त्रम्बकेश्वर (नासिक) और शिरडी की यात्रा का सौभाग्य मिला। हजारों ही नहीं लाखों की संख्या में दर्शनों की कतार में लगे भक्तगण, कोई साष्टांग प्रणाम कर रहा है तो कोई हाथ जोड़े श्रद्धा-भाव से खड़ा है। कोई नाच रहा है तो कोई जयकारे लगा रहा है। सब ही तो प्रभु से समृद्धि मांग रहे हैं। मुझे एक विचार आ रहा है कि पूर्व में भारत में अधिकांश लोग खेती करते थे, तब भी शायद प्रभु से समृद्धि की मांग होती थी। भगवान आकाश से पानी बरसा देते थे कि भक्तगणों लो अमृत समान पानी, अन्न उपजा लो और अपनी भूख-प्यास मिटा लो। किसान सारी जनता की भूख मिटाता है शायद इसीलिए भगवान उसे वर्षा-जल देता है। भगवान ने इस देय को कभी बन्द नहीं किया। बस कभी-कभार कम-ज्यादा करके बता देता है कि ईमानदारी से अपना कर्म करो, नहीं तो मैं सजा दूंगा! लेकिन आज लोगों को प्रभु के दरबार में मांगते देखती हूँ तो समझ नहीं आता कि आखिर इन सबको अब भगवान और क्या दे?
भगवान ने इतनी उपजाऊ धरती दी है, रत्नों और खनिजों से भरे पहाड़ दिए, समुद्र दिया, नदियां दी, पेड़ दिए, वनस्पतियां दी, पशु दिए, पक्षी दिए, सूर्य दिया, चन्द्रमा दिया, हवा दी, प्रकाश दिया। कहने का तात्पर्य यह है कि उसने मनुष्य के लिए इतना अकूत भण्डार पहले ही दे दिया तो अब हम क्या मांगते हैं? हमारे यहाँ कृष्ण हुए और उनको सारी ही दुनिया आज श्रेष्ठ मानती है, उन्होंने कहा कि कर्म पर ही तेरा अधिकार है। बस तू कर्म कर, फल तो मिल ही जाएगा। अब मुझे यह प्रश्न बेचैन करता रहता है कि मैं कृष्ण की बात मानूं या फिर मांगने वालों की जमात में जाकर खड़ी हो जाऊँ? जब वो स्वयं ही दे रहा है तब कैसा मांगना? आप कहेंगे कि नहीं यह मांगना नहीं है, यह तो श्रद्धा प्रगट करने का तरीका है। यदि श्रद्धा प्रगट करने का ही तरीका है और शायद कुछ हद तक सही भी हो तो फिर यह करोड़ों का चढ़ावा क्यों? यह किसी रिश्वत की परिभाषा में नहीं आता है क्या?
सत्य साई बाबा गरीबी में रहे लेकिन आज उनके शिष्यों ने करोड़ों रूपये का कारोबार कर लिया है। यहाँ तक की उन्हें भी सोने में मढ़ दिया है। बेचारे जो श्रद्धा प्रगट करने जा रहे हैं वे लम्बी कतार में फंसे हैं लेकिन जो रिश्वत दे रहे हैं या राहुल गाँधी जैसे बड़े पद वाले लोग सीधें ही दरबार में उपस्थित हो जाते हैं। आम जन को तो घण्टों कतार में लगे रहो तब जाकर कहीं दर्शन सम्भव होंगे! कैसा कारोबार है यह?
मैं इस देश की संस्कृति जागरण में रत उन तमाम महापुरुषों को नमन करती हूँ और उनके प्रति श्रद्धा-भाव भी रखती हूँ लेकिन उनके शिष्यों द्वारा किए जा रहे व्यापार से मन दुखी होता है कि आज गरीबों के मसीहा भी अमीरों के होकर रह गए हैं। अमीरों ने वैसे भी इस देश के राजनेताओं को खरीद लिया, नौकरशाहों को खरीद लिया और अब तो भगवान को भी खरीद लिया। तो बेचारा आम आदमी किस दरबार में जाकर अपनी फरियाद करेगा? या आम आदमी के पास समय बहुत है तो वह कतार में घण्टों खड़ा रहेगा और खास आदमी के पास समय की कमी है तो वह रिश्वत और रुतबे के सहारे अपनी ईच्छा पूर्ति कर लेगा? क्या देश को इस बारे में नहीं सोचना चाहिए कि यह धन का प्रदर्शन बन्द होना चाहिए। अनावश्यक कर्म-काण्ड बन्द होने चाहिएं और लोगों को कर्म करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। मुझे तो लगता है कि ऐसे स्थानों पर कुटीर उद्योग खोल देने चाहिए और प्रत्येक भक्त को वहाँ निश्चित समय और श्रम-दान अनिवार्य कर देना चाहिए। उन्हें कर्म की महिमा बतानी चाहिए फिर भगवान के दर्शन कराने चाहिएं। कितना भी कोई वीआईपी क्यों ना हो, सभी पहले श्रम-दान करें फिर दर्शन करें। देश के हित में कार्य। नहीं तो तीर्थ यात्रा भी एक खिलवाड़ बन कर रह जाएगी और देश का पैसा और समय दोनों केवल मांगने में ही खर्च होता जाएगा। हो सकता है आप मेरी बात से सहमत ना हो, लेकिन मुझे जो विचार आए मैंने यहाँ लिखे। आपके विचारों का भी स्वागत है।