Saturday, April 8, 2017

तू इसमें रहेगा और यह तुझ में रहेगा

प्रेम में डूबे जोड़े हम सब की नजरों से गुजरे हैं, एक दूजे में खोये, किसी भी आहट से अनजान और किसी की दखल से बेहद दुखी। मुझे लगने लगा है कि मैं भी ऐसी ही प्रेमिका बन रही हूँ, चौंकिये मत मेरा प्रेमी दूसरा कोई नहीं है, बस मेरा अपना मन ही है। मन मेरा प्रेमी और मैं उसकी प्रेमिका। हम रात-दिन एक दूजे में खोये हैं, आपस में ही बतियाते रहते हैं, किसी अन्य के आने की आहट भी हमें नहीं होती और यदि कोई हमारे बीच आ भी गया तो हमें लगता है कि अनावश्यक दखल दे रहा है। मन मुझे जीवन का मार्ग दिखाता है और मैं प्रेमिका का तरह सांसारिक ऊंच-नीच बता देती हूँ, मन कहता है कि आओ कहीं दूर चलें लेकिन मैं फिर कह देती हूँ कि यह दुनिया कैसे छोड़ दूं? मन मुझे ले चलता है प्रकृति के निकट और मैं प्रकृति में आत्मसात होने के स्थान पर गृहस्थी की सीढ़ी चढ़ने लगती हूँ। हमारा द्वन्द्व मान-मनोव्वल तक पहुंच जाता है और अक्सर मन ही जीत जाता है। मैं बेबस सी मन को समर्पित हो जाती हूँ। मन मेरा मार्गदर्शक बनता जा रहा है और मैं उसकी अनुयायी भर रह गयी हूँ।
यह उम्र ही ऐसी है, उसमें मन साथ छोड़ता ही नहीं, जब जागतिक संसार के लोग साथ छोड़ रहे होते हैं तब यह मन प्रेमी बनकर दृढ़ता से हमें आलिंगनबद्ध कर लेता है। मैं कहती हूँ हटो, मुझे ढेरों काम है लेकिन मन कहता है कि नहीं, बस मेरे पास बैठो, मुझसे बातें करो। मैं कहती हूँ कि आज बेटे से बात नहीं हुई, मन कहता है – मैं हूँ ना। मैं तुम्हें उसके बचपन में ले चलता हूँ, फिर हम दोनों मिलकर उसके साथ ढेरों बात करेंगे। मन कहता है कि आज बेटी क्या कर रही होगी, सभी मन बोल उठता है कि चलो मेरे साथ रसोई में, उसकी पसन्द के साथ बात करेंगे। मैं और मेरा मन अक्सर बाते करते रहते हैं – ऐसा होता तो कैसा होता, नहीं हम ऐसी बात नहीं करते। हम सपने देखते हैं खुशियों के, हम सपने देखते हैं खुशहाली के, हम सपने देखते हैं खुशमिजाजी के।
इन सपनों के कारण दुनिया के गम पीछे छूट जाते हैं, कटुता के लिये समय ही नहीं बचता और झूठ-फरेब गढ़ने का काम अपना नहीं लगता। बस हर पल हम दोनों का साथ, हर पल को जीवंत करता रहता है। किसी अकेले को देखती हूँ तो मन कहता है कि यह कहाँ अकेला है, अपने मन को क्यों नहीं पुकार लेता? मन को पुकार कर देख, कैसे तेरा अपना होकर रहता है, फिर तुझे किसी दूसरे की चाह होगी ही नहीं। तू अकेला नहीं निकलेगा कभी किसी का साथ ढूंढने, तेरा मन हर पल तेरे साथ होगा, बस आवाज दे उसे, थपथपा दे उसे, वह दौड़कर तेरे पास आ जाएगा। तुझसे बाते करेगा, तेरा साथी बनकर रहेगा। परछाई भी रात को साथ छोड़ देती है लेकिन यह गहरी अंधेरी रात में तेरे और निकट होगा, तू इसमें रहेगा और यह तुझ में रहेगा।

Tuesday, April 4, 2017

काश पैसा भी बासी होने लगे

हमारी एक भाभी हैं, जब हम कॉलेज से आते थे तब वे हमारा इंतजार करती थीं और फिर हम साथ ही भोजन करते थे। उनकी एक खासियत है, बहुत मनुहार के साथ भोजन कराती हैं। हमारा भोजन पूरा हो जाता लेकिन उनकी मनुहार चलती रहती – अजी एक रोटी और, हम कहते नहीं, फिर वे कहतीं – अच्छा आधी ही ले लो। हमारा फिर ना होता। फिर वे कहतीं कि अच्छा एक कौर ही ले लो। आखिर हम थाली उठाकर चल देते जब जाकर उनकी मनुहार समाप्त होती। कुछ दिनों बाद हमें पता लगा कि इनके कटोरदान में रोटी है ही नहीं और ये मनुहार करने में फिर भी पीछे नहीं है, जब हम हँसकर कहते कि अच्छा दो। तब वे हँस देती।
दूसरा किस्सा यह भी है कि एक अन्य भाभी कहती कि रोटी ले लो, हम कहते नहीं। फिर वे कहती कि देखो ले लो, नहीं तो सुबह कुत्ते को डालनी पड़ेगी।
कहने का तात्पर्य यह है कि रोटी है या नहीं लेकिन मनुहार अवश्य  है। रोटी बेकार होगी इससे अच्छा है कि इसका उपयोग हो जाए। लेकिन कभी किसी ने सुना है कि जेब में धेला नहीं और कोई कह रहा हो कि ले पैसे ले ले। या कोई कह रहा हो कि ले ले पैसे, नहीं तो बेकार ही जाएंगे। रोटी तो बेकार नहीं जाती लेकिन पैसे हमेशा बेकार ही जाते हैं। मनुहार तो छोड़ो, हिम्मत ही नहीं होती पैसे खर्च करने की। कल मुझे एक चीज मंगानी थी, ऑनलाइन देखी, मिल रही थी। फिर कीमत देखी तो कुछ समझ नहीं आया, ऐसा लगा कि 500 रू. की आधाकिलो है। मैंने पतिदेव को बताया कि यह चीज लानी है, यदि बाजार में मिल जाए तो ठीक नहीं तो ऑनलाइन मंगा लूंगी। जैसे ही 500 रू. देखे, एकदम से उखड़ गये, मैंने कहा कि क्या हुआ। ऐसा लगा कि सेट होने में कुछ समय लगा लेकिन फिर मैंने देखा कि 90 रू.की 200 ग्राम  है। 90 रूपये देखते  ही बोले कि कल ही ले आऊंगा। यह है हम सबकी मानसिकता, पैसे का पाई-पाई हिसाब और मन का कोई मौल नहीं। इतना ही नहीं यदि कोई वस्तु गुम हो गयी और वह मंहगी है तो चारों तरफ ढिंढोरा और सस्ती है तो चुप्पी। हमें चीज खोने का गम नहीं लेकिन मंहगी चीज खोने का गम है।

हम सब पैसे के  पीछे दौड़ रहे हैं, जितना संचय कर सकते हैं करने में जुटे हैं लेकिन यह भी बासी होगा और इसका उपयोग कौन करेगा, कोई चिंतन ही नहीं है। कोई नहीं कहता कि खर्च कर लो नहीं तो बेकार ही जाएगा। रोटी तो बासी हो जाती है, कुत्ते को डालनी पड़ती है लेकिन पैसा बासी नहीं होता। पैसे की मनुहार भी हम अपने बच्चों से ही करते  हैं – बेटा रख ले, काम आएगा, माँ अपने पल्लू से निकालकर बेटे की जेब में डालती जाती है। लेकिन यदि बेटे को जरूरत नहीं है तो इसका क्या उपयोग होगा हम समझना ही नहीं चाहते। बस संग्रह में लगे हैं, उसका समुचित उपयोग करने में भी हम पीछे हट जाते  हैं। अपने मन की नहीं करने पर हमारा मन कितना पीड़ित  हुआ इसका हिसाब कोई नहीं लगाता लेकिन करने पर कितना पैसा खर्च हुआ, हर आदमी गाता फिरता है। हम घूमने गये, वहाँ कितना खर्चा किया और कितना हम वसूल पाये, इसका तो हिसाब लगाते रहे लेकिन हमारा मन कितना तृप्त हुआ ऐसा हिसाब नहीं लगा पाए। हमारे मन को जो हमारी आत्मा से जुड़ा है, अतृप्त छोड़ देते हैं और पैसे को जोड़-जोड़कर संचय करते रहते हैं। मन क्षीण होता जाता है और पैसे के ढेर लग जाते हैं। काश पैसा भी बासी  होने लगे, कुत्ते की जगह अपनों को ही खिलाने का रिवाज बन जाये या फिर सभी परिवारजन को मनुहार से देने का मन बन जाए। 

Monday, April 3, 2017

कोई शर्त होती नहीं प्यार में

पूरब और पश्चिम फिल्म का एक गीत मुझे जीवन के हर क्षेत्र में याद आता  है – कोई शर्त होती नहीं प्यार में, मगर प्यार शर्तों पे तुमने किया ......। लड़की के रूप में जन्म लिया और पिताजी ने लड़के की तरह पाला, बस यही प्यार की पहली शर्त लगा दी गयी। हम बड़े गर्व के साथ कहते रहे कि हमारा बचपन लड़कों की तरह बीता लेकिन आज लगता है कि यह तो एक शर्त ही हो गयी। हम लड़की के रूप में बचपन को संस्कारित क्यों नहीं कर पाए? समाज का यह आरक्षण कितना कष्टकारी है, आज अनुभव में आने लगा है। अक्सर पुरुष बहस करते हैं, वे अपने मार्ग का रोड़ा महिला को मानते हैं। कई चुटकुले भी प्रचारित करते हैं कि मोदी जी अकेले और योगीजी अकेले, इसलिये ही इतनी उन्नति कर पाए। लेकिन संघर्ष क्या होता है, यह शायद पुरुषों को मालूम ही नहीं। जब आप जन्म लें और आपका व्यक्तित्व ही बदल जाए, जब आपके व्यक्तित्व को ही नकार दिया जाए, तब शुरू होता है संघर्ष। जब महिला होने के कारण आप विश्वसनीय ही नहीं रहें, आप की बुद्धि चोटी में है, कहकर आपकी उपेक्षा की जाए, तब शुरू होता है संघर्ष। आप केवल उपयोग और उपभोग की ही वस्तु बनकर रह जाएं तब शुरू होता है संघर्ष। आप पुरुष के संरक्षण में रहने के लिये बाध्य कर दी जाएं, तब शुरू होता है संघर्ष। आपको अपने तथाकथित घर से दूसरे घर में स्थानान्तरित कर दिया जाए, आपका नाम और उपनाम बदल दिया जाए, तब होता है संघर्ष। इतने प्रारम्भिक संघर्षों के बाद किसी  पुरुष ने अपना जीवन प्राम्भ किया है क्या?
विवाह के बाद घर बदला, संरक्षण बदला, अभी जड़े जमी भी नहीं कि उत्तरदायित्व की बाढ़ आ गयी। उपयोग और उपभोग दोनों ही खूब हुआ लेकिन जब निर्णय में भागीदारी की बात आये तो आप को पीछे धकेल दिया जाए। नौकरी की, लेकिन यहाँ भी निर्णय के समय अन्तिम पंक्ति में खड़ा कर दिया जाए। आप योग्य होकर भी अपने निर्णय नहीं ले सकते, क्योंकि आप पुरुषों के कब्जाए क्षेत्र में हैं। फिर ताने ये कि आपका क्या, आपकी एक मुस्कान  पर ही काम  हो जाते हैं। मतलब आप उपभोग की वस्तु हैं। मैंने अपने जीवन में अनेक प्रयोग किये, अनेक बदलाव किये। जब काम की स्वतंत्रता नहीं तो मन उचाट होने लगा और लेखन की ओर मुड़ने लगा। लेकिन महिला होने के संघर्ष को कभी स्वीकार नहीं किया, ऐसा लगता रहा कि ये संघर्ष तो सभी के जीवन में आते  हैं। एक जगह यदि महिला के साथ संघर्ष है तो क्या दूसरे क्षेत्र में नहीं होगा। नौकरी छोड़ दी और सामाजिक कार्य की राह पकड़ी। माध्यम बना लेखन। लेकिन अनुभव आने लगा कि यहाँ भी महिला  होना सबसे बड़ी पहचान है। लेखन के माध्यम से जैसे ही प्रबुद्ध पहचान बनने लगी, आसपास हड़कम्प मच गया। यह परिवर्तन स्वीकार्य नहीं हुआ, कहा गया कि कार्य बदलो। लेकिन मुझे अभी और अनुभव लेने शेष थे। अभी भी मेरा मन नहीं मानता था कि यह संघर्ष महिला होने का है। फिर नया काम, नये लोग लेकिन अंत वही कि महिला को महिला की ही तरह रहना होगा, निर्णय की  भागीदारी नहीं मिलेगी। कितने ही लोग आए, कितने ही काम आए, लेकिन सभी जगह एक ही बात की आप काम करें लेकिन नाम हमारा होगा। इतनी मेहरबानी भी तब मिलेगी जब आप उनके लिये उपयोगी सिद्ध होंगी।

आखिर सारा ज्ञान और अनुभव लेने के बाद यह समझ आने लगा कि महिला के संघर्ष को केवल महिला ही भुगतती है, जिन्दगी भर जिस बात को नकारती रही, उसी बात पर आज दृढ़ होना पड़ा कि मेरे संघर्ष अन्तहीन हैं। घर से लेकर बाहर तक मुझे संघर्ष ही करना पड़ेगा। किसी महिला के संघर्ष को पुरुष के संघर्ष से मत तौलो। पुरुष का संघर्ष केवल उसका खुद से है जबकि महिला का संघर्ष सम्पूर्ण समाज से है। हमारा संघर्ष हमारे गर्भाधान से शुरू होता  है, भाग्य से बच गये तो जीवन मिलता है, जीवन मिलता है तब या तो पुरुष की तरह पाला जाता  है या पुरुषों के लिये पाला जाता है। फिर जीवन आगे बढ़ता है तो दूसरे गमले में रोपकर बौंजाई बना दिया जाता है, बौंजाई पेड़ से एक वट-वृक्ष के समान छाया की उम्मीद की जाती है। संघर्ष अनन्त हैं, संघर्ष करते-करते मन कब थकने लगता है और फिर भगवान से मांग बैठता है कि अगले जन्म मोहे बेटी ना कीजो। लेकिन यदि पुरुषों के कब्जाए संसार को मुक्त करा सकें तो इतना संघर्ष करने के बाद मीठे ही मीठे फल लगे दिखायी देंगे और हर महिला गर्व से कह सकेंगी कि अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो। बस जिस दिन समाज की शर्तें समाप्त  हो जाएंगी, जब महिला कह सकेगी कि कोई शर्त होती नहीं प्यार में......। 

Saturday, April 1, 2017

इस गर्मी को नमन

और अंतत: आज एक तारीख को गर्मी ने एलान कर ही दिया कि मैं आ गयी हूँ। अब से अपने कामकाजी समय में परिवर्तन कर लो नहीं तो मेरी चपेट में आ सकते हो। स्कूल ने अपने समय बदल लिये, क्योंकि नन्हें बच्चे गर्मी की मार कैसे सहन कर सकेंगे। अस्पतालों ने भी समय बदल लिए क्योंकि बेचारे रोगी इतने ताप को कैसे सहन कर पाएंगे। और तो और पैसे के लेखा-जोखा ने भी आज से नयी शुरुआत कर दी है, गर्मी में हम नये तेवर के साथ रहेंगे। वस्त्र भी बदल गये हैं, पुराने संदूक में चले गये और नये पतले से और झीने से बाहर आ गये हैं।
सड़के तपने लगी हैं, कहीं पिघलने भी लगी हैं। तालाबों से पानी उड़ने लगा है। बालू रेत का तापमान भूंगड़े सेकने के लिये पर्याप्त हो गया है। प्रकृति गर्मी की तलाश कर रही है और प्राणी पेड़ों की छांव की तलाश कर रहे हैं। सूरज को शीघ्रता होने लगी है और वह सुबह जल्दी ही उदय होने लगा है, शाम को भी वह खरामा-खरामा ही यहाँ से दूर जाता है। लेकिन पक्षियों की रौनक लौट आयी है, भोर होते ही उनकी चहचहाट शुरू हो जाती है और शाम के साथ ही अपने-अपने ठिकाने में लौट आने की ताबड़-तोड़ कोशिश भी। अब प्रकृति अपने हिस्से की गर्मी खींच लेगी, सारी सृष्टि के रोम-रोम को विसंक्रमित कर देगी और जब ताप अपने उच्च माप पर जा पहुंचेगा तब अमृत वर्षा होगी।

इसलिये आज नव संकल्प प्रारम्भ हुआ है, गर्मी को आत्मसात करने का। सूर्य के आक्रोश को प्रकृति के सहारे झेलने का। प्रकृति की महत्ता समझने का। प्रकृति के एक-एक तत्व को सम्भालकर रखने का उसके संवर्द्धन करने का। सूर्य का ताप हमेशा से वृक्ष ही झेलते आए हैं तो आओ हम संकल्प करें कि अपने हिस्से के और जो असमर्थ हैं उनके हिस्से के भी वृक्ष लगाकर प्रकृति को ताप से बचाएंगे। सूर्य तो अपने चक्र के अनुसार ही कार्य करेगा लेकिन यदि हम प्रकृति को वृक्षों से लाद दें तो हमें शीतलता जरूर मिलेगी, हम भी बिना एसी खुली हवा में सांस ले सकेंगे। विचार शुरू कर दीजिये, शीघ्र ही पेड़ लगाने का अवसर प्रकृति देंगी तो हम अपनी तैयारी अभी से कर लें। हमें अपना कर्तव्य स्मरण कराने के लिये इस गर्मी को नमन।

Tuesday, March 21, 2017

हमारी फरियाद है जमाने से

कोई कहता है कि मुझसे मेरा बचपन छीन लिया गया कोई कहता है कि मुझसे मेरा यौवन छीन लिया गया लेकिन क्या कभी आपने सुना है कि किसी ने कहा हो कि मुझसे मेरा बुढ़ापा छीन लिया गया है। लेकिन मैं आज कह रही हूँ कि मुझसे मेरा बुढ़ापा छीन लिया गया है। सबकुछ छिन गया फिर भी हँस रहे हैं, बोल नहीं रहे कि हमारा बुढ़ापा छिन गया है। समय के चक्र को स्वीकार कर हम सत्य को स्वीकार कर रहे हैं। मेरे  बचपन में मैंने माँ को कभी रोते नहीं देखा और कभी भी नहीं देखा। पिता की सारी कठोरता को वे सहन करती थी लेकिन रोती नहीं थी, हमने भी यही सीख लिया कि रोना नहीं है। अब इतनी बड़ी चोरी हो गयी या डाका पड़ गया लेकिन फिर भी हँस रहे हैं, क्योंकि माँ ने रोने के किटाणु अन्दर डाले ही नहीं।
मैं अपने आस-पड़ोस में रोज ही देखती हूँ कि बुढ़ापे में लोग या 50 वर्ष की आयु के बाद ही सारे घर को कामों से निवृत्त हो जाते हैं। घर को बहु सम्भाल लेती है और आर्थिक मोर्चे को बेटा। बस माता-पिता का काम  होता है सुखपूर्वक समाज में अपने सुख को बांटना। पोते-पोती को अपनी गोद में खिलाने का सुख लेना। जीवन सरलता से चल रहा होता है। हमारे बड़ों ने यही किया था, हमने भी यही किया और हमारी संतान भी यही करेगी। लेकिन यह क्रम शिक्षा के कारण अब टूट गया है। इक्कीसवीं शताब्दी में यह क्रम मृत प्राय: हो गया है। हमने अपनी संतान के बचपन को जीने का पूरा अवसर दिया, उन्हें उनके यौवन को जीने का भी पूरा अवसर दिया लेकिन जब हमारी बारी आयी तब वे खिसक लिये। अपने उज्जवल भविष्य के लिये उन्होंने हमारे सारे अधिकार ही समाप्त कर दिये।

कल अपने मित्र के निमंत्रण पर उनके घर गये, निमंत्रण भोजन का था लेकिन उन्होंने पेट को तो तृप्त किया ही साथ ही मन को भी तृप्त कर दिया। तीन माह का उनका पोता  हमारी गोद में था, यह होता है बुढ़ापे का सुख, जो हम से छीन लिया गया है और उसकी शिकायत हम समाज के सम्मुख कर रहे हैं। यदि मैंने मेरी संतान के बचपन को छीन लिया  होता तो आज मुझे कितनी गालियां पड़ रही होतीं लेकिन किसी ने मेरे बुढ़ापे को छीन लिया  है तो उसका संज्ञान समाज लेता ही नहीं। हँसकर कह दिया जाता है कि अपने भविष्य के लिये बच्चे को ऐसा करना ही पड़ेगा। उल्टा मुझे ही तानों का दण्ड मिलेगा, इसलिये त्याग की अपनी महान छवि बनाने के लिये हँसना जरूरी हो गया है। लेकिन बुढ़ापा तो छिन ही गया है, अब जो भी है उसे कुछ और नाम दे दो, यह बुढ़ापा नहीं है, बस जीवन की सजा है। इसलिये हमारी उम्र के लोग कहने लगे हैं कि किसलिये जीना, हमारी संतान कहती है कि खुद के लिये जीना। लेकिन यदि हम यौवन में ही खुद के लिये जीते तो तुम्हारा बचपन क्या होता? अब हमसे कहते हो कि खुद के लिये जिओ, यह ईमानदारी तो नहीं है। हाँ यह जरूर है कि हम तुम्हारी बेईमानी को भी हँसकर जी लेंगे क्योंकि हमारे अन्दर तुम्हारे लिये प्रेम है, बस अब इस प्रेम का आवागमन रूक गया है। बुढ़ापा तो छिन ही गया है। जिस बुढ़ापे ने नयी पीढ़ी को गोद में नहीं खिलाया  हो, उसे संस्कारित नहीं किया हो, भला उस बुढ़ापे ने अपना कार्य कैसे पूरा किया? इसलिये हमने अपना बचपन जीया, यौवन भी जीया लेकिन बुढ़ापा नहीं जी पा रहे हैं। बुढ़ापे का मतलब दुनिया में एकान्त  होता होगा लेकिन भारत में कभी नहीं था लेकिन अब हमें एकान्त की ओर धकेला जा रहा  है तो यही कहेंगे कि हम से  हमारा बुढ़ापा छीन लिया गया है। हमारी फरियाद है जमाने से। फरियाद तो हम करेंगे  ही, चाहे हमें न्याय मिले या नहीं। हम भारत में नागरिक हैं तो हमें हमारी परम्परा चाहिये। हमें भी हमारा बुढ़ापा चाहिये। जैसे पति-पत्नी के अलग होने पर संतान का सुख बारी-बारी से दोनों को मिलता है वैसे ही संतान का सुख दादा-दादी को  भी मिलने का अधिकार होना चाहिये। मैं लाखों लोगों की ओर से आज समाज के सम्मुख मुकदमा दायर कर रही हूँ। हमारी इस फरियाद को जमाने को सुननी ही होगी।

Sunday, March 19, 2017

नरेन्द्र से विवेकानन्द की भूमि को नमन

जिस धरती ने विवेकानन्द को जन्म दिया वह धरती तो सदैव वन्दनीय ही रहेगी। हम भी अब नरेन्द्र ( विवेकानन्द के संन्यास पूर्व का नाम) की भूमि को, उनके घर को नमन करना चाह रहे थे। हम जीना चाह रहे थे उस युग में जहाँ नरेन्द्र के पिता विश्वनाथ दत्त थे, उनकी माता भुवनेश्वरी देवी थीं। पिता हाई-कोर्ट के वकील थे और माँ शिक्षित एवं धर्मानुरागी महिला थी। स्वामीजी के घर को हम मनोयोग पूर्वक देखना चाह रहे थे, लेकिन कोलकाता में सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि सभी भवनों में प्रवेश का समय निश्चित है, अक्सर दिन में बन्द भी रहते हैं। हमने भी दो चक्कर लगाये तब कहीं जाकर हम स्वामीजी के घर को देख पाये। हमें एक छोटी सी डाक्यूमेन्ट्री भी दिखायी गयी, जिसमें इस घर को जीर्णोद्धार के बारे में जानकारी थी। कैसे इस खण्डित भवन को पुन: उसी के शिल्प में बनाया गया और शिल्पकारों ने कैसे इस कठिन कार्य को सम्पादित किया, सभी कुछ बताया गया। विश्वनाथ दत्त का कक्ष, भुवनेश्वरी देवी का पूजा-कक्ष सभी कुछ संजोकर रखा है। किस खिड़की से नरेन्द्र ने साधुओं को वस्त्र दिये थे, किस कक्ष में ध्यान लगाते हुए सर्प आया था, सभी संरक्षित हैं। यह स्थान भारतीयों के लिये श्रद्धा-केन्द्र है, यहाँ आकर स्वत: ही गौरव का अनुभव होता है। यदि विवेकनन्द ने 1893 में शिकागो की धर्म-संसद में हिन्दुत्व को परिभाषित नहीं किया होता तो आज शायद हिन्दुत्व संरक्षित धर्म के स्वरूप में होता।
रामकृष्ण परमहंस नरेन्द्र के गुरु थे, कहते हैं कि नरेन्द्र को आध्यात्मिक शक्तियां अपने गुरु से ही मिली थीं। लेकिन यह भी आनन्द का विषय है कि शिष्य ने गुरु को नहीं ढूंढा अपितु गुरु ने शिष्य को ढूंढ लिया था, दक्षिणेश्वर का काली-मन्दिर इस बात का गवाह है। दक्षिणेश्वर का काली मन्दिर हमेशा से ही श्रद्धालुओं का केन्द्र रहा है, यहीं के पुजारी थे परमहंस। यहीं पर वे नरेन्द्र को प्रभु से साक्षात्कार करा सके थे और इसी मंदिर में नरेन्द्र ने काली माँ के समक्ष जाकर अपने परिवार की सुरक्षा की मांग के बदले में ज्ञान और भक्ति की मांग की थी। जब नरेन्द्र परमहंस के कहने पर काली-माँ से कुछ नहीं मांग पाये तो यहीं पर परमहंस ने उनके सर पर हाथ रखकर कहा था कि तेरे परिवार को मोटे कपड़े और मोटे अन्न की कमी नहीं आएगी। इसी मंदिर ने गुरु-शिष्य परम्परा का उत्कृष्ठ स्वरूप देखा है, इसी मन्दिर ने माँ शारदा को देखा है। इसलिये आज यह मन्दिर लाखों-करोड़ों लोगों का श्रद्धा-केन्द्र है। कोलकाता शहर में काली मन्दिर भी है लेकिन इस मन्दिर और उस मन्दिर की व्यवस्थाओं में रात-दिन का अन्तर है। काली-घाट मन्दिर में पैर रखते ही पण्डे लूटने को तैयार रहते हैं, पता नहीं हमारा समाज कब इस ओर ध्यान देगा? लेकिन दक्षिणेश्वर के काली मन्दिर में सभी कुछ अनुशासित है। तसल्ली से दर्शन कीजिये, कोई पण्डा आपको लूटने नहीं आएगा।
हमारा मन बार-बार बैलूर मठ में अटक जाता था, यात्रा के अन्त में दर्शन मिले वह भी लम्बी इंतजार के बाद। हम दक्षिणेश्वर से सीधे बैलूर मठ देखने गये लेकिन जाते ही पता लगा कि दिन में 1 बजे दर्शन बन्द हो जाते हैं, अब साढ़े तीन बजे प्रवेश मिलेगा। ढाई घण्टे का लम्बा समय निकालना कठिन काम था, लेकिन उसके बिना तो कोई चारा भी नहीं था। हमने पूछताछ की तो पता लगा कि सड़क के दूसरी तरफ एक विश्रामालय बनाया गया है। हम वहीं पहुंच गये। यहाँ भोजन भी था और विश्राम की अति उत्तम व्यवस्था भी। साढ़े तीन बजते ही हम प्रवेश द्वार पर थे। टिकट लेकर हम अंदर पहुँचे और विवेकानन्द को पूरी तरह से जी लिये। उनसे जुड़े जीवन के सारे ही प्रसंग वहाँ जीवन्त थे। जब रामकृष्ण परमहंस को कर्क रोग हुआ तब नरेन्द्र और उनके अन्य शिष्यों ने निश्चित किया था कि उन्हें कलकत्ता में किसी घर पर रखा जाये जिससे उन्हें चिकित्सकीय सुविधा में आसानी रहे। उनकी मृत्यु के बाद नरेन्द्र ने मठ स्थापना की बात रखी और एक घर को मठ का स्वरूप दे दिया गया। तभी नरेन्द्र ने संन्यास लिया था और शिकागो की धर्म-संसद में प्रसिद्धि के बाद उनका पहला कदम मठ की स्थापना ही था। अपने अन्तिम दिनों में विवेकानन्द यहीं रहे। जिन्हें विवेकानन्द में श्रद्धा है, उनके लिये यह तीर्थ से कम नहीं है, लेकिन हमारे  पास समय का अभाव था तो हमें शीघ्रता करनी पड़ी। वैलूर मठ से लगी हुई हुगली नदी परम आनन्द देती है, बस यहाँ बैठे रहो और अमृत पान करते रहो।

एक मजेदार वाकया हुआ उसे भी लिख ही देती हूँ – हम मठ के बाहरी प्रांगण को देख रहे थे और चित्र ले रहे थे। अंदर तो चित्र लेना मना है तो यहाँ तो जी भरकर लिये ही जा सकते थे। देखते क्या हैं कि पुलिस के अधिकारियों की एक टुकड़ी वहाँ आ गयी, उनका कोई केम्प वहाँ लगा था। हमारे चारों तरफ पुलिस थी, मेरे मुँह से निकला कि – पुलिस ने तुमको चारों तरफ से घेर लिया  है, सरेण्डर कर दो। सुनकर पुलिस अधिकारी भी अपनी हँसी  रोक नहीं पाये। हमने भी इस असहज स्थिति से बाहर निकलना ही उचित समझा और बाहर आ गये। कोलकाता में राजस्थान के मुकाबले एक घण्टा पूर्व सूर्यास्त होता है तो हमें लौटना ही था। लेकिन जितना समय मिला, उसे ही पाकर धन्य हो गये।

Thursday, March 16, 2017

नदी के मुहानों पर बसा सुन्दरबन

कोलकाता या वेस्ट-बंगाल के ट्यूरिज्म को खोजेंगे तो सर्वाधिक एजेंट सुन्दरबन के लिये ही मिलेंगे, हमारी खोज ने भी हमें सुन्दरबन के लिये आकर्षित किया और एजेंट से बातचीत का सिलसिला चालू  हुआ। अधिकतर पेकेज दो या तीन दिन के थे। हमारे लिये एकदम नया अनुभव था तो एकाध फोरेस्ट ऑफिसरों से भी पूछताछ की गयी और नतीजा यह रहा कि बिना ज्यादा अपेक्षा के एक बार अनुभव जरूर लेना चाहिये। 390 वर्ग मील के डेल्टा क्षेत्र में बसा जंगल  है, यह ऐसा जंगल या बन  है जो पानी पर  है। यहाँ सर्वाधिक टाइगर हैं जो पानी और दलदल में ही रहते हैं। चूंकि नदियों के मुहाने पर और सागर के मिलन स्थल पर डेल्टा बनते हैं तो नदियों का पानी खारा हो जाता है, इसकारण सुन्दरबन के प्राणी खारा पानी ही पीते  हैं। फोरेस्ट विभाग ने इनके लिये मीठे पानी की भी व्यवस्था की है, जंगल के बीच-बीच में मीठे पानी के पोखर बनाये हैं, जहाँ ये प्राणी पानी पीने आते हैं और पर्यटकों को भी इन्हें देखने का अवसर मिल जाता  है। सुंदरबन खारे पानी पर खड़ा है तो सारे ही वृक्ष फलविहीन है। यहाँ सुन्दरी नामक वृक्ष की बहुतायत है तो इसी के नाम पर यह सुन्दरीबन है जो सुन्दरबन हो गया है। पानी के मध्य होने से यहाँ आवागमन का साधन भी नाव ही है, पर्यटक सारा दिन नावों में भटकते रहते हैं और टाइगर को ढूंढने का प्रयास करते हैं। मीठे पानी के पोखर के पास हिरण तो दिखायी दे गये लेकिन टाइगर के दीदार होना इतना सरल नहीं है।
फोरेस्ट विभाग का गाइड बता रहा था कि अभी कुछ दिन पहले अमेरिका से एक महिला यहाँ आयी थी और यही पर बने फोरेस्ट के गेस्ट-हाउस में पूरे सात दिन रही थी। वह रात-दिन टाइगर के मूवमेंट के बारे में जानकारी रखने का प्रयास करती थी, आखिर उसे केवल एक दिन सुबह 4 बजे टाइगर के दुर्लभ दर्शन हुए। इसलिये आप चाहे तीन दिन का पेकेज लें या दो दिन का, टाइगर तो नहीं दिखेगा। ऐसा भी नहीं  है कि टाइगर गहरे जंगल में ही रहते हैं और वे गाँव की तरफ नहीं आते, वे खूब
आते हैं और गाँव वालों का शिकार कर लेते हैं। साल में 10-12 घटनाएं होना आम बात रही है लेकिन अब वनविभाग सतर्क हुआ है और उसने जंगल में तारबंदी की है। इससे घटनाओं में कमी आयी  है।
हमारा भ्रमण सुबह प्रारम्भ  हुआ और यहाँ तक पहुंचने में तीन घण्टे का समय लगा। कोलकाता से बाहर निकलते ही गाँवों का सिलसिला शुरू हो जाता है, इसकारण गाडी की रफ्तार धीमी  ही रहती है। यहाँ हाई-वे क्यों नहीं बना यह तो पता नहीं, लेकिन यदि बनता तो शायद गाँव भी  समृद्ध होते। हम भी खरामा-खरामा सुन्दरबन क्षेत्र में पहुंच ही गये। अब हमें नाव की यात्रा करनी थी, नाव को हाउस-बोट का नाम दिया गया था तो  हमारी कल्पना कश्मीर की हाउस-बोट सरीखी हो गयी और हमने उसी में रहने की स्वीकृति भी दे दी। लेकिन बोट पर जाते  ही बोट वाले ने बता दिया कि रात तो होटल के कॉटेज में ही काटनी होगी। इस बात पर एजेण्ट को डांटा भी कि कैसे उसने यहाँ रात गुजारने की कल्पना कर ली। लगभग 12 बजे हम बोट पर थे, कुछ नया अनुभव था उसका रोमांच था तो कुछ एजेण्ट के दिखाये सपनों से नाखुश भी थे। भोजन की व्यवस्था बोट पर ही रहती है, लेकिन दाल चावल और सब्जी मात्र ही होता है। आप इसे खुश होकर खा लेते  हैं तो ज्यादा ठीक रहता है नहीं तो सारा दिन कुड़कुड़ाते रहिये। उस जंगल में तो और कुछ मिलेगा नहीं। हम 12 बजे से तीन बजे तक जंगल में चलते रहे बस चलते रहे। पानी ही पानी था और चारों तरफ जंगल था। जंगल के पेड़ों पर पक्षी भी नहीं थे। तीन बजे नदी से पानी उतरना शुरू हुआ और देखते  ही देखते 20 फीट पानी उतर गया। जो पेड़ पानी में डूबे थे अब वे दलदली टीलों पर खड़े दिखायी दे रहे थे। जालबंदी भी दिखायी देने लगी थी। हमारी नाव भी नदी के बीच में चलने लगी थी और फिर 3 बजने  पर एक जगह रोक दी गयी। हमें बताया गया कि अब इन पेड़ों  पर पक्षी आएंगे, उनके कलरव का आप आनन्द ले सकते हैं। पक्षी आना शुरू भी हुए लेकिन बहुत कम तादाद में। इससे कहीं अधिक तो हमारे फतेह-सागर में आते हैं। पक्षी पेड़ो पर आकर नहीं बैठ रहे थे, वे पानी से बाहर निकल आयी जमीन पर ही चहल-कदमी कर रहे थे। कुछ देर बाद समझ आया कि दलदल में मछली आदि जीव थे जिन्हें पाने के लिये उनकी खोज जारी थी।

वहाँ से सूर्यास्त का नजारा अद्भुत था, हम भी उसी में खो गये और नाविक की आवाज आ गयी कि अब रवाना होने का समय  है। अंधेरा छाने से पूर्व हमने वहाँ से प्रस्थान कर लिया। नदी का पानी इतना उतर चुका था कि किस घाट पर नाव को बांधना है, नाविक इसी चिन्ता में दिखायी दिया। हमने भी एक गाँव में कॉटेज में शरण ली, अन्य नावों के यात्री भी आने लगे थे। गाँव में ही छोटा सा बाजार लगा था और गाँव में शान्ति दिखायी पड़ रही थी। रात का खाना भी नाव में ही बना था लेकिन हमने खाया कॉटेज में था। होटल वालों ने हमारे मनोरंजन के लिये बंगला नृत्य की व्यवस्था की थी, उसका भी आनन्द लिया। सुबह फिर यात्रा शुरू हुई, इसबार फोरेस्ट विभाग से आज्ञा-पत्र लेना था, विभाग में गये, औपचारिकताएं पूर्ण की। वहाँ पर ही छोटा सा उद्यान बना रखा है, साथ ही मीठे पानी का तालाब भी। वहाँ एक हिरण पानी पीने आया था, बस उसके दर्शन हो गये। दूसरे तालाब में मगरमच्छ थे, धूप सेंक रहे थे। एक ऊंची मचान भी बना रखी थी जहाँ से दूर-दूर तक देखा जा सकता था। मगरमच्छ के आकार की एक छिपकली भी देखी जो पानी में तैर रही थी। आज्ञा मिलने के बाद हमें एक गाइड दे दिया गया जो हमें जंगल के बारे में बताता रहा। जंगल में वनदेवी की मूर्ति लगी है, गाँव वाले पूजा करते हैं कि देवी टाइगर के दर्शन मत कराना। कैसी विडम्बना है कि वे कहते हैं कि टाइगर दिखना नहीं चाहिये और पर्यटक कहते हैं कि टाइगर दिखा दो। अब हमारी नाव गहरे जंगल में थी, गाँव पीछे छूट चुके थे। हमारी निगाहें हर पल कुछ खोज रही थी, क्या पता टाइगर दिख ही जाये! लेकिन यह भी उतना ही सच था कि हम जंगल के इतने नजदीक थे कि टाइगर दिखने का अर्थ था हम  पर आक्रमण। सभी जानते हैं कि टाइगर ऐसे में नहीं दिखता। लेकिन सुन्दरबन के नाम से पर्यटक आ रहे हैं और भटक रहे हैं। बस हम डेल्टा और पानी में जंगल को समझ सके, इतना फायदा हुआ। जिन लोगों ने तीन दिन का ट्यूर लिया था, वे कुछ और गहरे जंगल में जाएंगे लेकिन परिणाम यही होने वाला है। हम भी तीन बजे सुन्दरबन को छोड़ चुके थे। जिस बिन्दु से यात्रा शुरू की थी वापस वहीं थे। छोटा सा विश्रामालय था, जाते समय यही बैठकर नाव का इंतजार किया था। वापसी में नौजवानों ने वहाँ केरम लगा दिया था, मुझे याद आ गया कि कोलकाता कभी केरम के अड्डों के रूप में जाना जाता था। मैंने ड्राइवर से पूछा कि आज भी केरम के अड्डे चलते हैं, वह बोला की हाँ चलते हैं। कोलकाता का जन-मन नहीं बदला था, एक दुकान पर खड़े होकर ताश खेलते हुए  लोग दिखायी दे गये थे और आज केरम खेलते लोग। सुकून मिलता है जब लोग स्वस्थ मनोरंजन से जुड़े होते हैं।