Friday, October 26, 2018

अतिथि तुम कब जाओगे?

जब बच्चे थे तब भी दीवाली की सफाई करते थे और अब, जब हम बूढ़े हो रहे हैं तब भी सफाई कर रहे हैं। 50 साल में क्या बदला? पहले हम ढेर सारा सामान निकालते थे, कुछ खुद ही वापस ले लेते थे, कुछ भाई लोग ले जाते थे और जब थोड़ा बचता था तो वह कचरे के डिब्बे में जाता था। जैसे ही पिताजी की नजर कचरे के डिब्बे में जाती थी, वह सूतली उठा लेते थे और कहते थे कि यह तो बड़े काम की है, इसे कैसे फेंक दिया! आज भी यही हो रहा है, पहले केवल धूल ही कचरे में बच पाती थी और आज थोड़ी थैलियां और जुड़ गयी हैं। धीरे-धीरे करके एक-एक चीजें वापस अपने ठिकाने बिराज जाती हैं। कोई ना कोई इनकी तरफदारी करने आ ही जाता है। इस बार पुराने कपड़ों का ढेर निकाल डाला लेकिन फिकने में नहीं आ रहा। फेंके भी तो कहाँ? फेंकते समय हर चीज काम की लगती है और अगले साल फिर वही चीज फेंकने वाली लिस्ट में होती है, बरसों बरस यह क्रम चलता ही रहता है और इन्हें कोई ना कोई प्रशान्त भूषण सा वकील मिल ही जाता है। देश का कचरा देश में ही स्थापित हो जाता है। 
आज एक अलमारी खोली गयी, सामान ढूंसकर भरा था। यह कहाँ से आया? बिजली के कुछ बोर्ड बदलवाए गये थे और पुरानों को अल्मारी में बकायदा स्थान दे दिया गया था। जैसे ये सीनियर सिटिजन हों और उनके लिये एक कोठरी बना दी जाये! जब पुराने को बदल ही दिया गया है तो उसे सुरक्षित म्यूजियम बनाकर रखने की क्या आवश्यकता है? लेकिन हमारी मानसिकता में फेंकना तो मानो गुनाह है। मैंने अल्मारी खाली कर दी लेकिन वह सामान किसी दूसरे स्टोर में जगह पा ही जाएगा, यह निश्चित है। अच्छा कुछ सामान तो कबाड़ी भी नहीं खऱीदता, वह कहता है कि किसी काम का नहीं। लेकिन फिर भी हमारे यहाँ बिराजमान है। मेरी सबसे बड़ा समस्या है मोमण्टो। कबाड़ी कहता है कि नहीं ले जाता, अल्मारी कहती है कि किस-किस को समेटूं और किस-किस को याद रखूं। देश में भी ना न जाने कैसी-कैसी प्रथा बन जाती है! देने वाले के पैसे खर्च होते हैं और लेने वाले की समस्या बन जाते हैं। उपहार देना फैशन से भी बढ़कर आवश्यकता बन गया है, उपहार के बदले फिर वापसी में उपहार! कई बार तो लगता है कि हम सामान के बीच किसी खांचे में रहते हैं। जैसे सारे शऱीर में हड्डियों का जाल और बेचारा नन्हा सा दिल एक कोने में चुपचाप धड़कता रहता है। 18 बाय 22 के कमरे में हम सामानों से घिरे हैं और हमारे लिये बामुश्किल 5-6 फीट की जगह बची है। अल्मारी में सामान और पुस्तकें बढ़ती जाती हैं। दीवाली पर जब कुछ जगह बनाने की सोचते हैं तो कुछ किताबें ही फालतू के रिश्तों जैसे बाहर हो जाती हैं। बिग-बॉस के घर में बेचारी कविता की किताबों के कोई जगह नहीं होती। पत्रिकाएं तो महिने भर भी अपनी जगह स्थिर नहीं रख पाती, फिर चाहे उनके पन्नों में हम ही क्यों ना बैठे हों। यह तो भला हो कैमरे के डिजिटल होने का, नहीं तो ना जाने कितने नेगेटिव पड़े-पड़े अपने कालेपन को धोने को बेताब रहते। अब हम लेपटॉप को भरते रहते हैं। लेपटॉप की जगह दुनिया के एक कोने में कहीं सुरक्षित है, जिसका हमें भी नहीं पता है। कभी दुनिया नष्ट होगी और फिर आबाद होगी तो यह भूतिया महल लोगों के लिये आश्चर्य का कारण बनेगा! सारे दुनिया के डेटा यहाँ भरे हैं, लोग इस पहेली को हल करते-करते ना जाने कितनी सदियां निकाल देंगे। इस इलेक्ट्रोनिक कचरे की सोचकर तो मुझे कुछ राहत सी मिली है, मेरे पास तो एकाध अल्मारी में ही उछल-कूद मचाए है लेकिन दुनिया में ना जाने कितने देश की जगह ये लील रहे हैं! हम कहते हैं कि हर चीज नश्वर है, जो आया है वह जाएगा लेकिन इन्हें कैसे भस्मीभूत करें, समस्या बने हुए हैं! लगता है अलादीन का चिराग है, बोतल से निकलते ही समस्या कर देता है। कहाँ से लाएं वह बोतल, जिसमें कचरे को भर दें और ढक्कन लगाकर समुद्र में फेंक दें। हे! फालतू सामानों, तुम्हें हम कचरा कहते हैं, हमारे घर से, हमारे मन से निकलने का जतन करो। हमने यह मकान अपने लिये बनवाया था और तुमने इसपर अधिकार जमा लिया है। तुम क्यों उस अतिथि की तरह हो गये हो जिसे कहना पड़ता है – अतिथि तुम कब जाओगे? लेकिन तुम तो हमारे मन में बस गये हो, तुम्हें कैसे निकालें। मैं निष्ठुर हो जाती हूँ और बंगलादेशी समझकर बाहर कर देती हूँ लेकिन तभी पतिदेव प्रशान्त भूषण को अपने साथ ले आते हैं और स्टे लग जाता है। बचा ले मुझे! 

6 comments:

शिवम् मिश्रा said...

ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 26/10/2018 की बुलेटिन, "सेब या घोडा?"- लाख टके के प्रसन है भैया !! “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

गोपेश मोहन जैसवाल said...

बहुत सुन्दर ! इन कबाड़ों में हमारी मीठी यादें होती बसी हैं, इन्हें हमारे बच्चे और कबाड़ी क्या समझेंगे. परेशानी यह है कि आज के मकानों में कबाड़ क्या, बूढ़े माँ-बाप के लिए भी अक्सर जगह नहीं होती है. भले ही कोई प्रशांत भूषण घर की अदालत में अपनी दलीलों से इन्हें बे-दख़ल करवा दे पर इन्हें हमारी यादों से बे-दख़ल करवाने की किसी में भी ताक़त नहीं है.

smt. Ajit Gupta said...

शिवम् मिश्रा जी आभार।

smt. Ajit Gupta said...

गोपेश जी सुन्दर टिप्पणी के लिये आभार।

Kavita Rawat said...

कबाड़ में कई यादें समाहित जो होती हैं इसलिए मन दो-चार होता है, लेकिन कभी-कभी कठोर कदम उठाना जरुरी हो जाता है नहीं तो कॉकरोज का अड्डा बन जाता है कबाड़ में
बहुत अच्छी प्रस्तुति

smt. Ajit Gupta said...

कविता जी आभार।