Monday, October 8, 2018

बैताल को ढोता विक्रमादित्य


मेरे अन्दर मेरी अनूभूति को समेटने का छोटा सा स्थान है, वह शीघ्र ही भर जाता है और मुझे बेचैन कर देता है कि इसे रिक्त करो। दूध की भगोनी जैसा ही है शायद यह स्थान, जैसे ही मन की आंच पाता है, उफन जाता है और बाहर निकलकर बिखर जाता है। मैं कोशिश करती हूँ कि यह बिखरे नहीं और यथा समय मैं इसे खाली कर दूँ। मेरे सामने पाँच-सात चेहरे हैं जो राजनीति के फलक पर स्थापित होना चाहते हैं, लगातार कोशिश में हैं, लेकिन कोशिश सफल नहीं होती। उन सबके चेहरों पर तनाव देख रही हूँ, किसी उत्सव में होने पर भी मन की प्रसन्नता कहीं झलक नहीं रही है। लग रहा है कि विक्रमादित्य बैताल को कन्धे पर लादकर चल रहा है। बैताल प्रश्न कर रहा है, विक्रमादित्य कभी उलझ रहे हैं और कभी सुलझ रहे हैं। भीड़ में भी अकेलापन उनकी नियति बन गयी है। कुछ दुर्लभ सा पाने की इच्छा शायद उन्हें बेचैन करे हुए है। उनकी आँखे मित्र को नहीं देख पाती, उनकी आँखें बस खोज रही हैं जो उनकी नैया को पार लगा दे। उनकी हँसी उनसे दूर चले गयी है, उनकी चपलता उनके पास नहीं है, बस है तो खामोशी और चिन्ता। व्यग्रता ने उन सबको घेर लिया है। सत्ता मेरी मुठ्ठी में हो और मैं दुनिया में विशेष बन जाऊँ, बस यही चाहत उनको घेरे है।
सम्राट अशोक याद आने लगते हैं, भारत के सारे राज्य और राजा उनके अधीन होने चाहियें, या तो स्वयं ही सर झुका दो, नहीं तो तलवार के बल पर सर झुक जाएंगे या कट जाएंगे। सारा साम्राज्य कदमों में आ गया लेकिन मन के किसी कोने ने प्रश्न कर लिया! क्या मिला? सबको मुठ्ठी में बन्द करने से क्या मिला? क्या सबके उत्थान की चिन्ता थी, या सबके माध्यम से देश के उत्थान की चिन्ता थी? शायद नहीं! मेरा साम्राज्य चारों तरफ हो, मैं एकमात्र स्वामी हूँ, शायद यह भाव मन में था। भगवान का साक्षात्कार पता नहीं किस-किस ने किया है लेकिन भगवान की चाहत सभी को है। हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का भगवान बनना चाहता है। अशोक के मन में उहोपोह है, बेचैनी बढ़ती जा रही है। नहीं, यह मार्ग शान्ति की ओर नहीं जाता। आज मेरी तलवार में ताकत है तो कल दूसरे की तलवार में ताकत होगी, मैं आज जीत गया हूँ, कल हार जाऊँगा। सिंहासन कभी भी मन की खुशी का कारण नहीं हो सकता, हाँ मेरा प्रेम ही मन की खुशी का कारण बन सकता है। जिन प्रदेशों को जीतने में ना जाने कितने लोगों का रक्त बहा, कितने परिवार उजड़ गये, वह जीत कभी  भी मन को सुख देने वाली नहीं हो सकती है। अशोक ने निश्चय किया कि वे प्रेम बांटेंगे, प्रेम का संदेश देंगे। जैसे ही उनके मन से प्रेम का झरना फूटने लगा, चारों तरफ हरियाली छा गयी। क्या देश और क्या विदेश सब ओर स्वागत में लोग बिछ गये। अब रक्तपात नहीं था, था तो बस प्रेम। लोगों के दिल में अशोक बस गये।
सत्तासीन होने के लिये आचरण बदलना, ना केवल अपने लिये अपराध है अपितु समस्त आत्मीय जनों के प्रति भी अपराध जैसा ही है। मन का प्रेम, मन का उल्लास, मन की हँसी अक्षुण्ण रहनी चाहिये। यदि मन का असली स्वरूप परिवर्तित हो गया तो समझो आपने अपने आपको खो दिया। खोया हुआ इंसान भला क्या पा लेगा! यदि पा भी लिया तो किसी को क्या दे पाएगा? मैं घर से लेकर, समाज और देश में सत्ता का द्वन्द्व रोज देखती हूँ, जो सत्ता के लिये अपना स्वाभाविक चेहरा बदल लेते हैं, वे मिट जाते हैं। आपके अन्दर का प्रेम ही आपके लिये सबसे बड़ा वरदान है, यदि यह ही नष्ट हो गया तब किसके लिये सत्ता? कुछ भी पाने के लिये अपना मूल खोना, पाने से भी बदतर है। दुनिया प्रेम से मिलती है, दुनिया को बस प्रेम से जीता जा सकता है, इसलिये प्रेम को जीवित रहने दो। खुलकर प्रेम बांटों और माहौल को प्रेममय कर दो, बस तुम्हारी जीत निश्चित है। मन में उहापोह चल ही रहा था कि दूर कहीं खिलखिलाहट सुनायी दी, इन्हें शायद कुछ नहीं चाहिये था, ये हँस रहे थे, प्रेम बाँट रहे थे। ये दुनिया के सबसे सफल व्यक्ति थे। मन का आनन्द ही तो सफलता का पैमाना है। मैंने भी एक मुठ्ठी आनन्द झोली में भर लिया और सहेज लिया अपने मन में। मन में अब उद्वेग नहीं था।
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4 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (09-10-2018) को "ब्लॉग क्या है? " (चर्चा अंक-3119) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

विकास नैनवाल said...

सही कहा। प्रेम से ही दुनिया है। जीवन में सब कुछ हो और प्रेम न हो तो उसका फायदा नहीं। हाँ,कई बार लोगों को यह बात बाद में समझ आती है। सुन्दर प्रेरक लेख।

smt. Ajit Gupta said...

शास्त्रीजी आभार।

smt. Ajit Gupta said...

विकास जी आभार।