भारतीय रेल मानो संवाद का खजाना। कितनी कहानियां, कितने यथार्थों से यहाँ आमना सामना होता है। कितने मुखर स्वर सुनाई देते हैं? बस आप एक मुद्दा छोड़ दीजिए, कानों में ईयर-फोन लगाया व्यक्ति भी बोल उठेंगा। कोई डर नहीं, कोई चिन्ता नहीं कि मेरी बात से कोई नाराज होगा या बहस किस दिशा में जाएगी? क्योंकि सभी को कुछ घण्टों में ही बिछड़ जाना है। कभी बहस के ऊँचे स्वर भी सुनायी दे जाते हैं लेकिन छोटे से सफर में भला बहस को कितनी लम्बाई मिल सकेगी? खैर मैं अपनी बात कह रही थी अभी 9 अप्रेल को दिल्ली जाने के लिए रेल सेवा का उपयोग कर रही थी, साथ में दो साथी भी थे। एक जगह रहने के बाद भी बातचीत का सिलसिला रेल यात्रा में ही पूरा होता है। साथी के बेटे के बारे में बात निकली और पूछा कि कब शादी कर रहे हो? बात आगे बढ़ी और इस बात पर आकर ठहर गयी कि बच्चे कहते हैं कि आप कुछ नहीं समझते हो। पहले माता-पिता कहते थे कि तुम कुछ नहीं समझते हो और अब बच्चे कहते हैं कि आप लोग कुछ नहीं समझते हैं और आपको हम समझा भी नहीं सकते हैं।
इस युग की पीड़ा वास्तव में समझ भी नहीं आती है। वे एक दूसरे को जानने के लिए लिविंग रिलेशनशिप को आवश्यक मानते हैं और हम इसे पाप की संज्ञा देते हैं। बात कई मोड़ों से होकर गुजर रही थी, तभी मैंने कहा कि वास्तव में बड़ी अजीब सी स्थिति बन गयी है। क्योंकि मैंने अभी कुछ दिन पहले ही टीवी पर आ रही एक फिल्म को देखा था। उसके पहले उस फिल्म के चर्चे सुने थे तो सोचा कि जब टीवी पर आ ही रही है तो देख लिया जाए। नाम था बैण्ड बाजा बारात। खैर फिल्म शुरू हुई और एक दृश्य ने हमारे दिमाग की घण्टी को बजा दिया। सब कुछ इतना स्वाभाविक? लड़की कितनी सहजता से साथ लड़के के साथ शारीरिक सम्बंध स्थापित कर लेती है और सुबह होते के साथ ही भूल जाती है। लड़का तो उहापोह में है लेकिन लड़की ने जैसे रात में किसी के साथ डिनर किया हो बस। अरे डिनर करते हैं तब भी कोई चर्चा होती है लेकिन उतनी चर्चा भी नहीं। हम तो सकते में आ गए कि क्या वास्तव में इतना परिवर्तन आ गया है?
खैर जब हम इस फिल्म की चर्चा कर रहे थे तब हमारे साथी ने भी कहा कि मैंने भी देखी थी यह फिल्म। तभी पास में बैठा सहयात्री मुखर हो उठा, इतनी देर से तो वह अपने कम्प्यूटर पर मग्न था। एकदम से बोल उठा तो हमें भी लगा कि अरे हम अपनी बातों में कितना मशगूल थे और यह भी नहीं जान पाए कि दूसरा भी कोई इसे सुन रहा है। लेकिन वह जो बोला उसे सुनकर एक अविश्वसनीय सत्य हमारे सामने पसर गया और आज की पोस्ट लिखने को मजबूर कर गया। मैं कल याने 11 अप्रेल को ही दिल्ली से लौट आयी थी और कल से ही मेरे दिमाग में उस सहयात्री की बात घुमड़ रही है। कभी लगता है कि पोस्ट पर नहीं लिखू, फिर लगने लगा कि लिख ही दूं। बेकार में मन में पड़ें रखने से तो अच्छा है कि शेयर कर लिया जाए।
उन सज्जन ने बताया कि अभी कुछ दिन पहले मैं रेल में यात्रा कर रहा था। मुझे एसी का टिकट नहीं मिला तो मैं स्लीपर में था। वहाँ दो युगल भी यात्रा कर रहे थे। वे दोनों अपर बर्थ पर आराम से “प्रोपर सेक्स” कर रहे थे। मैंने यह शब्द उसी का लिखा है। शब्दों को छिपाया नहीं है, क्योंकि हम सब परिपक्व हैं और जिस बात को मैं इंगित कर रही हूँ उसमें छिपाव होना भी नहीं चाहिए। उसने कहा कि सारे अन्य यात्री मुँह फाड़े उन्हें देख रहे थे और बोल रहे थे कि पिक्चर चल रही है। मैं यह नहीं कहना चाह रही कि कितना पतन हो गया है, क्योंकि हो सकता है कुछ लोग इसे उत्थान माने। लेकिन हमारी पीढी के लिए आश्चर्यजनक और आपत्तिजनक भी है। क्या अन्य यात्रियों को उन्हें रोकना नहीं चाहिए था? या यह घटना ही झूठ का पुलिंदा है? कुछ समझ नहीं आ रहा है, तो आप लोगों से शेयर कर ली। बस इस बात को समझने का प्रयास कर रही हूँ कि वास्तव में हम कुछ नहीं समझ सकते। आखिर हम अपनी सोच से कितना आगे बढ़े? कितनी कल्पना करें, कि कितना परिवर्तन और होगा? क्या मनुष्य सामाजिक प्राणी से केवल प्राणी-मात्र रह जाएगा? क्या हमारे बच्चों की पीड़ा जायज नहीं है कि उन्हें भी ऐसे वातावरण को जीना पड़ता है और उसे आत्मसात भी करना पड़ता है। एक तरफ उनके पारिवारिक संस्कार हैं और दूसरी तरफ उनकी पीढी है जो सारी ही वर्जनाएं तोड़ देना चाहती है, अाखिर वे किस का साथ दें? तभी वे बात बात में कहते हैं कि आप नहीं समझोगे। आखिर हम समझ भी कैसे सकते हैं?