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Friday, October 1, 2010

गाँव में भी अभिजात्‍य बनने का शौक और खुलना प्राइवेट स्‍कूल का




आप सभी ने ग्रामीण परिसर के विद्यालय देखे होंगे। सरकारी विद्यालय - खेलने को बड़ा सा मैदान, बड़ी सारी बिल्डिंग और ढेर सारे अध्‍यापकगण। सारे ही अध्‍यापक शिक्षित व निपुण। बिना भेदभाव के ग्रामीण अंचल के सभी बच्‍चे वहाँ पढ़ने आते हुए। शहरों में भी ऐसे ही विद्यालय हैं। शहरों में पहले मिशनरीज ने और फिर अन्‍य व्‍यवसायियों ने प्राइवेट स्‍कूल खोलने शुरू किए। स्‍वयं को अभिजात्‍य वर्ग का बताने के लिए हम सभी ने अपने बच्‍चों को इन स्‍कूलों में पढ़ाया। शायद ये स्‍कूल शहर की जरूरतें भी पूरा कर रहे हों, क्‍योंकि हमारी जनसंख्‍या को देखते हुए सरकारी स्‍कूल आज भी पर्याप्‍त नहीं है। आप सोचिए कि अभी तक भारत में 55 प्रतिशत लोग ही शिक्षित हैं तथा इनके लिए भी सरकारी और गैर सरकारी प्रयास पूरे नहीं है तो जब 100 प्रतिशत शिक्षा हो जाएगी तब कितने विद्यालयों की आवश्‍यकता रहेगी? इसलिए शहरी क्षेत्र में ये गैर सरकारी विद्यालय यदि शिक्षा प्रदान भी कर रहे हैं तो हमारे समाज में अभिजात्‍य और गरीबी की इतनी बड़ी खाई नहीं खिंच पाती है क्‍योंकि यहाँ पहले से ही ऐसी खाइयां हैं। लेकिन अभी तक ग्रामीण अंचल में ऐसी खाइयां बहुत ही कम है। बस कहीं-कहीं दलित समाज की उपेक्षा अवश्‍य होती है।
मेरा इस आलेख के माध्‍यम से यह कहना है कि गैर सरकारी विद्यालय या प्राइवेट स्‍कूल आज अभिजात्‍य वर्ग की पहचान बनते जा रहे हैं। यह पहचान शहरी सीमा तक तो समझ आती है लेकिन यह पहचान या यह खाई गाँव में भी बन जाए तो प्रश्‍न शोचनीय है। कल मुझे एक गाँव में जाना था, एक कार्यक्रम के निमित्त चार विद्यालयों में। मैं यह भी बता दूं कि कुछ लेखकीय शौक से ज्‍यादा मुझे सामाजिक कार्यों में रुचि है और समाज और देश की उन्‍नति के लिए बीस वर्षों से कार्य भी कर रही हूँ। इसके लिए अपनी नौकरी को भी छोड़ा है। बस एक ही इच्‍छा है कि कैसे भी अपना देश संस्‍कारित और उन्‍नत बने। खैर मैं विद्यालयों के बारे में लिख रही थी तो उनमें से तीन सरकारी थे और एक गैर सरकारी। सरकारी तीनों ही विद्यालय साधन सम्‍पन्‍न थे जैसा मैंने ऊपर की पंक्तियों में लिखा है लेकिन प्राइवेट स्‍कूल एक पुराने मकान में ही संचालित था। व़हाँ बेहतर सुविधा देता हुआ प्राइवेट स्‍कूल नहीं था। तब क्‍यों वहाँ प्राइवेट स्‍कूल सफल हो रहा है? मुझे लगता है कि यह अभिजात्‍य की बीमारी हमारे ग्रामीण अंचल तक भी जा पहुंची है और एक ही परिवार और मोहल्‍ले के बच्‍चे अभिजात्‍य की सोच में बंट गए हैं। परिणामत: अभिभावको पर अतिरिक्‍त आर्थिक बोझ। यह मानसिकता कहीं न कहीं हीन भावना और उच्‍च भावना को जन्‍म देती है और हम बच्‍चे का विकास समुचित प्रकार से नहीं कर पाते।
मुझे अपना बचपन ध्‍यान आता है जब हम सब सरकारी विद्यालयों में पढ़ते थे और कभी भी हीन भावना क्‍या होती है दिमाग में आती ही नहीं थी। सारा समाज ही एक था लेकिन जैसे-जैसे प्राइवेट स्‍कूल खुलते गए वैसे-वैसे समाज बँटता चला गया। अब यह प्रक्रिया ग्रामीण अंचलों तक भी जा पहुंची है तो मन में प्रश्‍न जरूर खड़े होते हैं कि यह ठीक है या गलत? शिक्षा प्रणाली को लेकर बहुत सारे मतभेद हैं लेकिन मुझे लगता है कि अभी ग्रामीण अंचलों में अभिजात्‍य मानसिकता का निर्माण होना ठीक नहीं है। हो सकता है कि आपके विचार मुझ से पृथक हों लेकिन मैं सभी के विचारों का स्‍वागत करती हूँ। बस सीधा सा प्रश्‍न यही है कि क्‍या भारत के गाँवों में प्राइवेट स्‍कूल खुलने चाहिए या नहीं? बस एक निवेदन और है कि प्रश्‍न को गाँवों की जाति व्‍यवस्‍था या भारत की दयनीय स्थिति से मत जोडि़एगा। नहीं तो वही होगा कि आए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास। मेरा और आपका उद्देश्‍य भारत का निर्माण है, इसलिए आपकी राय मेरे लिए मायने रखती है।