Thursday, April 18, 2019

अब न्याय होगा?


किसी ने न्याय को देखा है क्या? विकास को भी तो नहीं देखा था ना! प्रजा के किसी अदने से बंदे ने राजा को ललकार दिया, तत्काल सर कलम कर दिया गया, राजा ने कहा कि हो गया न्याय! न्याय का निर्धारण राजा की पसन्द से होता है। जो राजा के हित में हो बस वही न्याय है। 1975 याद है ना, शायद नौजवानों को खबर नहीं लेकिन हम जैसे लोगों के तो दिलों में बसा है, भला उस न्याय को कैसे भूल सकते हैं! न्यायाधीश ने न्याय किया कि तात्कालीन प्रधानमंत्री ने चुनाव गलत तरीकों से जीता है लेकिन प्रधानमंत्री तो खुद को राजा मानती थी तो आपातकाल लगाकर, सारे विपक्ष को जैलों में ठूसकर, मीडिया की बोलती बन्द कर के न्याय हुआ। तब भी कहा गया कि अब न्याय हुआ। 1984 भी याद होगा! पेड़ के गिरने से धरती हिल जाती है और राजा की मृत्यु से निरपराध कौम का सरेआम कत्लेआम भी न्याय ही कहलाया था, तब भी कहा गया था कि अब न्याय हुआ। न्याय के कितने ही किस्से हैं जब एक वंश ने अपने हित में न्याय किया। लेकिन न्याय करते-करते प्रजा को समझ आने लगा कि यह न्याय एकतरफा है। जैसे ही प्रजा की समझ बढ़ी, वंश का शासन नेपथ्य में चले गया। अब फिर चुनाव आया है और नारा दिया है – अब न्याय होगा! मुझे एक-एक कर सारे ही न्याय याद आने लगे हैं। सीताराम केसरी के प्रति भी न्याय याद आ रहा है, मेनका गाँधी के प्रति भी न्याय याद आ रहा है, लाल बहादुर शास्त्री के प्रति भी न्याय याद आ रहा है। सरदार पटेल, राजेन्द्र प्रसाद, नरसिंह राव, सुभाष चन्द्र बोस, सावरकर न जाने कितने नाम है वे सारे ही न्याय याद आ रहे हैं।
खुली चेतावनी दी गयी है, अब न्याय होगा! खुली चेतावनी दी जा रही है कि एक सम्प्रदाय एकत्र हो जाए और बहुसंख्यक समाज को न्याय दें सकें। पाकिस्तान से हाथ मिलाया जा रहा है, चीन के भी फेरे लगाये जा रहे हैं, बस इसी न्याय के लिये। आतंकवाद को पनाह दी जा रही है, मासूम प्रजा को न्याय देने के लिये। कभी चायवाला तो कभी दलित तो कभी महिला को निशाना बनाया जा रहा है कि सत्ता पर इनकी जुर्रत कैसे हुई बैठने की, अब न्याय होगा। खुले आम कहा गया कि देश को सेवक नहीं शासक चाहिये क्योंकि शासक ही तो न्याय कर सकता है। सैना को भी औकात बतायी जा रही है कि हम जैसे शासकों के साथ रहो, जो हम चाहते हैं उसी  पक्ष में खड़े रहो, हम ही तय करेंगे कि देश की सीमा क्या हो! हमने ही पहले देश की सीमा तय की थी, हमने ही पाकिस्तान बनाया था, हम चाहेंगे कि कश्मीर भी अलग देश बने इसलिये सैना को हमारे ही पक्ष में खड़ा रहना है, अब सैना का न्याय भी हम करेंगे।
अब न्याय होगा! प्रजा को समझ लेना है कि कैसा न्याय होगा! लोकतंत्र के खोल में राजाशाही का खेल होगा। राजवंश पूर्णतया सुरक्षित रह सके, इसके लिये न्याय होगा। राजवंश एक ही समय में ब्राहण बने या मुस्लिम बने या फिर ईसाई, किसी को प्रश्न पूछने का अधिकार नहीं होगा, यदि कोई पूछेगा तो फिर न्याय होगा। जनता को हर पल अनुभव कराया जाएगा कि वह गुलाम प्रजा है, उसे चौबीस घण्टे बिजली और पानी की जरूरत नहीं है, उसे गुलाम प्रजा की तरह रहना सीखना ही होगा, नहीं तो न्याय होगा। सबके लिये विकास की बात करने वालों के प्रति न्याय होगा। हमारे वंश के चिरागों को ही प्रथम परिवार मानना होगा, नहीं तो न्याय होगा। हम शासक हैं यह बात सम्पूर्ण जनता को माननी ही होगी, नहीं तो न्याय होगा। राजा के दरबारी खुश हैं कि अब हमें भी लूट का माल मिलेगा, झूठन मिलेगी, गाड़ी में ना सही, गाडी के पीछे लटकने का अवसर मिलेगा, तो दरबारी खुश हैं। वे भी चिल्ला रहे हैं कि अब न्याय होगा। सब खुश हो रहे हैं, नाच रहे हैं कि अब न्याय होगा! हम राजस्थान में बैठकर घण्टों जाती बिजली को देखकर समझ गये हैं कि अब न्याय हो रहा है। हमें समझ आने लगा है कि प्रजा क्या होती है और राजा क्या होता है। हम भी अब न्याय होगा के मंत्र को दोहराने लगे हैं और खुद को गुलाम बनाने की ओर मुड़ने लगे हैं। चुनाव के नतीजे बताएंगे कि अब न्याय होगा या फिर जनता सबल बनकर राजा को सेवक धर्म का स्मरण कराती रहेगी!

Friday, April 5, 2019

इस बार वोट पकौड़ों के नाम

कहावत है कि दिल्ली दिलवालों की है, जब दिलवालों की ही है तो चटपटी होना लाजमी है। चटपटी कहते ही चाट याद आती है और चाट के नाम से ही मुँह में पानी आता है। मुँह में पानी आता है मतलब आपकी स्वाद ग्रन्थियाँ सक्रिय हो रही हैं। स्वाद ग्रन्थियाँ सक्रिय होती है तो जो भी खाया जाता है उसका पाचन आसान हो जाता है। अब इतिहास देखते हैं – दिल्ली साठ बार उजड़ी और इतनी बार ही बसी। कल एपिक चैनल देखते हुए बताया गया कि जब शाहजहाँ ने वापस दिल्ली को बसाया तो एक मंत्री ने उन्हें कहा कि आपने दिल्ली को बसा तो दिया है लेकिन यमुना का पानी तो पेट के लिये बहुत भारी है। अब! कोई उपाय शेष नहीं था, दिल्ली तो बस चुकी थी, लोगों के पेट भी खराब होने लगे थे। तब अनुभवी लोगों ने कहा कि यमुना के पानी से बचाव का एक तरीका है, हमारे खाने में चटपटे मसालों का समावेश होना चाहिये साथ में ढेर सारा घी। बस फिर क्या था, खट्टी-मीठी चटनियाँ बनने लगी, सब्जियाँ घी में बनने लगी। धीरे-धीरे चाट का स्वाद दिल्लीवालों की जुबान पर चढ़ने लगा। पुरानी दिल्ली चाटवालों से भर गयी, खोमचेवाले आबाद हो गये। यहाँ तक की पराँठेवाली गली तक बन गयी। आलू के पकौड़े, गोभी के पकौड़े, प्याज के पकौड़े, पनीर के पकौड़े, बस पकौड़े ही पकौड़े! हर खोमचेवाला कहता कि मेरी चाट नायाब है, बात सच भी थी क्योंकि सभी की चाट में कुछ ना कुछ अलग था। गली-गली में खोमचें वाले बिछ गये, जहाँ देखो वहाँ ठेले सज गये।
शाहजहाँ के दरबार में यमुनाजी के पानी को लेकर जो चिन्ता थी वह दूर हो गयी थी। लोगों को चाट का स्वाद इतना भा गया था कि अब बिना चाट के गुजारा ना हो। आज की दुनिया में जहाँ पानी के शुद्धिकरण के कई उपाय हैं लेकिन चाट को अपने जीवन के हटाने का कोई उपाय शेष नहीं है। दिल्ली जाइए, आप कितना भी कह दें कि सुबह नाश्ते में पकौड़े नहीं चाहिये लेकिन पकौड़े तो बनेगें ही और आप खाएंगे ही। लेकिन एक दिन अचानक ही एक बात हवा में तैरने लगी कि पकौड़े बनाना तो काम-धंधे की श्रेणी में ही नहीं आता। दिल्ली का वजूद तो पकौड़े के कारण ही है, यहाँ न जाने कितने परिवार इसी धंधे में करोड़पति हो गये, अब कहा गया कि यह तो धंधा ही नहीं है। तो धंधा क्या होता है सिरफिरे भाइयों? राजा द्वारा बांटी गयी मुफ्त की खैरात पर पलने का नाम धंधा है जो अभी तुम्हारे आका ने घोषित किया है कि मेरा राज आएगा तो सभी को खैरात मिलेगी। अरे छोड़िये राजनीति की बात, कहाँ चाट का मजा आ रहा था और कहाँ पकौड़े याद आ गये और पकौड़े याद आते ही लोगों की जहर बुझी बातो याद आ गयी। बस जुबान का स्वाद ही खराब हो गया। अभी कुछ दिन पहले की ही बात है, एक रेस्ट्रा में गये, स्टार्टर देखे, लेकिन कोई भी पसन्द का नहीं था। पूछा कि पकौड़े टाइप कुछ है क्या? मासूम सा मुँह बनाकर मना कर दिया, मुझे लगा कि यह कमबख्त भी पकौड़े को लेकर दुश्मनी निकालने वालों में से दिखता है! अब भारत में तो पकौड़े ही चलते हैं, भाँत-भाँत के पकौड़े, हर मौसम में खिला लो, पसीने बहते जाएंगे लेकिन पकौड़े के लिये कोई मना नहीं करेगा। भारी पानी की ऐसी की तैसी, पकौड़े के साथ खट्टी-मीठी चटनी तो पेट सही ही सही।
अब राजनीति करने वालों देख लो तुम्हारे आका कितने ज्ञानवान हैं! जिस दिल्ली की बुनियाद ही चाट-पकौड़े पर पड़ी हो, वहाँ यह कहना कि पकौड़े बनाना भी कोई धंधा होता है, है ना बेवकूफी की पराकाष्ठा! लेकिन चुनाव आ गये हैं, ऐसे अक्ल के पैदल लोगों को जवाब देने का समय आ गया है। पकौड़े खाइए, पकौड़े को धंधा बनाइए और जो पकौड़ों की खिल्ली उड़ाए उसे लात मारिये। समझ गये ना। दिल्ली दिलवालों की ही है, दिलजलों की नहीं है। यमुनाजी का पानी पीना है तो पकौड़े खाना ही होगा। इस बार वोट पकौड़ों के नाम। 

Thursday, April 4, 2019

भेड़िये ने खाल उतार दी है

कल कांग्रेस का घोषणा पत्र घोषित हुआ, बहुत आलोचना हो रही है लेकिन मुझे नया कुछ नहीं लग रहा है। कांग्रेस की राजनीति स्पष्ट है, उनके समर्थक भी भलीभांति समझते हैं इसलिये ही दृढ़ता के साथ उनके पीछे खड़े रहते हैं। राजनीति का अर्थ होता है राज करने की नीति। एक राजनीति होती है – जनता को सुखी और सुरक्षित करने की और दूसरी होती है – स्वयं को सुखी और सुरक्षित करने की। पहली राजनीति लोकतांत्रिक होती है तो दूसरी राजाशाही की ओर इंगित करती है। कांग्रेस की राजनीति दूसरे प्रकार की रही है, स्वयं को सुखी और सुरक्षित करने की। लोकतंत्र में यदि आप राजाशाही घुसाना चाहोंगे तब आपको अपने लिये ऐसे लोगों की आवश्यकता हमेशा रहती है जो शक्तिशाली हों। गुण्डे, मवाली, अराजक तत्व आपके चहेते होने ही चाहिये जिससे आप किसी भी क्रान्ति को कुचल सकें। जैसे आपातकाल में किया गया था या फिर सिखों का नरसंहार कर किया गया था। भारत में लोकतंत्र है और लोकतंत्र में चुनाव होते हैं। अन्दर कैसा भी राजाशाही भेड़िया बैठा हो लेकिन लोकतंत्र में खाल तो भेड़ की ही पहननी पड़ती है। 2019 के चुनाव विस्मयकारी हैं, इस बार भेड़िये ने भेड़ की खाल नहीं पहनी, अपितु स्पष्ट ऐलान किया कि हम भेड़िये हैं और हम केवल स्वयं के लिये राज करना चाहते हैं। इससे पूर्व भी वे संकेत दे चुके थे जब देश के प्रधानमंत्री ने कहा कि मैं देश का चौकीदार हूँ तब काग्रेंस ने कहा था कि ये देश को चौकीदार देना चाहते हैं जबकि हम प्रधानमंत्री देना चाहते हैं। मतलब उनकी राजनीति स्पष्ट थी।
पूर्व के चुनावों में राहुल गाँधी कभी जनेऊ पहन रहे थे, कभी यज्ञ कर रहे थे लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं किया। बस सीधे केरल गये और वहाँ से उम्मीदवारी की घोषणा कर दी। अपनी पुरानी खाल को उतार फेंका। अपने समर्थकों को स्पष्ट ऐलान कर दिया कि हम राज करने आए हैं और राज करने में तुम्हारा भी हिस्सा होगा। इसलिये यदि तुम देश के टुकड़े करना चाहोगे तो तुम पर कोई कानूनी कार्यवाही नहीं होगी, यदि तुम देश के एक वर्ग को लूटना चाहोगे तो हमारी स्वीकृति होगी। वे सारे अधिकार दिये जाएंगे जो कभी लुटेरे शासक अपनी सेना को देते आए थे। जैसे ही कांग्रेस ने घोषणा पत्र जारी किया, अराजक तत्व और जिनकी मानसिकता सामान्य जनता पर राज करने की रहती है, वे सारे ही खुशी का इजहार करने लगे। उन्होंने भी अपने चोगे उतार डाले। चारों तरफ एक ही शोर मचा है कि राजा हम तुम्हारे साथ हैं, तुम्हें हम सुखी और सुरक्षित रखेंगे और तुम हमें रखना। यह गरीब जनता हमारी सेवा के लिये है, इसलिये राज करना आपका पुश्तैनी अधिकार है और साथ देना हमारा। पड़ोसी देशों को भी कहा गया कि आपको भी इच्छित प्रदेश मिल जाएगा बस हमारा साथ दो। इतना कहर मचा दो कि देश का प्रधानमंत्री का ध्यान चुनाव से हटकर देश की सुरक्षा की ओर लग जाए। सारे पहलवान अखाड़े में आ जुटे हैं, अपनी ताकत से जनता को गुलाम बनाने निकल पड़े हैं। ये कल तक भी यही कर रहे थे, बस कल तक इनके चेहरे पर लोकतंत्र का नकाब था लेकिन आज यह स्पष्ट घोषणा के साथ अखाड़े में उतर आए हैं। सारे देश के अराजक तत्व एकत्र हो जाओ। तुम हमें राजा बनाओ हम तुम्हें लूटने का अधिकार देंगे। सारा धन, सारा वैभव राजमहल में सीमित करने की घोषणा है। जिसने भी कल तक अपराध किये थे, वे सभी राजाशाही का हिस्सा होंगे, उनपर कोई कानून नहीं लागू होगा। सभी बुद्धिजीवी, कलाकार आदि को खुला निमंत्रण मिल गया है कि तुम हमारे चारण-भाट और हम तुम्हारें रक्षक बन जाएंगे। बस इस अफरा-तफरी के माहौल में कौन टुकड़ों पर मोहताज होना चाहेगा और कौन सर ऊँचा करके जीवन यापन करना चाहेगा, फैसला जनता को करना है। 

Wednesday, April 3, 2019

अब भगीरथ की बारी

टाटा स्काई और नेटफ्लेक्स ने समानान्तर फिल्में बनाकर अपनी दुनिया खड़ी की है। नेटफ्लेक्स का तो मुझे अनुभव नहीं है लेकिन टाटा स्काई की बॉलीवुड प्रीमियर को काफी दिनों से देख रही हूँ। छोटे बजट की छोटी फिल्में बना रहे हैं और कहानी भी हमारी जिन्दगी के आसपास ही घूमती है। परसो एक फिल्म आ रही थी, दस मिनट की ही देख पायी थी लेकिन शुरुआत में ही ऐसा कुछ था जो मेरे कान खड़े करने को बाध्य कर रहा था। माता-पिता को अपनी बेटी की चिन्ता है और उन्हें शक है कि आधुनिक चलन के कारण उनकी बेटी भी लेस्बियन जीवन तो नहीं जी रही है? बेटी बोलती है कि नहीं मेरा ऐसा कुछ नहीं है, माँ लेस्बियन का अर्थ नहीं समझ पाती है तो बेटी समझाती है कि गंगा को धरती पर लाने वाले भगीरथ थे ना! राजा सगर की दो पत्नियाँ थी और वे जो थी उसी की बात कह रही हूँ। माँ भगीरथ के नाम से ही श्रद्धा से गीत गाने लगती है और बेटी को भी गीत गाने को कहती है लेकिन ना माँ समझ पायी कि बेटी क्या कहना चाहती है और ना ही दर्शक समझ पाए होंगे कि धीरे से फिल्म निर्माता ने हमारे पुराण पर प्रहार कर दिया है। ऐसे प्रहार रोज ही किये जाते हैं, कभी हम समझ पाते हैं और कभी नहीं। लेकिन देखते ही देखते कथाएं नवीन स्वरूप लेने लगती हैं और नयी पीढ़ी को भ्रमित करने का सफल प्रयोग किया जाता है।
एक तरफ साहित्य हमें सभ्यता और संस्कृति से जोड़ता है वही फिल्मी साहित्य हमें फूहड़ता और असभ्यता से जोड़ने की ओर धकेल रहा है। गालियों का प्रयोग इतना भरपूर हो रहा है कि लगने लगा है कि हम किस दुनिया में आ गये हैं! गालियों का प्रभाव तो हम सोशल मिडिया पर देख ही रहे हैं, किसी एक ने गालियों का प्रयोग लेखन में किया और गाली-प्रिय लोग एकत्र होने लगे। देखते ही देखते गालीबाज लोग प्रसिद्ध होने लगे, उनकी देखादेखी दूसरे लोग भी गाली पर उतर आए। अब तो गालियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है, सभ्यता को तो हमने किनारे कर दिया है। नेटफ्लेक्स में भी गालियों की भरमार है और टाटा स्काई पर भी। कथानक हमारी जिन्दगी के हर पहलू को छू रहे हैं लेकिन असभ्य तरीके से, इनमें सौंदर्यबोध कहीं नहीं है। ऐसी फिल्मों पर समाज को दृष्टि रखनी होगी। मैं समझ सकती हूँ कि हमारे पुराणों ने सैकड़ों कहानियाँ दी है, हमारा इतिहास भी गौरव गाथाओं से भरा है और टीवी के भी सैकड़ों चैनल आ गये हैं। कौन सा चैनल कब किस चरित्र का चरित्र हनन कर दे, उन पर लगाम लगाना परिश्रम साध्य काम है। लेकिन यह हमें करना ही होगा। हम पहले भी बहुत कुछ बर्बाद कर चुके हैं, तब तो हम कह देते हैं कि हम गुलाम थे इसलिये ऐसा हुआ लेकिन आज तो स्वतंत्र हैं! हम जागरूक भी हैं तो क्यों नहीं अपने विवेक को जागृत करते हैं और ऐसा कुछ फिल्माया गया है तो उस पर निगाह रहे। मैंने केवल दस मिनट की फिल्म देखी थी, नाम भी कुछ अजीब सा था, दोबारा जरूर देखूंगी और फिर समझ पाऊंगी कि फिल्मकार क्या चाहता है? लेकिन यह तय है कि हमारे सीरियल और फिल्में धीरे से वार कर रही हैं, बहुत ही सोची-विचारी रणनीति के अनुरूप ऐसा हो रहा है। एक सीरियल आ रहा है चन्द्रगुप्त मौर्य – इसमें तो पुरातन इतिहास की धज्जियां उड़ा दी गयी है लेकिन समाज का कोई स्वर नहीं उठता है! हम लोग इस विषय में क्या कर सकते हैं, इस पर विचार आवश्यक है। कल तक राम और कृष्ण इनके निशाने पर थे आज गंगा को माँ और पवित्र नदी मानने के कारण भगीरथ पर प्रहार शुरू हुआ है, अभी केवल कंकर फेंका गया है, धीरे-धीरे हमारे पैरों से जमीन ही खिसका दी जाएगी। सावधान!

Saturday, March 30, 2019

अभी तोते आजाद हैं

फतेहसागर की पाल पर खड़े होकर आकाश में विचरते पक्षियों का कलरव सुनने का आनन्द अनूठा है, झुण्ड के झुण्ड पक्षी आते हैं और रात्रि विश्राम के स्थान पर चले जाते हैं। कल मैंने ध्यान से देखा, तोते ही तोते थे, हजारों की संख्या में तोते स्वतंत्र होकर उड़ रहे थे। हम तो सुनते आए थे कि तोता स्वतंत्र नहीं है! शायद अभी चुनाव के चलते तोते स्वतंत्र हो गये हैं। खैर गाड़ी उठायी और अपन भी चल दिये घर की ओर। रास्ते में पुलिसियाँ तोतों का झुण्ड, सड़क घेरकर खड़ा था। सघन तलाशी ली जा रही थी। मैंने पूछ लिया कि माजरा क्या है? पता लगा कि चुनाव है। चुनाव है तो तोते स्वतंत्र हैं, अपनी मर्जी और अपनी ताकत दिखा रहे हैं। अब तोतों की मर्जी चलेगी, गाडी की डिक्की खोलो, हुकम आया। कहीं नोटों की गड्डियाँ तो इधर-उधर नहीं हो रही है! मन ही मन विचार आया कि यदि देश में इतने तोते हैं तो यह जाते कहाँ हैं! रोज तो दिखायी नहीं देते, चुनाव के समय कैसे झुण्ड के झुण्ड दिखायी दे रहे हैं! आकाश में भी हजारों दौड़ रहे हैं और धरती पर भी! घर के नजदीक आ गये, वहाँ भी देखा तोतों ने पकड़-धकड़ मचायी हुई है। शायद यही मौका है, पैसा कमाने का। आदमी को स्वतंत्र छोड़ दो, पैसा कमा ही लेगा, पक्षी को भी स्वतंत्र छोड़ दो, पेट भर ही लेगा।
चुनाव भी क्या अजीब खेल है! भगवान को एक तरफ बिठा दिया जाता है, बस सारे मंत्री और संतरी ही न्याय करते हैं। भगवानों की ऐसी की तैसी करने के लिये चुनाव कारगर सिद्ध होते हैं। कल तक यस सर कहने वाला नौकरशाह, सर को उठाकर कोठरी में बन्द कर देता है, जैसे ही चुनाव खत्म, फिर से यस सर! चुनाव नहीं हुए मानो पतझड़ आ गयी, सारे पत्ते झड़कर ही दम लेंगे, सबको कचरे में जाना ही है। कल तक जो पेड़ पर राज करते थे आज जमीन पर पड़े हुए धूल खा रहे होते हैं। तोते भी पेड़ों से चुन-चुनकर इन पत्तों को नीचे धकेलते रहते हैं। मैंने आकाश में उड़ते तोते से पूछ लिया कि भाई लोगों कल तक कहाँ थे? आज अचानक ही कहाँ से अवतरित हो गए? उन्होंने अपनी गोल-गोल आँखे मटकायी और कहाँ कि बताएं क्या कि कहाँ थे? तुम्हें भी वहीं सीखचों के पीछे धकेल दें? तोबा-तोबा, नहीं पूछना जी। तुम्हारा खेल दो महिने का है फिर तुम्हें पिंजरे में ही रहना है, दिखा दो अपनी ताकत। लेकिन अभी तो आकाश में दौड़ लगाते, अपना वजूद तलाशते तोते आजादी से घूम रहे हैं, अच्छा लग रहा है।
धरती के भगवान नेतागण भी घूम-घूमकर अपनी प्रजा को घेरे में ले रहे हैं, कहीँ कोई दूसरे पाले में नहीं चले जाएं! देव और असुरों का संग्राम जारी है, बस यही बात समझ नहीं आ रही है कि देव कौन हैं और असुर कौन हैं? चारों तरफ से बाण ही बाण चल रहे हैं। कुछ लोग काम तो असुरों जैसा करते हैं लेकिन चुनाव की इस घड़ी में खुद को देवता बताते हैं। कल तक खुलकर गौ-माता को सरेआम काटकर खा रहे थे, आज तिलक लगाकर मन्दिरों में ढोक लगा रहे हैं! मतलब कि कोई भी असुर दिखना नहीं चाहता है! कभी-कभी लगता है कि चित्तौड़ में लाखों लोगों का कत्ल करने वाला अकबर तिलक लगाकर प्रजा के सम्मुख हाथ जोड़कर खड़ा है। हम सब जय-जयकार कर रहे हैं। अकबर महान है का जयघोष कर रहे हैं। कश्मीर में कंकर फेंकने की पवित्र रस्म जारी है और इस कंकर से घायल हुए फौजी को खदेड़ने की मुहिम भी जारी है। हम वहाँ भी जय-जयकार कर रहे हैं। लेकिन देव भी डटे हुए हैं, वे सतयुग की कल्पना को रूप देने में जुटे हैं। बस देखते रहिये कि देव जीतते हैं या असुर। तोतों का राजपाट भी देख लेते हैं, इनकी आकाश में उड़ान भी देख लेते हैं। तोतों का तो यह हाल है कि लोग कहने लगे हैं कि बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी! लेकिन अभी तो तोते की आजादी आनन्द दे रही है। 

Thursday, March 28, 2019

31 रूपये में क्या नहीं आता?


हाथ में टीवी का रिमोट होना ही महसूस करा देता है कि घर की सत्ता हमारे हाथ में है। कभी घर की दादी पूजा कर रही होती थी, पूजा की घण्टी बजाते-बजाते भी निर्देश देती थी कि बहू दूध देख लेना, कहीं उफन ना जाए, पोते को कहती कि बेटा जरा मेरा चश्मा पकड़ा जाना, फिर जोर से बेटे को आवाज लगाती कि जाते समय मेरी दवा लाना भूल मत जाना। दादी पूजा घर में है लेकिन पूरे घर का रिमोट उनके हाथ में है, सभी को हर पल चौकन्ना रखती थी। अब दादी वाले घर तो कम होते जा रहे हैं लेकिन मन बहलाने को रिमोट हाथ आ गया है, जैसे ही पतिदेव के हाथ लगता है, बटन दबते ही जाते हैं और जब तक 100-50 चैनल बदल लिये नहीं जाते तब तक समाचार देखना सम्भव नहीं होता। पतिदेव रिमोट से चैनल बदल रहे होते हैं और पत्नी अल्मारी में से साड़ियों को हाथों से सरका रही होती है, यह नहीं, यह भी नहीं! 10-20 को जब तक परे धकेल नहीं देती तब तक साड़ी का चयन नहीं होता। बच्चे खिलौनों में उलझे हैं, सारे ही खिलौने कमरे में फैले हैं, लेकिन मजा नहीं आ रहा और छोटा बच्चा रसोई में जा पहुँचता है, कटोरी-चम्मच को बजाने से जो आवाज आती है, बस वही उसका आनन्द है। ढेर सारी चीजों में से अपनी पसन्द चुनना हमारी आदत है। यदि चुनने का अधिकार नहीं मिला तो लगता है जीवन ही बेकार गया। किसी युवा को यदि 10-20 लड़कियाँ या लड़के देखने को नहीं मिलें हो तो वह कभी ना कभी कह ही देंगे कि जिन्दगी में हमने क्या किया! सब्जी वाले की दुकान जब तक सब्जी से भरी ना हो तो क्या खाक सब्जी खरीदने का आनन्द है!
इन दिनों ट्राई ने यह आनन्द छीन लिया है, कहते हैं कि जो चैनल देखने हो, बस उतने ही रखो और पैसे बचाने के मजे लो। हुआ यूँ कि कुछ बुजुर्गवारों ने कहा कि हम तो केवल दाल-रोटी ही खाते हैं, चपाती भी कम से कम होती जा रही हैं तो भला 56 भोगों वाली पूरी थाली के पैसे क्यों दें! दूसरे ने कहा कि सच कह रहे हो, मैं तो टीवी पर केवल समाचार ही देखता हूँ, तो भला 1000 चैनल के पैसे क्यों दूँ! पहुँच गये ट्राई के दरबार में, मुकदमा दर्ज करा दिया। न्याय तो पैरवी करने वाले के हिसाब से मिलता है, ट्राई ने कहा कि सच है आप पूरे पैसे क्यों देंगे! फरमान जारी हो गया कि जितने चैनल देखते हो, बस उतने का ही पैसा दो। बड़ा अच्छा लगा, सुनने में। अब दो दो-चार चैनल के ही पैसे देंगे। लेकिन यह क्या! जो रिमोट घुमाते थे, उनका तो खेल ही समाप्त हो गया! ऐसे लगने लगा जैसे बोईंग विमान की जगह हेलीकोप्टर में यात्रा कर रहे हों। अभी रिमोट हाथ में लिया ही था कि मन ही मन सोच रहे थे और निर्देश दे रहे थे कि बीबी – दाएं घूम, बीबी बाएं घूम, लेकिन चैलन तो वहीं अटक गया। अब घुमा लो अपनी अंगुलियों पर दुनिया को! सारा मिजाज ही ठण्डा पड़ गया। पति बड़बड़ा रहा है, पत्नी बड़बड़ा रही है, बच्चे भी बड़बड़ा रहे हैं कि हमने भूसें के ढेर में से सुई खोज ली है, ऐसा आनन्द ही समाप्त हो गया। माना कि अपने घर का ही खाना खाना है लेकिन आसपास के घरों में ताक-झांक करके खाने का आनन्द ही कुछ और है। ऐसा लग रहा है कि टीवी पुराने दूरदर्शन का डिब्बा हो गया। समाचार देख लो और कृषिदर्शन देख लो। एचडी चैनल लेते हैं तो एसडी नहीं ले सकते और एसडी भी ले लेते हैं तो बजट तो लिमिट से बाहर हो जाता है। देखना हमें चार ही है लेकिन भरी पूरी दुकान से ही सौदा खरीदेंगे ना! भाई ट्राई वालों हमारे रिमोट चलाने का आनन्द हमसे मत छीनो, हम तो इसी के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं। जैसे ही हमारे हाथ में भूले भटके से रिमोट आता था हम कहीं की महारानी बन जाते थे, हमें भी रिजेक्ट करने का और चयन करने का सुख मिल जाता था। लेकिन हाय! घर में ही पुस्तकालय बना रखा था, जब मन करता किताब उठाकर पढ़ लेते थे लेकिन अब कहा जा रहा है कि आप सीमित रूप से ही किताबें रख सकेंगे, कौन सी किताब छाटूं और कौन सी नहीं, समझ ही नहीं आ रहा है। छाँटना भी टेढ़ी खीर है, कोई कह रहा है कि 31 रूपये में क्या नहीं आता है? लेकिन जब 31 रूपये ढूंढते हैं तो कहीं नहीं मिलते। कभी सोनी में अच्छा सीरियल आ जाता है तो कभी जी पर, कभी कौन सी फिल्म किस पर आ जाएगी, कुछ कह नहीं सकते, तो भाई वाट लग गयी है हमारी तो। सबसे बड़ी वाट तो चैनल छांटने में लगी है, किस को छांटे और कैसे छांटे, किसी के पास सरल रास्ता हो तो बता दो नहीं तो हम पैसे भी देते जाएंगे और भूखे ही रह जाएंगे। हमें तो लग रहा है कि भूसे में से सुई ढूंढना जैसा काम हो गया है। सत्ता का सुख भी गया और सुई ढूंढने की मुसीबत सर पड़ी वो अलग।

Wednesday, March 27, 2019

हे मोदी! साँपों को सुड़क जा

घर में यदि छिपकली आ जाए तो हड़कम्प मच जाता है, मानो दुश्मन का सिपाही ही घर में घुस आया हो! कल ऐसा ही हुआ, हड़कम्प तो नहीं मचा क्योंकि बहादुर युवा पीढ़ी घर में नहीं है, बस हम ही पुरातनपंथी लोग रहते हैं। आजकल नूडल्स का बड़ा फैशन है और वह भी उसके खाने के तरीके का। बच्चे लोग एक नूडल लेते हैं और उसे लम्बा करके सीधे ही मुँह से खींचते हैं और सड़ाक से नूडल अन्दर हो जाती है। मोर को तो देखा ही होगा आप सभी ने, हमारे देश का राष्ट्रीय पक्षी भी है, बहुत ही कमसिन और हसीन होता है। लेकिन साँप को नूडल्स की तरह सीधे की सुड़क लेता है। छिपकली भी साँप प्रजाति की ही है और एक ही पूर्वज की वंशज है, तो वह भी मोर से क्या उसके पंख से भी डरकर भाग जाती है। कल यही हुआ, बाथरूम में एक छिपकली आ गयी। मैंने तत्काल बाजार की ओर प्रस्थान किया, मुझे मालूम था कि शहर में सूरजपोल चौराहे पर मोरपंख बिकते है। मोरपंख खरीदे और बाथरूम में लगाया, मैंने देखा कि छिपकली चुपचाप देख रही थी। लेकिन यह क्या! दो मिनट में ही छिपकली गायब! देखा मोरपंख की ताकत। केवल सुन्दरता के लिये ही मोर को राष्ट्रीय पक्षी नहीं घोषित किया था, यह आस्तीन के छिपे साँपों को भी सुड़ुक कर जाता है। छिपकली तो मोरपंख से ही भाग जाती है।
श्रीकृष्ण ने मोरपंख को धारण किया था, श्रीकृष्ण की शक्ति का तो पता ही है। आजकल लोग कहते हुए मिल जाएंगे कि मोदी ने साँपों के बिल में गर्म तैल डाल दिया है, साँप निकल-निकलकर भाग रहे हैं। मोरों को चारों तरफ तैनात कर दो, सारे साँप सुड़ुक! लेकिन कल ऐसा हुआ कि मेरे घर में तो छिपकली ही निकली लेकिन देश में मणिधारी साँप निकल आया। अफवाह उड़ी की हमारे पास मणिधारी साँप है, हम कितना भी धन-दौलत उगल सकते हैं। देश में चारों तरफ जनता के मोर तैनात हो चुके थे लेकिन मोरों को कहा गया कि हमारे पास मणिधारी साँप है। अब कल से ही मोर सोच में पड़े हैं कि इस साँप को छोड़ दें या इसे ही सुड़ुक कर जाएं! क्योंकि कोई और जाने या ना जाने, मोर तो जानता ही है कि मणिधारी साँप कुछ नहीं होता। लेकिन जनता तो ऐसे ही सपनों में जीती आयी है तो वह भी मणि के सपनों में खोने लगी है। सोने की मुर्गी हर घर में रोज सोने का अण्डा देगी तो भला किसका ईमान नहीं डोलेगा!
सात फण फैलाए, बगल में मणि दबाए, साँप का जलवा अब पूरे देश में दिखाया जाएगा, साँप के जहर से मत डरो, यह साँप तो धन-दौलत देने वाला है। यह बहुत ही शुभ साँप है, इसे हर घर में पनाह दो, इसका आह्वान करो, इसे दूध पिलाओ। अब मोरों को भगाने का काम होगा, साँपों को न्यौता जाएगा। बस देखना यह है कि कैसे मोदी इस साँप की मणि का सच जनता के सामने रखते हैं और साँप को विष रहित करते हैं? हर घर में साँप नहीं होंगे लेकिन कहीं उन्हीं के वंश की छिपकली होगी तो कहीं दूसरी प्रजाति होगी। हमने मोरपंख लगा लिये हैं, हम किसी मणि के भ्रम में नहीं है। हमें पता है कि साँप के पास कोई मणि नहीं है, है तो केवल विष है। यदि हम सजग नहीं हुए तो धन-दौलत की जगह विष पीना पड़ेगा। सावधान पार्थ! श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि मैंने ऐसे ही मोरपंख को धारण नहीं किया है! हे मोदी! तू भी मोरपंख का धारण कर और इन साँपों को सुड़क जा। 

चूहा भाग – बिल्ली आयी

खबरे आ रही हैं कि लोग भाग रहे हैं, जहाँ सींग समाए वहीं भाग रहे हैं। उत्तर से दक्षिण तक की दौड़ लगाने की योजना है, बस छिपने की जगह मिल जाए। चूहे के पीछे बिल्ली पड़ी है, बिल्ली झपट्टा मारने को तैयार है। चूहे के गाँव में पहले कभी बिल्ली नहीं आयी, चूहा निर्भीक होकर घूम रहा था, अचानक कि एक बिल्ली ने म्याऊँ-म्याऊँ का राग अलाप दिया, चूहे को लगा कि बिल में दुबकना ही ठीक है। लेकिन चूहा हमेशा दूसरे के खेत में ही कुतर-कुतर करता है, खुद का उसके पास कुछ नहीं है तो खेत ढूंढने के लिये दौड़ लगा रहा है। सुना है सुदूर दक्षिण में उसकी बिरादरी वालों की भरमार है तो अनाज मिलता रहेगा और वहाँ आसानी से फुदकता भी रहेगा। वहाँ भी पैर नहीं जमे तो समुद्र किनारे से भागना भी आसान रहेगा। लोग पूछने लगे हैं कि चौकीदार चोर है तो तू क्यों भाग रहा है! चौकीदार और चोर की बात छोड़ो, अभी तो बिल्ली पीछे दौड़ रही है, चूहा भागते-भागते हाँफ रहा है।
चौकीदार खम्ब गाड़कर खड़ा हो गया है, काशी में खम्ब गड़ा है, किसी की हिम्मत नहीं की चौकीदार की लाठी के पास भी पहुँच जाए। चोरों की टोली से कहा कि जाओ चौकीदार से मुकाबला करो, उसे भ्रमित करो और घुस जाओ घर के अन्दर। लेकिन सारे ही चोर पीछे हट गये कि अंगद का पैर उखाड़ने की हमारी औकात नहीं, किसी को खाँसी आ गयी और किसी को हाँसी आ गयी। सभी की माया दाँव पर लगी है तो ममता भी किनारे बैठ गयी है। चोरों का खानदानी कुनबा भी मारा-मारा फिर रहा है। कोई गंगाजी में डुबकी लगा रहा है तो कोई छिप-छिपकर हनुमान चालीसा पढ़ रहा है। जमानती चोर को डर है कि जमानत ही रद्द ना हो जाए। चारों तरफ शोर है, भागो – भागो – भागो। अरब सागर तक भागो।
एक चोर बोल रहा है कि यह चौकादार नहीं कोई तांत्रिक है, जादू-टोना कर दिया है सभी पर। कृष्ण बांसुरी बजा रहे हैं और उनके पीछे सारे चूहे सम्मोहित से जा रहे हैं और अपने आप समुद्र में गिर रहे हैं। कैसा अद्भुत दृश्य है! प्रमुख चौकीदार ने हर चौकी पर चौकीदार तैनात कर दिये हैं, फिर चाहे सीमा की चौकी हो या फिर थाणे की चौकी। चारों ओर चौकीदार ही चौकीदार दिख रहे हैं, चोर को घुसने की कहीं जगह नहीं मिल रही! चोरों की रानी ने नाव की सवारी कर ली कि गंगा मैया के सहारे से घर में घुस जाऊंगी, लेकिन कामयाबी नहीं मिली अब खुद चोरों का सरदार समुद्र किनारे से घुसपैठ करने की सोच रहा है। लोग बता रहे हैं कि वहाँ उसकी बिरादरी वालों का हुजूम है, जैसे-तैसे उसे घर में घुसा ही देंगे। कोई बात नहीं, घर में आने से क्या होगा, बिल्ली को वहाँ पर भी रहेगी! बहुत चोर-चोर खेल लिया तूने, अब खुद ही भागा-भागा फिर रहा है। अब सभी ताली बजा रहे हैं, कह रहे हैं कि भाग – भाग – भाग, देख तेरे पीछे बिल्ली आ रही है। अब देखना है कि कल तक चोर-सिपाही का खेल खेला जा रहा था लेकिन अब चूहे और बिल्ली का खेल बन गया है। बिल्ली ने चूहे को भगा दिया है, वह उसके बिल के पास आसन डालकर बैठ गयी है। गाँव वालो भी बिल्ली को दूध-मलाई खिला रहे हैं, कह रहे हैं कि इस चूहे ने हमारी फसल बर्बाद की है। सारे खेतों को खोद डाला है, सारा ही गाँव उजाड़ सा पड़ा है। देखते हैं कि इस चूहे-बिल्ली की लड़ाई में किस की जीत होती है, बस देखते रहिये इस भागमभाग का नतीजा क्या होगा! 

Saturday, March 23, 2019

मोदी ने वास्तव में बर्बाद कर दिया


दिल बार-बार रस्सी तोड़कर भागने की कोशिश कर रहा है, कभी कहता है कि यह लिख और कभी कहता है कि वह लिख! चारों तरफ विषय बिखरे पड़े हैं लेकिन सारी मशक्कत बेकार सी लग रही है। ऐसा लग रहा है जैसे किसी भरे पेट वाले के सामने भोजन परोसने का प्रयास किया जा रहा हो। राजनीति में लोग आकंठ डूबे हैं, चारों तरफ से एक ही आवाज आ रही है कि हमें "सबका साथ – सबका विकास" ही करना है। लेकिन दूसरी तरफ से एक आवाज और आ रही है कि हम तुम्हारे माई-बाप रहे हैं, हमें फिर से देश का माई-बाप बनाओ। लोग तराजू के पलड़े में झूल रहे हैं, माई-बाप के टुकड़ों पर पलें या सबका साथ-सबका विकास के साथ आत्मनिर्भर बने? एक मन करता है कि अजगर करे ना चाकरी, पंछी करे ना काज, दास मलूका कह गये, सबके दाता राम, इस बात पर चलकर माई-बाप के टुकड़ों पर पलने में क्या बुराई है! इस कहावत में राम की जगह अल्लाह लगाने को भी तैयार हैं, लेकिन मन के एक कोने से दबी सी आवाज आती है कि नहीं, मुझे स्वाभिमान के साथ जीना है। मन तभी चिंघाड़ता है कि नहीं होगी मुझ से ईमानदारी! मैं जन्म-जन्मान्तर से आकण्ठ बेईमानी में डूबा रहा हूँ, अब कौन भला मुझे ईमानदारी की रोटी की सीख दे रहा है! क्यों हिन्दुस्थान, पाकिस्तान किया जा रहा है? भला बेईमान को किसने रोका है, यह तो हर युग में फला-फूला है। क्या औरंगजेब के काल में हम बेईमान मर गये थे? मरते और टूटते तो पत्थर के भगवान है, औरंगजेब ने सारे ही भगवानों को नेस्तनाबूद कर दिया था लेकिन  हम जैसे बेईमानों और चाटुकारों को तो खूब इज्जत बख्शी थी। आप नहीं मान रहे हैं मेरी बात! क्या कह रहे हैं? आपको प्रमाण चाहिये! अभी देखा नहीं कि पाकिस्तान ने कैसे सिद्धू, अय्यर, राहुल जैसे चाटुकारों के लिये पलक-पाँवड़े बिछाये थे जबकि अपने जन्म के साथ ही उसका एक ही मंसूबा रहा है कि हिन्दुस्थान को मटियामेट करना है और अखण्ड पाकिस्तान का निर्माण करना है। भई वह पाकिस्तान ही बनाएगा ना! हमें क्या! हम तो जन्मजात बेईमान और चाटुकार लोग हैं, हमें तो वहाँ भी कठिनाई नहीं होगी, सच पूछो तो हमें यहाँ घुटन हो रही है। ईमानदारी से जीना हमें रास नहीं आ रहा है और सबसे खराब बात तो यह है कि गरीब आदमी भी हमारे सामने छाती चौड़ा करके खड़ा हो जाए यह तो हम देख ही नहीं सकते। सब कुछ बर्बाद कर दिया है मोदी ने। घोड़ों और गधों को बराबर करने का प्रयास किया जा रहा है। अब यदि सभी अपने  पैरों पर खड़े हो गये तो हमारी सेवा कौन करेगा?
सभी के बैंक अकाउण्ट खुलवा दिये, साहूकारों पर कितना जुर्म है! हम सदियों से भरपूर ब्याज लेकर इन्हें लूटते आये थे। हर गाँव में साहूकार यह सेवा देता रहा है, हमें ही जनता माई-बाप मानती रही है और आज कहा जा रहा है कि तुम अपने माई-बाप खुद ही हो! सबको एक कार्ड थमा दिया है, एक नाचीज की भी पहचान हो गयी, कल तक केवल हमारी ही पहचान थी! सबकुछ बर्बाद कर दिया मोदी ने। इतनी चमचमाती सड़कें भला कोई बनाता है क्या? हर गाँव वाले ने मोटर सायकिल ले ली! गरीबी हटाओ का नारा केवल दिया जाता है, वास्तव में कोई हटाता है क्या! सब कुछ बर्बाद कर दिया मोदी ने। क्या-क्या लिखूँ, कैसे लिखूं! कल तक मंहगाई का रोना रोकर जीतते आए थे, आलू-प्याज की कद्र ही नहीं रही! पेट्रोल भी बेभाव मारा गया! टमाटर का रोना पाकिस्तान को भेज दिया! पाकिस्तान के नाम से याद आया, अब हमारे सैनिक भी घुस जाते हैं और मार आते हैं, कबड्डी-कबड्डी का खेल रोज ही खेल आते हैं और जब वे कबड्डी बोलने की सोचते भी हैं तो सीमा रेखा पर ही दबोच लेते हैं। हम जनता को अब पाकिस्तान के नाम से भी डरा नहीं पा रहे हैं, हमने कई नेता पाकिस्तान में ही तैनात कर दिये, न जाने कितने पत्रकार उनकी भाषा बोलते-बोलते थक गये हैं लेकिन मोदी ने ऐसा बर्बाद किया है कि अब पाकिस्तान का नाम लेने से भी डर लगने लगा है। हमने न जाने कितने रिश्ते पक्के कर रखे थे, कितनी बेटियों के दामाद ढूंढ रखे थे लेकिन अब वहाँ कंगाली छायी है तो क्या करेंगे रिश्ता कर के! मोदी ने वास्तव में बर्बाद कर दिया।

Friday, March 22, 2019

देश का बागवां सशक्त है

सखी! चुनाव ऋतु आ गयी। अपने-अपने दरवाजे बन्द कर लो। आँधियां चलने वाली है, गुबार उड़ने वाले हैं। कहीं-कहीं रेत के भँवर बन जाएंगे, यदि इस भँवरजाल में फंस गये तो कठिनाई में फँस जाओंगे। पेड़ों से सूखे पत्ते अपने आप ही झड़ने लगेंगे। जिधर देखों उधर ही पेड़ पत्रविहीन हो जाएंगे। सड़के सूखे पत्तों से अटी रहेगी, चारों तरफ सांय-सांय की आवाजें आने लगेगी। पुष्प कहीं दिखायी नहीं देंगे, बस कांटों का ही साम्राज्य स्थापित होगा। इस ऋतु को देश में पतझड़ भी कहते हैं, लेकिन चुनाव की घोषणा के साथ ही देश में पतझड़ रूपी यह चुनाव-ऋतु सर्वत्र छाने लगती है। पेड़ रूपी राजनैतिक दल सारे ही पत्ते रूपी वस्त्र त्याग देते हैं, निर्वस्त्र हो जाते हैं। जिसने धारण कर रखे होते हैं, उनके भी दूसरे दल खींच लेते हैं। तू-तू, मैं-मैं का शोर हवाओं की सांय-सांय से भी तेज होने लगता है। आंधियों के वेग के कारण हवा किस ओर से बह रही है, भान ही नहीं होता। रेत के टीले उड़कर इधर से उधर चले जाते हैं, रातों-रात धरती का भूगोल बदल जाता है। लेकिन इस चुनाव ऋतु में मनुष्य घबराता नहीं है, उसे पता है कि पतझड़ के बाद ही नवीन कोपलें फूंटेंगी, बस वह उन्हीं का इंतजार करता है।
अपने-अपने पेड़ों पर सभी की दृष्टि टिकी होती है, सभी चाहते हैं कि हमारे पेड़ पर ज्यादा से ज्यादा पत्ते आएं और नवीन फूल खिलें। लेकिन आजकल का चलन विदेशी पेड़ लगाने का भी हो गया है, कुछ लोग बिना सुगन्ध के विदेशी फूल लगाने लगे हैं, उनकी पैरवी भी खूब करते हैं, उन्हें वे सुन्दर लगते हैं। अपने गुलाब को उखाड़कर विदेशी गुलाब लगाने का चलन हो गया है। लेकिन इस बार लोग सतर्क हो गये हैं। फूल लगेगा तो देशी ही लगेगा, लोग कहने लगे हैं। लेकिन देश में एक नहीं अनेक समस्याएं हैं। कोई कह रहा है कि गुलाब नहीं चमेली लगाओ, कोई कह रहा है कि मोगरा लगाओ, कोई रातरानी तो कोई सदाबहार के पक्ष में है। देश में जितनी गलियाँ हैं उतने ही फूल हैं। इस ऋतु में हर आदमी के पास अपना फूल है, कोई विदेशी फूल लिये खड़ा है तो कोई देशी। हम तो देख रहे हैं कि अपने आंगन में एक तुलसी की पौध ही लगा दें, बारह मास काम आएगा। पतझड़ में इसके पत्ते भी झड़ गये थे, हमने बीज बचाकर रख लिये थे, बस गमले में डाला और उगने लगे हैं अंकुर।
सखी! पतझड़ में अपना ध्यान रखना। किसी भँवरजाल में मत फंसना। यह पतझड़ बस कुछ दिन ही रहने वाली है, फिर तो चारों तरफ सारे ही रंग बिखरे होंगे। सखी! तुम यही भी पता नहीं कर पाओगी कि किस पेड़ पर कौन सा फल लगेगा, लोग कह देंगे कि मेरे पेड़ पर आम लगेगा, लेकिन तुम पूरी जानकारी रखना, इसके बाद ही विश्वास करना। मेरे घर के बाहर शहतूत का पेड़ है लेकिन उसमें बोगनवेलिया की बेल चढ़ जाती है, दूर से पता ही नहीं चलता कि पेड़ शहतूत का है। यहाँ बहुत सी बेलें अमरबेल बनकर चढ़ी दिखायी देंगी, उनसे भी सावधान रहना। चुन-चुनकर अपने बगीचे में सुगन्धित फूल ही लगाना। हमारे देश में खऱपतवार भी बहुत उग आयी है, इस ऋतु में लगे हाथ उन्हें भी उखाड़ बाहर करना। मैं तो निश्चिंत हूँ, मुझे पता है कि अभी देश का बागवां सशक्त है। उनका पेड़ बरगद का पेड़ बन चुका है, जहाँ बारहों मास हरियाली रहती है, फल लगते हैं और सारे ही पक्षी शरण पाते हैं। इसलिये मेरे घर के दरवाजे खुले हैं, मैं चैन की बंसी बजा रही हूँ, मुझे पता है कि कितना ही गुबार उठे लेकिन मेरा बागवां सब कुछ सम्भाल लेगा। मैं तो अभी से चिड़ियाओं की चहचहाट सुन रही हूँ, फूलों की अंगड़ाई देख रही हूँ और वातावरण में सर्वत्र फैल रही सुगन्ध को अपने अन्दर समेट रही हूँ। सखी! तुम भी निश्चिंत रहो, बस अपना कर्तव्य पूर्ण करते रहो। ये आंधियां तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगी।

Friday, March 8, 2019

महिला होना चाहती हूँ


हमारे पिता बड़े गर्व से कहते थे कि मेरी बेटियाँ नहीं हैं, बेटे ही हैं। हमारा लालन-पालन बेटों की ही तरह हुआ, ना हाथ में मेहँदी लगाने की छूट, ना घर के आंगन में रंगोली बनाने की छूट, ना सिलाई और ना ही कढ़ाई, बस केवल पढ़ाई। हम सारा दिन लड़कों की तरह खेलते-कूदते, क्रिकेट से लेकर कंचे तक खेलते और पढ़ाई करते। रसोई में घुसने का आग्रह भी नहीं था, बस खाना बनाना आना चाहिये, इतना भर ही था। मुझ से कहते कि तर्क में प्रवीण बनो, हम बन गये लेकिन हमारे अन्दर जो महिला बैठी थी उसका दम निकल गया। पिताजी ने नाम भी रख दिया था "अजित" लेकिन साथ में एक पुछल्ला भी जोड़ दिया था – दुलारी। मेरे बड़े भाई मुझे रोज उकसाते कि केवल अजित ही ठीक लगता है और एक दिन स्कूल बदलते समय मैंने पुछल्ला अपने नाम से हटा ही दिया। अपने अन्दर की महिला को दूर कर, मेरे कार्य पुरुषों से होने लगे। अपने निर्णय खुद लेना, स्वतंत्र होकर रहना अच्छा लगने लगा। लेकिन जिस महिला को पिताजी ने दूर किया था और हमने जिसे अंगीकार किया था, वही महिला रोज हमारे सामने आकर खड़ी हो जाती। जीवन संघर्षमय हो गया। हम पुरुषों के बीच धड़ल्ले से घुस जाते लेकिन थोड़ी देर में ही आभास होने लगता कि हम कुछ और हैं! लेकिन हम हार नहीं मानते। विवाह हुआ और गम्भीर समस्या में फंस गये, पत्नी रूप में महिला ने चुनौती दे डाली कि अब दूर करो मुझको। सबकुछ कर डाला, सारी जिम्मेदारी निभा डाली लेकिन महिला बनकर, सर झुकाकर नहीं रहना, सारी अच्छाइयों पर पानी फेर देता। महिला को क्या करना होता है, समझ ही नहीं आता रहा। कैसे साधारण पुरुष को महान माना जाता है, यह समझ ही नहीं आया। जिन्दगी का बहुत बड़ा पड़ाव पार कर लिया, सामाजिक क्षेत्र हो या साहित्य क्षेत्र, सभी में पिताजी के अनुरूप खुद को सिद्ध भी कर डाला लेकिन एक दिन एक जज ने फरमान सुना डाला, महिला को महिला की तरह, पुरुष की अनुगामिनी बनकर ही रहना होगा। तब समझ आया कि हमने क्या खो दिया था। जिस मरीचिका के पीछे पिताजी ने भगा दिया था और अपना स्वरूप भी भूल बैठे थे वह तो केवल मरीचिका ही है। तब खोजना शुरू हुआ खुद को, महिला के सुख को।
मैंने महिला पर नजर डालनी शुरू की, उसे उन्मुक्त होकर हँसते देखा, उसे निडर होकर सजते देखा, उसे बिना छिपे रोते देखा, फिर खुद पर नजर डाली। मैं ना हँस पा रही थी ना सज पा रही थी और ना ही रो पा रही थी। मैंने अपने अन्दर की महिला को आवाज दी, उसे बाहर निकालने का प्रयास किया, वह डरी हुई थी, सहमी हुई थी, झिझकी हुई थी। मैंने कहा कि डर मत, सहम मत, झिझक मत, खुलकर हँस, खुलकर सज और खुलकर रो। लेकिन महिला हारती रही, मैं प्रतिपल प्रयास करती हूँ, महिला को पाने का इंतजाम करती हूँ लेकिन फिर हार जाती हूँ। क्यों हार जाती हूँ? क्योंकि दोहरी जिन्दगी हमें हरा देती है, हम महिला होने का सुख और उसकी सुख पाने की जद्दोजेहद से खुद को जोड़ ही नहीं पाते। लेकिन आज महिला दिवस पर सच में मैं महिला होना चाहती हूँ। अपने को कमजोर बताकर रोना चाहती हूँ, अपने वैभव के लालच को बताकर साड़ी-जेवर में सिमटना चाहती हूँ, मैं कुछ नहीं हूँ कहकर केवल जीना चाहती हूँ। सच में, मैं महिला होने का सुख पाना चाहती हूँ। अपने पिताजी की इच्छा से परे केवल महिला होना चाहती हूँ। अपने चारों ओर फैल गये पुरुषों के साम्राज्य को धकेलना चाहती हूँ, महिलाओं के रनिवास में पैर रखना चाहती हूँ। मैं नासमझ बनना चाहती हूँ, जिससे कोई भी पुरुष आहत ना हो पाए। मुझे नहीं चाहिये निर्णय का अधिकार, बस जीने और रोने के अधिकार से ही खुश रहना चाहती हूँ। मैं बस महिला बनना चाहती हूँ।

Thursday, March 7, 2019

घर वापसी


कहावत है कि गंगा में बहुत पानी बह गया। हमारा मन भी कितने भटकाव के बाद लेखन के पानी का आचमन करने के लिये प्रकट हो ही गया। न जाने कितना कुछ गुजर गया! कुम्भ का महामिलन हो गया और सरहद पर महागदर हो गया। राजनैतिक उठापटक भी खूब हुआ और सामाजिक चिंतन भी नया रूप लेने लगा। कई लोग सोचते होंगे कि आखिर हम कहाँ गायब थे, क्या नीरो की तरह हम भी कहीं बांसुरी बजा रहे थे? या इस दुनिया की भीड़ में हमारा नाम कहीं खो गया था! लेकिन ना हम बांसुरी बजा रहे थे और ना ही अपने नाम को खोने दे रहे थे, बस मन को साध रहे थे। मन बड़ा विचित्र है, खुशी मिले तो वहीं रम जाता है और दुख मिले तो वहीं गोते खाने लगता है, जब समाज का ऐसा कोई रूप जो मन को झिंझोड़ कर रख देता है तो मन कुछ टूटता ही है और कभी ऐसा भी होता है कि मन अंधेरे में डूब जाना चाहता है। देश से लेकर अपने मन तक की उथल-पुथल को महसूस करती रही हूँ मैं। सब कुछ विभ्रम पैदा करने वाला है, सत्य को सात तालों के बीच छिपाने का जतन हो रहा है। जो सत्य है उसे भ्रम बताया जा रहा है और जो मृग-मरीचिका है उसके पीछे भागने को मजबूर किया जा रहा है। लोग धर्म के नाम पर अपने शरीर में बम बांधकर खुशा-खुशी मर रहे हैं कि उन्हें ऐसे किसी लोक में सारे काल्पनिक सुख मिलेंगे जो कभी किसी ने नहीं देखे! चारों तरफ मार-काट मची है, जितना मारोंगे उतना ही कल्पना-लोक के सपने दिखाये जा रहे हैं और लोग वास्तविकता से आँख मूंदकर मरने को तैयार बैठे हैं।
नासमझी हर मोर्चें पर झण्डे गाड़े बैठी है, मेरी सत्ता – मेरी सत्ता करते हुए लोग घर-परिवार से लेकर देश-दुनिया तक तबाह करने पर तुले हैं। पहले लोग आराधना करते थे, श्रेष्ठ आचरण करते थे कि श्रेष्ठ पुत्र हो और वह परिवार और राज्य पर श्रेष्ठ शासन करे लेकिन अब श्रेष्ठ को हटाने की मुहिम छिड़ी है। सुख के लिये पुरूषार्थ के स्थान पर दुख को न्यौता जा रहा है। सूर्य निकलता है और पृथ्वी के सारे रोग हर लेता है, रोग हरता है साथ ही शक्ति प्रदान करता है लेकिन अब लोग सूर्य की चाहत नहीं रखते, वे अंधेरे की कामना कर रहे हैं। खुद को शक्तिशाली बनाने के स्थान पर दूसरे की शक्ति के पक्षधर बन रहे हैं। हमने मान लिया है कि हम कमजोर हैं और हम किसी के अधीन रहने से ही सुखी हो सकते हैं। जैसे स्त्री खुद को कमजोर मान बैठी है और पुरुष के अधीन रहने में ही सुरक्षित महसूस करती है ऐसे ही कुछ लोग देश और समाज को पराधीन करने में ही सुख मान रहे हैं। आततायियों को खुला निमंत्रण दिया जा रहा है, उनका समर्थन हो रहा है, अपने रक्षकों के विरोध में लामबन्द होने का प्रयास किया जा रहा है। यही तो है सुख के स्थान पर दुख के लिये पुरुषार्थ करना।
अपने मन को टटोलने का प्रयास कर रही हूँ, कुछ सार्थक लिखना हो जाए, बस यही प्रयास है। बहुत दिनों बाद की-बोर्ड पर खट-खट की है, रफ्तार आगे ही बन पाएगी। शुरूआत के लिये इतना ही। लग रहा है जैसे घर वापसी हो रही है, अपने लोगों से मिल रही हूँ, अपने मन को परत दर परत खोल रही हूँ। जहाँ अपना मन खुल सके, वही तो अपने लोग और अपना घर होता है। मैं ही खुद का अपने घर में स्वागत कर लेती हूँ, पता नहीं कितने लोग भूल गये होंगे और कितने याद कर रहे होंगे। लेकिन अब क्रम जारी रहने का प्रयास रहेगा।

Friday, January 25, 2019

हुकूमत इनके खून में बहती है


यदि आप ध्यान से सुने और गौर करें तो टीवी के चैनल बदलते-बदलते न जाने कितने ऐसे बोल सुनाई दे जाएंगे जो आपको सोचने पर विवश करते हैं। कल ऐसा ही हुआ, टीवी से आवाज आयी – हुकूमत इनके खून में बहती है। तभी मेरे दिल ने कहा – गुलामी हमारे खून में बसती है। हमारे देश में कौन राजा होगा और कौन उसका सेवक बनेगा, यह भी हमारे खून में ही बहता रहता है। हमने राजवंशों को कितना ही दरकिनार किया हो लेकिन आज भी प्रजा उन्हें अपना मालिक मानती ही है। उनके दोष नहीं देखे जाते अपितु वे अनिवार्य सत्य होते हैं। इस देश में जिसने भी कहा कि मैं राजा हूँ, तुम्हारा शासक हूँ और उसी के अनुरूप अपना वैभव दिखाया बस प्रजा ने उसे ही अपना राजा मान लिया, लेकिन जिसने भी त्याग किया उसे सम्मान तो पूरा मिला लेकिन राजवंश के अधिकारी वे नहीं हुए। गांधी, पटेल, गोखले, राजेन्द्र प्रसाद आदि सैकड़ों नाम हैं। लेकिन नेहरू खानदान ने अपना वैभव कायम रखा और उन्हें राजवंशों की श्रेणी में रख लिया गया। हर ओर से यही आवाज आती रही कि हुकूमत इनके खून में बहती है। आपातकाल लगाना, सिक्खों का कत्लेआम करना, भ्रष्टाचार से अपनी तिजौरियाँ भर लेना जैसे अनगिनत काम करने पर भी उनपर अंगुली तक नहीं उठाना, उनके राजवंशी होने का प्रमाण है। जनता बस एक ही बात मानती है कि हुकूमत किसके खून में बहती है। अब तो साहित्यकार और इतिहासकार तक इसी सत्य को स्थापित करने में जुट गये हैं।
हम सबने इतिहास में यही पढ़ा था कि चन्द्रगुप्त मौर्य बचपन में एक गड़रिया था, उसकी विलक्षण बुद्धि को देखकर उसे चाणक्य ने अपना शिष्य बनाया और फिर मगध का राजा बनाया। लेकिन विगत कुछ सालों से टीवी पर यह सिद्ध करने का सफल प्रयास चल रहा है कि चन्द्रगुप्त गड़रिया नहीं था अपितु वह राजपुत्र था। कहने का तात्पर्य है कि हुकूमत इनके खून में बहती है, इसी बात को स्थापित किया जा रहा है। जिनके खून में हुकूमत है बस वही हुकूमत करने योग्य हैं। हमारे देश ने लोकतंत्र जब अपनाया तब चन्द्रगुप्त को आदर्श माना कि एक गड़रिये में भी राजा बनने के सारे गुण होते हैं। लेकिन जब इतिहास को ही बदलने का प्रयास किया जा रहा हो तब वर्तमान तो स्थापित स्वत: ही हो जाएगा। इसलिये तो बड़ी ही विद्रूपता से साथ कहा जाता है कि चायवाला हमारे देश का प्रधानमंत्री कैसे हो सकता है? यह तुम्हारा प्रधानमंत्री है, हमारा नहीं। यह सूट पहनता है तो चोर है, विदेश जाता है तो फरेबी है। हमारे खून में हुकूमत है, हम प्रधानमंत्री तक को संसद में भी चोर बोल देते हैं और हम पर कोई अंगुली भी नहीं उठा पाता!  
लेकिन देश की मानसिकता में फिर बदलाव आ गया, राजवंश के राजकुमार की हरकते राजवंशीय नहीं दिखायी दी और जनता मजबूरन उनके साथ खड़े रहने पर बाध्य होने लगी। भला राजा मंचों पर गाली देता हुआ, झूठ बोलता हुआ, चिल्लाता हुआ शोभा देता है! नहीं, कदापि नहीं, यह राजवंश के लक्षण ही नहीं हैं, लोकप्रियता में गिरावट आ गयी। अब फिर से राजवंशी तौर तरीके की तलाश शुरू की गयी और एक चेहरा मिल गया। चेहरा-मोहरा, हाव-भाव, सभी कुछ राजवंशी लगने लगा और जनता के सामने लाकर खड़ा कर दिया की यह लो, हमारा राजवंशी चेहरा, हुकूमत इनके खून में बहती है। हमने अपनी ओर देखा और कह उठे कि गुलामी हमारे खून में बसती है। इतिहास बदल दिया और सिद्ध कर दिया कि कोई भी सामान्य व्यक्ति हुकूमत के काबिल नहीं होता, बस राजवंशीय व्यक्ति ही हुकूमत के काबिल होता है। तुम चन्द्रगुप्त का उदाहरण दोंगे और हम इतिहास ही बदल देंगे। जिस कौम के पास अपने इतिहास को सुरक्षित रखने का भी माद्दा नहीं हो, वह कौम कैसे जीवित रह सकती है? वह तो गुलाम रहने योग्य ही होती है और उसके समक्ष तो किसी ने किसी राजवंशीय को ही लाकर खड़ा किया जाता रहेगा। जनता तुम्हारो कार्य से प्रभावित तो होगी लेकिन सर तो राजवंशीय के समक्ष ही झुकेगा। जनता को सिद्ध करना है कि वे लोकतंत्र में जी रहे हैं या फिर अभी भी राजवंश की गुलामी को ओढ़कर जी रहे हैं? हुकूमत इनके खून में बहती है इसे ही मान्यता मिलेगी या हमारे खून में गुलामी नहीं बहती, यह हम सिद्ध कर पाएंगे!

Saturday, January 19, 2019

हीन भावना से ग्रस्त हैं हम

कल मैंने एक आलेख लिखा था - पाई-पाई बचाते हैं और रत्ती-रत्ती मन को मारते हैं । हम भारतीयों का पैसे के प्रति ऐसा ही अनुराग है। लेकिन इसके मूल में हमारी हीन भावना है। दुनिया जब विज्ञान के माध्यम से नयी दुनिया में प्रवेश कर रही थी, तब हम पुरातन में ही उलझे थे। किसी भी परिवार का बच्चा अपने माता-पिता पर विश्वास नहीं करता, वह उन्हें पुरातन पंथी ही मानता है और हमेशा असंतुष्ट रहता है। परिवार में जो भी आधुनिक दिखता है, सभी बच्चों का झुकाव उसकी तरफ रहता है। अंग्रेज हमारे यहाँ आये, उनकी आधुनिकता और खुले विचारों के कारण युवा पीढ़ी उनकी कायल हो गयी। उन्होंने हमें गुलाम बनाया लेकिन हम आजतक भी उन्हें अपना आदर्श मानते हैं। हम कभी भी अंग्रेजों से घृणा नहीं कर पाए। उनकी भाषा, उनकी वेशभूषा, उनका खान-पान, उनका नाचना-गाना सभी कुछ हमारे लिये आकर्षण के केन्द्र रहे। वे जन्मदिन पर केक काटते हैं, हमारे हर बच्चे ने कहा कि मुझे केक ही काटना है। हवन करना, मन्दिर जाना, दान देना सभी कुछ पुरातनपंथी सोच हो गये और हमारे अन्दर हीनभावना को जन्म देने लगे। क्लब जाना फैशन हो गया, जो नहीं जा पाया वे हीन भावना का शिकार होने लगे। अंग्रेजी का ज्ञान विद्वता की निशानी बन गया और संस्कृत व हिन्दी या कोई भी स्थानीय भाषा पुरातन पंथी हो गयी। पति और पत्नी में आपस में हीन भावना हो गयी, बाप और बेटे में हीन भावना हो गयी, सास और बहु में हीन भावना हो गयी, मित्र मित्र में हीन भावना हो गयी, गुरु शिष्य में हीन भावना हो गयी। इन सारी हीन भावना को समाप्त करने के लिये पैसा ढाल बन गया। लोगों को लगा कि जिसके पास पैसा है, वह समाज में सम्मान पा लेता है, नहीं तो उसे उच्च शिक्षा, उच्च ज्ञान से गुजरना होता है।
पैसे से सम्मान खरीदने की होड़ लग गयी और कैसे भी पैसा आए, लोग इस बात में जुट गये। अपने गुणों को बढ़ाने का प्रयास नहीं हुआ बस प्रयास हुआ तो पैसा एकत्र करने का। लोग सरल मार्ग ढूंढने लगे पैसा एकत्र करने का, सट्टा, शेयर, ब्याज आदि ऐसे ही मार्ग थे। लोग काल्पनिक दुनिया में जीने लगे। पैसे से स्वाभिमान खरीदने की सोचने लगे, लेकिन पैसे से स्वाभिमान नहीं आता, स्वाभिमान तो आता है, अपने पर विश्वास कायम रखने में। हम जैसे भी हैं, हमारे पास मुठ्ठी भर ही ज्ञान है लेकिन इस मुठ्ठी भर ज्ञान से ही हम दुनिया में सुख पूर्वक रह लेंगे, यह सोच बिसरा दी। सूर्य के पास अपार प्रकाश है, लेकिन मैं एक अंजुली भर ही प्रकाश अपने पास संचित कर पाती हूँ, बस सभी को इतना ही मिलता है। मैं मुठ्ठी भर से खुश हूँ लेकिन दूसरा मुठ्ठी भर से खुश ना होकर दुखी है, बस यहीं हीन भावना घर करने लगती है और हम कृत्रिम तरीकों को अपनाने लगते हैं। हम भारतीय संतुष्ट हो ही नहीं पाते क्योंकि हमने खुशी के प्रतिमान खुद को देखकर नहीं बनाए अपितु दूसरों को देखकर बनाए हैं। जैसे ही सामने वाला हँसता हुआ दिखायी देता है, हमें लगता है कि यह खुश क्यों हैं? हम हँसना छोड़ देते हैं, खुश रहना छोड़ देते हैं, मानसिक अवसाद में घिर जाते हैं और असंतुष्टि का भाव इस कदर हावी हो जाता है कि किसी परिस्थिति में भी संतुष्ट नहीं हो पाते। बस सबकुछ बदलना चाहते हैं। हमारे देश के पास क्या नहीं है? हमारे युवा में ज्ञान भरा हुआ है, बुद्धिमत्ता की कमी नहीं है लेकिन हम हमेशा विदेश को बड़ा मानता है, उनके हर त्योहार को अपनाना चाहता है, उनकी भाषा, उनकी वेशभूषा, उनका खानपान, उनका आचरण, सबकुछ की नकल करना चाहते हैं, लेकिन जो अपना नहीं है, वह खुशी नहीं दे पाता। भारत में राजनैतिक अस्थिरता का भी यही कारण है, हीनभावना से ग्रसित समाज अच्छा होने पर सबसे ज्यादा विचलित होता है। भारतीयता उसे फूटी आँख नहीं सुहाती, उसे तो लगता है कि विदेशी ही अच्छे हैं, वे ही हमें नयेपन की ओर ले जाएंगे। ये भारतीय तो हमें शुद्ध सात्विक बना देंगे। भारत का गौरव लौट आएगा का अर्थ है कि हम पुराने युग जैसे हो जाएंगे। हमें मांसाहार, खुला यौनाचार, घर-परिवार को छोड़कर दुनिया नापने का शौक, भारतीय होने पर सम्भव नहीं होगा। बस हमें भ्रष्टाचार की भाषा समझ आने लगती है, दबंगई की भाषा समझ आने लगती है, पैसे की भाषा समझ आने लगती है। हम जनता को समझाने में सफल हो जाते हैं कि कौवा चला हंस की चाल, याने की हैं तो भारतीय और होड़ कर रहे हैं विदेश की। लोग कहने लगते हैं कि विकास-विकास सब फिजूल की बात हैं, हम भला उनका मुकाबला कर सकते हैं? हमें तो केवल पैसा चाहिये जिससे हम भी हमारे बच्चों को विदेश भेज सकें। हमारा बच्चा भी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ सके, हमारा बच्चा भी जन्मदिन पर केक काट सके, हमारा बच्चा भी क्लब में जा सके। हम खुद अंग्रेजों से बड़े बन सकते हैं, यह सोच हमारे अन्दर घुसती ही नहीं, बस उन जैसा बनने की ही होड़ में हम लगे रहते हैं। इसलिये कभी अटलजी फैल हो जाते हैं और अब मोदी को फैल करने पर हम सब उतारू हैं। क्योंकि हमारे सामने विदेशी विकल्प खड़ा है, ज्ञान शून्य होने पर भी विदेशी विकल्प हमारे मन में बसा है। जिसके भी ऊपर विदेश का ठप्पा लग जाता है वह हमारे लिये आराध्य हो जाता है। गाँधी, नेहरू विदेश का ठप्पा लगाकर हमारे बीच आए, बस फिर क्या था, वे हमारे आराध्य बन गये। इसलिये आज हम हीन भावना से ग्रसित होकर केवल संचय की ओर झुक रहे हैं। आगामी चुनाव की राह आसान नहीं है, क्योंकि हम हीन भावना से भरे हैं।

Thursday, January 17, 2019

पाई-पाई बचाते हैं और रत्ती-रत्ती मन को मारते हैं


कल ज्वैलर की दुकान पर खड़ी थी, छोटा-मोटा कुछ खरीदना था। मुझे जब कुछ खरीदना होता है तब मैं अपनी आवश्यकता देखती हूँ, भाव नहीं। मुझे लगता है कि भाव देखकर कुछ खरीदा ही नहीं जा सकता है। अपना सामान खरीदते हुए ऐसे ही सोने के आज के भाव पर बात आ गयी, क्योंकि सोने के भाव रोज ही घटते-बढ़ते रहते हैं। सेल्स-गर्ल ने एक मजेदार बात बतायी कि जब सोना सस्ता होता है तब हमारे यहाँ ग्राहकी कम होती है लेकिन जब सोना महंगा होता है तब ग्राहकी बढ़ जाती है। कारण है कि लोग सोचते हैं कि आज सस्ता हुआ है तो अभी और सस्ता होगा, इसलिये रूक जाओ लेकिन जब महंगा होने लगता है तब चिन्ता हो जाती है कि खरीद लो नहीं तो और महंगा हो जाएगा। एक हम जैसे  लोग हैं कि ना सस्ता देखते हैं और ना ही महंगा देखते हैं बस अपने मन की जरूरत देखते हैं। जब मन किया तब खरीद लो, दुनिया के भाव तो चढ़ते-उतरते ही रहते हैं लेकिन मन के भाव स्थिर रहने चाहिये। आज मन कर रहा है तो खरीद लो, मन की सुनने में ही सार है। कई बार लोग सेल में चीजे खऱीदते हैं और सस्ती के चक्कर में ना जाने कितनी बेकार की चीजें खरीद लाते हैं। मेरा मन तो हमेशा यही कहता है कि जब जरूरत हो और जितनी जरूरत हो उतना ही खऱीदो, ना भाव की चिन्ता करो और ना मुहुर्त की। भाव की चिन्ता करने पर हम कभी भी अपने मन को खुश नहीं रख पाते।
दुनिया पाई-पाई का हिसाब रखने से चलती है और मैं मन की मौज का हिसाब रखना चाहती हूँ। जो लोग भी पाई-पाई का हिसाब रखते हैं वे अक्सर महंगा ही खऱीदते हैं, जैसे मुझे सेल्स-गर्ल ने बताया कि हमारे यहाँ हर आदमी महंगे के डर से महंगे भाव में ही खऱीदता है। एक पुरानी बात याद आ गयी, जब बच्चे पढ़ ही रहे थे तब एक विवाह समारोह में जाने के लिये बिटिया को हवाई जहाज से जाना आवश्यक था क्योंकि उसकी परीक्षा थी। अब या तो परीक्षा ही दो या फिर विवाह में ही जाओ, लेकिन हवाई यात्रा से दोनों सम्भव हो रहा था। मैंने पतिदेव को समझाया कि अभी समय की मांग है कि हवाईजहाज का टिकट लिया जाए, क्योंकि यह समय लौटकर नहीं आएगा। आज इसे हम टिकट दिला रहे हैं और कल इसे हमारी जरूरत नहीं होगी। लेकिन यदि हमने आज नहीं दिलायी तो इसके मन की कसक हम ताजिन्दगी नहीं मिटा सकेंगे। इसलिये पैसे को मत देखो, केवल जरूरत और मन को देखो। लेकिन इस देश में लोग मन को मारे बैठे हैं, केवल पैसा ही उनकी प्रमुखता में है। प्याज के भाव बढ़ गये, पेट्रोल के भाव बढ़ गये तो उनका सबकुछ लुट गया, महिने में शायद 100-200 रू. अन्तर आया होगा लेकिन हमने ऐसा शोर मचाया कि ना जाने क्या हो गया! हमारा मन सबके सामने खुलकर बाहर आ गया कि हम केवल पैसे से ही संचालित होते हैं और फिर इस बात का जमकर फायदा उठाया गया। पैसा-पैसा कर-करके हमने खुद को पैसे का दास बना लिया। चारों तरफ एक ही बात की पैसा कैसे बटोरा जाए, लोगों ने लाखों-करोड़ों बटोरने शुरू कर दिये और सस्ते-महंगे के चक्कर में खर्च भी नहीं कर पाए। आज किसी भी वरिष्ठ नागरिक से पूछ लीजिए, वह यही कहेगा कि पैसा बहुत है, खर्च ही नहीं होता, यही छोड़कर जाना होगा। लेकिन पैसा एकत्र करने का मोह तब भी समाप्त नहीं होता। हमें रोजमर्रा की जरूरतों के लिये भी रोज ही संघर्ष करना पड़ता है, घर में समझाना पड़ता है कि मन की जरूरतें पूरी कर लो नहीं तो मन मर जाएगा और फिर हम भी मर जाएंगे। लेकिन हम पैसे को सहलाते रहते हैं और मन को मारते रहते हैं। ज्वैलर से लेकर आलू-प्याज तक वाला व्यापारी हमारे मन को जान चुका है, राजनैतिक दल जान चुके हैं कि हम केवल पैसे से ही संचालित होते हैं। बस तूफान खड़ा होता है और राजनीति बदल जाती है। सदियों से हमें चन्द चांदी के सिक्कों से खऱीदा गया है और हम पर राज किया है। हमने पैसे के लिये घर-परिवार सबको छोड़ दिया। हमारे सामने हरा नोट लहरा दिया जाता है और हमारा मन डोल जाता है। सारी दुनिया कहती है कि भारतीयों को गुलाम बनाना बहुत सरल है, बस उन्हें पैसा दिखाओ, वे बिक जाएंगे। पाई-पाई बचाते हैं और रत्ती-रत्ती मन को मारते हैं, सस्ता ढूंढते हैं और महंगे में सौदा खऱीदते हैं, यही हमारी नियति बनकर रह गयी है। कभी पैसे से इतर मन के भाव को देखना सीख लो, दुनिया अपनी सी लगेगी। लोग कहते हैं कि मोदी अच्छा कर रहा है लेकिन हमारी जमीन के भाव सस्ते हो गये हैं इसलिये मोदी के हटाना जरूरी है। हम यदि रिश्वत नहीं लेंगे तो हमारा रूआब कम हो जाएगा, इसलिये मोदी को हटाना जरूरी है, हम बिल काटकर देंगे तो टेक्स देना पड़ेगा, इसलिये मोदी को हटाना जरूरी है। न जाने कितने तर्क हैं जो हमने पैसे के कारण मोदी को हटाने के लिये गढ़ लिये हैं। हमारे भ्रष्टाचार पर आंच नहीं आए तो मोदी अच्छा है, हमारे सारे काम बेईमानी से हों लेकिन दुनिया ईमानदारी से चले तो मोदी अच्छा है, मुझे एक पैसा भी टेक्स में नहीं देना पड़े और देश अमेरिका जैसा वैभव युक्त बन जाए तो मोदी अच्छा है। भारतवासी पैसे के दास हैं, भारतवासी पैसे के लिये संतान का सौदा भी कर लेते हैं, भारतवासी आलू-प्याज के कारण सत्ता बदल देते हैं, ऐसे कितने ही सत्य दुनिया जानती है और व्यापार करती है। कब भाव बढ़ाने हैं और कब घटाने हैं, व्यापार जगत का व्यक्ति जानता है। हम पैसे को दिल में बसाकर रखते हैं और मन को मारते रहते हैं, यही पैसा वे चुपके से हमसे निकलवा लेते हैं और हमारा मन भी मार देते हैं और पैसा भी लूट लेते हैं।

Saturday, January 5, 2019

कष्ट के बाद ही सुख है


यदि मैं आप से पूछूं कि जिन्दगी के किस कार्य में सबसे बड़ा कष्ट है? तो आप दुनिया जहान का चक्कर कटा लेंगे अपने दीमाग को लेकिन यदि यही प्रश्न में किसी महिला से पूछूं तो झट से उत्तर दे देगी कि माँ बनने में ही सबसे बड़ा कष्ट है। अब यदि मैं पूछूं कि सबसे बड़ा सुख क्या है? तब भी वही बात होगी कि पुरुष का ध्यान कई सुखों की तरफ जाएगा लेकिन महिला खटाक से कहेगी कि माँ बनना ही सबसे बड़ा सुख है। जिस क्रिया में सबसे बड़ा कष्ट है उसी से होने वाली प्राप्ति में सबसे बड़ा सुख है। लेकिन हम यह बात भूलते जा रहे हैं, हमने इस सत्य को सदियों से भुलाना शुरू कर दिया था। जब भी हम पर कष्ट आया हमने सरल मार्ग चुन लिया, कष्ट से समझौता कर लिया। सदियों से देश पर संकट आते रहे हैं, लेकिन हमने संघर्ष के स्थान पर सुख का मार्ग चुन लिया। कभी हम बिना लड़े ही गुलाम बन गये, कभी हमने अपने धर्म को ही बेच दिया, कभी हमने अपनी बेटियों के बदले सुख का सौदा कर लिया। वर्तमान में नयी पीढ़ी ने देश ही छोड़ दिया। देश में कष्ट ही कष्ट हैं, यह कहकर दूसरे देश में शरण ले ली। जब हमने मातृत्व जैसा कष्ट ही नहीं उठाया तब हम मातृत्व का सुख कैसे पा सकेंगे? हम वास्तविक सुख से ही अनभिज्ञ हो गये। क्योंकि जितना कष्ट उठाओंगे उसके बाद ही जो सुख मिलेगा वह अमृत जैसा लगेगा।
समाज ने हमें एक अनुशासन में बांधा लेकिन हमने ना तो उस कष्ट को सहा और ना ही उसमें परिवर्तन के लिये संघर्ष किया बस पलायन कर लिया। सामूहिक परिवारों में अनेक कष्ट थे तो हमने सामूहिक परिवार तोड़ दिये और उस सुख से वंचित हो गये। फिर परिवारों में भी कष्ट लगने लगा तो परिवार तोड़ दिये, पति-पत्नी में कष्ट हुआ तो विवाह संस्था को तोड़ दिया। मातृत्व और पितृत्व की जिम्मेदारी से कष्ट हुआ तो लिंग भेद को तोड़ दिया। हम कष्टों से  भागते रहे लेकिन कष्ट तो प्रकृति का उपहार है, कष्ट हमारे साथ लगे रहे। अब यह स्थिति हो गयी है कि व्यक्ति अकेला खड़ा है, ना उसके पास देश बचा है, ना उसके पास समाज बचा है और ना उसके पास परिवार बचा है। अब तो जीवनसाथी भी नहीं बचा और ना बचे हैं बच्चे। चारों तरफ से संकटों में घिर गये हैं हम। कोई चिल्ला रहा है – देश बचाओ, कोई चिल्ला रहा है - धर्म बचाओ, कोई चिल्ला रहा है - समाज बचाओ, कोई चिल्ला रहा है - परिवार बचाओ। चारों तरफ चिल्ल पौ मची है लेकिन कोई भी महिला की तरह कष्ट को धारण करने को तैयार नहीं। सृष्टि को रचने के लिये महिला कितना कष्ट सहती है, यह समझने को भी कोई तैयार नहीं।
एक महिला संतान को जन्म देने के लिये कष्ट उठाती है, आप कहेंगे कि हाँ नौ माह कष्ट उठाती है। मैं कहूँगी कि आप यहीं पर गलत हैं। एक माँ जीवन देने के लिये लगभग 30 से 40 वर्ष लगातार कष्ट उठाती है। इस कष्ट के समय वह अकेली खड़ी होती है। उसके साथ हमदर्दी भी नहीं होती अपितु अस्पर्श्य का दंश उसके समक्ष खड़ा होता है। माँ बनने की प्रथम प्रक्रिया से वह जब गुजरती है तब उसे जो कष्ट सहना पड़ता है, वह कष्ट शायद ही किसी पुरुष ने कभी झेला हो! हर माह इसी कष्ट से लगातार 30-40 साल तक गुजरना पड़ता है तब जाकर वह सृजन करती है। सृजन का फल जब शिशु रूप में उसकी गोद में आता है तब संसार का सबसे बड़ा सुख उसे प्राप्त होता है और इस सुख को भी कोई भी पुरुष प्राप्त नहीं कर सकता।
इसलिये कष्ट तो जीवन का अनिवार्य अंग हैं, कष्ट से होकर ही सुख निकलता है। हमारे देशवासियों को कष्ट से डर लगने लगा है। हमने आसान रास्ते चुन लिये हैं। सत्ता के करीब रहने के आसान तरीके। इसके लिये मन के पोर-पोर को मारना पड़े तो मार देंगे लेकिन कष्टों भरे जीवन को कभी अंगीकार नहीं करेंगे। संघर्ष की ओर बढ़े सारे ही कदम राजनीति की ओर मुड़ जाते हैं, बस सत्ता मिल जाए तो सारे कष्ट दूर हो जाएं। महिला भी यही सोचने लगी है कि सृजन में बहुत कष्ट हैं, नहीं अब नवीन सृजन नहीं। समाज भी नवीन चिंतन से भाग रहा है और देश भी नये कलेवर के साथ खड़ा नहीं हो पा रहा है। सब कष्टों से डर गये हैं। मेरे ऊपर भी अभी सात दिन पहले एक डर हावी हुआ, दुनिया से कट गयी लेकिन फिर सुबह हुई और मैंने सोचा कि महिला हूँ तो कष्टों से क्या डरना? कष्टों को धारण कर लो फिर सुख का कोई मार्ग निकल ही जाएगा। चार साल पहले भी दुनिया ने मुझे ठोकर मारने का प्रयास किया था, मैंने भी ठोकर मार दी। पहले भी मैं 25 सालों से लिख रही थी लेकिन जब दुनिया ने कष्ट दिया तब मैंने अपने मन का, अपनी संवेदना का लिखना शुरू किया और मैं आप लोगों से जुड़ गयी। अब जो सुख मुझे मिल रहा है, वह जीवन का सबसे हसीन सुख है। कष्ट आते हैं, मैं प्यार से उन्हें अपनी झोली में भर लेती हूँ और निकल पड़ती हूँ नवीन सृजन की ओर, बस कष्ट कब सुख में बदल जाते हैं, मुझे भी पता नहीं लगता। आप भी सच्चे कष्ट से रूबरू होने की पहल कीजिये, आपको भी अपना देश मिलेगा, समाज मिलेगा, परिवार मिलेगा और जब अपना मिलेगा तो सच्चा सुख मिलेगा। राजनीति की ओर देखना ही सरल मार्ग की तलाश है, सरल मार्ग से कभी सृजन का सुख नहीं मिलता। उत्तिष्ठ भारत:।   

Thursday, January 3, 2019

यह लड़ाई है गड़रियों की ना की भेड़ों की


कभी हम यह गीत सुना करते थे – यह लड़ाई है दीये की और तूफान की, लेकिन मोदीजी ने कहा कि यह लड़ाई है महागठबंधन और जनता की। मैं पहली बार मोदी जी के कथन से इत्तेफाक नहीं रखती, क्योंकि भारत में जनता है ही नहीं! यहाँ तो भेड़ें हैं, जो अपने-अपने गड़रियों से संचालित होती हैं। गड़रिया जिस किसी कुएं में गिरने को कहता है, भेड़े लाइन बनाकर उस कुएं में कूद जाती हैं। देश का नम्बर एक गड़रिया है – धार्मिक नेता। एक धर्म के गड़रिये ने कहा कि महिला पुरुष के पैर की जूती है, पुरुष का अधिकार है कि उसे तलाक बोलकर घर से धक्का मारने का। गड़रिये की बात सारी भेड़ों ने मानी, यहाँ तक की महिला भेड़ों ने भी मानी और खुद के ही खिलाफ तख्ती लेकर खड़ी हो गयी कि हम वाकयी में पैर की जूती है, हम किसी भी कानून के बदलाव की पैरवी नहीं करते। दूसरे धर्म के गड़रिये ने कहा कि महिला अपवित्र है, उसे रसोई, बिस्तर, मन्दिर कहीं भी जाने का अधिकार नहीं है। महिला ने खुद स्वीकार किया कि हम अपवित्र हैं, हमें वाकयी में कोई अधिकार नहीं है। बहस अपवित्रता पर नहीं हुई, बहस हुई केवल महिला पर, बहस तलाक के कारण पर नहीं हुई, बहस हुई केवल महिला पर। इन गड़रियों के पास थोक की भेड़े एकत्र हो गयीं, मोदी जी कहते हैं कि ये भेड़ें लोकतंत्र की रक्षा करेंगी! भेड़ों का  भी कहीं लोकतंत्र है? ये भेड़ें तो गड़रियों की तान पर कुएं में गिरने को तैयार हो जाती हैं, इनके  पास ना लोकतंत्र हैं ना स्वयं का कोई तंत्र है।
देश में दूसरे गड़रिये हैं, जो जातिगत भेड़ों को एकत्र करते हैं। कुछ राजनैतिक गड़रिये ऐसे गड़रियों को समय-समय पर पैदा भी करते रहते हैं। ये गड़रिये अपनी भेड़ों से कहते हैं कि तुम्हारे गड़रिये शक्तिशाली होने चाहिये, इसके लिये इन्हें विशेष अधिकार मिलने चाहिये और सारी भेड़ें इन्हें शक्तिशाली बनाने में जुट जाती हैं। कहीं आरक्षण के नाम पर विशेष अधिकार मांगते हैं तो कभी विशेष दर्जा। अभी बीते 5-7 सालों में ऐसे ही कुछ गड़रियों को पैदा किया गया, जिसने जाति के नाम पर, भ्रष्टाचार के नाम पर अपनी-अपनी भेड़ों का झुण्ड बनाया। भेड़ें वहां भी नाक बहने वाली ही थी, बस गड़रियों की नयी खेप राजनैतिक सौदेबाजी करने के नये पैतरों के साथ उपस्थित थी। एक सबसे खतरनाक गड़रिया जो पहले से ही देश में जड़े जमाए बैठा था, वह नये कलेवर के साथ आ गया और उसका दायरा बढ़ गया। यह गड़रिया झूठ को सच और सच को झूठ बताकर समाचारों की मण्डी लगाने लगा, इसके प्रभाव में अच्छी-अच्छी भेड़ें आ गयी, मानो उनके लिये ये गड़रिये भगवान बन गये। शेष गड़रियों की दुकानें समय-समय पर ही खुलती लेकिन इनकी दुकान चौबीसों घण्टे खुली रहती, भेड़े आती, चरती और इनके ही खेत में मींगनी करके बहुमूल्य खाद देती। ऐसे ही अनेक गड़रिये इस देश में फल-फूल रहे हैं।
राजनेता क्या करता है? अभी तक यह होता आया है कि जिसके पास जितने गड़रिये, उसे ही सत्ता का सिंहासन मिल जाता था। मोदीजी ने कहा कि नहीं हम भेड़ों को ही जागृत करेंगे, कुछ भेड़ों ने मिमियांकर उनका समर्थन भी कर दिया लेकिन जैसे ही चुनाव आते गड़रिये लामबन्द हो जाते और अपनी-अपनी भेड़ों को हांककर ले जाते। मोदीजी ने सारी भेड़ों के लिये व्यवस्थाएं देनी शुरू की लेकिन भेड़ों को अच्छा रहना और अच्छा खाने की समझ नहीं थी, वे तो केवल गड़रिये की बंसी की आवाज ही पहचानती थी, बस जैसे ही बंसी बजती और भेड़े नरम-नरम घास छोड़कर भाग जातीं। अब तो यह हालात हो गये हैं कि नये-नये गड़रिये पैदा हो रहे हैं, कोई कहता है कि मेरे पास इतनी लाख भेड़े हैं तो कोई कहता है कि मेरे पास इतनी हजार भेड़े हैं, मुझे सुविधा दो, मुझे विशेष अधिकार दो, बस मेरी सारी भेड़ें तुम्हारे ही कुएं में आकर गिरेंगी। गड़रियों का गठबंधन बन रहा है। आपके गड़रियों का भी गठबंधन बना लीजिये, भेड़ों के भरोसे मत रहिये, ये खुद की भी नहीं होती। ये तो बस गड़रिये की ही होती हैं। भेड़ों के अधिकारों की बात मत करिये, क्योंकि इनको तो खुद ही नहीं पता कि इनके अधिकार क्या हैं! दुनिया में ऐसा कोई प्राणी है जो खुद के ही खुलाफ तख्ती लेकर खड़ा हो जाए! इसलिये गड़रियों को एकत्र कीजिए और जरूरत पड़ने पर नये पैदा कीजिये।