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Wednesday, August 10, 2011

रेल यात्राओं के अनोखे अनुभव - अजित गुप्‍ता



यात्रा करना हमारे जीवन का अभिन्‍न अंग है। यात्राओं के कितने संस्‍मरण हमारे मस्तिष्‍क पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं। न जाने कितने प्रश्‍न भी खड़े हो जाते हैं। अभी 30 जुलाई को दिल्‍ली से वाराणसी जाना था। उसी दिन खुशदीपजी की एक पोस्‍ट आयी थी और मैंने अधिकारपूर्वक उन्‍हें लिख दिया था कि मैं आज दिल्‍ली में हूँ। तत्‍काल ही उनका फोन आ गया और यह निश्चित रहा कि शाम को ट्रेन पर ही मिलते हैं। मुझे संकोच भी हो रहा था कि केवल ब्‍लाग की पहचान के कारण उन्‍हें नई दिल्‍ली स्‍टेशन तक बुलाना, कितना जायज है और उन्‍हें आने में कठिनाई तो नहीं होगी। लेकिन वे और शहनवाज दोनो ही आए। मेरी ट्रेन में लगभग एक घण्‍टे का समय था तो हमने पास ही एक रेस्‍ट्रा में बैठकर बातचीत की। बातचीत तो ज्‍यादा नहीं हो पायी क्‍योंकि खुशदीपजी तो खातिरदारी में ही लगे रहे। खैर हम आधा घण्‍टे पूर्व गाड़ी में आकर बैठ गए। अभी अपनी बर्थ पर बैठने की कोशिश ही कर रहे थे कि धमाक से एक आवाज हुई। हम तीनों ही चौंके, कि क्‍या हुआ? हमने आवाज की तरफ पलटकर देखा। साइड लोअर बर्थ के पास एक विदेशी महिला खड़ी थी, जिसने लगभग चार इंच की हील वाली चप्‍पल पहन रखी थी। मानो वह युधिष्ठिर की तरह धरती से ऊपर चलना चाह रही हो। उसने अपने पैर को जो हील वाली चप्‍पल से घिरा था, जोर से धम से पटका। हम समझ गए कि यह धमक देशी नहीं विदेशी ही है। अब उसके हाथ में मोबाइल था और वह पूरी मेघ गर्जना के साथ फोन पर किसी पर बिजली गिरा रही थी। उसके साथ एक वृद्ध व्‍यक्ति भी थे और बाद में आता जाता एक किशोर वय का बालक भी दिखायी दिया। उसे पूरे हिन्‍दुस्‍थानी तर्ज पर चिल्‍लाते देख शहनवाज ने कहा कि आपका सफर कैसा रहेंगा?
वह शायद अपने एजेण्‍ट पर चिल्‍ला रही थी, कि उसने ढंग की बर्थ नहीं दिलायी और इस कारण उसके बेटे को भी साथ-साथ बर्थ नहीं मिली। लेकिन उसका प्रकोप शान्‍त नहीं हुआ। एक बार तो मन किया कि उसकी फोटो ले जी जाए, लेकिन फिर डर भी लगा कि कहीं मेरे ही ना चिपट जाए? हमारे साथ ही दो चाइनीज लड़किया भी थी, वे भी अपनी भाषा में बोलकर आनन्‍द ले रही थी। मेरे आसपास और कोई नहीं था, एक महिला कुछ देर से आयी लेकिन वह भी बातों में रुचि प्रदर्शित नहीं कर रही थी। सुबह जाकर पता लगा कि वह अपनी छोटी सी नातिन को छोड़कर आयी है इसलिए अनमनी सी थी। इसलिए मैं प्रतिक्रिया के आनन्‍द से वंचित थी।
अक्‍सर बात होती रहती है अमेरिका की, दूसरे दिन ही वाराणसी में एक मित्र के यहाँ जाना था। वहाँ उनकी एक रिश्‍तेदार जो दुबई में रहती हैं, से मुलाकात हो गयी। बातों ही बातों में पता चला कि दुबई में भी अमेरिका की तरह ही ना बच्‍चे रोते हैं और ना ही कुत्ते भौंकते हैं। यदि बच्‍चे रोते हैं तो समझो हिन्‍दुस्‍थानी है। हिन्‍दुस्‍थान में भी देखा है कि हिन्‍दी भाषी बेल्‍ट ही ज्‍यादा मुखर और  प्रखर दिखायी देती है। मैं उस समय ट्रेन में सोच रही थी कि अमूमन विदेशी यात्री शान्‍त होते हैं। वे अक्‍सर अपनी नींद पूरी करने में ही यकीन रखते हैं। लेकिन वह महिला अपने गुस्‍से पर काबू ही नहीं पा रही थी। दो-एक घण्‍टे बाद रात्रि-भोज का आदेश लेने वेटर आया तो उसके सहयात्री बुजुर्ग व्‍यक्ति ने जो शायद उसका पति ही था ने वेटर से हिन्‍दी में बात की। तब उस महिला ने भी कुछ शब्‍द हिन्‍दी में बोले। मैंने अपनी चुप्‍पी पर राहत की साँस ली। यदि अन्‍य कोई सहयात्री होता तो मैं अवश्‍य ही हिन्‍दी में कुछ न कुछ टिप्‍पणी अवश्‍य करती। और फिर? रात्रि को जब सोने का अवसर आया तब भी उस महिला ने अपनी ऊपर वाली बर्थ का उपयोग नहीं किया और दुख-सुख के साथ बड़बड़ाती हुई एक छोटी सी साइड लोअर बर्थ पर ही दोनों ने अपना आसरा बनाया। मैने लाइट बन्‍द करनी चा‍ही तो उसकी गुर्राहट फिर उभरी- नो नो। मैंने अपना पर्दा खींचा और सोने में ही भलाई समझी।
लेकिन मुझे इस तथ्‍य से ज्ञान प्राप्ति अवश्‍य हो गयी थी कि आम तौर पर शान्‍त रहने वाले ये विदेशी हिन्‍दी भाषी होने के कारण ही शायद चमक-धमक रहे हैं। इतना तेवर नहीं तो आया कहाँ से? वाराणसी पहुंचने तक उसके तेवर वैसे ही बने रहे। शाहनवाज भाई बस ऐसा ही कटा मेरा सफर। खुशदीपजी ने भी मेरी पिछली पोस्‍ट में पूछा था कि उस विदेशी महिला का क्‍या हाल रहा तो मैंने सोचा यह यात्रा वृतान्‍त भी लिख ही दो।