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Wednesday, December 8, 2010

राजस्‍थान को मेरी आँखों से देखो, हमें मालूम है प्रेम के मायने – अजित गुप्‍ता

 राजस्‍थान की जब बात आती है तब लोगों के मन में एक दृश्‍य उभरता है, बस बालू ही बालू। बालू के टीले, अंधड़, भँवर, कहीं कहीं उग आए केक्‍टस। ऊँट की सवारी और पानी को तरसता सवार। राह भटकते राहगीर। लेकिन इन सबसे परे भी कुछ और है राजस्‍थान में। राजस्‍थान का सेठाना, रंग बिरंगी चूंदड़, तीज-त्‍योहार, मेले-ठेले, और केक्‍टस पर लगा सुन्‍दर सा लाल फूल। आज का राजस्‍थान कभी राजपुताना था और इससे पूर्व रेगिस्‍तान या मरु भूमि। आज के राजस्‍थान में मरूभूमि भी है तो अरावली पर्वत मालाएं भी हैं। रेगिस्‍तान में खिलने वाले केक्‍टस पर लाल फूल हैं तो वादियों में लहलहाते खेत भी हैं। सात रंगों से बना है राजस्‍थान। सारे ही रंग हैं यहाँ। जिस धरती पर मीरां ने शाश्‍वत प्रेम के गीत गाए हों वह भूमि प्रेमरस से पगी हुई है। हम राजस्‍थानी प्रेम क्‍या है, इसे समझते हैं।
यहाँ के नायक ने सीमाओं को तोड़ा है, अपने देश से दूर विदेश तक में स्‍वयं को ना केवल बसाया है अपितु उस देश को भी सदा-सदा के लिए उन्‍नत कर दिया है। हजारों-लाखों युवा दिल जब राजस्‍थान से कूच करते हैं तब पीछे छूट गए उनके प्रेम को प्रेम और विरह के शब्‍द यहीं से मिले हैं। राजस्‍थानी कभी दुखी नहीं हुआ, उसने संघर्षों में से अपनी राह बनायी है। रेतीले धोरों में भी पानी निकाला है और आँधियों के साथ अपने को खड़ा किया है। यहाँ का कर्मठ व्‍यक्ति पंख लगाकर उड़ा है और सारी दुनिया को उसने नाप लिया है।
राजस्‍थान के आँचल में अनेक सभ्‍याएं पलती हैं, कहीं शेखावाटी है, कहीं मेवाड़, कहीं मारवाड़, कहीं बागड़, कहीं हाड़ौ‍ती, कहीं मेवात। सभी के अपने रंग हैं। लेकिन पधारो म्‍हारा देश की तान हर ओर सुनायी देती है। शेखावाटी और मारवाड़ में पी कहाँ का राग मोर अपने सतरंगी पंख फैलाकर सुनाते हैं तो मेवाड़ में कोयलिया बागों में कुहकती है। बागड़, मेवात और हाड़ौती के घने जंगलों में आज भी बाघों की दहाड़ सुनी जाती है। न जाने कितने सुन्‍दर और सुदृढ़ किले आज भी अपनी आन-बान-शान से पर्यटकों को सम्‍मोहित करते हैं। कितनी ही हवेलियां और उनमें बने झरोखें, राजसी ठाट-बाट का चित्र उपस्थित करते हैं।
राजस्‍थान में क्‍या नहीं हैं? यहाँ शौर्य रग-रग में टपकता है, यहाँ प्रेम नस-नस में बहता है और यहाँ त्‍याग कण-कण के बसता है। तभी तो कहते हैं कि म्‍हारो छैल-छबीलो राजस्‍थान। कभी यहाँ की मिट्टी को मुठ्ठी में उठाइए, इसका कण-कण सोने की आभा सा चमक उठेगा, आपके हाथों में कभी नहीं चिपकेगा बस हौले से सरक जाएगा। जब हवा अपनी रागिनी छेड़ती है तब यहाँ के मरूस्‍थल में स्‍वर लहरियाँ ताना-बाना बुनने लगती हैं और मरूस्‍‍थल पर बन जाते हैं अनगिनत मन के धोरे। बस इस बालू रेत को आहिस्‍ता से सहला दीजिए, मखमली अहसास दे जाएगी लेकिन कभी इसे उड़ाने की भूल की तो आँखों में किरकिरी बन चुभ जाएगी। इस बालू रेत का आकर्षण सारे ही आकर्षणों को फीका कर देता है तभी तो कहते हैं कि मरूस्‍थल में ही मरीचिका का जन्‍म होता है।
यहाँ की पहाडियां वीरगाथाओं से भरी पड़ी हैं। न जाने कितने किले सर उठाकर भारत के स्‍वाभिमान की रक्षा कर रहे हैं? कहीं चित्तौड़, कहीं रणथम्‍भोर, कहीं लौहागढ़ तो कहीं बूंदी का तारागढ़। सभी में न जाने कितनी कहानियां छिपी हैं। कहीं रानी पद्मिनी जौहर करती है तो कहीं हाड़ी रानी अपना सर काटकर युद्ध में जाते हुए अपने राणा को सैनाणी के रूप में दे देती है, कहीं पन्‍ना धाय अपने ही पुत्र का बलिदान राजवंश को बचाने के लिए कर देती है। कही राणा सांगा है तो कहीं राणा कुम्‍भा और महाराणा प्रताप। न जाने कितना इतिहास बिखरा है यहाँ? गाथा पूर्ण ही नहीं होगी, सदियों तक चलती रहेगी, अनथक।
बस ऐसा ही राजस्‍थान और ऐसे हैं राजस्‍थानवासी। जिसने भी यहाँ जन्‍म लिया है उसने इन सारे ही रंगों को अपने अन्‍दर संजोया है। यहाँ तपते रेगिस्‍तान में भी जब शाम ढलती है तब लोग स्‍वर लहरियां बिखेर देते हैं और जब पहाड़ों पर आदिवासी नंगे पैर चलता है तब भी वह प्रेम की धुन ही छेड़ता है। राजपूत जब युद्ध में जाते हैं तो वीर रस सुनायी पड़ता है और जब रानियों को जौहर करना पड़ता है तब भी करुण रस कहीं नहीं आता। यहाँ तो बस यही गीत गूंजता है मोरया आच्‍छयो बोल्‍यो रे ढलती रात में।
और अन्‍त में इस पोस्‍ट लिखने की भूमिका। http://satish-saxena.blogspot.com
पर सतीश जी ने इंदुपुरी गोस्‍वामी पर एक पोस्‍ट लिखी।
 मैंने उस पर यह टिप्‍पणी की -  राजस्‍थान वाले ऐसे ही प्रेम करते हैं। इस प्रेम को अनमोल समझ कर झोली में बांध लीजिए।

और अनामिका की सदाएं ने यह टिप्‍पणी की -
और डा.अजित जी क्या आप सच कह रही हैं ?

:):):):)
बस उसी प्रेम का उत्तर देने का प्रयास किया है कि राजस्‍थान वाले सदा प्रेम ही करते हैं।