Monday, February 8, 2010

साहित्‍यकार माता-पिता का स्‍मरण कौन करता है?

खुशबू हूँ मैं फूल नहीं जो मुरझा जाऊँगा
जब भी मुझको याद करोगे मैं आ जाऊँगा।
ये पंक्तियां रात को टीवी पर सुनी थी, मन से निकल नहीं रही। ऐसे लग रहा है जैसे दिल में समा गयी हों। टीवी पर संगीत का कार्यक्रम चल रहा था, उसमें प्रसिद्ध गायक शान अपने पिता का स्‍मरण करते हुए उनके ही गीत और संगीत को सुर दे रहे थे। आँखों में आँसू लिए और होठों पर मुस्‍कान लिए वे अपनी ही धुन में गाए जा रहे थे। उनकी पत्‍नी भी आँसू बहा रही थी। गुमनामी के अंधेरे में खो चुके अपने अप्रतिम पिता को जब शान ने याद किया तब लगा जैसे मन्दिर में घंटियां बज उठी हों। कोई बड़ी ही पवित्रता से भगवान को पुकार रहा हो।

आज न जाने कितना लिखा जा रहा है? लेकिन कितने बेटे हैं जिनके हाथों का स्‍पर्श उन शब्‍दों को मिलता है? कितने बेटे उन शब्‍दों का स्‍मरण कर पाते हैं और कितनी बहुएं उन शब्‍दों को सुनकर अपने आँसू नहीं रोक पाती? एक फिल्‍म आयी थी ‘यात्रा’ जिसमें नाना पाटेकर मुख्‍य भूमिका में थे। मैं उन दिनों अमेरिका अपने बेटे के पास गयी हुई थी। वहाँ सप्‍ताह में पाँच दिन तो घर पर बैठकर टाइम-पास के साधन ढूंढने पड़ते हैं तो इण्डियन स्‍टोर से किसी फिल्‍म की सीडी लाने का विचार बना। स्‍टोर के मालिक ने एक सीडी पकड़ा दी, नाम था ‘यात्रा’। पहले कभी नाम नहीं सुना था, फिर सोचा कि खाली बैठकर बोर होने से अच्‍छा है कोई अनजानी फिल्‍म ही देख ली जाए। उस फिल्‍म में नाना पाटेकर साहित्‍यकार बने थे, तो फिल्‍म के प्रति रुचि जागृत हो गयी। नाना पाटेकर का पात्र श्रेष्‍ठ साहित्‍यकार होने के बाद भी कहीं दुखी और कुंठित दिखायी पड़ता है। बेटा पूछता है कि भाई यह क्‍यों कुंठित है? मुझे भी समझ नहीं आता, मुझे लगता है कि साहित्‍यकार अधिकतर कुंठित ही रहते हैं तो शायद यही पात्र की मांग है। लेकिन अन्‍त में आभास हुआ कि उसका बेटा उसका साहित्‍य नहीं पढ़ता था शायद यह बहुत बड़ा कारण था उनकी कुंठा का।

हम अपने पिता या माता पर कब गर्व करते हैं? जब वे हमें भौतिक संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्‍ध करा सके? उनके आदर्श, उनके वचन, उनका साहित्‍य का क्‍या हमारे जीवन में कोई मौल नहीं? क्‍या ये सब बिना मौल की वस्‍तुएं हैं? हमारे द्वारा लिखा गया साहित्‍य क्‍या अभिमान करने का विषय नहीं है? कितने बेटे/बेटियां हैं जो एक सामान्‍य साहित्‍यकार माता-पिता का बड़े शान से परिचय कराते हैं? मैंने अक्‍सर देखा है कि वे परिचय के अभाव में कहीं खो जाते हैं। वे तरस जाते हैं उन शब्‍दों को सुनने के लिए जिन शब्‍दों को उन्‍होंने दुनिया को दिया है लेकिन जिन्‍हें वे बच्‍चों को शायद दे नहीं पाए। जब उनका परिचय ही नहीं है तो फिर उनके जाने के बाद उनका स्‍मरण तो शायद सपनों की बात होगी। फिर आज तो परिवार भी टूट गए हैं, श्राद्ध भी नहीं होते जो एक दिन ही याद कर लिया जाए। लेकिन फिर भी माता-पिता हमेशा ही कहेंगे कि जब भी मुझको याद करोंगे मैं आ जाऊँगा।

Saturday, February 6, 2010

प्रतिक्रिया करें, सुप्‍त ना रहें

रेल के एसी द्वितीय श्रेणी में अधिकतर सम्‍भ्रान्‍त लोग यात्रा करते हैं, मैंने अधिकतर सम्‍भ्रान्‍त लोग इसलिए लिखा है कि कभी-कभार मुझ जैसे लोग भी यात्रा करते हैं। वहाँ के बेड-रोल अक्‍सर गन्‍दे होते हैं। मैं उदयपुर में निवास करती हूँ तो मेरा उदयपुर से चलने वाली रेलों से ही अधिक सामना होता है, लेकिन कभी-कभी भारत के अन्‍य क्षेत्रों की रेलों से भी रूबरू हुई हूँ। कम्‍पार्टमेन्‍ट में 42-44 यात्री रहते हैं लेकिन मैंने कभी भी मेरे सिवाय किसी और को गन्‍दे बेड-रोल के लिए केयर-टेकर को टोकते नहीं सुना। उदयपुर से ट्रेन दिल्‍ली जाती है तो सुबह होते ही यात्रियों से चद्दरें लेकर केयर-टेकर समेटकर रख देता है और शाम को वापस दूसरे यात्रियों को दे देता है। कम्‍बल तो इतने फटे हुए और गन्‍दे होते हैं कि शायद घर में ऐसे हो तो तत्‍काल पत्‍नी के ऊपर फेंक दिए जाएं। नेपकीन तो मांगने पर भी मिल जाए तो शुक्र कीजिए। लेकिन हम कभी भी प्रतिक्रिया नहीं करते, बस चुपचाप उसी बिस्‍तर पर सो जाते हैं। यह मुद्दा तो ऐसा भी नहीं है जिससे आप किसी संकट में पड़ जाएं। लेकिन उस समय साधु बन जाते हैं कि जो मिला उसी में संतोष। परिणाम क्‍या होता है, रेल के ठेकेदार इसका फायदा उठाते हैं और हमें प्रतिदिन इन गन्‍दे बिस्‍तरों पर सोना पड़ता है।

इसके विपरीत एक और वाकया देखिए। जब मैंने यात्रियों को प्रतिक्रिया करते हुए देखा। मैं हैरान रह गयी देखकर कि लोग कमजारे व्‍यक्ति के सामने कैसे शेर बनते हैं? रायपुर से मैंने ट्रेन पकड़ी, अपनी बर्थ पर बैठ गयी। कुछ ही मिनट में एक व्‍यक्ति को थामे दो व्‍यक्ति आए और एक बर्थ पर सुलाकर चले गए। उसका सामान भी रख गए। जब ट्रेन चल दी, तो पास के सह-यात्रियों ने हल्‍ला मचाना शुरू किया कि इसने शराब पी रखी है और यह बेसुध होकर सो रहा है, हमें इससे खतरा है। पुलिस आ गयी, उन्‍होंने भी समझाने का प्रयास किया कि यात्री सो रहा है, पता नहीं क्‍या बात है? आपको इससे क्‍या परेशानी है? लेकिन लोग नहीं माने और अगले ही स्‍टेशन पर उस यात्री को सामान सहि‍त प्‍लेटफार्म पर डाल दिया गया। मैं खड़ी अवाक देखती रही कि यह क्‍या हो रहा है? उस यात्री की क्‍या मतबूरी थी, हो सकता है किसी ने उसे लूटा हो और ऐसी हालात में उसे यहाँ छोड़ गए हों। उसके पीछे कोई भी कारण हो सकता था। लेकिन भीड़ के कानून ने पुलिस के सामने फैसला सुना दिया था। यह घटना कई वर्ष पुरानी है, लेकिन मेरे मन से जाती नहीं। वह बेचारा व्‍यक्ति पता नहीं किस हालात का शिकार हुआ होगा। आप कहेंगे कि मैं क्‍यों नहीं बोली? मैंने कोशिश की लेकिन नक्‍कार-खाने में तूती की आवाज भला कौन सुनता है?

ये दो उदाहरण हैं, ऐसे कितने ही उदाहरण हमारी रोजमर्रा के जीवन में आते हैं लेकिन जहाँ कमजोर व्‍यक्ति होता है, वहाँ हम शेर बन जाते हैं और जहाँ व्‍यवस्‍था सुधारने की बात होती है वहाँ हम सहन करते जाते हैं। फिर कहते हैं कि भ्रष्‍टाचार है। हम बात-बात में नेताओं को गाली देते हैं लेकिन कभी नहीं सोचते कि हम कितना चुप रहते हैं? केवल अपना फायदा देखते हैं। यदि हम ऐसे अव्‍यवस्‍थाओं के खिलाफ प्रतिक्रिया करना प्रारम्‍भ कर दें तो बहुत कुछ सुधार सम्‍भव हो सकता है। प्रतिक्रिया करने पर ही सुधार होगा, सुप्‍त समाज मृत समान है।

Thursday, February 4, 2010

अमेरिकी-गरीब के कपड़े बने हमारे अभिनेताओं का फैशन

अमेरिका के एक मॉल में घूम रहे थे। कुछ किशोर बच्‍चे अजीबो-गरीब ड्रेस पहने हुए थे। किसी ने अपनी आयु से काफी बड़ा टी-शर्ट, किसी ने फुल टी-शर्ट पर हॉफ शर्ट और फटी जीन्‍स पहन रखी थी। वे बच्‍चे मेक्सिन, साउथ अफ्रिका आदि देशों के थे। गरीब थे और छोटे-मोटे धंधे करके अपना गुजारा करते थे। मैंने बेटे से पूछा कि ये बच्‍चे क्‍या ऐसी ही अजीबो-गरीब और फटी-टूटी ड्रेस पहनते हैं। उसने कहा कि हाँ ये ऐसी ही पहनते हैं। खैर हम भी मॉल में एक कपड़ों की दुकान में गए। बेटे ने कहा कि कुछ खरीदना हो तो खरीद लो। वहाँ फटी हुई जीन्‍स लटकी हुई थीं, मुसी-तुसी शर्ट पड़ी थीं। मैंने कहा कि क्‍या हम किसी कबाड़ी की दुकान में आ गए हैं? बेटा हँसा और बोला कि यही फैशन है।

दूसरे दिन शहर के अन्‍दरूनी हिस्‍से में थे, लोग बड़े करीने से सूट पहने थे, महिलाएं भी अच्‍छे वस्‍त्र पहने हुई थीं। मैंने फिर बेटे से पूछा कि तुम तो कहते थे कि वो फैशन है, पर ये सम्‍भ्रान्‍त लोग तो बड़े सलीके से कपड़े पहने हैं। बेटा बोला कि ये तो बड़े लोग हैं। हम देशी तो यही पहनते हैं। एक बार मेरा तो बेटे से झगड़ा भी हो गया। बाजार जाना था वो बरमूडा पहनकर आ गया कि चलो। मैंने कहा कि यह क्‍या? कपड़े तो ढंग के पहनकर चलो। वह बोला कि अरे यहाँ तो सभी ऐसे ही जाते हैं। मैंने गुस्‍से में कहा कि नहीं तुम कपड़े बदलो। वह गुस्‍से में भुनभुनाता हुआ कपड़े बदलकर आया, वो भी कोई अच्‍छे नहीं थे।

मैंने भारत आकर जब अपनी बहन से कहा कि अरे ये युवा फैशन के नाम पर क्‍या पहनते हैं? उसने बताया कि मेरा किस्‍सा सुनो। वह बोली कि मेरा बेटा जब भारत आया तो अपनी एक जीन्‍स छोड़ गया। मैंने उसे देखा, वो फटी हुई थी। मेरे नर्सिंग होम में जो सफाई कर्मचारी था, उसे मैंने वो जीन्‍स दे दी। कुछ महिनों बाद बेटा जब वापस आया तब उसने पूछा कि मम्‍मी आपने मेरे कपड़े किसी को दिए हैं क्‍या? मेरी एक नयी जीन्‍स नहीं मिल रही। मैंने बड़ा याद किया लेकिन कुछ याद नहीं आया। फिर अचानक से याद आया कि अरे एक जीन्‍स जो फटी हुई थी वो मैंने राजू को दी थी। अब बेटा भड़क गया, बोला कि अरे मम्‍मी आप क्‍या करती हैं? मेरी नयी जीन्‍स उसे दे दी। मैं अभी वापस लाता हूँ।

मैंने कहा कि उसकी पहनी हुई वापस लाएगा क्‍या? लेकिन वो बोला कि मुझे कोई फरक नहीं पड़ता। वो गुस्‍से में तमतमाया हुआ राजू के पास गया। उसने कहा कि तूने मेरी जीन्‍स ली है क्‍या? वह बोला कि मैं फटी हुई जीन्‍स नहीं पहनता, मेडम ने दी थी, तो मैं मना नहीं कर सका, लेकिन वो उस अल्‍मारी में रखी है। मैंने उसे हाथ भी नहीं लगाया है। आखिर उसे जीन्‍स वापस मिल गयी।

अभी टीवी पर एक कार्यक्रम आ रहा था, उसमें शाहिद कपूर ने एकदम फटी हुई जीन्‍स पहन रखी थी। फिर दूसरे कार्यक्रम में और भी हीरोज ने ऐसी ही घुटनों से और पीछे से फटी हुई जीन्‍स पहन रखी थी। कुछ ने लम्‍बी टी-शर्ट और ऊपर से हॉफ शर्ट पहन रखी थी। तब मन में एक विचार आया कि अमेरिका के गरीब की तो मजबूरी है, फटे हुए कपड़े पहनना और शायद जो भारतीय वहाँ रह रहे हैं वे भी अपनी धुलाई की समस्‍या और गरीबी के कारण ऐसे ही कपड़े पहन लेते हों। लेकिन ये अभिनेता, जिनसे भारत का फैशन बनता है, क्‍या इतनी हीनभावना से ग्रसित हैं जो अमेरिका की गरीब जनता जैसे कपड़ों को फैशन के नाम पर पहनते हैं? यह तो आप सब जानते ही हैं कि जीन्‍स तो वहाँ काउ-ब्‍वायज अर्थात ग्‍वाले पहनते हैं। वो भी हमने फैशन बना लिया और अब फटे-टूटे कपड़ों को फैशन बना रहे हैं। क्‍या ये अभिनेता वहाँ के अभिनेताओं के फैशन को नहीं अपना सकते? कितनी हीनभावना से भरा हुआ हैं हमारा अभिजात्‍य वर्ग भी?

Wednesday, February 3, 2010

नायक/लायक/नालायक – अमिताभ/राखी सावंत/राहुल महाजन

एनडीटीवी के रवीश जी ने कल अमिताभ को महानालायक कहा। इसके विपरीत यही चैनल राखी सावंत और राहुल महाजन को नायक बनाने में तुले हैं। मैं कांच के टुकड़े को भी हीरा कहूं तो मेरी मर्जी, यदि मुझे हीरे को भी कांच का टुकड़ा सिद्ध करना पड़े तो यह है मेरी शक्ति। अमिताभ नायक हैं, लायक हैं या फिर नालायक हैं, यह आज के तथाकथित तानाशाह सामन्‍त तय करते हैं। इनकी एक नायिका सरे आम अपनी माँ को गाली देती है और दूसरा नायक पिता की अस्थि कलश को गोद में रखकर जमकर नशा करता है। दोनों का ही ये स्‍वयंवर कराते हैं।

इस देश की जनता का आदर्श कौन बने, यह आज टीवी चैनल तय करते हैं। एक बार शाहरूख खान ने अपने साक्षात्‍कार में कहा था कि ‘हम तो भांड हैं, केवल अभिनय करते हैं’। अब अभिनय करने वाले लोग इस देश के नायक कैसे हो जाते हैं? फिर महानायक भी बन जाते हैं। कौन बनाता हैं इन्‍हें? यही टीवी चैनल। इस देश की युवा-शक्ति आज इन्‍हीं अभिनेताओं के पीछे पागल है। वे इन्‍हें अपना आयडल मानते हैं। विज्ञान का विद्यार्थी जिसे डाक्‍टर या इंजिनीयर बनना है भला उसका आयडल ये अभिनेता कैसे हो सकते हैं? वे इनके पसन्‍दीदा अभिनेता हो सकते हैं लेकिन जिनके पदचिन्‍हों पर या जिनके समान हमें बनना है उनको हम आयडल नहीं कहते। लेकिन ये टीवी वाले युवाशक्ति को भ्रमित करते हैं। उन्‍हें ऐसा ग्‍लेमराइज करते हैं कि सब उनके पीछे पागल हो जाते हैं।

मेरा रवीश जी से या जिनको मक्‍खन लगाने के लिए उन्‍होंने अमिताभ को महानालायक कहा, क्‍यो वे राहुल महाजन को अब नायक बनाने में तुले हैं? उन्‍होंने क्‍यों राखी सावंत को नायिका बनाकर पेश किया? ह‍म तो किसी भी अभिनेता को चाहे वो अमिताभ हो या फिर और कोई, कभी भी नायक या महानायक नहीं मानते। वे केवल एक अभिनेता हैं, बस। यदि वे अपने अभिनय द्वारा किसी ऐसे मुद्दे को उठाएं जिससे सारा देश एकता के सूत्र में बंध जाए तब हम उन्‍हें नायक कहेंगे। जैसे पूर्व में मनोज कुमार देश भक्ति का जज्‍बा जगाने के लिए फिल्‍में बनाते थे। वे नायक थे। लेकिन यदि आज के ये नायक जो कभी किसी फिल्‍म के नायक बनते हैं और कभी खलनायक, उन्‍हें कैसे हम अपना नायक मान लें। स्‍वांग भरने वाले इस देश के नायक कैसे हो गए? मीडिया आज जितना चरित्र हरण कर रहा है उतना तो शायद किसी तानाशाह राजा ने भी नहीं किया होगा। आज जो भी मीडिया की कमाई का जरिया बनता है वो नायक हो जाता है और जो उनके विरोधी के पक्ष में जा खड़ा होता है वो नालायक बन जाता है। यह दोहरा चरित्र अब जनता समझने लगी है, बस देश का दुर्भाग्‍य तो तब समाप्‍त होगा जब युवा पीढ़ी समझदार बनेगी। कौन नायक है, कौन लायक है और कौन नालायक है, यह मीडिया तय नहीं करती। मीडिया का काम है जो सत्‍य है उसको दिखाना, बस। अपनी राय थोपना मीडिया का काम नहीं है।

Monday, February 1, 2010

ब्‍लागवाणी से हम पल्‍टी खा गए

आजकल फुर्सत में हैं, तो सारा दिन इधर-उधर ताक-झांक करते रहते हैं। कभी किसी की रसोई में और कभी किसी की रसोई में। देखते हैं कि किस ने आज क्‍या पकाया है और क्‍या परोसा है? थोड़ा-थोड़ा चख भी लेते हैं, लेकिन चखते ही सामने लिखा बोर्ड दिखायी दे जाता है ‘पसन्‍द का’, लिखा होता है कि पसन्‍द है तो चटका लगाएं। अब वहाँ चटका लगाना जरूरी हो जाता है। लेकिन तभी एक खिड़की खुल जाती है कि अब इस पर टिप्‍पणी भी करो। कई बार मन में आता है कि लिख दें कि नहीं करेंगे तो क्‍या करोगे? तभी दिख जाते हैं पतिदेव, चुपचाप बिना प्रतिक्रिया के खाना खाते हुए। हम गुस्‍से में भुनभुनाते हुए कहते हैं कि सब्‍जी और लोंगे? हाँ लेंगे, लेकिन इतने गुस्‍से में क्‍यों बोल रही हो? पति मुस्‍कराकर बोले। अरे आप कोई प्रतिक्रिया ही नहीं कर रहे, बस ठूसे जा रहे हैं, खा लिया तो टिप्‍पणी भी करो कि अच्‍छा लगा। यह सीन ध्‍यान आते ही झट की-बोर्ड पर अंगुलिया चल पड़ती है और तड़ातड़ टिप्‍पणियां लिख दी जाती हैं। सारा दिन यही क्रम चलता रहता है। इस बीच अपनी रसोई में भी झांक लेते हैं, अपने पकवान पर भी किसी ने टिप्‍पणी की है क्‍या? या फिर पसन्‍द है ऐसा छौंक लगाया है क्‍या? लेकिन क्‍या बताऊँ भाईसाहब और बहनजी कुछ लोग तो बड़े ही नुगरे होते हैं, हम तो उन्‍हें अच्‍छा है अच्‍छा कह-कह कर थक गए लेकिन वे कभी हमारे पकवान की ओर झांकते तक नहीं। हम ठहरे राजस्‍थान के लोग बड़ा सीधा-सादा भोजन बनाते हैं, ना तो हमारे यहाँ उत्तर भारतीयों की तरह ज्‍यादा चाट-पकौड़ी चलती हैं और ना ही दक्षिणी भारतीयों की तरह डोसे वगैरह हम तो अधिक से अधिक बाटी-चूरमे तक ही बना पाते हैं। ज्‍यादा से ज्‍याद चटनी बना ली, पापड़ तल लिया। राजस्‍थान में हरियाली भी कम ही है, तो हमारे पकवानों को हम हरा-भरा भी नहीं बता पाते, आप लोगों की तरह। चलो कोई बात नहीं, आप मत चखिए राजस्‍थानी चूरमा, हम तो आप लोगों के भाँति-भाँति के व्‍यंजन चखते रहेंगे और पसन्‍द है इसका छौंक भी लगाते रहेंगे। हमें तो अभी फुर्सत है। लेकिन कल बड़ा मजेदार वाकया हो गया, हम अपने पकवान पर सबसे पहले पसन्‍द का छौंक लगा देते हैं। एक रसोइए ने हमें बताया था कि आप दुबारा भी छौंक लगाएंगे तो तड़का दिखेगा। हमने ऐसा कर दिया, अरे यह क्‍या संख्‍या तीन की जगह दो हो गयी। भैया ब्‍लागवाणी को मेरा प्रणाम। मेरी रसोई और मेरा पकवान ही उन्‍हें मिला ऐसी ठिठोली करने को। पहली बार किया और पहली बार ही हम पल्‍टी खा गए। चलिए मेरा पकवान तो तैयार हो गया, आपके भी चख लूं। सीता-सीता।

Saturday, January 30, 2010

परिवारवाद बनाम केरियरवाद

आज समाचार पत्रों में एक समाचार प्रकाशित हुआ, बी.बी.सी. ने एक सर्वे कराया कि सात मानवीय दुर्गुण यथा लोभ, ईर्ष्‍या, आलस्‍य, पेटूपन, वासना, क्रोध और अभिमान किन देशों के नागरिकों में अधिक है? आस्‍ट्रेलिया, अमेरिका, मेक्सिको, दक्षिणी कोरिया आदि देश इन दुर्गुणों में प्रथम रहे। हम अपने देश भारत को इन दोषों से युक्‍त मानते हैं और हम इसी हीन भावना से ग्रसित हैं कि हम ही सर्वाधिक इन दुर्गुणों से ग्रसित हैं। क्‍यों भारत के नागरिक इस सर्वे में प्रथम नहीं आए और क्‍यों‍ विकसित देश इस सर्वे में प्रथम आए? हमें इस विषय पर चिंतन करना चाहिए।

विश्‍व में जब से सभ्‍यता का जन्‍म हुआ तभी से परिवारवाद को महत्‍व मिला। इसका मुख्‍य कारण व्‍यक्ति की सुरक्षा था। व्‍यक्ति परिवार में रहकर स्‍वयं को सुरक्षित पाता था। लेकिन पश्चिम में जब से व्‍यक्तिवादी दर्शन की स्‍थापना हुई तभी से परिवारवाद का विघटन प्रारम्‍भ हुआ। विज्ञान के आविर्भाव के साथ ही इस व्‍यक्तिवादी चिन्‍तन में तीव्रता आई। डार्विन नामक वैज्ञानिक ने यह सिद्ध किया कि सृष्टि में जो शक्तिशाली है वही जीवित रहता है। इस दर्शन के बाद तेजी से व्‍यक्तिवाद बढ़ा। लगभग 100 वर्षों पूर्व व्‍यक्तिवाद का नया नामकरण हुआ और वह था केरियर। अब आधुनिकता का पर्याय बन गया केरियर। ज्ञान के स्‍थान पर विज्ञान के आने का परिणाम यह हुआ कि ज्ञान पुरातन का प्रतीक बना और विज्ञान आधुनिकता का। इस कारण जो परम्‍परागत चिन्‍तन एवं व्‍यवस्‍थाएं थीं वे पुरातन हो गयीं और इसके विपरीत सारी ही व्‍यवस्‍थाएं आधुनिक हो चली।

भारत सन् 1500 तक सर्वाधिक समृद्ध राष्‍ट्र था, यह इतिहास का निर्विवादित सत्‍य है। इसके विपरीत यूरोप जैसे देश सर्वाधिक अविकसित देश थे। अमेरिका आदि देश तो कहीं गणना में ही नहीं थे। भारत में तब तक पारिवारिक व्‍यापार या रोजगार प्रथा थी। ब्राह्मण का बेटा ब्राह्मण और क्षत्रीय का बेटा क्षत्रीय बनता था। लेकिन विज्ञान और अंग्रेजों के आने के बाद भारत में भी आधुनिकता का प्रवेश हुआ। अंग्रेजों की वेशभूषा, खानपान और विवाह पद्धति हम से एकदम भिन्‍न थे इस कारण भारतीयों को इनने आकृष्‍ट किया। शिक्षा के नवीन आयामों के कारण नवीन रोजगार प्रारम्‍भ हुए। पारिवारिक व्‍यवसाय बिखरने लगे। लेकिन यह बदलाव बहुत ही कम मात्रा में था। लेकिन लगभग 100 वर्षों से शिक्षाजनित रोजगारों में तेजी आयी और परिवारवाद के स्‍थान पर व्‍यक्तिवाद आ गया। धीरे-धीरे व्‍यक्तिवाद का नामकरण हुआ केरियर। केरियर निर्माण आधुनिकता का प्रतीक बन गया और समय की आवश्‍यकता भी।

शिक्षा से उत्‍पन्‍न रोजगारों के कारण गाँव-कस्‍बों में निकलकर युवावर्ग शहरों में बसने लगा। शहरों और महानगरों में जनसंख्‍या वृ‍द्धि के कारण अनेक रोजगार उत्‍पन्‍न हुए और गाँव से मजदूर भी अब शहरों की ओर पलायन करने लगे। यह स्थिति भारत में ही नहीं आयी अपितु विश्‍व के प्रत्‍येक देश में आयी। जिन देशों का समाज जितना अधिक केरियर ओरियेण्‍टेड हुआ उतने ही परिवार बिखर गये। परिवारवाद और व्‍यक्तिवाद में एक मूल अन्‍तर है। परिवारवाद में सबको साथ रखने का भाव है जबकि व्‍यक्तिवाद में केवल स्‍वयं का चिन्‍तन है। इस कारण परिवार में त्‍याग की भावना सर्वोपरि होती है और व्‍यक्तिवाद में भोग की। परिवार में रहते हुए सभी सदस्‍यों के अभ्‍युत्‍थान का भाव रहता है तथा किसी अशक्‍त व्‍यक्ति को भी बराबर के अवसर प्राप्‍त होते हैं। लोभ, क्रोध, अहंकार, ईर्ष्‍या, आलस्‍य, पेटूपन और वासना के भावों की वृद्धि नहीं होती। व्‍यक्ति अपने परिवार से ही संस्‍कारित होता है इस कारण उसके सार्वजनिक जीवन में भी इन दुर्गुणों का प्रवेश नहीं होता है।

लेकिन वर्तमान परिवेश में जब केरियर ही हमारी प्राथमिकता हो गयी है तब यह सारे ही दुर्गुण स्‍वयं ही चले आते हैं। केरियर का अर्थ होता है कि जीवन की घुड़दौड़ में प्रथम आना। आज के माता-पिता अपने बच्‍चों को इस घुड़दौड़ में प्रथम लाने के प्रयास में लगे रहते हैं। वे स्‍वयं को मिटाकर केवल बच्‍चे को प्राथमिकता देते हैं इस कारण बच्‍चे में अहंकार का दोष उदय होता है। जैसे-जैसे उसकी शिक्षा बढ़ती है माता-पिता के लिए केवल बालक ही सर्वोपरि होने लगता है और बच्‍चा अहंकार से परिपूर्ण बन जाता है। जब वह प्रतियोगिता में भाग लेता है तब वह क्रोध और ईर्ष्‍या का शिकार होता है। माता-पिता ही उसे आलसी और पेटू बना देते हैं। जब बालक व्‍यक्तिवादी बनता है तब लोभ और भोग स्‍वत: ही चले आते हैं। ये सात दुर्गुण केरियर निर्माण की देन है।

आस्‍ट्रेलिया, अमेरिका आदि देशों में परिवार पूर्णतया: बिखर चुके हैं। जिन-जिन देशों से जनसंख्‍या का सर्वाधिक पलायन हुआ या जिन देशों में सर्वाधिक आगमन हुआ, ये दोष वहीं अधिक उपजे। क्‍योंकि पलायन करने से ही परिवार का बिखराव हुआ। अमेरिका और आस्‍ट्रेलिया दोनों ही देश यूरोपियन्‍स के कारण विकसित हुए हैं। वे वहाँ जाकर बसे और अब तो इन दोनों देशों में विश्‍व के सारे देशों की जनसंख्‍या बसती है। इसकारण परिवार के संस्‍कार वहाँ सर्वाधिक न्‍यून है। भारत में आज भी बहुत बड़ी जनसंख्‍या परिवार के संस्‍कार के साथ रहती है इसी कारण ये सारे ही दोष हमारी अधिकांश जनसंख्‍या में नहीं है।

लेकिन केरियर निर्माण की दौड़ में प्रत्‍येक व्‍यक्ति दौड़ने को आतुर है। देर-सबेर भारत में भी केरियर के कारण परिवार प्रथा समाप्‍त होगी। तब हम भी इन सारे ही दुर्गुणों से बच नहीं सकते। इसलिए हमें पुन: विचार करना होगा अपने पारिवारिक व्‍यवसाय प्रणाली पर। गाँवों और कस्‍बों से पलायन रोकने के लिए वहाँ रोजगार के साधन उपलब्‍ध कराने होंगे। नहीं तो महानगरों और शहरों में संस्‍कारविहीन युवाओं की जनसंख्‍या बढ़ती जाएगी। शिक्षित युवाओं को भी अपने ग्रामों में ही रोजगार के साधन खोजने होंगे। अधिक से अधिक स्‍थानीयता को महत्‍व देना होगा। सरकार को भी अपनी नीति बदलनी होगी। परिवारप्रथा को बचाने के लिए कर्मचारी की नियुक्ति स्‍थानीय स्‍तर पर ही करनी होगी। बड़ी कम्‍पनियों को भी कर्मचारी के कार्य-समय को नियमित करना होगा, जिससे वह परिवार में पूर्ण समय दे सके। इससे दो लाभ होंगे, एक कर्मचारी के स्‍थान पर दो कर्मचारी की नियुक्ति होगी और परिवार भी बचेंगे। अब समय आ गया है कि हम इस विषय को गम्‍भीरता से लें और परिवारवाद को पुन: वि‍कसित करें और केरियरवाद को गौण करें।

Wednesday, January 27, 2010

गाँव में गणतन्‍त्र दिवस

गणतन्‍त्र दिवस का उत्‍सव मनाया जा रहा है। बच्‍चे चबूतरे पर बैठे हैं, गाँव वाले पेड़ों के नीचे और महिलाएं अपने झोपड़े के आगे घूंघट निकालकर बैठी हैं। कुछ बच्‍चे पास के पक्‍के मकान की छत पर भी चढ़ गए हैं। विद्यालय के बच्‍चे आज प्रस्‍तुति देंगे। कोई कविता पाठ करेगा तो कोई नृत्‍य। सामूहिक नृत्‍य करने को भी बालिकाएं सज-धज कर तैयार हैं। कल तक गंदे कपड़ों में आकर बैठने वाले बच्‍चों के तन पर अब स्‍कूल की साफ धुली हुई यूनिफार्म है। कुछ छोटे बच्‍चों ने जरूर गंदी ही ड्रेस पहन रखी है, वो ड्रेस उसके बड़े भाई या बहन की होगी। पूरे गाँव में उत्‍सव का सा माहौल है।

मेरे शहर से मात्र 12 कि मी की दूरी पर बसा है एक गाँव ‘नयाखेड़ा’। इसे हमारी संस्‍था भारत विकास परिषद ने गोद ले रखा है और वहाँ वर्तमान में एक सिलाई केन्‍द्र संचालित हैं। हम स्‍वतंत्रता दिवस और गणतन्‍त्र दिवस वहाँ प्रतिवर्ष मनाते हैं। सिलाई केन्‍द्र के पूर्व संस्‍था वहाँ विद्यालय संचालित करती थी लेकिन अब वहाँ सरकारी विद्यालय खुल गया है तो हमने विद्यालय के स्‍थान पर सिलाई केन्‍द्र संचालित करने का निश्‍चय किया। इन दोनों राष्‍ट्रीय पर्वों पर हम विद्यालय के बालक-बालिकाओं को माध्‍यम बनाकर वहाँ उत्‍सव मनाते हैं। इस उत्‍सव में सारा गाँव ही भागीदारी करता है। इस वर्ष गाँव में पंचायत के चुनाव हो रहे हैं तो इस गणतन्‍त्र दिवस पर गाँव में गहमा-गहमी थी। वर्तमान सरपंच हमारे साथ मंच पर बैठे थे। मुझे बताया गया कि इस बार उनकी पत्‍नी सरपंच का चुनाव लड़ रही है। मैंने उनसे पूछा कि कहाँ है आपकी पत्‍नी? उन्‍होंने दूर बैठी, लम्‍बा घूंघट निकाले एक महिला की तरफ इशारा किया।

इतने में ही संचालक ने घोषणा की कि अब पूजा आपके सामने कविता पाठ करेगी। ग्‍यारहवीं कक्षा में पढ़ने वाली पूजा का काव्‍य पाठ प्रारम्‍भ हुआ। पूजा ने एक लम्‍बी कविता बड़े ही जोश के साथ बोली। कभी यही लड़की हमारे विद्यालय में ही पढ़ती थी और आज इतने जोश के साथ कविता पाठ कर रही थी। अटक-अटक कर पढ़ने वाले बच्‍चे कब इतने होशियार हो गए? लेकिन मन को बहुत अच्‍छा लगा। मैंने गाँव वालों को अपने संदेश में यही कहा कि हमें हर घर में पूजा चाहिए।

कुछ ही देर में बिजली चले गयी। नृत्‍य करने को तैयार बच्‍चे मायूस होने लगे। हमने हमारे पति से कहा कि आप गाड़ी को आगे लगाकर उसका टेप रिकार्डर चालू कर दीजिए। काम हो गया और बच्‍चों ने अपना नृत्‍य प्रारम्‍भ कर दिया। लेकिन इस सबमें नृत्‍य करने का स्‍थान बदल गया। एक दस वर्षीय बच्‍ची मेरे पास आ खड़ी हुई। हमारी ही एक सदस्‍य ने मुझे बताया कि यह नन्‍हीं बच्‍ची सिलाई मशीन चला लेती है और बड़ी अच्‍छी सिलाई करती है। एक और लड़की भी पास आ गयी, उसने घाघरा, ब्‍लाउज पहन रखा था और उसने बताया कि उन सबकी उसने ही सिलाई की है। मन को तृप्ति सी होने लगी इस नन्‍हीं बालिकाओं को देखकर।

तीन विभिन्‍न आयु की स्‍त्री-शक्ति मेरे सम्‍मुख थी। एक सरपंच का चुनाव लड़ रही थी लेकिन वो घूंघट में थी, दूसरी अठारह साल की नौजवान लड़की, जो धडल्‍ले से कविता पाठ कर रही थी और तीसरी दस वर्ष की बालिका जो अपनी अदम्‍य इच्‍छा शक्ति के बल पर सिलाई सीख रही थी। आज गमेरा लाल की पत्‍नी सरपंच बनेगी, सारे ही काम गमेरा लाल ही करेगा लेकिन शहर से जब अफसर आएंगे तब पेमली बाई ही उनसे बात करेगी। धीरे-धीरे गमेरा की जगह पेमली ले लेगी। घूंघट चले जाएगा और महिला में हिम्‍मत का संचार होगा। जब पूजा बड़ी हो जाएगी और वह नन्‍हीं सी बच्‍ची कुसुम बड़ी हो जाएगी तब तो गाँव की तस्‍वीर ही बदल जाएगी, महिलाओं का स्‍वरूप ही बदल जाएगा।

गाँव तेजी से करवट बदल रहे हैं। महिलाएं तेजी से सोपान चढ़ रही हैं। आत्‍मविश्‍वास लौट रहा है। अब पढ़ी-लिखी पत्‍नी के सामने पति शराब पीकर आने की हिम्‍मत नहीं करेगा और ना ही उसपर हाथ उठाने की जुर्रत। पत्‍नी के हाथ में भी पैसा होगा। वह भी शहर जाकर मीटींग में भाग लेगी। आज पेमली सरपंच बनेगी तो कल पूजा विधायक और कुसुम शायद मुख्‍यमंत्री, प्रधानमंत्री या शायद राष्‍ट्रपति भी।