Monday, May 15, 2017

पैसे से घर फूंकना

मैंने अपने मोबाइल का प्लान बदलवा लिया है, पोस्टपेड से अब यह प्री-पेड़ हो गया है। 395 रू. में 70 दिन के लिये मेरे पास 2 जीबी डेटा प्रतिदिन हैं और 3000 मिनट कॉल बीएसएनएल पर तथा 1800 मिनट कॉल अन्य फोन पर है। मैं बीएसएनएल का विज्ञापन नहीं कर रही हूँ, बस यह बताने की कोशिश करने जा रही  हूँ कि मेरे फोन के पास बहुत डेटा और मिनट हैं। जब शाम को देखती हूँ कि कितना बचा, तो पाती हूँ कि थोड़ा ही खर्च हुआ है लेकिन सारा दिन चिन्ता यही रहती है कि ज्यादा खर्च ना हो जाए? हमारी सम्पत्ती की भी यही स्थिति है, हर पल खर्चे की सोचते हैं कि ज्यादा खर्च नहीं करना है लेकिन शाम के अन्त में जिस प्रकार मेरे मोबाइल का डेटा बेकार हो जाता है वैसै ही यह बिना खर्चे यह सम्पत्ती भी जाया हो जाती है। सम्पत्ती वही है जो आपने खर्च ली है। जिन्दगी सस्ता तलाशते ही निकले जा रही है, बस कैसे भी चार पैसे बच जाएं सारा दिन इसी चिन्ता में घुले जा रहे हैं।
लेकिन दूसरी तरफ यह भी सोच है कि कुछ डेटा तो काम में ले ही लें। मन करता है कि फ्री मूवी ही डाउनलोड कर लें, जिससे 2जीबी का उपयोग हो जाए। जिस पैसे का भविष्य स्पष्ट दिखायी देता है कि खर्च नहीं किया तो आयकर वालों को देना ही पड़ेगा तब हम बिना सोचे समझे खर्चा कर बैठते हैं। तब यह भी नहीं सोचते कि यह खर्चा हमारी मर्यादा को ही छिन्न-भिन्न कर रहा है, लेकिन हम कर लेते हैं। जैसे अभी कुछ लोगों ने किया बीबर का शो देखने चले गये 75000 रू. की टिकट  लेकर। बस पैसे को ठिकाने लगाना था तो ऐसी जगह पैसा फूंक दिया जहाँ से जहरीला धुआँ हमारे घर की ओर  ही आया। शादी में भी हम यही करते हैं। आयकर से छिपाकर रखे पैसे को फूंकना शुरू करते हैं और सभ्यता व असभ्यता की सीमा ही भूल जाते हैं। उदयपुर में ऐसे तमाशे रोज होते ही रहते हैं, भव्य शादियों में महिला संगीत के नाम पर नृत्यांगनाओं को बुलाने की परम्परा सी बना दी गयी है। ऐसे में असभ्यता की सीमाएं पार होती रहती हैं और परिवार इसके घातक परिणाम को बाद में भुगतता है।

इसलिये आपके सात्विक खर्च के बूते से बाहर का पैसा सुखदायी के स्थान पर दुखदायी हो जाता है। आज देश की सबसे बड़ी समस्या यही है। मैं जब फतेहसागर के पिछले छोर पर मोटरसाइकिल की अन्धाधुंध दौड़ देखती हूँ तब यही लगता है कि यह माता-पिता का नाजायज पैसा है जिसे अपनी जायज संतान को देकर उसके जीवन को अधरझूल में डाला जा रहा है। कहीं इस नाजायज पैसे से तिजोरी में हीरे-जवाहरात भरे जा रहे  हैं तो कहीं यह  पैसा बीबर जैसे अनर्गल शो में जाया किये जा रहे हैं। पैसा फूंकना अलग बात है और घर फूंकना अलग बात है। पैसे ठिकाने लगाने हैं तो कृत्य और अकृत्य का भान भी हम भुला देते हैं। इसलिये देश में जैसे-जैसे पैसा बढ़ रहा है वैसे-वैसे असभ्यता भी बढ़ रही है। मेरे मोबाइल का डेटा बिना खर्च किये ही बर्बाद हो जाए तो चिन्ता नहीं बस कहीं मैं आलतू-फालतू मूवी डाउनलोड कर अपनी आदतों को गलत राह ना दिखा दूँ. यही चिन्ता है। 

Sunday, May 14, 2017

कस्तूरी मृग है - माँ

कस्तूरी मृग का नाम सुना ही होगा आप सभी ने। कहते हैं कुछ  हिरणों की नाभि में कस्तूरी होती है और कस्तूरी की सुगंध अनोखी होती है। हिरण इस सुगंध से बावरा सा हो जाता है और सुगंध को सारे जंगल में ढूंढता रहता है। उसे पता ही नहीं होता है कि यह सुगंध तो उसके स्वयं के अन्दर से ही आ रही है! माँ भी ऐसी ही होती है। उसके अन्दर भी ममता नामक कस्तूरी होती है। इस कस्तूरी की सुगंध भी सारे जगत में व्याप्त  होती है। माँ को  भी पता नहीं होता कि उसकी ममता अनोखी है, अनमोल है और यह केवल उसी में है। जब कोई भी महिला माँ बनती है तो यह ममता  रूपी कस्तूरी उसके अन्दर बस जाती है, वह महिला कस्तूरी मृग की तरह विशेष हो जाती है। सृष्टि की सारी माताएं फिर चाहे वे पशु हो या पक्षी सभी में ममता का वास है। ये ही ममता संतान का सुरक्षा चक्र है।
हिरण को पता नहीं है कि उसके अन्दर कस्तूरी है और संतान को पता नहीं है कि माँ के अन्दर ममता है। हिरण जंगल में भटकता है और संतान ममता की गंध को नजर अंदाज कर प्यार की गंध के पीछे दौड़ता है, यही प्रकृति है। संतान को समाधान मिल जाता है लेकिन ममता को नहीं। मुझे देवकी का स्मरण होता है, कृष्ण को उससे छीन लिया गया है, वह नन्हें बाल-गोपाल बना लेती है और सारा दिन बाल-गोपाल के साथ कभी स्नान तो कभी भोजन और कभी निद्रा का खेल खेलती है और अपनी ममता को जीवित रखती है। क्योंकि स्त्री की ममता ही उसे सभी से विशेष बनाती है, बस ये ही शाश्वत रहनी चाहिये क्योंकि जो शाश्वत है वही सत्य है।

बुढ़ापे ने दस्तक दे दी है, संतान भी पास नहीं है तब ममता भी कठोरता धारण करने लगती है, ऐसे में विश्व मातृ-दिवस मनाता है और मुझे कस्तूरी मृग का ध्यान हो जाता है। ममता मुझे अमूल्य लगने लगती है और मैं इसके संरक्षण की बात सोचने लगती हूँ। इस एक-तरफा प्यार को बनाये रखने का उपाय ढूंढने लगती हूँ जिससे कस्तूरी की सुगंध जगत में हमेशा व्याप्त रहे। जिस ममता नें माँ को अमूल्य बना दिया वह ममता शाश्वत रहनी चाहिये तभी यह ममता सत्य बनेगी। जो भी माँ है वह अनोखी है और इस अनोखेपन को दुनिया नमन करती है। आज मातृ-दिवस है तो दुनिया में कस्तूरी गंध की तरह व्याप्त ममता को घारण करने वाली माँ को नमन। 

Friday, May 5, 2017

राग पैदा करो – वैराग्य आ जाएगा

कल अपनी एक मित्र से फोन पर बात हो रही थी, वे बोली की दुनिया की इन्हीं  बातों के कारण मुझे वैराग्य हो गया है। पता नहीं क्यों यह शब्द मुझे कई  पलों तक झकझोरता रहा और आखिर किसी दूसरी बात में लपेटकर मैंने कहा कि मैं तो राग की बात करती हूँ, आज राग ही नहीं है तो वैराग्य कहाँ से आएगा! जब हमारे मन में किसी दूसरे के  प्रति राग उत्पन्न होता है तब अपने से वैराग्य आता है। माँ संतान के जन्म देती है, संसार के सबसे बड़े राग को अपने अन्दर धारण करती है लेकिन इस राग के कारण स्वयं के सुख-दुख से वैराग्य धारण कर लेती है। एक सैनिक जमाव बिन्दु से 40 डिग्री नीचे के तापमान में अपने देश की सीमाओं की सुरक्षा करता है, वह देश से राग करता है और बदले में अपने सारे शारीरिक कष्टों के प्रति वैरागी हो जाता है। विवेकानन्द जैसा सामाजिक उद्धारक अपनी संस्कृति से राग करता है तब परिव्राजक बनकर अपने सारे ही सुखों से वैराग्य ले लेता है। आज हम केवल स्वयं से राग करते हैं, अपने अहंकार से चिपटे हुए हैं। बस परिवार में, समाज में और हो सके तो दुनिया में मेरी ही बात मानी जाए या मेरी ही सत्ता स्थापित  हो जाए। आज सारी दुनिया आतंक के साये में क्यों जी रही है? कारण है अपनी मान्यताओं के  प्रति राग। हम सारी दुनिया को एक ही रंग में रंगना चाहते हैं। आज जितने भी मत-मतान्तर हैं, वे सारे ही विस्तार की चाह रखते हैं। विवेकानन्द ने कहा था कि मैं दुनिया को अपनी संस्कृति के बारे में बताने आया  हूँ ना कि धर्मपरिवर्तन करने।
जब हम दूसरों से राग करते हैं या प्रेम करते हैं तब उसके प्रति झुकते हैं, अपने अहंकार का दमन करते हैं और जब हमारे अहंकार का नाश होता है तभी वैराग्य आता है। संन्यासी अक्सर गृहस्थों को कहते हैं कि त्याग करो और भोजन में कोई भी वस्तु त्याग दो। हम हमारी अप्रिय वस्तु छोड़ देते हैं। संन्यासी कभी नहीं कहते कि तुम संग्रह छोड़ दो या गलत तरीके से अर्जित धन का त्याग कर दो, इसके विपरीत वे ऐसी सम्पत्ति से खुद को बांध लेते हैं। बड़े-बड़े धार्मिक स्थान इस बात की गवाही दे रहे हैं। इसलिये मैं कहती हूँ कि अपनों के प्रति राग करो, अपने समाज के प्रति राग से भर जाओ, अपने देश के प्रति राग में डूब जाओ। अपने देश, समाज या अपनों के प्रति राग करने से अपने मन को समर्पित करना पड़ता है, तन के कष्ट उठाने पड़ते हैं और धन का दान करना पड़ता है, याने अपने से वैराग्य पैदा करना पड़ता है। इसलिये वैराग्य के आडम्बर में मत उलझो, राग के पाश में बंधने का प्रयास करो। जैसे  ही राग आएगा वैराग्य तो स्वयं ही आ जाएगा।

यहाँ मैंने आप सभी से राग में बंधकर अपनी बात कही है, आपके विचार भिन्न होंगे ही, लेकिन यह मेरे विचार हैं। आप अपने विचार भी खुलकर रख सकते हैं। 

Saturday, April 8, 2017

तू इसमें रहेगा और यह तुझ में रहेगा

प्रेम में डूबे जोड़े हम सब की नजरों से गुजरे हैं, एक दूजे में खोये, किसी भी आहट से अनजान और किसी की दखल से बेहद दुखी। मुझे लगने लगा है कि मैं भी ऐसी ही प्रेमिका बन रही हूँ, चौंकिये मत मेरा प्रेमी दूसरा कोई नहीं है, बस मेरा अपना मन ही है। मन मेरा प्रेमी और मैं उसकी प्रेमिका। हम रात-दिन एक दूजे में खोये हैं, आपस में ही बतियाते रहते हैं, किसी अन्य के आने की आहट भी हमें नहीं होती और यदि कोई हमारे बीच आ भी गया तो हमें लगता है कि अनावश्यक दखल दे रहा है। मन मुझे जीवन का मार्ग दिखाता है और मैं प्रेमिका का तरह सांसारिक ऊंच-नीच बता देती हूँ, मन कहता है कि आओ कहीं दूर चलें लेकिन मैं फिर कह देती हूँ कि यह दुनिया कैसे छोड़ दूं? मन मुझे ले चलता है प्रकृति के निकट और मैं प्रकृति में आत्मसात होने के स्थान पर गृहस्थी की सीढ़ी चढ़ने लगती हूँ। हमारा द्वन्द्व मान-मनोव्वल तक पहुंच जाता है और अक्सर मन ही जीत जाता है। मैं बेबस सी मन को समर्पित हो जाती हूँ। मन मेरा मार्गदर्शक बनता जा रहा है और मैं उसकी अनुयायी भर रह गयी हूँ।
यह उम्र ही ऐसी है, उसमें मन साथ छोड़ता ही नहीं, जब जागतिक संसार के लोग साथ छोड़ रहे होते हैं तब यह मन प्रेमी बनकर दृढ़ता से हमें आलिंगनबद्ध कर लेता है। मैं कहती हूँ हटो, मुझे ढेरों काम है लेकिन मन कहता है कि नहीं, बस मेरे पास बैठो, मुझसे बातें करो। मैं कहती हूँ कि आज बेटे से बात नहीं हुई, मन कहता है – मैं हूँ ना। मैं तुम्हें उसके बचपन में ले चलता हूँ, फिर हम दोनों मिलकर उसके साथ ढेरों बात करेंगे। मन कहता है कि आज बेटी क्या कर रही होगी, सभी मन बोल उठता है कि चलो मेरे साथ रसोई में, उसकी पसन्द के साथ बात करेंगे। मैं और मेरा मन अक्सर बाते करते रहते हैं – ऐसा होता तो कैसा होता, नहीं हम ऐसी बात नहीं करते। हम सपने देखते हैं खुशियों के, हम सपने देखते हैं खुशहाली के, हम सपने देखते हैं खुशमिजाजी के।
इन सपनों के कारण दुनिया के गम पीछे छूट जाते हैं, कटुता के लिये समय ही नहीं बचता और झूठ-फरेब गढ़ने का काम अपना नहीं लगता। बस हर पल हम दोनों का साथ, हर पल को जीवंत करता रहता है। किसी अकेले को देखती हूँ तो मन कहता है कि यह कहाँ अकेला है, अपने मन को क्यों नहीं पुकार लेता? मन को पुकार कर देख, कैसे तेरा अपना होकर रहता है, फिर तुझे किसी दूसरे की चाह होगी ही नहीं। तू अकेला नहीं निकलेगा कभी किसी का साथ ढूंढने, तेरा मन हर पल तेरे साथ होगा, बस आवाज दे उसे, थपथपा दे उसे, वह दौड़कर तेरे पास आ जाएगा। तुझसे बाते करेगा, तेरा साथी बनकर रहेगा। परछाई भी रात को साथ छोड़ देती है लेकिन यह गहरी अंधेरी रात में तेरे और निकट होगा, तू इसमें रहेगा और यह तुझ में रहेगा।

Tuesday, April 4, 2017

काश पैसा भी बासी होने लगे

हमारी एक भाभी हैं, जब हम कॉलेज से आते थे तब वे हमारा इंतजार करती थीं और फिर हम साथ ही भोजन करते थे। उनकी एक खासियत है, बहुत मनुहार के साथ भोजन कराती हैं। हमारा भोजन पूरा हो जाता लेकिन उनकी मनुहार चलती रहती – अजी एक रोटी और, हम कहते नहीं, फिर वे कहतीं – अच्छा आधी ही ले लो। हमारा फिर ना होता। फिर वे कहतीं कि अच्छा एक कौर ही ले लो। आखिर हम थाली उठाकर चल देते जब जाकर उनकी मनुहार समाप्त होती। कुछ दिनों बाद हमें पता लगा कि इनके कटोरदान में रोटी है ही नहीं और ये मनुहार करने में फिर भी पीछे नहीं है, जब हम हँसकर कहते कि अच्छा दो। तब वे हँस देती।
दूसरा किस्सा यह भी है कि एक अन्य भाभी कहती कि रोटी ले लो, हम कहते नहीं। फिर वे कहती कि देखो ले लो, नहीं तो सुबह कुत्ते को डालनी पड़ेगी।
कहने का तात्पर्य यह है कि रोटी है या नहीं लेकिन मनुहार अवश्य  है। रोटी बेकार होगी इससे अच्छा है कि इसका उपयोग हो जाए। लेकिन कभी किसी ने सुना है कि जेब में धेला नहीं और कोई कह रहा हो कि ले पैसे ले ले। या कोई कह रहा हो कि ले ले पैसे, नहीं तो बेकार ही जाएंगे। रोटी तो बेकार नहीं जाती लेकिन पैसे हमेशा बेकार ही जाते हैं। मनुहार तो छोड़ो, हिम्मत ही नहीं होती पैसे खर्च करने की। कल मुझे एक चीज मंगानी थी, ऑनलाइन देखी, मिल रही थी। फिर कीमत देखी तो कुछ समझ नहीं आया, ऐसा लगा कि 500 रू. की आधाकिलो है। मैंने पतिदेव को बताया कि यह चीज लानी है, यदि बाजार में मिल जाए तो ठीक नहीं तो ऑनलाइन मंगा लूंगी। जैसे ही 500 रू. देखे, एकदम से उखड़ गये, मैंने कहा कि क्या हुआ। ऐसा लगा कि सेट होने में कुछ समय लगा लेकिन फिर मैंने देखा कि 90 रू.की 200 ग्राम  है। 90 रूपये देखते  ही बोले कि कल ही ले आऊंगा। यह है हम सबकी मानसिकता, पैसे का पाई-पाई हिसाब और मन का कोई मौल नहीं। इतना ही नहीं यदि कोई वस्तु गुम हो गयी और वह मंहगी है तो चारों तरफ ढिंढोरा और सस्ती है तो चुप्पी। हमें चीज खोने का गम नहीं लेकिन मंहगी चीज खोने का गम है।

हम सब पैसे के  पीछे दौड़ रहे हैं, जितना संचय कर सकते हैं करने में जुटे हैं लेकिन यह भी बासी होगा और इसका उपयोग कौन करेगा, कोई चिंतन ही नहीं है। कोई नहीं कहता कि खर्च कर लो नहीं तो बेकार ही जाएगा। रोटी तो बासी हो जाती है, कुत्ते को डालनी पड़ती है लेकिन पैसा बासी नहीं होता। पैसे की मनुहार भी हम अपने बच्चों से ही करते  हैं – बेटा रख ले, काम आएगा, माँ अपने पल्लू से निकालकर बेटे की जेब में डालती जाती है। लेकिन यदि बेटे को जरूरत नहीं है तो इसका क्या उपयोग होगा हम समझना ही नहीं चाहते। बस संग्रह में लगे हैं, उसका समुचित उपयोग करने में भी हम पीछे हट जाते  हैं। अपने मन की नहीं करने पर हमारा मन कितना पीड़ित  हुआ इसका हिसाब कोई नहीं लगाता लेकिन करने पर कितना पैसा खर्च हुआ, हर आदमी गाता फिरता है। हम घूमने गये, वहाँ कितना खर्चा किया और कितना हम वसूल पाये, इसका तो हिसाब लगाते रहे लेकिन हमारा मन कितना तृप्त हुआ ऐसा हिसाब नहीं लगा पाए। हमारे मन को जो हमारी आत्मा से जुड़ा है, अतृप्त छोड़ देते हैं और पैसे को जोड़-जोड़कर संचय करते रहते हैं। मन क्षीण होता जाता है और पैसे के ढेर लग जाते हैं। काश पैसा भी बासी  होने लगे, कुत्ते की जगह अपनों को ही खिलाने का रिवाज बन जाये या फिर सभी परिवारजन को मनुहार से देने का मन बन जाए। 

Monday, April 3, 2017

कोई शर्त होती नहीं प्यार में

पूरब और पश्चिम फिल्म का एक गीत मुझे जीवन के हर क्षेत्र में याद आता  है – कोई शर्त होती नहीं प्यार में, मगर प्यार शर्तों पे तुमने किया ......। लड़की के रूप में जन्म लिया और पिताजी ने लड़के की तरह पाला, बस यही प्यार की पहली शर्त लगा दी गयी। हम बड़े गर्व के साथ कहते रहे कि हमारा बचपन लड़कों की तरह बीता लेकिन आज लगता है कि यह तो एक शर्त ही हो गयी। हम लड़की के रूप में बचपन को संस्कारित क्यों नहीं कर पाए? समाज का यह आरक्षण कितना कष्टकारी है, आज अनुभव में आने लगा है। अक्सर पुरुष बहस करते हैं, वे अपने मार्ग का रोड़ा महिला को मानते हैं। कई चुटकुले भी प्रचारित करते हैं कि मोदी जी अकेले और योगीजी अकेले, इसलिये ही इतनी उन्नति कर पाए। लेकिन संघर्ष क्या होता है, यह शायद पुरुषों को मालूम ही नहीं। जब आप जन्म लें और आपका व्यक्तित्व ही बदल जाए, जब आपके व्यक्तित्व को ही नकार दिया जाए, तब शुरू होता है संघर्ष। जब महिला होने के कारण आप विश्वसनीय ही नहीं रहें, आप की बुद्धि चोटी में है, कहकर आपकी उपेक्षा की जाए, तब शुरू होता है संघर्ष। आप केवल उपयोग और उपभोग की ही वस्तु बनकर रह जाएं तब शुरू होता है संघर्ष। आप पुरुष के संरक्षण में रहने के लिये बाध्य कर दी जाएं, तब शुरू होता है संघर्ष। आपको अपने तथाकथित घर से दूसरे घर में स्थानान्तरित कर दिया जाए, आपका नाम और उपनाम बदल दिया जाए, तब होता है संघर्ष। इतने प्रारम्भिक संघर्षों के बाद किसी  पुरुष ने अपना जीवन प्राम्भ किया है क्या?
विवाह के बाद घर बदला, संरक्षण बदला, अभी जड़े जमी भी नहीं कि उत्तरदायित्व की बाढ़ आ गयी। उपयोग और उपभोग दोनों ही खूब हुआ लेकिन जब निर्णय में भागीदारी की बात आये तो आप को पीछे धकेल दिया जाए। नौकरी की, लेकिन यहाँ भी निर्णय के समय अन्तिम पंक्ति में खड़ा कर दिया जाए। आप योग्य होकर भी अपने निर्णय नहीं ले सकते, क्योंकि आप पुरुषों के कब्जाए क्षेत्र में हैं। फिर ताने ये कि आपका क्या, आपकी एक मुस्कान  पर ही काम  हो जाते हैं। मतलब आप उपभोग की वस्तु हैं। मैंने अपने जीवन में अनेक प्रयोग किये, अनेक बदलाव किये। जब काम की स्वतंत्रता नहीं तो मन उचाट होने लगा और लेखन की ओर मुड़ने लगा। लेकिन महिला होने के संघर्ष को कभी स्वीकार नहीं किया, ऐसा लगता रहा कि ये संघर्ष तो सभी के जीवन में आते  हैं। एक जगह यदि महिला के साथ संघर्ष है तो क्या दूसरे क्षेत्र में नहीं होगा। नौकरी छोड़ दी और सामाजिक कार्य की राह पकड़ी। माध्यम बना लेखन। लेकिन अनुभव आने लगा कि यहाँ भी महिला  होना सबसे बड़ी पहचान है। लेखन के माध्यम से जैसे ही प्रबुद्ध पहचान बनने लगी, आसपास हड़कम्प मच गया। यह परिवर्तन स्वीकार्य नहीं हुआ, कहा गया कि कार्य बदलो। लेकिन मुझे अभी और अनुभव लेने शेष थे। अभी भी मेरा मन नहीं मानता था कि यह संघर्ष महिला होने का है। फिर नया काम, नये लोग लेकिन अंत वही कि महिला को महिला की ही तरह रहना होगा, निर्णय की  भागीदारी नहीं मिलेगी। कितने ही लोग आए, कितने ही काम आए, लेकिन सभी जगह एक ही बात की आप काम करें लेकिन नाम हमारा होगा। इतनी मेहरबानी भी तब मिलेगी जब आप उनके लिये उपयोगी सिद्ध होंगी।

आखिर सारा ज्ञान और अनुभव लेने के बाद यह समझ आने लगा कि महिला के संघर्ष को केवल महिला ही भुगतती है, जिन्दगी भर जिस बात को नकारती रही, उसी बात पर आज दृढ़ होना पड़ा कि मेरे संघर्ष अन्तहीन हैं। घर से लेकर बाहर तक मुझे संघर्ष ही करना पड़ेगा। किसी महिला के संघर्ष को पुरुष के संघर्ष से मत तौलो। पुरुष का संघर्ष केवल उसका खुद से है जबकि महिला का संघर्ष सम्पूर्ण समाज से है। हमारा संघर्ष हमारे गर्भाधान से शुरू होता  है, भाग्य से बच गये तो जीवन मिलता है, जीवन मिलता है तब या तो पुरुष की तरह पाला जाता  है या पुरुषों के लिये पाला जाता है। फिर जीवन आगे बढ़ता है तो दूसरे गमले में रोपकर बौंजाई बना दिया जाता है, बौंजाई पेड़ से एक वट-वृक्ष के समान छाया की उम्मीद की जाती है। संघर्ष अनन्त हैं, संघर्ष करते-करते मन कब थकने लगता है और फिर भगवान से मांग बैठता है कि अगले जन्म मोहे बेटी ना कीजो। लेकिन यदि पुरुषों के कब्जाए संसार को मुक्त करा सकें तो इतना संघर्ष करने के बाद मीठे ही मीठे फल लगे दिखायी देंगे और हर महिला गर्व से कह सकेंगी कि अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो। बस जिस दिन समाज की शर्तें समाप्त  हो जाएंगी, जब महिला कह सकेगी कि कोई शर्त होती नहीं प्यार में......। 

Saturday, April 1, 2017

इस गर्मी को नमन

और अंतत: आज एक तारीख को गर्मी ने एलान कर ही दिया कि मैं आ गयी हूँ। अब से अपने कामकाजी समय में परिवर्तन कर लो नहीं तो मेरी चपेट में आ सकते हो। स्कूल ने अपने समय बदल लिये, क्योंकि नन्हें बच्चे गर्मी की मार कैसे सहन कर सकेंगे। अस्पतालों ने भी समय बदल लिए क्योंकि बेचारे रोगी इतने ताप को कैसे सहन कर पाएंगे। और तो और पैसे के लेखा-जोखा ने भी आज से नयी शुरुआत कर दी है, गर्मी में हम नये तेवर के साथ रहेंगे। वस्त्र भी बदल गये हैं, पुराने संदूक में चले गये और नये पतले से और झीने से बाहर आ गये हैं।
सड़के तपने लगी हैं, कहीं पिघलने भी लगी हैं। तालाबों से पानी उड़ने लगा है। बालू रेत का तापमान भूंगड़े सेकने के लिये पर्याप्त हो गया है। प्रकृति गर्मी की तलाश कर रही है और प्राणी पेड़ों की छांव की तलाश कर रहे हैं। सूरज को शीघ्रता होने लगी है और वह सुबह जल्दी ही उदय होने लगा है, शाम को भी वह खरामा-खरामा ही यहाँ से दूर जाता है। लेकिन पक्षियों की रौनक लौट आयी है, भोर होते ही उनकी चहचहाट शुरू हो जाती है और शाम के साथ ही अपने-अपने ठिकाने में लौट आने की ताबड़-तोड़ कोशिश भी। अब प्रकृति अपने हिस्से की गर्मी खींच लेगी, सारी सृष्टि के रोम-रोम को विसंक्रमित कर देगी और जब ताप अपने उच्च माप पर जा पहुंचेगा तब अमृत वर्षा होगी।

इसलिये आज नव संकल्प प्रारम्भ हुआ है, गर्मी को आत्मसात करने का। सूर्य के आक्रोश को प्रकृति के सहारे झेलने का। प्रकृति की महत्ता समझने का। प्रकृति के एक-एक तत्व को सम्भालकर रखने का उसके संवर्द्धन करने का। सूर्य का ताप हमेशा से वृक्ष ही झेलते आए हैं तो आओ हम संकल्प करें कि अपने हिस्से के और जो असमर्थ हैं उनके हिस्से के भी वृक्ष लगाकर प्रकृति को ताप से बचाएंगे। सूर्य तो अपने चक्र के अनुसार ही कार्य करेगा लेकिन यदि हम प्रकृति को वृक्षों से लाद दें तो हमें शीतलता जरूर मिलेगी, हम भी बिना एसी खुली हवा में सांस ले सकेंगे। विचार शुरू कर दीजिये, शीघ्र ही पेड़ लगाने का अवसर प्रकृति देंगी तो हम अपनी तैयारी अभी से कर लें। हमें अपना कर्तव्य स्मरण कराने के लिये इस गर्मी को नमन।