Saturday, January 16, 2021

हमने देखा नाग-लोक

 

माया-सभ्यता, नाग-लोक जैसे नाम हम बचपन से ही सुनते आए हैं। तिलस्मी दुनिया का तिलस्म हमारे सर चढ़कर बोलता रहा है। चन्द्र कान्ता संतति सका सबस् बड़ा उदाहरण है। लेकिन कल माया-सभ्यता और नाग-लोक को देखकर आँखें विस्फारित होकर रह गयी! माया-सभ्यता और नाग-लोक मिला भी तो कहाँ – अमेरिका में! डिस्कवरी चैनल पर ग्वाटेमाला के घने जंगलों में एक पुरातत्व वैज्ञानिक खोज में लगा है, वह हजारों की संख्या में बने पिरामिड़ों का अध्ययन कर रहा है, उसे खोज हैं नाग-राजा के पिरामिड़ की। क्योंकि राजा के पिरामिड़ में ही अकूत खजाना होने का अनुमान है। बीसियों साल हो गये, खोज निरन्तर जारी है, न जाने कितने पिरामिड़ खोज लिये गये हैं लेकिन अभी राजा का  पिरामिड़ खोजना शेष है।

एंकर  बता रहा है कि यह दुनिया का विशालतम साम्राज्य था, शायद ईसा से 300-400 वर्ष पूर्व। इन जंगलों में हजारों की संख्या में पिरामिड़ हैं। घने वृक्षों के बीच जहाँ भी कोई टीले जैसी ऊँची पहाड़ी दिखती है, वहाँ पिरामिड़ होता है। इतना बड़ा सम्राज्य आखिर नष्ट कैसे हो गया? कहते हैं कि सभ्यता के विकास में वृक्षों के संरक्षण का ध्यान नहीं रखा गया और धीरे-धीरे जंगल कटते चले गये और एक दिन सारा साम्राज्य भरभरा के जमीदोंज होकर समाप्त हो गया! इसे नाम दिया गया माया सभ्यता।

हमारे यहाँ भी माया सभ्यता और नाग-लोक की चर्चा है, महाभारत में तो पूरा कथानक है। शायद भारत की सभ्यता भी यहाँ से जुड़ी हो! पिरामिड़ों में घूमते हुए पुरातत्व का दल भोजन के लिये आ गया है। भोजन सजा हुआ है, एक बर्तन में राजमा है, दूसरे में चावल, एक दो व्यंजन और है लेकिन इनके साथ हैं मक्की की रोटियाँ। बस वे इसे टोटिया कहते हैं। पूरी तरह से भारतीय थाली। नाग-राजा और रानी की कल्पना भी हमारे पुराणों जैसी ही है। पत्थर  पर भी कुछ चित्र नुमा संकेत उभारे गये हैं।

बड़े-बड़े पिरामिड़ आकर्षित करते हैं, वहाँ के पत्थर को जाँचा-परखा जा रहा है। एक विशाल पत्थर पर चित्र मिल जाते हैं, वे बताते हैं कि ये संकेत हैं कि यहाँ नाग-राजा का पिरामिड़ हो सकता है। एक  पिरामिड को बिना हानि पहुँचाए, ड्रिल मशीन से छेद किया जाता है और उस छेद में केमरे से देखा जाता है। वहाँ कमरे जैसा स्थान होने का अंदेशा होता है। यहाँ खोज जारी रहेगी।

इतने घने जंगलों में, जहाँ मौसम भी पल-पल बदलता है, वहाँ पहुँचना भी चुनौति है। हेलिकोप्टर के सहारे, टीम एक टीले पर पहुँचती है, अभी जाँच-पड़ताल चल ही रही है कि मौसम बिगड़ने लगता है। तूफान का संकेल मिलने लगता है और वे झटपट दौड़ पड़ते हैं, हेलिकोप्टर की तरफ! खोज का काम धीरे-धीरे ही हो पाता है। पिछले दो हजार साल से अनखोजी जगह को खोजने में अभी समय लगेगा। न जाने इस माया-सभ्यता के कितने पहलू निकलकर बाहर आएं!

रोमांचकारी अनुभव था, इस डोक्यूमेंट्री को देखना। मनुष्य निरन्तर अतीत को खोज रहा है, स्वयं को खोज रहा है! पता तो लगे कि हम आज जिस सभ्यता के दौर में जी रहे हैं, कल की सभ्यता क्या थी? आज जिस विज्ञान को लेकर हम फूलें नहीं समा रहे, उस युग में कौन सा ज्ञान था? अभी बहुत कुछ खोजना शेष है। ईसा से पूर्व की दुनिया को खोजना शेष है! हमारे यहाँ तो महाभारत और रामायण के माध्यम से उन्नत सभ्यता के दर्शन होते हैं लेकिन क्या शेष विश्व में भी इतनी उन्नत सभ्यताएं थी? मीलों तक फैले इस विशाल साम्राज्य में कितना कुछ छिपा है अभी शेष है। कहानी बहुत बड़ी होगी शायद महाकाव्य जैसी! मनुष्य के परिश्रम की कहानी, मनुष्य के ज्ञान की कहानी और मनुष्य के विनाश की कहानी!

Sunday, January 10, 2021

एक पक्षी की कुटिया

 

अपने आसपास से इतर आखिर दुनिया क्या है? हमारी सोच से परे आखिर दुनिया की सोच क्या है? दुनिया देखने के लिये झोला लेकर, दुनिया की सैर तो नहीं की जा सकती है बस टीवी ही हमें दुनिया दिखा देती है। मनुष्यों की दुनिया कमोबेश एक जैसी है, वही सत्ता का संघर्ष, वही अहंकार का वजूद! दुनिया के हर कोने के मनुष्य का यही फलसफा है, बस अधिकार और अधिकार।

डिस्कवरी से प्रकृति को देखने की चाहत बहुत कुछ दिखा देती है, तब लगता है कि मनुष्य को अभी बहुत कुछ सीखना है। प्रकृति में सामंजस्य है लेकिन जागरूकता भी है। अपने परिवार की रक्षा कैसे करनी है, वे जानते हैं। प्रणय से लेकर नयी पीढ़ी के पंख आने तक कैसी साधना करनी है, वे जानते हैं। उनकी साधना का प्रकार बदलता नहीं है, छोटे से जीवन में भी पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही साधना चली आ रही है, कुछ बदलता नहीं।

एक सुन्दर सा पक्षी, कबूतर से कुछ बड़ा, घने जंगल में फूल एकत्र कर रहा है। सुन्दर बीजों का ढेर सजा दिया है। तिनकों से झोपड़ी बना ली है। लग रहा है कि जंगल में किसी तपस्वी कन्या ने घर सजाया है। जब सब कुछ सज गया है, तब प्रणय निवेदन के लिये पुकार के स्वर गूंज जाते हैं। साथी पक्षी आता है, प्रणय निवेदन स्वीकार करता है और कुटिया में परिवार का डेरा सज जाता है। इतना सुन्दर दृश्य, मन कहीं खो सा गया, एक पक्षी का सौन्दर्य बोध सीधे दिल में उतर गया। अभी तक बया-पक्षी के घौंसले को ही उत्सुकता से देखा है लेकिन इस पक्षी की कुटिया को देखकर मन रीझ सा गया!

इतनी सुन्दर कुटिया तो बचपन में भी नहीं बना पाए थे! बरसात की भीगी मिट्टी, पैरों के ऊपर मिट्टी की तह जमा देना और फिर आहिस्ता से पैर को बाहर निकाल लेना! फिर फूल चुनकर लाना, उस घरोंदे को सजाना, एक खूबसूरत अहसास था। लेकिन इस पक्षी की खूबसूरती किसी भी पैमाने से नापी नहीं जा सकती थी! बेहद खूबसूरत।

पहाड़ की ऊँची सतह, जहाँ मिट्टी की पर्त थी, वहीं कोटरों में घौंसले बने थे। बाज पक्षी के छोटे-छोटे बच्चे वहाँ रह रहे थे। बाज पक्षी अपनी यात्रा  पर है, शायद भोजन की तलाश में गया है। लेकिन उसकी दृष्टि में उसका परिवार है। वह देखता है कि एक विशालकाय अजगर पहाड़ की ऊँचाई पर चढ़ रहा है. तेजी से आगे बढ़ रहा है। बाज  पक्षी ने उड़ान भर ली है। अभी अजगर कोटर तक नहीं पहुँच पाया है और बाज उस पर प्रहार कर देता है एक ही झटके में अजगर, हवा में तैरता हुआ पहाड़ से गिरने लगता है। बाज पक्षी को अभी भी विश्वास नहीं, वह पीछा करता है। बीच पहाड़ में जहाँ अजगर को जमीन मिलने के आसार दिखते हैं, वह वहाँ से भी उसे धकेलता है। तब कहीं जाकर निश्चिन्त होता है।

अपने परिवार को अपनी नजर में रखना, प्रकृति सिखाती है। लेकिन मनुष्य भूल गया है। परिवार को छोड़ देता है, समाज को छोड़ देता है और देश को भी छोड़ देता है। बस अकेला ही दुनिया को जीतने निकल पड़ता है! कहते हैं कि मनुष्य प्रकृति को जीतने निकला है लेकिन लगता ऐसा है कि वह प्रकृति को जान भी नहीं  पाया है! प्रत्येक जीव अपनी परम्परा से बंधा है, जो उसके पूर्वज करते रहे हैं, बस वह भी वही कर रहा है। उसके गुण-सूत्रों में ही समाहित हो गये हैं, उसी से उसकी पहचान है। लेकिन मनुष्य बस परिवर्तन दर परिवर्तन कर रहा है, उसकी  पहचान क्या है? कहीं खो सी गयी है। क्या मनुष्य रक्षक है या भक्षक? वह अपने युगल के साथ भी ढंग से व्यवहार नहीं कर पा रहा है। जब युगल से ही व्यवहार का  पता नहीं है तब अन्य प्रणियों के साथ सामंजस्य कैसे रख सकेगा?

लगता है मनुष्य को प्रकृति से बहुत कुछ सीखना है, सामंजस्य  बनाकर चलना है। जो उसके मूल गुण-सूत्र हैं, उन्हीं पर कायम रहना है। अपने सौन्दर्य बोध को जिंदा रखना है। बहुत उन्नति कर ली है मनुष्य ने लेकिन फिर भी इन छोटे से प्राणियों से हार जाता है। उस छोटे से पक्षी जैसा सौन्दर्य बोध शायद मनुष्य ने खो दिया है। वह प्रणय निवेदन करना भी भूल गया है। अपने अधिकार को जगा लिया है, सब कुछ छीनकर प्राप्त करना चाहता है। शायद प्रकृति का सौन्दर्य बोध उससे दूर होता जा रहा है! सब कुछ कृत्रिम सा है! प्रकृतिस्थ कुछ भी नहीं! काश हम  प्रकृति के साथ चले होते, जैसे हमारे ऋषि-मुनियों की दुनिया थी! किसी पड़ाव पर तो शान्ति मिलती! जीवन के अन्तिम पड़ाव पर खोज रहे हैं कि कहाँ बसेरा हो? लेकिन कृत्रिम दुनिया के मकड़जाल में ऐसे फंसकर रह गये हैं कि कहीं मार्ग दिखता नहीं। फूलों को एकत्र करने की चाहत भी जैसे इस कृत्रिमता के नीचे दब गयी है। काश हम भी उसी पक्षी की तरह बन पाते, जो अपनी चोंच के सहारे ही इतना सुन्दर घर बना लेती है!

Monday, August 31, 2020

खिलौनों का संसार

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अमेरिका में हम एक परिवार से मिलने गये, कुछ देर में ही बात चल पड़ी खिलौनों पर! वे आपस में पूछ रहे थे कि तुम्हारे बच्चे के पास कौन सा खिलौना है? अभी नया खिलौना जो बाजार में आया है, वह खरीदा है या नहीं! मैं आश्चर्यचकित थी कि खिलौने भी आपके रहन-सहन की सीमा तैयार करते हैं क्या! बच्चे भी खिलौनों की जरूरत समझने लगे, यदि उसके पास है तो मेरे पास भी होना ही चाहिये। दुनिया में जो है या था, उसे खूबसूरत खिलौने में ढाल दिया गया था। डिज्नीलैण्ड तो खिलौनों की दुनिया ही है। अमेरिका, यूरोप आदि विकसित देशों में सारी दुनिया को खिलौनों के रूप में बच्चे के सामने ला दिया। अब बच्चा सोते-जागते उसी दुनिया में जीने लगा। टॉय स्टोरी प्रमुख हो गयी और वास्तविक कहानी पीछे धकेल दी गयी। खिलौना उद्धोग बढ़ता गया और बच्चा सिमटता गया। उसकी दुनिया केवल मात्र खिलौने हो गये।

मोदीजी ने मन की बात कही। खिलौनों पर बात रखी। खिलौने हमारे बचपन को कैसे सृजनात्मक बनाते रहे हैं, यह हम सब जानते हैं। हमने खिलौने से लेकर ट्रांजिस्टर, पंखे आदि सभी खोलकर देखे हैं कि यह कैसे चलते हैं और इन्हें कभी वापस जोड़ लिया जाता था और कभी जोड़ नहीं पाते थे। बस वहीं से सृजन की शुरुआत हुई थी। अब थीम पर आधारित खिलौने बनने लगे हैं, जिससे बच्चे बहुत कुछ सीख जाते हैं। लेकिन थीम कुछ ही विषय पर बनती हैं। भारत में कहानी की भरमार है, हर प्रदेश के अपने नृत्य हैं, वेशभूषा है, मन्दिर हैं। यदि हम नृत्य शैली और उनकी वेशभूषा को आधार बनाकर एक थीम बनाएं तो कितनी सुन्दर खिलौनों की दुनिया होगी! प्रदेश के मन्दिरों की थीम बनाकर खिलौने बनाएं तो कितनी सुन्दर होगी! हमारे पौराणिक कथानकों पर कितने डिज्नीलैण्ड बन सकते हैं! दुनिया में लोगों के पास कितनी कहानियां हैं? भारत के पास अनगिनत कहानियां हैं।

भारत में ऐसी संस्कृति है जो जीवन के प्रत्येक पहलू को दिखाती है, गृहस्थी-परिवार से लेकर देश तक के दर्शन कराती है। हमारे यहाँ खिलौना का संसार बस सकता है। न जाने कितने डिज्नीलैण्ड बन सकते हैं! हमारे यहाँ कठपुतली के रूप में कुछ प्रयोग हुए हैं, ऐसे ही प्रयोग खिलौनों में होने चाहियें। न जाने कितने कलाकरों को नवीन सृजन का अवसर मिलेगा! बस आवश्यकता है, खिलौना व्यवसाय को नया रूप देने की। जब देश का प्रधानमंत्री लोगों का आह्वान करता है तब लोग इस उद्धोग में रुचि लेंगे ही। बस आवश्यकता है भारतीय दृष्टिकोण की। एक बार कलाकार को समझ आ जाए कि कैसे भारत की कला का दुनिया को परिचय कराया जा सकता है, बस तभी बात बनेगी।

Friday, August 28, 2020

घौंसला बनाता नर-बया

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शाम को घूमने का एक ठिकाना ढूंढ लिया है, एक ऐसा गाँव जहाँ पर्याप्त घूमने की जगह है। जहाँ जंगल भी है, और जंगल है तो पक्षी भी हैं। नाना प्रकार की चिड़ियाएं हैं जिनकी चींचीं से हमारा मन डोलता रहता है। काश हम इनकी भाषा समझ पाते! हम देख रहे हैं एक पेड़, जहाँ बया के खूबसूरत कई घौंसले लटक रहे हैं। अभी अधूरे हैं, नर-बया उन्हें बुनने में लगे हैं। मादा बया खुशी से प्रफुल्लित होकर चींचीं कर रही है। मादा-बया की खुशी से नर-बया उत्साहित होकर घौंसला बनाने में फुर्ती लाता है। दौड़-दौड़कर तिनके ला रहा है और बहुत ही खूबसूरती  से उन्हें घौंसलों में बुन रहा है। धीरे-धीरे घौंसला तैयार हो रहा है। मादा बया का निरीक्षण शुरू हो गया है। यह क्या? एक घौंसला अधूरा छूट गया है! अब नर बया दूसरे घौंसले पर काम कर रहा है! पता लगा कि मादा बया ने कहा कि यह घौंसला ठीक नहीं बन रहा है, इसमें गृहस्थी नहीं जमायी जा सकती है। बस मादा बया ने रिजेक्ट कर दिया तो रिजेक्ट हो गया। नर क्या करता! उसने फिर मादा बया को खुश रखने का प्रयास किया। पेड़ पर ऐसे अधूरे और पूरे कई घौंसले हो गये। अब मादा बया स्वीकृति देगी तो गृहस्थी बनेगी और फिर अण्डे सुरक्षित रह पाएंगे।

हम प्रतिदिन देख रहे हैं, नर-बया का कृतित्व। चित्र लेने का प्रयास भी करते हैं लेकिन चिड़िया आती है और फुर्र हो जाती है। हम आपस में बया की कहानी कहने लगते हैं फिर किसी पेड़ की जानकारी बताने लगते हैं और एक घण्टा घूमने का कब पूरा हो गया, खबर ही नहीं लगती! हमारे सामने प्रकृति है, कभी मोर को उड़ते देखते हैं। नाचते तो सभी ने देखा ही होगा लेकिन मोर उड़कर कैसे दूरियाँ नाप लेता है, यह भी देख लिया है। प्रकृति को समझने और देखने का जितना सुख है, यह सुख बहुत प्यारा है।

कभी इस निर्जन जगह पर कुछ युवक बोतल लिये युवा भी दिख जाते हैं, साथ में चबेना भी है। वे प्रकृति को देखने नहीं आए हैं अपितु प्रकृति की गोद में बैठकर छिपने आए हैं। वे प्रकृति को समझ ही नहीं पा रहे हैं। उन्होंने प्रकृति के बारे में कुछ पढ़ा ही नहीं है। उनमें जिज्ञासा ने जन्म ही नहीं लिया है। वे तो भोग में लगे हैं, इस निर्जर जंगल में डर पैदा करने में लगे हैं। यही तो असुरत्व है। डर पैदा करो। कल दो माँ-बेटी भी हमें देखकर यहाँ आ गयीं। उन्होंने बताया की बस पहाड़ी के उस पार ही हमारा गाँव है लेकिन यहाँ आने की कभी हिम्मत नहीं की। हमने पूछा क्यों? वे बोली की लोग कहते हैं कि यहाँ लोग शराब पीने आते हैं, बहुत कुछ हो जाता है यहाँ।  हमने कहा कि कुछ नहीं होता, रोज आया करो। अब वे निर्भय हो गयी है, आने लगी हैं। लेकिन प्रश्न जो मेरे मन में उदय हो रहा था कि लोग यहाँ आकर प्रकृति में क्यों नहीं खो जाते हैं? क्यों वे यहाँ असुरत्व पैदा करते हैं? शायद इसका कारण है हम पढ़ते ही नहीं हैं। आज का युवा भोगवाद के पीछे भाग रहा है, वह किताबों को हाथ ही नहीं लगा रहा है! उसे पता ही नहीं है कि जीवन कैसे बनाया जाता है। क्या अमीर और क्या गरीब सारे ही सुख के साधनों के पीछे भाग रहे हैं। अपनी हैसियत को धता बताकर माता-पिता को भी दुत्कार, बस सुख के साधन उनकी जीवन नैया हो गयी है। वे प्रकृति को देख ही नहीं रहे हैं कि प्रकृति में एक छोटी सी चिड़िया कितना परिश्रम करती है। परिश्रम करने पर ही उसे गृहस्थी का सुख मिलता है। लेकिन हम बोतल लेकर यहाँ आते हैं। ज्ञान नहीं है, तभी तो कुछ देख ही नहीं पाते। यदि ज्ञान होता तो बोतल घर पर भी याद नहीं आती। बस प्रकृति में ही खो जाने का मन करता। काश हम ज्यादा समय वहाँ रह पाते। उस बया के घौंसले बनाने वाले नर-बया से कुछ और सीख लेते!

Friday, August 21, 2020

हम ऊर्जा कहाँ से लेते हैं?

 

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कल माँ और बेटे के बीच हुई रोचक बात सुनिये। परिवार की बात नहीं है ना ही सामाजिक है, विज्ञान की बात है। लेकिन आप सभी को पढ़ लेनी चाहिये और अपनी राय भी देनी चाहिये जिससे यह बात आगे बढ़े। तो सुनिये – कल ही समाचार पत्र में एक समाचार प्रकाशित हुआ था कि धरती पर भार बढ़ रहा है इस कारण चुम्बकीय क्षेत्र में परिवर्तन हो रहा है और यदि ऐसा ही रहा तो धरती दो भागों में विभक्त हो जाएगी!

मैंने बेटे को बताया कि यह क्या है? अब वह इंजीनियर है तो विज्ञान क्षेत्र में कुशल ही है। वह बोला कि मैंने भी पढ़ा था। प्रश्न यह है कि भार कैसे बढ़ रहा है? पृथ्वी की ऊर्जा से ही सब कुछ बनता है, यहाँ की ऊर्जा यहाँ ही लगती है तो भार कैसे बढा?

मैंने कहा कि पृथ्वी तो कण पैदा करती है लेकिन हम मण हो जाते हैं!

उसने कहा यह सब इसी ऊर्जा से होता है। यदि किसी की मृत्यु होती है तो इसी उर्जा में समा जाती है। मेरी जिज्ञासा बढ़ रही थी, पूछा कि मतलब पंचतत्व में विलीन हो जाती है? लेकिन हम तो जलकर शीघ्र ही पंचतत्व में विलीन हो जाते हैं और वे जो दफन होते हैं?

वे भी कभी ना कभी पंचतत्व में विलीन होते ही हैं। मतलब यहीं की ऊर्जा यहीं पर काम आ गयी।

अब मेरा जो प्रश्न था वह ही धमाका था, मैंने पूछा कि हम तो ऊर्जा सूर्य से भी लेते हैं और सारे ही जीव जगत सूर्य के कारण ही बढ़ते हैं, तो यह तो पृथ्वी के अतिरिक्त हुआ ना! फिर हमारे इतने ग्रह हैं जिनकी ऊर्जा भी हम लेते ही हैं! हमारे यहाँ ज्योतिष विज्ञान है जो कहता है कि  हमारे जीवन में ग्रहों का प्रभाव होता है, तो सत्य ही है। हम सभी से ऊर्जा लेते हैं तो सभी से प्रभावित भी होते हैं। इसलिये ज्योतिष एक बहुत बड़ा विज्ञान है, जिसे समझना अति आवश्यक है।

इस एनर्जी याने की ऊर्जा के सिद्धान्त ने हम दोनों को ही अवाक कर दिया, उसने कहा इसे मैं विस्तार से पढ़ूंगा। विज्ञान कुछ भी कहे लेकिन मुझे तो समझ यही आया है कि ज्योतिष ज्ञान है और अब इसे बिन्दू-बिन्दू के रूप में समझकर विज्ञान की तरह सिद्ध करना होगा। कब मंगल से हम उर्जा लेते हैं, कब बृहस्पति से और कब बुद्ध से! इसी के अनुरूप  हमारा जीवन  बनता है। बस यह विज्ञान समझने की जरूरत है, फिर बहुत सारी गुत्थियाँ सुलझ जाएंगी। शायद यह भी पता लगे कि कौन सा वायरस किससे ऊर्जा ले रहा है!

अपने बच्चों से ऐसी रोचक बातें करते रहिये, बहुत नवीनता मिलती है। वैसे आप सब करते ही होंगे लेकिन थोड़ा कुरदेकर सीखने की दृष्टि से करेंगे तो सार्थक परिणाम मिलेंगे।

Friday, July 31, 2020

फेसबुक का कमरा

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हमारे यहाँ कहावत है कि दिन में कहानी सुनोंगे तो मामा घर भूल जाएगा! यहाँ मामा का रिश्ता तो सबसे प्यारा होता है, भला कौन बच्चा चाहेगा कि मामा ही घर का रास्ता भूल जाए! माँ जब  बच्चों से कहती है, तब बच्चे जिद नहीं करते और रात को ही आकर कहानी सुनते हैं लेकिन यह जुकरबर्ग ने तो हमें कठिनाई में डाल दिया! फेसबुक की हमारी दीवार पर लोगों की कहानी चिपका दी। अब दिन उगते ही हमें स्टोरी याने की कहानी पढ़नी पड़ती है। एक को सरकाओ तो दूसरी तैयार है, कब तक सरकाओगे! जुकरबर्ग कह रहा है कि मैं मामा का रास्ता  बन्द कराकर ही रहूंगा। भला यह भी कोई बात हुई! तुम्हारा मामा तुम्हें प्यार नहीं करता होगा, हमारे देश में तो शकुनी मामा तक भानजे से प्यार करता था। हमने जिद ठान ली कि हम कहानी दिन में नहीं पढ़ेंगे, जुकरवा ने अब हमारे ऊपर एक अदद कमरा तान दिया! यह फेसबुक है या कमरा बनाने की जगह! कमरा बन्द कर लेंगे और चाबी खो जाएगी तो क्या होगा? कोई जोर जबरदस्ती है क्या कि कहानी भी पढ़ो और कमरे में भी झांको!

हमने आजतक किसी के कमरे में ताक-झांक नहीं की। अब सरेआम कहा जा रहा है कि कमरे में जाओ! अपनी फोटो चिपकाकर कहानी से पेट नहीं भरा जो कमरा छान दिया हमारी दीवार पर! सुबह उठकर हम प्रभु को प्रणाम तो कर नहीं पाते लेकिन यहाँ जरूर करना पड़ता है। एक अदद मेसेंजर से ही दुखी थे और ऊपर से यह और लाद दिया हमारे ऊपर! ऐसा लग रहा है जैसे यूआईटी वाले कह दें कि खाली छतों पर आप अपना कमरा बना लीजिये। कर लो बात! छत मेरी और कमरा तेरा! किस-किस पर ताला लगाएं, जहाँ भी खुला रह जाता है, वहीं दूसरे के कब्जे होने का डर बना रहता है। सारे ही हमारी वॉल पर लिखने को टेग करते ही रहते हैं, अब कमरा और तान दिया! एक कोरोना से परेशान है कि वह मौका तलाश रहा है, हमारे शरीर में अपना खूंटा गाड़ने के लिये। जरा सी नाक खुली रह जाए तो वह घुस जाता है,  फिर तो उसी का राज हो जाता है। दूसरी तरफ फेसबुक का आतंक है कि चारों तरफ से आक्रमण हो रहे हैं। किले को चारों तरफ से घेर लिया है, चारों तरफ की दीवारे देखी जा रही हैं, जाँच पड़ताल जारी है कि कहाँ से घुसा जाए! एक तरफ मेसेन्जर की दीवार है, यह सबसे कच्ची है. यहाँ आराम से घुसा जा सकता है, दूसरी टेग की दीवार है, यहाँ थोड़ी सी अड़चन है। अब स्टोरी की जगह  देने से इस दीवार में भी रास्ता निकल सकता है और कमरे को  भी भेदकर घुसा जा सकता है! याने कि किला चारों तरफ से असुरक्षित  है! हे मेरे जुकरबर्ग! हमारी इस मुखपुस्तिका को थोड़ा सा सुरक्षित कर दो। हम तो अपना कीमती सामान मन्दिर के खजाने में सुरक्षित समझकर रख रहे हैं और आप हैं कि हमें चारों और से बेपर्दा कर रहे हैं।

हटा दीजिए ना हमारे ऊपर से ये कमरें और कहानी की दीवार। हम वैसे ही पढ़ाकू टाइप के लोग हैं, पढ़ ही लेंगे। क्यों हमारे घर पर आकर ही सत्यनारायण की कथा करनी है! ढ़ोल- मंजीरे अपने घर पर ही बजा लीजिये। हमें कुछ शान्ति चाहिये। हमारी बात आपको समझ आए तो सुन लीजिये, नहीं तो हम भला क्या कर सकते हैं!


Wednesday, July 29, 2020

सूरज को पाने की जंग


हमारे बंगले की हेज और गुलाब के फूल के बीच संघर्ष छिड़ा है, हेज की सीमा बागवान ने 6 फीट तक निर्धारित कर दी है। इस नये जमाने में, मैं बंगले और हेज की बात कर रही हूँ, अरे अब तो नया जमाना है, बस फ्लेट ही फ्लेट चारों तरफ हैं। लेकिन सोसायटी में भी दीवारें हैं और इन दीवारों के सहारे हेज को जगह मिली हुई है। मैं छोटे शहरों की बात कर रही हूँ, जहाँ अभी भी छोटे-बड़े बंगलें होते हैं और साथ में होती है हेज। हेज हमें सड़क से पृथक भी करती है और एक झीना सा पर्दा हमारे और सड़क के बीच डाल देती है। बागवान ने हेज के साथ गुलाब की डाली भी रोप दी। गुलाब बढ़ने लगा, उसे सूरज की किरणों की चाहत हुई, वह तेजी से बढ़ा। देखते ही देखते गुलाब की नन्हीं सी डाली हेज के ऊपर निकल गयी। बागवान आए और डाली को सीमित कर जाए लेकिन गुलाब माने ना! उसे तो सूरज का प्रकाश चाहिये ही, क्योंकि उसे फूल खिलाने हैं, बगिया में ही नहीं अपितु वातावरण में सुगन्ध फैलानी है।
मुझे रोज लगता है कि मेरी छोटी सी बगिया में मानो सूरज को पाने के लिये रोज संघर्ष छिड़ता है। एक बार बचपन में मसूरी गये थे, वहाँ लम्बे-लम्बे देवदार के वृक्ष हैरान कर रहे थे। गहरे जंगल में उगे देवदार सूरज को पाने के लिये जंग छेड़े हुए थे। बस बढ़ते ही जा रहे थे, जब तक सूरज का प्रकाश ना मिल जाए! मेरे गुलाब भी बढ़ते ही जा रहे हैं, जब तक सूरज का प्रकाश ना मिल जाए! गुलाब और देवदार प्रकृति के साथ रहते हैं, अपने रास्ते स्वयं तलाश लेते हैं। गुलाब नाजुक है और देवदार सुदृढ़, लेकिन दोनों ने ही अपना हित साध लिया है। वे जान गये हैं कि बिना सूर्य प्रकाश के हमारा जीवन नहीं है! लेकिन इन्हीं देवदार और गुलाब को गमले में कैद करके घर की दीवारें के बीच सजा दो तो? वे रुक जाएंगे, वहीं थम जाएंगे।
मेरे बंगले में दो सीताफल के पेड़ भी लगे हैं, हर साल इतने सीताफल आ जाते हैं कि बाजार से खरीदना नहीं पड़ता लेकिन इस बार सीताफल बहुत ही कम आए, क्योंकि बारिश ही नहीं है। प्रकृति जो पानी दे रही है, वह नहीं मिला और जब पानी नहीं मिला तो सीताफल बड़े नहीं हो पाए और गर्मी से पककर नीचे गिरने लगे। कमजोर सीताफल को फंगस ने आ घेरा और फिर सब कुछ विनष्ट! लाख दवा डाल लो लेकिन प्रकृति का साथ नहीं है तो कुछ भी नहीं है। संघर्ष तो सीताफल ने भी किया ही होगा लेकिन वह गुलाब की तरह वर्षाजल नहीं ले पाया। प्रकृति हमें सूर्य का प्रकाश देती है, प्रकृति हमें वर्षाजल देती है, लेकिन हम लेते ही नहीं हैं, देने वाला दोनों हाथ से दे रहा है लेकिन हमने हाथ बांध लिये हैं। हम सिमट गये हैं।
हमारे बंगले अब सिमटते जा रहे हैं, फ्लेट ने उनकी जगह ले ली है। सूरज अब वहाँ झांक भी नहीं सकता। हम जो नयी पौध उगाते हैं उन्हें सूरज को छूने का अवसर ही नहीं मिलता। हमारे बच्चे सूरज के प्रकाश को सीधा पाते ही नहीं। वे गुलाब की तरह संघर्ष करके हेज से बाहर निकल ही नहीं पाते। वे कमजोर बनकर रह जाते हैं। सीताफल की तरह उन्हें भी वर्षाजल चाहिये लेकिन हम छुईमुई बनाकर उन्हें दूर कर देते हैं। ना धूप मिले और ना वर्षाजल! ना मिट्टी के साथ रहें और ना ही खुली हवा के साथ! तो फिर कब कौन सा फफूंद हमारे जीवन के आ घेरता है, हमें पता ही नहीं चलता! छोड़ दो बच्चों को प्रकृति के साथ, कुछ पल तो उन्हें दे दो कि वे स्वतंत्र होकर सूरज के प्रकाश को ढूंढ सकें। उनकी हड्डियां मजबूत होंगी तो वह लड़ सकेंगे हर  रोग से नहीं तो फिर कृत्रिम विटामिन डी3 खाकर काम चलाना पड़ेगा। सीताफल की तरह कृत्रिमता से पक तो जाएंगे लेकिन अपनी सुरक्षा कितनी कर पाएंगे पता नहीं!