Thursday, March 4, 2010

हँसी ने मित्र बनाया और हँसी ही गायब हो गयी

उसकी खनखनाती हँसी ऐसे लग रही थी जैसे झरना कलकल बह रहा हो, या सुदूर पहाड़ों के मध्‍य कहीं से मन्दिर की घण्टियां बज उठी हों। मैं उसकी तरफ खिचने लगी। मन कर रहा था कि यह ऐसी ही हँसती रहे और मैं उस निर्मल हँसी का पान करती रहूँ। मैंने अपनी दोस्‍ती का हाथ तत्‍काल ही बढ़ा दिया। उसने भी मेरा हाथ थाम लिया। दोस्‍ती की पींगे बढ़ने लगी, सारा दिन हँसी-ठहाकों में ही गुजरने लगा। लेकिन बस कुछ ही दिनों का यह खेल था, धीरे-धीरे मेरे कंधों पर उसके सर का बोझ बढ़ने लगा और मेरा आँचल उसके आँसुओं से सरोबार हो गया। अब हमारे बीच दोस्‍ती तो थी लेकिन जो हँसी हमारी दोस्‍ती का कारण बनी थी वो गायब हो गयी थी। बस सारा दिन रुदन सुनना ही मेरी नियति रह गयी थी।

ऐसा बहुत ही कम होता है जब कोई महिला खुलकर हँसती हो। मैंने अक्‍सर महिलाओं का रुदन ही सुना है। यदि कभी हँसने का मन हुआ भी तो आँचल को मुँह पर ढापकर दबे स्‍वर में हँसती हैं। झरने की तरह कलकल बहना या फिर मन्दिर की घण्टियों सा बजना कितने लोगों को नसीब होता है? बस मैं ऐसे अवसर पर महिला होकर भी महिला पर फिदा हो जाती हूँ। जिस डाल पर फूल झूम-झूम कर नाच रहा हो, जिसमें जीवन का उत्‍साह झलकता हो, चंचलता और शोखी हवा में बिखर जाती हो, ऐसे फूल को तो हर कोई अपनी बगिया में लगाना चाहता है। बचपन से ही जब भी घर की डाँट-डपट से मन दुखी होता था तब एकाध बार ऐसा भी हुआ कि ऐसी ही निर्मल हँसी कहीं से सुनायी दे गयी, बस मैं उस हँसी को देखती ही रहती थी। मुझे लगता था कि यहाँ बैठकर कुछ पल हँसी-खुशी से बिताए जा सकते हैं। सारे ही गम यहाँ भुलाए जा सकते हैं।

दोस्‍ती बढ़ने लगती, कुछ दिन बेहद अच्‍छा लगता। मैं बड़ी ही संजीदगी से हर रिश्‍ते को लेती लेकिन बस कुछ दिन ही निकलते और उस हँसी के पीछे का रुदन सामने आ खड़ा होता। सच्‍चा श्रोता जानकार मुझे छिपे हुए सारे ही क्‍लेष सुना दिए जाते और मुझे लगने लगता कि जिस हँसी के पीछे मैंने अपने रुदन छिपाए थे, आज दूसरों के रुदन को भी गले लगाना पड़ रहा है। ऐसा अक्‍सर हुआ, जितनी हँसी, उतना ही रुदन। लोग कहते भी हैं कि अपना रुदन छिपाने के लिए ही यह हँस रहा है। लेकिन यह आकर्षण जो होता है, वह मन का ऐसा भाव है कि बस जिस बात को भी पकड़ले मानता ही नहीं। अब मेरे मन ने इसी भाव को पकड़ा हुआ है। बस जहाँ भी निर्मल हँसी कान में पड़ी और मुझे लगता है कि यह दोस्‍ती के लायक है। लेकिन यह भ्रम बस कुछ ही दिन रहता है, शेष समय तो रुदन सुनने में ही निकलता है।

ब्‍लोगिंग करते समय भी रिश्‍ते तो बन ही जाते हैं। किसी की खनकदार हँसी आकृष्‍ट भी करती है। लेकिन मन डरने लगा है उसके पीछे छिपे रुदन से। क्‍या आपके साथ भी ऐसा ही होता है जब आप किसी जिन्‍दादिल इंसान को अपना मित्र बनाते हो और उसका रुदन आपके जीवन का सत्‍य बन जाता हो? अब तो मैं मित्र बनाने से डरने लगी हूँ लेकिन मन की फितरत कभी मिटती नहीं। क्‍या कुछ मुठ्ठी भर ऐसे लोग हैं दुनिया में, जो बस केवल जीवन को हँसी के सहारे ही गुजार दें? अपने गमों के लिए कंधा नहीं तलाशें। दुख की घड़ी में रो भी लें लेकिन वो स्‍थाई भाव नहीं बने। बस जिन्‍दगी में हर गम को हँसी में उड़ा दे। मैं ऐसा मित्र-मण्‍डल बनाना चाहती हूँ जहाँ केवल हँसी हो, बस हम हँसने के बहाने तलाश करें। कौन साथ देगा मेरा?

Friday, February 26, 2010

दोहती का जन्‍मदिन है, आशीष दीजिए

दिनांक 28 फरवरी को हमारी दोहिती 'मिहिका' उर्फ चीयां का प्रथम जन्‍मदिन है। हम तो उसे आशीष देने आज ही पुणे जा रहे हैं। उसके लिए एक गीत लिखा है आप भी पढ़िए और हमारे साथ उसे  आशीष दीजिए। इस बार होली भी पुणे की ही रहेगी। होली पर भी हमारी ओर से सभी को शुभकामनाएं। आपके जीवन में जब कभी भी हिरण्‍यकश्‍यप जैसी महत्‍वाकांक्षा जन्‍म ले, साथ ही प्रहलाद रूपी संयम का भी अवतरण हो। इन्‍ही शुभकामनाओं के साथ होली की राम-राम। लीजिए गीत - 

खुशबू जैसे मन में बस गयी
जब तू आयी थी
होठों पर मुस्‍कान खिल गयी
जीवन दे गयी थी।

कलियों जैसे पलके खुलती
आँखों में तू मेरे बसती
पहले-पहले छूना तुझको
अधरों से तू गुनगुन करती
गोदी मेरी जन्‍नत बन गयी
खुशियां दे गयी थी।

पलटी जब तू डाली थिरकी
बैठी जब तू फूल खिला हो
घुटनों पर दौड़ी तू ऐसे
तितली उड़ती झूम रही हो
खिल-खिल तेरी घर में बस गयी
रौनक हो गयी थी।

उतराती चढ़ती तू ऐसे
चिड़िया जैसे फुदक रही हो
नन्‍हें पैरों से इठलाती
डाली जैसे झूम रही हो
रुन-झुन तेरी मन में बस गयी
जब तू चलती थी।

पल-पल जैसे बढ़ती थी तू
मन मुसकाता था
हर पल तुझको देख सकू मैं
मन यह कहता था
एक साल की आज हो गयी
मन्‍नत मेरी थी।

- नानी

Wednesday, February 24, 2010

जब कोई प्‍यार में हो तब वह सही होता है

एक फिल्‍म आयी थी ‘जब वी मेट’ उसके नायिका एक संदेश देती है कि जब कोई प्‍यार में हो तो वह बिल्‍कुल सही होता है। फिल्‍म देखने के बाद यह संदेश गले नहीं उतरा, बहुत चिंतन-मनन हुआ। फिर एक दिन अचानक ही दिमाग की बत्ती जली, ज्ञान का प्रकाश फैल गया। मुझे सुनायी देने लगी गाय के जोर-जोर से रम्‍भाने की आवाजें। बचपन में बहुत सुनी थी क्‍योंकि घर पर गाय थी। लेकिन तब समझ नहीं आता था कि गाय के रम्‍भाने की आवाज से घर वाले विचलित क्‍यों हो जाते हैं? वे उसे जंगल में छोड़ देते थे, दूसरे दिन उसका रम्‍भाना या चिल्‍लाना बन्‍द हो जाता था। कोई नहीं कहता था कि गाय को क्‍या हुआ है? बस सब उसकी चिन्‍ता करते थे और उसकी शारीरिक और मानसिक क्षुधा को पूरा करने का प्रयास।

ऐसा ही मनुष्‍यों के साथ होता है, प्‍यार में पड़ने पर आवेश जन्‍म लेता है। अब मनुष्‍य सामाजिक प्राणी है तो कुछ कायदे-कानून के साथ मनुष्‍य को जीना पड़ता है। वह पशु नहीं कि उसको आवेश आया और उसकी पूर्ति कर दी गयी। वो अलग बात है कि बेचारे पशु को आवेश छठे-चौमासे ही आता है। लेकिन मनुष्‍य को तो ऐसा आवेश प्रतिदिन ही आ जाता है। अब मैं उस फिल्‍म की नायिका की बात मानूं या अपने समाज के कानून की। वो तो मनुष्‍य को पशु के समान तौलकर अपना निर्णय सुना रही थीं जबकि हम कानून से बंधे हैं। फिल्‍म के नायक को बात समझ आ गयी और उसने अपनी माँ को माफ कर दिया। बात माफी की हो तब तक तो ठीक है, लेकिन जब कानून तक चले जाए तब क्‍या करें? किसी का परिवार टूट जाए तब क्‍या करें? जैसे मटूकनाथ वाले केस में बेचारी पत्‍नी का परिवार टूट गया। मैं आप सब से और उस फिल्‍म के निर्देशक से जानना चाहती हूँ कि क्‍या वो वाक्‍य मनुष्‍यों के लिए सही है? यह फिल्‍म बहुत पहले आ चुकी लेकिन मेरी बत्ती कुछ देर से जली इसके लिए भी क्षमा चाहती हूँ। आप भी सोच रहे होंगे कि गड़े मुर्दे उखाड़ दिए। लेकिन क्‍या करूं विचार बहुत दिनों से परेशान किये था कि क्‍या वो विचार सही है या फिर हमारा भारतीय विचार कि मनुष्‍य अपना आवेश पशुवत नहीं निकाल सकता।

Tuesday, February 23, 2010

ग्‍वालियर किला जो कैदखाने में बदल दिया गया

 दिनांक 20 फरवरी को हमारी गाड़ी ग्वालियर की सड़कों से होती हुई एक पहाड़ी पर चढ़ने लगी। एक सुदृढ़ किले की दीवारे दिखायी देने लगी और उन दीवारों पर बनी हुई जैन तीर्थंकरों की खंडित प्रतिमाएं हमारे मन में वेदना जगाने लगी। हम क्‍यों इतने असहिष्‍णु हो जाते हैं कि दूसरों की आस्‍था को खण्डित कर देते हैं? एक कलाकार अपनी कला का माध्‍यम मूर्तिकला को जीवन्‍त करके सिद्ध करता है और कुछ आततायी धर्मांध होकर उस कला पर ही अपना हथोड़ा चला देते हैं। लेकिन मन विचलित होता इससे पूर्व मजबूत किले की दीवारे हमारे सामने थी। शाम का धुंधलका फैल चुका था और किले के पट बन्‍द हो चुके थे। अन्‍दर जाना नामुमकिन था लेकिन हमें पता था कि अभी लाइट एण्‍ड साउण्‍ड का कार्यक्रम होगा और यहाँ का इतिहास जीवन्‍त हो उठेगा।


अमिताभ बच्‍चन की आवाज में इतिहास के पन्‍नों की गरज हमारे कानों को सुनायी देने लगी। कभी घोड़ों की टापों की आवाज आती और कभी संगीत की स्‍वर लहरियां वातावरण में गूंज जाती। गालव ॠषि की तपोभूमि पर राजा सूरज सेन का आगमन उनका कुष्‍ट रोग का निवारण और फिर गालव ॠषि के नाम पर ही ग्‍वालियर के निर्माण का इतिहास सुनायी देता रहा। राजा मानसिंह और मृगनयनी के प्रेम के किस्‍से भी सुनायी दिए और उन द्वारा बनाया गया महल पर भी रोशनी डाली गयी। जब तानसेन की स्‍वर-लहरियां वातावरण का सरस बना रही थी तभी आतताइयों ने किले के जीवन को समाप्‍त कर दिया और विशाल और भव्‍य किले को कैदखाने में बदल दिया। जिस किले की नीचले भाग में रानी मृगनयनी और राजा मानसिंह का प्रेम परवान चढ़ा था जिसे वृन्दावन लाल वर्मा ने अपनी लेखनी से हम तक पहुंचाया था उसी किले में न जाने कितने लोगों को तहखाने में फाँसी पर लटका दिया गया और न जाने कितने लोगों को विवश मरने के लिए छोड़ दिया गया। सिखों के छठे गुरु हर गोविन्‍द साहब भी इस कैदखाने में बन्‍द रहे लेकिन जहागीर की कृपा से वे छूट गए और उनका दामन पकड़कर 51 अन्‍य कैदी भी मुक्‍त हुए। उन्‍हीं की स्‍मृति में वहाँ गुरुद्वारा भी बना है।

म‍हाराष्‍ट्र के सतारा जिले से आए सिंधिया परिवार ने फिर से ग्‍वालियर की गद्दी की सम्‍भाला और एक नवीन ग्‍वालियर जनता को दिया। अन्‍य भारतीय शहरों की तरह ग्‍वालियर के भी दो स्‍वरूप हैं – एक वही पुरातन स्‍वरूप जो तीन भागों में विभक्‍त है एक कण्‍टोंमेंट दूसरा लश्‍कर और तीसरा मुरार। और अब नवीन ग्‍वालियर बड़ी-बड़ी मॉल और शॉपिंग सेंटरस की चकाचौंध लिए खड़ा है। शहर में वही ठेलों की रेलपेल है, सवारियों को ढोते टेम्‍पों हैं जो कहीं से भी घुसकर अपना रास्‍ते बना लेते हैं। वही रेलवे स्‍टेशन और वही बस स्‍टेण्‍ड। ग्‍वालियर में देखने को कई स्‍थान हैं लेकिन मीटिंग की व्‍यस्‍त दिनचर्या में इतना ही देखा जा सका। हमारे मेजबान श्रेष्‍ठ थे या फिर ग्‍वालियर की परम्‍परा ही है कि आतिथ्‍य सत्‍कार पूरा होता है। स्‍वादिष्‍ट भोजन के साथ स्‍वादिष्‍ट चाट भी परोसी गयी। तीन दिन ग्‍वालियर आँखों और मन में बसा रहा फिर ट्रेन ने कहा कि आज आप हमारे मेहमान है आपकी सीट हमारे यहाँ आरक्षित है तो चले आइए, कल पर भरोसा मत कीजिए। हम केवल वर्तमान में ही यात्रियों को ससम्‍मान उनके गंतव्‍य तक पहुंचाते हैं और हम भी ग्‍वालियर से चले आए वापस अपनी दुनिया में। अपनी ब्‍लाग की दुनिया में अपनी लेखकीय दुनिया में।

Thursday, February 18, 2010

माफ करना टिप्‍पणी नहीं कर पाएंगे

तीन दिन के लिए ग्‍वालियर जा रहे हैं, आपके ब्‍लाग पर नहीं आ पाएंगे और ना ही टिप्‍पणी कर पाएंगे। आने के बाद एक-एक की खबर लेंगे। सच आप लोगों की बहुत याद आएगी। आप लोगों से भी गुजारिश है कि इन दिनों सारी बेकार पोस्‍ट ही डालिए, न पढ़ने का गम रहें ही नहीं। बढ़िया से रहिए, आपस में झगडा मत करिए। घर में बड़ों का कहना मानना, समय पर खाना खा लेना यह नहीं कि सारा दिन कम्‍प्‍यूटर पर ही लगे रहो। मुझसे कोई भी काम हो तो मेरे मोबाइल 94141 56338 पर बात कर लेना। अपना भी ध्‍यान रखना और पडोस का भी। बाय।

Wednesday, February 17, 2010

बाराती चलाते हैं एक दिन चमड़े के सिक्‍के

आज कई शादियों में जाना था लेकिन एक शादी पारिवारिक मित्र के यहाँ थी तो सोचा कि आज बस उन्‍हीं की शादी में रहेंगे बाकि सभी में जाना केंसिल। कार्ड में बारात आने का समय देखा, लिखा था नौ बजे। दूसरे शहर से बारात आनी थी और बारात सुबह ही शहर में आ गयी थी, तो सोचा कि समय पर ही आ जाएगी बारात तो हम आठ सवा आठ तक जा पहुंचे। घूम-फिरकर भोजन का भी जायजा ले लिया गया और दाल रोटी कहाँ उपलब्‍ध है यह भी देख लिया गया। सोचा कि बारात का स्‍वागत करने के बाद ही खाना खाएंगे लेकिन कहीं बाजे-वाजे की आवाज सुनाई ही नहीं दे रही थी तो लगे हाथ खाने का काम भी निपटा लिया। दस बज गए लेकिन बैण्‍ड-बाजों की आवाज फिर भी सुनाई नहीं दी। अब क्‍या करें? बहुत देर तक परिवार वालों के साथ स्‍वागत करने वालों की कतार में भी खड़े रहे लेकिन आखिर बुढापे की टांगे कब तक साथ देती? पतिदेव ने चुपके से आकर कहा कि चाहो तो यहाँ कुर्सियों पर आकर बैठ जाओ। वैसे तो उनका सुझाव रास नहीं आता है लेकिन आज कुछ अच्‍छा लगा। हम भी पण्‍डाल में सजी-धजी और बारातियों की इंतजार करती कुर्सियों पर बैठ गए। हमने क्षमा भी मांग ली कि भाई आप लोग इन्‍तजार तो बारातियों का कर रही हो लेकिन अब सर्दी में आप भी अकेली बैठी हो तो हम ही आपका साथ निभा देते हैं। सुख-दुख देखकर हमारा ही साथ निभा लो। दो-तीन दोस्‍तों और सहेलियों की मण्‍डली भी जुट गयी।

हमने सारे ही किस्‍से भी सुना डाले, लेकिन जैसे ही हमारा एक किस्‍सा खत्‍म होता मैं देखती कि हमारे मित्र लोग हँस भी लेते लेकिन फिर मुड़कर दरवाजे की ओर देख लेते शायद अब आ जाए? लेकिन राजस्‍थान में बरसात की तरह बारात को भी देरी होती जा रही थी। हमारे किस्‍से भी खतम हो रहे थे। शादी गार्डन में थी, तो नीचे हरी दूब और ऊपर खुला आसमान दोनों से ही ठण्‍ड बरसने लगी थी। मैं तो एक पति में ही विश्‍वास रखती हूँ, तो शॉल वगैरह पहनकर ही जाती हूँ लेकिन आज की महिलाएं दूसरे चांस की जगह रखती हैं तो गरम कपड़ों से कुछ परहेज ही रखती हैं। कहीं ऐसा न हो कि हमें उम्रदराज समझ लिया जाए? तो मेरे अलावा सभी महिलाएं कुड़कती जा रही थीं। मैं भी एक शॉल के सहारे तो कब तक रहती, इसलिए मेरी हड्डिया भी खनकने लगी थी। कॉफी की तलाश शुरू की गयी जिससे शायद कुछ गर्मी का अहसास हो जाए। लेकिन पता नहीं मेजबान को क्‍या सूझी कि कॉफी को नाकाफी सिद्ध करके उसके साथ बेइंसाफी कर डाली। जब कॉफी नहीं मिली तो घड़ी पर ध्‍यान गया, अरे क्‍या साढे ग्‍यारह बज गए? लेकिन शुक्र था कि तब बारात आने की सुगबुगहाट होने लगी थी और बारात दरवाजे पर हाजिर थी। राम-राम करते दूल्‍हा 12 बजे स्‍टेज पर आया। अक्‍सर देखते हैं कि दूल्‍हा बहुत देरे तक स्‍टेज पर अपने दोस्‍तों के साथ बैठता है फिर बड़े सलीके से दुल्‍हन आती है लेकिन यहाँ तो दूल्‍हा स्‍टेज पर चढ़े उससे पहले दुल्‍हन तैयार थी स्‍टेज पर चढ़ने को। आनन-फानन में वरमाला हुई और हम आखिर खिसक ही लिए।

कन्‍या पक्ष ने विवाह का बड़ा भव्‍य आयोजन किया था, लगभग तीन-चार हजार लोग विवाह में सम्मिलित होने आए थे लेकिन बारात आयी जब केवल घर वाले और इष्‍ट-मित्र ही रह गए थे। ना किसी ने दूल्‍हा देखा और ना ही दुल्‍हन। ना किसी ने आशीर्वाद दिया और ना ही स्‍टेज पर जाकर फोटो खिंचवाए। लेकिन एक दिन के हम बादशाह हैं, लड़के वाले हैं। हम जितनी खरामा-खरामा आएंगे उतने ही लड़के वाले लगेंगे। भइया एक दिन चमड़े के सिक्‍के चला लो बाकि तो वही होगा जो दुल्‍हन चाहेगी। क्‍या आप भी एक दिन के सिक्‍के चलाने में विश्‍वास करते हैं?

Monday, February 15, 2010

विवाह के बारे में फोकटी सलाह

मैं पढ़-लिखकर डिग्री-विग्री लेकर शादी के लिए तैयार थी। जैसे ही पढ़ाई पूरी होती है, बस एक ही काम बचता है वह है शादी। पिताजी ने कहा कि तुम अब नौकरी भी करने लगी हो तो तुम्‍हें किसी कम पढ़े और बेरोजगार लड़के से विवाह कर लेना चाहिए। मैं एकदम से चौंक गयी। पिताजी कैसी सलाह दे रहे हैं? लेकिन उनकी सलाह आज ठीक ही लग रही है, काश ऐसा ही किया होता? मेरी एक मित्र ने लम्‍बा-चौड़ा पहलवान जैसा पति ढूंढ लिया, कारण बताया कि सुरक्षा करेगा। लेकिन कुछ दिन बाद खबर आयी कि वह पत्‍नी से ही दो-दो हाथ कर रहा है।

एक मेरी अन्‍य मित्र एम बी बी एस डाक्‍टर, मैंने उसे एक डॉक्‍टर पति ही बताया लेकिन वो बोली कि नहीं मुझसे ज्‍यादा पढ़ा होना चाहिए। ढूंढ शुरू हुई, और एक पी.जी. डाक्‍टर मिल ही गया। अब पत्‍नी ग्रेजयूट और पति पोस्‍ट-ग्रेजुएट। बात-बात में पत्‍नी को कहे कि तुम्‍हारी बुद्धि तो चोटी के पीछे रहती है। तब मुझे पिताजी की बात का मर्म समझ आया। ना रहे बांस और ना बजे बांसूरी। अरे किसने कहा कि पहलवान टाइप लड़के से शादी करो या फिर किसी बड़ी डिग्रीधारी से। ये बड़ी डिग्रीधारी मुझे अक्‍सर बड़े फन-धारी लगते हैं, हमेशा फुंफकारते ही रहते हैं। और फिर कोढ़ में खाज जैसा ही एक और फार्मूला है विवाह करने का, कि लड़का उम्र में भी बड़ा होना चाहिए। जिससे आपको हमेशा छोटा होने का अहसास दिलाया जा सके। आज नारियों ने कितनी ही उन्‍नति कर ली लेकिन अभी भी वे अपने सर को ओखली में डालने से बाज नहीं आती।

मैंने एक दिन हरियाणा की एक लड़की से कहा, जो पांच फीट आठ इंच थी, कि तू किसी पूर्वांचल के लड़के से शादी कर ले। अब वो बोली कि दीदी आप क्‍यूं मजाक कर रही हैं? क्‍या मुझे उसे गोद में उठाकर चलना है? अरे मारपीट का किस्‍सा एकदम से ही खत्‍म हो जाएगा बल्कि तू ही कभी एकाध हाथ जड़ सकती है, मैंने उसे समझाने का निरर्थक प्रयास किया। तू क्‍यों सुरक्षा ढूंढ रही है, तू स्‍वयं ही समर्थ बन ना। उसने कहा कि नहीं दीदी कुछ मजा नहीं आएगा। तब मैंने कहा चल पूर्वांचल का तो तुझे ज्‍यादा ही छोटा लग रहा है, तू ऐसा कर कि मध्‍यप्रदेश आदि का चुन ले कोई पांच फीट पांच इंच वाला। यहाँ भी मारपीट का खतरा नहीं रहेगा।

अब एक आई पी एस लड़की मिली, चौबीस घण्‍टे की नौकरी। कभी इस गाँव तो कभी उस गाँव। मैंने उससे कहा कि तू बेरोजगार किसी बिना पढ़े-लिखे से शादी कर ले। लेकिन उसने भी मेरी नहीं सुनी। उसने सीनियर आई पी एस से शादी कर ली। अब साहब की अटेची भी पेक करनी और खाना भी बनाकर देना। हो गयी न आई पी एस की ऐसी की तैसी? मैंने क्‍या बुरा कहा था? अरे पति चाहिए या आस-पड़ोस में रौब दिखाने के लिए बड़ी डिग्री? पड़ोस में तो दिखा लिया रौब लेकिन घर में?

अब देखिए उम्र के मामले में मुझे ऐश्‍वर्या की बात समझ आयी, हमेशा आँख दिखाकर कह सकेगी कि बड़ों से तमीज से बात करो। अभी तो बात-बात में छोटा होने का अहसास जताया जाता है।

अब इस देश की बालिकाओं और युवतियों तुम्‍हारे सोचने का समय शुरू होता है अभी। कि तुम अपने लिए बॉडी-गार्ड ढूंढती हो या फिर अपनी बॉडी का गार्ड स्‍वयं बनती हो। मैंने अनेक हल दिए हैं परम्‍परा से चली आ रही इस ...गर्दी के खिलाफ, फैसला आपको करना है। हमारी तो जैसे-तैसे कट गयी लेकिन तुम्‍हारी बढ़िया कटे इसके लिए मैंने फोकट में ही सलाह दी है। मैं जानती हूँ कि मेरी फोकटी सलाह को आप कोई भी नहीं मानेगा लेकिन जब मैं पैसे लेकर सलाह देने लगूंगी तब आप सब अवश्‍य मानेंगी। सीता-सीता।