Thursday, September 20, 2018

स्वयंसेवक स्वयंभू संघ बन गया


एक युग पहले हम सुना करते थे कि आचार्य रजनीश ने स्वयं को भगवान माना। सदी बदल गयी तो हमारे लिये युग बदल गया। फिर भगवान घोषित होने और करने का सिलसिला शुरू हो गया। कहीं खुद भगवान बन जाते तो कहीं शिष्य भगवान घोषित कर देते। आखिर भगवान क्यों बनना? हमने सर्व गुण सम्पन्न भगवान को माना है, यह चमत्कारी भी है, कुछ भी कर सकता है। इसलिये जब किसी को समाज में प्रतिष्ठित करना होता है तब हम उसे भगवान घोषित कर देते हैं, याने इससे ऊपर कोई नहीं, यह श्रद्धा का केन्द्र है। भगवान घोषित होते ही उनकी सारी बाते सर्वमान्य होने लगती हैं और उनकी शिष्य परम्परा में तेजी से वृद्धि होती है। तीन दिन से चली आ रही व्याख्यानमाला को सुनने के बाद, जिज्ञासा समाधान को भी सुनने के बाद और माननीय भागवत जी के समापन उद्बोधन सुनने के बाद मैं एक नतीजे पर पहुँची हूँ कि जैसे समाज में किसी को भी भगवान घोषित करने की परम्परा है वैसे ही समाज ने या स्वयं ने, संघ के किसी भी स्वयंसेवक को संघ घोषित करने की परम्परा है। संघ में एक कार्यकर्ता है जो उनका डिग्री कोर्स करता है और उनके ही विश्वविद्यालय में शिक्षक बन जाता है, उसे प्रचारक कहते हैं। एक कार्यकर्ता है जो वहाँ से शिक्षा लेता है और स्वयं का अधिष्ठान खोल लेता है, उसे उसी विश्वविद्यालय का अंग मानते हुए सम्पूर्ण स्वतंत्रता मिलती है। एक अन्य कार्यकर्ता है जो कभी शाखा में जाता है, कभी ड्राप आउट हो जाता है, लेकिन स्वयं को स्वयंसेवक कहता है।
हमारे समाज की परम्परा अनुसार हम इन्हें भगवान तो नहीं कहते लेकिन इन्हें संघ कह देते हैं। जब भी कोई बात आती है, हम कहते हैं कि संघ की यह इच्छा है। जब प्रश्न किया जाता है कि कौन है संघ, तो इन प्रभावशाली व्यक्तियों पर इशारा कर दिया जाता है। समाज इन्हें साक्षात संघ मान लेता है। जैसा की माननीय भागवत जी ने कहा कि संघ की विचारधारा समय के अनुरूप परिवर्तनशील है लेकिन उसका मूल बिन्दू राष्ट्रहित ही है। राष्ट्रहित में अनेक बार हिन्दुत्व में बदलाव किया गया है तो हम भी बदलाव करते हैं। अत: जब किसी भी व्यक्ति विशेष को संघ कह दिया जाता है तब उसकी प्रत्येक बात संघ की बात घोषित हो जाती है। उसका आचरण संघ का आचरण बन जाता है। हम अक्सर समाज में सुनते हैं कि संघ के लोग ऐसे होते हैं, वैसे होते हैं। जब एक प्रकार का विचार और आचरण प्रमुखता से परिलक्षित होने लगे तो मान्यता प्रगाढ़ हो जाती है। आज समाज में जो भ्रम और शंका की स्थिति बनी है वह इसी कारण से बनी है। संघ का ड्राप आउट स्वयंसेवक भी जब स्वयं को संघ कहने लगे तो स्थिति विकराल होने लगती है। यह स्थिति गम्भीर इसकारण भी हो गयी कि सोशलमिडिया की स्लेट हमें मिल गयी। जिस किसी के मन में आया उसने वह बात लिख दी। उसका खंडन करने वाला कोई नहीं तो वह बात भी संघ की मान ली गयी। जिन स्वयंसेवकों के विभिन्न क्षेत्रों में अधिष्ठान चल रहे हैं वे भी अपने अधिष्ठान की बढ़ोतरी के लिये स्वयं को संघ कहने लगे। वे नियंत्रण में रहें इसके लिये संघ ने संगठन मंत्री भी दिये लेकिन उसका भी कोई परिणाम नहीं निकला, क्योंकि उन संगठन मंत्री को भी स्वयं को संघ कहलाने में आनन्द आने लगा। समाज में भ्रम बढ़ते गये और संघ के विरोधी इन भ्रमों को हवा देते रहे और स्वयं को संघ घोषित किये हुए लोग वास्तविकता से दूर बने रहे। आज विकट स्थिति बन गयी है क्योंकि स्वयंभू घोषित संघ ने मनमाने प्रतिमान गढ़ लिये, उनके शिष्यों ने भी पत्थर की लकीर मानकर उनका अनुसरण किया लेकिन जब आज स्वयं माननीय भागवत जी ने कहा कि हम सब केवल स्वयंसेवक हैं और संघ विचार हिन्दुत्व की तरह परिवर्तनशील है, तब सामान्य व्यक्ति बगले झांकने लगा है। हम किसको सच माने, वह पूछ रहा है? राजनीति क्षेत्र की तो हालत ही पतली कर दी गयी, किसी भी राजनेता के खिलाफ फतवा जारी कर दिया गया कि यह संघ की मर्जी है। कार्यकर्ता दो भागों में बंट गये, एक सरेआम शोर मचाने लगे कि हटाओ-हटाओ और दूसरा कहने लगा कि यह अन्याय है। ऐसा ही वातावरण प्रत्येक अधिष्ठान में होने लगा, किसी को भी जब मन में आया निकालकर बाहर कर दिया गया, संघ की इच्छा के विरोध में भला कौन बोले? इसलिये यह तीन दिन की व्याख्यानमाला समाज के लिये हितकारी रही। स्वयं में संघ बने व्यक्तियों से संघ को कैसे बचाया जाए, अब यह प्रश्न विचारणीय होना चाहिये।
www.sahityakar.com

4 comments:

अजय कुमार झा said...

बहुत ही वाजिब प्रश्न उठाए हैं आपने

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (21-09-2018) को "गाओ भजन अनूप" (चर्चा अंक-3101) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।

smt. Ajit Gupta said...

अजय जी आभार

smt. Ajit Gupta said...

शास्त्रीजी आभार