Saturday, June 23, 2018

हिन्दुस्थान फिर गुलाम होने लगता है


ईसा से 350 साल पहले एलेक्जेन्डर पूछ रहा था कि हिन्दुस्थान क्या है? यहाँ के लोग क्या हैं? लेकिन नहीं समझ पाया! बाबर से लेकर औरंगजेब तक कोई भी हिन्दुस्थान को समझ नहीं पाए और अंग्रेज भी समझने में नाकामयाब रहे। शायद हम खुद भी नहीं समझ पा रहे हैं कि हमारे अन्दर क्या-क्या है! आप विदेश में चन्द दिन रहकर आइए, आपको वहाँ की मानसिकता समझ आ जाएगी – सीधी सी सोच है,  वे खुद के लिये जीते हैं। प्रकृति जिस धारा में बह रही है, वे भी उसी धारा में बह रहे हैं। खुद को सुखी करने के प्रयास दिन-रात करते हैं। दूसरों को उतना ही अधिकार देते हैं, जितना जरूरी है, जब उनके खुद के अस्तित्व पर बात आती है तो सारे अधिकार उनके खुद के हो जाते हैं। माँ और ममता दोनों ही सीमित दायरे में रहते हैं, बस स्त्री और पुरुष को युगल का महत्व है। इसके विपरीत हिन्दुस्थान में हजारों सालों का चिन्तन, हजार प्रकार से आया है, हमारे अन्दर संस्काररूप में थोड़ा-थोड़ा सभी कुछ है। हम धारा के साथ नहीं धारा के विपरीत बहने का प्रयास करते हैं और इसी को संस्कृति भी कहते हैं। धारा के विपरीत बहने से हर पल संघर्ष करना पड़ता है, अपने मन से, अपने परिवेश से। जब मन में ज्ञान की बाढ़ आ रही हो तब स्वाभाविकता दब जाती है लेकिन जैसे ही बाढ़ थमती है और स्वाभाविक परिस्थिति उत्पन्न होती है, हमारे अन्दर का ज्वालामुखी फट पड़ता है और ज्ञान की बाढ़, विषाक्त लावे में बदल जाती है। इसलिये दुनिया हमें समझ नहीं पाती कि ये ज्ञान का मीठा झरना हैं या विष का ज्वालामुखी!
हम कहते हैं कि हमारी संस्कृति का आधार है, बड़ों का सम्मान और खासकर के महिला व माँ का सम्मान। माँ कभी गलत नहीं होती, यदि आपको लगता भी है कि गलती हुई है तो धैर्य रखिये, यह केवल आपका भ्रम ही सिद्ध होगा। विदेश में कोई दुर्गा नहीं हुई लेकिन हमारे यहाँ दुर्गा का रूप हर युग में उत्पन्न हुआ। जिस संस्कृति में माँ को पूजनीय कहा उसी संस्कृति में हर युग में दुर्गा ने जन्म लिया। यही उलझन हर व्यक्ति को सोचने पर मजबूर कर देती है कि आखिर हिन्दुस्थान है क्या! हमारे यहाँ माँ घर के किसी कोने में पड़ी मिलती है या फिर वृन्दावन की गलियों में, लेकिन जब दुर्गा बन जाती है तब इतिहास के पन्नों में प्रमुखता मिलती है। सारे अत्याचार महिला पर आधारित हैं, सारी गाली महिला  पर आधारित हैं, युद्ध में हारने पर लुटती महिला ही है। पुरुष से गलती होने पर खामोशी छा जाती है और लोग बचाव की मुद्रा में आ जाते हैं लेकिन महिला का कदम भी सहन नहीं होता और चारों ओर से बवाल मचा दिया जाता है। ऐसा लगता है जैसे हमारे अन्दर महिला के प्रति तीव्र आकर्षण विद्यमान है, हम महिला को अपनी दासी के रूप में ही देखना चाहते हैं, जिससे उसके आकर्षण को नकार सकें। विदेशी और हिन्दुस्थानी पुरुष में यही अन्तर है कि विदेशी पुरुष, महिला को मित्र मानता है और हार-जीत से परे रहता है, अनेक प्रयोग भी कर लेता है लेकिन कुण्ठाओं को मन में ठहरने नहीं देता। जबकि हिन्दुस्थानी, महिला को मित्र के स्थान पर दासी की कल्पना करते हैं और माँ के नाम पर पत्नी को मुठ्ठी में रखने की चाह रखते हैं। सारी जिन्दगी उनकी इसी कुण्ठा में निकलती है और जब भी किसी महिला पर प्रश्न खड़े होते हैं, सारे ही एक साथ कूदकर, विष-वमन करते हुए अपनी कुण्ठा को निकालते हैं। भूल जाते हैं कि ये हमारी माँ समान आयु की है, कल तक हमने इसके पैर पूजे थे, हमारी संस्कृति में माँ को पूजनीय कहा है, सब कुछ भूल जाते हैं, बस अपनी कुण्ठा याद रखते हैं और ज्वालामुखी को लावा फूट निकलता है। इसी मानसिकता को दुनिया समझ नहीं पाती है और जो समझ लेते हैं, वे खुलकर हिन्दुस्थान को लूटते हैं। वे समझ जाते हैं कि वार कहाँ करना है, कैसे इन्हें खुद के विरोध में ही खड़ा किया जा सकता है, वे सब समझ जाते हैं और हिन्दुस्थान फिर गुलाम होने लगता है।
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Friday, June 15, 2018

जय कन्फ्यूज्ड देवा


जय कन्फ्यूज्ड देवा

हम भारतीयों की एक आदत है और अमूमन सब की ही है। आप पूछेंगे क्या! अजी बताते हैं। किसी भी  बात में अपना थूथन घुसाना और कैसी भी गैर जिम्मेदाराना अपनी राय देना। राय देते-देते दूसरे पर हावी हो जाना और हाथापाई तक पर उतर जाना। मीडिया पर यह खेल रोज ही खेला जाता है और बरसों से खेला जा रहा है। अब तो यह सब देखकर उबकाई सी आने लगी है। लेकिन यह बे-फालतू सा राय-मशविरा कल एक चैनल पर और दिखायी दे गया। नया सीरियल था, कुछ देखने को नहीं था तो सोचा इस दोराहे पर खड़े व्यक्ति ने जो अनावश्यक बहस और समाधान देने की पहल की है, उसे ही देख लिया जाए। देखकर हैरान हूँ कि लोगों की समझ की खिड़की बहुत झीनी सी ही खुली है, कोई भी जिम्मेदारी से बोलता नहीं दिखायी दिया, बस थोथी सी बातें और थोथे से तर्क। कुछ लोग अपनी  बात कहने के स्थान पर दूसरों की बात ही काटते नजर आए जैसे मिडिया की बहस में होता है। बहुत प्रभाव पड़ रहा है देश के लोगों पर, इन फिजूल सी बहसों का। शान्ति से अपनी  बात कहना और सारे ही दृष्टिकोण पर निगाहे डालना लोग भूल गये हैं। शायद यही कारण है कि देश भी ऐसी ही सोच के साथ आगे बढ़ रहा है। समग्र चिंतन का तो नितान्त अभाव दिखायी देता है।

देश के बारे में भी कोई समग्रता से बात करता दिखायी नहीं देता, बस सभी अपनी ढपली और अपना राग गा-बजा रहा है। कन्फ्यूज्ड सोच के साथ देश आगे चल रहा है। देश को क्लब की तरह चलाने की सोच हावी होती जा रही है, एक बार तू चला और एक बार तू। लोग समझ नहीं रहे हैं कि यह देश है क्लब नहीं। सभी को खुद को भी बनाए रखना है और अपनी जिद भी पूरी करनी है। देश में परिस्थितां क्या है, यह सत्य समझने को कोई तैयार नहीं है। हर व्यक्ति जितना मूर्ख है उतना ही मुखर है और प्रबुद्ध लोगों को भी हड़काने में देर नहीं करता। जिस प्रकार की सलाह देश के  बारे में दी जाती है, शायद किसी भी घर में कोई छोटा सा बच्चा भी ऐसी सलाह नहीं देता होगा, लेकिन यहाँ के ये मुखर लोग हर पल सलाह देते हैं। कोई कह रहा है कि सेकुलरवाद ही देश की जरूरत है तो कोई कह रहा है कि हिन्दुत्व ही विकल्प है! किसी को धारा 370 नहीं चाहिये और किसी को राम-मन्दिर चाहिये। किसी को नोट, बैंक की जगह जेब में चाहिये और 15 लाख रूपया भी। कांग्रेस के स्लीपर-सेल से सबको नफरत है लेकिन खुद के लिये ऐसी ही भूमिका चाहते भी हैं। कभी परिवार की तरफ हो जाते हैं तो कभी केरियरवाद की ओर। कभी विवाह संस्था को मानने लगते हैं तो कभी लिविंग टूगेदर को। कभी शिक्षा जरूरी तो कभी केवल ज्ञान की वकालात। लाखों मुद्दे और लाखों ही तर्क। लेकिन समग्र चिंतन की आवश्यकता किसी को भी नहीं। इतिहास के आधे-अधूरे से भाग को खोद-खोदकर वर्तमान बनाने की जिद है, कबूतर को बिल्ली ताक रही है और कबूतर आँख बन्द कर खुश है कि जब मैं बिल्ली को नहीं देख रहा तो बिल्ली भी मुझे नहीं देख पाएगी। मुझे लगता है कि जब हमारे पास पौराणिक कथाएं थी तब हमारा दृष्टिकोण स्पष्ट था, हम राम को नायक ही कहते थे और रावण को खलनायक। लेकिन अब तो हर आदमी को उलझाने की प्रक्रिया प्रारम्भ है, राम और रावण में मूल अंतर क्या है, बेचारा आदमी शिक्षा के इस माहौल में समझ ही नहीं पा रहा है। अब अच्छा और बुरा दोनों ही गड़मड़ हो गये हैं। नयी पीढ़ी की सोच भी गड़मड़ हो गयी है इसलिये ऐसी बहसों के समय उसे समझ ही नहीं आता कि मुझे बोलना क्या है! लेकिन फिर भी अंत में वह अच्छाई के साथ खड़ा हो जाता है लेकिन यदि ऐसा ही चलता रहा तो अंत में लोग बुराई के साथ खड़े हो जांएगे। वैसे इसकी शुरुआत हो चुकी है क्योंकि अच्छाई और बुराई दोनों का गड़मड़ कर दिया गया है। लोग गर्म गुलाब-जामुन के साथ ठण्डी आइसक्रीम खा रहे हैं, कॉकटेल पसन्द कर रहे हैं, हिंगलिश हावी होती जा रही है। अमेरिका में बसे देसियों को एबीसीडी कहा जाता है तो अब भारतीय को भी कन्फ्यूज्ड भारतीय कहा जाएगा। ऐसे ही कन्फ्यूजन में हम पहले भी गुलाम बन गये थे और शायद दोबारा भी इसी ओर जाने की तैयारी चल रही है। लोग कह रहे हैं कि हम रजाई ओढ़कर सोते हैं, जब गुलामी की सूचना आ जाए तो बता देना। हम तो हर हाल में तैयार हैं बस अपने लोगों का शासन कुछ अखरता है, तो इनके स्थान पर गुलामी ही अच्छी है। अपने व्यक्ति को रसगुल्ला खाते देखा जाता नहीं, दूसरे के जूते हम खुशी-खुशी खाने को तैयार हैं। जय कन्फ्यूज्ड देवा!
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Tuesday, June 5, 2018

दस का दम


कल दस का दम सीरियल देखा, सलमान खान इसे होस्ट कर रहे हैं। बड़ी निराशा हुई सीरियल देखकर, सलमान की ऊर्जा जैसे छूमंतर हो गयी हो! नकली हँसी, दबी सी आवाज, दण्ड के नीचे दबे से लगे सलमान! लेकिन सलमान के परे इस सीरियल पर मेरी दृष्टि में बात करना बनता है। सीरियल में पूछे गए प्रश्न, अनुमान पर आधारित हैं और यह अनुमान है भारतीय जनता की मानसिकता का। छोटे-छोटे प्रश्न हैं, जो हमारी आम जिन्दगी से ताल्लुक रखते हैं लेकिन क्या हम इनका अनुमान लगा पाते हैं? हम भारत को समझने का दम भरते हैं लेकिन इन प्रश्नों के आगे लड़खड़ा जाते हैं और जब सवाल के बाद जवाब आता है तो आश्चर्यचकित होना पड़ता है। तब लगता है कि हम भारत को कितना समझ पाए हैं! प्रश्न की बानगी देखिये – कितने प्रतिशत भारतीय जेवर गिरवी रखते हैं? भारत जैसे देश में जहाँ हर कहानी में साहूकार है और जेवर गिरवी रखता आम नागरिक है, तब यही सोच हावी होने लगती है कि यह प्रतिशत 70 से अधिक होगा। लेकिन उत्तर जब आया तब लगा कि यह प्रतिशत तो 21 ही है। साहूकार और कामदार की कहानी जो रोज दोहरायी जा रही है, उस पर प्रश्न चिह्न लगना स्वाभाविक है।
हम मानते हैं कि भारतीय पुरातनपंथी हैं और अक्सर यह कहते सुना जाता है कि एक लड़का और एक लड़की दोस्त नहीं हो सकते। हमें लग रहा था कि उत्तर अधिक प्रतिशत लेकर आएगा लेकिन उत्तर था – 25 प्रतिशत। ऐसे ही एक अन्य प्रश्न था – कितने लोगों को हिन्दी वर्णमाला पूरी याद है? सोचा था कि यह प्रतिशत भी कम होगी लेकिन 60 प्रतिशत उत्तर था। उत्तर एक सर्वे के आधार पर थे और हो सकता है यह सर्वे भी चुनाव जैसे ही हों! लेकिन मानसिकता की ओर संकेत तो करते ही हैं। सारे ही प्रश्नों को देखकर लग रहा था कि हमारा अनुमान लगभग गलत है और यह अनुमान जो हमारे दिल-दीमाग पर छाया हुआ है, उसका आधार फिल्में या साहित्य है। अब हिन्दी भाषा की ही बात कर लें, देश में वातावरण ऐसा बनाया  हुआ है कि हिन्दी भाषा की कोई कद्र ही नहीं है लेकिन यहाँ सर्वे कह रहा है कि 60 प्रतिशत लोगों को वर्णमाला याद है! एक प्रश्न था कि कितने प्रतिशत भारतीयों के घर में रोज मांसाहर  पकता है? अब उत्तर था 12 प्रतिशत। माहौल यह बनाया जा रहा है कि सारा देश मांसाहारी हो गया है और प्रोटीन की कमी तो केवल मांसाहार ही पूरी करता है इसलिये रोज मांसाहार करो और घर में भी पकाओ। सवाल देने वाली महिला मुस्लिम थी और कह रही थी कि हमारे घर की लड़कियाँ मांसाहार नहीं करती, उसके मन में भी जिज्ञासा थी की भारत में कौन रोज खाता होगा! लेकिन फिल्में देखें, विज्ञापन देखें, लगता है कि भारतीयों का मुख्य भोजन मांसाहार ही है।
सीरियल कैसा बना है, मेरी चर्चा का विषय यह नहीं है, मैं तो इस बात पर चर्चा करना चाह रही हूँ कि वह कौन सा भारत  है जिसे फिल्मों में और साहित्य में हमारे सामने परोसा जाता है? प्रश्नों के उत्तर से तो लग रहा था कि जिस भारत को हमपर थोपा जा रहा है, हमारा भारत उससे अलग है! यही कारण है कि चुनावों में नतीजे हमारी सोच से अलग आते हैं। कोई भी राजनैतिक और सामाजिक संगठन भारत की मानसिकता को समझ ही नहीं पा रहे हैं बस फिल्म और साहित्य पढ़कर अनुमान लगाते हैं और वैसे ही व्यवहार करते हैं। जबकि सच इससे परे हैं। मैं साहित्यकारों से हर बार कहती हूँ कि पढ़ने से अधिक समाज के बीच जाकर साहित्य लिखो, जबकि वे चीख-चीखकर यही दोहरा रहे हैं कि जितना  पढ़ोंगे उतना ही अच्छा लिखोंगे लेकिन मेरा मन इस बात को मानता नहीं और मैं उनसे विपरीत मत के कारण अस्पर्श्य घोषित हो जाती हूं। साहित्य पढ़ने का केवल एक फायदा है कि हम विधा की जानकारी पा लेते हैं बस। इसलिये साहित्य और फिल्मों से परे भारत को समझो, उसकी आत्मा में झांककर देखो, एक नया भारत दिखायी देगा। घिसीपिटी बाते के बहकावे में मत आओ और भारत के बारे में अपनी राय मत बनाओ, बस खुले दिल से भारत को जानो। अपने पूर्वाग्रह से मुक्त होकर जीना सीखो, नया जीवन मिलेगा। दस का दम सीरियल में कितना दम है यह तो पता आगे चलकर लगेगा लेकिन भारत की कहानी में बहुत दम है, यह सिद्ध हो रहा है।

Monday, June 4, 2018

जैसा देव वैसा पुजारी


कहावत है – जैसा देव वैसा पुजारी। काली माता का विभत्स रूप, तो पुजारी भी शराब का चढ़ावा चढ़ाते हैं, बकरा काटते हैं। डाकू गिरोह में डाकू ही शामिल होते हैं और साधु-संन्यासियों के झुण्ड में साधु-संन्यासी। डाकुओं का सरगना मन्दिर में जाकर भजन नहीं गाता और साधु कभी डाका नहीं डालता। जिस दिन डाकू सरदार ने भजन गाना शुरू कर दिया समझो उसके साथी डाकू उसका साथ छोड़ देंगे। जितने डाके उतना ही सम्मान। कुछ लोगों ने बड़ा शोर मचा रखा है कि नेताजी ने सरकारी सम्पत्ति पर कब्जा किया और जब न्यायालय ने खाली करने को कहा तो बंगले को ही लूटकर-तोड़कर चलते बने। नेताजी ने गलत किया यह तुम कह रहे हो, लेकिन उनके पुजारियों से पूछो कि उनके देव ने सही किया या गलत! नेताजी ने वही किया जिस सिद्धान्त पर उनने अपने दल की नींव रखी थी। देव को हर  पल सतर्क रहना पड़ता है, कहीं उसके पुजारी उसे गलत ना समझ लें! बंगले में लूट-खसोट कर सामान ले लिया मतलब हम अपनी ताकत बनाए हुए हैं, हमारे पुजारियों निश्चिंत रहो, तुम्हारा देव जैसा था वैसा ही है, वह तुम्हें निराश नहीं होने देगा! पुजारी खुश हैं कि हमारे देव वैसे ही हैं और सत्ता में आने पर हमें ऐसे ही लूट का मौका देंगे। भेड़िये के अभी दांत शेष हैं।
एक और हल्ला आये दिन मचता है, वो मरा तो तुमने शोर मचाया लेकिन यह मरा तो तुम खामोश रहे। जिसका मरेगा वही तो शोर मचाएगा, तुम्हारा मरा तो तुम शोर मचाओ। उन्हें शोर मचाना आता है तो तुम भी सीखो नहीं तो पीछे रह जाओगे। किसके जनाजे में कितने लोग गिनने से काम नहीं चलेगा, अपना दायरा बढ़ाओ फिर तुम्हारे जनाजे में भी भीड़ उमड़ेगी। वे अपने लोगों को महान बना देते हैं तो तुम भी महान बनाना सीखो, फिर देखो खेल। चमत्कारी भगवान के मन्दिर के बारे में तो सुना ही होगा, छोटा सा मन्दिर लेकिन चमत्कार के कारण भक्तों की लम्बी लाइन और दूसरी तरफ बड़ा विशाल मन्दिर और भक्त मुठ्ठी भर। इसलिये अपने देव को भी और अपने पुजारी को भी महान बनाना पड़ता है जब जाकर शोर मचता है। अपने व्यक्ति की रक्षा भी करनी पड़ती है और सुरक्षा के लिये कभी कभार आक्रमण भी करना पड़ता है। तब जाकर देव के पुजारी जुटते हैं। देव अगर कुछ उपहार ना दे, मन्नत पूरी ना करे तो उस देव को कौन पुजारी पूजेगा! देव वही जो अपने पुजारियों की चाहत पर खऱा उतरे। हम बंगला लूटने की ताकत रखते हैं, किसी को फांसी पर लटकाने का दम रखते हैं तो हमारे पुजारी हमें छोड़कर कहीं नहीं जाते। इसलिये जैसा देव वैसा ही पुजारी होता है। खाली-पीली शोर मत मचाओ, दम है तो कुछ करके दिखाओ। तुमने संन्यासियों का दल बनाया है तो तुम्हारे पुजारी बात-बात में सच का रास्ता दिखाते हैं, तुम लाख अच्छा करो लेकिन पुजारी तो केवल वही चाहता है, बस उसी की बात मानो। हम तो कायल हो गये इन लुटेरों के, जो हर पल अपने पुजारियों का ध्यान रखते हैं, उन्हें निराश नहीं करते। इनके देव बड़े महलों में रहते हैं और इनके पुजारी झोपड़े में, फिर भी पुजारी खुश हैं कि देखो हमारे देव कितने बड़े मन्दिर में रहते हैं। भगवान का मन्दिर विशाल होना चाहिये, पुजारी इसमें ही खुश रहता है, आधुनिक देव यह मनोविज्ञान जानते हैं, तभी तो बंगले की लूटपाट करते हैं और वाहवाही पाते हैं। धन्य हो गए इनके पुजारी, ऐसे देवों को पाकर। जब वे धन्य हो गये तो तुम क्यों हलकान हुए जाते हो!

Wednesday, May 2, 2018

शेर की किरकिरी


शेर और शेर के बच्चों से परेशान होकर मैंने सच्चे शेर की तलाश में नेशनल ज्योग्राफी चैनल पर दस्तक दे दी। खोलते ही जो दृश्य था वह बता दूं – एक संकरा सा रास्ता था, सड़क बनी थी, कार खड़ी थी और वहाँ काँपते पैरों से एक भैंस का बच्चा घूम रहा था। एंकर बोल रहा था कि इस बच्चे को देखकर लग रहा है कि यह डरा हुआ है, लेकिन डर किसका है यह समझ नहीं आ रहा है! तभी कार के पीछे से शेर निकला, अब दोनों आमने-सामने थे। शेर ने पोजीशन ली और घात लगाने के लिये तैयार हो गया। लग रहा था कि आसान शिकार हाथ लगा है लेकिन तभी एक बड़ी सी भैंस दौड़ती हुई आयी और उसने शेर पर आक्रमण कर दिया। शेर कुछ समझ ही नहीं पाया, बस दुम दबाकर भाग गया। सबसे बड़े शिकारी का हाल देखकर हँसी आ गयी, लोग तो इसकी कसमें खाते हैं और यह है कि भैस के सामने ही दुम दबाकर भाग गया। रूकिये अभी, मुझे बहुत कुछ देखना बाकी था और आपको बताना अभी शेष है। इसके तत्काल बाद दूसरा दृश्य दिखाया गया, एक सेई ( सेई जानते हैं ना. तीखे कांटों वाली) लगभग 8-10 शेरों से घिरी थी। लेकिन सेई के सारे बाल शूल की तरह खड़े थे, शेरों की हिम्मत नहीं हो रही थी उसे चबाने की। कई मिनट तक पहलवानों की तरह अखाड़े में घुमाई हुई लेकिन हारकर शेर चले गये। यह क्या छोटी सी – पिद्दी सी सेई से भी हार गए! एक शेर हारता तो समझ भी आता लेकिन यहाँ तो झुण्ड था, लेकिन फिर सबसे बड़ा शिकारी हार गया था। एंकर को अभी और दिखाना था – तीसरा दृश्य – एक जिराफ जो गर्भवती है, अपने बच्चे के साथ घूम रही है उसके बच्चे पर शेर ने आक्रमण कर दिया। बस फिर क्या था, जिराफ के पास ना तो लम्बे दांत और ना ही लम्बे नाखून लेकिन अपनी लम्बी टांगों से ही शेर को दबोच लिया। अब शेर नीचे था और जिराफ उसे पैरों से दबाकर वार कर रही थी।
पहले भी कई बार शेरों को चित्त होते देखा है लेकिन इसबार तो चित्त होने की ही घटनाएं थी, मैं शेर बने कुनबे की अठखेलियों से बाहर निकलना चाह रही थी और टीवी का दामन थामा था लेकिन यहाँ तो शेर की किरकिरी हुई पड़ी थी। सारे ही मुहावरे झूठे हो गये थे, बहुत सुना है – शेर अकेले ही शिकार करता है, झुण्ड में तो गीदड़ करते हैं, लेकिन यहाँ तो छोटी सी सेई के सामने शेरों का झुण्ड था और खिसियाकर जाते हुए दिख रहे थे। भैंस माँ के सामने शेर को भागते देखा और जिराफ ने तो दम ही निकाल दिया। इसलिये शेर की कसमें मत खाओ, कसमें खानी है तो माँ की खाओ। कहो कि हम भारत माता की संतान हैं और जब तक हमारी माँ का आँचल सलामत है, कोई हमारी तरफ आँख नहीं उठा सकता। शेर दा पुत्तर बनने से ज्यादा अच्छा है माँ का पुत्तर बनना।
वैसे भी मुझे समझ नहीं आता की लोग खुद को शेर क्यों बताते हैं? शेर तो सबसे हिंसक जानवर होता है, सबसे बड़ा शिकारी। क्यों लोग अपनी तुलना शिकारी के साथ करते हैं? अब आक्रान्ताओं का जमाना तो रहा नहीं कि कहें की हम सबसे बड़े शूरवीर हैं और तुम्हें गाजर-मूली की तरह काट खाएंगे। शेर की उपमा तो विनाश की ओर धकेलती है, संदेश देती है कि हम शिकारी हैं और तुम हमारा शिकार हो। शेर तो और कुछ करता नहीं, बस शिकार करता है। वैसे अभी तक ये लोग जनता का शिकार ही कर रहे थे, इसलिये अपने लोगों को याद दिलाया गया है कि तुम शेर के बच्चे हो, टूट पड़ो जनता पर। तुम्हारा काम शिकार करना है और तुम्हीं एकमात्र इस जंगल के राजा हो। यह लोकतंत्र क्या होता है? शेर किसी लोकतंत्र को नहीं मानता। ललकार मिली है लोगों को, सोते से उठकर जागो और अपना स्वरूप पहचानो, तुम कल भी शिकारी थे और आज भी शिकारी हो। याद करो हमने ही 84 में एक कौम को सबक सिखाया था, हमने ही देश का बंटवारा करवाया था और जब ये छोटे-मोटे प्राणी सर उठाने लगे थे तब हमने ही आपातकाल लगाकर इनको सींखचों के अन्दर डाल दिया था। शेरों जाग जाओ, शिकार का समय हो गया है, बस टूट पड़ो। लेकिन कठिनाई यह हो गयी है कि अब भारत माता तनकर खड़ी हो गयी है और उसने अपने पुत्तरों की रक्षा का वचन दिया है, वह माँ बनकर शेरों के सामने खड़ी हो गयी है। कहीं ऐसा ना हो कि जैसे भैंस के सामने शेर भागा था और जैसे जिराफ ने शेर को पैरों तले रौंद डाला था, वैसा ही हाल इन शेरों का ना हो जाए! खैर भगवान रक्षा करे।   
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Sunday, April 22, 2018

लुंज-पुंज से लेकर छूट और लूट की दुकान


लुंज-पुंज से लेकर छूट और लूट की दुकान
आज एक पुरानी कथा सुनाती हूँ, शायद पहले भी कभी सुनायी होगी। राजा वेन को उन्हीं के सभासदों ने मार डाला, अराजकता फैली तो वेन के पुत्र – पृथु ने भागकर अपनी जान बचाई। पृथु ने पहली बार धरती पर हल का प्रयोग कर खेती प्रारम्भ की, कहते हैं कि पृथु के नाम पर ही पृथ्वी नाम पड़ा। लेकिन कहानी का सार यह है कि राजा वेन का राज्य अब राजा विहीन हो गया था, प्रजा को समझ नहीं आ रहा था कि राज कैसे चलाएं। आखिर सभी ने पृथु को खोजने का विचार किया। पृथु के मिलने पर उसे राजा बनाया और कहा कि बिना राजा के प्रजा भीड़ होती है, इसलिये राजा का होना जरूरी है। लेकिन आज प्रश्न उठ रहा है कि राजा कैसा? अनुशासन प्रिय या फिर लुंज-पुंज? परिवार में जब माता या पिता कठोरता और अनुशासन के साथ परिवार का निर्माण करते हैं तो निर्माण की अवधि में कोई खुश नहीं रहता, लेकिन बाद में सब कहते नहीं अघाते कि हमारा अनुशासन के कारण निर्माण हुआ है। युवाओं को उच्छृंखलता रास आती है, लेकिन माता-पिता अनुशासन में रखकर उनका निर्माण करते हैं, ऐसे ही जनता की स्थिति होती है। जनता नैतिक-अनैतिक सारे ही काम करना चाहती है लेकिन देश-हित और जनता का हित किस में है यह अनुशासन प्रिय नेता तय करते हैं। जब भी किसी को लाभ प्राप्त नहीं होता है तो नाराजी प्रकट करता है और लोकतंत्र की दुहाई देता है। उसे लोकतंत्र का अर्थ लुंज-पुंज व्यवस्था में दिखायी देता है, जहाँ अनुशासनहीन समाज का निर्माण हो और भीड़तंत्र के द्वारा शासन में भागीदारी हो। परिवार से लेकर देश के लोकतंत्र में केवल उसी शासक की चाहना होती है जो लुंज-पुंज  हो, जो व्यक्ति को सारी छूट दे सके।
जितनी छूट और जितनी लूट इस देश में है, उतनी शायद ही किसी देश में हो, जनता की आदत छूट और लूट का उपभोग करने की पड़ी है, जरा सा अनुशासन आते ही लोकतंत्र की दुहाई दी जाने लगती है। एक पुराना वित्त-मंत्री लोकतंत्र की दुहाई दे रहा है क्योंकि उसे लूट और छूट का फायदा नहीं मिल रहा है। वे समझ बैठे हैं कि एक अनुशासन में देश को रखने की पहल करना लोकतंत्र नहीं हो सकता। इसलिये अब वे अनुशासन से परे लुंज-पुंज व्यवस्था के समर्थन में खड़े हो गये हैं, दूसरी तरफ सारे ही वे लोग भी जो शासन को ले-देकर चलाना चाहते हैं वे भी साथ में जुटने लगे हैं। देश ने लुंज-पुंज शासन बहुत देखा है, जो आजतक ले-देकर चल रहा था। जिसने भी भीड़तंत्र का शोर मचाया, उसको टुकड़ा डाल दिया गया। देश रसातल में पहुंच गया लेकिन भीड़तंत्र आकाश छूने लगा। जनता को समझ आने लगा था कि बिना अनुशासन के राज नहीं हो सकता इसलिये वे पृथु की तरह अपने राजा को खोजने निकल पड़े और मोदी को खोजकर सिंहासन पर बैठा दिया। लेकिन अब सत्ते-पे-सत्ता फिल्म जैसे हालात हो गये हैं। घर में आयी भाभी घर को घर बनाना चाहती है और उच्छृंखलता में जीवन व्यतीत कर रहे सारे भाई अनुशासन में बंधना नहीं चाहते। देश भी आज इसी उधेड़-बुन में लगा है। चारों ओर लोकतंत्र की दुहाई दी जा रही है, बेईमान व्यापारी कह रहा है कि मुझे बेईमानी की छूट मिले, खुद को मर्द समझने वाले लोग कह रहे हैं कि हमें बलात्कार और तलाक की सुविधा मिले, राजनेता कह रहे हैं कि परिवार सहित सारे ही पद हमें मिलें, न्यायाधीश तक कहने लगे हैं कि बड़े मुनाफा वाले केस हमें मिलें, वकील कह रहे हैं कि हम जैसा चाहे फैसला वैसा हो, समाज का हर वर्ग कह रहा है कि हमें भी आरक्षण मिले। एक-एक व्यक्ति इस छूट और लूट का भागीदार होना चाहता है और कह रहा है कि लोकतंत्र खतरे में आ गया है। व्यक्ति को सारी ही छूट खुलेआम मिलने को ही वे लोकतंत्र कह रहे हैं। वे यह भूल रहे हैं कि लोकतंत्र में भी तंत्र जुड़ा है, कोई ना कोई अनुशासन तो रखना ही होगा नहीं तो यह देश लूट का देश बन जाएगा। अब तय जनता को ही करना है कि उसे अनुशासन में रहकर खुद का और देश का निर्माण करना है या फिर लुंज-पुंज व्यवस्था के तहत छूट और लूट की दुकान सजाए रखनी है। हम इस दुनिया में केवल अकेले देश नहीं है जो कैसा भी विकल्प चुन लेंगे, आज सैकड़ों देश हमारी ताक में बैठे हैं कि कब यहाँ पुरानी लुंज-पुंज व्यवस्था लागू हो और हम देश को ही हड़प लें। वैसे भी जब बेईमान लोग धमकाने लगें तो समझ लो कि देश कहाँ खड़ा है! चुनाव आपका है – लुंज-पुंज से लेकर छूट और लूट की दुकान या फिर अनुशासन से निकली सम्मान की दुकान।

Friday, April 20, 2018

जी-हुजूरियें आखिरी दाँव ढूंढ रहे हैं


बात 90 के दशक की है, हमारे कॉलेज में जब परीक्षाएं होती थी तब परीक्षा केन्द्रों पर सारे ही अध्यापकों की ड्यूटी लगती थी, लेकिन मेरी कभी नहीं। मैं सोचती थी शायद महिला होने के कारण मुक्ति मिल जाती होगी लेकिन फिर बाद में महिला होने के कारण ही लगने लगी, क्योंकि परीक्षा तो बालिकाएं भी दे रही होती थी। तब में देखती कि कुछ लोगों की नियमित ड्यूटी लगती है लेकिन कुछ लोगों की नहीं। मुझे प्रशासन से प्रश्न पूछने का फितूर है, उसका परिणाम भुक्ता भी बहुत है, तो तब भी पूछ लिया कि कुछ लोगों की ड्यूटी लगे और कुछ की नहीं? यहाँ यह भी देखने की बात थी कि उस समय ड्यूटी देने पर 10 रू. मिलते थे और इन्हीं 10 रूपयों के कारण लोगों का चयन होता था। मेरे प्रश्न पर एक ने कहा कि जो लोग हमारे नहीं, हम उन्हें किसी भी प्रकार का लाभ नहीं देते। जब प्रशासन का फार्मूला पता लगा तो सभी जगह यह दिखायी दिया। केवल मुठ्ठी भर लोग ही फायदों की जगह दिखायी देते बाकि सारे ही सामान्य प्रजा की तरह रहते। देश की राजनीति की चाल भी यही थी, जो सरकार के जी-हुजूरिये उन्हें ही सरकारी लाभ मिले शेष तो केवल प्रजा। देश की आजादी के बाद से यही सिलसिला चला और एक ही घराने का राजकाज होने के कारण लोकतंत्र की जगह राजतंत्र ही दिखायी देने लगा। हर क्षेत्र में एक वर्ग खड़ा हो गया, जो सारे लाभों का हकदार था। योजनाएं इतनी बनी और पुरस्कार व सम्मानों की बाढ़ आ गयी, अपने जी-हुजूरियों के लिये ही ये सारी थीं। 50 साल में जी-हुजूरियें पक्के हो गये, सभी को आदत हो गयी कि ये ही है समाज के सितारे। फिर धीर-धीरे शासन बदलने लगा और राजतंत्र से निकलकर लोकतंत्र की ओर बढ़ने लगा तब जाकर कहीं इन जी-हुजूरियों की जगह आम जनता को भी लाभ मिलने लगा। लेकिन जैसे ही मेरे जैसा एक आम व्यक्ति उस पंक्ति में खड़ा हुआ, चारों तरफ से शोर मच गया। जी-हुजूरियों को तो तनिक भी नहीं भाया लेकिन आम जनता भी उन जी-हुजूरियों को ही बुद्धीजीवी मान बैठी थी तो उनने भी प्रश्न खड़े कर दिये। अब प्रश्न भी बुद्धिमत्ता पर नहीं लेकिन बस शुरू कर दी छिछालेदारी। 
2014 में आया मोदी-राज, अब तो पूर्ण लोकतंत्र लागू हो गया। कोई जी-हुजूरियें नहीं, बस योग्यता ही पैमाना। जहाँ सरकार की योजनाओं और पुरस्कार-सम्मान पर केवल इन जी-हुजूरियों का ही कब्जा था, नहीं रहा और लोकतंत्र स्थापित होने लगा। चारों तरफ से शोर मचने लगा कि हम कहाँ, हम कहाँ? जिन मंचों पर केवल वे थे अब समाज का प्रबुद्ध वर्ग दिखायी देने लगा, जिन योजनाओं पर आम गरीब व्यक्ति का हक था, अब योजना का लाभ उसे मिलने लगा तो शोर मचना लाजिमी था। लाखों गैस कनेक्शन फर्जी, लाखों राशन कार्ड फर्जी और न जाने क्या-क्या फर्जी। न जाने कितने व्यापारी कमीशन दलाल के रूप में काम कर रहे थे, अब उनका कमीशन बन्द। शोर यह  भी मचा कि शासन में नया क्या है, सब तो हमारे जमाने का है। सच भी है, नया विशेष नहीं, बस योजनाएं लागू करने में नवीनता होने लगी। अब एक वर्ग का स्थान आम व्यक्ति ने ले लिया था तो यह विशेष वर्ग हरकत में  आ गया। पत्रकार से लेकर साहित्यकार, वकील से लेकर न्यायाधीश, व्यापारी से लेकर दलाल, सारे ही शोर मचाने लगे। उन्हें ऐसा लग रहा है कि उनकी आँखों के सामने ही उनका खजाना आम जनता में बंट रहा हो! जिसपर केवल उनका हक था, वह हक सबका हो गया, यह तो घोर अनर्थ हो गया। वे लोग पैसे से भी गये और विशेष वर्ग की पहचान से भी। अब रोज भी नये उपद्रवों की खोज की जाने लगी, कभी थाणे में राजनीति तो कभी न्यायालय में राजनीति! संसद में केवल शोर-शराबा! क्योंकि ना तो प्रश्न थे और ना ही बहस के लिये विचार थे। कैसे कहें कि यह सब हमारा था, उसे कैसे निर्ममता से जनता में बांट रहे हो, तो संसद में केवल शोर रह गया। न्यायालय में केस दर्ज होने लगे, सोचा था कि अपने ही जज  हैं तो न्याय के माध्यम से ही राजनीति कर लेंगे लेकिन जज महोदय ने तो साफ आईना दिखा दिया कि यह न्याय का मन्दिर है, यहाँ राजनीति नहीं चलेगी।
जी-हुजूरियें आखिरी दाँव ढूंढ रहे हैं, कैसे भी शासन वापस अपने ही हाथ में आ जाए और फिर चाहे 10 रू वाली परीक्षा में ड्यूटी हो या फिर विदेश-यात्राओं से लेकर पुरस्कार-सम्मान की बंदर-बांट। जिन जी-हुजूरियों को खास बनाया गया था, बस वे ही देश के फलक पर दिखने चाहिये, बाकि तो सब मच्छर है। 2019 तक देश में यही दृश्य रहने वाला है, सारे ही प्रलाप को तैयार हैं। एक प्रलाप में दम नहीं तो दूसरे दिन ही दूसरा प्रलाप तैयार मिलेगा। हम प्रलाप करने में माहिर हैं, इतना तो कर ही देंगे कि लोग कहने लगें कि बाबा मैं तो भूखा ही रह लूंगा, ले देश की रोटी तू ही खा ले। जैसे गाँधीजी के सामने रोटी फेंकी गयी थी कि तू रोटी खा, उपवास मत कर, हम ही मर जाएंगे। सावधान रहना होगा, क्योंकि ये आम जनता को भी टुकड़ा डालेंगे कि तुम हमारे साथ आ जाओ, हम तुम्हें भी खास की लाइन में खड़ा कर देंगे। बड़ा होना कौन नहीं चाहता! दूसरों के सामने सम्मान कौन नहीं चाहता! बस इसी का फायदा उठाया जाएगा और लोगों का अपने पक्ष में किया जाएगा। बचना बाबा इन जी-हुजूरियों से।