Saturday, November 30, 2013

सम्‍मान – प्रेम को नष्‍ट और द्वेष को आकृष्‍ट करता है

इन दिनों अन्‍य शहरों में आवागमन बना रहा, इसकारण दिमाग के विचारों का आवागमन बाधित हो गया। नए-पुराने लोगों से मिलना और उनकी समस्‍याएं, उनकी खुशियों के बीच आपके चिंतन की खिड़की दिमाग बन्‍द कर देता है। जब बादल विचरण करते हैं तब वे सूरज के प्रकाश को भी छिपा लेते हैं, ऐसा ही हाल हमारे विचरण का भी होता है कि दिमाग रोशनी नहीं दे पाता। लेकिन अनुभव ढेर सारे दे देता है यह विचरण।
पोस्‍ट को पूरा पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - http://sahityakar.com/wordpress/

5 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज रविवार (01-112-2013) को "निर्विकार होना ही पड़ता है" (चर्चा मंचःअंक 1448)
पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

कविता रावत said...

बहुत बढ़िया प्रस्तुति ...

अजित गुप्ता का कोना said...

आभार कविता जी।

रश्मि प्रभा... said...

तुम अच्छे हो या बुरे
तेजस्वी हो यशस्वी हो
होड़ में सबसे आगे हो
या पीछे

… पूरी किताब का परिचय कोई नहीं पढ़ता
पर यदि तुम्हारा नाम जेहन में,मस्तिष्क में,जुबां पर है
तुम याद हो
राम,रावण
कृष्ण,कंस
कर्ण,अर्जुन
गांधी,गोडसे .... किसी भी अच्छे,बुरे नाम से
तो तुम्हारा परिचय है
परोक्ष विशेषताओं के साथ
अन्यथा पन्ने भरने से कुछ नहीं होता
कुछ भी नहीं !


http://www.parikalpnaa.com/2013/12/blog-post_6.html

PBCHATURVEDI प्रसन्नवदन चतुर्वेदी said...

बहुत उम्दा प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...
नयी पोस्ट@ग़ज़ल-जा रहा है जिधर बेखबर आदमी