Thursday, July 19, 2018

काले बदरा और पहाड़ का मन्दिर


आँखों के सामने होती है कई चीजें लेकिन कभी नजर नहीं पड़ती तो कभी दिखायी नहीं देती! कल ऐसा ही हुआ, शाम को आदतन घूमने निकले। मौसम खतरनाक हो रहा था, सारा आकाश गहरे-काले बादलों से अटा पड़ा था। बादलों का आकर्षण ही हमें घूमने पर मजबूर कर रहा था इसलिये निगाहें आकाश की ओर ही थीं। काले बादलों के समन्दर के नीचे पहाड़ियां चमक रही थीं और एक पहाड़ी पर बना नीमज माता का मन्दिर भी। कभी ध्यान ही नहीं गया और ना कभी दिखायी दिया कि यहाँ से नीमज माता का मन्दिर भी दिखायी देता है! दूसरे पहाड़ को देखा, वहाँ भी बन रहे निर्माण दिखायी दिये। जब आसमान घनघोर रूप से काला हो तब उसके नीचे की सफेदी दिखायी दे जाती है। काले बादल कह रहे थे कि लौट जाओ, हम कहर बरपाने वाले हैं लेकिन उनके अद्भुत सौंदर्य को देखने का मोह छूट नहीं रहा था और जब एकाध  बूंद हमारे ऊपर आकर चेतावनी दे गयी तब हम वापस लौट ही गए। लेकिन नाम मात्र की बारिश आकर रह गयी और वे काले-बदरा न जाने कहाँ जाकर अपना बोझ हल्का कर पाएं होंगे! लेकिन हमें तो सीख दे ही गये कि जब काले बादल आकाश में छाये हों और कुछ सूरज का प्रकाश पहाड़ों पर गिर रहा हो तब पहाड़ों पर बने मन्दिर चमक उठते हैं और दूर से दिखायी देने लगते हैं।
एक बार मैं पाटन (गुजरात) के इतिहास पर लिखे उपन्यास को पढ़ रही थी, वहाँ के राजा के मंत्री एक सपना देखते हैं कि गिरनार की पहाड़ियों पर मन्दिर की श्रंखला हो तो कितनी सुन्दर लगेंगी! यह कल्पना एक मंत्री की नहीं थी अपितु भारत के हर राजा और मंत्री की यही कल्पना रही है कि पहाड़ों पर दूर से चमकते मन्दिर हों और उन पर लहराता ध्वज भारतीयता का प्रतीक बनकर दूर से दिखायी देता रहे। न जाने कितने पहाड़ों पर कितने मन्दिर बने हैं, यह भारत की ही विशेषता है। शायद किसी भी अन्य देश में ऐसी परम्परा नहीं है। सौंदर्य को प्रकृति के साथ कैसे एकाकार करें यह बात हमारे शिल्पकार बहुत अच्छी तरह से जानते थे। समुद्र के किनारे आकाश-दीप बनाने की परम्परा भी शायद यहीं से आयी होगी! जैसे ही आकाश-दीप दिखायी देता है, नाविक चिल्ला उठते हैं कि किनारा आ रहा है, कोई नगर आ रहा है, ऐसे ही जब पहाड़ पर कोई ध्वजा लहराती दिखायी दे जाती है तब हम जान लेते हैं कि यह भारत है। कैसा भी काला अंधेरा हो लेकिन हमारे मन्दिर राहगीरों का पथ-प्रदर्शन करेंगे ही। हमारे सम्बल के लिये कोई सहारा होगा ही। जिन पहाड़ों पर वीराना पसरा हो, वहाँ भी मन्दिर और ध्वजा मिल ही जाती है, मतलब हम दूसरों को रास्ता दिखाने का काम हर हाल में करते ही हैं। शायद यही हमारी थाती है। कोई मार्ग ना भटके और भटक  भी जाए तो उसे ठिकाना मिल जाए, आसरा मिल जाए, हमारे भारत में यही परम्परा रही है। हजारों सालों से यही आकर्षण विदेशियों को भारत की ओर खींच लाता है, कुछ भारत को समझने चले आते हैं तो कुछ लूटने चले आते हैं। आज भी यह सिलसिला जारी है, समझने का और लूटने का भी। शायद बिजली की कृत्रिम रोशनी के कारण हमें पहाड़ों पर बने हमारे आकाश-दीप दिखायी नहीं देते, शायद किसी दिन ऐसे ही काले बादल जब घिरेंगे तब हमें ये आकाश-दीप ही रास्ता दिखाएंगे। फिर हमें समझ आने लगेगा कि कौन समझने चला आया है और कौन लूटने चला आया है। अभी तो सब एकाकार हो रहे हैं, हम लुटेरों को पहचान ही नहीं पा रहे हैं, हम उदारता का परिचय दे रहे हैं। लेकिन ये आकाश-दीप हमें मार्ग जरूर दिखाएंगे इसलिये इन आकाश-दीपों को सम्भाल कर रखिये।
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Wednesday, July 18, 2018

अनावश्यक नुक्ताचीनी से बचो


चटपटी खबरों से मैं दूर होती जा रही हूँ, डीडी न्यूज के अतिरिक्त कोई दूसरी न्यूज नहीं देखती तो मसाला भला कहाँ से मिलेगा। आप लोग कहेंगे कि नहीं, दूसरे न्यूज चैनल भी देखने चाहिये लेकिन मैं नहीं देखती। शायद यह मेरी कमजोरी है कि अनावश्यक नुक्ताचीनी मैं देख नहीं पाती। आप कभी अंधड़ में खड़े हो जाइए, कितना ही सर और चेहरे को कपड़े से ढक लें लेकिन कुछ ना कुछ धूल तो आपके शरीर पर चिपक ही जाएगी, यही बात झूठ का प्रसार करती दुनिया के साथ है। किसी न किसी बिन्दू को तो आप सच मान ही बैठेंगे और झूठ फैलाने वाले का काम हो गया। सोशल मीडिया पर भी यही है, हम विपरीत सोच वालों को तो नजर-अंदाज कर देते हैं लेकिन जब अपना ही कोई व्यक्ति अनावश्यक नुक्ताचीनी करने लगे तो कहीं ना कहीं असर जरूर होता है, आप अपने लोगों के ही दुश्मन बनने लगते हैं। देश में ढेरों बुराइयाँ हैं, यह बुराइयाँ देश की नहीं है अपितु हम व्यक्तियों की बुराई है। हम अपने ऊपर कम लेकिन दूसरे पर अधिक ध्यान देते हैं, दूसरे की बुराई को तूल देने में एक क्षण का भी विलम्ब नहीं करते फिर चाहे वह बुराई हम में भी हो।
मेरे फ्लश का नल खराब हो गया, अपने प्लम्बर के बुलाया, उसकी समझ में कुछ नहीं आया, फिर दूसरे को बुलाया वह भी सीट पर बैठकर ताकता ही रहा, लेकिन कुछ देर बाद हाथ खड़े कर दिये। तभी मेरे दीमाग ने झटका खाया कि कम्पनी में फोन करो। टोल-फ्री नम्बर ढूंढकर फोन किया, व्यक्ति आया और 100 रू. में सबकुछ दुरस्त। तब से निश्चय कर लिया है कि कुछ भी कठिनाई हो, कम्पनी में फोन करो। जो जिसका प्रोडक्ट है, उसे ही पूछो ना बाबा! इन दिनों राजस्थान की चिन्ता करने वाले कई लोग सोशल मीडिया पर दिखायी दे रहे हैं, वे कभी राजस्थान में आकर दस दिन नहीं रहे होंगे लेकिन दूर-परदेश में बैठकर नुक्ताचीनी करते हैं। माना कि आपका अधिकार बनता है नुक्ताचीनी का लेकिन बिना कोई जाँच-पड़ताल किये आप पूरे फ्लश सिस्टम को खोलकर बैठ जाएंगे क्या? एक पाना और एक पेचकस लेकर सारे ही प्लम्बर बने बैठे हैं। किसी के बारे में कुछ भी लिख रहे हैं! वे सोचते हैं कि हमने सिद्ध कर दिया कि हम विद्वान है और  दूर बैठकर भी खबरों की पकड़ रखते हैं लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि आपकी जो छवि पाठकों के  बीच थी वह एक गलत पोस्ट से धूमिल हो गयी है। चटपटी खबरे परोसने का शौक कई बार बहुत महंगा पड़ता है, आपकी बरसों की साधना एक ही झटके में नेस्तनाबूद हो जाती है। मैं जब भी दूर खड़े होकर रोटी सेकने वालों की ऐसी ही नुक्ताचीनी की खबर पढ़ती हूँ तब सोचती हूँ कि इसने जो आजतक लिखा है, उसमें भी शायद ऐसा ही चटपटापन हो और मैं उन सारी पोस्ट को एक ही क्षण में अपने मन से डिलिट कर देती हूँ। इसलिये ही मैं चटपटी खबरों से दूर रहती हूँ क्योंकि चटपटी के चक्कर में मेरा ही विश्वास खतरे में पड़ जाता है। मैं भ्रमित हो जाती हूँ कि किसके सत्य को सत्य मानूँ? तब चुपचाप डीडी न्यूज से काम चलाती हूँ और सोशल मीडिया पर ऐसे नुक्ताचीनी वाले खबरचियों से दूरी बनाकर रखती हूँ। मुझे लगता है कि हम अपने दीमाग से सोचें ना कि किसी के भ्रमित करने से झांसे में आएं। लिक्खाड़ बनने की चाह में कहीं हम अविश्वसनीय ना बन जाए, इस बात की चिन्ता अवश्य करनी चाहिये। पाठकों का खजाना जो हमारे पास है, वह पलक झपकते ही हमसे दूर हो जाता है, जब विश्वास नहीं रहता। इसलिये सावधान! अनावश्यक नुक्ताचीनी से बचो।  
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Thursday, July 12, 2018

बेगम जान


एक पुरानी फिल्म जो शायद दो साल पहले अपनी कहानी पर्दे पर कह रही थी, उसकी चर्चा भला मैं आज क्यों करना चाहती हूँ, यही सोच रहे हैं ना आप! बेगम जान जो नाम से ही मुस्लिम पृष्ठभूमि की दिखायी देती है, साथ में एक कोठे की कहानी बयान करती है। कल टीवी पर आ रही थी तो आखिरी आधा घण्टे की फिल्म देखी, बस उसी आधा घण्टे की  बात करूंगी, शेष फिल्म में क्या था, मुझे नहीं मालूम। बेगम जान का कोठा है, कई लड़कियाँ वहाँ रहती हैं लेकिन हुकुम मिलता है कि कोठा खाली कर दो। बेगम जान बन्दूक लेकर खड़ी हो जाती है और सामने थी गुण्डों की फौज। लड़कियों के हाथ में बन्दूक है, युद्ध हो रहा है लेकिन मुठ्ठी भर लड़कियां भला कहाँ ठहरती, कुछ मर जाती हैं और कुछ बच जाती हैं। गुण्डों का सरदार हवेली में आग लगा देता है और अपने हुक्मरानों से कहता है कि कोठा बर्बाद हो गया लेकिन मेरे लौण्डों को ईनाम के रूप में कुछ समय चाहिये जिससे यह कोठा कुछ देर के लिये आबाद हो सके। जलती हवेली का दृश्य है - बेगम जान सहित बची लड़कियां हँसते-हँसते हवेली का दरवाजा बन्द कर लेती हैं, अन्दर एक बुजुर्ग महिला सबको कहानी सुनाती है कि एक समय चित्तौड़ के किले पर खिलजी ने डेरा डाला था, जब सारे रास्ते बन्द हो गये तब राजपूज रानियों नें अपनी आबरू बचाने को 12 हजार की संख्या में जौहर किया था याने जलती आग में कूद गयी थी। हवेली जल रही है, कहानी कहने वाली का और सुनने वालियों का तन अग्नि में भस्म हो जाता है। बाहर खड़े गुण्डे और हुक्मरान सदमें में आ जाते हैं।
पद्मावती फिल्म पर बहुत विवाद किया गया, कुछ महिलाओं तक ने कहा कि जौहर गलत परम्परा है, बहुत खिल्ली उड़ायी गयी। कोई कह रहा था, युद्ध करके मरो और किसी का अर्थ था कि गुलाम बन जाओ लेकिन जीओ। बेगम जान कोठे की कहानी है वह भी मुस्लिम। आबरू को नीलाम करना ही उनका काम है लेकिन वे भी जानती हैं कि स्वतंत्रता का मतलब क्या  होता है? जब भेड़िये शरीर को नोचते हैं, उसका अर्थ क्या होता है? मरते समय मुस्लिम महिला का आग में जलना, धर्म विरोधी होता है लेकिन उस समय उन क्षत्राणियों ने रानी पद्मावती को याद कर जौहर किया।
मैं उन तथाकथित लेखिकाओं से पूछना चाहती हूँ कि बेगम जान के जौहर के लिये कुछ लिखना चाहेंगी या आपकी कलम हिन्दुस्थान की तहजीब का मखौल उड़ाने के लिये ही स्याही भरती है। जिन परम्पराओं का सदियों से सभी ने सम्मान किया, उन परम्पराओं का केवल इसलिये मखौल उड़ाया गया क्योंकि आपका लेखन मखौल उड़ाने के लिये ही पैदा हुआ है और जो समाज  हित में ना लिखकर केवल विद्रूपता के लिये ही लिखता है वह लेखक नहीं होता अपितु विनाशक होता है। मेरे पाठक मुझे क्षमा करेंगे जो बीती बात को यहाँ स्थान दिया। लेकिन यह रोजमर्रा की कहानी है कि हम हमारी परम्पराओं के विरोध में अपनी घृणित लेखनी लेकर खड़े हो जाते हैं। ना राम के आदर्श की लाज रखते हैं और ना कृष्ण के योगेश्वर स्वरूप की। एक बार पुन: क्षमा सहित।
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Tuesday, July 10, 2018

कहीं जीवित आवाज थम ना जाए!


अभी चार-पाँच दिन पहले एक फोन आया, अनजान नम्बर था तो सोचा कि कोई ना कोई व्यावसायिक हितों से जुड़ा फोन होगा तो अनमने मन से बात की लेकिन कुछ देर में लगा कि नहीं यह व्यावसायिक नहीं कुछ सामाजिक सरोकारों का फोन है। आवाज आयी की मैं आपको अपनी दो पुस्तकें भेजना चाहता हूँ, मैंने पूछा कि किस विधा की पुस्तके हैं। लेकिन मेरी बात कम सुनी गयी और सामने वाले को अपनी बात कहने की अधिक उत्सुकता थी, तो कहा कि मैं 92 साल का व्यक्ति हूँ, 82 वर्ष तक कुछ नहीं लिखा लेकिन उसके बाद 11 पुस्तकें लिखी। मैंने फिर कोई प्रश्न नहीं किया और कहा कि आप भेज दें। सोचा कि जहाँ इतनी पुस्तकें भेंट स्वरूप आयी हैं, वहाँ दो और सही। आखिर कल पुस्तकें भी आ गयीं और साथ में हाथ से लिखा एक पत्र भी। पत्र पढ़कर मन द्रवित हो गया, परिचय कुछ नहीं, बस कहीं से मेरा परिचय मिला और अनजान लेखक को पुस्तकें भेज दी। लिखा कि अनजान लेखक को परेशान कर रहा हूँ लेकिन हो सके तो प्राप्ति की सूचना देना। पत्र में ऐसा और भी कुछ था जो सामाजिक ढांचे की जर्जर होती अवस्था को दर्शा रहा था। खैर वह बात कभी और। पत्र हाथ में था, मैं थोड़ा सन्न सी थी तभी दो दिन पहले देखी एक बच्चों की फिल्म का ध्यान आ गया। कलकत्ता के एक गाँव के स्कूल में फुटबाल टीम बनी हुई है, एक कोच की आवश्यकता है। कोच आते हैं और नियुक्त हो जाते हैं। खेल के मैदान  पर स्कूल की टीम खेल रही है तभी एक गरीब बालक वहाँ आता है और बच्चों के साथ खेलने का प्रयास करता है। लेकिन बच्चे उसे नहीं खेलने देते। कोच देख रहे हैं कि इस लड़के में प्रतिभा है और यदि वह लड़का इस टीम का हिस्सा बन जाए तो उनकी टीम को कोई नहीं हरा सकता। लेकिन स्कूल इसकी आज्ञा नहीं देता, माता-पिता भी विरोध करते हैं।
कोच उस लड़के को दूसरे कोच के पास ले जाता है और कहता है कि तुम इसे खिलाओ। कोच लड़के को अपने पास रख लेता है और अपनी टीम में जगह देता है, आखिर उनके स्कूल की टीम जीत जाती है और पहले वाली टीम हार जाती है। स्कूल के हेडमास्टर कोच से कहते हैं कि तुमने हमारे साथ दगा किया, कोच कहता है कि मैं एक कोच हूँ, मेरा काम है खिलाड़ी को खोजना और उसे खिलाड़ी बनाना। जब आपने मना किया तो मैंने दूसरे को खिलाड़ी दे दिया, इसमें गलत क्या किया? साहित्य जगत में भी देखती आयी हूँ कि लोग ऐसे ही एक-दूसरे का हाथ थामते हैं। जहाँ-जहाँ भी कोई भी कला विद्यमान है वहाँ लोग एक-दूसरे की सहायता करते ही हैं। लेकिन मेरे पास जो पत्र था, वह नये उदीयमान लेखक का नहीं था, अपितु अस्त होते हुए लेखक का था। जो व्यक्ति 82 साल तक अपने आपको व्यक्त ना कर पाया हो, अचानक मुखर होता है और अपनी पीड़ा को शब्द देता है। अब कोशिश कर रहा है कि उसको कोई जाने। वह अपनी लेखनी का जोर बताने के लिये पत्र नहीं लिख रहा है, अपितु स्वयं से स्वयं को अभिव्यक्त कर रहा है।
बचपन में देखते थे कि घर में बड़े-बूढ़ों की खूब चलती थी, घर में उनकी आवाज गूंजती रहती थी। मतलब एक बार बोलते थे लेकिन दस बार प्रतिध्वनी बनकर वापस आती थी। बच्चे भी उनके पास मंडराते रहते थे, कि दादा-दादी की पोटली खुले और थोड़ा सा उन्हें भी मिले। जितने उपदेश उनके पास थे सारे ही बेटों-बहुओं को दे दिये जाते थे, जितनी कहानियाँ थी पोते-पोतियों या दोहते-दोहितियों को सुना दी जाती थी। मन खुद को अभिव्यक्त करके निर्मल हो जाता था और जब मृत्यु की पदचाप सुनायी देती थी तब हाथ थामते देर नहीं लगती थी। लेकिन अब? बड़े-बूढ़े चुप ही नहीं अपितु खामोश हैं, अपने मन को खोलना लगभग भूल गये हैं, अन्दर ही अन्दर ज्वालामुखी धधकता रहता है लेकिन कहीं रिसाव नहीं। ऐसे दो-राहे पर खड़े होकर कुछ लोग कलम का सहारा लेते हैं और कुछ अनबोले ही दुनिया से विदा हो जाते हैं। हम भी यही कर रहे हैं और न जाने कितने लोग यही कर रहे हैं। कुछ लोग खुद का भोगा हुआ यथार्थ प्रगट कर रहे हैं और मेरे जैसे लोग जनता से संवाद कर रहे हैं। कुछ उनका और कुछ अपना मिलाकर जो शब्दों का संसार बनता है, वह हम सभी को जीने का नया आयाम देता है। मैं नित नयी कहानी को अपने शब्दों में ढालने का जतन करती हूँ, जिससे दुनिया अनबोली ना रह जाए। चौकीदार कहता है – जागते रहो। मैं कहती हूँ कि बोलते रहो, कुछ कहते रहो और शब्दों के गूंजने से दुनिया को जगाते रहो। कहीं ऐसा ना हो जाए कि जीवित आवाज थम जाए और कल-कारखानों की आवाज से सृष्टि गूंजने लग जाए।
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Friday, July 6, 2018

I am in love


पहला प्यार! कितना खूबसूरत ख्वाब है! जैसे ही किसी ने कहा कि पहला प्यार, आँखे चमक उठती है, दिल धड़कने लगता है और मन कहता है कि इसे बाहों में भर लूँ। लेकिन प्यार की कसक भी अनोखी होती है, प्यार मिल जाए तो सबकुछ खत्म, लेकिन नहीं मिले तब जो घाव दे जाए वो कसक। प्यार पाना नहीं है अपितु खोना है, जो कसक दे जाए बस वही प्यार है। बचपन में जब होश सम्भाला तब प्यार का नाम ज्यादा मुखर नहीं था, चोरी-छिपे ही लिया जाता था और चोरी-छिपे ही किया जाता था। जिसने प्यार किया और कसक बनाकर मन में बसा लिया, उसके किस्से भी सुनाई देने लगे थे लेकिन जिसने प्यार किया और घर बसा लिया, उसके किस्से वहीं खत्म। 60 का दशक बीता, 70 का बीता, 80 का बीता और प्यार नामका शब्द स्थापित हो गया। सारे रिश्ते-नाते तोड़कर प्यार को केवल स्त्री-पुरुष के लिये पेटेण्ट करा लिया गया। मतलब लड़का-लड़की करे वही प्यार, माता-पिता करे वह प्यार नहीं। भाई इसका और कोई नाम दो, कन्फ्यूजन होता है। प्यार-मोहब्बत-इश्क सब लड़का-लड़की के लिये पेटेँट हो गये। लोगों ने कहा कि प्यार सभी के जीवन में होता है, हमने टटोला, हमें कहीं महसूस ही नहीं हुआ। अरे बिछोह हो तो कसक हो और कसक हो तो प्यार का नाम मिले! यह क्या कि शादी की, गृहस्थी बसायी और कहा कि पति-पत्नी में  प्यार है, खाक प्यार है! मैं नहीं मानती। प्यार तो वही होता है जिसमें कसक हो, एक तरफा हो। एक-दूसरे को पाने से अधिक एक-दूसरे की परवाह निहित हो।
लेकिन मुझे आजकल लगने लगा है कि मुझे प्यार हो गया है, चौंकिये मत, इसकी शुरुआत बहुत पहले ही हो गयी थी लेकिन कसक अब महसूस हो रही है तो प्यार अभी हुआ ना! प्यार में क्या होता है – दो जनों के रिश्ते में विश्वास होता है, एक-दूसरे का हाथ थामने का जज्बा होता है, जिन्दगी भर ख्याल रखने का भाव होता है। हम सभी महिलाओं का पहला प्यार, हमारा पहला पुत्र होता है, अब आप कहेंगे कि पुत्री क्यों नहीं! जो मिल जाए वह प्यार नहीं और जो कसक दे जाए वह प्यार है तो पुत्री कसक देती नहीं तो पहला प्यार बनती नहीं। पहले जमाने में पुत्र भी पहला प्यार नहीं बन पाता था क्योंकि वह कसक देता नहीं था, तभी तो प्यार नाम चलन में नहीं था। अब चलन में आया है लेकिन गलत संदर्भ में आ गया है। प्यार कोई बुखार नहीं है, जो पेरासिटेमॉल ली और उतर गया, प्यार तो खुशबू है जो दिल में समायी रहती है। असली प्यार तो माँ-बेटे का ही होता है, जिसमें कोई बुखार नहीं, बस एक-दूसरे के लिये मान और परवाह का भाव। तो प्यार तो मुझे पुत्र पैदा होते ही हो गया था लेकिन कसक बीते कुछ सालों से सालने लगी है तो अब कहती हूँ कि मुझे प्यार हो गया है। माँ-बेटे का रिश्ता क्या है? माँ अंगुली पकड़कर चलना सिखाती है और बुढ़ापे में सोचती है कि अब बेटा अंगुली थामेगा, बुढ़ापे में कोई कंधा मिलेगा जिसपर सर रखकर रोया जा सकेगा लेकिन नहीं मिलता। अंगुली और कंधा बहुत दूर जा बसे हैं, कोई उम्मीद शेष नहीं तो प्यार की कसक ने पूरी ठसक के साथ अपना अड्डा जमा लिया। सुबह सोकर उठो तो कसक भी जाग जाए कि काश बेटा सहारा बनता! दिन में थाली परोसो तो सोचो कि पता नहीं क्या खा रहा होगा! शाम हो तो बतियाने का सुख सामने आ जाए! रात तो काली अंधियारी बनकर खड़ी ही हो जाए! यह प्यार नहीं तो और क्या है? मेरा पहला और अन्तिम प्यार। प्यार के जितने भी पाठ अनपढ़े थे, उसने सारे ही पाठ याद करा दिये। लोग प्यार की कसक लेकर कैसे जिन्दगी में तड़पते हैं, सब पता लग गया। यही सच्चा प्यार है, माँ-बेटे का प्यार। जो कभी साक्षात मिलता नहीं और कसक भरपूर देता है। साँसों की डोर से बंधी रहती है यह कसक, अन्तिम इंतजार भी इसी कसक का रहता है, आँखें दरवाजे पर लगी रहती हैं और जब देह रीत जाती है तब भी एक इच्छा शेष रह जाती है कि अन्तिम क्रिया तो पुत्र ही करे। जो मरण तक साथ चले वही कसक सच्ची है और वही कसक प्यार  है। ऐसी कसक पुत्र से ही मिलती है, आज करोड़ो लोग इस प्यार में पागल होकर घूम रहे हैं, दिन काट रहे हैं। इसलिये मैं भी कहने लगी हूँ कि मुझे प्यार हो गया है, मेरे अन्दर भी कसक ने जन्म ले लिया है। क्या आपको भी हुआ है प्यार? प्यार को यदि अंग्रेजी में लव कहेंगे तो ज्यादा असर पड़ता है तो मैं चिल्लाकर कहती हूँ कि – I am in love.

Tuesday, July 3, 2018

जाएं तो किधर जाएं!


मेरी जानकारी के अनुसार देश भर में साधु-संन्यासी, मुल्ला-मौलवी, सिस्टर-पादरी आदि-आदि जो भी धर्म और समाज हित में घर-बार छोड़कर समाज के भरोसे काम कर रहे हैं, उनकी संख्या एक करोड़ से भी अधिक है। ये समाज के धन पर ही पलते हैं और फलते-फूलते भी हैं। दूसरी तरफ फिल्म उद्योग से जुड़े, कलाकार, संगीतज्ञ, लेखक आदि-आदि की संख्या देखें तो यह भी करोड़ के आस-पास तो है ही। ये दोनों ही प्रकार की प्रजातियाँ लोगों के मन को प्रभावित करती हैं और नये प्रकार के जीवन की ओर ले जाती हैं। साधु-संन्यासी वाला वर्ग एक स्वर्ग दिखाता है और इस दुनिया को निस्सार कहता है जबकि फिल्म जगत वाला वर्ग धरती पर ही स्वर्ग उतार देता है। दोनों में कोई अन्तर नहीं है, एक कहता है स्वर्ग में अप्सराएं हैं, मय है मयखाने हैं, बस जितना चाहे भोग लो। कोई कर्तव्य नहीं बस भोग। तो दूसरा कहता है कि इस दुनिया को भी मय और मयखाने के युक्त बना दो, जहाँ अप्सराएं विचरण करती हैं और बस भोग ही भोग है। एक कल्पना लोक में ले जाकर भोग की सम्भावना दिखा रहा है, दूसरा साक्षात सुख दिखा रहा है। दोनों ही वर्गों से लोग प्रभावित हैं, बस अन्तर इतना है कि स्वर्ग की कल्पना वाले भी धरती पर  ही साक्षात स्वर्ग की कल्पना में  कुछ देर जी लेना चाहते हैं और जो इस धरती  पर ही स्वर्ग के भोग खोज रहे हैं वे तो पूरी तरह से डूब गये हैं इस सिद्धान्त में। एक कल्पना का स्वर्ग दिखा रहा है दूसरा साक्षात स्वर्ग दिखा रहा है, लेकिन दोनों ही दिखाने वाले आनन्द में हैं, बस यदि कहीं कष्ट है तो देखने वालों को। दोनों वर्ग लुट रहे हैं, स्वर्ग की कल्पना के नाम पर एक करोड़ लोगों को समाज पाल रहा है, उनको स्वर्ग से भी अधिक सुख दे रहा है और जनता नरक सा जीवन जी रही है। इस दुनिया का त्याग करो, जो भी तुम्हारे पास है, सब दे दो और डूब जाओ स्वर्ग की कल्पना में। भूखे रहो, प्यासे रहो, लेकिन स्वर्ग का मार्ग मत बिसराओ। दूसरा कह रहा है कि मुझे देखो, मेरे ऊपर पैसा फेंको, मैं तुम्हें धरती के स्वर्ग में रहने की कला सिखाऊंगा। दोनों की दुनिया चल रही है, भक्त इधर भी हैं और उधर भी हैं।
स्वर्ग का साक्षात सुख लेने के लिये दिल्ली में 11 लोग मृत्यु को गले लगा लेते हैं तो दूसरी तरफ फिल्म "संजू" हिट हो जाती है। तुम मरकर स्वर्ग देखोगे और हम कलाकार बनकर यहीं स्वर्ग बना देंगे। इधर डाकू-गुण्डे-मवाली को कहा जाता है कि छोड़ दो यह सब, हमारा ताबीज बांध लो और स्वर्ग की राह पकड़ लो। उधर भी कहा जाता है कि तुम्हारे सौ खून माफ हो जाएंगे यदि कलाकार बन जाओ। लोग मचलने लगते हैं अपराधी को हीरो बनाने में, सिद्ध कर देते हैं कि यह अपराधी नहीं अपितु साक्षात स्वर्ग का बाशिन्दा है जो इसी धरती पर भोग कर रहा था। तुम वहाँ भोग कराओंगे और हम यहाँ भोग कराते हैं, अन्तर क्या है भाई! दो प्रकार के सोफ्टवियर फिट किये जा रहे हैं, लेकिन हम जैसे कुछ लोग भी हैं जिनके सिस्टम में ये दोनों प्रकार के ही सोफ्टवियर डाउनलोड नहीं होते। ना हम जीते-जी फांसी का फंदा लगाकर स्वर्ग जाना चाहते हैं और ना ही अपराधी को स्वर्ग की सैर कराना चाहते हैं। हम तो इस धरती को धरती ही रखना चाहते हैं, जहाँ केवल भोगने को अप्सराएं ना हो, मय ना हो और ना ही मयखाने हों। बस सृष्टि के प्राणी हों, उनमें संतुलन हो। हम कहते हैं कि यह धरतीनुमा सृष्टि ही सत्य है, इस धरती में जो कुछ है वही सत्य है, इसी सत्य को सुन्दर बनाना है। किसी के भी दिखाये स्वर्ग के पीछे हम नहीं भागते, ना पीर-फकीर के पैर पूजते हैं और ना ही किसी कलाकार के पीछे दीवाने होकर दौड़ते हैं। बस जो निर्माण कर रहा है उसके सहयोगी बनना चाहते हैं। इस धरती को जो हमारे लिये सहेज रहा है हम थोड़ा सा योगदान उसमें करना चाहते हैं। दुनिया को अपनी नजर से देखना चाहते हैं। इधर भी स्वर्ग है और उधर भी स्वर्ग है बस बीच में हम जैसे तुच्छ प्राणी पिस रहे हैं कि जाएं तो किधर जाएं! फांसी के फन्दे पर लटक जाएं और स्वर्ग पा जाएं या फिर संजू फिल्म देखकर कलाकार को महान बनाकर इसी धरती को स्वर्ग बनाने में जुट जाएं।
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Friday, June 29, 2018

विश्वास बड़ी चीज है


विश्वास बड़ी चीज होती है, लेकिन यह बनता-बिगड़ता कैसे है, इसका किसी को पता नहीं। शतरंज का खेल सभी ने थोड़ा बहुत खेला होगा, खेला नहीं भी हो तो देखा होगा, इसमें राजा होता है, रानी होती है, हाथी होता है घोड़ा होता है, ऊँट है तो पैदल भी  हैं। सभी की चाल निश्चित है, खिलाड़ी इन निश्चित चालों के हिसाब से ही अपनी चाल चलता है। उसे घोड़ा मारना है तो अपनी रणनीति तदनुरूप बनाता है और हाथी मारना है तो उसी के अनुसार। राजनीति भी एक शतरंज के खेल समान है, दोनों तरफ सेनाएं सजी हैं और दोनों ही सेनाएं अपनी-अपनी योजना से खेल को खेल रही हैं। खिलाड़ी को पता है कि मुझे क्या चाल चलनी है लेकिन दर्शक को पता नहीं है कि इस चाल का अर्थ क्या है! आज की राजनीति में दर्शक के साथ फेसबुकिये भी आ जुटे हैं, वे अपने ही खिलाड़ी को किसी भी चाल पर बदनाम कर सकते हैं। इस बेवजह की टोका-टोकी से जीतता हुआ खिलाड़ी भी हार जाता है। शतरंज का खिलाड़ी अपनी मेहनत से बनता है और इस मुकाम तक पहुँचता है कि वह राष्ट्रीय या अन्तरराष्ट्रीय मुकाबलों में भागीदार बने, उसे  बनाने में किसी की  भूमिका नहीं होती है, बस उसकी लगन और उसकी बुद्धि ही उसे चोटी का खिलाड़ी बनाती है। राजनीति में भी लगन और बुद्धि ही आगे ले जाती है। एक राजनीतिज्ञ सोच-समझकर अपने कदम रख रहा होता है कि चारों ओर से शोर मच जाता है कि तुम्हारी चाल गलत है। याने दर्शकों को अपने खिलाड़ी पर विश्वास ही नहीं है। चतुर दर्शक खिलाड़ी के खेल को आश्चर्य से देखते है कि देखों हमारे खिलाड़ी ने यह अनोखी चाल चली है तो कैसे सामने वाला वार करता है लेकिन कमअक्ल दर्शक चिल्लाने लगते हैं कि चाल गलत चल दी है।
जब हम खुद कमजोर होते हैं तब हमारा विश्वास भी हर घड़ी डगमगाता रहता है, हम अपने व्यक्ति पर विश्वास रख ही नहीं पाते। परिवार में भी यही देखने को मिलता है कि जो रात-दिन आपकी सेवा कर रहा है, उसके प्रति भी किसी बाहरी व्यक्ति के कहे अनर्गल शब्द विश्वास डगमगा देते हैं। यह उस व्यक्ति का दोष सिद्ध नहीं करते अपितु आपको अपरिपक्व सिद्ध करते हैं। लेकिन आपकी अपरिपक्वता कभी परिवार को तो कभी देश को ले डूबती है। परिवार वाले मेला देखने गये हैं, बच्चा जाते ही जिद पकड़ लेता है कि खिलौना दिलाओ। माता-पिता कहते हैं कि दिला देंगे, लेकिन बच्चा बीच रास्ते पसर जाता है, तमाशा खड़ा कर देता है और झक मारकर माता-पिता बच्चे को खिलौना दिला देते हैं। थोड़ी देर में वही खिलौना बच्चे के लिये भार बन जाता है, तब माता-पिता कहते हैं कि हमने इसलिये ही कहा था कि जाते समय दिला  देंगे। बच्चे को हर चीज देखते ही चाहिये, माता-पिता को पता है कि कब दिलानी है और कहाँ से लेनी है, लेकिन बच्चा मानता नहीं। राजनीति में भी यही हो रहा है, हमें आज की आज यह चाहिये। राजनैतिक परिस्थितियाँ चाहे कुछ भी हो, लेकिन उन्हें आज की आज चाहिये। बच्चा रो रहा है कि आप मुझे कुछ नहीं दिलाते हो, मेरे लिये आपने किया ही क्या है, हम भी रो रहे हैं कि हमारे नेताओं ने हमारे लिये किया ही क्या है?
दो दिन से पुरी के मन्दिर का प्रकरण आ रहा है, मैं भी दो-तीन बार पुरी गयी हूँ, वहाँ के जो हाल हैं वह अकथनीय हैं। पण्डे सरे आम लकड़ी मारते हैं, गाली देते हैं, धक्का देते हैं। आदत पड़ गयी है तो राष्ट्रपति की पत्नी को भी धक्का मार दिया। लेकिन क्या इसके लिये सरकार दोषी है? अपने गिरेहबान में झांक कर देखिये जो रात-दिन हिन्दुत्व का रोना रोते हैं वे खुद क्या कर रहे हैं! पुरी हो या बनारस, सभी जगह पण्डों के हाल बुरे हैं। अभी पिछले साल  ही गंगा सागर जाना हुआ, जहाज में बैठने के लिये इतनी धक्कामुक्की की कुछ भी हो जाए! क्या हिन्दुत्व वादी संगठनों की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती! हम वृन्दावन गये, इतनी दुर्दशा कि रोना आ जाए, लेकिन कोई संगठन वहाँ दिखायी नहीं देता। देश के सारे ही धार्मिक पर्यटक स्थलों पर जा आइए, दुर्दशा के अतिरिक्त कुछ नहीं मिलेगा। सारे भिखारी वहीं मिलेंगे, सारे लुटेरे वहीं होंगे, लेकिन हिन्दुत्व के लिये गरियाने वाले संगठन कहीं नहीं होंगे। अब आप कहेंगे कि हम क्या करें! आप अपने अन्दर झांकिये कि आपने आजतक हिन्दुत्व के लिये क्या किया? एक उदाहरण देकर अपनी बात समाप्त करूंगी, हमारे शहर में एक अमरूद का ठेका लेने वाले की मृत्यु हो गयी, सम्प्रदाय विशेष ने धार्मिक रंग देकर उसे बाबा बना दिया। हिन्दुओं ने जुलूस निकाला और जिलाधीश के पास गये। जिलाधीश ने  मेरे सामने कहा कि वे पचास हजार थे और आप पाँच हजार भी नहीं हैं, अपितु पाँच सौ हैं, तो अब कैसे हम आपके अधिकारों की रक्षा करें।  इसलिये अपने नेता पर विश्वास करना सीखिये, यदि आप में दमखम होता तो आप नेता होते। घड़ी-घड़ी कटघरे में खड़ा करने की आदत आपको ही महंगी पड़ जाएगी। कल एयरलिफ्ट फिल्म देख रही थी तो उस दिन की घटना को अभी यमन की घटना के संदर्भ में देखा तो सुषमाजी के लिये मैं नतमस्तक हो गयी। करना सीखिये, विश्वास भी अपने आप आ जाएगा, अभी तक आपने कुछ नहीं किया है, बस कॉपी-पेस्ट करके हवा में तूफान खड़ा किया है, इसलिये विश्वास नाम की चीज आपके खून से रिसती जा रही है। जिस दिन कुछ करने लगेंगे उस दिन काम कैसे होता है जान जाएंगे और स्वत: ही अपने नेताओं पर विश्वास बन जाएगा।
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Tuesday, June 26, 2018

रानी की खीर में लाल चावल


एक लघु कथा याद आ रही है, आपको भी सुनाए देती हूँ – एक महारानी थी, उसे देश के विद्वानों का सम्मान करने और उन्हें भोजन पर आमंत्रित करने का शौक था। उनके राज्य में एक दिन अपने ही मायके के एक विद्वान आए, उन्होंने अपनी आदत के अनुसार उन्हें भोजन पर आमंत्रित किया और सुस्वादु भोजन के रूप में खीर परोसी। खीर में बड़ी मात्रा में सूखे मेवे पड़े थे और मलाई के साथ मिलकर उनकी एक मोटी परता खीर पर जम गयी थी। विद्वान ने सबसे पहले मेवे युक्त मलाई की परत को हाथ से निकाला और बाहर रख दिया। फिर तेजी से हाथ की अंगुली को खीर के अन्दर डाला और एक लाल चावल उसमें से निकाला और रानी को दिखाया! रानी हतप्रभ थी, उसने हाथ जोड़कर पूछा की प्रभु! आपका परिचय क्या है? उत्तर आया कि मैं  प्रसिद्ध आलोचक हूँ।
आलोचक स्वयं को सिद्ध करने के लिये अपने अहंकार को पुष्ट करता है, चाहे वह राजनीति में हो या साहित्य में। जबकि राजनेता या लेखक समाज की अनुभूति के साथ खड़ा रहता है, वह समाज की नब्ज देखकर ही कार्य करता है या लिखता है। आज राजनीति की ही बात कर लें क्योंकि दो-तीन दिन से अलग प्रकार की राजनीति देखने में आ रही है, कोई अपनी ही नेता के खिलाफ अपशब्दों का प्रयोग कर रहा है तो कोई ताल ठोक कर विरोध में नया दल  बना बैठा है। मैं राजनीति शून्य हूँ, मेरा कोई अनुभव भी नहीं हैं लेकिन लेखक होने के नाते समाजनीति का पूरा अनुभव है। लेखक हूँ तो आलोचक नहीं हूँ, आलोचक नहीं हूँ तो स्वयं के अहंकार को पुष्ट करने का प्रयास नहीं करती। बस जो समाज चाहता है, उसे ही पढ़ने का प्रयास रात-दिन रहता है। मुझे आज लग रहा है कि एक रानी जो विद्वान का सम्मान कर रही है, लेकिन विद्वान लाल चावल का दाना निकालकर उसकी कमियां निकाल रहे हैं। यदि आप समाज के मध्य जाते तो अच्छे राजनेता या लेखक बनते लेकिन स्वयं के अहंकार में डूबकर आप केवल कमियां ढूंढने वाले आलोचक बन गये हैं। जब-जब भी किसी व्यक्ति के अहंकार ने ताल ठोकी है वह औंधे मुँह गिरा है क्योंकि समाज कभी भी निरर्थक आलोचना पसन्द नहीं करता, वह काम चाहता है। कोई भी व्यक्ति या संगठन केवल कमियाँ ही निकालता रहेगा तो समाज का दिल नहीं जीत सकता, उसे समाज के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करना ही पड़ेगा। उदाहरण देखिये – अन्ना हजारे का सम्मान समाज करता था लेकिन वे कमियाँ निकालने चल पड़े और लोगों ने उन्हें नकार दिया। देश की वर्तमान राजनीति में ऐसे कई नाम हैं जो खुद को बड़े पद पर आसीन करना चाहते हैं लेकिन आलोचना के अतिरिक्त कुछ करते नहीं, समाज उनकी बातों का आनन्द तो लेता है, उन्हें उकसा भी देता है लेकिन पसन्द नहीं करता।
मोदी में और अन्य नेताओं में क्या अन्तर है? मोदी काम करता है, देश के विकास को अपनी कलम से लिखता है। इसलिये वह लेखक की भूमिका में हैं और जो स्वयं के अहंकार को पुष्ट करने के लिये उनकी आलोचना करते हैं, वे केवल आलोचक बनकर रह गये हैं। आप कितनी नकारात्मक शक्तियों को एकत्र कर सकते हैं, इससे राजनीति चल ही नहीं सकती, हाँ आप विध्वंश जरूर कर सकते हैं। यह देश स्वार्थपरक राजनिति के कारण सदियों से विध्वंश का शिकार होता आया है और पुन: भी हो जाएगा, इससे ना आलोचकों को कुछ प्राप्त होगा और ना ही सृजन करने वालों को, बस विनाश ही निश्चित है। भारतीय इतिहास के जितने भी पृष्ठ खोलेंगे अधिकतर पृष्ठ ऐसे नकारात्मक – अहंकारी व्यक्तियों से भरे होंगे और यही कारण है कि आज भारत रात-दिन के संघर्ष में घिरा हुआ है। आप लोगों को यदि राजनीति की समझ है तो राजनीति कीजिए लेकिन समझ नहीं हैं तो अपने अहंकार को पुष्ट करने के लिये ही केवल आलोचक मत बनिये। एक तरफ ऐसी कौम है जो अपने सम्प्रदाय के लिये खुद को बारूद से बांधकर उड़ा दे रही है और दूसरी तरफ हम है जो अपने अहंकार के नीचे दबे होकर अपने समाज के लिये थोड़ा सा त्याग नहीं कर सकते। यदि आपके साथ अन्याय हुआ है तो आप पर्दे के पीछे जाकर समाज का काम करें लेकिन विध्वंश की राजनीति करने से विनाश के अतिरिक्त कुछ हासिल नहीं होगा। अपनी विद्वता सिद्ध करने के लिये रानी की खीर से लाल चावल निकालते रहिये और समाज को बताते रहिये कि विद्वानों का सत्कार करने पर ऐसी ही आलोचना का शिकार होना पड़ेगा।
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Saturday, June 23, 2018

हिन्दुस्थान फिर गुलाम होने लगता है


ईसा से 350 साल पहले एलेक्जेन्डर पूछ रहा था कि हिन्दुस्थान क्या है? यहाँ के लोग क्या हैं? लेकिन नहीं समझ पाया! बाबर से लेकर औरंगजेब तक कोई भी हिन्दुस्थान को समझ नहीं पाए और अंग्रेज भी समझने में नाकामयाब रहे। शायद हम खुद भी नहीं समझ पा रहे हैं कि हमारे अन्दर क्या-क्या है! आप विदेश में चन्द दिन रहकर आइए, आपको वहाँ की मानसिकता समझ आ जाएगी – सीधी सी सोच है,  वे खुद के लिये जीते हैं। प्रकृति जिस धारा में बह रही है, वे भी उसी धारा में बह रहे हैं। खुद को सुखी करने के प्रयास दिन-रात करते हैं। दूसरों को उतना ही अधिकार देते हैं, जितना जरूरी है, जब उनके खुद के अस्तित्व पर बात आती है तो सारे अधिकार उनके खुद के हो जाते हैं। माँ और ममता दोनों ही सीमित दायरे में रहते हैं, बस स्त्री और पुरुष को युगल का महत्व है। इसके विपरीत हिन्दुस्थान में हजारों सालों का चिन्तन, हजार प्रकार से आया है, हमारे अन्दर संस्काररूप में थोड़ा-थोड़ा सभी कुछ है। हम धारा के साथ नहीं धारा के विपरीत बहने का प्रयास करते हैं और इसी को संस्कृति भी कहते हैं। धारा के विपरीत बहने से हर पल संघर्ष करना पड़ता है, अपने मन से, अपने परिवेश से। जब मन में ज्ञान की बाढ़ आ रही हो तब स्वाभाविकता दब जाती है लेकिन जैसे ही बाढ़ थमती है और स्वाभाविक परिस्थिति उत्पन्न होती है, हमारे अन्दर का ज्वालामुखी फट पड़ता है और ज्ञान की बाढ़, विषाक्त लावे में बदल जाती है। इसलिये दुनिया हमें समझ नहीं पाती कि ये ज्ञान का मीठा झरना हैं या विष का ज्वालामुखी!
हम कहते हैं कि हमारी संस्कृति का आधार है, बड़ों का सम्मान और खासकर के महिला व माँ का सम्मान। माँ कभी गलत नहीं होती, यदि आपको लगता भी है कि गलती हुई है तो धैर्य रखिये, यह केवल आपका भ्रम ही सिद्ध होगा। विदेश में कोई दुर्गा नहीं हुई लेकिन हमारे यहाँ दुर्गा का रूप हर युग में उत्पन्न हुआ। जिस संस्कृति में माँ को पूजनीय कहा उसी संस्कृति में हर युग में दुर्गा ने जन्म लिया। यही उलझन हर व्यक्ति को सोचने पर मजबूर कर देती है कि आखिर हिन्दुस्थान है क्या! हमारे यहाँ माँ घर के किसी कोने में पड़ी मिलती है या फिर वृन्दावन की गलियों में, लेकिन जब दुर्गा बन जाती है तब इतिहास के पन्नों में प्रमुखता मिलती है। सारे अत्याचार महिला पर आधारित हैं, सारी गाली महिला  पर आधारित हैं, युद्ध में हारने पर लुटती महिला ही है। पुरुष से गलती होने पर खामोशी छा जाती है और लोग बचाव की मुद्रा में आ जाते हैं लेकिन महिला का कदम भी सहन नहीं होता और चारों ओर से बवाल मचा दिया जाता है। ऐसा लगता है जैसे हमारे अन्दर महिला के प्रति तीव्र आकर्षण विद्यमान है, हम महिला को अपनी दासी के रूप में ही देखना चाहते हैं, जिससे उसके आकर्षण को नकार सकें। विदेशी और हिन्दुस्थानी पुरुष में यही अन्तर है कि विदेशी पुरुष, महिला को मित्र मानता है और हार-जीत से परे रहता है, अनेक प्रयोग भी कर लेता है लेकिन कुण्ठाओं को मन में ठहरने नहीं देता। जबकि हिन्दुस्थानी, महिला को मित्र के स्थान पर दासी की कल्पना करते हैं और माँ के नाम पर पत्नी को मुठ्ठी में रखने की चाह रखते हैं। सारी जिन्दगी उनकी इसी कुण्ठा में निकलती है और जब भी किसी महिला पर प्रश्न खड़े होते हैं, सारे ही एक साथ कूदकर, विष-वमन करते हुए अपनी कुण्ठा को निकालते हैं। भूल जाते हैं कि ये हमारी माँ समान आयु की है, कल तक हमने इसके पैर पूजे थे, हमारी संस्कृति में माँ को पूजनीय कहा है, सब कुछ भूल जाते हैं, बस अपनी कुण्ठा याद रखते हैं और ज्वालामुखी को लावा फूट निकलता है। इसी मानसिकता को दुनिया समझ नहीं पाती है और जो समझ लेते हैं, वे खुलकर हिन्दुस्थान को लूटते हैं। वे समझ जाते हैं कि वार कहाँ करना है, कैसे इन्हें खुद के विरोध में ही खड़ा किया जा सकता है, वे सब समझ जाते हैं और हिन्दुस्थान फिर गुलाम होने लगता है।
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