Sunday, May 21, 2017

माँ को भी जीने का अधिकार दे दो

इन दिनों सोशल मीडिया में माँ कुछ ज्यादा ही गुणगान पा रही है। हर ओर धूम मची है माँ के हाथ के खाने की। जैसै ही फेसबुक खोलते हैं, एक ना एक पोस्ट माँ पर होती है, उसके खाने पर होती है। मैं भी माँ हूँ, जैसे ही पढ़ती हूँ मेरे ऊपर नेतिक दवाब बढ़ने लगता है, अच्छे होने का। अभी हम जिस जमाने में जी रहे हैं, वहाँ संयुक्त परिवार विदा ले चुके हैं, अब तो एकल परिवार ही दिखायी दे रहे  हैं। शिक्षा के कारण युवा एकल परिवार से भी वंचित हो गया है, अब युवक और युवती दोनों को ही अकेले किसी महानगर या विदेश में जीवन यापन करना होता है। विवाह की भी बात कर रही हूँ, जरा रूकिये। विवाह होने के बाद एक से दो हो जाते हैं लेकिन दोनों ही रसोई से अनजान होते हैं। जैसे-तैसे पेट भरने का जुगाड़ कर लिया जाता है लेकिन भोजन की तृप्ति क्या होती है, वे भूल ही जाते हैं। अब माँ याद आती है, माँ कैसा भी भोजन बनाती थी लेकिन वे जो खा रहे हैं उससे तो लाख गुणा अच्छा ही  होता था। जब ऐसी परिस्थिति अपने घर में भी देखती हूँ तो मेरे ऊपर नैतिक दवाब स्वाभाविक रूप से पड़ने लगता है और मैं कुछ नया और कुछ रुचिकर बनाने की ओर ध्यान देने लगती हूँ।
अब अपनी माँ के बारे में सोचती हूँ, वह सीधा-सादा भोजन बनाती थी, हमें बिना हाथ हिलाये भोजन मिलता था तो परम स्वादिष्ट ही लगता था  लेकिन दुनिया में आने वाले नये व्यंजनों को बनाने की शुरुआत हम ही करते थे। हम से मतलब नयी पीढ़ी है। हमें हमारी माँ के हाथ से बने भोजन की आदत सी हो जाती है और मन करने लगता है कि वही स्वाद हमें मिलता रहे। लेकिन माँ क्या चाहती है, यह कोई नहीं सोचता! जैसे ही नयी पीढ़ी आंगन में अंगड़ाई लेने लगती है, माँ भी सोचने लगती है कि अब मुझे भी कुछ नया व्यंजन खाने को मिलेगा। लेकिन ऐसा होता नहीं है। बस माँ तू अच्छी है, यही गुणगान सुनकर चुप लगा जाती है। भारतीय परिवारों में अभी तक नासमझी बरकरार है कि बेटे का घर बसेगा और बहु आकर सास की सेवा करेगी। माँ पलक-पाँवड़े बिछा देती है कि अब तो मुझे भी कोई भोजन कराएगा। लेकिन यह क्या बहु तो बेटे से भी अधिक कोरी निकल जाती है। उसने भी केवल शिक्षा पर ही ध्यान दिया, पेट कैसे भरा जाएगा चिन्तन ही नहीं किया!
बेचारी माँ, बुढ़ापे में भी रसोई में अपनी टूटी कमर को लेकर साधी खड़ी रहने का प्रयास करती है और माँ के हाथों में जन्नत  है इस बात को पोर-पोर से सुनती हुई खाना बनाने को मजबूर होती रहती है। कोई बेटा नहीं कहता कि माँ मैं तेरी सेवा करना चाहता हूँ, तू मेरे पास चली आ, बस सभी यह कहते सुने जाते हैं कि माँ तेरे हाथ के खाने का मन कर रहा है। माँ महान होती है, पुत्र कपूत हो सकता है लेकिन माता कुमाता नहीं होती है। अरे बस भी करो, सारे भाषण! माँ को भी जीने का अधिकार दे दो। उसकी सेवाओं की भी उम्र तय कर दो। तुम सेवा नहीं कर सकते तो जाने दो लेकिन बुढ़ापे में उनकी उम्र पर तो गाज ना गिराओ।
अन्तिम बात, अब जब हम सारे काम खुद कर सकते हैं तो क्या लड़का और क्या लड़की दोनों को ही पेट भरने के और जीने के सारे ही काम सिखाइये। माँ को अनावश्यक महान मत बनाइये, वह भी जीवित प्राणी है, उसे भी कुछ चाहिये। माँ पर लिखने से पहले यह सोचिये कि क्या किसी माँ ने भी अपने बेटे पर लिखा कि उसने माँ का जीवन धन्य कर दिया हो। जब संतान बड़ी हो जाती है तब माँ का कर्तव्य पूरा हो जाता है, इसलिये परस्पर सम्मान और प्रेम देने की सोचिये ना कि खुद की नाकामी छिपाकर माँ को काम में जोतिए।

(सारी संतानों से क्षमा मांगते हुए)

Saturday, May 20, 2017

कितने घोड़ों को कुशल सवार मिलता है?

जब में नौकरी में थी और मुझे विश्वविद्यालय की एक मीटिंग में फेकल्टी सदस्य के रूप में जाना था। मेरी वह पहली ही मीटिंग थी और फिर अंतिम भी हो गयी। मीटिंग के दौरान ही मुझे समझ आ गया था कि मेरा अधिकार मुझ से छीन लिया जाएगा। अब आपको अपनी टीम में क्यों रखा जाता है? इसलिये की आप बॉस की हाँ में हाँ मिलाएं। मीटिंग में एक बहस शुरू की गयी जिसका कोई औचित्य नहीं था, औचित्यहीन बहस लम्बी खिंचती गयी आखिर मैंने प्रश्न कर लिया कि हम किस  पर बहस कर रहे हैं? बहस तत्क्षण ही समाप्त हो गयी। मेरे साथी ने कहा कि आप का प्रश्न आपको सदस्य बनाये रखने का औचित्य सिद्ध करता है, लेकिन मैं तब मन ही मन हँस दी थी कि यही प्रश्न मुझे मेरे अधिकार से वंचित कर देगा। यही हुआ! लोग फायदे का मार्ग ढूंढ रहे थे और मैंने बहस पर विराम लगवा दिया, यह तो बड़ा अपराध था। मेरे साथ हर जगह ऐसा  ही होता रहा, मेरी शक्ल  पर ही कुछ ऐसा लिखा है कि पहले तो लोग मुझे अपनी टीम में रखते नहीं और यदि किसी योग्य अधिकारी ने रख भी लिया तो उनके जाते ही सबसे पहले मेरा ही नम्बर आता  है बाहर करने में।
आप सोच रहे होंगे कि कौन सी रामायण लेकर मैं आज बैठ गयी हूँ! मैं आपको बताना चाह रही हूँ कि यदि आप किसी नेतृत्व की पड़ताल करना चाहते हैं तो उसकी टीम को देखें। उसकी टीम में नायाब हीरे हैं तो समझिये की वह व्यक्ति क्षमतावान है और यदि हमारा नेतृत्व ऐसे  हाथों में है जिसकी टीम में स्तरहीन लोग हैं तो समझ लीजिये कि यह हीरो नहीं जीरो है। यदि आपको किसी की टीम में बामुश्किल जगह मिलती है तो समझिये कि आप योग्य  हैं और यदि सभी आपको लेना चाहते हैं तो आप कमजोर व्यक्ति हैं। मैंने इस बात को अच्छी तरह समझ रखा है और हमेशा अव्वल दर्जे के प्रबुद्ध व्यक्ति के साथ जुड़ती  हूँ लेकिन पता नहीं क्या होता है कि मुझे अधिकतर निराशा  ही हाथ लगती है। योग्य व्यक्ति मुझे काम तो करने देते हैं लेकिन हमेशा कमतर सिद्ध भी करते रहते हैं और अयोग्य व्यक्ति तो ऐसा वातावरण बना देते हैं कि मैं स्वयं  ही काम छोड़ दूं।
एक बात पर और विचार करते हैं कि कभी आपने इस बात पर गौर किया है कि एक युवती अपने विवाह के समय कैसा वर चाहती है और एक युवक विवाह के समय कैसी वधु चाहता है? शत-प्रतिशत युवतियाँ अपने से अधिक योग्य व बुद्धिमान युवक से विवाह करना चाहती हैं जबकि शत-प्रतिशत युवक अपने से कम योग्य और कम बुद्धिमती युवती से विवाह करना चाहते हैं। वैवाहिक विज्ञापन में लिख दिया जाता है कि शिक्षित और प्रबुद्ध कन्या चाहिये लेकिन जैसे ही परिचय-पत्र हाथ में आता है तब कहा जाता है कि अरे लड़का तो स्नातक ही है और लड़की स्नातकोत्तर नहीं चलेगी। ऐसा ही कन्या के माता-पिता भी कहते हैं कि लड़की से कम पढा-लिखा लड़का नहीं चलेगा।

हमारे समाज ने एक धारणा बना दी है कि लड़की को कमतर रखो और लड़के को सुरक्षित  रखने के लिये प्रयास करो। लड़की योग्य वर पाकर भी राज करती है और लड़का अयोग्य पत्नी पाकर भी दबा  हुआ अनुभव करता है। इसका अर्थ है कि लड़की में वंशानुगत आत्मविश्वास है और उसके अन्दर असुरक्षा का भाव नहीं है। तभी तो वह अनजान परिवार में  भी अपना अधिपत्य बना लेती है और लड़का बेबस दिखायी देने लगता है। लड़कों में वंशानुगत असुरक्षा का भाव शायद होता है तभी तो सारा समाज उसकी चिन्ता करता है और वह अपने कार्यस्थल पर भी अयोग्य व्यक्तियों के सहारे ही काम करता है। ऐसे कितने लोग हैं हमारे समाज में, जिनकी टीम में रत्न भरे हों! लेकिन मैंने अनुभव किया है कि हमारे #प्रधानमंत्रीमोदी जी की टीम में एक से बढ़कर एक रत्न हैं जो उनकी नेतृत्वक्षमता को उजागर करता है। वे स्वयं इतने प्रबुद्ध हैं कि उनके समक्ष दुनिया छोटी दिखायी देने लगी है। हर विषय  पर उनका विश्लेषण अद्भुत होता है, इसलिये वे स्वयं में इतने सुरक्षित हैं कि उनकी टीम में अच्छे से अच्छा प्रबुद्ध व्यक्ति भी काम करने को स्वतंत्र होता है। काश हमें  भी उनके समान या उनका एक अंश-धारक नेतृत्व मिला होता तो हम भी कभी मन लगाकर काम करते और अपना योगदान देश को दे पाते। कितने घोड़ों को कुशल सवार मिलता है? कुछ सवार तो खच्चरों पर ही अपना दांव लगाकर खुश होते रहते हैं और दमदार घोड़े पेड़ की छांव में बंधे रहकर ही बूढ़े हो जाते हैं। 

Friday, May 19, 2017

#तीनतलाक – पुरुषों को पारिवारिक निर्णय से वंचित किया जाए

आज अपनी बात कहती हूँ – जब मैं नौकरी कर रही थी तब नौकरी का समय ऐसा था कि खाना बनाने के लिये नौकर की आवश्यकता रहती ही थी। परिवार भी उन दिनों भरा-पूरा था, सास-ससुर, देवर-ननद सभी थे। अब यदि घर की बहु की नौकरी ऐसी हो कि वह भोजन के समय घर पर ही ना रहे तब या तो घर के अन्य सदस्यों को भोजन बनाना पड़े या फिर नौकर ही विकल्प था। सास बहुत सीधी थी तो वह नौकरानी के साथ बड़ा अच्छा समय व्यतीत कर लेती थीं। कोई कठिनाई नहीं थी। लेकिन हमारी नौकरानी ऐसी नहीं थी कि हम सब उस  पर ही निर्भर हों। घर में सारा काम सभी करते थे। इसलिये कोई यह नहीं कह सकता था कि यहाँ तो नौकरानी के हाथ का भोजन खाना पड़ता है। विशिष्ट व्यंजन तो अक्सर मैं ही बनाती थी। नौकरानी होने से बस मुझे सहूलियत हो गयी थी कि मेरी जगह वह काम को निपटा लेती थी और मैं निश्चिंत हो जाती थी।  उन दिनों रसोई तो सारा दिन ही चलती थी, किसी को 10 बजे भोजन चाहिये किसी को 12 बजे और हमें 2 बजे। लेकिन कुल मिलाकर सब ठीक ही चल रहा था।
लेकिन एक दिन अचानक ही हमारे एक आदरणीय सामाजिक कार्यकर्ता ने मुझे कहा कि मैंने एक प्रतिज्ञा की है, कि मैं घर की गृहिणी के हाथ का बना भोजन ही ग्रहण करूंगा, नौकरानी के हाथ का नहीं। मुझे इस बात से कोई कठिनाई नहीं थी, क्योंकि हमारे यहाँ तो सब मिलजुल कर ही भोजन बनाते थे और जब किसी अतिथि को आना होता था तब तो मैं ही बनाती थी लेकिन मुझे इस बात ने सोचने के लिये बाध्य कर दिया। हम नौकरीपेशा महिला से यह उम्मीद रखते हैं कि वह नौकरी भी करे और सारे घर की सेवा भी करे, क्योंकि वह महिला है। इतना ही नहीं एक प्रबुद्ध महिला से यह उम्मीद भी की जाए कि वह सामाजिक कार्य में भी योगदान करे। मैंने इस मानसिकता के बारे में कई वर्षों तक चिन्तन किया। मैंने कभी  भी किसी भी सामाजिक या धार्मिक कार्यकर्ता को यह प्रतिज्ञा करते नहीं देखा कि वह कहे कि मैं ऐसे पुरुष से अर्थ या धन नहीं लूंगा जो उसकी खरी कमाई का ना हो। लेकिन हम महिलाओं को लिये दायरे बनाने में सजग रहते  हैं।

कहीं न कहीं पुरुष के मन में कुण्ठा का भाव रहता है, वह महिला को सेवा करते देख ही तृप्त होता है। यह तृप्ति यौन-तृप्ति से भी अधिक मायने रखती है। महिला पुरुष की सेवा करती रहे, उसमें हमेशा सेवा भाव बना रहे इसके लिये अनेक perception याने धारणा बना ली गयी हैं। तरह-तरह के मुहावरे घड़ लिये गये हैं। महिला जितनी शिक्षित या प्रबुद्ध होगी उसके प्रति सेवा कराने का भाव उतना ही अधिक जागृत होगा। मानो उसे यह बताने का प्रयास किया जाता है कि तुम महिला हो और तुम्हारा प्रथम कर्तव्य है हम पुरुषों की सेवा करना। अभी दो दिन पहले जब न्यायालय के सामने #kapilsibbal ने यह कहा कि महिलाएं निर्णय लेने में अक्षम रहती हैं इसलिये उन्हें अधिकार नहीं दिये जा सकते। तब मुझे लगा कि यदि मैं वकील होती तो यह कहती कि तीन तलाक के निर्णय हमेशा क्रोध में लिये जाते हैं जिसे हम जल्दबाजी का निर्णय कहते हैं और पुरुष हमेशा अपने अहम् की संतुष्टि नहीं होने  पर महिला को अपमानित करते हैं और तलाक तक की नौबत आ जाती है इसलिये पुरुष जो केवल अपनी सत्ता बनाये रखने के लिये महिला को अपनी सेवा के लिये मजबूर करता  है उसे तो किसी भी पारिवारिक निर्णय लेने का अधिकार  होना ही नहीं चाहिये। महिलाओं को न्याय दिलाने के लिये जब तक पुरुष न्यायाधीश और पुरुष वकील  होंगे, न्याय की उम्मीद क्षीण ही रहेगी। लेकिन समानता के लिए न्याय का एक कदम भी उठता है तो हम उसका स्वागत करेंगे, क्योंकि जिस असमानता के कारण महिला हजारों वर्षों से अपमानित हो रही है, जिस दुनिया को पुरुषों ने कब्जा कर रखा है, ऐसी परिस्थिति को सामान्य  होने में समय लगेगा। मुस्लिम महिला को न्याय तो मिलकर रहेगा, बस कतरों-कतरों में मिलने की सम्भावनाएं अधिक है।

Monday, May 15, 2017

पैसे से घर फूंकना

मैंने अपने मोबाइल का प्लान बदलवा लिया है, पोस्टपेड से अब यह प्री-पेड़ हो गया है। 395 रू. में 70 दिन के लिये मेरे पास 2 जीबी डेटा प्रतिदिन हैं और 3000 मिनट कॉल बीएसएनएल पर तथा 1800 मिनट कॉल अन्य फोन पर है। मैं बीएसएनएल का विज्ञापन नहीं कर रही हूँ, बस यह बताने की कोशिश करने जा रही  हूँ कि मेरे फोन के पास बहुत डेटा और मिनट हैं। जब शाम को देखती हूँ कि कितना बचा, तो पाती हूँ कि थोड़ा ही खर्च हुआ है लेकिन सारा दिन चिन्ता यही रहती है कि ज्यादा खर्च ना हो जाए? हमारी सम्पत्ती की भी यही स्थिति है, हर पल खर्चे की सोचते हैं कि ज्यादा खर्च नहीं करना है लेकिन शाम के अन्त में जिस प्रकार मेरे मोबाइल का डेटा बेकार हो जाता है वैसै ही यह बिना खर्चे यह सम्पत्ती भी जाया हो जाती है। सम्पत्ती वही है जो आपने खर्च ली है। जिन्दगी सस्ता तलाशते ही निकले जा रही है, बस कैसे भी चार पैसे बच जाएं सारा दिन इसी चिन्ता में घुले जा रहे हैं।
लेकिन दूसरी तरफ यह भी सोच है कि कुछ डेटा तो काम में ले ही लें। मन करता है कि फ्री मूवी ही डाउनलोड कर लें, जिससे 2जीबी का उपयोग हो जाए। जिस पैसे का भविष्य स्पष्ट दिखायी देता है कि खर्च नहीं किया तो आयकर वालों को देना ही पड़ेगा तब हम बिना सोचे समझे खर्चा कर बैठते हैं। तब यह भी नहीं सोचते कि यह खर्चा हमारी मर्यादा को ही छिन्न-भिन्न कर रहा है, लेकिन हम कर लेते हैं। जैसे अभी कुछ लोगों ने किया बीबर का शो देखने चले गये 75000 रू. की टिकट  लेकर। बस पैसे को ठिकाने लगाना था तो ऐसी जगह पैसा फूंक दिया जहाँ से जहरीला धुआँ हमारे घर की ओर  ही आया। शादी में भी हम यही करते हैं। आयकर से छिपाकर रखे पैसे को फूंकना शुरू करते हैं और सभ्यता व असभ्यता की सीमा ही भूल जाते हैं। उदयपुर में ऐसे तमाशे रोज होते ही रहते हैं, भव्य शादियों में महिला संगीत के नाम पर नृत्यांगनाओं को बुलाने की परम्परा सी बना दी गयी है। ऐसे में असभ्यता की सीमाएं पार होती रहती हैं और परिवार इसके घातक परिणाम को बाद में भुगतता है।

इसलिये आपके सात्विक खर्च के बूते से बाहर का पैसा सुखदायी के स्थान पर दुखदायी हो जाता है। आज देश की सबसे बड़ी समस्या यही है। मैं जब फतेहसागर के पिछले छोर पर मोटरसाइकिल की अन्धाधुंध दौड़ देखती हूँ तब यही लगता है कि यह माता-पिता का नाजायज पैसा है जिसे अपनी जायज संतान को देकर उसके जीवन को अधरझूल में डाला जा रहा है। कहीं इस नाजायज पैसे से तिजोरी में हीरे-जवाहरात भरे जा रहे  हैं तो कहीं यह  पैसा बीबर जैसे अनर्गल शो में जाया किये जा रहे हैं। पैसा फूंकना अलग बात है और घर फूंकना अलग बात है। पैसे ठिकाने लगाने हैं तो कृत्य और अकृत्य का भान भी हम भुला देते हैं। इसलिये देश में जैसे-जैसे पैसा बढ़ रहा है वैसे-वैसे असभ्यता भी बढ़ रही है। मेरे मोबाइल का डेटा बिना खर्च किये ही बर्बाद हो जाए तो चिन्ता नहीं बस कहीं मैं आलतू-फालतू मूवी डाउनलोड कर अपनी आदतों को गलत राह ना दिखा दूँ. यही चिन्ता है। 

Sunday, May 14, 2017

कस्तूरी मृग है - माँ

कस्तूरी मृग का नाम सुना ही होगा आप सभी ने। कहते हैं कुछ  हिरणों की नाभि में कस्तूरी होती है और कस्तूरी की सुगंध अनोखी होती है। हिरण इस सुगंध से बावरा सा हो जाता है और सुगंध को सारे जंगल में ढूंढता रहता है। उसे पता ही नहीं होता है कि यह सुगंध तो उसके स्वयं के अन्दर से ही आ रही है! माँ भी ऐसी ही होती है। उसके अन्दर भी ममता नामक कस्तूरी होती है। इस कस्तूरी की सुगंध भी सारे जगत में व्याप्त  होती है। माँ को  भी पता नहीं होता कि उसकी ममता अनोखी है, अनमोल है और यह केवल उसी में है। जब कोई भी महिला माँ बनती है तो यह ममता  रूपी कस्तूरी उसके अन्दर बस जाती है, वह महिला कस्तूरी मृग की तरह विशेष हो जाती है। सृष्टि की सारी माताएं फिर चाहे वे पशु हो या पक्षी सभी में ममता का वास है। ये ही ममता संतान का सुरक्षा चक्र है।
हिरण को पता नहीं है कि उसके अन्दर कस्तूरी है और संतान को पता नहीं है कि माँ के अन्दर ममता है। हिरण जंगल में भटकता है और संतान ममता की गंध को नजर अंदाज कर प्यार की गंध के पीछे दौड़ता है, यही प्रकृति है। संतान को समाधान मिल जाता है लेकिन ममता को नहीं। मुझे देवकी का स्मरण होता है, कृष्ण को उससे छीन लिया गया है, वह नन्हें बाल-गोपाल बना लेती है और सारा दिन बाल-गोपाल के साथ कभी स्नान तो कभी भोजन और कभी निद्रा का खेल खेलती है और अपनी ममता को जीवित रखती है। क्योंकि स्त्री की ममता ही उसे सभी से विशेष बनाती है, बस ये ही शाश्वत रहनी चाहिये क्योंकि जो शाश्वत है वही सत्य है।

बुढ़ापे ने दस्तक दे दी है, संतान भी पास नहीं है तब ममता भी कठोरता धारण करने लगती है, ऐसे में विश्व मातृ-दिवस मनाता है और मुझे कस्तूरी मृग का ध्यान हो जाता है। ममता मुझे अमूल्य लगने लगती है और मैं इसके संरक्षण की बात सोचने लगती हूँ। इस एक-तरफा प्यार को बनाये रखने का उपाय ढूंढने लगती हूँ जिससे कस्तूरी की सुगंध जगत में हमेशा व्याप्त रहे। जिस ममता नें माँ को अमूल्य बना दिया वह ममता शाश्वत रहनी चाहिये तभी यह ममता सत्य बनेगी। जो भी माँ है वह अनोखी है और इस अनोखेपन को दुनिया नमन करती है। आज मातृ-दिवस है तो दुनिया में कस्तूरी गंध की तरह व्याप्त ममता को घारण करने वाली माँ को नमन। 

Friday, May 5, 2017

राग पैदा करो – वैराग्य आ जाएगा

कल अपनी एक मित्र से फोन पर बात हो रही थी, वे बोली की दुनिया की इन्हीं  बातों के कारण मुझे वैराग्य हो गया है। पता नहीं क्यों यह शब्द मुझे कई  पलों तक झकझोरता रहा और आखिर किसी दूसरी बात में लपेटकर मैंने कहा कि मैं तो राग की बात करती हूँ, आज राग ही नहीं है तो वैराग्य कहाँ से आएगा! जब हमारे मन में किसी दूसरे के  प्रति राग उत्पन्न होता है तब अपने से वैराग्य आता है। माँ संतान के जन्म देती है, संसार के सबसे बड़े राग को अपने अन्दर धारण करती है लेकिन इस राग के कारण स्वयं के सुख-दुख से वैराग्य धारण कर लेती है। एक सैनिक जमाव बिन्दु से 40 डिग्री नीचे के तापमान में अपने देश की सीमाओं की सुरक्षा करता है, वह देश से राग करता है और बदले में अपने सारे शारीरिक कष्टों के प्रति वैरागी हो जाता है। विवेकानन्द जैसा सामाजिक उद्धारक अपनी संस्कृति से राग करता है तब परिव्राजक बनकर अपने सारे ही सुखों से वैराग्य ले लेता है। आज हम केवल स्वयं से राग करते हैं, अपने अहंकार से चिपटे हुए हैं। बस परिवार में, समाज में और हो सके तो दुनिया में मेरी ही बात मानी जाए या मेरी ही सत्ता स्थापित  हो जाए। आज सारी दुनिया आतंक के साये में क्यों जी रही है? कारण है अपनी मान्यताओं के  प्रति राग। हम सारी दुनिया को एक ही रंग में रंगना चाहते हैं। आज जितने भी मत-मतान्तर हैं, वे सारे ही विस्तार की चाह रखते हैं। विवेकानन्द ने कहा था कि मैं दुनिया को अपनी संस्कृति के बारे में बताने आया  हूँ ना कि धर्मपरिवर्तन करने।
जब हम दूसरों से राग करते हैं या प्रेम करते हैं तब उसके प्रति झुकते हैं, अपने अहंकार का दमन करते हैं और जब हमारे अहंकार का नाश होता है तभी वैराग्य आता है। संन्यासी अक्सर गृहस्थों को कहते हैं कि त्याग करो और भोजन में कोई भी वस्तु त्याग दो। हम हमारी अप्रिय वस्तु छोड़ देते हैं। संन्यासी कभी नहीं कहते कि तुम संग्रह छोड़ दो या गलत तरीके से अर्जित धन का त्याग कर दो, इसके विपरीत वे ऐसी सम्पत्ति से खुद को बांध लेते हैं। बड़े-बड़े धार्मिक स्थान इस बात की गवाही दे रहे हैं। इसलिये मैं कहती हूँ कि अपनों के प्रति राग करो, अपने समाज के प्रति राग से भर जाओ, अपने देश के प्रति राग में डूब जाओ। अपने देश, समाज या अपनों के प्रति राग करने से अपने मन को समर्पित करना पड़ता है, तन के कष्ट उठाने पड़ते हैं और धन का दान करना पड़ता है, याने अपने से वैराग्य पैदा करना पड़ता है। इसलिये वैराग्य के आडम्बर में मत उलझो, राग के पाश में बंधने का प्रयास करो। जैसे  ही राग आएगा वैराग्य तो स्वयं ही आ जाएगा।

यहाँ मैंने आप सभी से राग में बंधकर अपनी बात कही है, आपके विचार भिन्न होंगे ही, लेकिन यह मेरे विचार हैं। आप अपने विचार भी खुलकर रख सकते हैं। 

Saturday, April 8, 2017

तू इसमें रहेगा और यह तुझ में रहेगा

प्रेम में डूबे जोड़े हम सब की नजरों से गुजरे हैं, एक दूजे में खोये, किसी भी आहट से अनजान और किसी की दखल से बेहद दुखी। मुझे लगने लगा है कि मैं भी ऐसी ही प्रेमिका बन रही हूँ, चौंकिये मत मेरा प्रेमी दूसरा कोई नहीं है, बस मेरा अपना मन ही है। मन मेरा प्रेमी और मैं उसकी प्रेमिका। हम रात-दिन एक दूजे में खोये हैं, आपस में ही बतियाते रहते हैं, किसी अन्य के आने की आहट भी हमें नहीं होती और यदि कोई हमारे बीच आ भी गया तो हमें लगता है कि अनावश्यक दखल दे रहा है। मन मुझे जीवन का मार्ग दिखाता है और मैं प्रेमिका का तरह सांसारिक ऊंच-नीच बता देती हूँ, मन कहता है कि आओ कहीं दूर चलें लेकिन मैं फिर कह देती हूँ कि यह दुनिया कैसे छोड़ दूं? मन मुझे ले चलता है प्रकृति के निकट और मैं प्रकृति में आत्मसात होने के स्थान पर गृहस्थी की सीढ़ी चढ़ने लगती हूँ। हमारा द्वन्द्व मान-मनोव्वल तक पहुंच जाता है और अक्सर मन ही जीत जाता है। मैं बेबस सी मन को समर्पित हो जाती हूँ। मन मेरा मार्गदर्शक बनता जा रहा है और मैं उसकी अनुयायी भर रह गयी हूँ।
यह उम्र ही ऐसी है, उसमें मन साथ छोड़ता ही नहीं, जब जागतिक संसार के लोग साथ छोड़ रहे होते हैं तब यह मन प्रेमी बनकर दृढ़ता से हमें आलिंगनबद्ध कर लेता है। मैं कहती हूँ हटो, मुझे ढेरों काम है लेकिन मन कहता है कि नहीं, बस मेरे पास बैठो, मुझसे बातें करो। मैं कहती हूँ कि आज बेटे से बात नहीं हुई, मन कहता है – मैं हूँ ना। मैं तुम्हें उसके बचपन में ले चलता हूँ, फिर हम दोनों मिलकर उसके साथ ढेरों बात करेंगे। मन कहता है कि आज बेटी क्या कर रही होगी, सभी मन बोल उठता है कि चलो मेरे साथ रसोई में, उसकी पसन्द के साथ बात करेंगे। मैं और मेरा मन अक्सर बाते करते रहते हैं – ऐसा होता तो कैसा होता, नहीं हम ऐसी बात नहीं करते। हम सपने देखते हैं खुशियों के, हम सपने देखते हैं खुशहाली के, हम सपने देखते हैं खुशमिजाजी के।
इन सपनों के कारण दुनिया के गम पीछे छूट जाते हैं, कटुता के लिये समय ही नहीं बचता और झूठ-फरेब गढ़ने का काम अपना नहीं लगता। बस हर पल हम दोनों का साथ, हर पल को जीवंत करता रहता है। किसी अकेले को देखती हूँ तो मन कहता है कि यह कहाँ अकेला है, अपने मन को क्यों नहीं पुकार लेता? मन को पुकार कर देख, कैसे तेरा अपना होकर रहता है, फिर तुझे किसी दूसरे की चाह होगी ही नहीं। तू अकेला नहीं निकलेगा कभी किसी का साथ ढूंढने, तेरा मन हर पल तेरे साथ होगा, बस आवाज दे उसे, थपथपा दे उसे, वह दौड़कर तेरे पास आ जाएगा। तुझसे बाते करेगा, तेरा साथी बनकर रहेगा। परछाई भी रात को साथ छोड़ देती है लेकिन यह गहरी अंधेरी रात में तेरे और निकट होगा, तू इसमें रहेगा और यह तुझ में रहेगा।

Tuesday, April 4, 2017

काश पैसा भी बासी होने लगे

हमारी एक भाभी हैं, जब हम कॉलेज से आते थे तब वे हमारा इंतजार करती थीं और फिर हम साथ ही भोजन करते थे। उनकी एक खासियत है, बहुत मनुहार के साथ भोजन कराती हैं। हमारा भोजन पूरा हो जाता लेकिन उनकी मनुहार चलती रहती – अजी एक रोटी और, हम कहते नहीं, फिर वे कहतीं – अच्छा आधी ही ले लो। हमारा फिर ना होता। फिर वे कहतीं कि अच्छा एक कौर ही ले लो। आखिर हम थाली उठाकर चल देते जब जाकर उनकी मनुहार समाप्त होती। कुछ दिनों बाद हमें पता लगा कि इनके कटोरदान में रोटी है ही नहीं और ये मनुहार करने में फिर भी पीछे नहीं है, जब हम हँसकर कहते कि अच्छा दो। तब वे हँस देती।
दूसरा किस्सा यह भी है कि एक अन्य भाभी कहती कि रोटी ले लो, हम कहते नहीं। फिर वे कहती कि देखो ले लो, नहीं तो सुबह कुत्ते को डालनी पड़ेगी।
कहने का तात्पर्य यह है कि रोटी है या नहीं लेकिन मनुहार अवश्य  है। रोटी बेकार होगी इससे अच्छा है कि इसका उपयोग हो जाए। लेकिन कभी किसी ने सुना है कि जेब में धेला नहीं और कोई कह रहा हो कि ले पैसे ले ले। या कोई कह रहा हो कि ले ले पैसे, नहीं तो बेकार ही जाएंगे। रोटी तो बेकार नहीं जाती लेकिन पैसे हमेशा बेकार ही जाते हैं। मनुहार तो छोड़ो, हिम्मत ही नहीं होती पैसे खर्च करने की। कल मुझे एक चीज मंगानी थी, ऑनलाइन देखी, मिल रही थी। फिर कीमत देखी तो कुछ समझ नहीं आया, ऐसा लगा कि 500 रू. की आधाकिलो है। मैंने पतिदेव को बताया कि यह चीज लानी है, यदि बाजार में मिल जाए तो ठीक नहीं तो ऑनलाइन मंगा लूंगी। जैसे ही 500 रू. देखे, एकदम से उखड़ गये, मैंने कहा कि क्या हुआ। ऐसा लगा कि सेट होने में कुछ समय लगा लेकिन फिर मैंने देखा कि 90 रू.की 200 ग्राम  है। 90 रूपये देखते  ही बोले कि कल ही ले आऊंगा। यह है हम सबकी मानसिकता, पैसे का पाई-पाई हिसाब और मन का कोई मौल नहीं। इतना ही नहीं यदि कोई वस्तु गुम हो गयी और वह मंहगी है तो चारों तरफ ढिंढोरा और सस्ती है तो चुप्पी। हमें चीज खोने का गम नहीं लेकिन मंहगी चीज खोने का गम है।

हम सब पैसे के  पीछे दौड़ रहे हैं, जितना संचय कर सकते हैं करने में जुटे हैं लेकिन यह भी बासी होगा और इसका उपयोग कौन करेगा, कोई चिंतन ही नहीं है। कोई नहीं कहता कि खर्च कर लो नहीं तो बेकार ही जाएगा। रोटी तो बासी हो जाती है, कुत्ते को डालनी पड़ती है लेकिन पैसा बासी नहीं होता। पैसे की मनुहार भी हम अपने बच्चों से ही करते  हैं – बेटा रख ले, काम आएगा, माँ अपने पल्लू से निकालकर बेटे की जेब में डालती जाती है। लेकिन यदि बेटे को जरूरत नहीं है तो इसका क्या उपयोग होगा हम समझना ही नहीं चाहते। बस संग्रह में लगे हैं, उसका समुचित उपयोग करने में भी हम पीछे हट जाते  हैं। अपने मन की नहीं करने पर हमारा मन कितना पीड़ित  हुआ इसका हिसाब कोई नहीं लगाता लेकिन करने पर कितना पैसा खर्च हुआ, हर आदमी गाता फिरता है। हम घूमने गये, वहाँ कितना खर्चा किया और कितना हम वसूल पाये, इसका तो हिसाब लगाते रहे लेकिन हमारा मन कितना तृप्त हुआ ऐसा हिसाब नहीं लगा पाए। हमारे मन को जो हमारी आत्मा से जुड़ा है, अतृप्त छोड़ देते हैं और पैसे को जोड़-जोड़कर संचय करते रहते हैं। मन क्षीण होता जाता है और पैसे के ढेर लग जाते हैं। काश पैसा भी बासी  होने लगे, कुत्ते की जगह अपनों को ही खिलाने का रिवाज बन जाये या फिर सभी परिवारजन को मनुहार से देने का मन बन जाए। 

Monday, April 3, 2017

कोई शर्त होती नहीं प्यार में

पूरब और पश्चिम फिल्म का एक गीत मुझे जीवन के हर क्षेत्र में याद आता  है – कोई शर्त होती नहीं प्यार में, मगर प्यार शर्तों पे तुमने किया ......। लड़की के रूप में जन्म लिया और पिताजी ने लड़के की तरह पाला, बस यही प्यार की पहली शर्त लगा दी गयी। हम बड़े गर्व के साथ कहते रहे कि हमारा बचपन लड़कों की तरह बीता लेकिन आज लगता है कि यह तो एक शर्त ही हो गयी। हम लड़की के रूप में बचपन को संस्कारित क्यों नहीं कर पाए? समाज का यह आरक्षण कितना कष्टकारी है, आज अनुभव में आने लगा है। अक्सर पुरुष बहस करते हैं, वे अपने मार्ग का रोड़ा महिला को मानते हैं। कई चुटकुले भी प्रचारित करते हैं कि मोदी जी अकेले और योगीजी अकेले, इसलिये ही इतनी उन्नति कर पाए। लेकिन संघर्ष क्या होता है, यह शायद पुरुषों को मालूम ही नहीं। जब आप जन्म लें और आपका व्यक्तित्व ही बदल जाए, जब आपके व्यक्तित्व को ही नकार दिया जाए, तब शुरू होता है संघर्ष। जब महिला होने के कारण आप विश्वसनीय ही नहीं रहें, आप की बुद्धि चोटी में है, कहकर आपकी उपेक्षा की जाए, तब शुरू होता है संघर्ष। आप केवल उपयोग और उपभोग की ही वस्तु बनकर रह जाएं तब शुरू होता है संघर्ष। आप पुरुष के संरक्षण में रहने के लिये बाध्य कर दी जाएं, तब शुरू होता है संघर्ष। आपको अपने तथाकथित घर से दूसरे घर में स्थानान्तरित कर दिया जाए, आपका नाम और उपनाम बदल दिया जाए, तब होता है संघर्ष। इतने प्रारम्भिक संघर्षों के बाद किसी  पुरुष ने अपना जीवन प्राम्भ किया है क्या?
विवाह के बाद घर बदला, संरक्षण बदला, अभी जड़े जमी भी नहीं कि उत्तरदायित्व की बाढ़ आ गयी। उपयोग और उपभोग दोनों ही खूब हुआ लेकिन जब निर्णय में भागीदारी की बात आये तो आप को पीछे धकेल दिया जाए। नौकरी की, लेकिन यहाँ भी निर्णय के समय अन्तिम पंक्ति में खड़ा कर दिया जाए। आप योग्य होकर भी अपने निर्णय नहीं ले सकते, क्योंकि आप पुरुषों के कब्जाए क्षेत्र में हैं। फिर ताने ये कि आपका क्या, आपकी एक मुस्कान  पर ही काम  हो जाते हैं। मतलब आप उपभोग की वस्तु हैं। मैंने अपने जीवन में अनेक प्रयोग किये, अनेक बदलाव किये। जब काम की स्वतंत्रता नहीं तो मन उचाट होने लगा और लेखन की ओर मुड़ने लगा। लेकिन महिला होने के संघर्ष को कभी स्वीकार नहीं किया, ऐसा लगता रहा कि ये संघर्ष तो सभी के जीवन में आते  हैं। एक जगह यदि महिला के साथ संघर्ष है तो क्या दूसरे क्षेत्र में नहीं होगा। नौकरी छोड़ दी और सामाजिक कार्य की राह पकड़ी। माध्यम बना लेखन। लेकिन अनुभव आने लगा कि यहाँ भी महिला  होना सबसे बड़ी पहचान है। लेखन के माध्यम से जैसे ही प्रबुद्ध पहचान बनने लगी, आसपास हड़कम्प मच गया। यह परिवर्तन स्वीकार्य नहीं हुआ, कहा गया कि कार्य बदलो। लेकिन मुझे अभी और अनुभव लेने शेष थे। अभी भी मेरा मन नहीं मानता था कि यह संघर्ष महिला होने का है। फिर नया काम, नये लोग लेकिन अंत वही कि महिला को महिला की ही तरह रहना होगा, निर्णय की  भागीदारी नहीं मिलेगी। कितने ही लोग आए, कितने ही काम आए, लेकिन सभी जगह एक ही बात की आप काम करें लेकिन नाम हमारा होगा। इतनी मेहरबानी भी तब मिलेगी जब आप उनके लिये उपयोगी सिद्ध होंगी।

आखिर सारा ज्ञान और अनुभव लेने के बाद यह समझ आने लगा कि महिला के संघर्ष को केवल महिला ही भुगतती है, जिन्दगी भर जिस बात को नकारती रही, उसी बात पर आज दृढ़ होना पड़ा कि मेरे संघर्ष अन्तहीन हैं। घर से लेकर बाहर तक मुझे संघर्ष ही करना पड़ेगा। किसी महिला के संघर्ष को पुरुष के संघर्ष से मत तौलो। पुरुष का संघर्ष केवल उसका खुद से है जबकि महिला का संघर्ष सम्पूर्ण समाज से है। हमारा संघर्ष हमारे गर्भाधान से शुरू होता  है, भाग्य से बच गये तो जीवन मिलता है, जीवन मिलता है तब या तो पुरुष की तरह पाला जाता  है या पुरुषों के लिये पाला जाता है। फिर जीवन आगे बढ़ता है तो दूसरे गमले में रोपकर बौंजाई बना दिया जाता है, बौंजाई पेड़ से एक वट-वृक्ष के समान छाया की उम्मीद की जाती है। संघर्ष अनन्त हैं, संघर्ष करते-करते मन कब थकने लगता है और फिर भगवान से मांग बैठता है कि अगले जन्म मोहे बेटी ना कीजो। लेकिन यदि पुरुषों के कब्जाए संसार को मुक्त करा सकें तो इतना संघर्ष करने के बाद मीठे ही मीठे फल लगे दिखायी देंगे और हर महिला गर्व से कह सकेंगी कि अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो। बस जिस दिन समाज की शर्तें समाप्त  हो जाएंगी, जब महिला कह सकेगी कि कोई शर्त होती नहीं प्यार में......। 

Saturday, April 1, 2017

इस गर्मी को नमन

और अंतत: आज एक तारीख को गर्मी ने एलान कर ही दिया कि मैं आ गयी हूँ। अब से अपने कामकाजी समय में परिवर्तन कर लो नहीं तो मेरी चपेट में आ सकते हो। स्कूल ने अपने समय बदल लिये, क्योंकि नन्हें बच्चे गर्मी की मार कैसे सहन कर सकेंगे। अस्पतालों ने भी समय बदल लिए क्योंकि बेचारे रोगी इतने ताप को कैसे सहन कर पाएंगे। और तो और पैसे के लेखा-जोखा ने भी आज से नयी शुरुआत कर दी है, गर्मी में हम नये तेवर के साथ रहेंगे। वस्त्र भी बदल गये हैं, पुराने संदूक में चले गये और नये पतले से और झीने से बाहर आ गये हैं।
सड़के तपने लगी हैं, कहीं पिघलने भी लगी हैं। तालाबों से पानी उड़ने लगा है। बालू रेत का तापमान भूंगड़े सेकने के लिये पर्याप्त हो गया है। प्रकृति गर्मी की तलाश कर रही है और प्राणी पेड़ों की छांव की तलाश कर रहे हैं। सूरज को शीघ्रता होने लगी है और वह सुबह जल्दी ही उदय होने लगा है, शाम को भी वह खरामा-खरामा ही यहाँ से दूर जाता है। लेकिन पक्षियों की रौनक लौट आयी है, भोर होते ही उनकी चहचहाट शुरू हो जाती है और शाम के साथ ही अपने-अपने ठिकाने में लौट आने की ताबड़-तोड़ कोशिश भी। अब प्रकृति अपने हिस्से की गर्मी खींच लेगी, सारी सृष्टि के रोम-रोम को विसंक्रमित कर देगी और जब ताप अपने उच्च माप पर जा पहुंचेगा तब अमृत वर्षा होगी।

इसलिये आज नव संकल्प प्रारम्भ हुआ है, गर्मी को आत्मसात करने का। सूर्य के आक्रोश को प्रकृति के सहारे झेलने का। प्रकृति की महत्ता समझने का। प्रकृति के एक-एक तत्व को सम्भालकर रखने का उसके संवर्द्धन करने का। सूर्य का ताप हमेशा से वृक्ष ही झेलते आए हैं तो आओ हम संकल्प करें कि अपने हिस्से के और जो असमर्थ हैं उनके हिस्से के भी वृक्ष लगाकर प्रकृति को ताप से बचाएंगे। सूर्य तो अपने चक्र के अनुसार ही कार्य करेगा लेकिन यदि हम प्रकृति को वृक्षों से लाद दें तो हमें शीतलता जरूर मिलेगी, हम भी बिना एसी खुली हवा में सांस ले सकेंगे। विचार शुरू कर दीजिये, शीघ्र ही पेड़ लगाने का अवसर प्रकृति देंगी तो हम अपनी तैयारी अभी से कर लें। हमें अपना कर्तव्य स्मरण कराने के लिये इस गर्मी को नमन।

Tuesday, March 21, 2017

हमारी फरियाद है जमाने से

कोई कहता है कि मुझसे मेरा बचपन छीन लिया गया कोई कहता है कि मुझसे मेरा यौवन छीन लिया गया लेकिन क्या कभी आपने सुना है कि किसी ने कहा हो कि मुझसे मेरा बुढ़ापा छीन लिया गया है। लेकिन मैं आज कह रही हूँ कि मुझसे मेरा बुढ़ापा छीन लिया गया है। सबकुछ छिन गया फिर भी हँस रहे हैं, बोल नहीं रहे कि हमारा बुढ़ापा छिन गया है। समय के चक्र को स्वीकार कर हम सत्य को स्वीकार कर रहे हैं। मेरे  बचपन में मैंने माँ को कभी रोते नहीं देखा और कभी भी नहीं देखा। पिता की सारी कठोरता को वे सहन करती थी लेकिन रोती नहीं थी, हमने भी यही सीख लिया कि रोना नहीं है। अब इतनी बड़ी चोरी हो गयी या डाका पड़ गया लेकिन फिर भी हँस रहे हैं, क्योंकि माँ ने रोने के किटाणु अन्दर डाले ही नहीं।
मैं अपने आस-पड़ोस में रोज ही देखती हूँ कि बुढ़ापे में लोग या 50 वर्ष की आयु के बाद ही सारे घर को कामों से निवृत्त हो जाते हैं। घर को बहु सम्भाल लेती है और आर्थिक मोर्चे को बेटा। बस माता-पिता का काम  होता है सुखपूर्वक समाज में अपने सुख को बांटना। पोते-पोती को अपनी गोद में खिलाने का सुख लेना। जीवन सरलता से चल रहा होता है। हमारे बड़ों ने यही किया था, हमने भी यही किया और हमारी संतान भी यही करेगी। लेकिन यह क्रम शिक्षा के कारण अब टूट गया है। इक्कीसवीं शताब्दी में यह क्रम मृत प्राय: हो गया है। हमने अपनी संतान के बचपन को जीने का पूरा अवसर दिया, उन्हें उनके यौवन को जीने का भी पूरा अवसर दिया लेकिन जब हमारी बारी आयी तब वे खिसक लिये। अपने उज्जवल भविष्य के लिये उन्होंने हमारे सारे अधिकार ही समाप्त कर दिये।

कल अपने मित्र के निमंत्रण पर उनके घर गये, निमंत्रण भोजन का था लेकिन उन्होंने पेट को तो तृप्त किया ही साथ ही मन को भी तृप्त कर दिया। तीन माह का उनका पोता  हमारी गोद में था, यह होता है बुढ़ापे का सुख, जो हम से छीन लिया गया है और उसकी शिकायत हम समाज के सम्मुख कर रहे हैं। यदि मैंने मेरी संतान के बचपन को छीन लिया  होता तो आज मुझे कितनी गालियां पड़ रही होतीं लेकिन किसी ने मेरे बुढ़ापे को छीन लिया  है तो उसका संज्ञान समाज लेता ही नहीं। हँसकर कह दिया जाता है कि अपने भविष्य के लिये बच्चे को ऐसा करना ही पड़ेगा। उल्टा मुझे ही तानों का दण्ड मिलेगा, इसलिये त्याग की अपनी महान छवि बनाने के लिये हँसना जरूरी हो गया है। लेकिन बुढ़ापा तो छिन ही गया है, अब जो भी है उसे कुछ और नाम दे दो, यह बुढ़ापा नहीं है, बस जीवन की सजा है। इसलिये हमारी उम्र के लोग कहने लगे हैं कि किसलिये जीना, हमारी संतान कहती है कि खुद के लिये जीना। लेकिन यदि हम यौवन में ही खुद के लिये जीते तो तुम्हारा बचपन क्या होता? अब हमसे कहते हो कि खुद के लिये जिओ, यह ईमानदारी तो नहीं है। हाँ यह जरूर है कि हम तुम्हारी बेईमानी को भी हँसकर जी लेंगे क्योंकि हमारे अन्दर तुम्हारे लिये प्रेम है, बस अब इस प्रेम का आवागमन रूक गया है। बुढ़ापा तो छिन ही गया है। जिस बुढ़ापे ने नयी पीढ़ी को गोद में नहीं खिलाया  हो, उसे संस्कारित नहीं किया हो, भला उस बुढ़ापे ने अपना कार्य कैसे पूरा किया? इसलिये हमने अपना बचपन जीया, यौवन भी जीया लेकिन बुढ़ापा नहीं जी पा रहे हैं। बुढ़ापे का मतलब दुनिया में एकान्त  होता होगा लेकिन भारत में कभी नहीं था लेकिन अब हमें एकान्त की ओर धकेला जा रहा  है तो यही कहेंगे कि हम से  हमारा बुढ़ापा छीन लिया गया है। हमारी फरियाद है जमाने से। फरियाद तो हम करेंगे  ही, चाहे हमें न्याय मिले या नहीं। हम भारत में नागरिक हैं तो हमें हमारी परम्परा चाहिये। हमें भी हमारा बुढ़ापा चाहिये। जैसे पति-पत्नी के अलग होने पर संतान का सुख बारी-बारी से दोनों को मिलता है वैसे ही संतान का सुख दादा-दादी को  भी मिलने का अधिकार होना चाहिये। मैं लाखों लोगों की ओर से आज समाज के सम्मुख मुकदमा दायर कर रही हूँ। हमारी इस फरियाद को जमाने को सुननी ही होगी।

Sunday, March 19, 2017

नरेन्द्र से विवेकानन्द की भूमि को नमन

जिस धरती ने विवेकानन्द को जन्म दिया वह धरती तो सदैव वन्दनीय ही रहेगी। हम भी अब नरेन्द्र ( विवेकानन्द के संन्यास पूर्व का नाम) की भूमि को, उनके घर को नमन करना चाह रहे थे। हम जीना चाह रहे थे उस युग में जहाँ नरेन्द्र के पिता विश्वनाथ दत्त थे, उनकी माता भुवनेश्वरी देवी थीं। पिता हाई-कोर्ट के वकील थे और माँ शिक्षित एवं धर्मानुरागी महिला थी। स्वामीजी के घर को हम मनोयोग पूर्वक देखना चाह रहे थे, लेकिन कोलकाता में सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि सभी भवनों में प्रवेश का समय निश्चित है, अक्सर दिन में बन्द भी रहते हैं। हमने भी दो चक्कर लगाये तब कहीं जाकर हम स्वामीजी के घर को देख पाये। हमें एक छोटी सी डाक्यूमेन्ट्री भी दिखायी गयी, जिसमें इस घर को जीर्णोद्धार के बारे में जानकारी थी। कैसे इस खण्डित भवन को पुन: उसी के शिल्प में बनाया गया और शिल्पकारों ने कैसे इस कठिन कार्य को सम्पादित किया, सभी कुछ बताया गया। विश्वनाथ दत्त का कक्ष, भुवनेश्वरी देवी का पूजा-कक्ष सभी कुछ संजोकर रखा है। किस खिड़की से नरेन्द्र ने साधुओं को वस्त्र दिये थे, किस कक्ष में ध्यान लगाते हुए सर्प आया था, सभी संरक्षित हैं। यह स्थान भारतीयों के लिये श्रद्धा-केन्द्र है, यहाँ आकर स्वत: ही गौरव का अनुभव होता है। यदि विवेकनन्द ने 1893 में शिकागो की धर्म-संसद में हिन्दुत्व को परिभाषित नहीं किया होता तो आज शायद हिन्दुत्व संरक्षित धर्म के स्वरूप में होता।
रामकृष्ण परमहंस नरेन्द्र के गुरु थे, कहते हैं कि नरेन्द्र को आध्यात्मिक शक्तियां अपने गुरु से ही मिली थीं। लेकिन यह भी आनन्द का विषय है कि शिष्य ने गुरु को नहीं ढूंढा अपितु गुरु ने शिष्य को ढूंढ लिया था, दक्षिणेश्वर का काली-मन्दिर इस बात का गवाह है। दक्षिणेश्वर का काली मन्दिर हमेशा से ही श्रद्धालुओं का केन्द्र रहा है, यहीं के पुजारी थे परमहंस। यहीं पर वे नरेन्द्र को प्रभु से साक्षात्कार करा सके थे और इसी मंदिर में नरेन्द्र ने काली माँ के समक्ष जाकर अपने परिवार की सुरक्षा की मांग के बदले में ज्ञान और भक्ति की मांग की थी। जब नरेन्द्र परमहंस के कहने पर काली-माँ से कुछ नहीं मांग पाये तो यहीं पर परमहंस ने उनके सर पर हाथ रखकर कहा था कि तेरे परिवार को मोटे कपड़े और मोटे अन्न की कमी नहीं आएगी। इसी मंदिर ने गुरु-शिष्य परम्परा का उत्कृष्ठ स्वरूप देखा है, इसी मन्दिर ने माँ शारदा को देखा है। इसलिये आज यह मन्दिर लाखों-करोड़ों लोगों का श्रद्धा-केन्द्र है। कोलकाता शहर में काली मन्दिर भी है लेकिन इस मन्दिर और उस मन्दिर की व्यवस्थाओं में रात-दिन का अन्तर है। काली-घाट मन्दिर में पैर रखते ही पण्डे लूटने को तैयार रहते हैं, पता नहीं हमारा समाज कब इस ओर ध्यान देगा? लेकिन दक्षिणेश्वर के काली मन्दिर में सभी कुछ अनुशासित है। तसल्ली से दर्शन कीजिये, कोई पण्डा आपको लूटने नहीं आएगा।
हमारा मन बार-बार बैलूर मठ में अटक जाता था, यात्रा के अन्त में दर्शन मिले वह भी लम्बी इंतजार के बाद। हम दक्षिणेश्वर से सीधे बैलूर मठ देखने गये लेकिन जाते ही पता लगा कि दिन में 1 बजे दर्शन बन्द हो जाते हैं, अब साढ़े तीन बजे प्रवेश मिलेगा। ढाई घण्टे का लम्बा समय निकालना कठिन काम था, लेकिन उसके बिना तो कोई चारा भी नहीं था। हमने पूछताछ की तो पता लगा कि सड़क के दूसरी तरफ एक विश्रामालय बनाया गया है। हम वहीं पहुंच गये। यहाँ भोजन भी था और विश्राम की अति उत्तम व्यवस्था भी। साढ़े तीन बजते ही हम प्रवेश द्वार पर थे। टिकट लेकर हम अंदर पहुँचे और विवेकानन्द को पूरी तरह से जी लिये। उनसे जुड़े जीवन के सारे ही प्रसंग वहाँ जीवन्त थे। जब रामकृष्ण परमहंस को कर्क रोग हुआ तब नरेन्द्र और उनके अन्य शिष्यों ने निश्चित किया था कि उन्हें कलकत्ता में किसी घर पर रखा जाये जिससे उन्हें चिकित्सकीय सुविधा में आसानी रहे। उनकी मृत्यु के बाद नरेन्द्र ने मठ स्थापना की बात रखी और एक घर को मठ का स्वरूप दे दिया गया। तभी नरेन्द्र ने संन्यास लिया था और शिकागो की धर्म-संसद में प्रसिद्धि के बाद उनका पहला कदम मठ की स्थापना ही था। अपने अन्तिम दिनों में विवेकानन्द यहीं रहे। जिन्हें विवेकानन्द में श्रद्धा है, उनके लिये यह तीर्थ से कम नहीं है, लेकिन हमारे  पास समय का अभाव था तो हमें शीघ्रता करनी पड़ी। वैलूर मठ से लगी हुई हुगली नदी परम आनन्द देती है, बस यहाँ बैठे रहो और अमृत पान करते रहो।

एक मजेदार वाकया हुआ उसे भी लिख ही देती हूँ – हम मठ के बाहरी प्रांगण को देख रहे थे और चित्र ले रहे थे। अंदर तो चित्र लेना मना है तो यहाँ तो जी भरकर लिये ही जा सकते थे। देखते क्या हैं कि पुलिस के अधिकारियों की एक टुकड़ी वहाँ आ गयी, उनका कोई केम्प वहाँ लगा था। हमारे चारों तरफ पुलिस थी, मेरे मुँह से निकला कि – पुलिस ने तुमको चारों तरफ से घेर लिया  है, सरेण्डर कर दो। सुनकर पुलिस अधिकारी भी अपनी हँसी  रोक नहीं पाये। हमने भी इस असहज स्थिति से बाहर निकलना ही उचित समझा और बाहर आ गये। कोलकाता में राजस्थान के मुकाबले एक घण्टा पूर्व सूर्यास्त होता है तो हमें लौटना ही था। लेकिन जितना समय मिला, उसे ही पाकर धन्य हो गये।

Thursday, March 16, 2017

नदी के मुहानों पर बसा सुन्दरबन

कोलकाता या वेस्ट-बंगाल के ट्यूरिज्म को खोजेंगे तो सर्वाधिक एजेंट सुन्दरबन के लिये ही मिलेंगे, हमारी खोज ने भी हमें सुन्दरबन के लिये आकर्षित किया और एजेंट से बातचीत का सिलसिला चालू  हुआ। अधिकतर पेकेज दो या तीन दिन के थे। हमारे लिये एकदम नया अनुभव था तो एकाध फोरेस्ट ऑफिसरों से भी पूछताछ की गयी और नतीजा यह रहा कि बिना ज्यादा अपेक्षा के एक बार अनुभव जरूर लेना चाहिये। 390 वर्ग मील के डेल्टा क्षेत्र में बसा जंगल  है, यह ऐसा जंगल या बन  है जो पानी पर  है। यहाँ सर्वाधिक टाइगर हैं जो पानी और दलदल में ही रहते हैं। चूंकि नदियों के मुहाने पर और सागर के मिलन स्थल पर डेल्टा बनते हैं तो नदियों का पानी खारा हो जाता है, इसकारण सुन्दरबन के प्राणी खारा पानी ही पीते  हैं। फोरेस्ट विभाग ने इनके लिये मीठे पानी की भी व्यवस्था की है, जंगल के बीच-बीच में मीठे पानी के पोखर बनाये हैं, जहाँ ये प्राणी पानी पीने आते हैं और पर्यटकों को भी इन्हें देखने का अवसर मिल जाता  है। सुंदरबन खारे पानी पर खड़ा है तो सारे ही वृक्ष फलविहीन है। यहाँ सुन्दरी नामक वृक्ष की बहुतायत है तो इसी के नाम पर यह सुन्दरीबन है जो सुन्दरबन हो गया है। पानी के मध्य होने से यहाँ आवागमन का साधन भी नाव ही है, पर्यटक सारा दिन नावों में भटकते रहते हैं और टाइगर को ढूंढने का प्रयास करते हैं। मीठे पानी के पोखर के पास हिरण तो दिखायी दे गये लेकिन टाइगर के दीदार होना इतना सरल नहीं है।
फोरेस्ट विभाग का गाइड बता रहा था कि अभी कुछ दिन पहले अमेरिका से एक महिला यहाँ आयी थी और यही पर बने फोरेस्ट के गेस्ट-हाउस में पूरे सात दिन रही थी। वह रात-दिन टाइगर के मूवमेंट के बारे में जानकारी रखने का प्रयास करती थी, आखिर उसे केवल एक दिन सुबह 4 बजे टाइगर के दुर्लभ दर्शन हुए। इसलिये आप चाहे तीन दिन का पेकेज लें या दो दिन का, टाइगर तो नहीं दिखेगा। ऐसा भी नहीं  है कि टाइगर गहरे जंगल में ही रहते हैं और वे गाँव की तरफ नहीं आते, वे खूब
आते हैं और गाँव वालों का शिकार कर लेते हैं। साल में 10-12 घटनाएं होना आम बात रही है लेकिन अब वनविभाग सतर्क हुआ है और उसने जंगल में तारबंदी की है। इससे घटनाओं में कमी आयी  है।
हमारा भ्रमण सुबह प्रारम्भ  हुआ और यहाँ तक पहुंचने में तीन घण्टे का समय लगा। कोलकाता से बाहर निकलते ही गाँवों का सिलसिला शुरू हो जाता है, इसकारण गाडी की रफ्तार धीमी  ही रहती है। यहाँ हाई-वे क्यों नहीं बना यह तो पता नहीं, लेकिन यदि बनता तो शायद गाँव भी  समृद्ध होते। हम भी खरामा-खरामा सुन्दरबन क्षेत्र में पहुंच ही गये। अब हमें नाव की यात्रा करनी थी, नाव को हाउस-बोट का नाम दिया गया था तो  हमारी कल्पना कश्मीर की हाउस-बोट सरीखी हो गयी और हमने उसी में रहने की स्वीकृति भी दे दी। लेकिन बोट पर जाते  ही बोट वाले ने बता दिया कि रात तो होटल के कॉटेज में ही काटनी होगी। इस बात पर एजेण्ट को डांटा भी कि कैसे उसने यहाँ रात गुजारने की कल्पना कर ली। लगभग 12 बजे हम बोट पर थे, कुछ नया अनुभव था उसका रोमांच था तो कुछ एजेण्ट के दिखाये सपनों से नाखुश भी थे। भोजन की व्यवस्था बोट पर ही रहती है, लेकिन दाल चावल और सब्जी मात्र ही होता है। आप इसे खुश होकर खा लेते  हैं तो ज्यादा ठीक रहता है नहीं तो सारा दिन कुड़कुड़ाते रहिये। उस जंगल में तो और कुछ मिलेगा नहीं। हम 12 बजे से तीन बजे तक जंगल में चलते रहे बस चलते रहे। पानी ही पानी था और चारों तरफ जंगल था। जंगल के पेड़ों पर पक्षी भी नहीं थे। तीन बजे नदी से पानी उतरना शुरू हुआ और देखते  ही देखते 20 फीट पानी उतर गया। जो पेड़ पानी में डूबे थे अब वे दलदली टीलों पर खड़े दिखायी दे रहे थे। जालबंदी भी दिखायी देने लगी थी। हमारी नाव भी नदी के बीच में चलने लगी थी और फिर 3 बजने  पर एक जगह रोक दी गयी। हमें बताया गया कि अब इन पेड़ों  पर पक्षी आएंगे, उनके कलरव का आप आनन्द ले सकते हैं। पक्षी आना शुरू भी हुए लेकिन बहुत कम तादाद में। इससे कहीं अधिक तो हमारे फतेह-सागर में आते हैं। पक्षी पेड़ो पर आकर नहीं बैठ रहे थे, वे पानी से बाहर निकल आयी जमीन पर ही चहल-कदमी कर रहे थे। कुछ देर बाद समझ आया कि दलदल में मछली आदि जीव थे जिन्हें पाने के लिये उनकी खोज जारी थी।

वहाँ से सूर्यास्त का नजारा अद्भुत था, हम भी उसी में खो गये और नाविक की आवाज आ गयी कि अब रवाना होने का समय  है। अंधेरा छाने से पूर्व हमने वहाँ से प्रस्थान कर लिया। नदी का पानी इतना उतर चुका था कि किस घाट पर नाव को बांधना है, नाविक इसी चिन्ता में दिखायी दिया। हमने भी एक गाँव में कॉटेज में शरण ली, अन्य नावों के यात्री भी आने लगे थे। गाँव में ही छोटा सा बाजार लगा था और गाँव में शान्ति दिखायी पड़ रही थी। रात का खाना भी नाव में ही बना था लेकिन हमने खाया कॉटेज में था। होटल वालों ने हमारे मनोरंजन के लिये बंगला नृत्य की व्यवस्था की थी, उसका भी आनन्द लिया। सुबह फिर यात्रा शुरू हुई, इसबार फोरेस्ट विभाग से आज्ञा-पत्र लेना था, विभाग में गये, औपचारिकताएं पूर्ण की। वहाँ पर ही छोटा सा उद्यान बना रखा है, साथ ही मीठे पानी का तालाब भी। वहाँ एक हिरण पानी पीने आया था, बस उसके दर्शन हो गये। दूसरे तालाब में मगरमच्छ थे, धूप सेंक रहे थे। एक ऊंची मचान भी बना रखी थी जहाँ से दूर-दूर तक देखा जा सकता था। मगरमच्छ के आकार की एक छिपकली भी देखी जो पानी में तैर रही थी। आज्ञा मिलने के बाद हमें एक गाइड दे दिया गया जो हमें जंगल के बारे में बताता रहा। जंगल में वनदेवी की मूर्ति लगी है, गाँव वाले पूजा करते हैं कि देवी टाइगर के दर्शन मत कराना। कैसी विडम्बना है कि वे कहते हैं कि टाइगर दिखना नहीं चाहिये और पर्यटक कहते हैं कि टाइगर दिखा दो। अब हमारी नाव गहरे जंगल में थी, गाँव पीछे छूट चुके थे। हमारी निगाहें हर पल कुछ खोज रही थी, क्या पता टाइगर दिख ही जाये! लेकिन यह भी उतना ही सच था कि हम जंगल के इतने नजदीक थे कि टाइगर दिखने का अर्थ था हम  पर आक्रमण। सभी जानते हैं कि टाइगर ऐसे में नहीं दिखता। लेकिन सुन्दरबन के नाम से पर्यटक आ रहे हैं और भटक रहे हैं। बस हम डेल्टा और पानी में जंगल को समझ सके, इतना फायदा हुआ। जिन लोगों ने तीन दिन का ट्यूर लिया था, वे कुछ और गहरे जंगल में जाएंगे लेकिन परिणाम यही होने वाला है। हम भी तीन बजे सुन्दरबन को छोड़ चुके थे। जिस बिन्दु से यात्रा शुरू की थी वापस वहीं थे। छोटा सा विश्रामालय था, जाते समय यही बैठकर नाव का इंतजार किया था। वापसी में नौजवानों ने वहाँ केरम लगा दिया था, मुझे याद आ गया कि कोलकाता कभी केरम के अड्डों के रूप में जाना जाता था। मैंने ड्राइवर से पूछा कि आज भी केरम के अड्डे चलते हैं, वह बोला की हाँ चलते हैं। कोलकाता का जन-मन नहीं बदला था, एक दुकान पर खड़े होकर ताश खेलते हुए  लोग दिखायी दे गये थे और आज केरम खेलते लोग। सुकून मिलता है जब लोग स्वस्थ मनोरंजन से जुड़े होते हैं।

Tuesday, March 14, 2017

ठाकुर जी को भोग

कोलकाता यात्रा में कुछ यादगार पल भी आए, लेकिन सोचा था कि इन्हें अंत में लिखूंगी लेकिन ऐसा कुछ घटित हो गया कि उन पलों को आज ही जीने का मन कर गया। गंगासागर से वापस लौटते समय शाम का भोजन मेरी एक मित्र के यहाँ निश्चित हुआ था, लेकिन हम दो बजे ही वापसी कर रहे थे तो भोजन सम्भव नहीं लग रहा था। मैंने #reeta bhattacharya को फोन लगाया तो उसने कहा कि आपको अभी कोलकाता पहुंचने में 3 घण्टे लगेंगे, मैं खाना बनाकर रखूंगी, अब मेरे पास मना करने का मार्ग नहीं था। हमने भी सुबह से खाना नहीं खाया था, खाने का मन भी कर रहा था और वह भी घर का खाना, भला कोई छोड़ता है क्या? खैर हम 6 बजे तक उसके यहाँ पहुंच गये थे।
एक दृश्य आपको दिखाने का प्रयास करती  हूँ, शायद मेरी भावना आप तक पहुँचे! अतिथि कक्ष में दीवान लगा था और उस पर एक वृद्ध महिला बैठी थी, उन्हें कुछ दिन पूर्व पक्षाघात हुआ था तो चलने में और बोलने में कठिनाई थी लेकिन उनकी आँखें हमारा स्वागत कर रही थीं और वे बराबर बोलने का प्रयास कर रही थीं। रीता एक प्याली में कुछ व्यंजन लेकर उन्हें बच्चों की तरह खिला रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे वह लाड़ लड़ाकर ठाकुर जी के भोग लगा रही हो। पीठ थप-थपाकर, मनुहार करके उनके मुँह में दो-चार कौर ठूंसने की प्रक्रिया थी। वे रीता की सास थी, लेकिन लग रहा था कि रीता उनकी माँ  है। वेसे भी मैं हमेशा यही कहती  हूँ कि हमारी पुत्रवधु हमारी माँ ही  होती  है, क्योंकि उसे ही हमारी देखभाल करनी होती  है। यह दृश्य मेरे मन में कभी ना मिटने वाला चित्र बन गया था। रीता ने ढेर सारे बंगाली व्यंजन खिलाये, जब हमने हाथ खड़े कर दिये तब जाकर उसके व्यंजनों का आना बन्द हुआ। भोजन करने के बाद हम फिर से माँ के साथ थे, हम यात्रा में 4 जन थे तो मुझे संकोच भी था कि कैसे हम रीता का भार बढ़ाएं लेकिन शायद इस प्रेम को देखने के लिये ही हमें अवसर प्रदान हुआ था।
हम कोलकाता जाते समय निश्चित नहीं कर पाये थे कि किस से मिल पाएंगे और किस से नहीं तो किसी के लिये उपहार भी लेकर नहीं गये थे। फिर सच तो यह है कि उपहारों की बाढ़ में, मैं उपहारों से ऊब गयी हूँ तो मेरा ध्यान इस ओर जाता भी नहीं है। हम रीता के लिये कुछ लेकर नहीं गये थे, एक तो खाली हाथ, उस पर से चार मेहमान! लेकिन माँ ने हमारा पूरा लाड़ किया, उन्होंने हम सभी को उपहार दिये। हमने एक यादगार फोटो भी माँ के साथ ली जो अब हमारे लिये वास्तव में यादगार ही बन गयी  है।
दूसरे दिन ही हमें सुन्दरबन के लिये निकलना था और वहाँ नेटवर्क ही नहीं था तो रीता से बात नहीं हो पायी। कोलकाता से लौटने  वाले दिन मैंने रीता को फोन किया तो उसने बताया कि माँ आपको याद कर  रही है और वे आपको कुछ और बंगाली व्यंजन खिलाना चाह रही हैं। लेकिन अब तो हमें जाना ही था तो हम जा नहीं पाये, पहले की ही शर्म बाकी थी कि खाली  हाथ खाना खाकर आ गये, अब फिर ऐसी गलती दोहराने का मन नहीं था और समय तो था ही नहीं। खैर हम कोलकाता से वापस लौट आए और उस प्रगाढ़ ममत्व को अपने साथ लेकर आ गये।

अभी होली के एक दिन पहले रीता का मेसेज मिला, हर पल का मेसेज पढ़ने वाली मैं, उस मेसेज को कई घण्टे बाद देख पायी और देखते ही मन धक्क से रह गया। माँ अब हमारे बीच नहीं थीं। ऐसा लगा कि भगवान ने ही हमें वहाँ ऐसे प्रेम के दर्शन करने भेजा था, नहीं तो हम तो ऐसे प्रेम के सपने भी नहीं देखते। मैं उन्हें नहीं जानती थी, बस एक घण्टे का  ही साथ था लेकिन जैसे मैंने जीवन के अमूल्य पल जी लिये हों, ऐसी अनुभूति हुई। उन्हें मेरा प्रणाम,वे जहाँ भी जन्म लें, उनकी आत्मीयता का दायरा और भी बड़ा हो, उन्हें फिर किसी रीता का समर्पण भाव मिले। मेरा अन्तिम प्रणाम।

Sunday, March 12, 2017

गंगासागर एक बार – सारे तीर्थ बार-बार

कोलकाता की यदि जन-जन में पहचान है तो वह गंगासागर के कारण है। गंगोत्री से निकलकर गंगा यहाँ आकर सागर में समा जाती है। गंगासागर की यात्रा कठिन यात्राओं में से एक है। लेकिन जैसै-जैसे आवागमन के साधनों में वृद्धि हुई है, वैसे-वैसे यात्रा सुगम होने लगी है। लेकिन फिर भी मानवीय अनुशासनहीनता के कारण यात्रा सुरक्षित नहीं रह पाती। गंगासागर कलकत्ता से 150 किमी की दूरी पर स्थित  है, यहाँ गंगा, सागर में आत्मसात हो जाती है। कोलकाता से कार, बस या रेल द्वारा डायमण्ड हार्बर तक लगभग 2 घण्टे का समय लगता है। हमने कार द्वारा यात्रा की और प्रात: 6 बजे गंगासागर के लिये निकल पड़े। 27 फरवरी 17 का दिन था तो मौसम सुहावना था लेकिन जैसे ही कोलकाता के बाहर पहुँचे फोग ने हमारा रास्ता रोक लिया। फोग इतना गहरा था कि एक जगह गाडी रोकनी ही पड़ी। इस कारण मार्ग में दो की जगह तीन घण्टे का समय लगा। फेरी लेने के लिये 8 रू. का टिकट था लेकिन भीड़ बहुत थी और भीड़ को नियंत्रित करने के लिये कोई भी साधन या सेवा नहीं थी। एक घण्टे तक लाइन में लगे रहने के बाद कहीं फेरी की सूचना मिली की वह तट पर लग गयी है लेकिन जैसे ही प्रवेश प्रारम्भ हुआ भगदड़ मच गयी। जो देर से आये थे उन्होंने इतनी धक्कामुक्की की कि जरा सी चूक दुर्घटना का कारण बन सकती थी। यह भगदड़ केवल इसलिये थी कि उन्हें फेरी में बैठने को स्थान मिल जाये। खैर हम भी बचते बचाते प्रवेश द्वार से पार हो  ही गये। हमें भी फेरी में खड़े होने का स्थान मिल ही गया।
फेरी गंगा नदी में चलती है और 45 मिनट में गंगासागर-द्वीप पर पँहुचती  है। लाइन में लगे थे तब चिड़ियों और मछलियों के लिये मूंगफली बेचने वाले पीछे पड़े थे साथ  ही गंगा में समर्पित करने के लिये 50 रू में साड़ी भी मिल रही थी। फेरी पर आने पर पता लगा कि यहाँ बड़ी संख्या में पक्षी है, यात्री मूंगफली का दाना पानी में डालते हैं और मछली दाने को लपक लेती है साथ ही पक्षी, दाने और मछली दोनों को लपक लेते हैं। अनोखा दृश्य बन जाता है, झुण्ड के झुण्ड विशाल पक्षी फेरी के साथ चलते रहते हैं, मध्य में जाने पर कम हो जाते हैं और फिर किनारे पर आते ही इनकी संख्या बढ़ जाती है। उन पक्षियों को देखते हुए ही 45 मिनट की यात्रा कट जाती है और शोर मच जाता है कि तट आ गया। द्वीप पर हमारे लिये दूसरी कार तैयार थी लेकिन पास ही गन्ने का ताजा रस निकल रहा था तो हमने भी कण्ठ गीला करना उचित समझा।  अब कार द्वारा पुन: 30 मिनट की यात्रा थी, बसें भी लगी थी और कुछ लोग बस में भी यात्रा कर रहे थे। 30 मिनट बाद हम गंगासागर के किनारे से एक किमी. दूर थे। यहाँ गंगासागर पर यात्रियों के लिये छोटी दूरी पार करने के लिये ठेले लगे हैं, इनपर बैठना ही असुविधाजनक है। मुझे बैठना पसन्द नहीं आया और पैदल चलने का अवसर हाथ से जाने नहीं दिया, बस चल दिये पैदल। सामान और साथी ठेले पर लद गये। कुछ ही देर में हम गंगा सागर के किनारे थे। गंगा और सागर आत्मसात हो गये थे यहाँ तो पानी भी खारा हो गया था। गंगा का मुहाना होने के कारण रेत भी पानी में अधिक थी। डुबकी लगाने जितनी आस्था तो मुझमें नहीं थी बस पानी में अठखेलियां कर ली और बाहर निकल आये। नदी तट पर पण्डों की लाइन लगी थी और लोग पूजा-अर्चन करा रहे थे, हम से तो वे निराश ही  हो गये। ज्यादा समय हमारे पास नहीं था तो हम शीघ्र ही वहाँ से रवाना हुए और सुलभ स्नानघर में नहाकर तरोताजा हो गये। टेक्सी वाला शीघ्रता कर रहा था, उसका कहना था कि यदि देरी की तो फेरी छूट जाएगी और यदि नदी में पानी का उतार हो गया तो फिर फेरी 6 बजे बाद मिलेगी। सामने ही मारवाड़ी ढाबा था लेकिन हमें भोजन का मोह छोड़ना पड़ा। जैसे हीं किनारे पहुंचे गार्ड के कहा कि दौड़ो फेरी छूटने वाली  है। हमने दौड़कर आखिर फेरी पकड़ ही ली। हम 2 बजे ही वापस किनारे लग चुके थे लेकिन हमने देखा कि नदी में पानी उतरना शुरू हो गया था तो दूसरी फेरी पता नहीं कब चलेगी, कुछ कहा नहीं जा सकता था!
यहाँ गंगा के मुहाने पर पानी का स्तर ज्वार-भाटे के कारण घटता बढ़ता रहता है। जब पानी घटता है तब फेरी चलना कठिन हो जाता है और पानी में ज्वार का इंतजार किया जाता  है। दिन में दो-तीन बजे तक ज्वार रहता  है और फिर भाटा होने लगता है। शाम के 6 बजे बाद फिर ज्वार होता है, इसलिये फेरी के संचालन में कठिनाई  होती है। पानी किनारे से काफी दूर चले जाता है और दलदल दिखायी देने लगता है। इस दलदल में फेरी फंस जाती  है और दुर्घटना की सम्भावना बढ़ जाती  है। गंगा सागर द्वीप काफी बड़ा है  और यहाँ की जनसंख्या 2 लाख  है। द्वीप पर कपिल मुनी का आश्रम हैं। इतिहास में दर्ज है कि मकर संक्रान्ति पर ही कपिल मुनी का आश्रम जल से बाहर दिखायी देता था इसलिये ही यहाँ मकर संक्रान्ति पर सर्वाधिक तीर्थ यात्री पहुंचते हैं लेकिन वर्तमान में एक नवीन आश्रम का निर्माण कर दिया गया है जिससे दर्शन सुलभ हो गये हैं। द्वीप पर भी अब धर्मशालाएं आदि बनने लगी  हैं, जिससे  रात्रि विश्राम की सुविधा हो गयी है। लेकिन सभी यात्रियों के लिये एक ही प्रकार की सरकारी फेरी  है, यदि कुछ सुविधाजनक फेरी और लगा दी जाएं तो वृद्ध लोगों को आसानी हो जाए। ठेले के स्थान पर ई-रिक्शे सुविधाजनक रहते हैं लेकिन प्रशासन शायद चिंतित नहीं दिखायी देता। सारे  ही साधनों की सीमा निश्चित है इसलिये ठेलों ने भी अपना वजूद स्थापित कर रखा है।

सागर तट पर चहल-कदमी करते  हुए एक मोती और हीरे बेचने वाला भी मिल गया। 600 रू. में दो बड़े हीरे दे रहा था, साथ ही कांच के टुकड़े को भी दिखा रहा था कि देखो कितना अन्तर है दोनों में। शायद कुछ लोग तो भ्रम में खरीद  ही लेते होंगे। ज्वार-भाटे के कारण हम अधिक देर वहाँ टिक नहीं पाये, बस भागते-दौड़ते गये और भागते-दैड़ते ही वापस आ गये। 50 रू. की साड़ी का भी हश्र देखा, गंगासागर को गन्दा करने के काम आ रही थी और तट पर बेतरतीब बिखरी थी। मुझे समझ नहीं आती पुण्य की परिभाषा! गंगासागर देश के करोड़ों लोगों के लिये तीर्थ है और आस्था का केन्द्र है तो हिन्दू समाज को उनकी सुविधा के लिये आगे आना चाहिये। कुछ संस्थाएं काम कर रही हैं लेकिन ये काम ऊँट के मुँह में जीरे के समान है। आस्था के स्थानों को सरकारों के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिये, यह समाज का उत्तरदायित्व है और समाज को ही वहन करना चाहिये। यदि सरकार से सुविधा भी लेनी है तो इसके लिये भी समाज को ही आगे आना होगा। 

Thursday, March 9, 2017

शान्तिनिकेतन – प्रकृति से शिक्षण

जब हम बचपन में तारों के नीचे अपनी चारपाई लेकर सोते थे तो तारों को समझने में बहुत समय लगाते थे। तब कोई शिक्षक नहीं होता था लेकिन हम प्रकृति से ही खगोल शास्त्र को समझने लगे थे। प्रकृति हमें बहुत कुछ सिखाती है, बस हमें प्रकृति से तादात्म्य बिठाना पड़ता है। कलकत्ता के देवेन्द्र नाथ ठाकुर ने भी प्रकृति के वातावरण में ज्ञान प्राप्ति की कल्पना को साकार रूप देने का प्रयास किया और उसे उनके ही यशस्वी पुत्र रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने मूर्त रूप दिया। खुला विश्वविद्यालय की कल्पना को साकार किया। वृक्षों के कुंज में बैठकर ज्ञान प्राप्त करना कितना सहज और सरल हो जाता है, इस बात को शान्तिनिकेतन में आकर ही समझा जा सकता है। देवेन्द्रनाथ जी ने एक गाँव को खरीदा और वहाँ ज्ञान प्राप्ति की नींव रखी, धीरे-धीरे वह स्थान शिक्षा का केन्द्र बन गया। आज वहाँ विश्व प्रसिद्ध विश्वभारती विश्वविद्यालय है। कई एकड़ में फैला है शान्तिनिकेतन लेकिन पर्यटकों के लिये कुछ स्थानों को देखने की  ही ईजाजत है। पर्यटक जाते हैं और जाते ही गाइड चिपक जाते हैं, हमने भी सोचा कि ले ही लिया जाये, समझने में आसानी रहेगी, लेकिन गाईड 10 प्रतिशत भी उपयोगी सिद्ध नहीं हुआ। जहाँ वृक्षों के नीचे कक्षाएं लगती हैं ऐसे कुंज को उसने दिखा दिया और बताया कि यहाँ रवीन्द्रनाथ बैठते थे। इससे अधिक कुछ नहीं। खैर उसने 10-15 मिनट में हमें चलता किया और छोड़ दिया म्यूजियम के पास। म्यूजियम में रवीन्द्रनाथ से सम्बन्धित संकलन था, उनके द्वारा उपयोग में लायी वस्तुएं थी, उनका घर था।
हम शिक्षा के इस मंदिर को समझना चाहते थे लेकिन असफल  रहे। शायद पर्यटकों से हटकर हमने व्यवस्था की  होती तो विश्वभारती को भी देख पाते। लेकिन एक विलक्षण कल्पना के साकार रूप का आंशिक भाग तो हम देख ही सके। छोटा सा गाँव है, विश्वभारती के अतिरिक्त कुछ नहीं है। पर्यटकों की सुविधा के लिये कुछ  होटल भी हैं और सरकारी गेस्ट-हाउस भी। लेकिन हम होटल में ही रुके थे। कलकत्ता से शान्तिनिकेतन का मार्ग बेहद खूबसूरत है। लगभग 150 किमी क्षेत्र में धान और आलू की खेती प्रमुख रूप से हो रही थी। हर खेत में पोखर था, जहाँ मछली पालन हो रहा था। कोलकाता के होटल से निकलते समय वहाँ के एक वेटर ने बताया था कि वहाँ का लांचा बड़ा अच्छा होता है और लूची-आलू की सब्जी भी। रास्ते में दो चार ढाबे आये सभी पर लिखा था लांचा मिलता है। एक साधारण से ढाबे पर अभिजात्य वर्ग की बड़ी भीड़ थी, हमारे ड्राइवर ने भी गाड़ी वहीं रोकी। हमें कोलकाता में लूची-आलू की सब्जी और झाल-मूरी खाने के लिये मेरे दामाद ने बताया था और लांचा की सलाह वेटर ने दे दी थी। उस होटल पर तीनों ही चीज थी। हमारे यहाँ भेल बनाते हैं लेकिन कोलकाता में झाल-मूरी बनाते हैं, इसमें सरसों के तैल का प्रयोग होता है। लूची मैदा की पूड़ी थी और लांचा गुलाब-जामुन का लम्बा स्वरूप।
रस्ते में एक शिव-मंदिर था, भव्य था और शिवरात्रि के कारण भीड़ भी अधिक थी। हमने सोचा की मंदिर का आते समय दर्शन करेंगे। वापसी में हम मंदिर में रूके लेकिन निराशा हाथ लगी। भव्य मंदिर था, दक्षिणेश्वर की तर्ज पर शिव के छोटे-छोटे मंदिर बनाये गये थे जो 108 की संख्या में थे। लेकिन शिवरात्रि पर भक्तों ने ऐसी पूजा की कि मन्दिर का हर कक्ष माला और पूजा सामग्री से अटा पड़ा था। सफाई की कोई व्यवस्था नहीं थी। तालाब का पानी भी बेहद गन्दा था लेकिन भक्तगण उस गन्दे पानी से ही शिव का अर्चन कर रहे थे।  हम स्वर्ग की कल्पना करके उसे पाने के लिये पूजा करते हैं और जिस धरती पर साक्षात रहते हैं उसे गन्दा करते हैं, यह कौन सी मानसिकता है, मेरे समझ से परे हैं!

हमने शान्तिनिकेतन को दो दिन दिये लेकिन लोग एक दिन में ही घूमकर चले जाते हैं, शायद ठीक ही है, दो दिन जैसा कुछ है नहीं। हम भी दूसरे दिन 10 बजे ही वापस लौट गये और शिव-मन्दिर देखते हुए दो बजे तक कोलकाता पहुंच गये।

Monday, March 6, 2017

कोलकाता मन का और देखन का

युवा होते – होते और साहित्य को पढ़ते-पढ़ते कब कलकत्ता मन में बस गया और विमल मित्र, आशापूर्णा देवी, शरतचन्द्र, बंकिमचन्द्र, रवीन्द्रनाथ आदि के काल्पनिक पात्रों ने कलकत्ता के प्रति प्रेम उत्पन्न कर दिया इस बात का पता ही नहीं चला। मन करता था कि वहाँ की गली-कूंचे में घूम रहे उन पात्रों को अनुभूत किया जाए। समय कुछ और आगे बढ़ा, अब काल्पनिक पात्रों का स्थान वास्तविक पात्र लेने लगे। विवेकानन्द, रामकृष्ण परमहंस कलकत्ता के कण-कण में रचे-बसे दिखायी देने लगे और कलकत्ता के प्रति प्रेम, श्रद्धा और आस्था में बदल गया। अण्डमान की सेलुलर जेल में बंगाल के सैकड़ों शहीदों के चित्र जब दिखायी दिये, तब लगा कि यह स्थान देश के लिये तीर्थ से कम नहीं है। यहाँ क्रांतिकारी हुए, यहाँ चिंतक और विचारक हुए. यहाँ साहित्य को खाया-पीया और ओढ़ा गया, यहाँ संगीत कण्ठ का आभूषण बना, यहाँ भारत की संस्कृति के दर्शन जन-जन में हुए, ऐसे कलकत्ता को देखने के लिये मन सपने देखता था।
यहीं गंगा, सागर में समा जाती है, यहीं सर्वाधिक टाइगरों का निवास है, यहीं नदियों के मुहानों पर डेल्टाज हैं, यहाँ घर-घर में पोखर है, यहाँ सकड़ी-सकड़ी गलियां हैं, भीड़ है, गरीबी है, मारवाड़ी सेठ हैं, आदि आदि सुनते आये थे। किसी भी शहर को देखने के लिये 3-4 दिन पर्याप्त होते हैं, लेकिन मैंने पूरे 8 दिन का समय लिया लेकिन जब कलकत्ता देखने निकले तो लगा कि ये दिन तो कम हैं। इतना कुछ है यहाँ की समय कम ही पड़ जाता है और बहुत कुछ छूट जाता है। जब आप विवेकानन्द के बचपन को अनुभूत करने लगते हो तब हर गली और मौहल्ला पवित्र लगने लगते हैं और मन करता है कि वहाँ मनभर कर घूमा जाए लेकिन समय आड़े आ जाता है। रवीन्द्रनाथ को यहाँ कण-कण में अनुभूत किया जाता है, लेकिन दो दिन में तो उनके एक कण को भी नहीं छूआ जा सकता है, हम से भी बहुत कुछ छूट गया। ऐसा लगा कि नदी किनारे से प्यासे ही लौट आए।
कल का कलकत्ता और आज का कोलकाता राजनीति का कुरूक्षेत्र भी रहा है। कभी मुगलों के काल में यहाँ नवाबी और जमींदारी के किस्से मशहूर हुए तो कभी अंग्रेजों ने यहाँ देश की राजधानी बनाकर शहर को वैभव प्रदान किया तो गाँवों को कंगाल कर दिया, मारवाड़ी सेठों ने यहाँ पटसन-जूट आदि का साम्राज्य स्थापित किया। यहाँ दो धारायें एक साथ बही, एक तरफ पूर्ण विलासिता तो दूसरी तरफ पूर्ण कंगाली। कंगाली के कारण नक्सलवाद भी परवान चढ़ा तो कम्युनिस्ट सरकारें  भी खूब चली। यहाँ की भौगोलिक स्थिति और वास्तविक स्थिति में ज्यादा अंतर नहीं है। चारों तरफ से नदियाँ आ रही है, कहीं गंगा है तो कही हुगली बन गयी है, सभी सागर में विलीन हो रही हैं। नदी और सागर का मध्य डेल्टा बन गये हैं। कहीं नदी मीठी है तो कहीं खारी हो गयी है, दिन में कभी ज्वार आता है तो कभी भाटा आता है। कभी पानी गाँव तक चले आता है तो कभी तटों को छोड़ देता है। ऐसी ही यहाँ की वास्तविक जिन्दगी है। भारत की सम्पूर्ण संस्कृति - गंगा सदृश्य यहाँ दिखायी देती है, उतनी ही पवित्र और उतनी ही सादगी पूर्ण। नदी के मुहानों पर बने डेल्टा गाँवों के जीवन जैसे हैं, जहाँ सूरज उगने पर ज्वार आता है और शाम पड़ते-पड़ते भाटा आ जाता है, फिर चाँद के साथ ही ज्वार। कभी दलदल हो जाता है तो कभी खारा पानी सभी कुछ खारा कर देता है। चारों तरफ पानी ही पानी लेकिन कुछ-कुछ मीठा शेष खारा। शहर सरसब्ज है तो पानी भी मीठा है लेकिन गाँव गरीबी की चादर ओढ़े है तो खारे पानी की मार भी झेल रहे हैं।
नगर की सड़के चौड़ी-चौड़ी हैं, साफ-सुथरी हैं, दो सड़कों को जोड़ने को इन्टर सेक्शन भी हैं। गलियाँ भी इतनी सकरी नहीं है। बड़ा बाजार के लिये सुनते थे कि सकरी गलियां हैं लेकिन जैसे जयपुर में कटला है वैसे ही बड़ा बाजार है, मुख्य सड़क पूरी चौड़ी है। अमेरिका की तरह ही सड़क के साथ-साथ ट्राम की पटरी  है जो आपकी गाड़ी के साथ चलती दिखायी दे जाती  है। बिजली से चलने  वाली दो-तीन डिब्बों की ट्राम अब पुरानी हो चली है, सवारी भी बहुत कम देखने में आती है, शायद कुछ दिनों बाद बन्द ही  हो जाये। हाथ से खेचनें वाले रिक्शे भी हैं लेकिन ई-रिक्शों की भीड़ ने उन्हें एकाकी कर दिया  है। शहर के चारों तरफ गंगा का वास  है जो यहाँ हुगली नदी के नाम से विख्यात है। लम्बी-चौड़ी हुगली शान्त भाव से बहती है और उस पर छोटी नाव, स्टीमर आदि चलते हुए हर तरफ दिखायी देते हैं। रात को यह दृश्य अद्भुत होता है। कभी हावड़ा ब्रिज यहाँ की शान हुआ करता था लेकिन आज विद्यासागर ब्रिज ने उसका स्थान ले लिया है। शहर की मुख्य सड़कें एकदम साफ-सुथरी हैं, सुबह 6 बजे भी साफ थी तो शाम को भी साफ थी, अन्दर गलियों में कहीं-कहीं गन्दगी देखी जा सकी।  गाँव भी लगभग साफ ही थे। गरीबी के पैबन्द मखमल पर दिखायी देते हैं, जैसे ही चौड़े रास्तों से गलियों में जाते हैं, गरीबी झांकने लगती है। बाजार इतने चौड़े हैं कि पगडण्डी  पर भी हाट-बाजार लग गये हैं फिर भी जाम की स्थिति नहीं रहती। पीले रंग की टेक्सियां दूर से ही दिखायी देती  हैं और उन सभी पर लिखा है नो-रिफ्यूजल, कोई भी टेक्सी कहीं जाने से मना नहीं कर सकती है। पुलिस बहुत कम दिखायी देती है, लेकिन जब दिखायी देती है तो  पूरी चाक-चौबन्द। लगा की अनुशासन वहाँ के जीवन में है।

अब खान-पीन और पहनावे की बात कर लें। खाना सादा है, तीखापन कम है। यहाँ के रसगुल्ले, संदेश और मिष्टी दही बहुत प्रसिद्ध है। खासियत क्या है? रसगुल्ले गुड़ से बने हैं और गुड़ खजूर से। दही में भी खजूर का गुड़ है। गोलगप्पे याने की पुचके हर 100 कदम पर मिल जाएंगे और झाल-मूरी वाले भी। खीरा ककड़ी खूब बिक रही थी, छिली हुई और नमक के साथ। लूंची और आलू की सब्जी भी प्रसिद्ध है और हींग की कचौरी भी। बाकि तो दाल-चावल ही है। मछली को भूली नहीं हूँ, वो तो यहाँ का जीवन है। हम जैसे शाकाहारी लोगों को बार-बार याद दिलाना पड़ता था कि मछली नहीं चलती। सड़क पर गाड़ी चल रही है और आप गली में या गाँव में आ गये हैं तो शीशे से दाएं या बाएं देखने  पर मछली ही मछली कटती-पिटती दिखायी देगी। खेतों में धान और आलू की फसल बहुतायत से दिखायी देती है तो भोजन में भी चावल और आलू का बोलबाला  है। बैंगन और परवल को पकाने का तरीका पसन्द आया। इन्हें काटकर नमक और हल्दी लगाकर सरसों के तैल में तवे पर भूना जाता है और ऐसे ही खाया जाता है। बहुत स्वादिष्ट था। पहनावे ने तो मन ही मोह लिया। पहले पुरुषों की ही बात करें क्योंकि अक्सर पुरुष महिला के वस्त्रों को लेकर चिंतित दिखायी देते हैं लेकिन स्वयं के कपड़ों का जिक्र नहीं करते। यहाँ धोती पहने पुरुष खूब दिखायी दिये, यहाँ आकर लगा कि अभी भी कहीं ना कहीं हमारी धोती इज्जत पा रही है, नहीं तो सारे ही पुरुषों ने विलायती पेंट धारण कर ली है। महिलाएं साड़ी में ही नजर आयीं, सूती तांत की साड़ी, माथे पर बड़ी सी बिन्दी और गहरी भरी हुई मांग। आज भी स्कूल का परिधान साड़ी है या सलवार-सूट। बच्चियों को स्कूल से निकलते देखा और सभी साड़ी में या सलवार सूट में थी तो प्राचीन भारत दिखायी देने लगा। रास्ते चलते आदमी माँ कहकर सम्बोधित करते मिले तो लगा कि विवेकानन्द का कलकत्ता आज भी वैसा ही है। खूब भालो – खूब भालो – खूब भालो। 

Wednesday, February 15, 2017

काश हम विशेष नहीं होते

सामान्य और विशेष का अन्तर सभी को पता है। जब हम सामान्य होते हैं तो विशेष बनने के लिये लालायित रहते हैं और जब विशेष बन जाते हैं तब साँप-छछून्दर की दशा हो जाती है, ना छछून्दर को छोड़े बनता है और ना ही निगलते बनता है। आपके जीवन का बिंदासपन खत्म हो जाता है। जब मैं कॉलेज में प्राध्यापक बनी तब कई बार कोफ्त होती थी कि क्या जीवन है! फतेहसागर पर जाकर गोलगप्पे भी नहीं खा सकते। क्योंकि कोई ना कोई छात्र आपको देख लेगा और आपका विशेषपन साधारण में बदल जाएगा। महिलाओं के साथ तो वेशभूषा को लेकर भी परेशानी होती है, बाहर जाना है तो साड़ी  ही पहननी है, नहीं तो ठीक नहीं लगेगा। कई बैठकों में सारा दिन साड़ी में लिपटे गर्मी खा रहे होते थे तब मन करता था कि शाम को तो सलवार-सूट पहन लिये जाये लेकिन फिर वही विशेष का तमगा! सारे  ही पुरुष कुर्ते-पाजामे में और हम साड़ी में।
यह सब तो बहुत छोटी-छोटी बातें  हैं, असली बात है सम्मान और अपमान की। इस देश में जो भी चाँदी का चम्मच लेकर पैदा होता है, उसे ही सम्मान मिलता है। आप साधारण हैं और संघर्षों के बाद विशेष बने हैं तो दुनिया चाहे आपको स्वीकार ले लेकिन आपके नजदीकी कभी भी आपको स्वीकार नहीं पाते हैं। आप सम्मानित व्यक्ति हैं यह बात उनके गले नहीं उतरती, यहाँ तक तो ठीक है लेकिन वे आपको छोटा सिद्ध करने के लिये कदम-कदम पर अपमानित करते रहते हैं, यह बात आपको हिला देती है। क्या मित्र और क्या परिवारजन सभी आप से दूर होने लगते हैं या कभी-कभी आप ही अपमान से बचने के लिये उनसे दूर हो जाते हैं। जब तक आप किसी को भी लाभ देने की स्थिति में हैं तब तो आपको सम्मान मिलेगा लेकिन यदि आप लाभ देने की स्थिति में नहीं हैं तो अपमान के लिये तैयार रहना  होगा।

लेखन ऐसी चीज है, जिससे आप किसी को लाभ नहीं दे सकते हैं लेकिन यदि आपके विचार अच्छे हैं तो आप सम्मान जरूर पा जाते हैं। बस यही सम्मान जी का जंजाल बन जाता है। आपका सम्मान मुठ्ठीभर लोग करेंगे और अपमान को तैयार सारा जग रहेगा। तब लगने लगता है कि काश हम विशेष ही ना बने होते। एक कहानी याद आ रही  है – एक नगर में पानी के लिये दो कुएं थे, एक प्रजा के लिये और दूसरा राजा के लिये। प्रजा के कुएं के पानी में अचानक ही बदलाव आ गया, जो भी उस पानी को पीता वह पागल  होने लगता। धीरे-धीरे प्रजा पागल होने लगी और एक दिन पूरी प्रजा पागल हो गयी। लेकिन राजा के कुए का पानी ठीक था तो राजा भी ठीक ही रहा। लेकिन एक दिन प्रजा ने राजा पर यह कहकर आक्रमण कर दिया कि हमारा राजा पागल है। अब राजा के पास बचाव का कोई साधन नहीं था, हार कर राजा ने भी उसी कुए का पानी पी लिया। विशेष होने पर हमारे साथ भी यही होता है, कोई भी हमें स्वीकार नहीं कर पाता और राजा की तरह हमें भी सर्वसामान्य के कुए का पानी पीना पड़ता है। यदि ऐसा नहीं करते हैं तब अकेलेपन का संत्रास भुगतना पड़ता है। इसलिये ही लोग बचपन को याद करते हैं, जब विशेष का दर्जा होता ही नहीं था। बचपन में हम, मैदान में फुटबॉल खेल रहे होते हैं और बड़े होकर हम खुद फुटबॉल बन जाते हैं। चारों तरफ से लाते पड़ना शुरू होती हैं, बस स्वयं को और स्वयं के विशेषपन को बचाते हुए चुपके-चुपके आँसू बहा लेने पर मजबूर हो जाते हैं। अब लगने लगा है कि काश हम विशेष नहीं होते! 

Sunday, February 5, 2017

छोटे डर का डेरा


आप यदि विचारक है या चिंतक हैं तो सच मानिये आपको रोज ही जहर पीना पड़ता है। आपके आसपास रोज ऐसी घटनायें घटती हैं कि आपकी नींद उड़ा देती हैं लेकिन शेष समाज या तो उस ओर ध्यान देता नहीं या देता भी है तो सोचता नहीं। बस दुखी होने के लिये केवल आप  हैं। ऐसी घटनायें खुद चलकर आप तक आती हैं, वे शायद समझ गये हैं कि इनके पास कोई समाधान है। यदि हम जैसे लोगों के पास समाधान भी है तो हम दुखी होते हैं क्योंकि समाज में चारों तरफ फैली समस्या का यदि हमने एक परिवार में समाधान कर भी दिया तो क्या! चारों तरफ तो वही आग लगी है। कैसे बुझाएंगे इसे?
एक दिन एक माँ का फोन आता है, फोन पर जार-जार रो रही थी। पहली बार फोन आया था तो पहचान में भी कठिनाई हुई, खैर बात सामने आयी कि उसकी उच्च शिक्षित बेटी एक निठल्ले लड़के के साथ भाग गयी है। यह भागमभाग हर घर का हिस्सा बन चुकी  है। इसके अतिरिक्त भी कोई अपनी सास से दुखी है तो कोई बहु से,  कोई पिता से दुखी है तो कोई बेटे से। सामाजिक ताना-बाना इतना उलझ गया है कि सुलझाने का कोई मार्ग दिखायी नहीं देता। जैसे ही रिश्तों की डोर उलझे, बस काटकर फेंक दो, आज यह फैसला आम हो गया है। कभी हम रास्ते चलते रिश्ते बनाते थे लेकिन आज रास्ते चलते रिश्ते तोड़ रहे हैं। हम सब तोड़ रहे हैं, क्योंकि इसके अतिरिक्त कोई मार्ग दिखायी देता ही नहीं।
अक्सर हम मानते हैं कि समस्याएं गरीब लोगों में हैं, लेकिन वहाँ कितना ही गाली-गलौंच हो, लेकिन परिवार टूटता नहीं है। हमारे आसपास सफाई कर्मचारी-सब्जी बेचने वाली-काम वाली सभी घर में सास के बड़ा मानती हैं। अधिकांश में तो सभी का वेतन सास के पास ही एकत्र होता है। सारे ही वार-त्योहार और शादी आदि वे धूमधाम से करते हैं। मैं ऐसे लोगों को अक्सर हँसते हुए देखती हूँ और जब इन्हें खुश देखती हूँ तो मुझे भी जीने का तरीका समझ आने लगता है। मैंने शायद ही कभी किसी बड़े व्यक्ति से कुछ सीखा हो लेकिन इन छोटे लोगों से मैं रोज ही सीख लेती हूँ। यहाँ की महिलाएं रोती नहीं हैं, शराबी पति के साथ रहकर भी रोज ही खुश रहने के साधन ढूंढ लेती हैं।

मुझे लगता है कि हमने संघर्ष के मार्ग को भुला दिया है, दुनिया को आसान समझ लिया है। यदि जंगल में घूम रहे हिरण की तरह अपने जीवन को जीया होता तो हर पल चौकन्ना रहते। समूह में  रहने की आदत डालते। वर्तमान में माता-पिता बड़ी होती संतान के प्रति शंका नहीं पालते हैं, उन्हें सुरक्षा का वातावरण देते हैं। उन्हें पता ही नहीं लगता कि जीवन में असुरक्षा भी है और अपना घोड़ा छांव में बांधना सीखना पड़ता है। संतान असुरक्षित जीवन जीकर खुश होना चाहती है और माता-पिता उन्हें सुरक्षित जीवन देना चाहते हैं। माता-पिता के पास अनुभव है और वे इसी आधार पर जार-जार रोने लगते हैं लेकिन संतान के पास खुला आसमान है। वे गिद्दों के बीच जाकर भी स्वयं को सुरक्षित समझने की भूल कर बैठते हैं। लेकिन संघर्ष भरे जीवन को जीने की कला भी आनी ही चाहिये। यह मानकर जीवन जीना होगा कि हम जंगल में हिरण के समान है और हर पल हम पर शेर की नजर है। हमें शारीरिक और मानसिक दोनों रूपों में शक्तिशाली होना पड़ेगा। जीवन की सच्चाई को समझना पड़ेगा। शून्य से जीवन कैसे शुरू किया जाता  है, हमारी संतान को आना चाहिये। बड़े डर जीवन से दूर चले गये हैं तो छोटे डर ने डेरा डाल लिया है, इसलिये बड़े डर को भी परिचय में रखने की आदत डालिये। जैसे छोटे लोग करते हैं। उनके पास बड़े डर हैं तो वे छोटे डर से डरते नहीं और जीवन में खुश रहने के तरीके ढूंढ लेते हैं।

Saturday, January 28, 2017

वे जड़े ढूंढ रहे हैं

गणतंत्र दिवस अपनी उपादेयता बताकर चले गया, मेरे अंदर कई पात्र खलबली मचाने लगे हैं। देश के गण का तन्त्र और देश के मन की जड़े दोनों को खोद-खोदकर ढूंढने का ढोंग कर रही हूँ। जी हाँ हम ढोंग ही करते हैं। देश के प्रतीक के रूप में अपने ध्वज के समक्ष जब सल्यूट करने को  हाथ उठते हैं तब उसके तंत्र की ओर ध्यान  ही नहीं जाता। ना तो उस तंत्र को अंगीकार कर पाते हैं और ना ही अपने मन की जड़े कहाँ है, उन्हें ही देख पाते हैं। गाँव में कल गणतंत्र दिवस मनाते हुये एक व्यक्तित्व से परिचय हुआ, अमेरिका में रहकर भारत में अपनी जड़े ढूंढ रहे थे। मन में  भारत बसा था लेकिन खुद अमेरिका में बस गये थे, अब वे भारत को भी सम्पन्न बनाना चाह रहे हैं जिससे अपनी जड़ों को वापस लहलहा सके। वे जब से गये हैं भारत को भूल नहीं पाते और बार-बार यहाँ आकर जमीन खोदकर देखते रहते हैं कि मेरी जड़े सुरक्षित तो हैं ना। जिस देश की जड़ों में भौतिकता के अंश ही ना हो, जहाँ के गाँव आज भी प्रकृति के साथ ही जीना चाहते हों, भला वहाँ कैसे देश के तंत्र को विकसित किया जाये?
घर आकर बेटे और पोते से बात होती है, गणतंत्र की बधाई स्वीकार करती हूँ लेकिन साथ ही ढूंढ नहीं पाती अमेरिका के गणतंत्र दिवस को। तो स्वतंत्रता दिवस का ही स्मरण करा देती हूँ। बेटा कहता है कि हम लाख यहाँ के हो जाये लेकिन हमारा गणतंत्र तो भारत में ही है। सुनकर अच्छा भी लगा लेकिन तभी अमेरिका से आये सज्जन याद आ गये। तो क्या अपने देश की जड़े सभी तलाश रहे हैं? लेकिन क्यों तलाश रहे हैं? हम तो भूल बैठे हैं अपनी जड़ों को! हमारी जड़ों में कौन सा खाद पानी है, यह हमें पता ही नहीं। हमारी जड़े कितनी गहरी हैं, वे कहाँ-कहाँ तक अपनी पैठ बनाये हुए  हैं, उनका विस्तार कहाँ तक था, हम कुछ ढूंढ ही नहीं पा रहे हैं, बस हमारे तनों में सुन्दर फूल लगे और मीठे फल आयें बस यही प्रयत्न करते रहते हैं।

बचपन में पढ़ी एक कहानी याद आने लगी है – भारत के बँटवारे के बाद शरणार्थी बनकर  रह रहे एक व्यक्ति की कहानी – वतन। हर साल पागल का वेश धरकर जा पहुँचना अपनी जड़ों को ढूंढने। उसकी कठिनाई यह थी कि वह जबरन धकियाये गये थे और अभी की कठिनाई यह है कि सहूलते देखकर मन से गये हैं। लेकिन जड़ों की तलाश दोनों में ही है। इसलिये मुझे बैचेनी सी लगती है गणतंत्र की सामाओं से। नियमों से बंधकर हमारा जीवन हो यह तो अच्छा लगता है लेकिन देश की सीमाएं भी बाड़ बंदी में बंध जाये तो बस जड़ों की ही तलाश बनी रहती है। कुछ लोग तलवार लेकर निकले और उन्होंने रेखाये खींचना शुरू किया, यह तेरा और यह मेरा। बाड़बंदी बढ़ती गयी और सभी देश चाक-चौबन्द हो गये। इसलिये ही कहती हूँ कि तंत्र से लिपटकर हम अपनी जड़ों को ढूंढने का ढोंग करते हैं। जड़े  तो अपने मन से विस्तार लेती हैं, जहाँ खाद-पानी मिलता है, वहीं पहुँच जाती है। लेकिन जब पहरे लगा दिये जाएं कि अपनी जड़ों को वहीं छोड़ दो तब तलाश ऐसे ही जारी रहती  है। लोग जाते रहेंगे और यहाँ आकर जड़ों को ढूंढते रहेंगे और हमें  बताते रहेंगे कि हम तनों पर फूल खिलाने आयें हैं। सच तो यह है कि वे जड़े ढूंढ रहे  हैं और हम उनकी आँखों में इस देश को देख रहे हैं। लेकिन हम किसे ढूंढ रहे हैं? यह प्रश्न किसी के मन में आता ही नहीं! वे अपनी जड़ों से अलग हुए, विचलित हो रहे हैं। हम अपनी जड़ों से जुड़े रहकर भी जड़ों के बारे में जानना ही नहीं चाहते!

Sunday, January 22, 2017

ना नौलखा हार और ना ही बगीचा!

ना नौलखा हार और ना ही बगीचा!

नौलखा हार की कहानी तो सभी को पता है, कैसे एक माँ ने नकली हार के सहारे अपना बुढ़ापा काटा और उसकी  संतान इसी आशा में सेवा करती रही कि माँ के पास नौलखा हार है। यह कहानी संतान की मानसिकता को दर्शाती है लेकिन एक और कहानी है जो समाज की मानसिकता को बताती है। सुनो – एक गरीब किसान था, उसके पास एक बगीचा था। किसान  के कोई संतान नहीं थी और वह बीमार रहने लगा था। किसान के बगीचे पर जमींदार की नजर थी। एक दिन जमींदार ने किसान से कहा कि तुम अपना बगीचा मेरे नाम कर दो, मैं तुम्हें इसके बदले में आजीवन एकमुश्त पैसे दूंगा। तुम जब तक जीवित हो, तुम्हारा खर्चा मैं उठाऊंगा और मरने के बाद यह बगीचा मेरा हो जाएगा। किसान ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। जब किसान को जमींदार से मासिक पैसे की बात पता लगी तो उसके दूर के रिश्तेदार का बेटा-बहु उसकी सेवा के लिये आ गये। जमींदार तो पल-पल किसान के मरने की बाँट जोहे और बेटा-बहु उसकी खूब सेवा करे। जमींदार हर महिने पैसा देने के बहाने देखने आए कि किसान के कितने दिन बाकी हैं? महिने दर महिने गुजर गये, साल गुजरने लगे, किसान स्वस्थ होने लगा और एक दिन धोती-कुर्ता पहनकर, ऊपर से शॉल डालकर, छड़ी घुमाता हुआ जमींदार के पास पहुंच गया।
हमारे समाज में पुत्र-मोह क्यों है, यह बात लोग अलग-अलग दृष्टिकोण से बताते हैं, मुझे भी सच्चा ज्ञान अभी ही प्राप्त हुआ है। तो सोचा कि आप को भी बताती चलूं कि पुत्र क्यों जरूरी  है? पुत्र हमारे जीवन में नौलखा हार के समान है या किसान के बगीचे के समान। हमारे पास नौलखा हार है फिर वह नकली ही क्यों ना हो लेकिन बैंक में रखा हुआ या संदूक में रखा हुआ संतानों को भ्रमित करता है कि माता-पिता के पास धन है और इसी कारण वे उनकी सेवा करते हैं। रिश्तेदार भी बगीचे के कारण रिश्तेदार की सेवा करते हैं। हमेशा से ही यह चलन  रहा है कि बेटा ना हो तो गोद ले लो लेकिन बेटा होना जरूर चाहिये। मैं इस ज्ञान को समझ नहीं पाती थी और ना  ही किसी ने सत्य के दर्शन कराये थे लेकिन सत्य तो होता ही प्रगट होने के लिये है तो मेरे सम्मुख भी प्रगट हो गया। सत्य ने कहा कि बेटा वंश बढ़ाने से अधिक आपकी सेवा में सहयोग कराता है। किसान को जैसे ही जमींदार से पैसे मिलने लगे रिश्तेदार आ गये, ऐसे ही बेटा है तो लोग कहते हैं कि सेवा करने वाला है। गोद लिया है तो भी बेटा है, गाली देता है तो भी बेटा है, क्योंकि रिश्तेदारों को पता है कि यह हुण्डी है। जब हमारे काम पड़ेगा तो भी खड़ा होगा और खुद के लिये भी खड़ा रहेगा ही। लेकिन बेटा है ही नहीं, असली या नौलखा हार जैसा नकली या गोद लिया हुआ तो रिश्तेदार कहते हैं कि हम क्यों सेवा करें इन बूढ़ों की।

सबसे खराब स्थिति तो अब पैदा हुई है, हमने असली नौलखा हार बनाया, उसमें हीरे जड़ा दिये और उसे करोड़ों का बना दिया। करोड़ों का बनते  ही वह हीरा रानी विक्टेरिया के मुकुट का श्रृंगार बन गया या अमेरिका की शोभा बढ़ाने लगा। रिश्तेदारों के पुत्र ताने खाने लगे कि देखो उसे और तुम? लेकिन बारी अब उनकी थी, वह विदेशी बने इस हीरे के माता-पिता की तरफ झांकने से भी कटने लगे। जब उनका बेटा हमारे काम का नहीं तो हम क्यों सेवा-टहल करें? जो कान हरदम आवाजें सुनते थे अब वहाँ सन्नाटा पसर गया। ना कोई आवाज आती है कि चाची कैसी हो, ना ताई कैसी हो, मामी-बुआ सारे ही सम्बोधन दुर्लभ हो गये। होली-दीवाली भी दुआ-सलाम नहीं होती। आस-पड़ोस वाले ही हैं जो तरस खाते हैं और अपने बेटे से कहते हैं कि बेचारे अकेले हैं, वार-त्योंहार कभी जा आया कर। पुत्र क्या होता है, आज हमारी समझ में आने लगा  है. यह ऐसा बगीचा है जिसके लालच में कोई भी जमींदार आपको मासिक धन दे देता है और कोई भी दूर का रिश्तेदार आपकी सेवा-टहल कर देता  है। पुत्र हो और वह भी कीमती लेकिन आपके रिश्तेदारों के किसी काम का नहीं तो वह बगीचे में खड़े बिजूका जैसा भी आश्वस्त नहीं करता, उल्टा आपके लिये मखौल का वातावरण बनाने में सहायक हो जाता है। हर घर में सन्नाटा पसरा है, माता-पिता ने अपने लाल को करोड़ों का  बना दिया है और वह विदेश में बैठकर माता-पिता के सारे रिश्तों को दूर करने में तुले हैं। उन्हें इतना असहाय बना दिया है कि हार कर बेचारे माता-पिता बिना पतवार की नाव के समान नदी में गोते खाने को मजबूर हो गये हैं। ना नौलखा हार अपने पास रहा और ना ही बगीचा! 

Friday, January 20, 2017

तेरे बिना मेरा नहीं सरता रे


हमेशा कहानी से अपनी बात कहना सुगम रहता है। एक धनवान व्यक्ति था, वह अपने रिश्तेदारों और जरूरतमंदों की हमेशा मदद करता था। लेकिन वह अनुभव करता था कि कोई भी उसका अहसान नहीं मानता है, इस बात से वह दुखी रहता था। एक बार उसके नगर में एक संन्यासी आए, उसने अपनी समस्या संन्यासी को बतायी। संन्यासी ने पूछा – क्या तुमने भी कभी उनकी मदद ली है? व्यक्ति ने कहा कि नहीं मैंने कभी मदद नहीं ली। तब संन्यासी ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति दूसरे के लिये उपयोगी बनना चाहता है, किसी के लिये उपयोगी बनने पर ही उसे गौरव की अनुभूति होती है। एकतरफा सहयोग, एक व्यक्ति को बड़ा और दूसरे को छोटा सिद्ध करता है, इसलिये तुम्हारी सहायता पाकर भी कोई खुश नहीं होता। तुम जब तक दूसरों को उपयोगी नहीं मानोंगे तब तक कोई भी तुम्हारी इज्जत नहीं करेगा।

मन की भी यही दशा है, मन चाहता है कि दूसरों पर अपना नियंत्रण बनाकर रखूं। अपनी सत्ता और सम्मान सभी के मन में स्थापित कर दूं। लेकिन जब हम अपने मन को दूसरे के नियंत्रण में जाने देते हैं तब हमें सुख मिलता है। हमारी सत्ता हमारा मन  भी नहीं मानता तो हम दूसरों पर अपनी सत्ता कैसे स्थापित कर सकते हैं! हम यदि स्वयं को ही कर्ता मानते रहेंगे तो कभी सुखी नहीं हो सकते। माता-पिता कहते हैं कि हमारे अस्तित्व को मानो, संतान कहती है कि हमारा भी अस्तित्व है। अन्य रिश्तों में भी यही है। जब तक हम एक-दूसरे की जरूरत नहीं बनते तब तक खुशी हमारे पास नहीं आती। स्वयं को स्वयंभू बनाने के चक्कर में हम भाग रहे हैं, एक-दूसरे से भाग  रहे हैं। किसी के अधीन रहना हमें पसन्द नहीं, इसलिये हम अपनी सत्ता के लिये भाग रहे  हैं। जिस दिन हम दूसरों को अपनी जरूरत समझेंगे उस दिन शायद हम एक-दूसरे के साथ के लिये भागेंगे। दूसरों की जरूरतों को पूरा करने का हम दम्भ रखते हैं लेकिन अपने मन की जरूरतों को ही पूरा नहीं कर पाते, मन तो हमारा दूसरों के लिये तड़पता है लेकिन हम ही दाता है, यह भावना हमें सुखी नहीं रहने देती। मेरे लिये मेरे नजदीकी बहुत उपयोगी हैं, बस यही भावना  हमें पूरक बनाती है। जिस दिन हम किसी पराये को भी यह कह देते हैं कि – तेरे बिना मेरा नहीं सरता रे, तो वह पराया भी अपनों से अधिक हो जाता है। फिर अपनों से ऐसा बोलने में हमारी जुबान अटक क्यों जाती है!