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Saturday, December 11, 2010

व्यंग्य - सतयुग का आगमन अर्थात कलियुग का अन्‍त - अजित गुप्‍ता

बड़े-बूढे़ कहते हैं कि कलियुग चल रहा है। लेकिन मुझे लगने लगा है कि हम सतयुग की दहलीज पर खड़े हैं। आपको विश्वास नहीं होता न? कैसे होगा? जब चारों तरफ घनी अँधेरी रात हो, तब कोई खिली-खिली सुबह की बात कैसे कर सकता है? बस हमारे देखने और समझने का यही अन्तर है। जैसे घर और सरकार दोनों में ही नारियों का राज कायम है लेकिन पुरुष अपने आपको ही सरदार मानकर चलते हैं। हम सब जानते हैं कि रात के बाद ही सुबह होती है। इसलिए मैं कहती हूँ कि सतयुग आने वाला है। अभी कलयुग की पराकाष्ठा है इसलिए अंधकार समाप्ति की ओर है। मेरी इस बात से  आप भी सहमत होंगे कि हजारों-लाखों वर्षों से मनुष्य इन्द्रिय निग्रह के प्रयास कर रहा है। लेकिन प्रयोग सफल होता नहीं। जिस युग में इन्द्रिय निग्रह नहीं हो सके वह कलियुग और जब हो जाए वही सतयुग। आपको मैं रोड शो के माध्यम से समझाने का प्रयास करती हूँ, क्योंकि आज राजनेता से भी जनता भाषण की मांग नहीं करती, बस उसके रोड-शो से ही खुश हो जाती है तो आप एक दृश्य देखिए, विश्वामित्र तपस्या में लीन हैं, उन्हें लग रहा है कि मैंने ज्ञान प्राप्ति कर ली है और मेरी इन्द्रियां अब मेरे वश में हैं, तभी स्वर्ग से मेनका उतरती है और अपने नृत्य प्रदर्शन से विश्वामित्र की तपस्या भंग कर देती है। वर्षों की तपस्या, एक अप्सरा ने क्षण भर में भंग कर दी! नारी के दो ठुमके भी तपस्वी पुरुष बर्दास्त नहीं कर पाए तो इसका अर्थ हुआ कि उस काल का मनुष्य आत्मबल क्षीण था। राम-राम घोर कलियुग।
काल आगे बढ़ा, ऋषि-मुनियों की तपस्या-परम्परा समाप्त हुई। शायद समाप्त भी इसलिए हुई कि कभी मेनका और कभी उर्वशी, तपस्वियों की तपस्या भंग करने में सफल हो जाती थी। लोगों ने सोचा कि अब गृहस्थ ही रहा जाए। अनावश्यक तपस्या का बोझ, ईमानदारी के भूत की तरह लोगों के मन से उतर गया और एक नए सत्य का आगमन हुआ। गृहस्थी में रहने से स्वतः ही इन्द्रियनिग्रह हो जाता है। पत्नी के साथ लगातार वर्षों तक रहने से व्यक्ति पर सवार कामदेव वैसे ही भाग छूटता है जैसे बिल्ली को देखकर चूहा। उसे चाँद सा मुख - जेठ का सूर्य, बलखाती मनीप्लांट सी जुल्फे - निरीह पेड़ पर चढ़ी अमरबेल सी लगने लगती हैं। लेकिन फिर भी कुछ लोगों ने संन्यास की परम्परा को जीवित रखा और जंगलों के स्थान पर मठों और मंदिरों में जाकर बैठ गए। इसका भी कारण था कि अब तपस्या के लिए वन में तो नहीं जाना था, अपितु घर के जंजाल से मुक्त होकर आनन्द से जीवन व्यतीत करना था। संन्यासी भी कहलाएं और समस्त भौतिक सुख भी उपलब्ध हों! इस कारण उनकी तपस्या में वह कशिश नहीं थी कि कोई अप्सरा उतर कर आए और उनका तप भंग कर सके। क्योंकि मठों और मंदिरों में तो वैसे ही देवदासियां और बाल विधवाएं रहती थी तो उनके तप भंग करने के लिए इंद्रदेव को कोशिश नहीं करनी पड़ती थी। न ही इंद्र का सिंहासन डोलता था, क्योंकि उनसे उसे कोई खतरा जो नहीं था। इन्द्र भी अब बार-बार धरती पर नहीं आता था, क्योंकि यहाँ के इन्द्रों ने राजनीति में दक्षता प्राप्त कर ली थी। खैर, धीरे-धीरे समय के साथ स्वर्ग के द्वार बंद होने लगे अब केवल वन वे ट्रेफिक ही स्वर्ग के लिए था, अर्थात पृथ्वी से लोग जा तो सकते थे लेकिन स्वर्ग से अप्सराएं आ नहीं सकती थी। अतः पृथ्वी से अप्सरा परम्परा का समापन हो गया।
चलचित्र की दुनिया प्रारम्भ हुई। स्वर्ग की अप्सराओं का ठेका समाप्त हुआ और न्यूनतम दरों के टेण्डर के कारण पृथ्वी की अप्सराओं को ही कार्य मिल गया। अब उन्होंने ही नृत्य कर पुरुषों को रिझाने का कार्य प्रारम्भ किया। ऋषियों की परम्परा भी शेष नहीं थी, तो आम व्यक्ति को यह सुविधा उपलब्ध होने लगी। वैसे भी सामन्तशाही समाप्त होकर आम व्यक्ति का राज आ गया था। फिल्मों के माध्यम से यह अपरोक्ष दर्शनीय सुविधा सभी को उपलब्ध करायी गयी। प्रत्यक्ष रूप से एवं स्पर्श के लिए अप्सराएं नायकों के लिए थीं। अप्सरा रूपी नायिका बुरका पहनकर, हाथ में किताबें लेकर, सड़क पर चली जा रही है, सामने से नायक अपने ख्यालों में खोया हुआ, बेसुध-सा चला आ रहा है। परिणाम - टक्कर। किताबें बेतरतीब सी सड़क पर। नायक किताबों को कम और बुरके से झांकती नायिका की आँखों को समेटने में लग जाता है। पहले मेनका को कितना नृत्य करना पड़ा था, तब कहीं जाकर कामदेव उपस्थित हुए थे और अब पलकों के झुकने-मुंदने से ही नायक के दिल में तीर उतर जाता है। तब घोर कलयुग था, राम! राम! लेकिन अब सतयुग आने लगा था। चलचित्र की यात्रा आगे बढ़ी। तंग सलवार सूट से लेकर जीन्स, स्कर्ट तक जा पहुँची। नायक और नायिकाओं के माध्यम से जनता, धीरे-धीरे कमनीयता से अभ्यस्त होने लगी। अब पाकीजा के राजकुमार की तरह केवल पाँव की एड़ी देखकर ही फिदा होना सम्भव नहीं था। अब तो पूरी खुली टांगे भी कामदेव को आमन्त्रित नहीं कर पाती थी।
राजकपूर जैसे शो मैन ने फिल्मी दुनिया में अपने जलवे बिखेरने प्रारम्भ किए और सत्यम्-शिवम्-सुंदरम्से लेकर राम तेरी गंगा मैली हो गयीजैसी धार्मिक नामों वाली फिल्मों में अप्सराओं को उतारने का प्रयास किया गया। दर्शकों की निगाहें अब आँखों और ऐड़ी से आगे बढ़ीं। अब उनकी आँखें अप्सरा के शरीर के और करीब पहुँच चुकी थीं। नारी को जानने और पाने की ललक के वे बहुत करीब पहुँच गए थे। अर्थात ज्ञान प्राप्ति के काफी नजदीक था आम दर्शक। इन्द्रिय भी वश में होने लगी थी। जहाँ राजेन्द्र कुमार, बुरके से झांकती आँखों से ही घायल हो गए थे और राजकुमार साड़ी से बाहर निकलती पैरों की एड़ियों से ही दिल गँवा चुके थे, वहीं अब टोप लेस, बेक लेस, तक का जमाना आ चुका था और नारी शरीर को देखने की आदत बन चुकी थी। फिर इन्द्रियों को वश में करने का नुस्खा फिल्मों से दूरदर्शन ने भी ले लिया। अब तो घर-घर में विश्वामित्र की तपस्याएँ होने लगी। जब भी कामदेव आते, व्यक्ति दूरदर्शन खोलकर उनका स्वागत करते और धीरे-धीरे उनसे पीछा छुड़ाने में अभ्यस्त होते गए।
फिर आया, रीमिक्स का जमाना। इसी जमाने से हुई सतयुग की शुरुआत। रीमिक्स गानों की अप्सराएँ इस तरह से उछल-कूद करती हैं जैसे रावण के दरबार की राक्षसियाँ। बेचारे व्यक्ति के दिल और दिमाग से अप्सराओं का भूत पूरी तरह से उतर गया और उनकी जगह सूर्पणखा ने ले ली। काफी हद तक जनता का इन्द्रिय वशीकरण यज्ञ सफल हुआ। लेकिन फिर भी यदा-कदा कामदेव का बाण चल ही जाता। अभी हाल ही में सूर्पणखा जैसी अप्सरा ने एक गायक कलाकार का तेज भंग करने का प्रयास किया और वह उसमें सफल भी हुई। जैसे ही गायक पर बाणों की बोछार हुई, साक्षात कामदेव उसके होठों पर आकर बिराजमान हो गए। एक जमाने में लक्ष्मणजी ने सूर्पणखा की ऐसी धृष्टता पर नाक काट दी थी लेकिन आज परिस्थितियां बदल गयी थी। गायक ने तत्काल बाण का प्रत्युत्तर, और भी तीक्ष्ण बाण से दे दिया था। फिर गायक लक्ष्मण भी नहीं था, वैसे वह भी छोटा भाई ही था लेकिन अब कहाँ हैं, राम और लक्ष्मण की परम्परा? सूर्पणखा को ऐसा प्रत्युत्तर नागवार गुजरा और उसने पुलिस रूपी रावण के दरबार में दस्तक दे दी। रावण बोला कि जब लक्ष्मण तुम्हारे बाणों से विचलित नहीं हुआ था और उसने तुम्हारी नाक काट ली थी, तब तुम आहत हुईं थी, लेकिन आज, जब एक बेचारा प्राणी, तुम्हारे बाणों से घायल होकर, तुम्हें बाहुपाश में जकड़कर तुम्हारा विष पी लेता है, तब तुम क्यों विचलित होती हो? सूर्पणखा बोली कि मुझे इससे आपत्ति नहीं, बस आपत्ति है, तो परम्परा के निर्वहन की। विश्वामित्र ने मेनका से विवाह किया था, तो मेरे भी प्रेम निवेदन पर उसे दयालुता के साथ, विवाह का प्रस्ताव रखना चाहिए था। जिसे में मौल-भाव करते हुए स्वीकार करती, या नहीं भी करती। सार्वजनिक रूप से प्रत्युत्तर देने से हम सूर्पणखाओं की परम्परा पर आघात हुआ है। इस सारे वाद-विवाद के कारण और गायक की दुर्दशा देखकर सारे ही दर्शकों ने सबक लिया। उन्हें फिर ज्ञान प्राप्ति हुई कि सूर्पणखा की बात मानो तब भी खतरा है। मनुष्य अपनी इन्द्रियनिग्रह में एक कदम और आगे बढ़ गया।
आज चल-चित्र ही नहीं दूरदर्शन और आम सड़क पर चलती टापलेस, बेकलेस, मिनी स्कर्ट वाली अप्सराएँ आँखों को अभ्यस्त हो चली हैं। अब वे दिन लद गए जब मेनका ने नृत्य किया और विश्वामित्र की तपस्या भंग हो गयी। यह ही कलयुग कहलाता था। सतयुग में कामदेव कम सक्रिय होते हैं, वे अप्सराओं के नर्तन या अल्प वस्त्रों से डगमगाते नहीं हैं। अब तो लगने लगा है कि कामदेव कहीं चरित्र की भांति कथनीय पुराण ही नहीं रह जाए। आज ऐसी अप्सराओं के कारण या सूर्पणखाओं के कारण व्यक्ति के मन का कामदेव शांत हो चला है, अतः सतयुग का आगमन होने लगा है। अब तो तपस्या के लिए जंगल में जाने की आवश्यकता नहीं, बस दूरदर्शन खोलकर बैठिए और तपस्या कर लीजिए। प्रात-काल रामदेवजी जैसे प्राणायाम के द्वारा शरीर को शुद्ध करा रहे हैं वैसे ही सायंकालीन सभा में मनुष्यों के मन को शुद्ध किया जा रहा है। धीरे-धीरे मनुष्य का मन दृढ़ होने लगा है, बहुत जल्दी विचलित नहीं होता। ऐसे लगने लगा है कि मनुष्य की स्थिरप्रज्ञता बढ़ी है। हम सब चल-चित्र निर्माताओं और दूरदर्शन के कलाकारों के आभारी हैं, जिन्होंने स्त्री-पुरुष के बीच समता भाव का निर्माण किया। हम इसलिए भी खुश हैं कि हमारे जीते जी, हम सतयुग देखने की ओर बढ़ रहे हैं। मेरी इस ठोस दलील के बाद तो आप मानेंगे न कि सतयुग आ रहा है। जैसे-जैसे हम प्रकृति के करीब पहुँचेंगे, वैसे-वैसे हम सतयुग के करीब पहुँचते जाएंगे। इसलिए इस सूर्पणखा युग को आप धन्यवाद दीजिए और बढ़ जाइए सतयुग की ओर। 
हम गुलेलची - व्‍यंग्‍य संग्रह - अजित गुप्‍ता

Sunday, November 28, 2010

दुख के सब साथी सुख में ना कोय - अजित गुप्‍ता


      सुख के सब साथी, दुख में ना कोययह कहावत जिसने भी ईजाद की होगी तब शायद यह कहावत चरितार्थ होती होगी। लेकिन आज के युग में यह कहावत मेरी समझ से परे है। मुझे तो हर ओर दुख के सब साथी सुख में ना कोय ही नजर आता है। फिर सुख और दुख का अर्थ भी व्यापक है जो आपके लिए सुख है वही दूसरे के लिए दुख बन जाता है। बचपन में जब पिताजी की मार पड़ती थी तब हम दुखी होते थे और पिताजी सुखी। तब हमारे भाई लोग हमारे दुख के आँसू पोछने आते और जिस दिन हमें डाँट भी नहीं पड़ती तो वे आँसू नहीं पोछने के दुख से दुखी होकर हमारी डाँट का बंदोबस्त करते थे। जब हम सायकिल पर सवार होकर कॉलेज जाते और कोई मनचला हमें छेड़ता तो रास्ते वाले हमारे दुख से दुखी होकर हमारे पास सांत्वना के लिए आ जाते। जिस दिन हम उस मनचले के जूते मारकर सुखी होते तब कोई भी हमारे पास नहीं होता उल्टे वे सब उस मनचले के आँसू पोछ रहे होते।
      नौकरी में जब अफसर ने हमको खेद पत्र पकड़ाया तो सारे मित्रगण अफसोस जताने को आए और जिस दिन पदोन्नति के कागज मिले उस दिन कोई भी बधाई देने नहीं आया और शर्म लिहाज के मारे आ भी गए तो वही दुख प्रगट करने वाले शब्दों का ही सहारा लिया गया। अरे आपका प्रमोशन हुआ अब आपको घर से बाहर अधिक रहना पड़ेगा तो आपके पति और बच्चे तो बेचारे कैसे रह पाएंगे?’ एक दिन सोचा चलो नौकरी छोड़कर घर का सुख ही ले लिया जाए और जो बेचारे हमारे नौकरी करने से यह कहकर दुखी थे कि आपके घरवाले तो कैसे सुखी रहते होंगे, तो हमने उनका दुख हलका करने के लिए नौकरी छोड़ दी। जैसे उठावणे में लोग आते है दुख प्रगट करने वैसे ही लोग चले आए। अरे आपने नौकरी छोड़ दी, अच्छी भली नौकरी को भला कोई इस तरह छोड़ता है? फिर धीरे से कान के पास मुँह ले जाकर पूछा कि कोई परेशानी थी क्या और थी तो हमसे कहते। भई हमें तो बहुत दुख हुआ सुनकर जो चले आए। मैंने कहा कि आपको दुखी होने की कतई आवश्यकता नहीं मैंने नौकरी सुख लेने के लिए छोड़ी है। मैं बहुत सुखी अनुभव कर रही हूँ। मेरे सुख का नाम सुनना था कि वह उठकर चले गए जैसे मरे की खबर सुनकर आए हों और मुर्दा जिन्दा हो जाए तो कहना पड़े अरे बेकार ही समय बर्बाद हुआ।
      हम लेखक ठहरे और उस पर तुर्रा सामाजिक कार्यकर्ता का। जैसे करेला और नीम चढ़ा। लेखक भी क्या है लिखता गम के फसाने है और सुनाता हँसके है। लेखक के फटे हाल को देखकर कोई दया करके उसकी रचना पर कुछ बख्शीश दे देते हैं। लेकिन यदि वह सुखी दिखता है तो उसे कोई लेखक ही मानने को तैयार नहीं होता। सामाजिक कार्यकर्ता की भी ऐसी ही नियति है। यदि झोला लटकाए टूटी सायकिल पे चप्पल घिसटते हुए आपको कोई मिल जाए तो तुरन्त आपकी सहानुभूति उसके साथ होगी। लेकिन यदि कोई पढ़ा लिखा मुझ जैसा व्यक्ति समाज का कार्य करे तो लोग मुँह फेर लेते हैं। आजकल समाज का दुख दूर करने का भी फैशन चल निकला है। एक दिन भरी सर्दी में हमारे एक मित्र बोले कि चलो ऐसे सर्दी में बेचारे जो बिना कम्बल के सो रहे हैं उनको कम्बल बांट आएं। थोड़ा पुण्य कमा आएं। मैंने कहा कि किसे कम्बल बाँटोंगे? उन्होंने कहा कि कैसे सामाजिक कार्यकर्ता हो, तुम्हे दिखायी नहीं देता रात को फुटपाथ के किनारे बेचारे भिखारी सर्द में ठिठुर रहे हैं उन्हें ही देंगे। मैंने कहा वे तो व्यापारी हैं उनका भीख मांगना धंधा है वह बेचारे कैसे हो गए? फिर भी दुख में शामिल होने का उनका जोश कम नहीं हुआ और भरी ठण्ड में मुझे ले जाकर ही दम लिया। पूरे शहर के चक्कर काटकर पचासों सोए हुए लोगों के ऊपर कम्बल डालकर हम आ गए। वे भी किसी के दुख मंे शरीक हो कर तृप्त होकर सो गए। मैंने दूसरे दिन उनसे कहा कि उनके दुख को तो देख आए अब क्या उनके सुख को देखने नहीं चलोंगे? सर्द रात को फुटपाथ पर तुम्हारे कम्बल के सहारे सुख से सोते हुए लोगों का सुख क्या नहीं देखोंगे? उन्हें लगा कि चलो यह भी देख लिया जाए। वे दूसरी रात को हमारे साथ चल दिए। देखने के बाद वे दुखी हो गए और हम उनके दुख में शरीक होकर सुखी हो गए। एक भी भिखारी के तन पर कम्बल नहीं था। गुस्से में आगबबूला होकर उन्होंने एक को झिंझोड़कर उठाया और कहा कि कम्बल कहाँ है? कौन से कम्बल, पहले तो वह अनजान बना फिर कहने लगा कि अच्छा आपने ही रात को हमारे ऊपर डाला था क्या? वह तो हमने बेच दिया। भाईसाहब क्यों हमें दुखी करते हो हमें तो ऐसे ही रात गुजारने की आदत हैं। भीख मांगना हमारा पेशा है दिन में हाथ पसारते हैं और रात को भरी ठण्ड में खुली छत के नीचे सोकर मजबूत बनते हैं। बेचारे हमारे मित्र उनके सुख को देखकर दुखी हो गए और चुपचाप आकर सो गए।
      अब अपनी बात कहती हूँ कि जब मन का सुख लेने के लिए हम पति-पत्नी जोर शोर से लड़ते हैं और हमारी आवाजे खिड़कियों से पार हमारे पड़ोसी सुनते हैं तब झट से कोई ना कोई पड़ोसी आ जाता है। हमें समझाता है और हमारे दुख में दुखी होकर अपार सुख पाता है। लेकिन जब कभी भूले भटके से पतिदेव हमारी मान मनौवल कर रहे होते हैं और हमारे पड़ोसी की हम पर नजर पड़ जाती है, पड़ौसी की नजर तो हमारे हर काम पर ही रहती है इसलिए ऐसे मौके पर भी पड़ना लाजमी है, तब पड़ोसी गुस्से से अपनी खिड़की का पर्दा खींच लेते हैं और बुरा मुँह बनाकर कहते हैं कि अपने प्रेम का ढिंढोरा पीट रहे हैं कल ही तो लड़ रहे थे और देखो आज कैसे चोंचले कर रहे हैं।
      तो भाईसाहब आप ही बताइए कि लोग आपके दुख में कितने दुखी है और कितने आपके सुख को देखकर आपके साथ होते हैं? आप किस भ्रम में जीते हैं? आप यदि दुखी हैं तो चाहे कोई मित्र हो या शत्रु आपके आँसू पोछने चला आएगा और यदि आप सुखी हैं तो फिर चिड़ी का बच्चा भी पंख नहीं मारेगा। एक हमारी मित्र हैं, मित्र इसलिए कह रही हूँ कि हमारे दुख में वे सदैव दुख प्रकट करने आ ही जाती हैं और जब आ नहीं पाती तो फोन अवश्य कर देती हैं। उनमें इतना दुखों के प्रति संवेदना का भाव है कि वे केवल दुख के समय ही उपस्थित होती हैं। यदि आप भूले से सुखी हो जाए तो वे प्राणपण से दुख के स्रोत ढूंढने में लग जाती हैं। आपका सुख उन्हें फूटी आँख नहीं सुहाता और आपके सुख में वे बराबर की दूरी बनाकर रखती हैं। बस उनका मन हमेशा सहारा देने के लिए ही लालायित रहता है। एक दिन हमारे चोट लग गयी, कहीं से उनको भी खबर लगी। उन्होंने सांत्वना का कोई मौका नहीं छोड़ा था तो आज कैसे छोड़ती, तुरन्त फोन किया और हालचाल पूछा। मैंने कहा कि आपका इतने दिनों बाद फोन आने का कारण? उन्होंने कहा कि बहुत दिनों बाद मौका मिला, इसलिए फोन किया वरना आप तो मौका ही नहीं देतीं।
      मेरे जैसे उदाहरण आपके जीवन में भी बिखरे पड़े होंगे। मेरी बात पर यदि गौर कर सको तो करना वैसे मेरा क्या है एक लेखक हूँ, जिसका कोई वजूद नहीं होता। बेचारा लेखक तो वह प्राणी है जिसके पास ना कोई दुख देखकर आता है और ना कोई सुख देखकर। क्योंकि वह बेवकूफ किस्म का व्यक्ति दुख में भी सुख ढूंढ लेता है। रुदन में भी हास्य ढूंढ लेता है तो फिर ऐसे सिरफिरों के पास भला कोई सांत्वना देने भी क्यों आए। आप तो बस दुख में शरीक होकर कहावत को झूठा सिद्ध करते रहिए और देश के संवेदना वाले नागरिक बनने का सौभाग्य पाइए। किसी को भी सुखी देखें तो उसे दुखी करने का मौका जरूर तलाशे। तभी आप इस देश के महान नागरिक बन पाएंगे।
व्‍यंग्‍य संग्रह - हम गुलेलची - लेखक- अजित गुप्‍ता