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Saturday, May 7, 2011

मन से पंगा कैसे लूँ, यह अपनी ही चलाता है - अजित गुप्‍ता


यह मन भी क्‍या चीज है, न जाने किस धातु का बना है? लाख साधो, सधता ही नहीं। कभी लगता है कि नहीं हमारा मन हमारे कहने में हैं लेकिन फिर छिटककर दूर जा बैठता है। अपने आप में मनमौजी होता है “मन”। ना यह हमारी परवाह करता है और ना ही हम इसकी परवाह करते हैं। जीवन के घेरे में ना जाने कितनी बार मन को परे धकेल देते हैं! इस मन की कीमत हम कभी नहीं लगा पाते। नौकरी और व्‍यापार से कमाए धन की गणना हम खूब कर लेते हैं, लेकिन मन की खुशियों की कीमत का हम आकलन कर ही नहीं पाते। एक फकीर से पूछ बैठते हैं कि तुम फकीर क्‍यों हो? साधनों का अभाव खटकता नहीं है? लेकिन उसके मन की पूँजी जो उसके पास है उसकी गणना कोई नहीं कर पाता। उसे दुनियादारी से वंचित व्‍यक्ति मान लिया जाता है। जो तन के सुख के लिए लाखों कमाए, बस उसी की गणना होती है लेकिन जो मन के सुख के लिए लाखों गँवा दे उसे तो कभी गणना के लायक भी नहीं मानते।
लेकिन यदि इसी की सुनो तो दुनियादारी ऐसी छूटती है कि आप चारों तरफ से विरोध से घिर जाते हो। सुबह उठे, अभी चाय बनाने रसोई में घुसे ही थे कि इस मन ने न जाने कब का भूला-बिसरा गाना जुबान पर ला दिया और बस सारा दिन वही टेप चलता रहा। इन्‍टरनेट खोला तो बस उसी गाने के इर्द‍-गिर्द घूमता रहा मन। बड़ी अच्‍छी-अच्‍छी पोस्‍ट लगी हैं, ना जाने कितने विषयों पर लोगों ने लिखा है लेकिन आज तो आपका मन उसी गाने के चारों तरफ घूम रहा है तो बस उसे उसी के अनुरूप पोस्‍ट चाहिए और कुछ नहीं। ढूंढ मच गयी, सारी श्रेष्‍ठ पोस्‍ट रिजेक्‍ट हो गयी, बस जो मन को जँची उसी को पढ़ा गया। लेकिन इस मन के चक्‍कर में दुनियादारी पीछे छूट गयी। न जाने कितने लोग नाराज हो गए। हमने इतने अच्‍छे विषय पर पोस्‍ट लिखी लेकिन फला व्‍यक्ति ने पढ़ी ही नहीं, जरूर कोई नाराजी है। बस इस मन ने करा दिया लोगों को नाराज।
कभी इस मन का मन होता है कि गद्य पढे तो कभी मन होता है पद्य पढे। कभी मन होता है कि परिवार से सम्‍बंधित कोई बात पढे तो कभी मन होता है कि देश से सम्‍बंधी कोई पोस्‍ट पढे। कहने का तात्‍पर्य यह कि गलती यह करे और सजा मिले व्‍यक्ति को। लेकिन कुछ लोग हैं जो दुनियादारी खूब निभाते हैं और इस मन को परे धकेल कर रखते हैं। अब आप ही बताइए कि मन को परे धकेलकर केवल दुनियादारी ही निभानी चाहिए या फिर मन की सुननी चाहिए। मैं कई दिनों से उहापोह में हूँ। इस मन ने मेरी ऐसी की तैसी कर रखी है। लोग मुझसे नाराज होते जा रहे हैं और यह पठ्ठा मजे में है। लोग कह रहे हैं कि आप हमारे घर नहीं आते, ब्‍लाग पर लोग कह रहे हैं कि आप हमारी पोस्‍ट नहीं पढ़ते। सामाजिकता क्‍या होती है, इसने भुला दिया है। हमारा नाम भी लोगों की सूची से कटता जा रहा है।
मुझे एक घटना याद आ रही है, जब मैं कॉलेज में थी। एक बदमाश टाइप के छात्र ने विवाह कर लिया, बाहर कितना ही शेर बने लेकिन पत्‍नी के आगे गीदड़ जैसा। जब ज्‍यादा परेशान हो गया तो मुझे बुलाने आया, बोला कि मेडम एक बार मेरे घर चलो, मेरी पत्‍नी को देख लो। मैंने टालमटोल की लेकिन वो माना नहीं तो अपने राम भी चल दिए। मनोवैज्ञानिक समस्‍या थी, उसे समझाया और वापस आ गए। लेकिन कॉलेज में चर्चा का विषय बन गए कि ये बदमाशों के घर जा आती हैं। अब उन्‍हें कैसे समझाऊँ कि भाई मेरा उससे कोई लेना-देना नहीं, बस मानवता और चिकित्‍सक होने के नाते ही गयी थी। यहाँ ब्‍लाग-जगत में भी ऐसा ही है। आपके ब्‍लाग पर कौन आता है और आप किसके ब्‍लाग पर जा आते हैं, वह चर्चा का विषय बन जाता है। आप लोगों के साथ होता हो या नहीं लेकिन मेरे साथ तो बड़ा होता है। लोग लठ्ठ लेकर पीछे पड़ जाते हैं कि तुम्‍हें ऐसा नहीं करना चाहिए था। कभी-कभी लगता है कि मैं कुछ खास हूँ क्‍या? जो मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था। लोग कहने लगते हैं कि आप ऐसे लोगों से बात करें यह शोभा नहीं देता। अब मैं क्‍या करूँ? यह मन ऐसा है कि दूसरों के सामने बड़ी समझदारी और अपनेपन से बात करने लग जाता है तो कुछ लोग कहते हैं कि नहीं हमें आपकी मित्रता चाहिए। एक बार ऐसा ही हुआ, एक बहुत बड़े व्‍यक्ति आ गए, मन से कुछ असंयमित थे। हमारा मन बोला कि बेचारे दुखी हैं तो यहाँ सकून ढूंढ रहे हैं तो कुछ देर बात करने में क्‍या जाता है? हद तो तब हो गयी जब रक्षा-बंधन के दिन आ टपके। सारा घर मुझ पर हँस रहा और मैं दीवार कूदकर पड़ोसी के घर। लेकिन दुनिया आजतक मुझे चिढ़ाती है। अब इसका ईलाज है आप लोगों के पास?  
अब यह पोस्‍ट भी यह मन ही लिखा रहा है, मैंने कहाँ से शुरू की थी और कहाँ समाप्‍त होगी मुझे नहीं मालूम। इस मन से परेशान होकर ही इस ब्‍लाग-जगत में आयी थी कि यहाँ अपने मन की करने की पूरी छूट होगी। कोई टोका-टोकी नहीं होगी। लेकिन यहाँ भी पूरी दुनियादारी निकली। कभी कोई नाराज तो कभी कोई राजी। ऐसा भी नहीं है कि मेरे से ही लोग नाराज होते हैं, मेरा मन भी लोगों से दूर भाग जाता है। कई बार मैंने अनुभव किया है कि यह बड़ा डरपोक भी है। किसी ने कुछ ऊँचा-नीचा कह दिया तो अपनी चादर समेटने में देर ही नहीं करता। कहता है कि दुनिया में पत्‍थरबाजी क्‍या कम है जो यहाँ भी झेलने चले आए। जो बिना बात ही तुमपर पत्‍थर मार रहे हों, उनसे दूर ही रहो ना। यह समझो कि तुम्‍हारे और उनके गण नहीं मिलते बस। इसलिए आज इस पोस्‍ट के माध्‍यम से बस यही कहना चाह रही हूँ कि मुझे मेरा मन जहाँ ले जाता है बस उसी के इशारे पर चले जाती हूँ। जो पोस्‍ट पढ़ने को कहता है, बस उसे ही पढ़ती हूँ। आप लोग मुझसे नाराज ना हो, क्‍योंकि मैं किसी से नाराज नहीं हूँ। बस पत्‍थरबाजी से डरती हूँ, मेरी गलती हो तो प्रेम से बता दें कि आप यहाँ गलत हैं, मैं मान लूंगी। लेकिन यह कभी ना सोचे कि मैं किसी नाराजी के कारण आपकी पोस्‍ट पर नहीं आ रही हूँ। आपने यदि अपने मन को साध रखा है और दुनियादारी के अनुसार चलते हैं तो आपको मैं महान मानती हूँ लेकिन मैं अपने मन को साध नहीं पाती हूँ, बस इसके कहने में ही रहती हूँ। मेरा मानना है कि मन की मानो तो बात लाखों की है और ना मानो तो फिर खाक की है। अन्‍त में एक प्रश्‍न क्‍या आप भी मन की बात सुनते हैं या फिर दुनियादारी को महत्‍व देते हैं? इस पोस्‍ट को पढ़कर भी मुझसे नाराज रहेंगे?

Saturday, September 11, 2010

क्‍या आपको भी आपके दिमागी कीड़े (neurons) उकसाते हैं टिप्‍पणी करने पर


मुझे जब से आप लोगों की संगत मिली है और जैसे-जैसे दुनियादारी की समझ बढ़ी है तभी से अपने दिमाग के न्‍यूरोन्‍स से बहुत सचेत रहती हूँ। कमबख्‍त कब बगावत कर दें? अच्‍छी खासी किसी की पोस्‍ट पढ़ रही होती हूँ कि यह न्‍यूरोन्‍स रूपी कीड़ा दिमाग में कुलबुलाने लगता है और मुझे उकसाना शुरू करता है। कभी तो मैं इसके झांसे में नहीं आती हूँ लेकिन कभी यह मुझपर हावी हो ही जाता है और फिर उस पोस्‍ट पर अपनी मर्जी से टिप्‍पणी करा लेता है। अभी खुशदीपजी की पोस्‍ट पढ रही थी, मुन्‍नी बाई के गीत पर लिखी थी, उन्‍होंने कुछ पुराने गीत भी लगाए थे, जिनकी नकल से नया गीत बना है, तो मैंने अपने दिमाग के न्‍यूरोन्‍स को टटोला और पूछा कि क्‍या सुने जाएं ये बेहूदे गीत या छोड़ दिये जाएं? दिमाग बोला कि छोड़ दिए जाएं नहीं तो हमें पता नहीं कि ये अफलातून आपके न्‍यूरोन्‍स आपसे कैसी टिप्‍पणी लिखा लें? मैंने नहीं सुने और सीधी-सादी टिप्‍पणी करके उनके ब्‍लाग से लौट आयी। लेकिन आप देखिए इसका कीड़ा, यह नहीं माना और मुझे उकसाता रहा कि कुछ लिखो, और मैं सब कुछ बन्‍द करके पहले यह लिखने बैठ गयी।
मैं मुन्‍नी बाई पर नहीं लिखना चाह रही हूँ बस मैं तो दिमाग के इन कीड़ों के बारे में लिखना चाह रही हूँ जिन्‍हें विज्ञान ने नाम दिया है न्‍यूरोन्‍स का। वैज्ञानिक कहते हैं कि हमारे दिमाग में अरबों न्‍यूरोन्‍स हैं लेकिन शायद सात या आठ ही उनमें से सक्रिय रहते हैं। अब आप ही बताइए कि भगवान ने या प्रकृति ने (क्‍योंकि आजकल तो भगवान का नाम लेना कि उसने बनायी है दुनिया, पर प्रश्‍न चिन्‍ह लग गया है) जिसने भी आदमी के दिमाग को बनाया होगा वह क्‍या मूर्ख था? सक्रिय है केवल सात या आठ ( हो सकते हैं ज्‍यादा होते हों, लेकिन मुझे ऐसा ही विदित है) और बना दिए अरबों? क्‍या दिमाग और शरीर का संतुलन बनाए रखने के लिए ही इतना बड़ा दिमाग या ब्रेन बनाया गया या और कोई मामला है? मुझे तो लगता है कि आदमी नामक जीव में जितने गुण-अवगुण होते हैं सभी के परिचायक ये न्‍यूरोन्‍स हैं अब किसी के कौन सा सक्रिय तो किसी के कौन सा? किसी के झूठ का सक्रिय तो किसी के सच का। आप सत्‍यवादी से झूठ बुलवा लीजिए, कभी नहीं बोलेगा, चाहे मर जाए और झूठे से सच बुलाकर देख लीजिए।
कल ही एक पोस्‍ट पढ़ी थी, गीता के ऊपर थी, लिखा था कि व्‍यक्ति के गुणों के आधार पर भी मनुष्‍य कर्म करता है। तब मेरी न्‍यूरोन्‍स थ्‍योरी और पक्‍की हो गयी। अब मैं अपने आस-पास देखती हूँ तो मुझे इस सिद्धान्‍त की सत्‍यता पर यकीन होता है। इसके ढेर सारे मेरे पास उदाहरण भी हैं लेकिन यहाँ उदाहरण देकर पोस्‍ट को लम्‍बी नहीं करूंगी। बस आप मंथन करें और मुझे बताएं कि क्‍या आपके साथ भी ऐसा ही होता है कि आप किसी की पोस्‍ट पढें या दुनिया में कुछ देखें तो ना चाहते हुए भी प्रतिक्रिया होती है और वह भी कुछ खास विषयों पर। चाहे दुनिया में आग लग जाए हमारा दिमाग चुप बैठा रहता है लेकिन आपके न्‍यूरोन्‍स के विपरीत कोई बात आयी नहीं कि आप दुनिया को आग लगाने पर तुल जाते हैं। अब क्‍या करें? जैसे मेरे साथ होता है कोई महिलाओं को बु‍द्धिहीन बोले या अनावश्‍यक उन्‍हीं को सदुपदेश दें, अपने देश के बारे में बुराई करें या समाज में वर्ग संघर्ष को बढ़ाने वाली कोई बात करें, ऐसे कितने ही विषय हैं जिनपर मेरे न्‍यूरोन्‍स मुझे चुप नहीं रहने देते। वैसे मैं उम्र के साथ बहुत कुछ बर्दास्‍त करना सीख गयी हूँ लेकिन फिर भी ये दिमागी कीड़े मुझे उकसाते ही रहते हैं और आज मुन्‍नी बाई को बचाते हुए इस पोस्‍ट को लिखवाकर ही दम लिया है इन कमबख्‍तों ने। इसलिए इस पोस्‍ट में आपको कुछ भी बुरा लगा हो या पसन्‍द नहीं आया हो तो इसमें मेरा दोष इतना भर ही है कि मैं मेरे न्‍यूरोन्‍स के कारण मजबूर हूँ और आप अपने। गणेश चतुर्थी और ईद पर आपको शुभकामनाएं। इस पोस्‍ट के बारे में अपने विचार जरूर बताएं। 

Monday, April 19, 2010

क्‍या ब्‍लाग-जगत भी चुक गया है?

दो चार दिन से ब्‍लाग जगत में सूनापन का अनुभव कर रही हूँ। न जाने कितनी पोस्‍ट पढ़ डाली लेकिन मन है कि भरा ही नहीं। अभी कुछ दिन पहले तक ऐसी स्थिति नहीं थी। दो चार पोस्‍ट तो ऐसी होती ही थी कि दिन भर की तृप्ति दे जाती थी। किसी को सुनाने का मन भी करता था। कहीं अपनी बात कहनी होती थी तो ब्‍लाग जगत का जिक्र भी हो ही जाता था। लेकिन अब तो ऐसा हो रहा है कि बस ढूंढते ही रह जाओगे। आखिर ब्‍लाग है क्‍या? कुछ पोस्‍ट धर्म-सम्‍प्रदाय को लेकर आ रही हैं। सभी को अपनी बात अपने ब्‍लाग पर लिखने का हक है लेकिन ऐसी बाते कितना असर छोड़ पाती हैं? एकाध बार तो पढ़ी जाती है फिर आत्‍म-प्रलाप सा लगने लगता है और उन पोस्‍टों से स्‍वत: ही दूरी बन जाती है। हमारे यहाँ इतने धार्मिक नेता हैं और उन्‍हीं का काम है अपने धर्म के बारे में बताने का। लेकिन पता नहीं क्‍यों हम ब्‍लाग पर इस बारे में लिख रहे हैं और अपने अल्‍प ज्ञान से एक नयी बहस को जन्‍म दे रहे हैं।

मैं अनुभव कर रही हूँ कि हम अनावश्‍यक स्‍वयं को विद्वान सिद्ध करने में लगे रहते हैं, सहजता से कुछ नहीं लिखते। जबकि ब्‍लाग लेखन सहजता का ही दूसरा नाम है। पूर्व में पत्र-लेखन होता था, आज ब्‍लाग-लेखन है। समाज में जो हम प्रतिदिन देखते हैं, अनुभव करते हैं, जिनके बारे में हमारा मन कुछ कहता है, बस उसे ही यदि ब्‍लाग पर लिखें तो शायद बहुत सारे ऐसे विषय होंगे जिन पर आज तक किसी ने अपनी लेखनी नहीं चलायी होगी। हम रोज ही कुछ न कुछ पढ़ते हैं, ह‍में लगता है कि अरे इस बारे में हमें भी कुछ लिखना चाहिए। ऐसा ही आज मेरे साथ भी हुआ। लेखक रस्किन बॉन्‍ड का एक संस्‍मरणनुमा आलेख समाचार पत्र में प्रकाशित हुआ। उसमें उन्‍होंने किसी भी कार्यक्रम में जाकर भाषण देने का दर्द बताया। मेरा मन भी हुआ कि इस बारे में लिखना चाहिए कि मुख्‍य अतिथि का क्‍या दर्द होता है? लेकिन फिर सोचा कि उन्‍होंने अपने विचार लिखे, अब यदि इसी विचार को मैं भी लिखूंगी तो नकल जैसा हो जाएगा। लेकिन वो उनके मौलिक विचार थे, पढ़कर एक विषय ध्‍यान में आया। लेकिन मुझे लगता है कि मैं अपनी स्‍लेट को खाली ही रखूं किसी और के विचारों से उसे ना भरूं। क्‍योंकि लेखन के माध्‍यम से मैं अपने आपको जानना चाहती हूँ कि मेरी किन विषयों पर संवेदनाएं जागृत होती हैं और विचार स्‍वत: ही निकलकर बाहर आते हैं? , ब्‍लाग पढ़ना भी इसी जानने की एक प्रक्रिया है। हमें क्‍या अच्‍छा लगता है? लेकिन जब कुछ भी नया नहीं मिले तो लगता है कि क्‍या ब्‍लाग जगत भी चुक गया? हो सकता है मैं गलत हूँ, मेरी खोज अपूर्ण हो और मैं उन पोस्‍ट त‍क पहुंच ही नहीं पा रही जहाँ कुछ नया मिलता है। आप को लगता हो तो मुझे भी बताइए।