Friday, May 10, 2019

गाँधीजी का देश के साथ झूठ का प्रयोग!


सत्य के प्रयोग – गाँधी इन्हीं प्रयोगों के नाम से प्रसिद्ध हैं। वे सत्य के प्रयोग अपने ऊपर करते रहे लेकिन वे देश के ऊपर झूठ के प्रयोग कर बैठे। मैं गाँधी की प्रशंसक रही हूँ लेकिन जब गाँधी उपनाम को लेकर चर्चा चली तब एक बात ध्यान में आयी कि यह गाँधीजी का उपनाम देने का प्रयोग तो झूठ और झांसा देने का प्रयोग था। इन्दिरा नेहरू फिरोज गंधी ( खान ) से निकाह करती है, कुछ लोग कहते हैं कि फिरोज पारसी मुसलमान थे और कहते हैं कि उनकी माँ के पीहर का व्यवसाय इत्र का था तो उनको गंधी कहते थे। लेकिन पिता का गोत्र क्या था? खैर मैं इस विवाद में नहीं पड़ती, बस फिरोज मुस्लिम थे, यह निर्विवाद सत्य है। इन्दिरा और फिरोज का निकाह हुआ, सभी जानते हैं कि मुस्लिम गैर मुस्लिम युवती से निकाह नहीं करते। इसके लिये वे पहले युवती का धर्म परिवर्तन कराते हैं. उसका नाम बदलते हैं फिर निकाह करते हैं। यहाँ भी ऐसा ही हुआ, इन्दिरा नेहरू का नाम बदल गया, मेमूना बेगम। जब गाँधीजी को इसकी खबर लगी, तब उन्होंने नेहरू को समझाया कि देश की आजादी सर पर है और तुम्हें प्रधानमंत्री बनना है, ऐसे में इन्दिरा का मुस्लिम हो जाना देश की प्रजा में असंतोष भर देगा। गाँधीजी ने फरेब किया, जनता को झांसा दिया और इन्दिरा व फिरौज का विवाह अपने समक्ष कराया। इतना ही नहीं उन्होंने अपना उपनाम भी उन्हें भेंट स्वरूप दिया। अब फिरोज गंधी या खान से बदलकर गाँधी हो गये और इन्दिरा जी भी मेमूना बेगम से हटकर इन्दिरा गाँधी हो गयी।
सत्य के प्रयोग करने वाले गाँधीजी ने देश के साथ इतना बड़ा झूठ का प्रयोग कर डाला। यह मुस्लिमों के साथ भी छल था और हिन्दुओं के साथ भी छल था। जो सच है उसे क्यों छिपाया जा रहा था? क्या गाँधीजी की नजर में मुस्लिम होना ठीक नहीं था? क्या गाँधीजी की नजर में देश में हिन्दू और मुस्लिम के बीच सौहार्द नहीं था? यदि वे इस कटु सत्य को जानते थे और उस पर पर्दा डाल रहे थे तो यह देश की जनता के साथ छल था। उन्होंने जो भ्रम की स्थिति बनाई उसका फायदा अनेक लोगों ने उठाया और लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ किया। अनेक अभिनेताओं ने यही किया, वे वास्तव में मुस्लिम थे लेकिन उन्होंने हिन्दू नाम रख लिया। लोग उन्हें श्रद्धा की नजर से देख रहे थे, उनकी पूजा कर रहे थे लेकिन वे देश को धोखा दे रहे थे। गाँधीजी का यह झूठ के साथ प्रयोग देश के लिये खतरनाक खेल  बन गया। हिन्दू और मुसलमान दोनों ही एक दूसरे के प्रति बैर भाव रखने लगे क्योंकि गाँधीजी ने मुस्लिम को देशहित में छोटा सिद्ध किया था और हिन्दू के साथ छल किया था। अधिकांश हिन्दू समाज भी मुस्लिमों के साथ अविश्वास का भाव रखने लगा और जह किसी भी कौम पर अविश्वास पैदा होने लगे तब वह कौम भी आक्रामक बनकर खड़ी हो जाती है। मुस्लिम अपनी कट्टरता के कारण पहले ही देश के टुकड़े करवा चुके थे और अब अविश्वास का वातावरण उन्हें सुख की नींद नहीं लेने दे रहा था। परिणाम निकला कि वे कांग्रेस को ब्लेकमेल करने लगे। यदि तुम हमारे धार्मिक स्थलों पर जाकर सर झुकाओ तो तुम्हें वोट दें, नहीं तो नहीं दें। यदि तुम हमारी पहचान के परिधान पहनों तो तुम्हें वोट दें नहीं तो नहीं दें। ऐसे कितनी ही रोजमर्रा की ब्लेकमेलिंग  शुरू हो गयी।
इसलिये आज जो कुछ देश में हो रहा है वे सब गाँधीजी के झूठ के प्रयोग के कारण हो रहा है। उनके सारे ही श्रेष्ठ कार्य मिट्टी में मिल गये बस शेष रह गयी एक दूसरे के प्रति नफरत। जो जैसा है उसे वैसा ही स्वीकार करो, क्यों नाम बदलते हो, क्यों उपनाम बदलते हो और क्यों धर्म बदलते हो? मैंने कल भी यही कहा था कि यदि राहुल गाँधी खुद को ईसाई मानते हैं तो खुलकर कहें कि वे ईसाई हैं, यदि मुस्लिम मानते हैं तो खुलकर कहें कि मुस्लिम हैं और यदि हिदू मानते हैं तो खुलकर कहें कि हिन्दू हैं। लेकिन कभी नाम बदल लेना, कभी खुद को जेनुऊधारी बता देना, कभी टोपीधारी बता देना, यह उचित नहीं लगता। इस देश में अनेक धर्म के लोग रहते हैं, सभी को किसी भी पद पर आने का हक है तो यह छल क्यों! भावनाओं से खेलकर यदि आप गद्दी पर बैठ भी गये तो आप कैसे लोगों का दिल जीत पाएंगे! इसलिये गाँधीजी के सत्य के साथ प्रयोग ही कीजिये, झूठ के साथ प्रयोग मत करिये।

2 comments:

शिवम् मिश्रा said...

ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 10/05/2019 की बुलेटिन, " प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की १६२ वीं वर्षगांठ - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

अजित गुप्ता का कोना said...

शिवम् मिश्रा जी आभार।