Monday, September 24, 2018

पाकिस्तान की ये सुन्दर लड़कियां क्या संदेश दे रही हैं?


अभी एशिया कप क्रिकेट हो रहा है, स्थान है संयुक्त अरब अमीरात। दुबई के प्रसिद्ध स्टेडियम पर मैच चल रहा है, कैमरामैन रह-रहकर पाकिस्तानी सुन्दर लड़कियों पर सभी का ध्यान खींचता है। लोग सी-सी कर उठते हैं, कोई कह रहा है कि ये हमारे मुल्क में क्यों नहीं हुई, कोई कह रहा है कि काश देश का विभाजन नहीं हुआ होता। मेरी भी दृष्टि गयी, लेकिन मेरी नजर सुन्दरता के साथ उनके पहनावे पर भी गयी। पाकिस्तानी लड़कियों में एक भी बुर्का पहने नहीं दिखायी दी अपितु आधुनिक वेश में ही वे थीं। लग ही नहीं रहा था कि हम दुबई जैसे शहर को देख रहे हैं, क्योंकि हमने तो सुना था कि लड़कियां यहाँ बुर्के में रहती हैं। खैर मुद्दा यह भी नहीं हैं मेरा। मुद्दा यह है कि पाकिस्तान, हिन्दुस्थान की मुस्लिम महिलाओं के लिये भी कानून बताता है और यहाँ के मुल्ला-मौलवी यह कहकर उसे स्वीकारते हैं कि ऐसा मुस्लिम धर्म में कहा है। कश्मीर में हम देखते हैं कि अलगाववादी नेताओं के बच्चे विदेश में पढ़ रहे हैं और कश्मीर के स्कूलों में उनके द्वारा ताले लगा दिये गये हैं। एक तरफ मुस्लिम समुदाय का वह वर्ग है जो सम्पूर्ण आधुनिकता के साथ रहता है, उनकी महिलाओं को सम्पूर्ण आजादी है, उनके बच्चे विदेश में पढ़ रहे हैं और दूसरी तरफ वह वर्ग है जिसे किसी भी प्रकार की आजादी नहीं है, उनके बच्चों की शिक्षा का अधिकार भी धर्म के नाम पर छीन लिया गया है। यदि इनका प्रतिशत निकालें तो शायद 10 और 90 प्रतिशत होगा।
ये 10 प्रतिशत शानोशौकत से रहने वाले लोग किसी धार्मिक बातों से बंधे हुए नहीं हैं, वे मानो स्वयं धर्म हैं लेकिन शेष 90 प्रतिशत लोगों के लिये सारी बंदिशें हैं। ऐसा नहीं है कि यह मुस्लिम समाज में ही हो रहा है, यह सभी वर्गों में हो रहा है। जो सम्पन्न हैं उनके लिये धर्म की कोई भी बंदिशें नहीं है लेकिन जो विपन्न है, उनके लिये सारी ही बंदिशें हैं। धर्म के पैरोकार इस तबके को डराकर रखता है, दोजख का वास्ता देता है और धर्म की आड़ में शोषण करता है। विपन्न वर्ग में भी अनजाना डर समाया हुआ है, वह भी डर की आड़ में शोषण का आदि हो गया है। अभी 150 साल पहले तक यूरोप में महिला चर्च से मुक्त नहीं थी, पादरी उसकी देह का शोषण करते थे इसलिये यूरोप में महिला मुक्ति का आन्दोलन चला। हालात यहाँ तक थी कि यदि कोई महिला चर्च के शोषण के खिलाफ आवाज उठाती थी तो उसे डायन घोषित कर दिया जाता था। यह डायन प्रथा हमारे देश में भी वहीं से आयी है। यूरोप में महिला संघर्ष को जीत मिली और महिला चर्च के शोषण से मुक्त हुई। अभी हाल ही में केरल में हुई ननों के साथ बलात्कार की घटना इस ओर इशारा करती है कि आज भी पादरी ननों को अपना शिकार बना रहे हैं और इसे धार्मिक कृत्य बताने की कोशिश कर रहे हैं।
सारी दुनिया में यह खेल चल रहा है, 10 प्रतिशत लोग निरंकुश हैं लेकिन शेष 90 प्रतिशत लोग धार्मिक गुलाम हैं। ये ही 10 प्रतिशत लोग दुनिया पर राज कर रहे हैं। वे पूर्ण स्वतंत्र लोग हैं इनपर दुनिया के किसी भी धर्म का कोई कानून लागू नहीं होता है, यह स्वयं कानून हैं। इसलिये इन लोगों को देखकर जनता को मुक्त होने की ओर कदम बढ़ाना चाहिये। जब पाकिस्तान की उन आधुनिक लड़कियों को पूर्ण स्वतंत्रता है तो शेष लड़कियों को क्यों नहीं? ये प्रश्न सभी को करना चाहिये। हम भी इन कर्मकाण्डों और आडम्बरों से जितना मुक्त होने की कोशिश करेंगे उतने ही उन्नत होते जाएंगे। हिम्मत जुटाइए और मुक्ति की ओर कदम बढ़ाइए। इस दुनिया के हर फूल को खिलने का अधिकार है तो दुनिया की हर लड़की को भी खिलने का अधिकार है, इसे पर्दे में रखकर अत्याचार करने का हमें कोई हक नहीं है।

Saturday, September 22, 2018

मोगली को मनुष्य बताने में गलत क्या है?

मोगली की कहानी तो आपको याद ही होगी, क्या कहा, ध्यान नहीं है! जंगल-जंगल पता चला है, चड्डी पहनके फूल खिला है, याद आ गयी ना। तो एक कहानी थी कि एक मनुष्य परिवार का बच्चा जंगल में गुम हो गया। भेड़ियों के झुण्ड को वह बच्चा मिलता है और वे उसे पालने का निश्यच करते हैं। बच्चा भेड़ियों के बीच बड़ा होने लगता है और बच्चा खुद को भी भेड़िया ही समझने लगता है। जंगल के शेर आदि दूसरे प्राणी जानते हैं कि यह मनुष्य का बच्चा है और हमेशा इस ताक में रहते हैं कि कब अवसर मिले और हम इसका शिकार कर लें लेकिन मोगली नहीं समझता की मैं मनुष्य का बच्चा हूँ। मोगली की भेड़िया माँ भी जानती है कि मोगली मनुष्य का बच्चा है लेकिन वह भी उसे नहीं बताती। एक दिन जंगल में एक मनुष्य जा पहुँचा, उसने मोगली को देखा और कहा कि अरे तुम मनुष्य के बच्चे हो और यहाँ भेड़ियों के बीच क्या कर रहे हो! मोगली कहता है कि नहीं मैं तो भेड़िया ही हूँ। मनुष्य उसे समझाने की कोशिश करता है कि देख तेरे दो हाथ और दो पैर हैं, मेरे जैसे। तू बोल सकता है, मेरे जैसे। मनुष्य उसे सबकुछ बताता है, लेकिन मोगली नहीं मानता। तभी भेड़िये भी आ जाते हैं और मोगली को समझने नहीं देते। मनुष्य कहता है कि देख मैं तुझे बता रहा हूँ कि तू मेरे जैसा है, तेरे पिता और मैं एक जैसे ही हैं। तू हिंसक नहीं है, इन भेड़ियों की तरह शिकार नहीं कर सकता। तू मेरे साथ शहर में चल। मोगली कहता है कि नहीं, मैं तुम्हारे साथ नहीं जाऊंगा क्योंकि मुझे पता है कि मनुष्य बहुत खतरनाक होता है और तुम मुझे भी मार दोगे। मनुष्य उसे फिर समझाने की कोशिश करता है कि मैं यदि तुझे मार दूंगा याने मनुष्य होकर मनुष्य को मार दूंगा तो मैं मनुष्य कैसे रहूंगा? मैं भी फिर भेड़िया ही बन जाऊंगा ना! 
मोगली ने उसकी बात ध्यान से सुनी और भेड़ियों की तरफ देखा, भेड़ियों ने कहा कि तू इसकी बात में मत आ, यह मनुष्य बहुत खतरनाक होते हैं। तुझे अवश्य मार देंगे। हम सब मिलकर इन्हें मारेंगे और सबके डर को समाप्त करेंगे, तू हमारे साथ ही रह। जब मोगली भेड़ियों के साथ जाने लगा तो मनुष्य ने कहा कि देख मैं तुझे फिर कह रहा हूँ कि तू मनुष्य है यदि तूने मेरी बात नहीं मानी और इन भेड़ियों के साथ मिलकर मनुष्यों को समाप्त करने के सपने देंखे तो फिर मैं इन भेड़ियों को तो समाप्त करूंगा तुझे फिर समझ आएगा कि तू वास्तव में क्या है। यह कहकर मनुष्य शहर में लौट गया। जंगल में सन्नाटा छा गया, मोगली क्या शहर लौट जाएगा? यह प्रश्न हर प्राणी की जुबान पर था। शहर में भी हलचल मच गयी कि मोगली को यह मनुष्य अपने जैसा कहकर आया है, जबकि अब वह हमारे जैसा रहा ही नहीं। लोगों में डर बैठ गया, चारों तरफ चर्चा होने लगी कि आखिर मोगली हमारे जैसे कैसे है! कैसे मनुष्य ने कहा कि इसको मारने से मनुष्यत्व समाप्त हो जाएगा। यह तो हम मनुष्यों के साथ सरासर अन्याय है। हम बरसों से भेड़ियों का आतंक झेलते रहे हैं और अब यह मनुष्य मोगली को कहकर आया है कि तुम हमारे जैसे हो! नहीं यह हो नहीं सकता, हम मनुष्य को ऐसा नहीं करने देंगे। जंगल में चर्चा थी कि यदि मोगली चले गया तो हम भेड़ियों का यह दावा खारिज हो जाएगा कि मनुष्य सब पर अत्याचार करता है इसलिये हम इसका शिकार करते हैं। उधर शहर में यह चिंता थी कि मोगली यहाँ आ गया तो वह हमारे साथ रहकर हमें मारेगा, आखिर वह भेड़िया ही तो है।
आज यदि हम कहें कि ऐसे लोग जिनके और हमारे पूर्वज एक थे, साथ आ जाओ और देश को सुंदर बनाने में सहयोगी बन जाओ तो क्या गलत है? यदि कोई भेड़ियों के साथ रह रहे मोगली को कहे कि तुम हमारे जैसे ही मनुष्य हो तो क्या गलत है? भेड़ियों ने मोगली को कहा कि तुम हमारे जैसे हो इसलिये इंसान का खून करो लेकिन यदि मनुष्य कह रहा है कि नहीं मोगली तुम मेरे जैसे हो तो क्या गलत है? शहर के सभ्य लोगों समझों उस मनुष्य की बात जो मोगली को मनुष्य बताकर उसकी हिंसा समाप्त करना चाहता है, उसे देश निर्माण में भागीदार बनाना चाहता है। हमेशा की हिंसा और रक्तपात को मिटाना चाहता है तो गलत क्या है?

Thursday, September 20, 2018

स्वयंसेवक स्वयंभू संघ बन गया


एक युग पहले हम सुना करते थे कि आचार्य रजनीश ने स्वयं को भगवान माना। सदी बदल गयी तो हमारे लिये युग बदल गया। फिर भगवान घोषित होने और करने का सिलसिला शुरू हो गया। कहीं खुद भगवान बन जाते तो कहीं शिष्य भगवान घोषित कर देते। आखिर भगवान क्यों बनना? हमने सर्व गुण सम्पन्न भगवान को माना है, यह चमत्कारी भी है, कुछ भी कर सकता है। इसलिये जब किसी को समाज में प्रतिष्ठित करना होता है तब हम उसे भगवान घोषित कर देते हैं, याने इससे ऊपर कोई नहीं, यह श्रद्धा का केन्द्र है। भगवान घोषित होते ही उनकी सारी बाते सर्वमान्य होने लगती हैं और उनकी शिष्य परम्परा में तेजी से वृद्धि होती है। तीन दिन से चली आ रही व्याख्यानमाला को सुनने के बाद, जिज्ञासा समाधान को भी सुनने के बाद और माननीय भागवत जी के समापन उद्बोधन सुनने के बाद मैं एक नतीजे पर पहुँची हूँ कि जैसे समाज में किसी को भी भगवान घोषित करने की परम्परा है वैसे ही समाज ने या स्वयं ने, संघ के किसी भी स्वयंसेवक को संघ घोषित करने की परम्परा है। संघ में एक कार्यकर्ता है जो उनका डिग्री कोर्स करता है और उनके ही विश्वविद्यालय में शिक्षक बन जाता है, उसे प्रचारक कहते हैं। एक कार्यकर्ता है जो वहाँ से शिक्षा लेता है और स्वयं का अधिष्ठान खोल लेता है, उसे उसी विश्वविद्यालय का अंग मानते हुए सम्पूर्ण स्वतंत्रता मिलती है। एक अन्य कार्यकर्ता है जो कभी शाखा में जाता है, कभी ड्राप आउट हो जाता है, लेकिन स्वयं को स्वयंसेवक कहता है।
हमारे समाज की परम्परा अनुसार हम इन्हें भगवान तो नहीं कहते लेकिन इन्हें संघ कह देते हैं। जब भी कोई बात आती है, हम कहते हैं कि संघ की यह इच्छा है। जब प्रश्न किया जाता है कि कौन है संघ, तो इन प्रभावशाली व्यक्तियों पर इशारा कर दिया जाता है। समाज इन्हें साक्षात संघ मान लेता है। जैसा की माननीय भागवत जी ने कहा कि संघ की विचारधारा समय के अनुरूप परिवर्तनशील है लेकिन उसका मूल बिन्दू राष्ट्रहित ही है। राष्ट्रहित में अनेक बार हिन्दुत्व में बदलाव किया गया है तो हम भी बदलाव करते हैं। अत: जब किसी भी व्यक्ति विशेष को संघ कह दिया जाता है तब उसकी प्रत्येक बात संघ की बात घोषित हो जाती है। उसका आचरण संघ का आचरण बन जाता है। हम अक्सर समाज में सुनते हैं कि संघ के लोग ऐसे होते हैं, वैसे होते हैं। जब एक प्रकार का विचार और आचरण प्रमुखता से परिलक्षित होने लगे तो मान्यता प्रगाढ़ हो जाती है। आज समाज में जो भ्रम और शंका की स्थिति बनी है वह इसी कारण से बनी है। संघ का ड्राप आउट स्वयंसेवक भी जब स्वयं को संघ कहने लगे तो स्थिति विकराल होने लगती है। यह स्थिति गम्भीर इसकारण भी हो गयी कि सोशलमिडिया की स्लेट हमें मिल गयी। जिस किसी के मन में आया उसने वह बात लिख दी। उसका खंडन करने वाला कोई नहीं तो वह बात भी संघ की मान ली गयी। जिन स्वयंसेवकों के विभिन्न क्षेत्रों में अधिष्ठान चल रहे हैं वे भी अपने अधिष्ठान की बढ़ोतरी के लिये स्वयं को संघ कहने लगे। वे नियंत्रण में रहें इसके लिये संघ ने संगठन मंत्री भी दिये लेकिन उसका भी कोई परिणाम नहीं निकला, क्योंकि उन संगठन मंत्री को भी स्वयं को संघ कहलाने में आनन्द आने लगा। समाज में भ्रम बढ़ते गये और संघ के विरोधी इन भ्रमों को हवा देते रहे और स्वयं को संघ घोषित किये हुए लोग वास्तविकता से दूर बने रहे। आज विकट स्थिति बन गयी है क्योंकि स्वयंभू घोषित संघ ने मनमाने प्रतिमान गढ़ लिये, उनके शिष्यों ने भी पत्थर की लकीर मानकर उनका अनुसरण किया लेकिन जब आज स्वयं माननीय भागवत जी ने कहा कि हम सब केवल स्वयंसेवक हैं और संघ विचार हिन्दुत्व की तरह परिवर्तनशील है, तब सामान्य व्यक्ति बगले झांकने लगा है। हम किसको सच माने, वह पूछ रहा है? राजनीति क्षेत्र की तो हालत ही पतली कर दी गयी, किसी भी राजनेता के खिलाफ फतवा जारी कर दिया गया कि यह संघ की मर्जी है। कार्यकर्ता दो भागों में बंट गये, एक सरेआम शोर मचाने लगे कि हटाओ-हटाओ और दूसरा कहने लगा कि यह अन्याय है। ऐसा ही वातावरण प्रत्येक अधिष्ठान में होने लगा, किसी को भी जब मन में आया निकालकर बाहर कर दिया गया, संघ की इच्छा के विरोध में भला कौन बोले? इसलिये यह तीन दिन की व्याख्यानमाला समाज के लिये हितकारी रही। स्वयं में संघ बने व्यक्तियों से संघ को कैसे बचाया जाए, अब यह प्रश्न विचारणीय होना चाहिये।
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Tuesday, September 18, 2018

हमारे मन में बसा है राजतंत्र


वाह रे लोकतंत्र! तू कहने को तो जनता के मन में बसता है लेकिन आज भी जनता तुझे अपना नहीं मानती! उसके दिल में तो आज भी रह-रहकर राजतंत्र हिलोरे मारता है। मेरे सामने एक विद्वान खड़े हैं, उनके बचपन को मैंने देखा है, मेरे मुँह से तत्काल निकलेगा कि अरे तू! तू कैसे बन गया बे विद्वान! तू तो बचपन में नाक पौछता रहता था। यह है आम आदमी की कहानी। लेकिन यदि मेरे समक्ष कोई खास आदमी लकदक करता खड़ा हो तो उसे कभी नहीं कहेंगे कि तू  बचपन में कैसा था। बचपन में नाक उसके भी बहती होगी लेकिन वह खास था तो खास बनने के लिये ही पैदा हुआ है। हाँ ऐसा जरूर हुआ होगा कि कोई अध-पगला सा बच्चा आपके सामने बड़ा हुआ हो और जवानी में किसी उच्च पद पर होकर जब आपके सामने आ खड़ा हो, और सब उसे स्वीकार भी कर रहे हों! यह है हमारे मन में बसा राजतंत्र। मुझसे तो यह प्रश्न न जाने कितनी बार किया गया है कि तुम भला लेखक कैसे! ना कोई अपना और ना ही कोई पराया मानने का तैयार है! क्योंकि मैं खानदानी नहीं! लेकिन इसके विपरीत जो विरासत में लेखक की संतान है वह चाहे कखग नहीं लिख सकें लेकिन उनसे कोई प्रश्न नहीं होता!
इसलिये मैं कहती हूँ कि लोकतंत्र को जड़े जमाने में बहुत समय लगेगा। अभी राजतंत्र की जड़े अपना वर्चस्व बनाए हुए हैं। 90 प्रतिशत आम जनता को कोई मानने को ही तैयार नहीं है, बस हमारे मन में तो 10 प्रतिशत खास लोग ही बिराजे हैं। लोकतंत्र जिनके लिये हैं वे भी राजतंत्र से ग्रसित हैं, वे भी कहते हैं कि इसका बचपन तो हम देखी रहे। इसलिये आज लोकतंत्र को भी राजतंत्र का चोला पहनना पड़ता है। जैसे ही आम आदमी खास हुआ नहीं कि वह हमारे गले उतर जाता है। लालू यादव, मुलायम सिंह, मायावती इसी लोकतंत्र का चेहरा रहे हैं लेकिन जब इनने राजतंत्र का चोला पहना तो गरीब-गुरबा को कोई आपत्ति नहीं हुई अपितु अब वे सर्वमान्य हो गये। इनका भ्रष्टाचार इनके राजतंत्र में शामिल हो गया। राजीव गांधी से लेकर राहुल तक आज सर्वमान्य बने हुए हैं क्योंकि वे राजतंत्र का चेहरा हैं। उनके किसी कृतित्व पर कोई चिन्तन या बहस नहीं होती, वे सर्वमान्य हैं लेकिन लोकतंत्र की जड़ों से उपजे मोदी पर बहस होती है। क्या मोदी राजपुरुष की तरह सर्वगुण सम्पन्न हैं? उनकी छोटी से छोटी बात पर भी प्रश्न खड़े होते हैं। आज लोग उनसे प्रश्न कर रहे हैं कि यह कैसा लोकतंत्र है आपका, जो हमें कानून के दायरे में रखता है! हम सदियों से कभी कानून के दायरे में नहीं रहे! हमारा हर शब्द ही कानून था। चारों तरफ कोलाहल है, कोई कह रहा है कि स्त्री को पैर की जूती समझना हमारा अधिकार है, आप कैसे कानून ला सकते हैं कि हम किसको रखे और किसको छोड़े! कोई कह रहा है कि हम उच्च कुलीन हैं, हम किसी को भी दुत्कारें, यह सदियों से हमारा अधिकार रहा है, हमें कानून के दायरे में कैसे रखा जा सकता है! कोई कह रहा है कि हम क्षत्रीय हैं, हमें राजकाज से कैसे दूर किया जा सकता है। लोग कह रहे हैं कि यह सारे कानून पहले से ही थे तो आज प्रश्न क्यों? पहले जब कानून बने थे तब राजतंत्र के व्यक्ति ने बनाये थे लेकिन आज इस लोकतंत्र के व्यक्ति की हिम्मत कैसे हो गयी जो हमारे खिलाफ कानून को समर्थन दे डाला।
ये है हमारे दिल और दीमाग की कहानी, जिसमें आज भी राजा और रानी ही हैं। उनका अधपगले बेटे को हम राजा मानते हैं लेकिन तैनाली राम जैसे प्रबुद्ध व्यक्ति को हमारा मन नेता मानता ही नहीं। मेरे तैनाली राम लिखने से भी प्रश्न खड़े हो जाएंगे, आपने तैनाली राम से तुलना कैसे कर दी? किसी भी लोकतंत्र से निकले व्यक्ति की तुलना नहीं, बस उदारहण के रूप में किसी महापुरुष से कर दो, फिर देखो, कैसा बवाल मचता है! उन्हें यह पता नहीं कि वह महापुरुष भी जरूरी नहीं कि किसी राजतंत्र का हिस्सा ही हों। लेकिन बेचारे साधारण परिवार से आए व्यक्ति को किसी उदाहरण में भी जगह नहीं है। इसलिये मोदीजी कह देते हैं कि वे नामदार है और हम कामदार हैं। हे! खास वर्ग के लोगों, जागो, लोकतंत्र आपके दरवाजे पर दस्तक दे रहा है, आपको भी इसी लोकतंत्र का हिस्सा बनना ही होगा अब दुनिया से राजतंत्र विदा लेने लगा है तो आपके मन से भी कर दो नहीं तो कठिनाई आपको ही होगी। लोकतंत्र में हम जैसे लोग तो लेखक भी बन जाएंगे और मोदी जैसे लोग प्रधानमंत्री भी बनेंगे, आपके घर की महिला अब पैर की जूती नहीं रहेगी और ना ही आपके घर का चाकर आपके चरणों की धूल बनकर रहेगा। जिन भी देशों ने राजतंत्र को अपने दिलों से विदा किया है, वे आज सर्वाधिक विकसित हैं। अमेरिका इसका उदाहरण है। तो आप भी विदा कर दो इस राजतंत्र को।
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Saturday, September 15, 2018

कहीं दीप जलेंगे – कही दिल


साँप-छछून्दर की दशा, मुहावरा तो आपने सुना ही होगा। एक साँप ने छछून्दर पकड़ लिया, अब यदि साँप छछून्दर को निगल लेता है तो वह अंधा हो जाता है और उगलना उसके वश में नहीं। मैंने इस मुहावरे का उल्लेख क्यों किया है, यह बताती हूँ। परसो मोदी जी अपने कार्यकर्ताओं से बात कर रहे थे। एक महिला कार्यकर्ता ने पूछा कि 17 सितम्बर को आपका जन्मदिन है, इसे हम कैसे मनाएं? मोदी जी ने कहा कि जब मैं मुख्यमंत्री बना था, उससे पहले तक मुझे मेरे जन्मदिन का पता भी नहीं था, फिर लोगों ने मनाना शुरू किया, अब चूंकि मैं बड़े पद पर हूँ तो सभी यह प्रश्न करते हैं। मैं एक काम करने को कहता हूँ, क्या आप करेंगे? आप 17 तारीख को आपके गाँव में जो भी बच्चा पैदा हो रहा है, उसके पास जाएं, उसो आशीर्वाद दें और बताएं कि यदि आप परिश्रम करेंगे तो आप भी मोदी जैसे बड़े व्यक्ति बन सकते हैं। दिखने में बहुत ही सुन्दर और स्वस्थ विचार है। किसी भी नवजात के कान में यह मंत्र फूंकना की तुम महान हो क्योंकि आज के दिन तुमने जन्म लिया है, और तुम्हारी भी मोदी जैसे बड़े  बनने की सम्भावना है। मेरे  बेटे का जन्म 14 मार्च 1979 को हुआ और 100 साल पहले उसी दिन आइन्सटीन का जन्म हुआ था। हम सब इस गौरव से भरे रहते हैं कि जन्म तारीख एक है। तो 17 सितम्बर को जन्में बच्चों में यह गौरव नहीं होगा! जरूर होगा और वे गाहे-बगाहे इसका जिक्र भी करेंगे। लेकिन यदि बच्चे का परिवार कांग्रेसी हुआ तो! मोदी जी ने अपने कार्यकर्ताओं को मंत्र दे दिया है, वे घर-घर में जाएंगे भी। अब देखिए – एक घर में बच्चा पैदा हुआ है, लोग खुशियों में डूबे हैं, तभी बीजेपी के लोग मिठाई लेकर पहुंचते हैं। परिवारजन खुश होते हैं, पिता के मुँह में मिठाई का निवाला अभी गया भी नहीं था कि एक कार्यकर्ता कहता है कि भाग्यशाली है आपकी संतान जो मोदी जी के जन्मदिन पर जन्म लिया है, आगे जाकर यह भी मोदीजी जैसा बने, प्रभु से यही प्रार्थना है। बच्चे के कान में भी यही मंत्र फूंक दिया है। मिठाई का निवाला साँप की तरह गले में अटक गया। मिठाई ना हो गयी, छछूंदर हो गया। खाएंगे तो संतान के मोदी बनने की खुशी मनाएंगे और फिर पार्टी क्या हाल करेगी, उन्हें साफ दिखायी दे रहा है! नहीं खाते तो संतान की खुशी नहीं, मुँह में गया टुकड़ा उगले भी तो कैसे?
अब संतान ना हो गयी, सारी जिन्दगी का क्लेश हो गया! सोते-जागते यही चिन्ता, कहीं मोदी के प्रभाव में ना आ जाए। स्कूल जाएगा और तारीख जब अन्य बच्चे देखेंगे और यदि किसी ने कह दिया कि अरे तेरा जन्मदिन तो बड़े पवित्र दिन हुआ है तो? मोदीजी का छोटा सा फूल का उपहार भी घाव कर देगा! उन्होंने तो सहजता से कह दिया कि मेरा पीछा छोड़ो और नये बच्चों का जन्मदिन मनाओ लेकिन यहाँ तो कठिनाई खड़ी होने वाली है। न जाने संजय निरूपम जैसे कितने ही कंस, कहाँ हैं कृष्ण- कहाँ है कृष्ण, कहकर इस दिन जन्में बच्चों का वध करने नहीं निकल पड़े। मुझे तो 17 तारीख का इंतजार है, भाजपा के कार्यकर्ताओं का इंतजार है, जब वे घर-घर जाकर बच्चों को आशीर्वाद देंगे। कुछ परिवारजन फूलकर कुप्पा हो जाएंगे और कुछ की स्थिति साँप-छछून्दर जैसी होने वाली है। कुछ ने तो आज ही चिकित्सकों से सलाह लेना शुरू कर दिया होगा कि कुछ भी करो लेकिन इस 17 तारीख को टालो। कुछ ऐसे भी होंगे जो कहेंगे कि डॉक्टर, चाहे सिजेरियन कर दो, लेकिन तारीख 17 ही होनी चाहिये। कहीं दीप जलेंगे और कहीं दिल। देखते रहिये 17 को क्या होता है?
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Friday, September 14, 2018

मेरे पहलवान को अखाड़े में नहीं उतारा तो????????

पहले गाँवों में एक अखाड़ा होता था, वहाँ पहलवान आते थे और लड़ते थे। जब दंगल होते थे तो गाँव वाले भी देखने आ जाते थे नहीं तो पहलवान तो रोज ही कुश्ती करते थे। जैसे ही पहलवान अखाड़े से बाहर आया वह अपनी दुनिया में रम जाता था। वह हर जगह को अखाड़ा नहीं बनाता था। लेकिन आज राजनीति का अखाड़ा ऐसा हो गया है कि वह भगवान की तरह कण-कण में बस गया है। कभी हम पढ़ा करते थे कि बंगाल में लोग यदि शादी की बात करने भी जाते थे तो जाँच-परख लेते थे कि सामने वाला व्यक्ति फुटबाल की कौन सी टीम का समर्थक है, यदि विपरीत टीम का समर्थक निकला तो झट से इशारा होता था और बातचीत बन्द हो जाती थी, अतिथि अपने घर को रवाना हो जाते थे। लेकिन आज इन खेलों का स्थान राजनीति ने ले लिया है, आप होली-दीवाली पर राम-राम करने को फोन करेंगे तो सामने से राजनीति का प्यादा चलकर बाहर आ जाएगा, मिलने जाओगे तो घोड़ा अपनी ढाई घर की चाल के साथ उपस्थित हो जाएगा। किसी जवान मौत पर भी चले जाओ, ऊँट की तरह तिरछी चाल से अपनी बात वहाँ भी कह दी जाएगी। और यदि साक्षात अपने प्रतिद्वंद्वी के घर चले जाओ तो शह और मात का खेल शुरू हो जाएगा। 
कुछ लोगों ने तो बकायदा ट्रेनिंग भी ली है और उन्हें किट भी दे दिया जाता है कि उन्हें कब-कहाँ-कैसे वार करना है। ट्रेनिंग के लिये आजकल फेसबुक सबसे सटीक जगह है, कोई उस्ताद जुमले गढ़ता है और उसके चेले सारा दिन वही जुमले बोलते हैं। मूर्ख चेले सभी ओर हैं, उन्हें पता ही नहीं कि यह जो जुम्ला आया है वह मेरे लिये है या नहीं है, बस वह किसी भी चाल से उलझ जाता है और किसी भी जुम्ले को अपने आका के विरोध में ही उछालने लगता है। यह खेल इतना मजेदार हो चला है कि बाकायदा जुम्ले बनाने का कारखाना खोल दिया गया है, लोग सारी तरह के जुम्ले बना रहे हैं और वे सब धड़ाधड़ बिक रहे हैं। कुछ लोगों को लग रहा है कि ऐसे स्वर्ण युग में भी यदि हमारी दुकान नहीं चली तो फिर क्या फायदा है हमारे लिखने का! उन्हें लगने लगा कि पहलवान तो लड़ ही रहे हैं लेकिन हम भी उनके लिये टुकड़ियों का इंतजाम कर दें। वे भांत-भांत की टुकड़ियाँ बनाने में जुट गये हैं। फौज में देखना कोई सिख बटालियन है तो कोई जाट रेजिमेंट, ऐसे ही बहुतेरी है। अब इन दंगलबाजों के लिये भी कई जातियों की बटालियन बनाने की होड़ लगी है। सभी ने मोर्चा सम्भाल लिया है। पहले गाँव का पहलवान गाँव के लिये लड़ता था लेकिन अब अलग-अलग बटालियन बना दी गयी हैं तो गाँव में ही एक-दूसरे को ललकारा जा रहा है। चारों तरफ ललकारने की आवाजें आ रही हैं, पहलवान समझ नहीं पा रहे हैं कि हमें किससे लड़ना है और किससे हाथ मिलाना है। लेकिन जुम्लों के तीर की तरह बारिश हो रही है, कोई अछूता नहीं रहना चाहिये। गाँव-गाँव, ढाणी-ढाणी, क्या पैदल, क्या घोड़ा, क्या हाथी और क्या ऊँट सारे ही मैदान में उतर आए हैं। जुम्लें बनाने वाले अचानक से व्यस्त हो गये हैं, वे सुध-बुध खो बैठे हैं, उन्हें पता ही नहीं कि सारे गाँव के लोग मिलकर ही एक गाँव बनाते हैं, यदि एक भी कड़ी टूट जाए तो गाँव बिखर जाता है। वे जो रोटी खा रहे हैं, उसका अन्न किसी दूसरे ने उगाया है, वह जो कपड़े पहने बैठे हैं, उसका सूत किसी ने काता है, वह जो जूते पहनकर अकड़कर चल रहे हैं, उस जूते को किसी ने बनाया है। लेकिन उन्हें लग रहा है कि मैं जुम्ले बना सकता हूँ तो मैं ही महान हूँ। भला अन्न उपजाने वाला, सूत कातने वाला, जूता बनाने वाला मेरी कैसे बराबरी कर सकता है, नहीं मुझे मेरा पहलवान ही चाहिये। यदि मेरे पहलवान को अखाड़े में नहीं उतारा गया तो मैं ????? उसे समझ नहीं आ रहा कि मैं क्या करूंगा? रोटी-कपड़ा तो दूसरे से मिल जाएगा, फिर???????????????

Thursday, September 13, 2018

जहरीला धुआँ फैल रहा है


कंटीले तारों से बनी सीमा, इस पार सैनिक तो दूसरी पार महिलाएं। महिलाएं हाथों में किसी पुरुष की फोटो लिये हैं और वे मौन फरियाद कर रही हैं सैनिकों से कि हमारे घर का यह शख्स कहीं खो गया है, आपने देखा है क्या? सैनिक फोटो हाथ में लेते हैं और ना मैं सर हिला देते हैं। महिलाओं की आशा रोज ही बंध जाती है और सड़क की उस पार कंटीले तारों की बाड़े बन्दी तक उनको ले जाती है। यह उस जन्नत के एक गाँव की कहानी है, जिसे कवि ने बड़े गर्व से कहा था कि दुनिया में कहीं जन्नत है तो यहीं है। उजड़े मकान, घर-घर में केवल महिलाएं, मैदान में आवारा से खेलते बच्चे, पूरे गाँव में सैना की उपस्थिति। यह एक फिल्म का दृश्य है, जो कल टीवी पर दिखायी जा रही थी। यह गाँव कश्मीर का नहीं लग रहा था अपितु सीरिया या मौसुल का लग रहा था। एक व्यापारी है, जो लोगों की आम जरूरतों की चीजों को खच्चर और गधों पर लादकर एक गाँव से दूसरे गाँव पहुँचा रहा है। नदी बह रही है और उस नदी पर बर्फ जम रही है, पहाड़ों पर भी बर्फ जमा है, घने जंगल हैं और इन जंगलों में आतंकवादी छिपे हैं। युवा आतंकवादी, किशोर आतंकवादी और उन्हें तलाश है बालकों की जिनकी मासूमियत के सहारे वे आतंक को अंजाम दे सकें। मैदान में बच्चे गोलीबारी का खेल खेल रहे हैं और आतंकवादी उन्हें चुन रहे हैं।
एक कवि जब जन्नत की कल्पना करता है तो उसके मन के अन्दर भी जन्नत होती है, जन्नत जितनी ही पवित्रता होती है, तभी वह जन्नत की कल्पना को शब्द दे पाता है लेकिन आतंकवादी ने कैसी जन्नत बनायी है, इस फिल्म में दिखायी देती है। "यह पहाड़, यह नदी, यह जंगल, बताओ किसके हैं" यह प्रश्न फिल्म में कई बार पूछा गया। वहाँ का बाशिन्दा कहता है कि ऊपर वाले का है, ये पहाड़ हजारों साल से यहीं खड़े हैं, नदी यूं ही बह रही है। आतंकवादी कहता है कि यह पहाड़ तुम्हारा है, इसे तुम्हें लेना है। गरीबी से लड़ती महिलाएं, मनमानी करता साहूकार, शिक्षा से वंचित बचपन सब ऐसे ही दौड़ रहे हैं। मन बार-बार सवाल कर रहा था कि क्या यही कवि की जन्नत है? इसी जन्नत को देखने सैलानी दौड़े जा रहे हैं? क्या हम सैना के बलबूते सीमा पार के इस आतंक से लोगों को राहत दे पाएंगे? विचारों की इस जहरीली हवा को रोक पाएंगे? जो बच्चे आतंक का खेल खेल रहे हों, क्या उन्हें आतंक से दूर रख पाएंगे? सवाल ढेर सारे हैं लेकिन उत्तर कहीं नहीं है! समस्या एक क्षेत्र की भी नहीं है, इस समस्या का जहर हवाओं में घुल रहा है और भारत के सारे आकाश को अपनी आगोश में ले रहा है। क्या सबसे प्राचीन सभ्यता भारत इस जहरीले धुएं के नीचे दम तोड़ देगी? कश्मीर के इस गाँव की कहानी, क्या भारत के हर गाँव की कहानी बन जाएगी? फिल्म के बालक को पता ही नहीं कि उसके हाथ में जो बम्म रखा है, वह कितना घातक है, उसे छोटे से लालच ने फंसा लिया है। फिल्म के बालक को तो समझ आ गया था कि यह शायद घातक है, लेकिन हम किस-किस बच्चे को समझा पाएंगे कि तुम्हारे हाथ में बम्म रख दिया गया है। जो बच्चे बंदूक हाथ में लेकर गोलीबारी का खेल खेल रहे हैं, उन्हें कौन सभ्य नागरिक बनाएंगा? वे तो आतंक की ही खेती हैं ना! जितने भी बच्चे, अकेले अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वे अपराध की शरण में जाने को मजबूर कर दिये जाते हैं। जिन कच्ची बस्तियों में, जिन गाँवों में, जिन कस्बों में ऐसे बच्चे घूम रहे हों, उनकी सुध समाज को लेनी चाहिये नहीं तो सीमा पार से किसी आतंकवादी को आने की जरूरत नहीं होगी, उनके लिये यहीं उपलब्धता रहेगी। फिल्में तो आपको इशारा कर रही हैं, सम्भल जाओ, अभी भी समय है, नहीं तो हर शहर सीरिया में तब्दील हो जाएगा। तुम मोदी-मोदी खेलते रह जाओगे और वे तुम्हें अपना शिकार बना लेंगे।
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Tuesday, September 11, 2018

नरम नेता चुनो और गुलामी का आनन्द लो


घर में  पिताजी सख्त हों और माताजी नरम तो पिताजी नापसन्द और माताजी पसन्द। स्कूल में जो भी अध्यापक सख्त हो वह नापसन्द और जो नरम हो वह पसन्द। ऑफिस में जो बॉस सख्त हो वह नापसन्द और जो हो नरम वह पसन्द। जो राजनेता सख्त हो वह नापसन्द और जो नरम हो वह पसन्द। जीवन के हर क्षेत्र में जो भी सख्त है, उसे कोई पसन्द नहीं करता इसके विपरीत जो नरम है उसे अधिकतर पसन्द किया जाता है। सख्त मतलब दो-टूक कहने वाला और नरम मतलब तेरे मुँह पर तेरी और मेरे मुँह पर मेरी। जिस किसी का भी घर सुधरा हुआ दिखायी देता है, वहाँ कोई ना कोई सख्त व्यक्ति का शासन होता है और जो घर बिगड़ा दिखायी देता है, वहाँ किसी नरम व्यक्ति का शासन रहता है। सख्त व्यक्ति दो-टप्पे की बात करता है, यह करना है और यह नहीं करना, बस। इस रास्ते पर चलना है और इसपर नहीं। दुनिया उसे समझने लगती है कि यह व्यक्ति यह काम तो करेगा और यह नहीं करेगा जबकि नरम व्यक्ति को कोई समझ नहीं पाता कि यह क्या तो करेगा और क्या नहीं करेगा। घर, सख्त व्यक्ति ही बनाता है लेकिन सबकी नाराजी का केन्द्र बिन्दू रहता है जबकि नरम व्यक्ति घर बिगाड़ता है लेकिन सबका चहेता रहता है। इसलिये कई बार लोग गुस्से में बोल भी देते हैं कि मैं ही क्यों बुरा बनू? घर जाए भाड़ में। लेकिन सब जानते हैं कि हम सब अपनी-अपनी आदतों से मजबूर हैं, हम चाहकर भी विपरीत कार्य कर ही नहीं सकते।
कुछ लोग मोदीजी से नाराज हैं क्योंकी मोदीजी सख्त है। वे नरम लोगों को ढूंढ रहे हैं और खोज-खोजकर उनका नाम उछाल रहे हैं। देश का नेता सख्त है वह देश बनाने में लगा है लेकिन आपको नरम नेता चाहिये! क्यों चाहिये नरम नेता? जिस राजनीति में मैं दूर-दूर तक भी भागीदार नहीं हूँ, तो मुझे क्यों चाहिये नरम नेता? मुझे तो बनते देश को देखकर खुश होना चाहिये लेकिन नहीं! इसी नहीं पर हर जगह पेच अटक जाता है। चाहे वह घर हो या देश। आपने अपने पिता के जमाने की शादी देखी होगी, शादी में केवल पिता का आदेश चलता था, सारे काम व्यवस्थित होते थे लेकिन तभी किसी एक बेटे को लगता था कि मेरी भी पूछ होनी चाहिये। वह छोटे भाई-बहनों को कभी नये कपड़ों के लिये तो कभी किसी और के लिये उकसा देता था। पिताजी का अनुशासन बिगड़ जाता था और लोग कहने लगते थे कि बच्चों की खुशी का भी ध्यान रखना चाहिये। शादी व्यवस्थित हो रही है, इस बात से ध्यान हटकर, बेटे की बात पर केन्द्रित हो जाता है। सभी को लगने लगता है कि यदि  पिताजी की जगह बेटे के हाथ में शादी का प्रबन्ध होता तो हम सब मजे करते। आज ऐसा ही देश में हो रहा है, मोदी जी का कोई साथी लोगों को उकसा रहा है कि इनकी सख्ती के कारण तुम मजे नहीं कर पा रहे हो। तुम्हारे घर में शादी  हो रही है और तुम्हीं मजे नहीं कर पा रहे हो तो फिर क्या फायदा घर की शादी का। जो हर जगह मजे लेने की फिराक में रहते हैं वे आज कह रहे हैं कि ऐसी सख्ती ठीक नहीं, हम मजे नहीं ले पा रहे हैं। मोदीजी की जगह नरम नेता को लाओ जो हमें मजे करा सके। अब या तो मजे ही करा दो या फिर देश को ऊँचा उठा दो। हमने वोट दिया और हम ही विशेष नहीं बने, भला यह भी कोई बात है! हमने इनके पक्ष में इतना लिखा, इतना कहा, फिर भी हम विशेष नहीं, यह भी कोई बात है! बस मोदी जी जैसे सख्त नेता नहीं चाहिये, नरम नेता को आगे लाओ। मजे की चाहत वाले लोग अब नरम नेता की खोज में लगे हैं। बस एक बात याद आ गयी, उसे लिखकर बात खत्म करती हूँ। एक व्यक्ति मेरे पास आया कि फला काम करना है, मैंने काम देखा और कहा कि यह सम्भव ही नहीं है। मेरी बात मेरा बॉस सुन रहा था, उसने इशारे से उसे अपने पास बुलाया और पूछा कि क्या काम है? अब नरम बॉस ने कहा कि ठीक है, मैं देखूंगा। मैं क्या देखती हूँ कि वह व्यक्ति बॉस का गुलाम बनकर रह गया, हमेशा अटेची उठाकर पीछे चलने वाला। काम तो होना नहीं था लेकिन उसने कई साल ऐसे ही निकाल दिये, गुलामी कर-कर के। तो भाई मजे की चाहत रखने वाले लोगों, नरम नेता तो कांग्रेसी बहुत थे, पूरा देश सालों से गुलाम की तरह उनको तोक रहा था, तुमको भी वही गुलामी की आदत पड़ चुकी है, तुम भी फिर से नरम नेता चुनो और गुलामी का आनन्द लो।
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Saturday, September 8, 2018

डायनिंग टेबल पर फीड-बैक रजिस्टर


मेरा मन कर रहा है कि मैं भी अपनी डायनिंग टेबल पर एक फीड-बैक रजिस्टर रख लूं। जब भी कोई मेहमान आए, झट मैं उसे आगे कर दूँ, कहूँ – फीड बैक प्लीज। दुनिया में सबसे बड़ी सेवा क्या है? किसी का पेट भरना ही ना! हम तो रोज भरते हैं अपनों का भी और कभी परायों का भी। इस बेशकामती सेवा के लिये कभी फीड-बैक मांगा ही नहीं, जबकि हर आदमी पैसा भी लेता है और फीड-बैक भी मांग लेता है। होटल में खाना खाने जाओ तो फीड-बैक, घर में कुछ भी काम कराओ तो फीड-बैक, होटल में रूक जाओ तो फीड-बैक! अब देखिये जैसे ही मेहमान आने की सूचना मिलती है, हम फटाफट शुरू हो जाते हैं। दीमाग के घोड़े दौड़ने लगते हैं कि भोजन में क्या खास होगा। पतिदेव भी आसपास चक्कर लगाने लगते हैं कि आज क्या खास बनने वाला है। जैसे ही मेनू फिक्स होता है, घर  पर नजर पड़ती है, अरे बाबा, कमरे की चादर तो बदली ही नहीं! झट से चादर बदली जाती है, बैठकखाने को करीने से सजाया जाता है। ना जाने कितने जतन करने पड़ते हैं। मेहमान आते हैं, हम लजीज सा खाना परोसते हैं और वे खाकर चले जाते हैं। कभी कोई तहजीब वाला हुआ तो कह देता है कि भोजन अच्छा था। लेकिन कई तो ऐसे ही खिसक लेते हैं। छककर भोजन करेंगे फिर कहेंगे कि अरे भाभीजी पान-सुपारी नहीं है क्या? हम भी झूठी हँसी हँस देंगे कि जी अभी लायी। लेकिन क्या मजाल जो बन्दा भोजन की तारीफ कर दे।
दो दिन पहले सोफे की धुलाई कराई थी, कल सोफे वाले का मेसेज आ गया कि प्लीज फीड-बैक दें। अब बताओ कि सोफे की धुलाई में क्या फीड-बैक होगा! तब मैंने सोचा कि हम तो ढेर सारा खाना बना-बनाकर मरे जा रहे हैं, कभी फीड-बैक नहीं मांगा और ये देखो, जरा सा सोफा क्या धो दिया, फीड-बैक चाहिये। बस हमारे भी दीमाग में जंच गयी कि हम भी रजिस्टर रखेंगे। यह भी बताएंगे कि अभी तक कौन-कौन लोग आकर खाना खाकर गये हैं। उनने क्या-क्या लिखा है इस रजिस्टर में। सोच रही हूँ कि कुछ शुरुआत खुद ही कर दूँ जिससे लगेगा कि यह काम पहले से ही चालू है, नहीं तो किसी को लगेगा कि हमी से शुरुआत की है क्या! मन तो यह भी करता है कि मेहमान का ईमेल भी ले लिया जाए और फिर उसे ईमेल द्वारा बताया जाए कि आपने आज कितने पैसे बचाए
! खैर छोड़िये, मन तो पता नहीं क्या-क्या करता है लेकिन सभी करने लगे तो हंगामा खड़ा हो जाएगा। मुझे तो आजकल कोर्ट का भी डर सताने लगा है कि कहीं कोई मेहमान कोर्ट में चला गया और कहा कि हमारा अधिकार बनता है इनके हाथ का बना खाना खाने का और कोर्ट के माननीयों ने आदेश दे दिया कि हमारी परम्परा रही है – अतिथि देवोभव:, इसका पालन करना ही होगा, तो हम क्या करेंगे? अब आप मित्रगण बताएं कि हमें फीड-बैक रजिस्टर रखना चाहिये या नहीं। जब अतिथि देव ही हैं तो वीआईपी हुए ना, और वीआईपी के हस्ताक्षर लेने का हक तो हमें मिलना ही चाहिये। हम आपका उत्तर पाते ही तुरन्त बाजार के लिये निकल पड़ेंगे एक सुन्दर सा फीड-बैक रजिस्टर खरीदने के लिये। बस आपके हाँ की देर है।

Monday, September 3, 2018

मिश्र के पिरामिड ना बन जाए हमारी वेबसाइट?


रोज खबरें आती है कि फलाना चल बसा और ढिकाना चल बसा, कम आयु का भी चल बसा और ज्यादा आयु वाले को तो जाना ही था! हमें भी एक दिन फुर्र होना ही है। लेकिन हम जो यहाँ फेसबुक पर दाने डाल रहे हैं, अपनी वेबसाइट पर बगीचा उगा रहे हैं और ब्लाग पर खेत लगा रहे हैं, उस बगीचे और उस फसल का मालिक कौन होगा? हम तो आग को समर्पित हो जाएंगे लेकिन यह जो हमारी धरोहर है उसका कौन मालिक होगा या फिर यह भी स्विस अकाउण्ट की तरह गुमनामी में रहकर किसी लोकर जैसे ही दफन हो जाएगी। अभी तो हम इसमें से एक फूल नहीं तोड़ने देते, कोई तोड़ लेता है तो हम गुर्राने लगते हैं कि हमारा फूल कैसे तोड़ा? फिर क्या होगा? या तो कोई समूचा बगीचा ही हथिया लेगा या फिर उसे अंधेरे में उजड़ने को छोड़ देगा! मिश्र के पिरामिड जैसी हो जाएंगी हमारी वेबसाइट, रात के अंधेरे में चोर घुसेंगे और सोना-चाँदी लूटकर ले जाएंगे। अब आप कहेंगे कि खाक सोना-चाँदी होगा, गोबर भरा होगा, लेकिन इस गोबर की  भी तो खाद बन जाएगी ना! एक विज्ञापन में तो यही आ रहा है कि खाद ही सोना है, तो वैसा सोना नहीं तो ऐसा सोना तो होगा ही ना!
अभी हमारा खजाना सभी के लिये खुला है, शायद ही कोई चोरी करता हो लेकिन जैसे ही हम बन्द करेंगे तो शायद लालच बढ़ने की सम्भावना जागृत हो जाए! हम सरलता से सबके लिये उपलब्ध हैं तो हमारी कीमत कोई नहीं लगाता सब घर की मुर्गी दाल बराबर मानता है लेकिन यदि हम भी चारों तरफ तालों में बन्द होकर अपना विज्ञापन करने लगें कि हमारे पास कस्तूरी है तो कुछ ना कुछ लालच तो हम चोरों के लिये छोड़ ही सकते हैं! लेकिन अपना विज्ञापन करना बड़ा कठिन काम है, हम जैसे लोग तो इस काम में नौसिखिया भी नहीं है। एक कहानी याद आ रही है, एक साहित्यकार था, शिमला गया और एक होटल में जाकर ठहर गया। देखता क्या है कि उसके नाम के इश्तहार तो पहले से ही वहाँ लगे हैं। उसे उत्सुकता हुई सत्य जानने की। उसने देखा कि एक आदमी उसी के नाम से होटल में ठहरा है और भीड़ से घिरा है। उसकी रचनाओं का पाठ करके वाह-वाही लूट रहा है और ठाठ से रह रहा है। उसने नकली व्यक्ति से मिलने की ठान ली, वह मिला और अपना परिचय दिया। नकली व्यक्ति भी उससे मिलकर खुश हुआ और बोला कि देखिये आप तो अपना प्रचार करते नहीं, लेकिन मैं आपका ही प्रचार कर रहा हूँ, बस चेहरा ही तो अलग है, प्रचार तो आपका ही हो रहा है। फिर बोला कि मुझे इसमें कितना खर्चा करना पड़ता है, आप नहीं जानते इसलिये मुझे कुछ पैसे दीजिये। उस साहित्यकार को वह भ्रमित कर चुका था और उसकी जेब से पैसे भी निकलवा चुका था। अब वे दोनों उस होटल में रह रहे थे। असली चुप था और नकली फसल काट रहा था। लेकिन असली भी खुश था कि उसी के नाम की फसल कट रही है। फसल के पैसे नकली ले रहा था और असली, बीज के पैसे भी जेब से भर रहा था।
तो बहनों और भाइयों, इस समस्या का हल है किसी के पास? हमारे बैंक को कोई गोद लेने की सोच रखता है क्या? या हमारा वारिस ही कोई बन जाए। कारू का खजाना ना मिलेगा लेकिन टूटे-फूटे बर्तनों में भी इतिहास तो मिल ही जाएगा। लोग कहते हैं कि खानदानी धंधा ही करना चाहिये, जिससे आपके धंधे को आगे ले जाने वाले हमेशा बने रहते हैं लेकिन हमने तो ऐसा काम किया कि हमारी ना तो पिछली पुश्तों में और ना आगे की पुश्तों में कोई धोले पर काला करता है। इसलिये इस लिखे हुए का कोई मौल भी नहीं जानता, उनके लिये तो यह ऐसा कचरा है जिसकी खाद भी नहीं बनती। कोई मुझे बताए कि कभी किसी मन की कीमत लगायी गयी है? कीमत तो शरीर की ही लगी है। लेखन तो मन है, यदि यह किसी सुन्दर शरीर में रहता है तो फिर भी कीमत लग जाती है नहीं तो तिजौरी में पड़ा रहता है। लेखन की तिजौरी अब वेबसाइट हो गयी है, इसका भी गोपनीय पासवर्ड है, यदि किसी ने पासवर्ड को जान लिया तो सरेआम हो जाएगी नहीं तो किसी गुमनाम जंगल के किसी कोने में पड़ी रहेगी। न जाने कितना समय बीतेगा, कभी तिजौरी पर ध्यान जाएगा तब शायद कोई कहे कि इसमें भी कुछ है और फिर मिश्र के पिरामिड की तरह परते उखाड़ी जाएंगी। हमारे  पिरामिड में भी शायद कुछ मिल जाए और हम भी इतिहास की चीज बन जाए। तथास्तु।

Sunday, September 2, 2018

शायद यही परिवर्तन है!

आजकल टीवी के लिये फिल्म बनाने की कवायद जोर-शोर से चल रही है इनमें से अधिकतर फिल्म आधुनिक सोच को लिये होती है। वे युवा मानसिकता को हवा देती हैं और एक सुगम और सरस मार्ग दिखाती हैं। हर कोई इनसे प्रभावित होता है। क्यों प्रभावित होता है? क्योंकि ऐसे जीवन में अनुशासन नहीं होता, पूर्ण स्वतंत्रता की मानसिकता को दर्शाने का प्रयास रहता है और जहाँ कोई भी अनुशासन नहीं हो भला वह सोच किसे नहीं पसन्द होगी! मैं नवीन पीढ़ी की सोच से रूबरू होना चाहती हूँ इसलिये जब भी मौका मिलता है इन फिल्मों को टीवी पर देख लेती हूँ। मेरी संतान के मन में भी क्या चल रहा है, मुझे भान हो जाता है और मैं सतर्क हो जाती हूँ। एक बात मैंने नोटिस की है, शायद यह पहले से ही होती रही हो लेकिन जब से जेएनयू का नाम रोशन हुआ है तब से मैंने नोटिस किया कि फिल्मों में जेएनयू का नाम खुलकर लिया जाता है और फिल्म का कोई भी करेक्टर यह जरूर कहता है कि मैं जेएनयू में पढ़ा हूँ। खैर बाते तो बहुत हैं लेकिन कल की ही बात करती हूँ, कल टीवी पर एक फिल्म आ रही थी, आधी-अधूरी ही देखी गयी, उसे दोबारा अवश्य देखूंगी। एक माँ है और उसकी एक युवा बेटी है, दोनो आधुनिक तरीके से रहती हैं। एक दिन माँ बेटी से कहती है कि मैं जेएनयू मैं पढ़ती थी और मुझे एक लड़के से प्यार हो गया और मैं उसके साथ भाग गयी। बेटी उसे प्रश्नचिह्न लगाकर देखती है लेकिन माँ आगे बोलती है कि तुम्हारे जो पापा है वे दूसरे हैं। मेरे भागने के दो साल बाद मुझे ये मिले और मुझे इतने पसन्द आये कि मैं फिर भाग गयी। बेटी एक क्षण के लिये ठिठकती है लेकिन अगले ही क्षण ठहाका मारकर हँस देती है कि वाह माँ। कहानी सोशल मीडिया पर आधारित है, कैसे लोग लिख रहे हैं और विचार को वायरल कर रहे हैं। कह रहे हैं कि हमारा नाम कहीं नहीं आता लेकिन हमारे विचार तो वायरल होते हैं, यही सुख देता है। 
एक प्यारी नज्म है लेकिन सोशल मीडिया ने उसे तोड़-मरोडकर चुटकुला बना दिया है, नज्म लिखने वाले को पहले गुस्सा आता है लेकिन फिर वह देखता है कि लोग आनन्द ले रहे हैं तो मान जाता है। फिल्म में कहा जाता है कि सभी कुछ परिवर्तनशील है, जिसमें लोग आनन्द लें वही अच्छा है। नया जमाना है, जहाँ और जिससे सुख मिले बस वही करो। खुलकर अपनी बात कहो, कोई दुराव नहीं कोई छिपाव नहीं। सब कुछ सुन्दर हो, सजा-धजा हो जरूरी नहीं। मन को पसन्द है तो साथी अच्छा है। कई प्रयोग करने में भी कोई बुराई नहीं। माँ अपनी बात खुलकर कह रही है और साहस के साथ कह रही है, बेटी अपने मन की कर रही है, कोई रोक-टोक नहीं है। सोशल मीडिया के द्वारा जीवन को बदला जा रहा है। ये लोग किसी अनुशासन को नहीं मानते, संविधान को नहीं मानते। इनका संविधान है इनका मन। जो मन करे वह करो। ऐसी फिल्में गुडी-गुडी होती है मतलब अच्छी-अच्छी। कोई कठिनाई नहीं, कोई लड़ाई नहीं। जेएनयू के लिये बनी इन फिल्मों का सार है कि केवल अपने मन का सुख।
लेकिन इस संसार में केवल अपने मन की कब चली है? किसी भी प्राणी की ऐसी स्थिति नहीं है कि वह अपना मनमाना करे। सभी के कुछ ना कुछ अनुशासन है, मेरे घर की मुंडेर पर बैठे कबूतर को जोड़े को जब चोंच मिलाते देखती हूँ तब यह नहीं सोच लेती हूँ कि यह हर किसी कबूतर या कबूतरी से चोंच मिलाने को स्वतंत्र है। लेकिन कुछ लोग सोच लेते हैं कि सारी प्रकृति स्वतंत्र है तो हम भी स्वतंत्र हैं। स्वतंत्रता किसे अच्छी नहीं लगती, मुझे भी लगती है और आप सभी को भी लगती होगी लेकिन जब कभी इस स्वतंत्रता को खुली आँखों से देखने का प्रयास करती हूँ तो ताकतवर का कमजोर के प्रति शोषण ही दिखायी देता है। शायद मकसद भी यही हो कि हम स्वतंत्रता का खेल दिखाकर लोगों को घर-समाज और देश के अनुशासन से बाहर निकाल दें और फिर बाज की तरह इनपर टूट पड़ें। दुनिया में बढ़ रहे महिलाओं के प्रति अपराध इस ओर ही इंगित करते हैं। पहले क्लब के बहाने महिलाओं को पाने का प्रयास किया गया और अब जेएनयू की सभ्यता दिखाकर की सभी साथ रह रहे हैं, साथ सो रहे हैं। पहले रजामंदी से फिर जोर-जबरदस्ती से शोषण होगा। शोषण में पुरुष और स्त्री दोनों ही शामिल हैं। बस जो कमजोर है वह शोषित होगा। ये फिल्में बनती रहेंगी, हमें लुभाती रहेंगी और हमारा जीवन बदलती रहेंगी। क्योंकि हम कहते रहेंगे कि जीवन परिवर्तनशील है, सुन्दर हो, सजा-धजा हो यह आवश्यक नहीं, बस सुख देने वाला हो। भाषा बदल जाएगी, वेशभूषा बदल जाएगी, जिस सभ्यता को हमने संस्कृति के सहारे उच्च स्थान दिया था हम उसे प्रकृति के नाम पर विकृति की ओर ले जाते रहेंगे, शायद यही परिवर्तन है।

Saturday, September 1, 2018

जनता तुम्हारा नोटा बना देगी

हमने पिताजी और माँ के जीवन को देखा था, वे क्या करते थे, वह सब हमारे जीवन में संस्कार बनकर उतरता चला गया। लेकिन जिन बातों के लिये वे हमें टोकते थे वह प्रतिक्रिया बनकर हमारे जीवन में टंग गया। प्रतिक्रिया भी भांत-भांत की, कोई एकदम नकारात्मक और कोई प्रश्नचिह्न लगी हुई। जब हवा चलती है तब हम कहते हैं कि यह जीवन दायिनी है लेकिन जब यही हवा अंधड़ के रूप में विकराल रूप धर लेती है तो कई अर्थ निकल जाते हैं। ऐसी ही होती हैं स्वाभाविक क्रिया और प्रतिक्रिया। मैंने कोशिश की जीवन में कि मैं बच्चों को कम से कम सीख दूँ, वे स्वाभाविक रूप से हमारे जीवन को देखें और अनुसरण करें। लेकिन कभी हमारे स्वाभाविक आचरण से भी प्रतिक्रिया हो जाती है। मुझे एक बात का स्मरण हो गया, मेरी ननद की शादी थी, यह शादी हमने ही की थी और धूमधाम से की थी। बेटा सबकुछ देख रहा था, उसने मुझसे पूछा कि क्या बहन की शादी भाई को ही करनी होती है? मैंने कहा कि यह प्रश्न क्यों? वह बोली कि यदि ऐसा है तो मैं तो नहीं करूंगा। बच्चे की बात पर हम सब हँसकर रह गये लेकिन जब आज उस बात को सोचती हूँ तो यह अच्छी बात की प्रतिक्रया लगती है। हम क्रिया कर रहे थे लेकिन बच्चे के दीमाग में प्रतिक्रिया जन्म ले रही थी। हम अक्सर सोचते हैं कि हमने तो अच्छा किया लेकिन लोगों ने हमारे साथ बुरा क्यों किया! कई बार देखा है कि जिन लोगों के साथ हमने अच्छा किया होता है, अक्सर वे लोग हमसे दूर हो जाते हैं। क्यों हो जाते हैं? जैसा मेरे बेटे ने कहा कि क्या मुझे भी यह करना होगा, बस यही बात हमें रिश्ते निभाने से दूर कर देती है। हमारे अच्छे काम अक्सर विपरीत असर दिखाते हैं, लोग कहते हैं कि हमें भी ऐसा ही करना होगा! चलो इनसे दूर हो लेते हैं।
अच्छे काम की बुरी प्रतिक्रिया परिवार में ही नहीं होती अपितु समाज में भी होती है और राजनीति में भी होती है। अच्छा राजा हो तो प्रजा की आँखों में खटकने लगता है क्योंकि प्रजा अपने कर्तव्य से भागना चाहती है। इसलिये जितने भी श्रेष्ठ राजा हुए हैं उन्हें कठिन संघर्ष से गुजरना पड़ा है। हमारे अन्दर सर्वाधिक भाव स्वार्थ का होता है, हम सबकुछ अपने लिये ही पाना चाहते हैं इसलिये जैसे ही किसी राजा ने या गृहस्वामी ने सबके लिये कार्य करना शुरू किया, हमारे मन में विरोध के भाव आ जाते हैं। आज की राजनीति को यदि देखें तो यही दिखायी देता है कि मोदी सरकार का सारा विरोध इसी बात को लेकर है। उनके समर्थक भी कह रहे हैं कि हमारे लिये विशेष अधिकार क्यों नहीं? उनके विरोधी भी कह रहे हैं कि सभी के लिये क्यों? सब अपना हिस्सा चाहते हैं। इसलिये घर में संतान को ही सम्पत्ती देने की परम्परा बनी, यदि संतान को सम्पत्ती नहीं तो वह शत्रु से भी अधिक क्षति करेगा। राजनीति में कुछ लोगों पर अनुग्रह करने की परम्परा बनी जिससे ये अनावश्यक रूप से शत्रु ना बन जाएं? मोदी सरकार की सबसे बड़ी भूल यही होगी कि उन्होंने लोगों के सामने चाँदी के सिक्के नहीं उछाले! आज हर समाज का तबका विशेष बनना चाह रहा है, वे सामाजिक रूप से कुछ नहीं कर रहे लेकिन उन्हें विशेषाधिकार चाहिये। जो लड़ाई समाज की है, जो कर्तव्य समाज के हैं, उन्हें वे राजनीति में घसीट रहे हैं। सब जानते हैं कि भारत में सदियों से छूआछूत है, किसी जाति को सारे अवसर मिले और किसी को कुछ मिलना तो दूर उसे इतना हीन बना दिया गया कि वह कल्पना में भी अपने लिये अच्छा नहीं सोच सकता था। यह सारी दुनिया में था लेकिन दुनिया ने इसे समझा और सामाजिक रूप से इस विभेद को दूर किया। आज दुनिया में सामाजिक छुआछूत इतना प्रबल नहीं है जितना भारत में दिखायी देता है। यह सब सामाजिक इच्छा शक्ति से हुआ है ना कि राजनीति द्वारा। आज देश में जितने भी सामाजिक और धार्मिक संगठन हैं उनसे प्रश्न करना होगा कि उनने सामाजिक समरसता के लिये कितने लोगों को उच्च या सवर्ण वर्ग में दीक्षित किया? बना दीजिये सभी को सवर्ण और स्थापित करिये बेटी-रोटी का सम्बन्ध फिर देखिये कहाँ विरोध रहता है? समाज में यदि वर्ग भेद को अपने मन से नहीं निकालेंगे और उन्हें खुलेआम नीचा दिखाने का काम करेंगे या सम्बोधन में नीचा दिखाएंगे तो वे प्रतिक्रिया अवश्य करेंगे। अब यदि अपने लिये विशेषाधिकार मांगते हुए ना मिलने की दशा में देश को की तबाह करने की सोच विकसित होने लगी तो देश तो तबाह नहीं होगा, हाँ आप जरूर तबाह हो जाओंगे।
मैं परिवार से लेकर देश तक, सबकुछ - सबके लिये के सिद्धान्त पर चली हूँ और आगे भी चलती रहूँगी। यह देश सभी का है, यदि किसी भी समाज ने केवल अपना आधिपत्य स्थापित करने की मानसिकता का प्रदर्शन किया और राजनीति को धमकाकर अपने लिये विशेषाधिकार की मांग की तो राजनीति करने वाले नष्ट नहीं होंगे अपितु आप का नामोनिशान मिट जाएगा। दुश्मन हजारों साल से हमारी इसी कमजोरी का फायदा उठाता रहा है और हमें तोड़ता रहा है लेकिन आज भी जिस शिक्षा और डिग्रियों के नाम पर इतराते फिरते हो, वे किसी काम की नहीं हैं जब आप को इतना ज्ञान भी नहीं कि एकता में ही शक्ति है। राजनीति में धमकाने की परम्परा को छोड़ दो, शायद भगवान के सामने भी कुछ लोगों ने यही धमकी दी होगी कि हम ना तो पुरुष को मानेंगे और ना ही स्त्री को तो भगवान ने उन्हें दोनों से ही अलग बना दिया। नोटा का प्रयोग भी यही है। कुछ नारे लगा रहे हैं कि घर-घर अफजल निकलेगा और कुछ नारे लगा रहे कि घर-घर नोटा निकलेगा। याद रखना जिस भी राजा के सामने संघर्षों की बाढ़ आयी है, वही राजा सुदृढ़ होकर निकला है, फिर चाहे वह चन्द्रगुप्त हो या अशोक। चाँदी के सिक्के तो तुम्हारे सामने मोदी उछालेगा नहीं, अब अपनी औकात में आ सको तो आ जाओ नहीं तो तुम नोटा दबाने की बात कर रहे हो, जनता तुम्हारा नोटा बना देगी। 

Thursday, August 30, 2018

इन मेहंदी से सजी हथेलियों के लिये

कभी आपने जंगल में खिलते पलाश को देखा है? मध्यम आकार का वृक्ष अपने हाथों को पसारकर खड़ा है और उसकी हथेलियों पर पलाश के फूल गुच्छे के आकार में खिले हैं। गहरे गुलाबी-बैंगनी फूल दप-दप करते वृक्ष की हथेली को सुगन्ध से भर देते हैं। एक मदमाती गन्ध वातावरण में फैल जाती है। जंगल के मन में दावानल जल उठता है, इससे अधिक सुन्दरता कोई चित्रकार भी नहीं उकेर सकता जितनी प्रकृति ने उकेर दी होती है। मैंने कई बार देखी है यह सुन्दरता। बचपन में देखी थी और इन टेसू के फूलों से होली के रंग बना लिये थे। ! (यह टेसू और पलाश एक ही है।) युवावस्था में देखी तो लगा कि जंगल में दावानल दहक रहा है, साक्षात कामदेव ने अपने सारे ही सर-संधान कर दिये हैं। भला ऐसी प्रकृति को छोड़कर कौन शहर की ओर दौड़ना चाहेगा! मन करता कि यही बस जाएं। हर पलाश का वृक्ष निमंत्रण देता सा लगता। लेकिन शहरी जीवन कब जाकर बसा है जंगलों में! इसने तो शहर में ही पलाश की सुन्दरता खोजने का काम कर लिया है। 
मेरी नजर महिलाओं की हथेली पर पड़ी, सुन्दर-गुलाबी सी हथेली और उसपर रची मेहंदी। जब फोटो खिंचवाने के लिये हाथ ऊपर किये तो लगा कि पलाश के वृक्ष ने अपने तने को ऊपर किया है। मुझे हथेली पर पलाश के फूल खिलते दिखायी दिये। लाल-पीली सी मेहंदी और महकती मेहंदी, क्या किसी टेसू के फूल की उपस्थिति से कम है त्योहार पर अनेक हाथ जो मेहंदी से रच गये हैं, जंगल के पलाश-वृक्ष की अनुभूति करा रहे हैं। यह मेहंदी का रंग हथेली के साथ मन में भी रचता है, इस मेहंदी की खुशबू से हाथ ही नहीं महकते अपितु मन भी महकता है और अपनी हथेली में रची मेहंदी से दिल किसी ओर का डोलता है। जैसे जंगल पलाश के खिलने से जादुई हो जाता है, लगता है कि किसी तांत्रिक ने वशीकरण मंत्र से बांध दिया है सभी के मन को, वैसे ही मेहंदी से रचे हाथों में यह ताकत आ जाती है। खुमारी सी छाने लगती है और लगता है हर घर में वसन्त ने दस्तक दे दी हो।
महिलाओं ने मेहंदी का भरपूर प्रयोग किया है, जैसे प्रेम की रामबाण औषधि यही हो। बस कोई भी त्योहार हो, बहाना चाहिये और रच जाते हैं मेहंदी के हाथ। घण्टों तक मंडते हैं फिर घण्टों भर की देखभाल लेकिन घर में कहीं कोई उतावलापन नहीं। अपने हाथ से पानी भी नहीं पीने वाले पुरुष पत्नियों को पानी लाकर पिलाने लगते हैं। सब काम खरामा-खरामा होता है लेकिन घर का धैर्य बना रहता है। बिस्तर की चादर लाल हो जाती है, घर के आँगन में मेहंदी का चूरा बिछ जाता है, वाँशबेसन चितकबरे हो जाते हैं लेकिन कोई शिकायत नहीं। मेहंदी का जादू घर के सर पर चढ़कर बोलता है, उसकी खुशबू से सभी मदमस्त रहते हैं, बस इस इंतजार में कि कब मेहंदी सूखेगी और कब हथेली निखरेगी। जैसे ही हथेली से मेहंदी ने झरना शुरू किया, एक ही चाहत आँखों में बस जाती है कि कितना रंग चढ़ा? इस रंग को प्यार का नाम भी दिया गया कि जिसकी ज्यादा रचे, उसे प्यार अधिक मिले। प्रकृति ने हमें जहाँ टेसू के फूल में भरकर रंग दिये हैं वहीं मेहंदी के अन्दर भी रंग घोल दिये हैं। कुछ लोग मेहंदी के बहाने प्रकृति को घर में न्योत देते हैं और कुछ दूर से ही निहारते रहते हैं। जिसने भी प्रकृति के इस प्रेम की ताकत को पहचाना है उसने प्रेम को भी पहचान लिया है और जिसने इन रंगों को अपने जीवन से दूर किया है, उससे प्रेम भी रूठ गया है। हमारे जीवन में मेहंदी ऐसे ही रची-बसी रहे जैसे जंगल में पलाश। जंगल भी महकेंगे और घर भी महकेंगे। घर भी महकेंगे और मन भी महकेंगे।
विशेष - यह सावन-भादो का महिना हम महिलाओं के लिये विशेष होता है और फेसबुक पर मेहंदी से रची हथेलियों के फोटोज की भरमार है, यह पोस्ट उन्हीं के लिये।
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Monday, August 27, 2018

बहन की मुठ्ठी में सम्मान रख दो


कई बार आज का जमाना अचानक आपको धक्का मारता है और आप गुजरे हुए जमाने में खुद को खड़ा पाते हैं, कल भी मेरे साथ यही हुआ। बहने सज-धज कर प्रेम का धागा लिये भाई के घर जाने लगी लेकिन भाई कहने लगे कि आज तो बहनों को कुछ देना पड़ेगा! कुछ यहाँ लिखने भी लगे कि बहनों की तो कमाई का दिन है आज। मुझे मेरी माँ का जमाना याद आ गया। जैसे ही गर्मियों की छिट्टियां होती और माँ के पास भाई का बुलावा आ जाता और माँ हमें लेकर अपने मायके चले जाती। ना भाई कभी कारू का खजाना लुटाता और ना ही माँ कभी उलाहना देती, बस मुठ्ठी में जो भी प्यार से रख देता, माँ के लिये साल भर के प्रेम की सौगात होती। मामा माँ को इतना सम्मान देते कि कभी मामी के स्वर ऊँचे नहीं होते। जब हमारे घर किसी भाई का विवाह होता तो मामा सबसे पहले आकर खड़े होते और वे मायरे में क्या लाए हैं यह कोई नहीं पूछता बस माँ के खुशी के आँसू ही उनका खजाना बता देते। राखी पर तो कोई आने-जाने का बंधन कभी दिखायी ही नहीं दिया। बस माँ की आँखों में हमेशा विश्वास बना रहा कि मेरी हर जरूरत पर मेरे भाई सबसे पहले आकर खड़े होंगे और हमारे मामा ने कभी उनके विश्वास को टूटने नहीं दिया। भाई-बहन का सम्मान वाला प्रेम मैंने अपने घर देखा है। माँ का जमाना बीता फिर हमारा जमाना आया, सम्मान तो अटल खड़ा था लेकिन उसकी बगल में चुपके से पैसा भी आकर खड़ा हो गया था। जैसे ही पैसा आपका आवरण बनने लगता है, रिश्तों से आवाजें आने लगती हैं जैसे यदि आपने बरसाती पहन रखी है तो उससे आवाज अवश्य होगी ही। लेकिन फिर  भी रिश्ते में सम्मान  बना रहा और हमारी आँखों में भी वैसे ही आँसू होते थे जैसे माँ की आँखों में होते थे, विश्वास के आँसू।
लेकिन ....... आज वैसा प्यार कहीं दिखायी नहीं देता है, सब ओर पैसे से तौल रहे हैं इस अनमोल प्यार को। बहन क्या लायी और भाई ने क्या दिया, बस इसी पड़ताल में लगे दिखते हैं। कोई कह रहा है कि आज तो बहनों का दिन है, आज तो बहनों की चाँदी है। त्योहार भाई का और पैसे के कारण हो गया बहनों का! बहन रात-दिन इसी में लगी रहे कि मेरा भाई हमेशा खुश रहे, वह मेरे ससुराल के समक्ष मेरा गौरव और सम्मान  बनकर खड़ा रहे और भाई रिश्ते को पैसे से तौल रहा है! कल राखी थी, मेरी ननद को अचानक बाहर जाना पड़ा, मेरे पैर के नीचे से धरती खिसक गयी कि राखी कौन बांधेगा? लेकिन वह आ गयी। तब पता लगा कि जिनके बहने नहीं होती वे भाई इस प्यार को पाने से कितना वंचित होते होंगे! यह धागा प्रेम का है इसे पैसे से मत तौलो। यदि आज भी तराजू के एक पलड़े में राखी रख दोगे और दूसरे में तुम्हारा सारा धन तो भी पलड़ा हिलेगा नहीं, लेकिन यदि तुमने सम्मान का एक पैसा ही रख दिया तो पलड़ा ऊपर चले जाएगा। बहनें सम्मान के लिये होती हैं, इनसे पैसे का हिसाब मत करो, ये ऐसा अनमोल प्यार है जो दुनिया के सारे रिश्तों के प्यार से बड़ा है। इस रिश्ते पर किसी की आंच भी मत आने दो, भाई का सम्मान ही इस रिश्ते को किसी भी उलाहने से बचा सकता है। भाई का बड़प्पन भी इसी में है कि वह अपनी बहन को कितना सम्मान देता है।
मखौल में मत उड़ाओ इस रिश्ते को, यह भारत भूमि की अनमोल धरोहर है। जहाँ दुनिया अपनी वासना में ही प्रेम को ढूंढ रही है, वहीं भारत में यह अनमोल प्यार आज भी हम भाई-बहनों के दिलों में धड़कता है। पैसे को दूर कर दो, बस प्यार से बहन की मुठ्ठी में सम्मान रख दो, जैसे मेरी माँ के हाथ में रखा जाता था। इतना सम्मान दो कि आने वाली पीढ़ी भी उछल-उछलकर कहे कि आज हमारी बुआ आयी है, जैसे हम कहते थे। मुँह से बोले शब्द ही कभी मिटते नहीं तो भाई लोग तुम तो धमाधम लिखे जा रहे हो, बहनों के प्यार को पैसे से तौल रहे हो! हम बहनें तो नहीं तौलती पैसे से, हमें तो प्रेम का ही धागा बांधना आता है, हमने इसी धागे को राखी का रूप दिया है। जो सबसे सुन्दर लगता है बस हम वही धागा खरीद लेते हैं क्योंकि हम मानते हैं कि हमारा भाई भी इतना ही सुन्दर है।
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Friday, August 24, 2018

#कुम्भलगढ़ जब बोल उठा

एक सुन्दर सी पेन्टिंग मेंरे सामने थी, लेकिन मुझे उसमें कुछ कमी लग रही थी। तभी दूसरी पेन्टिंग पर दृष्टि पड़ी और मन प्रफुल्लित हो गया। एक छोटा सा अन्तर था लेकिन उस छोटे से बदलाव ने पेन्टिंग में जीवन्तता भर दी थी। खूबसूरत मंजर था, हवेली थी, पहाड़ था, बादल था, सभी कुछ था लेकिन किसी जीवित का चिह्न नहीं था। दूसरे चित्र में कलाकार ने पैर के निशान बना दिये थे बस मेरी नजर में वह चित्र बोल उठा था। अचल प्रकृति को हम कितना भी सुन्दर चित्रित कर दें लेकिन मुझे उसमें खालीपन ही दिखायी देता है लेकिन जब कभी भी उसमें एक नन्ही चिड़िया ही आकर बैठ जाए, मेरे लिये वह दृश्य जीवन्त हो उठता है। अभी 15 अगस्त को कुम्भलगढ़ जाना हुआ, इसके पूर्व भी कई बार देखा है उस भव्य किले को लेकिन कभी उसकी बोली सुनाई नहीं दी। उस दिन रात को 7.30 बजे जब ध्वनी और प्रकाश का शो शुरू हुआ और पहाड़ों से टकराती आवाज गूंज उठी की मैं कुम्भलगढ़ हूँ तब लगा कि आज पूर्णता के दर्शन हो गये हैं। 
मौन तपस्वी सा खड़ा कुम्भलगढ़ उस दिन अचानक बोल उठा, 2000 वर्ष पूर्व का इतिहास अचानक ही जीवन्त हो गया। कल्पना में सारे पात्र आकार लेने लगे। सम्राट अशोक के पौत्र ने इस पहाड़ पर आकर किसी मानव के पैरों को प्रतिष्ठित किया था, मुझे अशोक के काल का स्मरण हो आया कि किस सोच के साथ उनका यहाँ पदार्पण हुआ होगा! समय बीत गया और राजा हमीर का जीवन सामने आ खड़ा हुआ। फिर किला बोल उठा, बधाई गीत सुनायी दिये। लेकिन महाराणा कुम्भा ने सन् 1458 में इसे साकार रूप देकर जीवन्तता का नाम दे दिया – कुम्भलगढ़। किले की प्राचीर से, किले के हर पत्थर से आवाज गूंज रही थी कि मैं कल भी जीवित था और आज भी जीवित हूँ। कल तक मैं जनता की रक्षा कर रहा था और आज जनता मेरा यशोगान कर रही है। मेरे कल के कृतित्व को अपने हाथ से छूकर अनुभव कर रही है और हर कोने में झांककर उस इतिहास को अनुभूत कर रही है, जो उसका वर्तमान नहीं था। हजारों सैलानी आ रहे हैं, हम भी उनमें से एक थे, बेटे ने कहा कि कैसे बनाया होगा उस काल में यह किला! पहाड़ की ऊंची चोटी पर खड़ा होकर यह किला अपनी कहानी खुद कहता है, अपने भी आये और पराये भी आये लेकिन किले ने प्रजा की सदैव रक्षा की।
बस किले के साथ एक दुखद प्रसंग भी जुड़ा हुआ है जो दिल में बने नासूर की तरह लगता है। हमारे इतिहास को कलंकित करता है। किले की जो हवाएं इठला रही थी वे अचानक से स्तब्ध हो जाती है, सन्नाटा छा जाता है, जिस महाराणा कुम्भा ने मुझे अस्तित्व दिया उसी कुम्भा को सत्ता के लालच में बेटे ने तलवार से काट दिया। बेटा कहता है कि कब तक धैर्य धरूं, मेरा यौवन बीत रहा है और आपका अन्त नहीं होता और मन्दिर में ही तलवार उठ जाती है। जिस कुम्भा ने संगीत दिया, नृत्य दिया, वीरता दी, उसी कुम्भा को पुत्र ने अन्त दिया। पुत्र भी नहीं रहा लेकिन दुनिया को इतना कुछ देने वाले का भी ऐसा अन्त भारत के लालच की सच्चाई को दिखाता है। सत्ता का लालच कभी समाप्त नहीं होता, हर मजबूत किला यही कहता है और कुम्भलगढ़ भी यही कह रहा था।
लेकिन फिर कहानी आगे बढ़ती है, इसी किले ने बालक उदयसिंह को शरण दी, यहीं पर प्रताप और उनके पुत्र अमर सिंह का जन्म हुआ, यहीं से हल्दीघाटी का युद्ध लड़ा गया, यहीं से दिवेर का युद्ध लड़ा गया। आखिर प्रताप ने विजय पायी और फिर कुम्भलगढ़ छूट गया। उदयसिंह ने उदयपुर बसा लिया और प्रताप ने चावण्ड को राजधानी बना लिया। अमर सिंह भी उदयपुर आ गये। चारों तरफ पहाड़ और एक पहाड़ पर किला, दुश्मन का पहुंचना नामुमकिन। आज भी वहाँ जाकर हमारा मोबाइल खामोश हो गया, नेटवर्क नहीं। लेकिन लोग आ रहे थे, शो के लिये कुछ बैंचें लगी थीं, हमने सोचा कि शायद दर्शक कम ही आते होंगे लेकिन जैसे ही 7.00 बजे, हलचल शुरू हो गयी, पंक्तियों पर कार्पेट बिछने लगे और देखते ही देखते पूरा मैदान भर गया। हम जो पसरकर बैठे थे अब सिकुड़ने लगे थे। चारों तरफ उत्सुकता थी, सभी इतिहास में जाने को उत्सुक थे। चारों तरफ सन्नाटा था और तभी पहाड़ों को चीरती हुई आवाज गूंज उठी कि मैं कुम्भलगढ़ हूँ। कथा आगे बढ़ती गयी और किले पर रोशनी होती गयी। अन्त में पूरा किला जगमगा उठा, आज विद्युत का प्रकाश है कल मशाले जलती होगी, आज मोटर गाड़ी की पीं-पीं है कल घोड़ों की टापे गूंजती होगी। किले और पूरे क्षेत्र को घेरती हुई 34 किलोमीटर की लम्बी दीवार पर जब घोड़े चलते होंगे और दीवार पर बने मोखों में बन्दूक लगाये सैनिक तैनात रहते होंगे तब कैसा मंजर होगा, बस यही कल्पना करते रहे और शौ समाप्त हो गया। 

Wednesday, August 22, 2018

यह भी बलात्कार का ही मामला है


अमेरिका में मैंने देखा कि वहाँ पर हर प्राणी के लिये नियत स्थान है, मनुष्य कहाँ रहेंगे और वनचर कहाँ रहेंगे, स्थान निश्चित है। पालतू जानवर कहाँ रहेंगे यह भी तय है। मनुष्यों में भी युवा कहाँ रहेंगे और वृद्ध कहाँ रहेंगे, स्थान तय है। भारत में सड़क के बीचोंबीच बैठी गाय और सड़क पर चलती भैंस मिल जाएंगी, कुत्ते तो हर कोने में अपना राग बजाते दिख ही जाएंगे। हर घर में बिल्ली सेंध मारने की फिराक में रहेगी और कबूतर आपके घर में घौंसला बनाने के फेर में। गाँव में चले जाइए, बकरी रात को घर के अन्दर बंधी मिलेगी। भारत में हमारी दुनिया एक है। मनुष्यों में भी बच्चे-बूढ़े सब साथ हैं। ना बच्चों के लिये होस्टल को पसन्द किया जाता है और ना ही वृद्धों के लिये ओल्ड एज होम। घर में माँ का शासन चलता है और माँ सबकी पालनहार होती है। हम भोग-विलास के लिये गृहस्थी नहीं बसाते अपितु माता-पिता की सेवा और संतान को संस्कार देने के लिये गृहस्थी बसाते हैं। लेकिन जब से दुनिया एक गाँव में बदल गयी है हम सारी ही व्यक्तिगत-सुखकर परम्पराओं को अंगीकार करते जा रहे हैं। कभी सशक्त हाथ अशक्त हाथ को थामने के लिये होते थे लेकिन आज सशक्त हाथ अशक्त हाथों को धकेलने के लिये काम आने लगे हैं। पूर्व में हम घर का फालतू सामान भी नहीं फेंकते थे, उसके दोबारा उपयोग के बारे में सोचते थे लेकिन आज अपने ही माता-पिता को फेंकने के बारे में सोच लेते हैं।
कल एक तस्वीर वायरल हो गयी, दादी और पोती की। पोती वृद्धाश्रम देखने जाती है और दादी वहीं मिल जाती है। अचानक मिलने की खुशी की जगह समाज का दर्द और शर्म निकल आयी। पोती समझ नहीं पा रही थी कि मेरी दादी यहाँ क्यों है! मुझे तो लगता है कि उस परिवार में कुछ भारतीय संस्कार शेष रहे होंगे जो पोती को बताया गया कि दादी रिश्तेदारी में गयी है। नहीं तो ऐसे परिवारों में नफरत इतनी भरी होती है कि पोती दादी को पहचानती ही नहीं। स्कूल की सहेलियां उसके साथ थी, उसके परिवार का सम्मान जुड़ा था, लेकिन पोती ने दादी को पहचाना और गले मिलकर रोने लगी। अभी तो हम अनेक परिवारों में देख रहे हैं कि बच्चों को दादा-दादी से दूर रखा जाता है, उनके अन्दर प्यार पनपने की जगह नफरत पनपती है और ऐसे बच्चे कभी दादा-दादी को पहचानते तक नहीं।
अब प्रश्न यह है कि क्या बेटा माँ को वापस घर ले जाएगा? क्या माँ वापस जाएगी? क्या बेटे को अक्ल आएगी? क्या माँ को वापस जाना चाहिये? जब हम गृहस्थी बसाते हैं तब पूर्ण समर्पण का भाव रखना होता है जैसे फसल लगाने से पहले दाने को जमीन में समर्पित होना ही पड़ता है। खुद को समर्पित करने पर ही नयी पौध आती है और तभी घर बसता है। हिन्दू परिवार में लड़की को लड़के के घर जाना होता है और लड़के के परिवार को अपना परिवार मानने की सौगंध खायी जाती है। लेकिन इसके विपरीत आज लड़की अपने ससुराल याने लड़के के परिवार को अपना परिवार नहीं मानती, वह कहती है कि यदि तू मेरे परिवार को अपना परिवार माने तो मैं भी मान लूंगी। आजकल स्वार्थ की परम्परा ने जन्म ले लिया है, हम सौगन्ध कुछ लेते हैं और आचरण कुछ करते हैं। जिस प्रकार से लड़कियों का व्यवहार बदल रहा है, उसमें गलत कुछ नहीं है, बस इतना ही है कि यदि आपको लड़के के परिवारजन के साथ नहीं रहना है तो आप विवाह के समय सौगन्ध से मना कर दो। लड़के के साथ अपने घर से विदा होने के बाद ससुराल मत जाओ। लेकिन यह दोहरा रवैया चरित्र हीनता है। आप सौगन्ध किसी बात की खा रही हैं और काम कुछ और कर रही हैं! इसलिये ही आज घर-घर में माता-पिता पर संकट आया हुआ है। वृद्धावस्था सभी की आनी है और इन अशक्त हाथों को सशक्त हाथ की जरूरत पड़ने ही वाली है। क्या हम सभी वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर कर दिये जाएंगे? घर से यदि माता-पिता को रद्दी के सामान की तरह उठाकर कबाड़ी को दे दिया जाएगा तो कैसे परिवार चलता रहेगा! पुत्र आँखे बन्द कर केवल अपने भोगविलास की ही सोचता रहे और उसकी पत्नी घर के माता-पिता को उठाकर बाहर फेंक दे तो क्या यह मनुष्यता की श्रेणी में आएगा? यह भी मानवाधिकार का मामला है यह यूँ कहूँ कि यह भी बलात्कार का ही मामला है, तो ज्यादा ठीक होगा।
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Monday, August 20, 2018

डिजिटल होते स्वर्ग

कोई आपको फोलो करने को कहे और एक के बाद एक आदेश दे कि अब यह करे और अब यह करें! आप क्या करेंगे? मेरी दो राय है, यदि महिला है तो फोलो आसानी से करेगी, फिर चाहे वह किसी भी आयु की क्यों ना हो लेकिन यदि पुरुष है और उम्रदराज हो गया है तो किसी का आदेश कभी नहीं मानेगा। मेरे पति के हाथ में जैसे ही मोबाइल आता है, वह चाहते हैं कि पहले ही झटके में सारे काम हो जाएं। लेकिन मोबाइल है कि वह उन्हें अपनी अंगुली पर नचाना चाहता है। एक क्लिक करी, तो लिखा आएगा कि अब यह करो, फिर वह भी कर दिया तो कहेगा कि अब यह करो। बस इतने में तो मूड उखड़ जाता है। सारी जिन्दगी किसी की नहीं मानी और अब इस उम्र में यह पिद्दी सा मोबाइल लगा है आदेश पर आदेश देने। वह पटक देते हैं इसे और फिर मैं सदा से आदेश मानने की मारी इस पिद्दी से मोबाइल का आदेश मानते हुए उस काम को अंजाम देती हूँ। मेरे सामने जब भी कोई पुरुष होता है तो सबसे पहले यही कहता है कि मुझे इस मोबाइल में केवल लाल और हरा बटन समझ आता है, बाकि के चक्कर में मैं पड़ता ही नहीं। मैंने पुरुष लिख दिया है तो आपकी भौहें तन गयी होंगी, अरे गुस्सा मत कीजिये आप लोग तो लड़के हैं अभी। पुरुष तो मैं 60 साल के बाद कहती हूँ। इसका भी कारण है, जब नयी पीढ़ी को बात करते देखती हूँ तो वे खुद के लिये boys या guys का ही प्रयोग करते हैं और पत्नियों के लिये लड़कियों का। चाहे वे लड़कियाँ चालीस को पार कर गयी हों और खुद पचास को। इसलिये 60 तक आप लड़के हैं और उसके बाद पुरुष। तो मैं बात पुरुषों की कर रही थी कि वे मोबाइल से कैसा बेर रखते हैं! 
अब जमाना है डिजिटल लेन-देन का, सारे ही ऑफिस कम्प्यूटर से लेस हैं तो यमराज के दरबार में चित्रगुप्त के बही-खाते भी बदल दिये गये हैं वहाँ पर भी कम्प्यूटर आ गया है। जैसे ही कोई जीव यमलोक पहुंचता है, चित्रगुप्त उससे उसकी पहचान पूछते हैं। अभी तक तो सब कुछ ठीक ही चल रहा था लेकिन जैसे ही पहचान पत्र कम्प्यूटर में आ गया चित्रगुप्त भी मांगने लगे हैं पहचान-पत्र। अब 90 के बाद के पुरुष जैसे ही चित्रगुप्त के सामने प्रस्तुत हुए, वे उनका हिसाब-किताब निकालने के लिये कम्प्यूटर खंगालने लगे। पूछा कि मोबाइल काम में लेते थे, वे शान से बोले कि हाँ लेते थे। तो बताओ अपना नम्बर। नम्बर तो याद था, बता दिया लेकिन जैसे ही नम्बर से मोबाइल खोला तो वहाँ लाल और हरे बटन के उपयोग के अतिरिक्त कुछ ना आए! चित्रगुप्त भागे-भागे यमराज के पास गये, बोले कि क्या करें, ऐसे केस बहुतेरे आ रहे हैं! यमराज ने कहा कि डालो सभी को नरक में। जीवात्मा अड़ गयी कि यह कैसा न्याय है? मैंने इतने पुण्य कर्म किये और मुझे नरक! यमराज ने समझाया कि बात पुण्य और पाप की नहीं है, बात है डिजिटल स्वर्ग की। यहाँ स्वर्ग में सभी को मोबाइल और कम्प्यूटर दिये गये हैं, वे सारे ही काम इनसे करते हैं, अब अप्सराएं भी ऑनलाइन ही उपलब्ध हैं तो आप अपना जीवन कैसे काटेंगे? स्वर्ग का तो मतलब रह ही नहीं जाएंगा ना! नरक में किसी के पास मोबाइल और कम्प्यूटर नहीं है वहाँ पुराना हिसाब ही चलता है तो आप वही फिट हो सकेंगे ना!
बड़ी दुविधा में फंस गये हैं लोग, फिर यमराज ने एक मार्ग निकाला, कहा कि हम सात दिन का क्रेश कोर्स चलाते हैं, यदि आपने सीख लिया तो आपको स्वर्ग में प्रवेश मिल जाएगा नहीं तो हम कुछ नहीं कर सकेंगे और यह कहकर यमराज ऑफलाइन हो गये। जीवात्मा बड़ी दुविधा में पड़ गये कि सात दिन में कैसे सीख पाएंगे! मन ही मन सोचने लगे कि कितना कहा था पत्नी और बच्चों ने कि सीख लो, थोड़ा तो सीख लो लेकिन तब तो हेकड़ी दिखायी कि नहीं जी हम तो नहीं सीखेंगे लेकिन अब! अब दादाजी मोबाइल की एबीसीडी सीख रहे हैं और चिन्ता इस बात की है कि यदि सात दिन में नहीं सीखा तो नरक के द्वार खुल जाएंगे फिर वही गाँव का 200 साल पुराना जीवन जीना पड़ेगा। चिन्ता यह भी खाए जा रही है कि पत्नी भी साथ नहीं रहने वाली क्योंकि उसने तो सीख लिया था मोबाइल। वह तो व्हाटसएप भी चला लेती थी और फेसबुक भी। यहाँ उसका काम तो चल ही जाएगा। सोचने का समय अब शेष नहीं है, वे पिल पड़े हैं सबकुछ सीखने को। जैसा मोबाइल आदेश देता है उसे फोलो करने में अब गुस्सा नहीं आता, सवाल स्वर्ग का जो ठहरा! जो कल तक समझ के परे था अब जल्दी-जल्दी समझ आने लगा है। पत्नी की आवाज कानों में बजने लगी है कि मैं कहती थी कि सीख लो, मेरी बात नहीं मानते थे, अब! भाई क्या करें स्वर्ग भी डिजिटल जो हो गये हैं! 

Monday, August 6, 2018

मित्र मिला हो तो बताना


दुनिया में सबसे ज्यादा अजमाया जाने वाला नुस्खा है – मित्रता। एलोपेथी, आयुर्वेद, होम्योपेथी, झाड़-फूंक आदि-आदि के इतर एक नुस्खा जरूर आजमाया जाता है वह है विश्वास का नुस्खा। हर आदमी कहता है कि सारे ही इलाज कराए लेकिन मुझे तो इस नुस्खे  पर विश्वास है। तुम भी आजमाकर देख लो। ना मंहगी दवा का चक्कर, ना कडुवी दवा का चक्कर, ना लम्बी दवा का चक्कर, बस छोटा सा नुस्खा और गम्भीर से गम्भीर बीमारी भी चुटकी बजाते ही ठीक। ऐसी ही होती है मित्रता! सारे रिश्तों पर भारी! माता-पिता बेकार, भाई-बहन बेकार, सारे रिश्ते बेकार बस मित्र है विश्वास पात्र! वातावरण में ऑक्सीजन की तरह घुली हुई है मित्रता की दलील। बचपन की याद आ गयी, एक सहेली पास आती है और कहती है कि – तू मेरी सबसे अच्छी सहेली है! मैं उसकी तरफ देखती हूँ और सोचती हूँ कि मुझ पर यह कृपा क्यों! जल्दी ही उसे और कोई मिल गया और मैं किस कोने में गयी, ना उसे पता और ना मुझे पता! फिर कुछ बड़े हुए फिर किसी ने कह दिया कि तुम मेरी सबसे अच्छी सहेली हो। फिर वही अन्त! और कुछ बड़े हुए किसी ने कहा – आप मेरी सबसे अच्छी सहेली हैं। सम्बोधन बदलते रहे लेकिन कहानी एक सी रही। कोई मित्र स्थायी नहीं हुआ। जब मुझसे काम पड़ा मित्रता की कसमें खा ली गयीं और जब काम खत्म तो मित्रता और मित्र दोनों की रफूचक्कर। जब मेरी समझ पुख्ता हो गयी तब मैं कहने लगी कि भाई रहने दो, तुमसे यह नहीं हो पाएगा। मेरे पास देने को कुछ नहीं है, बस मैं विश्वास दे सकती हूँ, तुम्हारी खुशी में खुश हो सकती हूँ और तुम्हारे दुख में दुखी, इसके अतिरिक्त मेरे पास कुछ नहीं है देने को। लेकिन लोग कहते कि नहीं हमें आपका साथ अच्छा लगता है इसलिये आपसे मित्रता चाहते हैं। मैं कहती रही कि यह चौंचले कुछ दिन के हैं फिर वही ढाक के तीन पात। यही होता, उनकी आशाएं धीरे-धीरे जागृत होती, मैं किसी के काम आती और काम जैसे ही होता मित्र और मित्रता दोनों नदारद! लोगों को मिलते होंगे सच्चे मित्र, मुझे तो कोई खास अनुभव नहीं आया।
इसके परे रिश्तों की कहानी ज्यादा मजबूती से खड़ी दिखायी दी। रिश्तों के पन्ने फड़फड़ाते जरूर हैं लेकिन ये अपनी जिल्द फाड़कर दूर नहीं हो पाते, कभी जिल्द फट भी जाती है लेकिन अधिकांश किताब हाथ में रह ही जाती है। जीवन में कुछ भी अघटित होता है, ये रिश्ते ही हैं जो रिश्तों की मजबूरी से चले आते हैं, उन्हें आना ही पड़ता है। मित्रता तो ठेंगा दिखा दे तो आप कुछ नहीं कर सकते लेकिन रिश्ते ठेंगा दिखा दें तो अनेक हाथ आ जाते हैं जो उन्हें आड़े हाथ ले लेते  हैं। हमने मित्रता की आँच को इतनी हवा दी कि वह धू-धू कर जल उठी, उसने आसपास के सारे ही रिश्तों को लीलना शुरू किया, हमने भी ला-लाकर अपने रिश्ते इस आग में फेंकना शुरू किये और बस देखते ही देखते केवल मित्रता की आग हमारे सम्बन्धों की रोटी सेंकने को शेष रह गयी, शेष आग बुझती चले गयी। कुछ दिनों बाद देखा तो हमारे चारों तरफ आग ही आग थी लेकिन मित्र कहीं नहीं थे। रिश्तों को तो स्वाह कर ही दिया था, मित्र तो आहुति चाहते थे, आहुति पड़ना बन्द तो मित्र भी पानी डालकर चले गये। लेकिन मित्रता में एक फायदा जरूर है, जब चाहो तब तक रिश्ता है, एक ने भी नहीं चाहा तो तू तेरे रास्ते और मैं मेरे रास्ते। रिश्तों में यह नहीं हो सकता, कितने भी रास्ते अलग बना लें, कहीं ना कहीं एक दूसरे से टकरा ही जाएंगे! रिश्तों की तो बात ही अलग है लेकिन जिन मित्रता को हम रिश्तों का नाम दे देते हैं वे भी हमारा साथ निभाते हैं और जिनको केवल मित्र कहकर छोड़ देते हैं वे कबूतर के घौंसले ही सिद्ध होते हैं।
कल मित्र-दिवस आकर निकल गया, बाजार में तेजी आ गयी। हर कोई अपने मित्र को उपहार देना चाहता था, इसलिये बाजार में थेंक्स गिविंग की तरह रौनक थी। सोशल मीडिया के कारण कंजूस लोगों का भी काम बन गया था, फूलों का गुलदस्ता सभी तरफ घूम रहा था। कहीं भी विश्वास दिखायी नहीं दिया, कहीं प्रेम दिखायी नहीं दिया, कहीं अनकही बातें सुनायी नहीं दीं! कहीं राजनैतिक मखौल दिखायी दिया, कहीं धार्मिक उदाहरण खोज लिये गये और कहीं सोशल मिडिया की दोस्ती ही दिखायी दी। मेरा मन बहुत करता है कि कोई ऐसा हो जिसके साथ घण्टों मन की बात की जा सके, मिलते भी रहे हैं ऐसे मित्र लेकिन वे समय के साथ बिसरा दिये गये। कहीं समय ने उन्हें पीछे धकेल दिया तो कहीं आर्थिक सम्पन्नता और विपन्नता ने तो कहीं बदलते विचारों ने। मित्रता वही शेष रही जो दूर बैठी थी, नजदीक आने पर तो तू मुझे क्या दे सकता है और क्या नहीं दे पाया, इसका हिसाब ही मन ही मन लगाया जाता है। इसलिये मैं मित्रता की कमसें नहीं खाती, ना ही मित्रता को रिश्तों से ऊपर रखती हूँ क्योंकि मैं जानती हूँ मित्रता के मायने। इसकी उम्र बहुत छोटी होती है। लम्बी उम्र यदि मिल जाती है तो वह दूरियाँ लिये होती हैं। इसलिये बार-बार कहती हूँ कि मित्रता को इतना महान मत बनाओ कि रिश्ते ही दूर चले जाएं। मित्र होते हैं लेकिन उनको बाजार के  हवाले मत करो, जिन रिश्तों को भी हमने बाजार के हवाले किया है उनमें ठहराव अधिक दिन नहीं रह पाया है। मित्रता दिवस भी मनाओ लेकिन अपने अन्दर के सच्चे मित्र को खोजकर। आज ऐसी पोस्ट लिखकर सभी मित्रों को नाराज कर दिया, लेकिन मुझे बताएं जरूर कि किसी को ऐसा मित्र मिला क्या जो हर कटु परिस्थिति में उसके साथ खड़ा था। हम सभी को ऐसे लोगों का अभिनन्दन तो करना ही चाहिये।
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