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Thursday, January 6, 2011

सब पूछ रहे हैं कि धूप कब निकल रही? - अजित गुप्‍ता

राजस्‍थान में कड़कड़ाती ठण्‍ड ने सभी को पस्‍त कर रखा है। उदयपुर में जहाँ खुशनुमा सर्दी रहती है इस बार यहाँ भी 3.5 डिग्री तापमान रिकोर्ड किया गया। माउण्‍ट आबू जो राजस्‍थान का एकमात्र हिल-स्‍टेशन हैं वहाँ तो तापमान माइनस 6 डिग्री तक चले गया। सभी की इंतजार में है धूप। धूप निकले और बाहर बैठकर धूप का सेवन किया जाए। कम्‍प्‍यूटर पर की-बोर्ड चलाते हुए भी अंगुलियां ठण्‍डी पड़ जाती हैं और उन्‍हें बार-बार विश्राम देकर गर्म किया जाता है। ऐसे में एक कविता निकल आयी। हल्‍की-फुल्‍की सी, महज सर्दी को ध्‍यान में रखकर लिखी गयी कविता।

धूप कब निकल रही?
बर्फीली ठण्‍ड थी
हवा भी प्रचण्‍ड थी
थर-थर सी हो रही
धूप कब निकल रही?


पात ओस लिप्‍त थे
धुंध भरा व्‍योम था
सूरज को तक रही
धूप कब निकल रही?


चिड़िया भी मौन थी
सड़क तक उदास थी
बदली को कह रही
धूप कब निकल रही?


खेत में किसान था
हाथ में कुदाल था
आज भोर कह रही
धूप कब निकल रही?


छत पर मजदूर था
हाथ में तगार था
साँस भाप बन रही
धूप कब निकल रही? 

Monday, September 20, 2010

बिटिया क्या है? मन की धड़कन? मन की खुशबू या फिर हमारा नवीन रूप?


 बहुत दिनों से कोई कविता पोस्‍ट नहीं की थी, बस गद्य ही लिखती रही। संगीता स्‍वरूपजी ने कहा कि कोई कविता पोस्‍ट करें तो सोचने लगी कि कौन सी कविता पोस्‍ट करी जाए? पेज-मेकर खोला गया और सबसे पहले ही एक कविता पर नजर पड़ी और मैं उसमें खो गयी। मुझे लगा कि मैंने इसे शायद पहले पोस्‍ट भी नहीं किया है और यदि किया भी हो तो कौन सा आपको स्‍मरण ही होगा? आप दोबारा पढ़ लेना।
खुशदीपजी की आज पोस्‍ट पढ़ी, बेटियों को लेकर चिन्‍ता व्‍य‍क्‍त की गयी है। लेकिन मुझे तो लगता है कि बेटियां चिन्‍ता का विषय है हीं नहीं। वे तो हमारे मन की सारी ही चिन्‍ताओं को हम से दूर कर देती हैं। जब बेटी पहली बार गोद में आयी थी तब लगा था कि यह कैसा अहसास है? जैसे-जैसे वह बड़ी होती गयी, मुझे अपने बचपन में लेती गयी और मेरा बचपन साकार हो गया। जब बहु घर में आयी तब ऐसा लगा कि अरे यह तो अपना यौवन ही लौटकर आ गया है।
आज अदाजी की पोस्‍ट में तीन पीढ़ियों का चित्र है, तो बस यही कविता मुझे याद आयी और इसे आप सभी से बाँट रही हूँ। अच्‍छी लगे तो तालियां, नहीं, नहीं दाद जरूर दीजिएगा।

तुम ही मेरा रूप हो, तुम ही शेष गीत हो
बंसी में संगीत जैसे, मन की शेष प्रीत हो।

तुम में ही गुथी हूँ मैं, तुम ही आकार शेष
मैं तो जैसे हारती,, तुम ही नेक जीत हो।

पुष्प में पराग जैसे, गंध का संसार तुम
मैं तो पात पीत बनी, तुम ही शेष चिह्न हो।

अब तो शेष रंग गंध, बंसियों सी गूंज तुम
मैं तो रीती धड़कनें, तुम ही नेह रीत हो।

अब हवा संग घुल रही, घुल के भी समा रही
मैं तो जाता प्राण हूँ, तुम ही तो शरीर हो।

अब तो केवल शब्द हैं, पुस्तिका बनोगी तुम
मैं तो पृष्ठ-पृष्ठ हूँ, तुम ही मेरी जिल्द हो।