हम अक्सर अपनी छुट्टिया बिताने पर्वतीय क्षेत्रों पर जाते हैं। ऊँचे-ऊँचे पहाड़, घने जंगलों की श्रृंखला, कलकल बहती नदी और झरने, मौसम में ठण्डक। लगता है समय यही ठहर जाए और इस प्रकृति का हम भरपूर आनन्द लें। ऐसे मनोरम स्थान पर ही रहने का मन करने लगता है। गहरे जंगल के अन्दर प्रवेश करोंगे तो कभी हिरण, कभी खरगोश तो कभी सर्पराज आपको मिल ही जाएंगे। राजस्थान को रेगिस्तान भी कहा जाता रहा है। लेकिन इसके विपरीत एक क्षेत्र है मेवाड़, यहाँ भरपूर जंगल, पहाड़, नदियां हैं। विश्व की प्राचीन अरावली पर्वत श्रृंखला भी यहीं है। उदयपुर के समीप वनांचल है, बस कुछ किलोमीटर ही चले और जंगल प्रारम्भ होने लगते हैं। वही पर्वत, संकरी और घुमावदार सड़के, कलकल करती नदी(अधिकतर वर्षाकाल में), अनेक वृक्षों की भरमार। कहीं पीपल हैं, कहीं बरगद है तो कहीं पलाश और कहीं सागवान। हर ॠतु में कोई न कोई वृक्ष फल-फूल रहा होता है। कभी महुवा महकता है तो कभी नीम बौराता है। कभी पलाश खिलता है तो कभी सागवान फूलों से भरा रहता है। एक मदभरी गंध वातावरण को बौराती रहती है। महुवा जब फूलता है तब उसके नीचे चादर तान कर लेट जाइए, खुमारी सी छा जाएगी। पलाश जब फूलता है तब लगता है कि जंगल के सीने में किसी ने अपने सौंदर्य से आग लगा दी है। सुबह और शाम को चहचहाते पक्षी, आपको संगीत का रसपान करा देते हैं।
लेकिन इससे परे एक और दृश्य है, गरीबी का, अज्ञानता का। वहाँ के वासी अज्ञानता के साथ रह रहे हैं और स्वयं के विकास के प्रति विचारशून्य। अंग्रेजों के आने के पूर्व तक इनके कबीले थे, ये जंगल के राजा थे। इनकी वेशभूषा आकर्षक थी। गहनों के रूप में पत्थरों और विभिन्न धातुओं का भरपूर प्रयोग करते थे। पशुपालन और खेती आजीविका के मुख्य साधन थे। शिक्षा का महत्व ना ये जानते थे और ना ही इन्हें इसकी आवश्यकता थी। पूर्ण स्वतन्त्रता के साथ जीवन यापन करते थे यहाँ के वासी। लेकिन अंग्रेजों ने जंगल पर सरकार का अधिकार घोषित कर दिया और ये राजा से रंक बन गए। बस तभी से इनकी दुर्दशा के दिन प्रारम्भ हो गए। सोचा था कि आजादी के बाद भारत का विकास गाँव से शहर की ओर होगा लेकिन हमने विकास का आधार शहर को बनाया। परिणाम स्वरूप गाँव उजड़ते चले गए। जहाँ के पहाड़ों से झरने फूटते थे और नदियों से होकर पानी कलकल करता बारहों मास बहता था, अब वही पानी शहरों की ओर जाने लगा। वनांचलवासी पानी को तरसने लगे। उनके कुएं सूख गए, नदियां नालों में तब्दील हो गयी। शहर की आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए जंगलों का अंधा-धुंध दोहन किया गया, परिणामत: घने जंगलों का स्थान वीरानों ने ले लिया।
अब सरकार और समाज को समझ आने लगा है कि हमें इन क्षेत्रों के विकास के लिए कुछ करना चाहिए। करोड़ों रूपए पानी की तरह बहाए गए लेकिन जैसे वनांचल का पानी शहर की ओर आ रहा है वैसे ही यहाँ से बहकर आता हुआ रूपया भी शहर के अधिकारियों और राजनेताओं रूपी समुद्र में आ मिला। विकास के रूप में सड़के, स्कूल, अस्पताल दिखने लगे हैं लेकिन वनांचलवासी की मनोदशा नहीं बदली। वह आज भी गरीबी में दिन गुजार रहा है।
इतने मनोरम स्थलों पर गरीबी देखकर लगता है कि स्वर्ग में गरीबी छा गयी है। क्या हम इन स्थलों को पर्यटकीय दृष्टिकोण से विकसित नहीं कर सकते? अमेरिका के जंगलों को देखने का अवसर मिला। उन्हें मैंने अच्छी प्रकार से समझा कि वहाँ और हमारे जंगलों में क्या अन्तर है। हमारे जंगल कुछ किलोमीटर जाकर ही समाप्त हो जाते हैं लेकिन वहाँ कभी न समाप्त होने वाले जंगल दिखायी देते हैं। मैं उन जंगलों की सघनता से मुग्ध होकर शाम की वेला में पक्षियों का इन्तजार कर रही थी लेकिन पक्षी नहीं आए! आश्चर्य का विषय था। हमारे यहाँ तो एक वृक्ष पर ही इतने पक्षी होते हैं कि उनके कलरव की गूंज से चारो दिशायें गूंज जाती है। निगाहें कुछ और खोजने लगी, कहीं फल नहीं थे और कहीं फूल नहीं खिला था। जब फल-फूल ही नहीं थे तो सुगन्ध तो कहाँ से होगी? केवल एक ही वृक्ष की उपस्थिति सर्वत्र देखी। ना पलाश था, ना बरगद था, ना पीपल था, ना गूलर था, ना नीम था। कुछ भी नहीं था। लेकिन पर्यटकीय आकर्षण कितना अधिक था कि विश्व के सारे ही पर्यटक खिंचे चले आते हैं। क्या हम हमारे जंगलों को जो विविधता से भरे हैं, जो महक रहे हैं, जो फल और फूल रहे हैं उनकी सुगंध से दुनिया को अवगत नहीं करा सकते? जंगलों का पर्यटन बढे़गा और हमारे वनांचलवासी का हौसला भी लौट आएगा। उसकी वेशभूषा जो कभी सतरंगी थी, जिसमें गहनों की भरमार थी, क्या पुन: लौटायी नहीं जा सकती? इतनी सुन्दरता भरी हुई हैं हमारे जंगलों में कि कोई भी यहाँ आकर बौरा जाए फिर हमने क्यों इन्हें उपेक्षित छोड़ रखा है? एक ऐसा संसार यहाँ बसा है, जिसकी कल्पना शायद युवापीढ़ी को नहीं है। वह शहरों में जीवन का उल्लास तलाश रहा है, उसने कभी प्रकृति का आनन्द देखा ही नहीं।
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| एक छोटा सा गाँव जहाँ आज एक उत्सव है |
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| वनांचल की एक बालिका |
मैंने इसी शनिवार को अर्थात् 1 अक्टूबर को ही ऐसे क्षेत्र की यात्रा की थी। पूर्व में भी कई बार जाती रही हूँ। लेकिन वर्षा के बाद जाने का आनन्द तो अनूठा होता है। धरती ने हरियाली ओढ़ी होती है और पहाड़ नर्तन कर रहे होते हैं। झरने खुशी से झूम रहे होते हैं। एक अन्तिम बात और, पहाड़ी स्थलों पर और उदयपुर के समीप सीताफल प्रचुरता से होता है। इन दिनों सीताफल ही सीताफल दिखायी देता है। हम जिस गाँव में गए थे, वहाँ के मन्दिर में भी सीताफल का पेड़ लगा था। हमारे साथ एक नवयुवती भी थी जिसने शायद पहले कभी सीताफल नहीं देखा था। उसका कौतुक इस फल के प्रति बहुत था। मैंने कहा अभी पंद्रह दिन में पक जाएंगे, लेकिन उसने कच्चे ही तोड़े और कहा कि इन्हें ही अपने साथ लेकर जाऊँगी। आप लोग भी कभी वनाचंलों का आनन्द ले और भारत कितना प्रकृति से सम्पन्न है इसकी जानकारी यहाँ आकर लें। तब आप विदेश यात्राओं को भूल जाएंगे। आप भी खुश हो जाएंगे और आपके कारण यहाँ का वनांचलवासी भी सम्पन्न हो सकेगा।

