हैलो, फोन उठाते ही सामने से आवाज आयी, अरे आप घर पर ही हैं क्या? आश्चर्य से भरा स्वर सुनाई देता है। हाँ, घर पर नहीं होऊँगी तो कहाँ जाऊँगी? मैंने प्रश्न कर लिया। अरे आप रोज ही तो बाहर जाती हैं, कभी दिल्ली तो कभी मुम्बई। बेचारे डॉक्टर साहब को अकेला छोड़कर। बड़े ही उलाहने भरे स्वर में सामने से आवाज आई। कोई महिला यदि सामाजिक कार्य कर रही है तो ऐसी बातें उसको रोज ही सुनने को मिल जाती हैं। कम से कम मैं तो सुन-सुनकर आदी हो चुकी हूँ। जब मैं नौकरी में थी और प्रायोगिक परीक्षा लेने बाहर जाती थी तब ये स्वर सुनाई नहीं देते थे। तब तो मैं कमा रही होती थी। लेकिन सामाजिक कार्य करते समय यह बात किसी को भी नहीं पचती कि आप फोकट में बाहर घूमे। यह भी पूछ लिया जाता है कि आपकी संस्था आपको किराया वगैरह देती है या नहीं?
हमारे मित्र शर्माजी एक दिन घर आ गए। मैंने पूछा कि भाभीजी नहीं आयी? वे बोले कि अरे वो तो एक महिने से पीहर गयी है, हमेशा ही गर्मी की छुट्टिया पीहर में बिताती है।
तो आप क्या करते हैं? अकेले। खाने की समस्या उत्पन्न हो जाती होगी। अरे कुछ नहीं, खुद बना लेता हूँ या फिर होटल में खा लेता हूँ।
लेकिन शर्माजी की पत्नी से कोई नहीं पूछता कि आप इतने दिन शर्माजी को छोड़कर कैसे चले जाती हो?
मेरे एक-दो दिन के बाहर जाने पर भी आपत्ति की जाती है। कई लोग तो मुझे घर की महिलाओं से दूर ही रखना चाहते हैं, वे कहते हैं कि आप हमारी पत्नियों को भी बिगाड़ देंगी।
अब आप ही बताइए कि सामाजिक या साहित्यिक कार्य के लिए बाहर जाना क्या इतना बड़ा अपराध है कि आप पर तमगा ही चिपका दिया जाता है कि यह तो अपने पति को अकेला छोड़कर अक्सर बाहर चले जाती हैं। मुझे कभी तो इतना गुस्सा आता है कि आपको इतनी ही चिन्ता हो रही है तो इन्हें अपने घर ले जाकर खाना खिला दिया करो। लेकिन उन्हें तो बस मुझे ताने मारने हैं क्योंकि मैं फोकट का काम कर रही हूँ।
इस समाज में किसी का भी फोकट में काम करना सहन नहीं होता। यह स्थित केवल मेरी ही हो ऐसी बात नहीं है, पुरुषों की भी है। सेवानिवृत्ति के बाद यदि कोई पुरुष सामाजिक कार्य करने की इच्छा जाहिर करे तो घर वालों के माथे पर शिकन आ जाती है। उन्हें लगता है इसे अभी हमारे लिए और पैसे कमाने चाहिए और यदि पैसे कमाने की शक्ति नहीं है तब घर का काम करना चाहिए। जैसे सुबह थैला पकड़कर सब्जि लाना, पोते-पोतियों को स्कूल छोड़ आना आदि-आदि।
अब आप ही बताइए कि कोई ऐसी उम्र होती है जब व्यक्ति अपने मन की करना चाहे और लोग उसे करने दें? वो तो अच्छा है कि मेरे पति और मुझमें अच्छी समझ है इस बात को लेकर, नहीं तो झगड़ा होते तो एक पल नहीं लगे। बस तब याद आता है कि इस देश में शिवाजी पैदा होने चाहिए लेकिन अपने पड़ोसी के।
श्रीमती अजित गुप्ता प्रकाशित पुस्तकें - शब्द जो मकरंद बने, सांझ की झंकार (कविता संग्रह), अहम् से वयम् तक (निबन्ध संग्रह) सैलाबी तटबन्ध (उपन्यास), अरण्य में सूरज (उपन्यास) हम गुलेलची (व्यंग्य संग्रह), बौर तो आए (निबन्ध संग्रह), सोने का पिंजर---अमेरिका और मैं (संस्मरणात्मक यात्रा वृतान्त), प्रेम का पाठ (लघु कथा संग्रह) आदि।
Saturday, February 13, 2010
Wednesday, February 10, 2010
घूमने जाते समय रिश्तेदार की तलाश या होटल की?
इन गर्मियों की छुट्टियों में बच्चों ने कहा कि पापा इस बार हम मसूरी घूमने चले। पापा ने कहा कि देखते हैं। लेकिन एक दिन अचानक ही पापा बोले कि बच्चों तुम कह रहे थे ना कि मसूरी घूमने जाना है। तो हम ऐसा करते हैं कि मसूरी की जगह कोडयकेनाल चलते हैं। तुम्हें तो हिल-स्टेशन से मतलब है ना, और फिर मसूरी से अधिक अच्छी जगह है कोडयकेनाल। फिर वहाँ फायदा यह है कि वहाँ पर पहाड़ों की खुबसूरती के साथ समुद्र भी है। बच्चे खुश हो गए। पत्नी ने पूछा कि उस दिन तो आप चुप लगा गए थे लेकिन आज कैसे आप दक्षिण घूमने की बात कर रहे हैं? पति बोले कि वो क्या है ना कि अपना हितेश है ना। कौन हितेश पत्नी ने कहा? अरे अपने दिल्ली वाले चाचाजी का लड़का। वो आजकल केरल में पोस्टेट है। कल उसी का फोन आया था कि भैया इसबार छुट्टियों में यहाँ का कार्यक्रम बना लो। अब घूमने का घूमने हो जाएगा और उससे मिलने का अवसर भी। फिर सबसे बड़ी बात की कोई अपना वहाँ है तो मन में सुरक्षा का भाव भी रहेगा। लेकिन वो तो अपने दूर की रिश्तेदारी में है। पत्नी ने फिर प्रश्न कर दिया। अरे तो क्या हुआ? हितेश मुझे बड़ा मानता है। एक दो दिन उसके यहाँ रहेंगे और बाकि पूरा समय घूमेंगे। उसका वहाँ परिचय है तो गेस्ट-हाउस वगैरह भी वो उपलब्ध करा देगा।
अब बोलने की बारी बच्चों की थी। बच्चों ने कहा कि पापा हम तो होटल में रहेंगे। घूमने तो जाते ही इसलिए हैं कि होटल में रहने को मिले।
अरे होटल में भला घर जैसा सुख मिलता है क्या? पापा बोले। हम होटल में भी रहेंगे और घर पर भी। अब देखो साउथ में खाने की कितनी दिक्क्त होती है? घर का खाना मिल जाएगा।
ये वार्तालाप अमुमन हर घर में होता है। हम जब भी कहीं घूमने जाते हैं पहले किसी रिश्तेदार या परिचित को ढूंढते हैं। हमारा स्वभाव ही यह बन गया है। लेकिन इसके विपरीत आधुनिकता को अपना रहे बच्चे होटल की बात करते हैं। विदेश में कहीं भी किसी परिचित के रूकने की बात अधिकतर नहीं सोची जाती। सगे भाई-बहन भी होंगे तो रुकेंगे तो होटल में ही, फिर चाहे मिलने चले जाएं। इसी कारण हमारे यहाँ समाज जीवित है। परिवार भी रिश्तों से बंधे हैं।
लेकिन आधुनिकता और भारतीयता के मध्य एक अजीब सी परिस्थिति का निर्माण होने लगा है। मैं जब भी किसी माता-पिता से बात करती हूँ तो वे अक्सर कहते हैं कि हम बच्चों से कुछ नहीं लेते। माता-पिता अपना सम्मान रखने के लिए ऐसा कहते हैं वास्तविकता में तो बच्चे कुछ देते नहीं। हम जिस देश में रहते हैं, उस देश को चलाने के लिए प्रत्येक समर्थ नागरिक टेक्स देता है इसी प्रकार परिवार में भी समर्थ संतानों को टेक्स देना पड़ता है। यह भारत का कानून है कि हम समर्थ से ही टेक्स लेते हैं। परिवार में भी यही होता है कि गरीब और असमर्थ संतान को तो सब मिलकर पालते हैं। आज संतानों के द्वारा परिवारों में यह कहकर टेक्स देना या अपना अंश देना बन्द कर दिया है कि आपको इसकी आवश्यकता ही क्या है? परिणाम हुआ है कि आज एक पीढ़ी ही समाज को बनाए रखने का प्रयास कर रही है। यही युवा पीढ़ी जब स्वयं कहीं जाती है तब माता-पिता से रिश्तेदारों का पता पूछती हैं लेकिन ये रिश्तेदारी कैसे बचायी जाती है इसकी चिन्ता नहीं करती। कितने भी समर्थ माता-पिता हो लेकिन क्या युवा-पीढ़ी को अपना अंश परिवार में नहीं देना चाहिए? क्या एक दिन रिश्तेदारी का यह सुरक्षा-कवच भारत में भी समाप्त हो जाएगा? क्या हम भी कहीं घूमने जाएंगे तब बस होटल की ही तलाश करेंगे? हमारा रिश्तेदार वहाँ रह रहा होगा लेकिन उससे सम्बंध बनाए रखने के लिए कुछ त्याग करना पड़ेगा तो हम ऐसा क्यों करें, ऐसा भाव क्या भारत में भी सर्वत्र छा जाएगा? अपना अंश नहीं देने और होटलों की परम्परा को अपनाने से माता-पिता और संतानों के रिश्ते तो शायद बचे रह जाएं लेकिन हम रिश्तेदारी के रिश्ते नहीं बचा पाएंगे। आगे आने वाली पीढ़ी फिर बिल्कुल अकेली होगी, बिल्कुल अकेली।
अब बोलने की बारी बच्चों की थी। बच्चों ने कहा कि पापा हम तो होटल में रहेंगे। घूमने तो जाते ही इसलिए हैं कि होटल में रहने को मिले।
अरे होटल में भला घर जैसा सुख मिलता है क्या? पापा बोले। हम होटल में भी रहेंगे और घर पर भी। अब देखो साउथ में खाने की कितनी दिक्क्त होती है? घर का खाना मिल जाएगा।
ये वार्तालाप अमुमन हर घर में होता है। हम जब भी कहीं घूमने जाते हैं पहले किसी रिश्तेदार या परिचित को ढूंढते हैं। हमारा स्वभाव ही यह बन गया है। लेकिन इसके विपरीत आधुनिकता को अपना रहे बच्चे होटल की बात करते हैं। विदेश में कहीं भी किसी परिचित के रूकने की बात अधिकतर नहीं सोची जाती। सगे भाई-बहन भी होंगे तो रुकेंगे तो होटल में ही, फिर चाहे मिलने चले जाएं। इसी कारण हमारे यहाँ समाज जीवित है। परिवार भी रिश्तों से बंधे हैं।
लेकिन आधुनिकता और भारतीयता के मध्य एक अजीब सी परिस्थिति का निर्माण होने लगा है। मैं जब भी किसी माता-पिता से बात करती हूँ तो वे अक्सर कहते हैं कि हम बच्चों से कुछ नहीं लेते। माता-पिता अपना सम्मान रखने के लिए ऐसा कहते हैं वास्तविकता में तो बच्चे कुछ देते नहीं। हम जिस देश में रहते हैं, उस देश को चलाने के लिए प्रत्येक समर्थ नागरिक टेक्स देता है इसी प्रकार परिवार में भी समर्थ संतानों को टेक्स देना पड़ता है। यह भारत का कानून है कि हम समर्थ से ही टेक्स लेते हैं। परिवार में भी यही होता है कि गरीब और असमर्थ संतान को तो सब मिलकर पालते हैं। आज संतानों के द्वारा परिवारों में यह कहकर टेक्स देना या अपना अंश देना बन्द कर दिया है कि आपको इसकी आवश्यकता ही क्या है? परिणाम हुआ है कि आज एक पीढ़ी ही समाज को बनाए रखने का प्रयास कर रही है। यही युवा पीढ़ी जब स्वयं कहीं जाती है तब माता-पिता से रिश्तेदारों का पता पूछती हैं लेकिन ये रिश्तेदारी कैसे बचायी जाती है इसकी चिन्ता नहीं करती। कितने भी समर्थ माता-पिता हो लेकिन क्या युवा-पीढ़ी को अपना अंश परिवार में नहीं देना चाहिए? क्या एक दिन रिश्तेदारी का यह सुरक्षा-कवच भारत में भी समाप्त हो जाएगा? क्या हम भी कहीं घूमने जाएंगे तब बस होटल की ही तलाश करेंगे? हमारा रिश्तेदार वहाँ रह रहा होगा लेकिन उससे सम्बंध बनाए रखने के लिए कुछ त्याग करना पड़ेगा तो हम ऐसा क्यों करें, ऐसा भाव क्या भारत में भी सर्वत्र छा जाएगा? अपना अंश नहीं देने और होटलों की परम्परा को अपनाने से माता-पिता और संतानों के रिश्ते तो शायद बचे रह जाएं लेकिन हम रिश्तेदारी के रिश्ते नहीं बचा पाएंगे। आगे आने वाली पीढ़ी फिर बिल्कुल अकेली होगी, बिल्कुल अकेली।
Monday, February 8, 2010
साहित्यकार माता-पिता का स्मरण कौन करता है?
खुशबू हूँ मैं फूल नहीं जो मुरझा जाऊँगा
जब भी मुझको याद करोगे मैं आ जाऊँगा।
ये पंक्तियां रात को टीवी पर सुनी थी, मन से निकल नहीं रही। ऐसे लग रहा है जैसे दिल में समा गयी हों। टीवी पर संगीत का कार्यक्रम चल रहा था, उसमें प्रसिद्ध गायक शान अपने पिता का स्मरण करते हुए उनके ही गीत और संगीत को सुर दे रहे थे। आँखों में आँसू लिए और होठों पर मुस्कान लिए वे अपनी ही धुन में गाए जा रहे थे। उनकी पत्नी भी आँसू बहा रही थी। गुमनामी के अंधेरे में खो चुके अपने अप्रतिम पिता को जब शान ने याद किया तब लगा जैसे मन्दिर में घंटियां बज उठी हों। कोई बड़ी ही पवित्रता से भगवान को पुकार रहा हो।
आज न जाने कितना लिखा जा रहा है? लेकिन कितने बेटे हैं जिनके हाथों का स्पर्श उन शब्दों को मिलता है? कितने बेटे उन शब्दों का स्मरण कर पाते हैं और कितनी बहुएं उन शब्दों को सुनकर अपने आँसू नहीं रोक पाती? एक फिल्म आयी थी ‘यात्रा’ जिसमें नाना पाटेकर मुख्य भूमिका में थे। मैं उन दिनों अमेरिका अपने बेटे के पास गयी हुई थी। वहाँ सप्ताह में पाँच दिन तो घर पर बैठकर टाइम-पास के साधन ढूंढने पड़ते हैं तो इण्डियन स्टोर से किसी फिल्म की सीडी लाने का विचार बना। स्टोर के मालिक ने एक सीडी पकड़ा दी, नाम था ‘यात्रा’। पहले कभी नाम नहीं सुना था, फिर सोचा कि खाली बैठकर बोर होने से अच्छा है कोई अनजानी फिल्म ही देख ली जाए। उस फिल्म में नाना पाटेकर साहित्यकार बने थे, तो फिल्म के प्रति रुचि जागृत हो गयी। नाना पाटेकर का पात्र श्रेष्ठ साहित्यकार होने के बाद भी कहीं दुखी और कुंठित दिखायी पड़ता है। बेटा पूछता है कि भाई यह क्यों कुंठित है? मुझे भी समझ नहीं आता, मुझे लगता है कि साहित्यकार अधिकतर कुंठित ही रहते हैं तो शायद यही पात्र की मांग है। लेकिन अन्त में आभास हुआ कि उसका बेटा उसका साहित्य नहीं पढ़ता था शायद यह बहुत बड़ा कारण था उनकी कुंठा का।
हम अपने पिता या माता पर कब गर्व करते हैं? जब वे हमें भौतिक संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध करा सके? उनके आदर्श, उनके वचन, उनका साहित्य का क्या हमारे जीवन में कोई मौल नहीं? क्या ये सब बिना मौल की वस्तुएं हैं? हमारे द्वारा लिखा गया साहित्य क्या अभिमान करने का विषय नहीं है? कितने बेटे/बेटियां हैं जो एक सामान्य साहित्यकार माता-पिता का बड़े शान से परिचय कराते हैं? मैंने अक्सर देखा है कि वे परिचय के अभाव में कहीं खो जाते हैं। वे तरस जाते हैं उन शब्दों को सुनने के लिए जिन शब्दों को उन्होंने दुनिया को दिया है लेकिन जिन्हें वे बच्चों को शायद दे नहीं पाए। जब उनका परिचय ही नहीं है तो फिर उनके जाने के बाद उनका स्मरण तो शायद सपनों की बात होगी। फिर आज तो परिवार भी टूट गए हैं, श्राद्ध भी नहीं होते जो एक दिन ही याद कर लिया जाए। लेकिन फिर भी माता-पिता हमेशा ही कहेंगे कि जब भी मुझको याद करोंगे मैं आ जाऊँगा।
जब भी मुझको याद करोगे मैं आ जाऊँगा।
ये पंक्तियां रात को टीवी पर सुनी थी, मन से निकल नहीं रही। ऐसे लग रहा है जैसे दिल में समा गयी हों। टीवी पर संगीत का कार्यक्रम चल रहा था, उसमें प्रसिद्ध गायक शान अपने पिता का स्मरण करते हुए उनके ही गीत और संगीत को सुर दे रहे थे। आँखों में आँसू लिए और होठों पर मुस्कान लिए वे अपनी ही धुन में गाए जा रहे थे। उनकी पत्नी भी आँसू बहा रही थी। गुमनामी के अंधेरे में खो चुके अपने अप्रतिम पिता को जब शान ने याद किया तब लगा जैसे मन्दिर में घंटियां बज उठी हों। कोई बड़ी ही पवित्रता से भगवान को पुकार रहा हो।
आज न जाने कितना लिखा जा रहा है? लेकिन कितने बेटे हैं जिनके हाथों का स्पर्श उन शब्दों को मिलता है? कितने बेटे उन शब्दों का स्मरण कर पाते हैं और कितनी बहुएं उन शब्दों को सुनकर अपने आँसू नहीं रोक पाती? एक फिल्म आयी थी ‘यात्रा’ जिसमें नाना पाटेकर मुख्य भूमिका में थे। मैं उन दिनों अमेरिका अपने बेटे के पास गयी हुई थी। वहाँ सप्ताह में पाँच दिन तो घर पर बैठकर टाइम-पास के साधन ढूंढने पड़ते हैं तो इण्डियन स्टोर से किसी फिल्म की सीडी लाने का विचार बना। स्टोर के मालिक ने एक सीडी पकड़ा दी, नाम था ‘यात्रा’। पहले कभी नाम नहीं सुना था, फिर सोचा कि खाली बैठकर बोर होने से अच्छा है कोई अनजानी फिल्म ही देख ली जाए। उस फिल्म में नाना पाटेकर साहित्यकार बने थे, तो फिल्म के प्रति रुचि जागृत हो गयी। नाना पाटेकर का पात्र श्रेष्ठ साहित्यकार होने के बाद भी कहीं दुखी और कुंठित दिखायी पड़ता है। बेटा पूछता है कि भाई यह क्यों कुंठित है? मुझे भी समझ नहीं आता, मुझे लगता है कि साहित्यकार अधिकतर कुंठित ही रहते हैं तो शायद यही पात्र की मांग है। लेकिन अन्त में आभास हुआ कि उसका बेटा उसका साहित्य नहीं पढ़ता था शायद यह बहुत बड़ा कारण था उनकी कुंठा का।
हम अपने पिता या माता पर कब गर्व करते हैं? जब वे हमें भौतिक संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध करा सके? उनके आदर्श, उनके वचन, उनका साहित्य का क्या हमारे जीवन में कोई मौल नहीं? क्या ये सब बिना मौल की वस्तुएं हैं? हमारे द्वारा लिखा गया साहित्य क्या अभिमान करने का विषय नहीं है? कितने बेटे/बेटियां हैं जो एक सामान्य साहित्यकार माता-पिता का बड़े शान से परिचय कराते हैं? मैंने अक्सर देखा है कि वे परिचय के अभाव में कहीं खो जाते हैं। वे तरस जाते हैं उन शब्दों को सुनने के लिए जिन शब्दों को उन्होंने दुनिया को दिया है लेकिन जिन्हें वे बच्चों को शायद दे नहीं पाए। जब उनका परिचय ही नहीं है तो फिर उनके जाने के बाद उनका स्मरण तो शायद सपनों की बात होगी। फिर आज तो परिवार भी टूट गए हैं, श्राद्ध भी नहीं होते जो एक दिन ही याद कर लिया जाए। लेकिन फिर भी माता-पिता हमेशा ही कहेंगे कि जब भी मुझको याद करोंगे मैं आ जाऊँगा।
Saturday, February 6, 2010
प्रतिक्रिया करें, सुप्त ना रहें
रेल के एसी द्वितीय श्रेणी में अधिकतर सम्भ्रान्त लोग यात्रा करते हैं, मैंने अधिकतर सम्भ्रान्त लोग इसलिए लिखा है कि कभी-कभार मुझ जैसे लोग भी यात्रा करते हैं। वहाँ के बेड-रोल अक्सर गन्दे होते हैं। मैं उदयपुर में निवास करती हूँ तो मेरा उदयपुर से चलने वाली रेलों से ही अधिक सामना होता है, लेकिन कभी-कभी भारत के अन्य क्षेत्रों की रेलों से भी रूबरू हुई हूँ। कम्पार्टमेन्ट में 42-44 यात्री रहते हैं लेकिन मैंने कभी भी मेरे सिवाय किसी और को गन्दे बेड-रोल के लिए केयर-टेकर को टोकते नहीं सुना। उदयपुर से ट्रेन दिल्ली जाती है तो सुबह होते ही यात्रियों से चद्दरें लेकर केयर-टेकर समेटकर रख देता है और शाम को वापस दूसरे यात्रियों को दे देता है। कम्बल तो इतने फटे हुए और गन्दे होते हैं कि शायद घर में ऐसे हो तो तत्काल पत्नी के ऊपर फेंक दिए जाएं। नेपकीन तो मांगने पर भी मिल जाए तो शुक्र कीजिए। लेकिन हम कभी भी प्रतिक्रिया नहीं करते, बस चुपचाप उसी बिस्तर पर सो जाते हैं। यह मुद्दा तो ऐसा भी नहीं है जिससे आप किसी संकट में पड़ जाएं। लेकिन उस समय साधु बन जाते हैं कि जो मिला उसी में संतोष। परिणाम क्या होता है, रेल के ठेकेदार इसका फायदा उठाते हैं और हमें प्रतिदिन इन गन्दे बिस्तरों पर सोना पड़ता है।
इसके विपरीत एक और वाकया देखिए। जब मैंने यात्रियों को प्रतिक्रिया करते हुए देखा। मैं हैरान रह गयी देखकर कि लोग कमजारे व्यक्ति के सामने कैसे शेर बनते हैं? रायपुर से मैंने ट्रेन पकड़ी, अपनी बर्थ पर बैठ गयी। कुछ ही मिनट में एक व्यक्ति को थामे दो व्यक्ति आए और एक बर्थ पर सुलाकर चले गए। उसका सामान भी रख गए। जब ट्रेन चल दी, तो पास के सह-यात्रियों ने हल्ला मचाना शुरू किया कि इसने शराब पी रखी है और यह बेसुध होकर सो रहा है, हमें इससे खतरा है। पुलिस आ गयी, उन्होंने भी समझाने का प्रयास किया कि यात्री सो रहा है, पता नहीं क्या बात है? आपको इससे क्या परेशानी है? लेकिन लोग नहीं माने और अगले ही स्टेशन पर उस यात्री को सामान सहित प्लेटफार्म पर डाल दिया गया। मैं खड़ी अवाक देखती रही कि यह क्या हो रहा है? उस यात्री की क्या मतबूरी थी, हो सकता है किसी ने उसे लूटा हो और ऐसी हालात में उसे यहाँ छोड़ गए हों। उसके पीछे कोई भी कारण हो सकता था। लेकिन भीड़ के कानून ने पुलिस के सामने फैसला सुना दिया था। यह घटना कई वर्ष पुरानी है, लेकिन मेरे मन से जाती नहीं। वह बेचारा व्यक्ति पता नहीं किस हालात का शिकार हुआ होगा। आप कहेंगे कि मैं क्यों नहीं बोली? मैंने कोशिश की लेकिन नक्कार-खाने में तूती की आवाज भला कौन सुनता है?
ये दो उदाहरण हैं, ऐसे कितने ही उदाहरण हमारी रोजमर्रा के जीवन में आते हैं लेकिन जहाँ कमजोर व्यक्ति होता है, वहाँ हम शेर बन जाते हैं और जहाँ व्यवस्था सुधारने की बात होती है वहाँ हम सहन करते जाते हैं। फिर कहते हैं कि भ्रष्टाचार है। हम बात-बात में नेताओं को गाली देते हैं लेकिन कभी नहीं सोचते कि हम कितना चुप रहते हैं? केवल अपना फायदा देखते हैं। यदि हम ऐसे अव्यवस्थाओं के खिलाफ प्रतिक्रिया करना प्रारम्भ कर दें तो बहुत कुछ सुधार सम्भव हो सकता है। प्रतिक्रिया करने पर ही सुधार होगा, सुप्त समाज मृत समान है।
इसके विपरीत एक और वाकया देखिए। जब मैंने यात्रियों को प्रतिक्रिया करते हुए देखा। मैं हैरान रह गयी देखकर कि लोग कमजारे व्यक्ति के सामने कैसे शेर बनते हैं? रायपुर से मैंने ट्रेन पकड़ी, अपनी बर्थ पर बैठ गयी। कुछ ही मिनट में एक व्यक्ति को थामे दो व्यक्ति आए और एक बर्थ पर सुलाकर चले गए। उसका सामान भी रख गए। जब ट्रेन चल दी, तो पास के सह-यात्रियों ने हल्ला मचाना शुरू किया कि इसने शराब पी रखी है और यह बेसुध होकर सो रहा है, हमें इससे खतरा है। पुलिस आ गयी, उन्होंने भी समझाने का प्रयास किया कि यात्री सो रहा है, पता नहीं क्या बात है? आपको इससे क्या परेशानी है? लेकिन लोग नहीं माने और अगले ही स्टेशन पर उस यात्री को सामान सहित प्लेटफार्म पर डाल दिया गया। मैं खड़ी अवाक देखती रही कि यह क्या हो रहा है? उस यात्री की क्या मतबूरी थी, हो सकता है किसी ने उसे लूटा हो और ऐसी हालात में उसे यहाँ छोड़ गए हों। उसके पीछे कोई भी कारण हो सकता था। लेकिन भीड़ के कानून ने पुलिस के सामने फैसला सुना दिया था। यह घटना कई वर्ष पुरानी है, लेकिन मेरे मन से जाती नहीं। वह बेचारा व्यक्ति पता नहीं किस हालात का शिकार हुआ होगा। आप कहेंगे कि मैं क्यों नहीं बोली? मैंने कोशिश की लेकिन नक्कार-खाने में तूती की आवाज भला कौन सुनता है?
ये दो उदाहरण हैं, ऐसे कितने ही उदाहरण हमारी रोजमर्रा के जीवन में आते हैं लेकिन जहाँ कमजोर व्यक्ति होता है, वहाँ हम शेर बन जाते हैं और जहाँ व्यवस्था सुधारने की बात होती है वहाँ हम सहन करते जाते हैं। फिर कहते हैं कि भ्रष्टाचार है। हम बात-बात में नेताओं को गाली देते हैं लेकिन कभी नहीं सोचते कि हम कितना चुप रहते हैं? केवल अपना फायदा देखते हैं। यदि हम ऐसे अव्यवस्थाओं के खिलाफ प्रतिक्रिया करना प्रारम्भ कर दें तो बहुत कुछ सुधार सम्भव हो सकता है। प्रतिक्रिया करने पर ही सुधार होगा, सुप्त समाज मृत समान है।
Thursday, February 4, 2010
अमेरिकी-गरीब के कपड़े बने हमारे अभिनेताओं का फैशन
अमेरिका के एक मॉल में घूम रहे थे। कुछ किशोर बच्चे अजीबो-गरीब ड्रेस पहने हुए थे। किसी ने अपनी आयु से काफी बड़ा टी-शर्ट, किसी ने फुल टी-शर्ट पर हॉफ शर्ट और फटी जीन्स पहन रखी थी। वे बच्चे मेक्सिन, साउथ अफ्रिका आदि देशों के थे। गरीब थे और छोटे-मोटे धंधे करके अपना गुजारा करते थे। मैंने बेटे से पूछा कि ये बच्चे क्या ऐसी ही अजीबो-गरीब और फटी-टूटी ड्रेस पहनते हैं। उसने कहा कि हाँ ये ऐसी ही पहनते हैं। खैर हम भी मॉल में एक कपड़ों की दुकान में गए। बेटे ने कहा कि कुछ खरीदना हो तो खरीद लो। वहाँ फटी हुई जीन्स लटकी हुई थीं, मुसी-तुसी शर्ट पड़ी थीं। मैंने कहा कि क्या हम किसी कबाड़ी की दुकान में आ गए हैं? बेटा हँसा और बोला कि यही फैशन है।
दूसरे दिन शहर के अन्दरूनी हिस्से में थे, लोग बड़े करीने से सूट पहने थे, महिलाएं भी अच्छे वस्त्र पहने हुई थीं। मैंने फिर बेटे से पूछा कि तुम तो कहते थे कि वो फैशन है, पर ये सम्भ्रान्त लोग तो बड़े सलीके से कपड़े पहने हैं। बेटा बोला कि ये तो बड़े लोग हैं। हम देशी तो यही पहनते हैं। एक बार मेरा तो बेटे से झगड़ा भी हो गया। बाजार जाना था वो बरमूडा पहनकर आ गया कि चलो। मैंने कहा कि यह क्या? कपड़े तो ढंग के पहनकर चलो। वह बोला कि अरे यहाँ तो सभी ऐसे ही जाते हैं। मैंने गुस्से में कहा कि नहीं तुम कपड़े बदलो। वह गुस्से में भुनभुनाता हुआ कपड़े बदलकर आया, वो भी कोई अच्छे नहीं थे।
मैंने भारत आकर जब अपनी बहन से कहा कि अरे ये युवा फैशन के नाम पर क्या पहनते हैं? उसने बताया कि मेरा किस्सा सुनो। वह बोली कि मेरा बेटा जब भारत आया तो अपनी एक जीन्स छोड़ गया। मैंने उसे देखा, वो फटी हुई थी। मेरे नर्सिंग होम में जो सफाई कर्मचारी था, उसे मैंने वो जीन्स दे दी। कुछ महिनों बाद बेटा जब वापस आया तब उसने पूछा कि मम्मी आपने मेरे कपड़े किसी को दिए हैं क्या? मेरी एक नयी जीन्स नहीं मिल रही। मैंने बड़ा याद किया लेकिन कुछ याद नहीं आया। फिर अचानक से याद आया कि अरे एक जीन्स जो फटी हुई थी वो मैंने राजू को दी थी। अब बेटा भड़क गया, बोला कि अरे मम्मी आप क्या करती हैं? मेरी नयी जीन्स उसे दे दी। मैं अभी वापस लाता हूँ।
मैंने कहा कि उसकी पहनी हुई वापस लाएगा क्या? लेकिन वो बोला कि मुझे कोई फरक नहीं पड़ता। वो गुस्से में तमतमाया हुआ राजू के पास गया। उसने कहा कि तूने मेरी जीन्स ली है क्या? वह बोला कि मैं फटी हुई जीन्स नहीं पहनता, मेडम ने दी थी, तो मैं मना नहीं कर सका, लेकिन वो उस अल्मारी में रखी है। मैंने उसे हाथ भी नहीं लगाया है। आखिर उसे जीन्स वापस मिल गयी।
अभी टीवी पर एक कार्यक्रम आ रहा था, उसमें शाहिद कपूर ने एकदम फटी हुई जीन्स पहन रखी थी। फिर दूसरे कार्यक्रम में और भी हीरोज ने ऐसी ही घुटनों से और पीछे से फटी हुई जीन्स पहन रखी थी। कुछ ने लम्बी टी-शर्ट और ऊपर से हॉफ शर्ट पहन रखी थी। तब मन में एक विचार आया कि अमेरिका के गरीब की तो मजबूरी है, फटे हुए कपड़े पहनना और शायद जो भारतीय वहाँ रह रहे हैं वे भी अपनी धुलाई की समस्या और गरीबी के कारण ऐसे ही कपड़े पहन लेते हों। लेकिन ये अभिनेता, जिनसे भारत का फैशन बनता है, क्या इतनी हीनभावना से ग्रसित हैं जो अमेरिका की गरीब जनता जैसे कपड़ों को फैशन के नाम पर पहनते हैं? यह तो आप सब जानते ही हैं कि जीन्स तो वहाँ काउ-ब्वायज अर्थात ग्वाले पहनते हैं। वो भी हमने फैशन बना लिया और अब फटे-टूटे कपड़ों को फैशन बना रहे हैं। क्या ये अभिनेता वहाँ के अभिनेताओं के फैशन को नहीं अपना सकते? कितनी हीनभावना से भरा हुआ हैं हमारा अभिजात्य वर्ग भी?
दूसरे दिन शहर के अन्दरूनी हिस्से में थे, लोग बड़े करीने से सूट पहने थे, महिलाएं भी अच्छे वस्त्र पहने हुई थीं। मैंने फिर बेटे से पूछा कि तुम तो कहते थे कि वो फैशन है, पर ये सम्भ्रान्त लोग तो बड़े सलीके से कपड़े पहने हैं। बेटा बोला कि ये तो बड़े लोग हैं। हम देशी तो यही पहनते हैं। एक बार मेरा तो बेटे से झगड़ा भी हो गया। बाजार जाना था वो बरमूडा पहनकर आ गया कि चलो। मैंने कहा कि यह क्या? कपड़े तो ढंग के पहनकर चलो। वह बोला कि अरे यहाँ तो सभी ऐसे ही जाते हैं। मैंने गुस्से में कहा कि नहीं तुम कपड़े बदलो। वह गुस्से में भुनभुनाता हुआ कपड़े बदलकर आया, वो भी कोई अच्छे नहीं थे।
मैंने भारत आकर जब अपनी बहन से कहा कि अरे ये युवा फैशन के नाम पर क्या पहनते हैं? उसने बताया कि मेरा किस्सा सुनो। वह बोली कि मेरा बेटा जब भारत आया तो अपनी एक जीन्स छोड़ गया। मैंने उसे देखा, वो फटी हुई थी। मेरे नर्सिंग होम में जो सफाई कर्मचारी था, उसे मैंने वो जीन्स दे दी। कुछ महिनों बाद बेटा जब वापस आया तब उसने पूछा कि मम्मी आपने मेरे कपड़े किसी को दिए हैं क्या? मेरी एक नयी जीन्स नहीं मिल रही। मैंने बड़ा याद किया लेकिन कुछ याद नहीं आया। फिर अचानक से याद आया कि अरे एक जीन्स जो फटी हुई थी वो मैंने राजू को दी थी। अब बेटा भड़क गया, बोला कि अरे मम्मी आप क्या करती हैं? मेरी नयी जीन्स उसे दे दी। मैं अभी वापस लाता हूँ।
मैंने कहा कि उसकी पहनी हुई वापस लाएगा क्या? लेकिन वो बोला कि मुझे कोई फरक नहीं पड़ता। वो गुस्से में तमतमाया हुआ राजू के पास गया। उसने कहा कि तूने मेरी जीन्स ली है क्या? वह बोला कि मैं फटी हुई जीन्स नहीं पहनता, मेडम ने दी थी, तो मैं मना नहीं कर सका, लेकिन वो उस अल्मारी में रखी है। मैंने उसे हाथ भी नहीं लगाया है। आखिर उसे जीन्स वापस मिल गयी।
अभी टीवी पर एक कार्यक्रम आ रहा था, उसमें शाहिद कपूर ने एकदम फटी हुई जीन्स पहन रखी थी। फिर दूसरे कार्यक्रम में और भी हीरोज ने ऐसी ही घुटनों से और पीछे से फटी हुई जीन्स पहन रखी थी। कुछ ने लम्बी टी-शर्ट और ऊपर से हॉफ शर्ट पहन रखी थी। तब मन में एक विचार आया कि अमेरिका के गरीब की तो मजबूरी है, फटे हुए कपड़े पहनना और शायद जो भारतीय वहाँ रह रहे हैं वे भी अपनी धुलाई की समस्या और गरीबी के कारण ऐसे ही कपड़े पहन लेते हों। लेकिन ये अभिनेता, जिनसे भारत का फैशन बनता है, क्या इतनी हीनभावना से ग्रसित हैं जो अमेरिका की गरीब जनता जैसे कपड़ों को फैशन के नाम पर पहनते हैं? यह तो आप सब जानते ही हैं कि जीन्स तो वहाँ काउ-ब्वायज अर्थात ग्वाले पहनते हैं। वो भी हमने फैशन बना लिया और अब फटे-टूटे कपड़ों को फैशन बना रहे हैं। क्या ये अभिनेता वहाँ के अभिनेताओं के फैशन को नहीं अपना सकते? कितनी हीनभावना से भरा हुआ हैं हमारा अभिजात्य वर्ग भी?
Wednesday, February 3, 2010
नायक/लायक/नालायक – अमिताभ/राखी सावंत/राहुल महाजन
एनडीटीवी के रवीश जी ने कल अमिताभ को महानालायक कहा। इसके विपरीत यही चैनल राखी सावंत और राहुल महाजन को नायक बनाने में तुले हैं। मैं कांच के टुकड़े को भी हीरा कहूं तो मेरी मर्जी, यदि मुझे हीरे को भी कांच का टुकड़ा सिद्ध करना पड़े तो यह है मेरी शक्ति। अमिताभ नायक हैं, लायक हैं या फिर नालायक हैं, यह आज के तथाकथित तानाशाह सामन्त तय करते हैं। इनकी एक नायिका सरे आम अपनी माँ को गाली देती है और दूसरा नायक पिता की अस्थि कलश को गोद में रखकर जमकर नशा करता है। दोनों का ही ये स्वयंवर कराते हैं।
इस देश की जनता का आदर्श कौन बने, यह आज टीवी चैनल तय करते हैं। एक बार शाहरूख खान ने अपने साक्षात्कार में कहा था कि ‘हम तो भांड हैं, केवल अभिनय करते हैं’। अब अभिनय करने वाले लोग इस देश के नायक कैसे हो जाते हैं? फिर महानायक भी बन जाते हैं। कौन बनाता हैं इन्हें? यही टीवी चैनल। इस देश की युवा-शक्ति आज इन्हीं अभिनेताओं के पीछे पागल है। वे इन्हें अपना आयडल मानते हैं। विज्ञान का विद्यार्थी जिसे डाक्टर या इंजिनीयर बनना है भला उसका आयडल ये अभिनेता कैसे हो सकते हैं? वे इनके पसन्दीदा अभिनेता हो सकते हैं लेकिन जिनके पदचिन्हों पर या जिनके समान हमें बनना है उनको हम आयडल नहीं कहते। लेकिन ये टीवी वाले युवाशक्ति को भ्रमित करते हैं। उन्हें ऐसा ग्लेमराइज करते हैं कि सब उनके पीछे पागल हो जाते हैं।
मेरा रवीश जी से या जिनको मक्खन लगाने के लिए उन्होंने अमिताभ को महानालायक कहा, क्यो वे राहुल महाजन को अब नायक बनाने में तुले हैं? उन्होंने क्यों राखी सावंत को नायिका बनाकर पेश किया? हम तो किसी भी अभिनेता को चाहे वो अमिताभ हो या फिर और कोई, कभी भी नायक या महानायक नहीं मानते। वे केवल एक अभिनेता हैं, बस। यदि वे अपने अभिनय द्वारा किसी ऐसे मुद्दे को उठाएं जिससे सारा देश एकता के सूत्र में बंध जाए तब हम उन्हें नायक कहेंगे। जैसे पूर्व में मनोज कुमार देश भक्ति का जज्बा जगाने के लिए फिल्में बनाते थे। वे नायक थे। लेकिन यदि आज के ये नायक जो कभी किसी फिल्म के नायक बनते हैं और कभी खलनायक, उन्हें कैसे हम अपना नायक मान लें। स्वांग भरने वाले इस देश के नायक कैसे हो गए? मीडिया आज जितना चरित्र हरण कर रहा है उतना तो शायद किसी तानाशाह राजा ने भी नहीं किया होगा। आज जो भी मीडिया की कमाई का जरिया बनता है वो नायक हो जाता है और जो उनके विरोधी के पक्ष में जा खड़ा होता है वो नालायक बन जाता है। यह दोहरा चरित्र अब जनता समझने लगी है, बस देश का दुर्भाग्य तो तब समाप्त होगा जब युवा पीढ़ी समझदार बनेगी। कौन नायक है, कौन लायक है और कौन नालायक है, यह मीडिया तय नहीं करती। मीडिया का काम है जो सत्य है उसको दिखाना, बस। अपनी राय थोपना मीडिया का काम नहीं है।
इस देश की जनता का आदर्श कौन बने, यह आज टीवी चैनल तय करते हैं। एक बार शाहरूख खान ने अपने साक्षात्कार में कहा था कि ‘हम तो भांड हैं, केवल अभिनय करते हैं’। अब अभिनय करने वाले लोग इस देश के नायक कैसे हो जाते हैं? फिर महानायक भी बन जाते हैं। कौन बनाता हैं इन्हें? यही टीवी चैनल। इस देश की युवा-शक्ति आज इन्हीं अभिनेताओं के पीछे पागल है। वे इन्हें अपना आयडल मानते हैं। विज्ञान का विद्यार्थी जिसे डाक्टर या इंजिनीयर बनना है भला उसका आयडल ये अभिनेता कैसे हो सकते हैं? वे इनके पसन्दीदा अभिनेता हो सकते हैं लेकिन जिनके पदचिन्हों पर या जिनके समान हमें बनना है उनको हम आयडल नहीं कहते। लेकिन ये टीवी वाले युवाशक्ति को भ्रमित करते हैं। उन्हें ऐसा ग्लेमराइज करते हैं कि सब उनके पीछे पागल हो जाते हैं।
मेरा रवीश जी से या जिनको मक्खन लगाने के लिए उन्होंने अमिताभ को महानालायक कहा, क्यो वे राहुल महाजन को अब नायक बनाने में तुले हैं? उन्होंने क्यों राखी सावंत को नायिका बनाकर पेश किया? हम तो किसी भी अभिनेता को चाहे वो अमिताभ हो या फिर और कोई, कभी भी नायक या महानायक नहीं मानते। वे केवल एक अभिनेता हैं, बस। यदि वे अपने अभिनय द्वारा किसी ऐसे मुद्दे को उठाएं जिससे सारा देश एकता के सूत्र में बंध जाए तब हम उन्हें नायक कहेंगे। जैसे पूर्व में मनोज कुमार देश भक्ति का जज्बा जगाने के लिए फिल्में बनाते थे। वे नायक थे। लेकिन यदि आज के ये नायक जो कभी किसी फिल्म के नायक बनते हैं और कभी खलनायक, उन्हें कैसे हम अपना नायक मान लें। स्वांग भरने वाले इस देश के नायक कैसे हो गए? मीडिया आज जितना चरित्र हरण कर रहा है उतना तो शायद किसी तानाशाह राजा ने भी नहीं किया होगा। आज जो भी मीडिया की कमाई का जरिया बनता है वो नायक हो जाता है और जो उनके विरोधी के पक्ष में जा खड़ा होता है वो नालायक बन जाता है। यह दोहरा चरित्र अब जनता समझने लगी है, बस देश का दुर्भाग्य तो तब समाप्त होगा जब युवा पीढ़ी समझदार बनेगी। कौन नायक है, कौन लायक है और कौन नालायक है, यह मीडिया तय नहीं करती। मीडिया का काम है जो सत्य है उसको दिखाना, बस। अपनी राय थोपना मीडिया का काम नहीं है।
Monday, February 1, 2010
ब्लागवाणी से हम पल्टी खा गए
आजकल फुर्सत में हैं, तो सारा दिन इधर-उधर ताक-झांक करते रहते हैं। कभी किसी की रसोई में और कभी किसी की रसोई में। देखते हैं कि किस ने आज क्या पकाया है और क्या परोसा है? थोड़ा-थोड़ा चख भी लेते हैं, लेकिन चखते ही सामने लिखा बोर्ड दिखायी दे जाता है ‘पसन्द का’, लिखा होता है कि पसन्द है तो चटका लगाएं। अब वहाँ चटका लगाना जरूरी हो जाता है। लेकिन तभी एक खिड़की खुल जाती है कि अब इस पर टिप्पणी भी करो। कई बार मन में आता है कि लिख दें कि नहीं करेंगे तो क्या करोगे? तभी दिख जाते हैं पतिदेव, चुपचाप बिना प्रतिक्रिया के खाना खाते हुए। हम गुस्से में भुनभुनाते हुए कहते हैं कि सब्जी और लोंगे? हाँ लेंगे, लेकिन इतने गुस्से में क्यों बोल रही हो? पति मुस्कराकर बोले। अरे आप कोई प्रतिक्रिया ही नहीं कर रहे, बस ठूसे जा रहे हैं, खा लिया तो टिप्पणी भी करो कि अच्छा लगा। यह सीन ध्यान आते ही झट की-बोर्ड पर अंगुलिया चल पड़ती है और तड़ातड़ टिप्पणियां लिख दी जाती हैं। सारा दिन यही क्रम चलता रहता है। इस बीच अपनी रसोई में भी झांक लेते हैं, अपने पकवान पर भी किसी ने टिप्पणी की है क्या? या फिर पसन्द है ऐसा छौंक लगाया है क्या? लेकिन क्या बताऊँ भाईसाहब और बहनजी कुछ लोग तो बड़े ही नुगरे होते हैं, हम तो उन्हें अच्छा है अच्छा कह-कह कर थक गए लेकिन वे कभी हमारे पकवान की ओर झांकते तक नहीं। हम ठहरे राजस्थान के लोग बड़ा सीधा-सादा भोजन बनाते हैं, ना तो हमारे यहाँ उत्तर भारतीयों की तरह ज्यादा चाट-पकौड़ी चलती हैं और ना ही दक्षिणी भारतीयों की तरह डोसे वगैरह हम तो अधिक से अधिक बाटी-चूरमे तक ही बना पाते हैं। ज्यादा से ज्याद चटनी बना ली, पापड़ तल लिया। राजस्थान में हरियाली भी कम ही है, तो हमारे पकवानों को हम हरा-भरा भी नहीं बता पाते, आप लोगों की तरह। चलो कोई बात नहीं, आप मत चखिए राजस्थानी चूरमा, हम तो आप लोगों के भाँति-भाँति के व्यंजन चखते रहेंगे और पसन्द है इसका छौंक भी लगाते रहेंगे। हमें तो अभी फुर्सत है। लेकिन कल बड़ा मजेदार वाकया हो गया, हम अपने पकवान पर सबसे पहले पसन्द का छौंक लगा देते हैं। एक रसोइए ने हमें बताया था कि आप दुबारा भी छौंक लगाएंगे तो तड़का दिखेगा। हमने ऐसा कर दिया, अरे यह क्या संख्या तीन की जगह दो हो गयी। भैया ब्लागवाणी को मेरा प्रणाम। मेरी रसोई और मेरा पकवान ही उन्हें मिला ऐसी ठिठोली करने को। पहली बार किया और पहली बार ही हम पल्टी खा गए। चलिए मेरा पकवान तो तैयार हो गया, आपके भी चख लूं। सीता-सीता।
Subscribe to:
Posts (Atom)