Monday, January 10, 2011

श्रद्धा और उपहास के बीच झूलता आदमी -अजित गुप्‍ता

पढ़ना और सुनना मेरे दोनों ही प्रिय विषय रहे हैं। परिवार में साहित्‍य पढ़ने का माहौल नहीं था,लेकिन साहित्‍य मेरी रगों मे कैसे घर कर गया मुझे ज्ञात नहीं। जैसी भी पुस्‍तक हाथ लगी, बस एक ही बैठकी में समाप्‍त करके ही चैन पड़ा। पुस्‍तकों का कहीं न कहीं से जुगाड़ हो ही जाता था। पुस्‍तकालय तो सबसे अच्‍छा स्रोत था ही। कभी विमल मित्र हाथ में होते तो कभी शरद चन्‍द्र, कभी बंकिम चन्‍द्र तो कभी ताराशंकर बंदोपाध्‍याय। कभी आशापूर्णा देवी तो कभी शिवानी। गुलशन नन्‍दा भी पढे जाते तो कर्नल रंजीत भी। बस पुस्‍तक मिलनी चाहिए थी। पत्रिकाओं में उन दिनों धर्मयुग और हिन्‍दुस्‍थान आता तो वे तो चट ही जाते थे। कुछ मनोंरंजन के नाम पर पढ़े जाते और कुछ ऐसे साहित्‍य के नाम पर जो दिल पर अपने हस्‍ताक्षर बना जाते। ऐसे कितने ही साहित्‍यकार होंगे जिनके लिए मन आज भी श्रद्धा से भरा हुआ है। कुछ साहित्‍यकार पूर्व परिचित नहीं होते थे लेकिन साहित्‍य हाथ लगा तो फिर यादों में हमेशा के लिए बस गये।
जब कुछ बड़े हुए तो घर से एक आवाज सुनायी दी कि आज फलां व्‍यक्ति का भाषण है और उसे सुनने जाना है। हम भी साथ चिपक लिए और फिर अच्‍छे व्‍यक्तियों को सुनने की भी लत लग गयी। कभी किसी राजनेता का भाषण तो कभी किसी समाज-सेवक का उद्बोधन तो कभी किसी संत का प्रवचन। बस पढ़ते और सुनते ही जीवन निकल गया। मन में अगाध श्रद्धा-भाव भर गया। ऐसे मनीषियों के विचार पर चिंतन भी होता और मनन भी। अपनाने की कोशिश भी यथासम्‍भव रहती। विमल मित्र की खरीदी कौडि़यों के मौल आप लोगों ने भी पढ़ी होगी, दो वोल्‍यूम में पूरा उपन्‍यास है। तीन-चार दिन में ही पूरा कर लिया और कई बार पढ़ा गया। लेकिन पन्‍ने पलटकर समाप्‍त करने वाली मानसिकता कभी नहीं बनी। ऐसे ही कभी एक घण्‍टे का भाषण सुना तो कभी तीन घण्‍टे तक भी सुना लेकिन आनन्‍द में कभी कमी नहीं आयी। ऐसे चिंतकों के प्रति मन के श्रद्धा-भाव में कभी कमी नहीं आयी।
शायद वह पीढ़ी श्रद्धा की ही थी। हम अपने माता-पिता के प्रति श्रद्धा रखते थे, गुरुजनों के प्रति श्रद्धा रखते थे और बड़ों के प्रति भी श्रद्धा रखते थे।  कई बार इस बात पर बहस भी होती थी कि प्रेम क्‍या है? प्‍यार क्‍या है और श्रद्धा क्‍या है? लेकिन आज सबकुछ बदल गया सा नजर आता है। श्रद्धा शब्‍द कहीं चुक सा गया है। आज के आराध्‍य भी बदल गये हैं। अब अभिनेता और खिलाड़ियों के पीछे लोग दौड़ रहे हैं। क्‍यों दौड़ रहे हैं मालूम नहीं? कभी दौड़ते-दौड़ते वे हाथ आ जाते हैं तो समझ नहीं आता कि अब क्‍या करें? तब लगता है कि प्रमाण के रूप में ऑटोग्राफ ही ले लिए जाए! या अधिक सुविधा मिल जाए तो आलिंगन की ईच्‍छा बलवती हो जाती है। लेकिन उनके विचारों को कोई अपनाता नहीं, क्‍योंकि वे विचारवान तो हैं ही नहीं।
अपनी-अपनी पीढ़ी का सत्‍य है। आज श्रद्धा हमारे जीवन से गायब होती जा रही है। बराबरी का जमाना आ गया है। टेलीविजन पर हमेशा देखती हूँ और मन में एक टीस सी उभरती है, जब किसी नौजवान पत्रकार को किसी विचारवान व्‍यक्तित्‍व का उपहास करते हुए देखती हूँ। कैसा भी व्‍यक्तित्‍व सामने हो, वे उसे बौना सिद्ध करने पर तुल जाते हैं। कभी लगता है कि कैसी शिक्षा है आज की, जो ज्ञानवान व्‍यक्ति का उपहास करना सिखाती है! आप कहेंगे कि पहले जैसे आदर्श व्‍यक्तित्‍व आज कहाँ? लेकिन हमारी पीढ़ी तो अशिक्षित माता-पिता का भी सम्‍मान करती थी, उनका उपहास तो कभी नहीं उड़ाती थी। फिर आज क्‍या हो गया? तर्क और वितर्क हमारे जीवन में भी रहे हैं लेकिन किसी विषय के साथ रहे हैं ना कि व्‍यक्ति के साथ। व्‍यक्ति के साथ तो हमेशा श्रद्धा या विश्‍वास ही रहा है। मुझे तो लगता है कि सर्वाधिक सुखी व्‍यक्ति वे ही हैं जिनके मन में श्रद्धा है। इसलिए मैं हमेशा कहती हूँ कि आज भक्ति-मार्गी सबसे अधिक सुखी हैं, क्‍योंकि वे श्रद्धा से लबालब भरे हैं उनमें अविश्‍वास घर करता ही नहीं। जब अविश्‍वास ही नहीं है तब वे कैसे उपहास को माध्‍यम बनाएंगे। इसलिए आज मुझे लगता है कि आज का आदमी श्रद्धा और उपहास के बीच में झूल रहा है। एक हमारी पीढ़ी है जिसके पास अगाध श्रद्धा है और एक आज की नवयुवा पीढ़ी, जिसके उपहास को हम झेल रहे हैं। आपका क्‍या विचार है?  

57 comments:

Satish Saxena said...

श्रद्धावान हैं कहाँ अब ?? केवल जलन के साथ अविश्वास और फलस्वरूप उपहास उड़ाइए गुरुजनों का ..

संजय कुमार चौरसिया said...

aapse poori tarah sahmat,

सुज्ञ said...

एकदम सही कहा है आपने, यह युग श्रद्धा से सीधा उपहास में कुद पडा है।
उन जीवन मूल्यों को तहस-नहस करने को उतारू है, जो आस्था से प्राप्त है। और ऐसी श्रद्धाएं युगो के मानव जीवन विकास श्रम से बनती है। जिसे सभी अल्पकाल में ही नष्ट करने को तुले है।

Dr. Zakir Ali Rajnish said...

यह दिखावे और आडम्‍बर का युग है, जिसमें हर व्‍यक्ति एक दूसरे से होड लेता प्रतीत होता है।

---------
कादेरी भूत और उसका परिवार।
मासिक धर्म और उससे जुड़ी अवधारणाएं।

Rahul Singh said...

व्‍यवहार का (सोच का नहीं) जनरेशन गैप के साल सिकुड़ कर धीरे-धीरे कम हो रहे हैं.

प्रवीण पाण्डेय said...

श्रद्धावान्लभते ज्ञानम्।

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून said...

बहुत सी नई चीज़े समाज में स्थानापन्न के रूप में स्थापित हो गई हैं जैसे टी.वी., वीडियो व वीडियो गेम्स, कंप्यूटर, लैपटाप, टेबलेट पैड, iPod और भी न जाने क्या क्या. इसलिए पुराने मूल्यों की जगह नए मूल्य ले रहे हैं...

P.N. Subramanian said...

सुन्दर आलेख. आपका सौभाग्य ही था की आपको खूब पढने को मिला. मिल तो सब को जाता है परन्तु बुद्धि भी तो काम करनी चाहिए.!आजकल तो लोग पढना भूल ही गए हैं. केवल दिखता ही है.

डॉ टी एस दराल said...

स्कूल कॉलिज में तो हम भी खूब शौक से पुस्तकें पढ़ते थे । फिर पढना मजबूरी हो गई ।
अब तो काम ही अवसर मिलता है ।
लेकिन सुनने के लिए हम तो बस अटल बिहारी बाजपेयी की इलेक्शन मीटिंग्स में जाते थे । क्योंकि एक वाही थे जिन्हें सुनकर वास्तव में आनंद आता था बाकि तो सब नेता ही होते थे । आज वो भी नहीं ।

rashmi ravija said...

सही कहा...आपने अजित जी,
आजकल बच्चों के मन में बड़ों के लिए श्रद्धा भाव नहीं है...और इस से उनके जीवन की ही कठिनाई बढ़ रही है.

पढने की आदत तो खैर विलुप्त ही होती जा रही है. फिर भी अगर घर में माता-पिता को पढ़ते देखें...तो किताबें उन्हें ही आकृष्ट करने लगती हैं....पर माता-पिता के पास भी पढने का समय कहाँ है, अब.

V.P. Singh Rajput said...

सही कहा...

Sushil Bakliwal said...

दीदीश्री,
आपके समकक्ष तो सम्भव नहीं किन्तु किताबें हमारी सबसे अच्छी साथी होती हैं इसी विचार को ग्राह्य रखते हुए पढने में दिलचस्पी के साथ ही मेरा भी बचपन गुजरा जो बाद में आवश्यकतानुसार रह गया ।
पहले श्रद्धा और अब उपहास युग की यात्रा मेरी भी करीब-करीब आपके साथ ही चल रही है इसलिये हम जब बच्चे थे और आज जब बच्चों के बडे हैं इस युग में क्षोभजनक पर्याप्त ऋणात्मक परिवर्तन देख रहे हैं ।

anshumala said...

अजित जी

समय के साथ चीजे बदलती रहती है आप के समय में माता पिता केवल श्रद्धा के नजर से देखे जाते थे तो हमारे समय में नजरिये में थोडा फर्क आया और सम्मान के साथ मित्रता का भाव आ गाय था आज उस नजरिये में भी परिवर्तन आया है और ये आगे भी आता रहेगा हम में से कोई भी इसे नहीं रोक सकता है हम यदि कुछ कर सकते है तो वो ये की हम उस परिवर्तन का रुख सकरात्मक कर दे | ये हमारे ही हाथ में है यदि हम ऐसा नहीं कर पा रहे है तो गलती हमारी होगी, आने वाली पीढ़ी की नहीं |

shikha varshney said...

पता नहीं अजीत जी! पर इस बात से मैं पूरी तरह सहमत नहीं हो पाती हूँ .यह सच है कि समय बहुत बदल गया है जाहिर है मूल्य और तरीके भी बदलेंगे .पर इसके लिए यह कहना कि नई पीड़ी में श्रद्धा ही नहीं है शायद ठीक नहीं यह आज भी व्यक्ति व्यक्ति पर निर्भर करता है.पुराने समय में भी मैंने कितनो को देखा जो लंबा लंबा घूंघट करके उसके पीछे से अपने से बड़ों को गालियाँ दिया करती थीं.या बेटा अपने बुजुर्ग पिता को मुंह घुमा कर कोसा करता था.
जहाँ तक रही बात पढ़ने की तो आप ब्लॉग जगत में ही देखिये कितने ही कम उम्र युवा शायद आप और हमसे ज्यादा पढते हैं.
कुछ ज्यादा लिख दिया हो तो माफी चाहती हूँ.
विचारणीय पोस्ट सहज अभिव्यक्ति के लिए आभार...

अनामिका की सदायें ...... said...

aajkal kaam bahut hain aur samay bahut kam. ek din ke 24 ghante bhi kam lagte hain. padhne ki bahut kuchh chaahat rakhte hue bhi aur kartavvyon ko prathmikta dene ke chakkar me kafi kuchh padhna rah jata hai. baaki shraddha ki baat hai to vo man se hoti hai aur aaj ki generation ek baar ko maan bhi liya jaye ki sir jhukakar agyakari peechhe chalne wali generation nahi lekin shraddha to rakhti hai...han vo dikhava nahi karti.

vichaarneey post.

राज भाटिय़ा said...

अजित जी इतने आगे तो यह युरोपियन भी नही निकले जितने आगे हमारे आज के नोजवान निकल गये हे, यह गोरे भी अपने से बडो का सम्मान तो करते हे, चाहे उन्हे नाम के संग पुकारे,लेकिन हमारे इन नोजवानो की भी कोई गलती नही, जो बडो की इज्जत नही करते या श्रद्धा से नही बुलाते, यह ऎसे ही नोजवान करते हे जिन के घरो मे संस्कार नाम की चीज थी ही नही, या मां बाप सारी उम्र इन्हे नोकरो के हवाले छॊड कर अपनी महफ़िलो मे मस्त रहे या पेसो के पीछे भागते रहे, लेकिन उन घरो मे आज भी यह नोजवान बडॊ को श्रद्धा ओर इज्जत से देखते हे, जहां संस्कार बच्चो को शुरु से ही सिखाये जाते हे, बडो की इज्जत करना शुरु से ही सिखाया जाता हे, अभी पुरा समाज खराब नही हुआ, लेकिन हालात जरुर विचारणिया हो गये हे, ओर अगर ऎसा ही आगे चलता रहा तो....
धन्यवाद इस अच्छॆ ओर आंखे खोलने वाले लेख के लिये

Ruchi said...

Mausi,

I get your point, but you cannot blame the whole generation for it. Because in that case I have to be of your generation. I know in the current or upcoming generation role models have changed but still people do have role models...And the fan following of Sportsmen and Actors is very age specific....your generation followed Rajesh Khanna and mine Hritik Roshan.....Your generation followed Sharad Chandra and mine Arundati Rao...

अजित गुप्ता का कोना said...

कल टेलीविजन पर एक साक्षात्‍कार देख रही थी। जिस प्रकार से पत्रकार एक श्रद्धावान व्‍यक्तित्‍व को उपहास में उड़ा रहा था तब मेरे मन में यह प्रश्‍न जगा। मैं अक्‍सर मीडिया में इसी प्रकार के साक्षात्‍कार और बहसें देखती हूँ जिसमें सामने वाले को बौना बनाकर प्रस्‍तुत करने का प्रयास रहता है। तभी मन में विचार आया कि क्‍या हम लोग ऐसे किसी का उपहास उड़ा सकते हैं? हमारे अन्‍दर का श्रद्धा-भाव क्‍यों उपहास के भाव मं बदल गया है?

दिनेशराय द्विवेदी said...

अजित जी,
केवल इस पोस्ट से काम न चलेगा, श्रद्धा को व्याख्यायित भी करना पड़ेगा।

अजित गुप्ता का कोना said...

दिनेश राय जी, मैं जानती हूँ कि आप अच्‍छे वकील के साथ एक अच्‍छे इंसान भी हैं। बस मेरे मन में आपके प्रति यही श्रद्धा भाव या आदर भाव है। जब मैं आपका साक्षात्‍कार या वैसे भी कभी बात करूंगी तो उसी भाव के साथ करूंगी, कभी उपहास की भाषा में बात करने की कल्‍पना भी नहीं करूंगी। या बात-बात में आपको बौना सिद्ध करने का प्रयास नहीं करूंगी। मैं केवल इसी छोटे से बिन्‍दु पर लिख रही हूँ। वैसे मुझे पता है कि मेरा विषय अभी बहुत अधूरा है, उसे और पूर्णता की आवश्‍यकता है।

सदा said...

एकदम सही बात कही है आपने इस लेख में ...।

Anonymous said...

उपयोगी पोस्ट!
इसे बुकमार्क कर लिया है!

अन्तर सोहिल said...

बेहतरीन लेख
आत्मविश्वास, आत्मसम्मान के नाम पर आज अहंकार को पुष्ट करने की शिक्षा और संस्कार दिये जा रहे हैं और यही मूल कारण है।

प्रणाम

vandan gupta said...

सुन्दर आलेख.शुरु का तो ऐसा लगा जैसे मुझे ही लि्ख दिया आपने…………मेरे भी जो हाथ लगता था सब पढ लेती थी ऐसा ही हाल था तब और शायद कुछ हद तक अब भी वो ही हाल है।

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

`अच्‍छे व्‍यक्तियों को सुनने की भी लत लग गयी। कभी किसी राजनेता का भाषण ...'
राजनेता.... अच्छे व्यक्ति.... आपको शायद प्याज़ खरीदने का साबेका नहीं पडा :) :) :)

अजित गुप्ता का कोना said...

@रुचि,
तुमने मेरा पोइण्‍ट पूरी तरह से नहीं समझा या मैं ही स्‍पष्‍ट न‍हीं लिख पायी। तीन शब्‍द हैं हमारे जीवन में श्रद्धा, प्रेम और प्‍यार। आज इनमें से श्रद्धा शब्‍द सरकता जा रहा है और जब भी मैं टीवी देखती हूँ तो रिपोर्टर जिस प्रकार से साक्षात्‍कार लेते हैं या बहस करते हैं उस समय यह अनुभव में आता है। इस शब्‍द की जगह उपहास ने ले ली है। एकदम युवा रिपोर्टर किसी विद्वान से किस तरह से साक्षात्‍कार लेते हैं उससे तो यही लगता है कि इनके अन्‍दर श्रद्धा की जगह उपहास आ गया है।

Neeraj said...
This comment has been removed by the author.
अजित गुप्ता का कोना said...

शिखा जी
आपने मेरी बात नहीं समझी या मैं ही नहीं समझा पायी। मैंने श्रद्धा वाली बात टीवी के संदर्भ में लिखी थी कि किस प्रकार विद्वान लोगों के साक्षात्‍कार लिए जाते हैं, उपहास उड़ाते हुए। सभी को बौना बनाने की प्रथा चल पड़ी है। आपके विचारों से मैं पूरी तरह से सहमत हूँ और यह मंच तो है ही सभी के विचार जानने के लिए, इसलिए इसमें किसी बात का बुरा मानने वाली तो बात ही नहीं होनी चाहिए।

अजित गुप्ता का कोना said...

अनामिका जी
आपने लिखा कि नवीन पीढ़ी प्रदर्शन नहीं करती, लेकिन मैं तो देखती हूँ कि प्रेम का तो भरपूर प्रदर्शन करती है। बात बात में आई लव यू कहती है। आइ लव यू और आइ रेस्‍पेक्‍ट यू में अन्‍तर होता है। ऐसा मेरा मानना है। वैसे सभी के अपने नजरिए हैं।

रेखा श्रीवास्तव said...

अजित जी,

आपका लिखा पढ़ कर लगा कि दो पीढ़ियों का सही विश्लेषण किया है आपने. बल्कि "खरीदी कौड़ियों के मोल" का नाम लेकर तो वापस उसी में पहुंचा दिया. ये पुस्तक मेरी भी सर्वाधिक प्रिय पुस्तकों में से है. इस पीढ़ी को संस्कार तो हमने ही दिए हैं लेकिन वे उसको लेने में कुछ और आगे निकल गए. अर्थ से अनर्थ तक का सफर उन्हें भटका रहा है. श्रद्धा जैसा भाव पहले जैसा तो रहा ही नहीं है बल्कि पिछली पीढ़ी में कमियां निकालने कि प्रवृत्ति का भी विकास तेजी से हुआ है. साक्षात्कार में गुणों की चर्चा कम और कमियों के प्रति इशारा अधिक होने लगा है. हो सकता है कि ये पीढ़ी का अंतर हो ?

उपेन्द्र नाथ said...

अजित जी, सही कहा है आपने...... सुन्दर लेख.

अरुण चन्द्र रॉय said...

aadarniya ajit ji jyon jyon jiwan se pustak visthapit hoti jayengi jiwan se shradhha bhi visthapit hogi aur shunyata ghar kar jayega.. pichhle dashak me yah sabse adhik hua hai...mulyon ke patan me aadhunik sanchar madhyamo ke badi bhumika hai.. achha laga aapko padhna...

प्रतिभा सक्सेना said...

क्योंकि आस्थाएँ खंडित हो रही हैं.जो आदर्श पढ़ाए जाते हैं उनमें और व्यवहार में बहुत बड़ा गैप है ,घर में भी बच्चे यह देखते हैं और बाहर भी .जीवन की विकृतियाँ खुल कर सामने आ रही हैं ,हर क्षेत्र में और चारित्रिक पतन ,जीवन मूल्यों की गिरावट और एक अँधी दौड़.
आज कितने बच्चों को अपने बड़ों से संस्कार मिलते हैं टीवी कल्चर .और भी जाने क्या-क्या .श्रद्धा की भावना को उचित,पोषण और वातावरण नहीं मिलता .
मेरा तात्पर्य सिर्फ़ इतना कि यह भी एक पक्ष है .

वाणी गीत said...

श्रद्धा विलुप्त हो गयी है , हमनारे स्वाभाव में ही नहीं रही ...अपने गुरुजनों के प्रति हमारे मन में जो श्रद्धा और सम्मान था , वह आज की पीढ़ी में नहीं है ...दोष सिर्फ इस पीढ़ी का भी नहीं है , शिक्षकों में भी विद्यार्थियों के प्रति जिम्मेदारी का भाव समाप्त हो गया है ...वास्तव में यह सिर्फ शिक्षक और विद्यार्थी की बात नहीं है , हमारा सामाजिक चरित्र ही सिर्फ अर्थ पर केन्द्रित हो गया है ...ना बाप बड़ा ना भैया , सबसे बड़ा रुपैया ...भावनाएं भी बिकती हैं यहाँ ..!

-सर्जना शर्मा- said...

अजित जी आपकी एक बात से मैं समहत हूं कि श्रद्धा वान इंसाल सुखी रहते हैं और संतुष्ट भी । आज की पूरी पीढ़ी संस्कारहीन है ऐसा नहीं है हां ज्यादातर युवा अपनी मनमानी करते हैं अपने नज़रिए को सही समझते हैं लेकिन मेरा भी अपना अनुभव है हमारे पास हर साल बहुत सारे इंटर्न आते हैं जर्नलिज़्म संस्थानों से 98 फीसदी बच्चे बहुत संस्कारवान , सभ्य हैं और सम्मान करते हैं . जब मैं इंटर्न थी तो इतनी अकल ही नहीं थी आजकल के बच्चे बहुत फोकस्ड भी हैं . अपना लक्ष्य जानते हैं और काम सीख कर जाने के बाद भी संपर्क में रहते हैं जब कभी आते हैं तो पांव छूते हैं । मुझे लगता है बहुत सी बातें अपने घर परिवार पर निर्भर करती हैं . कि उन्होनें अपने घर से कैसे संस्कार लिए हैं । इस पर विस्तार से अपनी ब्लॉग पर लिखूंगी । आपको लोहड़ी , पोंगल , मकर संक्राति और उत्तरायण की शुभ कामनाएं .

शोभना चौरे said...

अजितजी
आपने बिलकुल सही कहा है |घर में तो संस्कार दिए ही जा रहे है किन्तु रात दिन चलने वाले टी. वि की भाषा इस नै पीढ़ी को अपने आकर्षण में ले रही है जो सोचनीय है बड़े से बड़े विद्वानों ,नेताओ के नाम इस तरह लिए जाते है युवा पत्रकारों द्वारा मानो वे उनके सहपाठी है |श्रद्धा ,आदर, प्यार सब कुछ अति नाटकीय हो चला है |हम लोग किसी के उपकार करने पर या हमारे छोटे से कोई काम कर देने पर जीवन भर उसके ऋणी
हो जाते है जिसे आज की पीढ़ी व्यर्थ समझती है उनका कहना है टीचर पढाता है तो उसे सेलरी मिलती है ,डाक्टर को उसकी फ़ीस देते है ,आदि |घर में काम करने वालो को पैसा देते है उनपर मेहरबानी कैसी ?
अब इन विचारो का क्या किया जाय ?

Sushil Bakliwal said...

दीदीश्री नमस्कार,
पिछले 3 लेखों से आपकी टिप्पणी पर प्रति टिप्पणी करने के लिये मेरा लिखा गया मैटर भी नेट कनेक्शन की गडबडियों के कारण व्यर्थ ही गया । Sorry.
वास्तव में ब्लाग लेखन में संक्षिप्त तरीके से लिखे को थोडी रोचक शैली में प्रस्तुत किये जाने की आवश्यकता ही अधिक दिखती है । शैली की रोचकता के लिहाज से आपका अन्तिम व्यंगात्मक लेख जिसमें आपने मेरे मेहबूब फिल्म के बुर्के युग के प्रेम से चलते हुए आज के राखी सावंत के युग तक के प्रेम की व्याख्या की थी, मुझे बहुत ही श्रेष्ठ लगा था । सही मायनों में मैं उस लेख से आपकी लेखनशैली का कायल हो गया था और उसी दिन मैंने आपके ब्लाग को फालो भी किया था ।
बाकि तो सबकी अपनी-अपनी शैली चलती ही है ।

सुनील गज्जाणी said...

श्रद्धावान हैं कहाँ अब ? केवल जलन के साथ अविश्वास और फलस्वरूप उपहास उड़ाइए गुरुजनों का .

डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali) said...

ममा....आप कैसी हैं? मैं आपकी सारी छूटी हुई पोस्ट्स इत्मीनान से पढ़ कर दोबारा आता हूँ...

विशाल said...

respected guptaji,
aap shaed perion ke farak ko bhul rahi hain .badla hua environment,globalisation technology ne sabhi ko ek dusre se dur kar diya hai. ham jure hue hain lekin pehle ki tarah nahin.shradha ko bhi naye sandarbhon me talashne ki jarurat hai.shaed aaj ki shradha pehle se achhi ho. raha uphaas ka swaal ya usko mehsoos karne ki bat wo viaktighat baat hai. aap uphaas se bahut ooper uth chuki hain..................regards..........bob

डॉ. मोनिका शर्मा said...

यही हाल है...... अब श्रृद्धा नहीं रही तभी तो ज्ञान भी नहीं ले पा रहे हैं युवा...... अच्छे विषय पर बात की आपने ....

Chaitanyaa Sharma said...

सक्रांति ...लोहड़ी और पोंगल....हमारे प्यारे-प्यारे त्योंहारों की शुभकामनायें......सादर

Khushdeep Sehgal said...

अजित जी,
थोथा चना, बाजे घना...

अधकचरी नॉलेज के बावजूद खुद को प्रकांड पंडित समझने लगे हैं...ये न तो खुद के व्यक्तिव का विकास करता है और न ही समाज का कुछ भला करता है...

इसीलिए तो कहते हैं सिक्के शोर मचाते हैं और नोट चुप रहते हैं...नोट जानते हैं कि उनकी वैल्यू बड़ी है, इसलिए उन्हें शोर मचाने की ज़रूरत नहीं...

जय हिंद...

सुज्ञ said...

लोहड़ी,पोंगल और मकर सक्रांति उत्तरायण की ढेर सारी शुभकामनाएँ।

DR. ANWER JAMAL said...

Nice post .

प्रवीण said...

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अजित जी,

बहुत सही कह रही हैं आप, इलैक्ट्रानिक मीडिया के अधिकाँश चेहरे लाइव होते व हाथ में माइक्रोफोन आते ही स्वयं को सर्वज्ञानी समझ बैठते हैं व अकसर विषय विशेषज्ञों का उपहास करते नजर आते हैं... तब यही लगता है कि उनसे तो श्रद्धावान भले...


...

Rajeysha said...

बात नई और पुरानी पीढ़ी की नहीं, आपकी जि‍न्‍दगी का नि‍चोड़ क्‍या कहता है उसकी है। कमउम्र लोग आपका उपहास कर रहे हैं... यदि‍ आपके पास कुछ बहुमूल्‍य है जि‍से वो नहीं ले पा रहे तो उनका नुक्‍सान है। यदि‍ आपमें कुछ है ही नहीं, और उपहास हो रहा है तो भी कुछ गलत नहीं।

विनोद कुमार पांडेय said...

अजीत जी प्रणाम,
आपने बहुत सटीक और प्रासंगिक विषय उठाया है.. मुझे जहाँ तक लगता है यह सब संस्कार से आते है कहीं ना कहीं हम सब के अंदर वो भाव छिपे थे जो प्रेम के प्रति श्रद्धा प्रकट करता था....आज इन सब बातों का तही से हनन हो रहा है पर अब भी इन भावनाओं को समझनें वालों की कमी नही है...पर पीढ़ी बदल रही है और इसमें सुधार की ज़रूरत है इस बात से भी इनकार नही किया जा सकता है...बढ़िया सार्थक आलेख के लिए धन्यवाद

ZEAL said...

बहुत अहम् विषय पर लिखा है आपने। आपके लेख एवं सभी टिप्पणियों से सहमत हूँ।

निर्मला कपिला said...

सही कहा अजित जी। ये जेनेरेशन गैप तो है लेकिन नेट क्रान्ति से ये बदलाव अचानक और जल्दी से बच्चों मे आया है। शायद हमारी पेढी ने हर क्षेत्र मे इस गैप का अन्तर्विरोध अधिक झेला है या झेल रहे हैं। आलेख अच्छा लगा। शुभकामनायें।

k.joglekar said...

namaskar ajit ji. Bhopal nari smmelan me aapko suna tha. aaj blog par padha.aadarsh,parampara,aastha inka makhoul udana aaj ka faishan sa hota ja raha hai. aalekh bahut achha hai.

संजय भास्‍कर said...

अजीत जी प्रणाम,
आपने बहुत सटीक और प्रासंगिक विषय उठाया है..

Atul Shrivastava said...

बहुत सही कहा आपने। आपकी बातों से मैं सहमत हूं, आज के दौर के पत्रकारों को लेकर आपने जो बात कही है, उसे मैंनें भी पत्रकार होने के नाते महसूस किया है। आपको एक और बेहतरीन पोस्‍ट के लिए बधाई।

Atul Shrivastava said...

बहुत सही कहा आपने। आपकी बातों से मैं सहमत हूं, आज के दौर के पत्रकारों को लेकर आपने जो बात कही है, उसे मैंनें भी पत्रकार होने के नाते महसूस किया है। आपको एक और बेहतरीन पोस्‍ट के लिए बधाई।

Atul Shrivastava said...

बहुत सही कहा आपने। आपकी बातों से मैं सहमत हूं, आज के दौर के पत्रकारों को लेकर आपने जो बात कही है, उसे मैंनें भी पत्रकार होने के नाते महसूस किया है। आपको एक और बेहतरीन पोस्‍ट के लिए बधाई।

Neeraj said...

सही कहती हैं आप, जाने नयी पीढ़ी में श्रद्धा का ह्रास क्यों होता जा रहा है | उपहास उड़ाने की प्रवृत्ति बढती जा रही है बस |

प्रियंका गुप्ता said...

आदरणीय़ा अजीत जी,
बिन अनुमति के कोई सम्बोधन नहीं दूँगी...। आपकी आधी बात से सहमत हूँ , आधी से नहीं...। बड़ों के प्रति सम्मान, श्रद्धा सबमें ख़त्म नहीं हुई, यह कमी कहीं-न-कहीं पारिवारिक संस्कारों और अपने-अपने नज़रिए पर निर्भर करती है...ऐसा मेरा मानना है। अगर आप खुद बड़ों के प्रति सम्मान दिखाएँगे, तो आपके बच्चे भी ऐसा ही करेंगे । कई परिवारों में मैने देखा है कि अपने खुद के माता-पिता या बड़ों के लिए तो आदर होता है, पर अपने जीवनसाथी के माँ-बाप या परिवारवालों को हिकारत से सम्बोधित किया जाता है । ऐसे में शायद कुछ बच्चे, जो अपने विवेक से काम नहीं ले पाते, आगे चल कर पूरे समाज में ग़लत आचरण प्रस्तुत करते हैं...।
साक्षात्कार या कार्यक्रमों में तो कई बार सच में मज़ाक के नाम पर अपनी सीमाएँ लाँघ ली जाती हैं...बुरा लगता है । पर दूसरों का मज़ाक बनाते या उँगली उठाते वक़्त इंसान ज्यादातर अपने ग़िरेबां में नहीं झाँकता...।
विचारपूर्ण लेख के लिए मेरी बधाई...।

प्रियंका गुप्ता