Sunday, April 22, 2018

लुंज-पुंज से लेकर छूट और लूट की दुकान


लुंज-पुंज से लेकर छूट और लूट की दुकान
आज एक पुरानी कथा सुनाती हूँ, शायद पहले भी कभी सुनायी होगी। राजा वेन को उन्हीं के सभासदों ने मार डाला, अराजकता फैली तो वेन के पुत्र – पृथु ने भागकर अपनी जान बचाई। पृथु ने पहली बार धरती पर हल का प्रयोग कर खेती प्रारम्भ की, कहते हैं कि पृथु के नाम पर ही पृथ्वी नाम पड़ा। लेकिन कहानी का सार यह है कि राजा वेन का राज्य अब राजा विहीन हो गया था, प्रजा को समझ नहीं आ रहा था कि राज कैसे चलाएं। आखिर सभी ने पृथु को खोजने का विचार किया। पृथु के मिलने पर उसे राजा बनाया और कहा कि बिना राजा के प्रजा भीड़ होती है, इसलिये राजा का होना जरूरी है। लेकिन आज प्रश्न उठ रहा है कि राजा कैसा? अनुशासन प्रिय या फिर लुंज-पुंज? परिवार में जब माता या पिता कठोरता और अनुशासन के साथ परिवार का निर्माण करते हैं तो निर्माण की अवधि में कोई खुश नहीं रहता, लेकिन बाद में सब कहते नहीं अघाते कि हमारा अनुशासन के कारण निर्माण हुआ है। युवाओं को उच्छृंखलता रास आती है, लेकिन माता-पिता अनुशासन में रखकर उनका निर्माण करते हैं, ऐसे ही जनता की स्थिति होती है। जनता नैतिक-अनैतिक सारे ही काम करना चाहती है लेकिन देश-हित और जनता का हित किस में है यह अनुशासन प्रिय नेता तय करते हैं। जब भी किसी को लाभ प्राप्त नहीं होता है तो नाराजी प्रकट करता है और लोकतंत्र की दुहाई देता है। उसे लोकतंत्र का अर्थ लुंज-पुंज व्यवस्था में दिखायी देता है, जहाँ अनुशासनहीन समाज का निर्माण हो और भीड़तंत्र के द्वारा शासन में भागीदारी हो। परिवार से लेकर देश के लोकतंत्र में केवल उसी शासक की चाहना होती है जो लुंज-पुंज  हो, जो व्यक्ति को सारी छूट दे सके।
जितनी छूट और जितनी लूट इस देश में है, उतनी शायद ही किसी देश में हो, जनता की आदत छूट और लूट का उपभोग करने की पड़ी है, जरा सा अनुशासन आते ही लोकतंत्र की दुहाई दी जाने लगती है। एक पुराना वित्त-मंत्री लोकतंत्र की दुहाई दे रहा है क्योंकि उसे लूट और छूट का फायदा नहीं मिल रहा है। वे समझ बैठे हैं कि एक अनुशासन में देश को रखने की पहल करना लोकतंत्र नहीं हो सकता। इसलिये अब वे अनुशासन से परे लुंज-पुंज व्यवस्था के समर्थन में खड़े हो गये हैं, दूसरी तरफ सारे ही वे लोग भी जो शासन को ले-देकर चलाना चाहते हैं वे भी साथ में जुटने लगे हैं। देश ने लुंज-पुंज शासन बहुत देखा है, जो आजतक ले-देकर चल रहा था। जिसने भी भीड़तंत्र का शोर मचाया, उसको टुकड़ा डाल दिया गया। देश रसातल में पहुंच गया लेकिन भीड़तंत्र आकाश छूने लगा। जनता को समझ आने लगा था कि बिना अनुशासन के राज नहीं हो सकता इसलिये वे पृथु की तरह अपने राजा को खोजने निकल पड़े और मोदी को खोजकर सिंहासन पर बैठा दिया। लेकिन अब सत्ते-पे-सत्ता फिल्म जैसे हालात हो गये हैं। घर में आयी भाभी घर को घर बनाना चाहती है और उच्छृंखलता में जीवन व्यतीत कर रहे सारे भाई अनुशासन में बंधना नहीं चाहते। देश भी आज इसी उधेड़-बुन में लगा है। चारों ओर लोकतंत्र की दुहाई दी जा रही है, बेईमान व्यापारी कह रहा है कि मुझे बेईमानी की छूट मिले, खुद को मर्द समझने वाले लोग कह रहे हैं कि हमें बलात्कार और तलाक की सुविधा मिले, राजनेता कह रहे हैं कि परिवार सहित सारे ही पद हमें मिलें, न्यायाधीश तक कहने लगे हैं कि बड़े मुनाफा वाले केस हमें मिलें, वकील कह रहे हैं कि हम जैसा चाहे फैसला वैसा हो, समाज का हर वर्ग कह रहा है कि हमें भी आरक्षण मिले। एक-एक व्यक्ति इस छूट और लूट का भागीदार होना चाहता है और कह रहा है कि लोकतंत्र खतरे में आ गया है। व्यक्ति को सारी ही छूट खुलेआम मिलने को ही वे लोकतंत्र कह रहे हैं। वे यह भूल रहे हैं कि लोकतंत्र में भी तंत्र जुड़ा है, कोई ना कोई अनुशासन तो रखना ही होगा नहीं तो यह देश लूट का देश बन जाएगा। अब तय जनता को ही करना है कि उसे अनुशासन में रहकर खुद का और देश का निर्माण करना है या फिर लुंज-पुंज व्यवस्था के तहत छूट और लूट की दुकान सजाए रखनी है। हम इस दुनिया में केवल अकेले देश नहीं है जो कैसा भी विकल्प चुन लेंगे, आज सैकड़ों देश हमारी ताक में बैठे हैं कि कब यहाँ पुरानी लुंज-पुंज व्यवस्था लागू हो और हम देश को ही हड़प लें। वैसे भी जब बेईमान लोग धमकाने लगें तो समझ लो कि देश कहाँ खड़ा है! चुनाव आपका है – लुंज-पुंज से लेकर छूट और लूट की दुकान या फिर अनुशासन से निकली सम्मान की दुकान।

Friday, April 20, 2018

जी-हुजूरियें आखिरी दाँव ढूंढ रहे हैं


बात 90 के दशक की है, हमारे कॉलेज में जब परीक्षाएं होती थी तब परीक्षा केन्द्रों पर सारे ही अध्यापकों की ड्यूटी लगती थी, लेकिन मेरी कभी नहीं। मैं सोचती थी शायद महिला होने के कारण मुक्ति मिल जाती होगी लेकिन फिर बाद में महिला होने के कारण ही लगने लगी, क्योंकि परीक्षा तो बालिकाएं भी दे रही होती थी। तब में देखती कि कुछ लोगों की नियमित ड्यूटी लगती है लेकिन कुछ लोगों की नहीं। मुझे प्रशासन से प्रश्न पूछने का फितूर है, उसका परिणाम भुक्ता भी बहुत है, तो तब भी पूछ लिया कि कुछ लोगों की ड्यूटी लगे और कुछ की नहीं? यहाँ यह भी देखने की बात थी कि उस समय ड्यूटी देने पर 10 रू. मिलते थे और इन्हीं 10 रूपयों के कारण लोगों का चयन होता था। मेरे प्रश्न पर एक ने कहा कि जो लोग हमारे नहीं, हम उन्हें किसी भी प्रकार का लाभ नहीं देते। जब प्रशासन का फार्मूला पता लगा तो सभी जगह यह दिखायी दिया। केवल मुठ्ठी भर लोग ही फायदों की जगह दिखायी देते बाकि सारे ही सामान्य प्रजा की तरह रहते। देश की राजनीति की चाल भी यही थी, जो सरकार के जी-हुजूरिये उन्हें ही सरकारी लाभ मिले शेष तो केवल प्रजा। देश की आजादी के बाद से यही सिलसिला चला और एक ही घराने का राजकाज होने के कारण लोकतंत्र की जगह राजतंत्र ही दिखायी देने लगा। हर क्षेत्र में एक वर्ग खड़ा हो गया, जो सारे लाभों का हकदार था। योजनाएं इतनी बनी और पुरस्कार व सम्मानों की बाढ़ आ गयी, अपने जी-हुजूरियों के लिये ही ये सारी थीं। 50 साल में जी-हुजूरियें पक्के हो गये, सभी को आदत हो गयी कि ये ही है समाज के सितारे। फिर धीर-धीरे शासन बदलने लगा और राजतंत्र से निकलकर लोकतंत्र की ओर बढ़ने लगा तब जाकर कहीं इन जी-हुजूरियों की जगह आम जनता को भी लाभ मिलने लगा। लेकिन जैसे ही मेरे जैसा एक आम व्यक्ति उस पंक्ति में खड़ा हुआ, चारों तरफ से शोर मच गया। जी-हुजूरियों को तो तनिक भी नहीं भाया लेकिन आम जनता भी उन जी-हुजूरियों को ही बुद्धीजीवी मान बैठी थी तो उनने भी प्रश्न खड़े कर दिये। अब प्रश्न भी बुद्धिमत्ता पर नहीं लेकिन बस शुरू कर दी छिछालेदारी। 
2014 में आया मोदी-राज, अब तो पूर्ण लोकतंत्र लागू हो गया। कोई जी-हुजूरियें नहीं, बस योग्यता ही पैमाना। जहाँ सरकार की योजनाओं और पुरस्कार-सम्मान पर केवल इन जी-हुजूरियों का ही कब्जा था, नहीं रहा और लोकतंत्र स्थापित होने लगा। चारों तरफ से शोर मचने लगा कि हम कहाँ, हम कहाँ? जिन मंचों पर केवल वे थे अब समाज का प्रबुद्ध वर्ग दिखायी देने लगा, जिन योजनाओं पर आम गरीब व्यक्ति का हक था, अब योजना का लाभ उसे मिलने लगा तो शोर मचना लाजिमी था। लाखों गैस कनेक्शन फर्जी, लाखों राशन कार्ड फर्जी और न जाने क्या-क्या फर्जी। न जाने कितने व्यापारी कमीशन दलाल के रूप में काम कर रहे थे, अब उनका कमीशन बन्द। शोर यह  भी मचा कि शासन में नया क्या है, सब तो हमारे जमाने का है। सच भी है, नया विशेष नहीं, बस योजनाएं लागू करने में नवीनता होने लगी। अब एक वर्ग का स्थान आम व्यक्ति ने ले लिया था तो यह विशेष वर्ग हरकत में  आ गया। पत्रकार से लेकर साहित्यकार, वकील से लेकर न्यायाधीश, व्यापारी से लेकर दलाल, सारे ही शोर मचाने लगे। उन्हें ऐसा लग रहा है कि उनकी आँखों के सामने ही उनका खजाना आम जनता में बंट रहा हो! जिसपर केवल उनका हक था, वह हक सबका हो गया, यह तो घोर अनर्थ हो गया। वे लोग पैसे से भी गये और विशेष वर्ग की पहचान से भी। अब रोज भी नये उपद्रवों की खोज की जाने लगी, कभी थाणे में राजनीति तो कभी न्यायालय में राजनीति! संसद में केवल शोर-शराबा! क्योंकि ना तो प्रश्न थे और ना ही बहस के लिये विचार थे। कैसे कहें कि यह सब हमारा था, उसे कैसे निर्ममता से जनता में बांट रहे हो, तो संसद में केवल शोर रह गया। न्यायालय में केस दर्ज होने लगे, सोचा था कि अपने ही जज  हैं तो न्याय के माध्यम से ही राजनीति कर लेंगे लेकिन जज महोदय ने तो साफ आईना दिखा दिया कि यह न्याय का मन्दिर है, यहाँ राजनीति नहीं चलेगी।
जी-हुजूरियें आखिरी दाँव ढूंढ रहे हैं, कैसे भी शासन वापस अपने ही हाथ में आ जाए और फिर चाहे 10 रू वाली परीक्षा में ड्यूटी हो या फिर विदेश-यात्राओं से लेकर पुरस्कार-सम्मान की बंदर-बांट। जिन जी-हुजूरियों को खास बनाया गया था, बस वे ही देश के फलक पर दिखने चाहिये, बाकि तो सब मच्छर है। 2019 तक देश में यही दृश्य रहने वाला है, सारे ही प्रलाप को तैयार हैं। एक प्रलाप में दम नहीं तो दूसरे दिन ही दूसरा प्रलाप तैयार मिलेगा। हम प्रलाप करने में माहिर हैं, इतना तो कर ही देंगे कि लोग कहने लगें कि बाबा मैं तो भूखा ही रह लूंगा, ले देश की रोटी तू ही खा ले। जैसे गाँधीजी के सामने रोटी फेंकी गयी थी कि तू रोटी खा, उपवास मत कर, हम ही मर जाएंगे। सावधान रहना होगा, क्योंकि ये आम जनता को भी टुकड़ा डालेंगे कि तुम हमारे साथ आ जाओ, हम तुम्हें भी खास की लाइन में खड़ा कर देंगे। बड़ा होना कौन नहीं चाहता! दूसरों के सामने सम्मान कौन नहीं चाहता! बस इसी का फायदा उठाया जाएगा और लोगों का अपने पक्ष में किया जाएगा। बचना बाबा इन जी-हुजूरियों से।

Tuesday, April 17, 2018

औरंगजेब के काल की याद आ रही है



पिछले कई दिनों से रह-रहकर औरंगजेब के काल की याद आ रही है, देश के किसी मन्दिर को बक्शा नहीं गया था और ना ही ऐसी कोई मूर्ति शेष रही थी जो तोड़े जाने से बच गयी हो। घर में भी पूजा करना दुश्वार हो गया था, लोग चोरी-छिपे पूजा करते थे और खुश हो लेते थे। लोगों के पास से मन्दिर बनाने का काम चुक गया तो लोग अपने परिवार बनाने लगे, परिवारों में मनुष्य तैयार होने लगे और देखते ही देखते औरंगजेब का काल समाप्त हो गया और मुगल सल्तनत का चाँद भी सूरज की रोशनी में कहीं खो गया। अंग्रेज आए, फिर मन्दिर बनने प्रारम्भ हुए और इस बार आर्य समाज ने सावचेत किया कि मूर्तियों से प्यार मत करो, अपितु देश से प्यार करो। विवेकानन्द ने भी कहा कि 50 साल तक सारे भगवानों को भूल जाओ और केवल भारत माता का स्मरण करो। लेकिन भारतीय मन नहीं माना और स्वतंत्रता के बाद तो मन्दिरों की बाढ़ सी आ गयी। आज सारे ही सम्प्रदाय के साधु-सन्त मन्दिर बनाने में होड़ कर रहे हैं, समाज का बेशकीमती पैसा और समय केवल मन्दिर बनाने में लग रहा है। लोग कह रहे हैं कि हिन्दू समाज शीघ्र ही अल्पसंख्यक होने वाला है, शायद 25-30 सालों में हो ही जाएगा। तो फिर वही प्रक्रिया दोहरायी जाएगी, मन्दिर टूंटेंगे और मूर्तियां टूटेंगी। एक तरफ मूर्तियां प्रतिष्ठित हो रहीं हैं और दूसरी तरफ मनुष्य का अस्तित्व ही खतरे में पड़ा है। मन्दिरों के कंगूरे सोने से मंड रहे हैं तो परिवार के आंगन समाप्त हो रहे हैं। समाज और देश को बचाने की मानसिकता ही परिवारों के साथ अवसान पर है।
राम मन्दिर निर्माण के लिये हम जोर-शोर से आवाज उठा रहे हैं, यदि मन्दिर 2-5 साल में बन भी गया तो 25-30 साल बाद शायद सबसे पहले यही टूटेगा। कोई भी औरंगजेब हमारी आस्था पर आघात ना कर पाए, हमें वह काम करना चाहिये ना कि सारा ध्यान मन्दिर बनाने में लगाना चाहिये। चारों तरफ से हिन्दू समाज पर आक्रमण हो रहा है, सामने वाले को बहुत जल्दी है, देश को बुत-विहीन करने की लेकिन हमें बुत बनाने से फुर्सत ही नहीं। देश में ऐसी-ऐसी समस्याओं ने जन्म ले लिया है, जो शायद किसी अन्य देश में हों। लेकिन हम आँखे मूंदे बस मन्दिर बना रहे हैं। हमारे पूर्वजों को कोई गाली देता है तो हम उनके पूर्वजों को गाली देने लगते हैं, यह नहीं देखते कि हम सब के पूर्वज एक ही हैं, हम खुद को ही गाली दे रहे हैं। लोग लिख रहे हैं कि सम्भलों हिन्दू, सम्भलों। लेकिन क्या कोई  हिन्दू सम्भलने को तैयार है? तैयार तो तब हो जब कोई हिन्दू हो! यहाँ तो कोई हिन्दू है ही नहीं। सभी अपने-अपने सम्प्रदाय में विभक्त हैं। जैसे किसी जमाने में यहूदियों को समाप्त किया गया वैसे ही हिन्दुओं का हश्र होने वाला है। यहूदियों के समान ही फिर वे लोग जो हिन्दू से पहचान बताने में गौरव का भाव रखते हैं, पुन: एकत्र होंगे और इजरायल की तरह भारत के किसी कोने में नया भारत बनाएंगे। फिर वह नया भारत ऐसा सशक्त  होगा कि उसकी तरफ कोई आँख उठाकर देखने की हिम्मत कोई भी नहीं कर पाएगा। तब तक शायद हम सब मन्दिर ही बनाते रहेंगे और मन्दिरों में मूर्तियां सजाते रहेंगे। उन्हें जल्दी है हमें मिटाने की और हमारे पास फुर्सत ही फुर्सत है। हमें गुलामी का अनुभव है तो अब गुलाम होने से डर भी नहीं लगता, सोचते हैं कि जैसे पहले के काल निकल गये, फिर निकल जाएंगे। आज साधु-संन्यासियों के पैरों में लौटते हैं तो कल हुक्मरानों के पैरों में लौट लेंगे, क्या अन्तर आएगा! हम तो पूजा करने वाले लोग हैं, तो इनकी ना सही तो उनकी कर लेंगे। हम किसी की नहीं सुनेंगे क्योंकि हमें उस अनजान सफर के लिये निकलना है, जिसका अता-पता तक हमारे पास नहीं है लेकिन जिस धरती का सच हमारी आँखों के सामने हैं, उसे जल्दी से जल्दी त्याग देना चाहते हैं। इस धरती से पीछा छुड़ाने का मंत्र एक ही है कि मन्दिर बनाओ और मूर्तियों की पूजा करो। चलिये समाप्त करती हूँ, आप सभी को मन्दिर जो जाना होगा।

Monday, April 16, 2018

हर मन में हमने हिंसा को कूट-कूटकर भर दिया है


यह शोर, यह अफरा-तफरी मचाने का प्रयास, आखिर किस के लिये  है? एक आम आदमी अपनी रोटी-रोजी कमाने में व्यस्त है, आम गृहिणी अपने घर को सम्भालने में व्यस्त है, व्यापारी अपने व्यापार में व्यस्त है, कर्मचारी अपनी नौकरी में व्यस्त है लेकिन जिन्हें खबरे बनाने का हुनर है बस वे ही इन सारी व्यस्तताओं को अस्त-व्यस्त करने के फिराक में रहते हैं, कैसे भी दुनिया में उथल-पुथल मचे, बस इनका उद्देश्य यही रहता है। आप दिनभर लोगों से मिलिये, कोई खबरों पर चर्चा नहीं कर रहे होते हैं, बस एकाध बुद्धीजीवी मिल जाएंगे जो ऐसे चिंतित हो रहे होंगे जैसे भूचाल आ गया हो। सारी दुनिया शान्त है लेकिन पत्रकार और कुछ बुद्धिजीवी ता-ता-थैया करते फिर रहे हैं। ये व्यस्त दुनिया जो दिन में एकाध मिनट के लिये समाचार देख लिया करती थी, अब उसने एकाध मिनट को भी बाय-बाय कह दिया है। कुछ तो टीवी ही नहीं खोलते, या खोलते भी हैं तो अपने पसंदीदा सीरीयल देखे और झांकी बन्द। ये पत्रकार सोचते हैं कि हम जनता को भ्रमित कर लेंगे लेकिन जनता भ्रमित नहीं होती। हमें लगता है कि केण्डल मार्च निकालने वाले या धरना देने वाले सैकड़ों लोग थे लेकिन ये दल विशेष के कार्यकर्ता ही रहते हैं, जनता यहाँ नहीं होती है। असल में हम जनता को प्रभावित ही नहीं कर पाते, जनता अपने हिसाब से चलती है। आज देश में सारे वादों को लेकर कई संगठन हैं, जो अपने-अपने जाति और धर्म के लिये बने हैं लेकिन उन सारे ही संगठनों के काम पर दृष्टि डालिये, ये केवल अखबारों में होते हैं या मिडिया की चौपाल पर रहते हैं, बाकि इनका वजूद आम जनता के बीच नहीं है। यदि इन सारे ही संगठनों का एक साल तक मीडिया संज्ञान ना ले तो लोग इनका नाम तक भूल जांएगे।
दस दिन से राष्ट्र मण्डल खेल चल रहे थे, देश के खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे, देश में इनकी चर्चा होनी चाहिये थी लेकिन अच्छाई के लिये समय नहीं है, जब की जनता के पास अच्छाई के लिये ही समय है। जनता जानती है कि जिन घटनाओं को मुद्दा बनाकर अच्छाई को ढकने का प्रयास किया जा रहा है, वे घटनाएं मनुष्य की मानसिकता से जुड़ी हैं और अनादि काल से चली आ रही हैं, किसी भी देश में ये आज तक नहीं रुकी हैं। इन घटनाओं को मुद्दा बनाकर नहीं अपितु सामाजिक जागरण से रोकथाम सम्भव है। दुनिया के सारे ही देश यौन-विकृति वाली मानसिकता से ग्रसित हैं और कल तक भी थे। हम किसी को भी उपदेश देने में सक्षम नहीं हैं और ना ही किसी को भी सुधारने में, बस पहल स्वयं से ही करनी है। हमारा बचपन भी आम बालिकाओं की तरह ही बीता, जहाँ कदम-कदम पर यौन शोषण का खतरा मंडराता रहता था। यौन शोषण करने  वाले लोग आसपास से भी आते थे और अनजाने लोग और दूरदराज से भी। जैसे ही एक बालिका में समझ आने लगती है, सबसे पहले उसके मन में यौन-हिंसा के प्रति डर पैदा हो जाता है। वह जानती तक नहीं कि यौन-हिंसा होती क्या है लेकिन वह पुरुष का दूषित स्पर्श पहचान लेती है। समाज में शरीफ से शरीफ दिखने वाला व्यक्ति भी मौका मिलने पर दूषित मानसिकता से ग्रसित हो जाता है। इसलिये परिवारों को सावधान रहने की आवश्यकता है। बालिका हमारे लिये उस हीरे के समान है जो कीमती है और जरा सा आघात लगने पर उसकी कीमत का कोई मूल्य ही नहीं रह जाता है। इसलिये परिवारों को सावधानी की जरूरत है और बालिकाओं को भी सावचेत करते रहने की जरूरत है। परिवार के बालकों में यौन आकर्षण और हिंसा दोनों के अन्तर को भी बताते रहने की जरूरत है। किसी भी बालक को इतनी स्वच्छंदता ना दें कि वह हिंसक तक बन जाए और समाज में हिंसा को बलवती कर दे। इसलिये आज बालिका से अधिक बालकों पर ध्यान देने की जरूरत है।
पत्रकारों के लिये  भी सनसनी बनाने पर रोक लगनी चाहिये, झूठी खबरे तो यौन हिंसा से भी खतरनाक है और इन पर कठोर दण्ड का प्रावधान होना चाहिये। कोई  भी किसी के लिये झूठ प्रचारित करता है तो केवल माफी मांग लेने के न्याय समाप्त नहीं होना चाहिये अपितु यह यौन-हिंसा के समान ही कठोर दण्ड का अधिकारी होना चाहिये। आज शोर मचाने का सिलसिला बनता जा रहा है, अवधि पार होने पर  पता लगता है कि शोर जिस बात पर था, मामला कुछ और था। लेकिन तब तक समाज में वैर स्थापित हो चुका होता है। चारों तरफ से तलवारे खिंच चुकी होती हैं, गाली-गलौच का वातावरण बन चुका होता है फिर चुप्पी होने से भी कुछ नहीं होता है। नफरत की दीवार ऊंची हो गयी होती है। इसलिये जो खुद को बुद्धीजीवी कहते हैं, उन्हें ऐसे शोर से बचना चाहिये। कुछ भी बोलने से बचने चाहिये और कुछ भी लिखने से बचना चाहिये। अपनी वफादारी सिद्ध करने के लिये जल्दबाजी नहीं करनी चाहिये। आपकी वफादारी किसी एक दल के प्रति ना होकर समाज और देश के प्रति होनी चाहिये और सबसे अधिक मानवता के लिये होनी चाहिए। हमें लिखने की जो आजादी मिली है, उसके दुरुपयोग से बचना चाहिये। यौन-हिंसा से एक व्यक्ति पीड़ित होता है लेकिन झूठ के प्रचार से सारा समाज और देश पीड़ित होता है। कभी हम हिन्दू-मुसलमान करने लगते हैं, कभी सवर्ण-दलित करने लगते हैं, कभी स्त्री-पुरुष तो कभी फलाना-ढिकाना। कोई अन्त ही नहीं है इस हिंसा का। हर मन में हमने हिंसा को कूट-कूटकर भर दिया है, इसपर लगाम लगानी होगी।

Thursday, April 12, 2018

दे थप्पड़ और दे थप्पड़



राष्ट्रमण्डल खेलों का जुनून सर चढ़कर बोल रहा है और लिखने के लिये समय नहीं निकाल पा रही हूँ, लगता है बस खेलों की यह चाँदनी चार दिन की है तो जी लो, फिर तो उसी अकेली अँधेरी रात की तरह जिन्दगी है। कल शूटिंग के मुकाबले चल रहे थे, महिला शूटिंग में श्रेयसी सिंह ने स्वर्ण पदक जीता। स्वर्ण पदक मिलता इससे पहले ही खेल बराबरी पर थम गया और अब बारी आयी शूट-ऑफ की। इस समय किसी भी खिलाड़ी के दिल की धड़कने बढ़ ही जाती है लेकिन कौन अपने दीमाग को संतुलित रख पाता है, बस वही जीतता है। आखिर श्रेयसी अपने आप को संतुलित रखने में सफल हो गयी और स्वर्ण पदक पर कब्जा कर लिया। दूसरा गेम पुरुषों के बीच था, भारत के दो खिलाड़ी आगे चल रहे थे लेकिन जैसे-जैसे वे पदक के नजदीक आ रहे थे उनका धैर्य चुकता जा रहा था और मित्तल तो आखिरी क्षणों में संतुलन ही खो बैठे और कांस्य से समझौता करना पड़ा। अधिकतर खेलों में दीमाग का संतुलन रखने में महिला खिलाड़ी पुरुषों से अधिक सफल रहीं।
आम जीवन में हम सुनते आये  हैं कि महिला जल्दी धैर्य खो देती हैं जबकि पुरुष हिम्मत बनाए रखता है। लेकिन इन खेलों को देखकर तो ऐसा नहीं लग रहा है। महिला ज्यादा सशक्त दिखायी दे रही हैं। जैसै-जैसे महिलाएं दुनिया के समक्ष आता जाएंगी, उनके बारे में बनायी धारणाएं बालू के ढेर की तरह बिखरती जाएंगी। यहाँ भी तुम्हें धैर्य नहीं खोना है, आधी दुनिया तुमने पार कर ली है बस अब बाकी की आधी दुनिया शीघ्र ही तुम पार कर लोगी फिर यह दुनिया वास्तविक दुनिया बनेगी।
मेरे कार्यस्थल के एक साथी थे, गुटका खा रहे थे तो मैंने टोका, वे बोले की पुरुष हूँ तो कोई ना कोई नशा तो करूंगा ही। कोई गुटका खा रहा है, कोई सिगरेट, कोई शराब तो कोई भांग और अब तो जहरीले नशे भी उपलब्ध हैं। नशा नहीं भी है तो गालियों का सहारा लेते हैं या हिंसा का। तुर्रा यह कि पुरुष  हैं। लेकिन सारे ही नशे आपकी मानसिक स्थिति के परिचायक हैं। दुनिया में प्रतिशत देख लो, महिलाएं नशे के लिये कितना नशा करती हैं और पुरुष कितना? एक हास्य कलाकार हैं – अमित टंडन, वे किस्सा सुना रहे थे कि लड़का केवल पैदा होता है, घर वाले भी कहते हैं कि बस तू तो पैदा हो जा, इतना ही बहुत है। लेकिन लड़की को सिखाते हैं कि यह सीख ले और वह सीख ले नहीं तो पता नहीं सामने वाला कैसा मिलेगा! लड़के को कहते है कि देख कहना मान ले नहीं तो काला कुत्ता आ जाएगा। जब लड़का समझने लायक होता है और 7-8 साल का हो जाता है तब काले कुत्ते को देखता है और कहता है कि यह काला कुत्ता था, जिससे मुझे डराया जाता था कि काला कुत्ता आ जाएगा और दे थप्पड़ और दे थप्पड़, कुत्ते को मार देता है। जब लड़की की शादी होती है और 6 महिने निकल जाते हैं तो कहती  है यह था वो सामने वाला कि यह सीख ले और वह सीख ले! फिर दे थप्पड़ और दे थप्पड़। दुनिया आँखे खोलो, नशे से  बाहर आओ, महिलाओं के साथ रहना सीखो और इस दुनिया को सुन्दर बनाने में अपनी ऊर्जा लगाओ। जीवन को खेल की तरह लो और अपना संतुलन बनाए रखो।

Wednesday, April 4, 2018

द्वेष की आग कितना जलाएगी?


सोमनाथ का इतिहास पढ़ रही थी, सेनापति दौड़ रहा है, पड़ोसी राजा से सहायता लेने को तरस रहा है लेकिन सभी की शर्ते हैं। आखिर गजनी आता है और सोमनाथ को लूटकर चले जाता है। कोई "अपना" सहायता के लिये नहीं आता, सब बारी-बारी से लुटते हैं लेकिन किसी की कोई सहायता नहीं करता! इतना द्वेष हम भारतीयों में कहाँ से समाया है! हम एक दूसरे को नष्ट कर देना चाहते हैं, फिर इसके लिये हमें दूसरों की गुलामी ही क्यों ना करनी पड़े! हमारा इतिहास रामायण काल में हमें ले जाता है, मंथरा और कैकेयी का द्वेष दिखायी पड़ता है, महाभारत काल में तो सारा राष्ट्र ही दो भागों में विभक्त हो जाता है, चाणक्य काल में छोटे-छोटे राजा एक-दूसरे की सहायता करने को तैयार नहीं और सिक्न्दर आकर विजयी बनकर चले जाता है। चाणक्य कोशिश करते हैं और कुछ वर्षों तक एकता रहती है फिर वही ढाक के तीन पात! कल पोरस सीरियल देख रही थी, फारसी राजा कहता है कि तुम भारतीयों में वतन परस्ती नहीं है केवल अपनों से मोहब्बत करते हो, अपनों के कारण वतन को दाव पर लगा देते हो। मुझे लगता है कि मोहब्बत नहीं द्वेष कहना चाहिये था, हमारे अन्दर द्वेष भरा है और यह शायद हमारे खून में ही सम्म्लित है। द्वेष की आग हमारे अन्दर धूं-धूं जल रही है, किसी को भी कुछ प्राप्त हो जाए, हम सहन नहीं कर पाते। किसी अपने की या परिचित को सत्ता मिल जाये, यह तो कदापि नहीं। हम गुलामी में खुश रहते हैं। हम बार-बार गुलाम बनते हैं लेकिन हम सीखते कुछ नहीं हैं। हम टुकड़े-टुकड़े होते जा रहे हैं लेकिन बिखरना बन्द नहीं करते। हम अपने छोटे से लाभ के लिये किसी को भी भगवान मान लेते हैं, फिर अपनों को ही मारने निकल पड़ते हैं।
जंगल के जीवन पर आधारित फिल्म देख लीजिये, सभी अपना शिकार ढूंढते मिल जाएंगे। कल देखी थी ऐसी ही एक फिल्म, शेर शिकार के लिये निकला है, सामने बड़े सींग वाले जानवर थे, पार नहीं पड़ी। भूख लगी थी तो छोटे शिकार के लिये प्रस्थान किया और सदा के शिकार हिरण को दबोच लिया। हिरण में भी देखा गया कि कब कोई अपने झुण्ड से अलग हो और अकेले पाकर दबोच लिया जाए। मानवों में भी यही प्रकृति का कानून लागू है, शिकारी ताक में बैठे हैं कि कब कोई झुण्ड में अकेला हो और उसे दबोच लिया जाए। ऐसे ही नहीं बन गये अपनी-अपनी सम्प्रदाय के सैकड़ों देश और हम अपने प्राचीन देश को भी बचा नहीं पा रहे हैं। किस को समझाना? यहाँ तो सारे ही द्वेष की आग में जल रहे हैं, आज से नहीं हजारों साल से जल रहे हैं। द्वेष की आग समाप्त होती ही नहीं, हमारा सबसे बड़ा हथियार ही यह द्वेष बन गया है। हम एक-दूसरे को कुचल देना चाहते हैं, गरीब होने पर सम्पन्न को कुचल देना चाहते हैं और सम्पन्न होने पर गरीब को कुचल देना चाहते हैं। हम ना अमीर बनने पर द्वेष मुक्त होते हैं और ना ही गरीब रहने पर। हमारा पोर-पोर द्वेष से भरा है। हमारे देश में न जाने कितने महात्मा आये, सभी ने राग-द्वेष को अपने मन से निकालने की बात कही लेकिन जितने महात्मा हुए, उतना ही राग-द्वेष हम में बढ़ता चला गया। एक-एक महात्मा के साथ सम्प्रदाय जुड़ता चला गया और फिर अपने-अपने राग-द्वेष जुड़ते गये। दो महात्माओं ने एक ही बात कही लेकिन शिष्य अलग-अलग बन गये और फिर द्वेष ने जन्म ले लिया। वे पूरक नहीं बने अपितु विद्वेष के कारण बन गये। जबकि दुनिया में ऐसा नहीं हुआ, ना ज्यादा आए और ना ही ज्यादा ने अपना-अपना सम्प्रदाय अलग किया। वे शिकारी की भूमिका में रहे ना कि शिकार की। हम हमेशा शिकार ही बने रहे या अधिक से अधिक खुद के रक्षक बस। कैसे ठण्डे छींटे मारे जाएं, जो हमारे द्वेष की आग को समाप्त कर दे। हमें पता ही नहीं चलता कि हमारे द्वेष का कारण क्या है, हम किस पर वार कर रहे हैं? एक गरीब व्यक्ति प्रधानमंत्री बनता है, उसके ही खिलाफ हम गरीबों में द्वेष भरते हैं और फिर लोकतंत्र को बन्दी बनाकर राजशाही को स्थापित कर देते हैं। सारे गरीब खुश हो जाते हैं। फिर कोई द्वेष नहीं, चारों तरफ अमन-चैन स्थापित हो जाता है। मन हमेशा पूछता है कि कब होंगे हम इस द्वेष से मुक्त लेकिन देश का चलन देखकर लगता है कि शायद कभी नहीं।

Monday, April 2, 2018

भ्रष्टाचार का प्रथम गुरु


बचपन की कुछ बाते हमारे अन्दर नींव के पत्थर की तरह जम जाती हैं, वे ही हमारे सारे व्यक्तित्व का ताना-बाना बुनती रहती हैं। जब हम बेहद छोटे थे तब हमारे मन्दिर में जब भी भगवान के कलश होते तो माला पहनने के लिये बोली लगती, मन्दिर की छोटी-बड़ी जरूरतों को पूरा करने के लिये धन की आवश्यकता होती थी और इस माध्यम से धन एकत्र हो जाता था। उस समय 11 और 21 रूपए भी बड़ी रकम हो जाती थी लेकिन हमारे लिये तो यह भी दूर की कौड़ी हुआ करती थी। बोली लगती और कभी 11 में तो कभी 21 में किसी बच्चे को अवसर मिलता की वह माला पहने। माला पहनने के बाद उस बच्चे को सारी महिलाएं मन्दिर की स्कूल जैसी घण्टी बजाकर और गीत गाकर घर तक छोड़ती थी। हमें ऐसा सौभाग्य कभी नहीं मिला, हम कल्पना भी नहीं करते थे, क्योंकि हमारे पिताजी के तो आदर्श ही अलग थे। जैसे ही हमारे गाँव से, परिवार की किसी कन्या के विवाह का समाचार आता, पिताजी 5000 रू. का चेक भेज देते थे। उस समय उनका वेतन 500 रू. से अधिक नहीं रहा होगा लेकिन वे हमेशा 5000 रू. भेजते रहे। इस बात से परिवार में उनका सम्मान नहीं होता था अपितु विरोध होता था। इन दोनों ही घटनाओं का हमारे जीवन में प्रभाव पड़ना लाजिमी था। जैसे ही हम समर्थ हुए और किसी ने हमें भी चन्दा देने के योग्य समझा तो हम भी बचपन में जा पहुंचे और तत्काल चेक काट दिया। जितना हमारा सामर्थ्य होता हम चन्दा जरूर देते और परिवार के लिये भी जितना करना होता जरूर करते। लेकिन जैसे-जैसे समय व्यतीत होता गया  हमें लगने लगा कि समाज और धार्मिक संस्थाओं को चन्दा उगाहने की बीमारी लग गयी है। जरूरत से कहीं अधिक और असीमित पैसा एकत्र किया जाने लगा है। जो जितना चन्दा दे, उसका उतना ही सम्मान हो, बाकि किसी भी श्रेष्ठ कार्य करने वाले का सम्मान तो असम्भव हो गया।
हमारे समाज जीवन में पैसे का मोह बढ़ने लगा, आवश्यकता से अधिक पैसा एकत्र करने की होड़ लग गयी, क्योंकि हमें समाज के मंचों पर बैठने की लत लग गयी थी। पैसा एकत्र करो, कैसा भी पैसा हो, बस एकत्र करो और धार्मिक से लेकर सामाजिक मंचों पर कब्जा कर लो। किसी भी संस्था ने श्रेष्ठ व्यक्ति को कभी सम्मानित नहीं किया, बस पैसा ही प्रमुख हो गया। मैंने बचपन में देखा था कि मन्दिर में 21 रू. देने  पर गाजे-बाजे के साथ जुलूस निकलता था और परिवार में 5000 रू. देने पर भी आलोचना सुनने को मिलती थी। समाज का दृष्टिकोण बदलने लगा और सारा ध्यान येन-केन-प्रकारेण धन संग्रह पर जाकर अटक गया। हर व्यक्ति समाज के सम्मुख दानवीर बनना चाहता है, समाज भी नहीं पूछता कि यह धन कैसे एकत्र किया? तो भ्रष्टाचार का प्रथम गुरु यह चन्दा है। चन्दे से प्राप्त यह सम्मान है। मैं हमेशा सामाजिक संस्थाओं में अनावश्यक पैसा एकत्र करने का विरोध करती रही, जब लगा कि यह एकत्रीकरण मिथ्या है तो हाथ रोक लिये। हमने हाथ रोके तो हमारे हाथ भी रोक दिये गये। आज समाज में व्यक्तित्व की चर्चा नहीं है ना ही कृतित्व की चर्चा है, बस पैसे की चर्चा है। मेरे परिवार का खर्चा हजारों में चल जाता है लेकिन मुझे जब गाजे-बाजे के साथ जुलूस निकलने की याद आती है तब मैं लाखों कमाने की सोचने लगती हूँ और लाखों तो ऐसे ही नहीं आते! लोग करोड़ों रूपये चन्दे में देकर सम्मान खऱीद रहे हैं, समाज भी उन्हें ही सम्मानित कर रहा है, तो फिर भ्रष्टाचार से पैसा कमाने की होड़ तो लगेगी ही ना! आज संस्थाओं में होड़ लगी है – भव्यता की। मन्दिरों में होड़ लगी है – विशालता की और व्यक्तियों में होड़ लगी है – महानता की। ऐसे लगने लगा है कि ये संस्थाएं समाज को उन्नत नहीं कर रही हैं अपितु पैसा कमाने के मोह में उलझा रही हैं, पुण्य कमाने का मोह हम पर हावी कर दिया गया है, जैसे बासी रोटी को कुत्तों के सामने डालने को हम पुण्य समझने लगे हैं वैसे ही संस्थाओं में अनावश्यक चन्दा देकर हम समाज को लालची बना रहे हैं। यही कारण है कि समाज को सत्य दिखायी नहीं दे रहा है कि कैसे हम तलवार की नोक पर आखिरी सांसे गिन रहे हैं लेकिन टन-टन बजती घण्टी वाला जुलूस हमें ललचा रहा है। हम खुद को पैसे के भ्रष्टाचार में डुबो रहे हैं और देश को कमजोर कर रहे हैं। जिस भी देश का समाज लालची होगा, वह देश कभी भी गुलाम होने में समर्थ होगा। सामर्थ्यवान व्यक्ति आज घर में बैठे हैं और पैसे वाले समाज का आईना बन बैठे हैं, तब भला देश कैसे और कब तक स्वतंत्र रह पाएगा?

Saturday, March 31, 2018

माँ से मिलती है बुद्धिमत्ता


बहुत दिनों की ब्रेक विद बिटिया के बाद आज लेपटॉप को हाथ लगाया है, कहाँ से शुरुआत करूं अभी सोच ही रही थी कि बिटिया ने पढ़ाये एक आलेख का ध्यान आ गया। आलेख सेव नहीं हुआ लेकिन उसमें था कि हमारी बुद्धिमत्ता अधिकतर माँ से आती है। क्रोमोजोम की थ्योरी को इसके लिये जिम्मेदार बताया गया था। एक किस्सा जो बनार्ड शा के बारे में आता है और अभी इस देश की धरती पर देखें तो धीरू भाई अम्बानी और कोकिला बेन पर फिट बैठता है। बनार्ड शा को एक खूबसूरत महिला ने विवाह का प्रस्ताव रखा और कहा कि आपकी बुद्धि और मेरी खूबसूरती से मिलकर जो संतान होगी, वह सुन्दर और बुद्धिमान होगी। बनार्ड शा ने कहा कि यदि मेरी सूरत और तुम्हारी बुद्धि संतान को प्राप्त हो गयी तो? धीरू भाई अम्बानी ने यह प्रयोग कर लिया लेकिन विज्ञान ने अब सिद्ध कर दिया कि अधिकतर बुद्धिमत्ता माँ से ही आती है, एक्स क्रोमोजोम का जोड़ा ही इसके लिये उत्तरदायी होता है। मैंने जैसे ही आलेख देखा, मेरी माँ के प्रति मेरा आदर एकदम से बढ़ गया, क्योंकि हम तो आजतक यही मानते आये थे कि हमें बुद्धिमत्ता पिताजी से मिली है। माँ को कभी बुद्धिमत्ता दिखाने का अवसर ही नहीं मिला, तो हमने भी सोच लिया कि पिताजी ही अधिक बुद्धिमान थे लेकिन आज मैं तो बहुत खुश हूँ और शायद बहुत लोग इसे पढ़कर खुश हो जाएंगे कि बुद्धिमत्ता माँ से मिलती है।
एक कॉमेडी शो देख रही थी, उसमें आ रहा था कि लड़के का काम होता है केवल पैदा होना बस। उसे कोई काम नहीं सिखाया जाता जबकि लड़की को हर पल होशियार किया जाता है। अब तो यह मजाक की बात नहीं रही अपितु सत्य हो गयी कि वे माँ से बुद्धिमत्ता लेते हैं और अपने तक ही सीमित रखते हैं जबकि बेटियाँ अपनी संतानों को भी हिस्सा बांटती है। जो भी हमारे पास  है वह माँ का दिया हुआ है, कोई बिरला ही होता है जो पिता से ले पाता है। इसलिये जितनी ज्यादा लड़कियां, उतनी अधिक बुद्धिमत्ता। परिवार में बुद्धिमान संतान चाहिये तो सुन्दरता के स्थान पर बुद्धिमान माँ की तलाश करो, बिटिया को अधिक से अधिक ज्ञानवान बनाने का प्रयास करो। स्वामी विवेकानन्द से जब भी कोई कहता था कि आप बहुत बुद्धिमान हैं तो वे हमेशा यही कहते थे कि मेरी माँ अधिक बुद्धिमान है। मोदीजी के बारे में भी मैं हमेशा कहती रही हूँ कि उन्होंने माँ की बुद्धि पायी है तभी वे आत्मविश्वास से पूर्ण है। अब अपने चारों ओर निगाह घुमाओ और जानो की सबकि बुद्धिमत्ता का राज क्या है? माँ की खामोशी पर मत जाओ, उसने खामोश रहकर भी तुम्हें बुद्धिमत्ता दी है और कोशिश करो कि तुम्हारी बेटी भी ज्ञानवान बने जिससे हमारी पीढ़ी उत्तम पीढ़ी बन सके। लड़कियों तुम  भी अपना समय ब्यूटी-पार्लर की जगह पुस्तकालय में बिताओं जिससे जमाना तुम पर गर्व कर सके।

Friday, March 16, 2018

स्वार्थवाद का जेनेटिक परिवर्तन


कल मुझे एक नयी बात पता चली, आधुनिक विज्ञान की बात है तो मेरे लिये नयी ही है। लेकिन इस विज्ञान की बात से मैंने सामाजिक ज्ञान को जोड़ कर देखा और लिखने का मन बनाया। मेरा बेटा इंजीनियर है और उनकी कम्पनी ग्राफिक चिप बनाती है। कम्पनी की एक चिप का परीक्षण करना था और इसके लिये लन्दन स्थित प्रयोगशाला में परीक्षण होना था। मुझे कार्य की जानकारी लेने में हमेशा रुचि रहती है तो मैंने पूछा कि कैसे परीक्षण करते हो? उसका भी पहला ही परीक्षण था तो वह भी बहुत खुश था अपने सृजनात्मक काम को लेकर। उसने  बताया कि हमारी चिप, कम्प्यूटर से लेकर गाडी और हवाईजहाज तक में लगती है तो इसकी रेडियोधर्मिता के लिये परीक्षण आवश्यक होता है। सृष्टि के वातावरण में रेडियोधर्मिता पायी जाती है इसलिये चिप को ऐसा डिजाइन करना पड़ता है जिससे उसके काम में बाधा ना आए और वह अटक ना जाए। चिप को एटामिक पावर से गुजरना पड़ता है और खुद की डिजाइन को सशक्त करना होता है। जहाँ भी परीक्षण के दौरान चिप में एरर आता है, वहीं उसके डिजाइन को ठीक किया जाता है। खैर यह तो हुई मोटो तौर पर विज्ञान की  बात लेकिन अब आते  है समाज शास्त्र पर। मनुष्य को भी जीवन में अनेक संकटों से जूझना पड़ता है और इस कारण बचपन से ही हमें उन परिस्थितियों का सामना करने के लिये संस्कारित किया जाता है।
हमारा बचपन बहुत ही कठोर अनुशासन में व्यतीत हुआ है, पिताजी अक्सर कहते थे कि सोने के तार को यदि जन्ती से नहीं निकालोगे तो वह सुदृढ़ नहीं बनेगा उसी भांति मनुष्य को भी कठिन परिस्थितियों से गुजरना ही चाहिये। वे हमें अखाड़े में भी उतार देते थे तो घर में चक्की पीसने को भी बाध्य करते थे। हम संस्कारित होते रहे और हमारे इरादे भी फौलादी बनते गये। हमारे सामने ऐसे पल कभी नहीं आये कि जब सुना हो कि यह लड़की है इसलिये यह काम यह नहीं कर सकती, हाँ यह बात रोज ही सुनी जाती थी कि स्त्रियोचित काम में समय बर्बाद मत करो, यह काम पैसे देकर तुम करवा सकोगी। काम आना जरूर चाहिये लेकिन जो काम आपको लोगों से अलग बनाते हैं, उनपर अधिक ध्यान देना चाहिये। ये संस्कार ही हैं जो हमें प्रकृति से लड़ने की ताकत देते हैं, कल एक डाक्यूमेंट्री देख रही थी, उसमें बताया गया कि 5000 वर्ष के पहले मनुष्य ने अपना जीवन बचाने के लिये पशुओं का दूध पीना प्रारम्भ किया था। अपनी माँ के अतिरिक्त किसी अन्य पशु के दूध को पचाने के लिये शरीर में आवश्यक तत्व नहीं होते हैं लेकिन हमने धीरे-धीरे शरीर को इस लायक बनाया और हमने जेनेटिक बदलाव किये लेकिन आज भी दुनिया की दो-तिहाई जनसंख्या दूध को पचा नहीं पाती है। इसलिये शरीर को सुदृढ़ करने के लिये मनुष्य भी अनेक प्रयोग आदिकाल से करता रहा है, बस उसे हम ज्ञान की संज्ञा देते हैं और आज विज्ञान के माध्यम से समझ पा रहे हैं।
हमारे अन्दर शरीर के अतिरिक्त मन भी होता है, शरीर को सुदृढ़ करने के साथ ही मन को भी सुदृढ़ करना होता है। हमें कितना प्रेम चाहिये और कितना नहीं, यह संस्कार भी हमें परिवार ही देता है। जिन परिवारों में प्रेम की भाषा नहीं पढ़ायी जाती, वहाँ भावनात्मक पहलू छिन्न-भिन्न से रहते हैं। हमारे युग में मानसिक दृढ़ता तो सिखायी जाती थी लेकिन भावनाओं के उतार-चढ़ाव से अनभिज्ञ ही रखा जाता था लेकिन आज इसका उलट है। अब हम अपनी संतान को भावनात्मक भाषा तो सिखा देते हैं लेकिन शारीरिक और मानसिक दृढ़ता नहीं सिखा पाते, परिणाम है अनिर्णय की स्थिति। हमारे शरीर की चिप इस भावनात्मक रेडियोधर्मिता की शिकार हो जाती है, कभी हम छोटी सी भावना में बहकर किसी के पक्ष में खड़े हो जाते हैं और कभी अपनों के भी दुश्मन बन बैठते हैं। हमारी चिप आर्थिक पक्ष की सहिष्णु बनती जा रही है, जहाँ अर्थ देखा हमारा मन वहीं अटक जाता है। यही कारण है कि हम अपने अतिरिक्त ना परिवार की चिन्ता करते हैं और ना ही समाज और देश की। हमारे देश में परिवार समाप्त हो रहे हैं, जब परिवार ही नहीं बचे तो समाज कहाँ बचेंगे! देश की भी सोच छिन्न-भिन्न होती जा रही है इसलिये चाहे राजनीति हो या परिवारवाद, सभी में हमार स्वार्थ पहले हावी हो जाता है। हम धीरे-धीरे स्वार्थवाद से ग्रसित होते जा रहे हैं और इतिहास उठाकर देखें तो लगेगा कि हजारों सालों से हमने इसी स्वार्थवाद को पाला-पोसा है और हमारे जीन्स में भी जेनेटिक परिवर्तन आ गये हैं। कुछ सालों के परिवर्तन से इस जेनेटिक बीमारी को दूर नहीं किया जा सकता है। जब अन्य पशुओं का दूध पचाने योग्य शरीर भी बनने में 5000 साल से अधिक का समय लग गया और वह भी केवल एक-तिहाई जनसंख्या तक ही बदलाव आया है तो भारतीयों को स्वार्थवाद में परिवर्तन लाने के लिये अभी कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी।