बिखेर कर अपनी उथल-पुथल को शान्त करते हैं। बच्चा जब अपने शब्द ढूंढ नहीं पाता तब वह स्याही की दवात ही उंडेल देता है। शब्द भी पेड़ों से झरे फूलों की तरह होते हैं, वे झरते हैं और सिमट कर एक कोने में एकत्र हो जाते हैं। अच्छा मकान मालिक उन्हें झोली में भरता है और अपने घर में सजा लेता है। लेखक भी शब्दों को अपनी स्याही के सहारे पुस्तकों में सजा देता है। जैसे ही कमरे में फूलों का गुलदस्ता सजा दिया जाता है स्वतः ही वातावरण सुगंधित हो जाता है। वहाँ फैली घुटन, सीलन झट से बाहर भाग जाती है। ऐसे ही जब हम शब्दों को मन में सजाते हैं उन्हें कोरे पन्नों में उतारते हैं तब मन की घुटन और ऊब पता नहीं कहां तिरोहित हो जाती हैं। जीवन फिर खिल उठता है।

आज एक कसक फिर उभर आयी। बचपन से ही मेरे पीछे पड़ी है, कभी भी छलांग लगाकर मेरे वजूद पर हावी हो जाती है। मैं नियति का देय मानकर सब कुछ स्वीकार कर चुकी हूँ लेकिन फिर भी यह कसक मेरे अंदर अमीबा की तरह अपनी जड़े जमाए बैठी है। जैसे ही अनुकूल वातावरण मिलता है यह भी अमीबा की तरह वापस सक्रिय हो जाती है। आदमी सपनों के सहारे जिंदगी निकाल देता है। बचपन में जब नन्हें हाथ प्रेमिल स्पर्श को ढूंढते थे तब एक सपना जन्म लेता था। हम बड़े होंगे अपनी दुनिया खुद बसाएंगे और फिर प्रेम नाम की ऑक्सीजन का हम निर्यात करेंगे। जिससे कोई भी रिश्ते में उत्पन्न हो रही कार्बन-डाय-आक्साइड का शिकार ना हो जाए। लेकिन यह कारखाना लगाना इतना आसान नहीं रहा। हवा इतनी दूषित हो चली थी कि आक्सीजन का निर्यात तो दूर स्वयं के लिए भी कम पड़ती थी। जैसे तैसे करके काम चलाते रहे। बच्चे बड़े होने लगे, तब फिर सपना देख लिया। सपने में देखने लगे कि अब तो प्राण वायु का पेड़ बड़ा होगा और हमें भरपूर वायु मिलेंगी। लेकिन क्या? हमने पेड़ बोना चाहा लेकिन बच्चे पंछी बन गए। वे हमारे पेड़ से उड़कर बर्फ की धवल चोटी पर बैठ गए। जहाँ उष्मा नहीं थी, थी केवल ठण्डक। हम फिर आक्सीजन के अभाव में तड़फड़ाने लगे। अब तो सपने भी साथ छोड़ने को आमादा हो गए। वे बोले कि तुम जिंदगी भर हमारा सहारा लेते रहे, तुमने सच करके कुछ भी नहीं दिखाया। हम भला तुम्हारा साथ कब तक देंगे? और एक दिन उन्होंने बहुत ही रुक्षता के साथ हम से कह दिया कि नहीं अब नहीं होगा, बाबा हमारा पीछा छोड़ो।

हमने भी जिद ठान ली कि देखें सपने कैसे नहीं आते? लेकिन सपनों ने नींद से दोस्ती कर ली। वे बोले सपने तभी देखोंगे ना, जब नींद आएगी? हम नींद को भी अपने साथ ले जाते हैं। हम फिर भी हताश नहीं हुए। हमने कहा कि कोई बात नहीं हम खुली आँखों से सपना देखेंगे। लेकिन इतना सुनते ही सपने फिर हँस दिए, वे बोले कि दिन में जब भी खुली आँखों से सपना देखने की कोशिश करोगे तो नींद झपकी बनकर उसे तोड़ देगी। अब तुम उस संन्यासी की तरह हो जिस का तप भंग करने के लिए अप्सरा जरूर आएगी। अतः भूल जाओ सपने और कठोर धरातल पर जीना सीखो। यहाँ रिश्तों में जहरीली हवा ज्यादा है और प्रेम की ताजगी से भरी प्राण वायु कम है। तुम ने जिस प्राण वायु का कारखाना लगाना चाहा था वह भी तुम्हारे लिए नहीं रहा। तुम्हें तो उसी जद्दो-जहेद में अपनी जिंदगी निकालनी है। यदि हिम्मत को बटोर सको तो फिर जुट जाओ। लेकिन इस बार ध्यान रखना कि सपनों की दुनिया बसाने का अब समय नहीं है, जो भी करना है ठोस धरातल पर खुली आँखों के सहारे करना है। रोज ही पीना है जहर और जब भी आत्मसात ना हो तब शब्दों के सहारे उन्हें उलट देना है। तुम्हारी बगियां की प्राण वायु शायद तुम्हारें लिए ना हो लेकिन उठो और खोजों शायद कहीं किसी की बगियां में थोड़ी प्राण वायु तुम्हारे लिए हो। विवेकानन्द की तरह हिम्मत मत हारो, जब तक प्रयत्न करते रहो जब तक कि मंजिल ना मिल जाए। बस शब्दों की निर्झरनी को बहाते रहो और अपने आप सुकून आता जाएगा, आता जाएगा बस आता जाएगा।

Tuesday, January 12, 2010

तीन लघुकथाएं

 रोटी और कुत्ते

झबरा कुत्ता आराम से सो रहा था। तभी कालू कुत्ता उसके पास आया और बोला कि अरे झबरे तू बड़े आराम से सो रहा है, अभी मालिक देखेंगे तो तुझे रोटी भी नहीं देंगे और दो लात भी लगाएँगे।
मैं अब उनकी रोटी पर नहीं पलता। मुझे उनकी चिन्ता भी नहीं। मुझे लात मारकर तो देखें, मैं उनकी टंगड़ी को ही चबा डालूँगा।
अरे भाई ऐसा क्या हो गया? मालिक तो बड़े भले हैं!
अरे कुछ नहीं, शहर के बहुत लोग रोज यहाँ घूमने आते हैं और हमें मुफ्त में ही रोटियां डालते हैं तो फिर हम काम क्यों करें?

 दुश्मन
यार सुधांशु! तुम इतने कठोर क्यों हो? अपने किसी भी कर्मचारी की पदोन्नति नहीं करते। पदोन्नति तो उनका अधिकार है। तुम्हारे कार्यालय में बेचारे तीन र्कचारी दस वर्ष से अपनी सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन वे अभी भी अस्थायी ही हैं। ये सारे ही निम्न वर्ग के लोग हैं। इनका भला करो, तुम्हें दुआएं देंगे।
हाँ राजेन्द्र तुम सत्य कहते हों। मैं अभी इस विभाग में दो वर्ष पूर्व ही आया हूँ और शायद एक वर्ष बाद मेरा स्थानान्तरण दूसरे विभाग में हो जाएगा। मैं पदोन्नति और स्थायीकरण करके किसी को भी अपना दुश्मन नहीं बनाना चाहता।


 अशिक्षित माँ
एक आत्मा एक दिन भगवान के सामने हाथ जोड़े खड़ी थी। भगवान मुझे माँ चाहिए। माँ के माध्यम से ही मैं शरीर धारण कर सकूंगा, धरती का उपभोग कर सकूंगा।
तथास्तु। भगवान ने कहा। लेकिन साथ ही एक प्रश्न भी कर दिया।
तुमको कैसी माँ चाहिए?
मेरे पास एक माँ है जो शिक्षित है और दूसरी है अशिक्षित।
शिक्षित तुम्हें ममता देगी, संस्कार देंगी, अच्छे, बुरे की समझ देगी।
अशिक्षित केवल ममता देगी। तुम जो भी मांगोंगे बस वो देगी।
अच्छा और बुरा सबकुछ उसकी ममता के सामने टिक नहीं पाएगा।
बोलो तुम्हें शिक्षित माँ चाहिए या अशिक्षित?
कलियुग की आत्मा बोली कि अशिक्षित।

Friday, January 1, 2010

एक कविता ब्‍लागर मित्रों के नाम

नये वर्ष पर आज फिर डायरी और कलेण्‍डर बदल गए, बस नहीं बदले तो ब्‍लागर मित्र। मेरी दीवारें और टेबल खुश है, क्‍योंकि उन पर कोई नया चित्र आने वाला है। लेकिन मैं खुश हूँ कि मेरे पास मेरे पुराने मित्र हैं।  नव वर्ष की शुभकामनाओं के साथ आप सभी के लिए एक कविता।


सूची एक बनायी मैंने
विगत वर्ष के दुष्ट जनों से
इक्का-दुक्का ही थे वे सब
आँचल भर गया मित्र जनों से।

आँसू कम औ खुशियाँ ज्यादा
दो औ दस का मेल बनाया
पलड़े में भारी थी खुशियाँ
आँसू तो बस बेचारे थे
आँखों में दिखते वे केवल
अन्तस भर गया सुधि जनों से।

कितने साँप निकल आए थे
आस्तीन को जब झाड़ा था
कितने अनदेखे मन ऐसे
जिनके पास फूलमाला थी
साँपों को अनदेखा कर के
अँजुरी भर गयी मिष्ट जनों से।

तीर धनुष भाला औ बरछी
दुश्मन में सारे दिखते थे
ढाई अक्षर प्रेम के देखे
सारे ओझल हो जाते थे
कलम प्रेम की मन के कागज
भर डालो तुम श्रेष्ठ जनों से।

खुशियाँ लाए समय नवान्तर
दुख को पीछे छोड़ निरन्तर
जग जाने दे प्रीत स्वयं की
काल रहेगा नूतन मनहर
सिंचित सकल प्रेम को लेकर
ज्योत जला ले इष्ट जनों से।

Saturday, December 12, 2009

डर कैसे बस गया जीवन में?

बचपन शहर से दूर रेत के समन्‍दर के बीच व्‍यतीत हुआ। साँप और बिच्‍छू जैसे जीव रोज के ही साथी थे। वे बेखौफ कभी भी घर में अतिथी बन जाते थे। लेकिन डर पास नहीं फटकता था। घर के आसपास रेत के टीले थे, रोज शाम को सहेलियों के साथ वहाँ जाकर टीलों के ऊपर बैठते थे। कभी-कभी तो किसी एक सहेली के साथ ही जाकर बैठ जाते थे, लेकिन डर नहीं लगता था। उस जमाने में मोपेड बाजार में आयी तो घर में भी भाई ने खरीदी। हम उनकी आँख बचाकर निकल जाते सूनी सुनसान सड़क पर। चारों तरफ रेत ही रेत और बीच में काली सड़क। लेकिन फिर भी डर नहीं लगता था। सायकिल से कॉलेज जाते, रास्‍ते में कोई बदमाश छेड़ देता तो सामने तनकर खड़े हो जाते, क्‍योंकि डर नहीं था।
ऐसे ही कितने ही प्रसंग हैं जीवन के, जहाँ जीवन बिंदास होकर जीया जाता था ना कि डर के साये में। डर तो बस एक ही था और वो था पिताजी का। उनका डण्‍डा कब खाने को मिले इसका कुछ भी निश्चित समय और घटना नहीं थी। अच्‍छी बात पर भी मार पड़ सकती थी तो बुरी बात पर भी। लेकिन आज के जीवन में जब परिवार में किसी का भी डर नहीं है तब बाहर की दुनिया में हर पल डर ने आ घेरा है। बच्‍चों को हल्‍का बुखार भी आ जाए तो न जाने कौन-कौन सी बीमारियों का डर आ घेरता है। बच्‍चे या अपने कोई छोटी सी यात्रा भी कर रहे हों, तब भी यात्रा पूर्ण होने तक डर ही समाया रहता है। घर सब तरफ से सुरक्षित हैं फिर भी डर बसा रहता है। सड़क पर डर, घर पर डर, मन में डर न जाने कितने प्रकार का डर हमारे अन्‍दर आ बसा है। क्‍या हमने अनुभव से डर ही कमाया है? बचपन में डर का अनुभव नहीं था इसलिए डर भी नहीं था या कुछ और बात थी? आपको भी नाना प्रकार के डर सताते होंगे, क्‍या हम इन सबसे मुक्‍त हो सकते हैं? किस कारण से यह डर हमारे जीवन में बस गया है?

Thursday, December 10, 2009

दिसम्‍बर में आएंगे घर-घर में राम

चौंकिए मत। राम को वनवास मिला और वे जिस दिन अयोध्‍या वापस लौटे, उस दिन दीपावली मनी। कौशल्‍या के दुलारे राम, या किसी माँ के लाड़ले बेटे का आगमन दीपावली ही तो मनाता है। भारत के लाखों माँओं के लाल आज विदेशों में हैं। विदेशों में दिसम्‍बर मास में ही छुट्टियों का योग सर्वाधिक बनता है तो सारे ही लाड़ले इसी मास अपने घर आते हैं। इसलिए हम सभी के राम और लक्ष्‍मण सीता के साथ दिसम्‍बर में ही तो आ रहे हैं।
घर-घर में सफाई हो रही है, पकवान बन रहे हैं। दीपावली पर पटाखे नहीं चलाए गए थे, उन्‍हें बचाकर रखा गया है, उनको निकाल लिया गया है। शायद दीपक तो नहीं जलें लेकिन अब हर कमरे की बत्तियां रोशन होंगी। महिनों से जो कमरे बन्‍द पड़े थे उनकी सीलन भी भाग जाएगी, वहाँ ताजी हवा का झोंका जो आने वाला है। माँ नौकर-नौकरानियों को आदेश देती घूम रही है कि देखो इन दिनों में कोई छुट्टी नहीं मिलेगी। सभी को काम मन लगाकर करना है। जब भैया चले जाएंगे तब ईनाम भी मिलेगा।
फोन पर बातें हो रही हैं कि बेटा क्‍या-क्‍या बनाऊँ? पोता भी तो आ रहा है। उसे क्‍या पसन्‍द है? वह भारतीय खाना पसन्‍द करेगा? क्‍या कहा, उसे लड्डू पसन्‍द हैं, अच्‍छा बस आज ही बनाकर रखती हूँ। मैंने गाजर का हलुवा भी बना लिया है और मठरियां भी। एक लिस्‍ट तुम्‍हारे पापा को भी थमा दी है कि घर में सारा ही सामान होना चाहिए। दूध वाले को भी कह दिया है कि अब से ज्‍यादा और अच्‍छा दूध देना। लेकिन यह क्‍या, उसने तो आज ही ढेर सारा दूध ला दिया। पतिदेव से कहा कि आज ही क्‍यों ले लिया इतना दूध? वे बोले कि अरे तुम्‍हे हलुवा बनाना है ना।
पिता भी बहुत खुश हैं। बेचारी माँ कह-कहकर थक गयी कि गाड़ी का टेप पुराना हो गया है, इसमें नया लगवाओ। लेकिन खर्चे का बहाना करके ऐसी विलासिता की बाते टल ही जाती हैं। लेकिन यह क्‍या तीन दिन से गाड़ी गेराज में हैं, जितनी भी टूट-फूट है वह दुरस्‍त हो रही है। वह तो जायज है लेकिन आज फिर दिन में बिना खाना खाए ही पिताजी गायब हो गए। आकर बताया कि देखो नया सोनी का टेप लगवा कर आ रहा हूँ गाड़ी में। अब तुम देख लो कुछ और कमी तो नहीं है। माँ आश्‍चर्य से देख रही है परिवर्तन। सैकड़ों का हिसाब रखने वाले आज हजारों की भी पर्वाह नहीं कर रहे।
ऐसे ही तो नहीं मनी थी दीपावली? अपने जिगर का टुकड़ा जब पोते के साथ घर आता है तब उसका आना सच में दीपावली बन जाता है। इस दिसम्‍बर में सारी ही फ्‍लाइट भरी हुई हैं। दाम आसमान छू रहे हैं। क्‍योंकि हर घर में राम आ रहे हैं। रिश्‍तेदारों को भी उत्‍साह है, वो भी कह रहे हैं कि अब तो तभी आएंगे, जब बेटा आएगा। ये पंद्रह दिन का त्‍योहार घरों में साल में एक बार या दो साल में एकबार आता है, फिर वहीं अमावस। बस नेट पर बातें, फोन पर बातें ही रह जाती हैं। बहुत लम्‍बी पोस्‍ट हो गयी है। मुझे भी तो तैयारी करनी है, बेटे, पोते और बहु का स्‍वागत करना है। शायद अब ब्‍लोगिंग की दुनिया कुछ पीछे छूट जाए। लेकिन हम तो बारहों महिने ही साथ है ना? चलिए शायद आपके घर भी राम आ रहे हों। सभी को बधाई।