Friday, July 31, 2020

फेसबुक का कमरा

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हमारे यहाँ कहावत है कि दिन में कहानी सुनोंगे तो मामा घर भूल जाएगा! यहाँ मामा का रिश्ता तो सबसे प्यारा होता है, भला कौन बच्चा चाहेगा कि मामा ही घर का रास्ता भूल जाए! माँ जब  बच्चों से कहती है, तब बच्चे जिद नहीं करते और रात को ही आकर कहानी सुनते हैं लेकिन यह जुकरबर्ग ने तो हमें कठिनाई में डाल दिया! फेसबुक की हमारी दीवार पर लोगों की कहानी चिपका दी। अब दिन उगते ही हमें स्टोरी याने की कहानी पढ़नी पड़ती है। एक को सरकाओ तो दूसरी तैयार है, कब तक सरकाओगे! जुकरबर्ग कह रहा है कि मैं मामा का रास्ता  बन्द कराकर ही रहूंगा। भला यह भी कोई बात हुई! तुम्हारा मामा तुम्हें प्यार नहीं करता होगा, हमारे देश में तो शकुनी मामा तक भानजे से प्यार करता था। हमने जिद ठान ली कि हम कहानी दिन में नहीं पढ़ेंगे, जुकरवा ने अब हमारे ऊपर एक अदद कमरा तान दिया! यह फेसबुक है या कमरा बनाने की जगह! कमरा बन्द कर लेंगे और चाबी खो जाएगी तो क्या होगा? कोई जोर जबरदस्ती है क्या कि कहानी भी पढ़ो और कमरे में भी झांको!

हमने आजतक किसी के कमरे में ताक-झांक नहीं की। अब सरेआम कहा जा रहा है कि कमरे में जाओ! अपनी फोटो चिपकाकर कहानी से पेट नहीं भरा जो कमरा छान दिया हमारी दीवार पर! सुबह उठकर हम प्रभु को प्रणाम तो कर नहीं पाते लेकिन यहाँ जरूर करना पड़ता है। एक अदद मेसेंजर से ही दुखी थे और ऊपर से यह और लाद दिया हमारे ऊपर! ऐसा लग रहा है जैसे यूआईटी वाले कह दें कि खाली छतों पर आप अपना कमरा बना लीजिये। कर लो बात! छत मेरी और कमरा तेरा! किस-किस पर ताला लगाएं, जहाँ भी खुला रह जाता है, वहीं दूसरे के कब्जे होने का डर बना रहता है। सारे ही हमारी वॉल पर लिखने को टेग करते ही रहते हैं, अब कमरा और तान दिया! एक कोरोना से परेशान है कि वह मौका तलाश रहा है, हमारे शरीर में अपना खूंटा गाड़ने के लिये। जरा सी नाक खुली रह जाए तो वह घुस जाता है,  फिर तो उसी का राज हो जाता है। दूसरी तरफ फेसबुक का आतंक है कि चारों तरफ से आक्रमण हो रहे हैं। किले को चारों तरफ से घेर लिया है, चारों तरफ की दीवारे देखी जा रही हैं, जाँच पड़ताल जारी है कि कहाँ से घुसा जाए! एक तरफ मेसेन्जर की दीवार है, यह सबसे कच्ची है. यहाँ आराम से घुसा जा सकता है, दूसरी टेग की दीवार है, यहाँ थोड़ी सी अड़चन है। अब स्टोरी की जगह  देने से इस दीवार में भी रास्ता निकल सकता है और कमरे को  भी भेदकर घुसा जा सकता है! याने कि किला चारों तरफ से असुरक्षित  है! हे मेरे जुकरबर्ग! हमारी इस मुखपुस्तिका को थोड़ा सा सुरक्षित कर दो। हम तो अपना कीमती सामान मन्दिर के खजाने में सुरक्षित समझकर रख रहे हैं और आप हैं कि हमें चारों और से बेपर्दा कर रहे हैं।

हटा दीजिए ना हमारे ऊपर से ये कमरें और कहानी की दीवार। हम वैसे ही पढ़ाकू टाइप के लोग हैं, पढ़ ही लेंगे। क्यों हमारे घर पर आकर ही सत्यनारायण की कथा करनी है! ढ़ोल- मंजीरे अपने घर पर ही बजा लीजिये। हमें कुछ शान्ति चाहिये। हमारी बात आपको समझ आए तो सुन लीजिये, नहीं तो हम भला क्या कर सकते हैं!


Wednesday, July 29, 2020

सूरज को पाने की जंग


हमारे बंगले की हेज और गुलाब के फूल के बीच संघर्ष छिड़ा है, हेज की सीमा बागवान ने 6 फीट तक निर्धारित कर दी है। इस नये जमाने में, मैं बंगले और हेज की बात कर रही हूँ, अरे अब तो नया जमाना है, बस फ्लेट ही फ्लेट चारों तरफ हैं। लेकिन सोसायटी में भी दीवारें हैं और इन दीवारों के सहारे हेज को जगह मिली हुई है। मैं छोटे शहरों की बात कर रही हूँ, जहाँ अभी भी छोटे-बड़े बंगलें होते हैं और साथ में होती है हेज। हेज हमें सड़क से पृथक भी करती है और एक झीना सा पर्दा हमारे और सड़क के बीच डाल देती है। बागवान ने हेज के साथ गुलाब की डाली भी रोप दी। गुलाब बढ़ने लगा, उसे सूरज की किरणों की चाहत हुई, वह तेजी से बढ़ा। देखते ही देखते गुलाब की नन्हीं सी डाली हेज के ऊपर निकल गयी। बागवान आए और डाली को सीमित कर जाए लेकिन गुलाब माने ना! उसे तो सूरज का प्रकाश चाहिये ही, क्योंकि उसे फूल खिलाने हैं, बगिया में ही नहीं अपितु वातावरण में सुगन्ध फैलानी है।
मुझे रोज लगता है कि मेरी छोटी सी बगिया में मानो सूरज को पाने के लिये रोज संघर्ष छिड़ता है। एक बार बचपन में मसूरी गये थे, वहाँ लम्बे-लम्बे देवदार के वृक्ष हैरान कर रहे थे। गहरे जंगल में उगे देवदार सूरज को पाने के लिये जंग छेड़े हुए थे। बस बढ़ते ही जा रहे थे, जब तक सूरज का प्रकाश ना मिल जाए! मेरे गुलाब भी बढ़ते ही जा रहे हैं, जब तक सूरज का प्रकाश ना मिल जाए! गुलाब और देवदार प्रकृति के साथ रहते हैं, अपने रास्ते स्वयं तलाश लेते हैं। गुलाब नाजुक है और देवदार सुदृढ़, लेकिन दोनों ने ही अपना हित साध लिया है। वे जान गये हैं कि बिना सूर्य प्रकाश के हमारा जीवन नहीं है! लेकिन इन्हीं देवदार और गुलाब को गमले में कैद करके घर की दीवारें के बीच सजा दो तो? वे रुक जाएंगे, वहीं थम जाएंगे।
मेरे बंगले में दो सीताफल के पेड़ भी लगे हैं, हर साल इतने सीताफल आ जाते हैं कि बाजार से खरीदना नहीं पड़ता लेकिन इस बार सीताफल बहुत ही कम आए, क्योंकि बारिश ही नहीं है। प्रकृति जो पानी दे रही है, वह नहीं मिला और जब पानी नहीं मिला तो सीताफल बड़े नहीं हो पाए और गर्मी से पककर नीचे गिरने लगे। कमजोर सीताफल को फंगस ने आ घेरा और फिर सब कुछ विनष्ट! लाख दवा डाल लो लेकिन प्रकृति का साथ नहीं है तो कुछ भी नहीं है। संघर्ष तो सीताफल ने भी किया ही होगा लेकिन वह गुलाब की तरह वर्षाजल नहीं ले पाया। प्रकृति हमें सूर्य का प्रकाश देती है, प्रकृति हमें वर्षाजल देती है, लेकिन हम लेते ही नहीं हैं, देने वाला दोनों हाथ से दे रहा है लेकिन हमने हाथ बांध लिये हैं। हम सिमट गये हैं।
हमारे बंगले अब सिमटते जा रहे हैं, फ्लेट ने उनकी जगह ले ली है। सूरज अब वहाँ झांक भी नहीं सकता। हम जो नयी पौध उगाते हैं उन्हें सूरज को छूने का अवसर ही नहीं मिलता। हमारे बच्चे सूरज के प्रकाश को सीधा पाते ही नहीं। वे गुलाब की तरह संघर्ष करके हेज से बाहर निकल ही नहीं पाते। वे कमजोर बनकर रह जाते हैं। सीताफल की तरह उन्हें भी वर्षाजल चाहिये लेकिन हम छुईमुई बनाकर उन्हें दूर कर देते हैं। ना धूप मिले और ना वर्षाजल! ना मिट्टी के साथ रहें और ना ही खुली हवा के साथ! तो फिर कब कौन सा फफूंद हमारे जीवन के आ घेरता है, हमें पता ही नहीं चलता! छोड़ दो बच्चों को प्रकृति के साथ, कुछ पल तो उन्हें दे दो कि वे स्वतंत्र होकर सूरज के प्रकाश को ढूंढ सकें। उनकी हड्डियां मजबूत होंगी तो वह लड़ सकेंगे हर  रोग से नहीं तो फिर कृत्रिम विटामिन डी3 खाकर काम चलाना पड़ेगा। सीताफल की तरह कृत्रिमता से पक तो जाएंगे लेकिन अपनी सुरक्षा कितनी कर पाएंगे पता नहीं!

Wednesday, July 8, 2020

मैं अभिव्यक्ति हूँ


जी हाँ मैं अभिव्यक्ति हूँ। अपने अन्दर छिपे हुए भावों को प्रत्यक्ष करने का माध्यम। न जाने कितने प्रकार हैं मेरे! कितने भावों से भरी हूँ मैं!
मैं प्रेम को बाहर निकालती हूँ, मैं आक्रोश को बाहर निकालती हूँ, मैं लोभ को बाहर धकेलती हूँ, मैं विरक्ति को बाहर प्रकट करती हूँ, मैं अहंकार को सार्वजनिक करती हूँ, मैं स्वाभिमान को फूलों की महक के साथ जिन्दा करती हूँ। मैं मेरे अन्दर की महक हूँ, मैं मेरे अन्दर की दुर्गन्ध हूँ, मैं कायरता हूँ, मैं ही साहस हूँ, मैं ही घृणा हूँ और मैं ही आसक्ति हूँ। न जाने मेरे कितने प्रकार है? 64 कलाओं की तरह मेरे 64 रूप हैं। कभी मैं शब्दों से प्रकट होती हूँ, कभी नृत्य से तो कभी गान से। कभी मैं रंगों से सजती हूँ और कभी बदरंग में भी दिखायी देती हूँ। कभी किसी वाद्य से झंकृत होती हूँ तो कभी मौन सी पसर जाती हूँ। कभी मुखर हो जाती हूँ तो कभी अपने ही अहसासों तले दबकर रह जाती हूँ। मेरी कल्पना लोग वर्तमान में करते हैं, कभी भूत में भी कर लेते हैं और कभी भविष्य में भी मुझे पा लेते हैं। मेरे पास न जाने कितनी उपमाएं हैं! मैं रोज ही नये की ओर कदम बढ़ाती हूँ।
एक कथा याद आ रही है – शंकराचार्य की कथा! शंकराचार्य बाल ब्रह्मचारी थे, उन्हें गृहस्थी का ज्ञान नहीं और ज्ञान नहीं तो अभिव्यक्ति भी नहीं! लेकिन यौन सम्बन्ध ज्ञान का विषय नहीं, यह तो शारीरिक गुण हैं, जो प्रत्येक प्राणी का आवश्यक गुण है। एक शास्त्रार्थ में उभय भारती ने प्रश्न कर लिया, पति-पत्नी के सम्बन्धों पर! बस फिर क्या था, शंकराचार्य से उत्तर देते नहीं बना। उनकी अभिव्यक्ति मौन हो गयी। शरीर के अन्दर सुगन्ध है लेकिन अभिव्यक्ति का मार्ग नहीं! क्योंकि हमने सात तालों में बन्द कर लिया है! शंकराचार्य हार की कगार पर खड़े थे लेकिन उभय भारती ने कहा कि मार्ग तलाशकर आओ। एक माह का समय मिला, शंकराचार्य ब्रह्मचारी ठहरे, मार्ग कैसे तलाशें, अनुभव कैसे लें! एक रूग्ण और मरणासन्न राजा की काया में प्रवेश किया और अभिव्यक्ति के मार्ग को प्रशस्त किया। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि अभिव्यक्ति नहीं है तो आप ज्ञान शून्य ही कहलाएंगे और अभिव्यक्ति है तो ज्ञानवान! सृष्टि में न जाने कितने प्रकार के जीव हैं, कहते हैं कि कोई एकेन्द्रीय है तो कोई दो-इन्द्रीय तो कोई तीन, कोई चार और कोई पाँच। सभी में अभिवयक्ति की क्षमता है। मनुष्य  पाँच-इन्द्रीय वाला प्राणी है तो उसके पास नाना  प्रकार की अभिव्यक्ति के साधन हैं। लेकिन यदि मनुष्य भी अपनी अभिव्यक्ति ना कर सके तो उसमें और एकेन्द्रीय प्राणी में कोई अन्तर नहीं रह जाएगा। ऐसे प्राणी केवल भोग करते हैं, अभिव्यक्ति नहीं होते। इसलिये संसार में इन्हें भोगवादी कहा जाता है। मनुष्य चूंकि कर्म करता है, स्वयं को अभिव्यक्त करता है इसलिये वह कर्मवादी कहलाता है।
सभी कुछ अभिव्यक्ति में ही निहीत है। पर्वत ने स्वयं को अभिव्यक्त कर दिया तो रत्न निकल आते हैं, सागर ने अभिव्यक्त किया तो अमृत और विष दोनों ही निकल आते हैं। नदी ने अभिव्यक्त किया तो पृथ्वी के साथ मिलकर दुनिया क लिये धान पैदा कर देती है। मनुष्य अभिव्यक्त होने लगता है तब सारा ही ज्ञान-विज्ञान-कला प्रगट होने लगती है। कहाँ मनुष्य प्रकृति के बीच खड़ा था और कहाँ मनुष्य ज्ञान-विज्ञान-कला को अभिव्यक्त करने के बाद अपने ही बनाए स्वर्ग में खड़ा है! अब जन्नत की कल्पना की जरूरत नहीं, मनुष्य ने धरती पर ही जन्नत बना ली है, इसे चाहे जन्नत कह लो, इसे चाह स्वर्ग कह लो और इसे चाहे हैवन कह लो। बस सारा ही अभिव्यक्ति का खेल है। जितने हम अभिव्यक्त होते जाएंगे उतना ही नवीन संसार रचते जाएंगे। हमारी आँखों में उतने ही सपने बड़े होते जाएंगे, हमारी कल्पना की दुनिया विशाल होती जाएगी।
इसलिये हमेशा मन को कहते रहिए कि मैं अभिव्यक्ति हूँ, बिना अभिव्यक्ति मैं सूक्ष्म प्राणी समान हूँ। इस धरती पर ऐसे प्राणी भी हैं जो जन्म लेते हैं, जन्म लेते ही शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करते हैं, नवीन जीव को जन्म देते हैं और फिर उनका जीवन समाप्त हो जाता है। लेकिन हम मनुष्य हैं, हम में अपार ऊर्जा है, हम धरती पर परिवर्तन करने में सक्षम हैं और परिवर्तन के लिये निरन्तर अभिव्यक्ति करते रहिए। स्वयं को रिक्त करना फिर भरना ही कर्म है, जैसे कुआं खुद को जितना रिक्त करता है, उतना ही जल वापस भर लेता है। जिस के पास भी कला है, वह निरन्तर झरता रहता है, उसके अन्दर प्रवाह भरा है, वह मार्ग तलाशता है और जैसे ही उचित मार्ग मिलता है, वह निर्झरणी बन जाता है।


Tuesday, June 16, 2020

पीपल की जड़ें

हमारी सामाजिक मान्यताएँ पीपल के पेड़ के समान होती हैं, पेड़ चाहे सूख गया हो लेकिन उसकी जड़ें बहुत गहराई तक फैली होती हैं। वे किसी हवेली के पुराने खण्डहर में से भी फूट जाती हैं। छोटे शहर की मानसिकता सामाजिक ताने-बाने में गुथी रहती हैं, हम कई बार महानगरों में पहुँचकर वहाँ की चाल से चलने लगते हैं लेकिन हमारी मान्यताओं वाले पीपल के पेड़ की जड़ हवेली के खण्डहर में से फूट जाती हैं।
हमारे समाज में विवाह सात जन्मों का बन्धन है लेकिन जब कोई विवाह को ही नकारता हुआ, खुल्लम खुल्ला प्यार करेंगे हम दोनों की तर्ज पर लिविंग रिलेशन में रहने लगे तब वह पीपल की जड़ न जाने कहाँ-कहाँ से फूट पड़ती है। मानसिकता साथ नहीं देती और तू तेरे रास्ते और मैं मेरे, कहकर अलग हो जाते है।
मानसिक बैलेंस को बनाकर रखना एक चुनौती है। जैसे ही अनैतिक कदम पड़े और हमारी मान्यताएँ हमें आगाह करने लगती हैं, हम नहीं मानते और कब संतुलन गड़बड़ हो जाता है, पता ही नहीं चलता। जहां भी सामाजिक मान्यताओं के पेड़ सुदृढ़ हैं और उन्हीं के वारिस पेड़ को काटने का प्रयास करते हैं तब पेड़ की जड़ हवेली से भी फूटने लगती है। विशाल हवेली जर्जर होने लगती है। मानसिक संतुलन अवसाद की स्थिति में आ जाता है।
बॉलीवुड ऐसी जगह है जहाँ सामाजिक मान्यताओं की धज्जियाँ उड़ा दी गयी हैं। कहते हैं कि कलाकार नैतिक होता है इसलिये फक्कड़ होता है लेकिन जब कलाकार अनैतिकता के दलदल में धंस जाये तो कलाकार कहाँ रह जाता है! वह केवल सौदागर बन जाता है। एक तरफ उसकी मर्यादाएँ खड़ी होती हैं तो दूसरी तरफ बाज़ार! जिसके पेड़ की जड़ें जितनी गहरी और विस्तृत होती हैं वही जड़ें कहीं से भी फूट पड़ती हैं!
कलाकार और बाजार, में से एक को चुनना होगा। नैतिकता और अनैतिकता में से एक के साथ चलना होगा। सामाजिक मान्यताओं और खुलेपन में से किसी एक के दायरे में रहना होगा। नहीं तो फिर मानसिक अवसाद और स्वयं को समाप्त करने का संकल्प सामने होगा। कब पीपल के पेड़ की जड़ें हमारे अन्दर से फूट पड़ेंगी और हम बेजान हो जाएंगे, पता ही नहीं चलेगा।
#sushantsingh

रोटी

अभी कुछ साल पहले की बात है, मैं अमेरिका में थी, भोजन बना रही थी। तभी बेटे का मित्र आ गया, मैंने भोजन के लिये उसे भी बैठा दिया। वह बोला कि मैं केवल एक रोटी खाऊंगा। खैर मैंने उस दिन मिस्सी रोटी बनायी थी, तो दोनों को परोस दी। मैं मिस्सी रोटी कुछ मोटी ही बनाती हूँ और मिट्टी के तवे पर बनाना पसन्द करती हूँ। भारत से जाते समय मिट्टी का तवा मैं लेकर गया थी। अब रोटी सिकती जा रही थी और दोनों प्रेम से खाते जा रहे थे। एक रोटी खाने की बात पीछे छूट गयी थी। मैंने दोबारा आटा लगा लिया था
रोटी का स्वाद केवल भारतीय जानते हैं, बाजरे की रोटी, मिस्सी रोटी, ज्वार की रोटी, मक्की की रोटी आदि आदि। थाली में चार कटोरी लगाकर षडरस भोजन भी हम ही जानते हैं। गर्म रोटी पर चम्मच भर घी लगाना भी हम ही जानते हैं। चूल्हे के पास बैठकर गर्म खाना भी हम ही जानते हैं। रोटी का स्वाद एक तरफ और सारी दुनिया के भोजन का स्वाद दूसरी तरफ! कहीं कोई मुकाबला नहीं। जिसने गर्म रोटी खा ली वह ब्रेड नहीं खा पाता! बस शौक से या मजबूरी से खा लेता है।
रोटी में पूरा अन्न होता है जबकि ब्रेड में अन्न का अन्दरूनी भाग! मैदा और सूजी गैंहूं के छिलके उतारकर बनायी जाती है। सारे पोषक तत्व छिलके में होते हैं और हम अपने शरीर रूपी घर में शक्तिहीन व्यक्तियों को भर लेते हैं। जब दुश्मन से लड़ने का समय आता है तब ये चारों खाने चित्त हो जाते हैं। छोटा सा कीटाणु भी हमें आँख दिखाने लगता है और हम बीमार पड़ जाते हैं। हमने स्वयं को शहतूत के फल जैसा नाजुक बना लिया है।
हमने अभी देखा कि ६ फीट से ऊंचे विदेशी जवान, देखते ही देखते कोरोना की भेंट चढ़ गये और भारतीय ८० साल के बुजुर्ग बच गये। विदेशी शहतूत बन गये हैं और हम भारतीय मोटी खाल वाले तरबूज।
हमारा शरीर सैनिक छावनी है, हर पल युद्ध होता है। जिसमें लड़ने की जितनी क्षमता होती है वह जीत जाता है नहीं तो विषाणु के क़ब्ज़े में आ जाता है। जब हम मैदा और सूजी ही खाते है तो हमारे अन्दर का सैनिक शहतूत की तरह कमजोर हो जाता है लेकिन जब रोटी खाते हैं तब हमारा सैनिक तरबूज की तरह ताकतवर हो जाता है। अब हमें तय करना है कि हमें शहतूत बनना है या तरबूत! रोटी खानी है या पिजा-बर्गर-ब्रेड! कोरोना के कारण सब घर पर हैं और भारतीय रसोई में खूब रोटी बन रही है। सारे ही बच्चे रोटी चाव से खा रहे हैं। यही मौका है सिखा दीजिये उन्हें रोटी खाना। रोटी की सौंधी सुगन्ध और ताजा घी कैसे मन को तृप्त करता है, इसका आभास करा दीजिये। कोरोना जैसे विषाणु कभी हिम्मत नही करेंगे हमारे शरीर की छावनी में दस्तक देने की! बस अपने भोजन में रोटी को जगह दीजिये।

Friday, June 12, 2020

घाव है तो हँसिये

मुँह का एक छाला होता है, जिसे मेडीकल भाषा में Aphthous ulcer कहते है। मैंने इस छाले को बहुत झेला है। कारण ढूंढा तो पता लगा कि मानसिक तनाव से होता है। अब जिसने संघर्षों से ही भाग्य को गुदवाया हो, वह तनाव तो झेलेगा ही! लेकिन मुझे जैसे ही समझ आया कि यह छाला तनाव के कारण है मैंने वैसे ही हँसने के बहाने ढूँढ लिये। एक बार यह छाला हो जाए तो इसके घाव को भरने में दो सप्ताह तक लग जाए और दर्द इतना की हालत पतली कर दे।
मैंने प्रयोग किया हँसने का, अन्दर से हँसने का। बस चुटकी बजाते ही दर्द दूर। मैंने छाले से पीछा छुड़ा लिया था। लेकिन फिर भी कभी-कभी चोर रास्ते से मुझे पकड़ ही लेता है। खाना खाते समय दाँत के नीचे मुँह के अन्दर का कोई भी हिस्सा आ जाए तो समझो कि यह एपथस अल्सर बनकर ही रहेगा। अभी दो-चार दिन पहले ऐसा ही हुआ और कल तक घाव बन गया। दर्द शुरू। कोरोना ने तनाव दे रखा था, हँसने का बहाना ही नहीं था लेकिन कुछ फ़ेसबुक से, कुछ बातों से हँसने के बहाने ढूँढ ही लिये। बस फिर क्या था, लगभग आधे दिन कोशिश रही कि हंसते रहें और सफलता हाथ लग गयी। आज दर्द से छुट्टी!
अब सोचो जब हँसने से एक घाव भरता है तो अन्दर के कितने घाव भी भरते ही होंगे। लेकिन हंसना दिखावे का नहीं होना चाहिये, अन्दर तक के हार्मोन सक्रिय होने चाहिये। इसलिये गुनगुनाते रहिये, हंसते रहिये। अन्दर से खुश रहिये। कैसे भी घाव हों, भर ही जाएँगे।

Thursday, June 4, 2020

शाबाश अमेरिकी पुलिस

अमेरिकी पुलिस का एक चित्र कल वायरल हो रहा था- घुटने पर बैठकर क्षमायाचना करते हुए। यह चित्र पुलिस का धैर्य और समन्वय प्रदर्शित करता है। सत्ता का मद और शक्ति का प्रदर्शन कभी भी शान्ति स्थापित नहीं कर सकता। श्रेष्ठ शासक हमेशा धैर्यवान होता है, वह प्रत्येक परिस्थिति में समन्वय बैठाकर चलता है। कल पुलिस का अधिकारी बोल रहा था कि आप देश से प्यार करने वाले लोग हैं, सभी से प्यार करने वाले लोग हैं, शान्ति पूर्वक प्रदर्शन करना आपका अधिकार है लेकिन दंगे करना आप भी पसन्द नहीं करेंगे।
मुझे मोदीजी याद आ गये, हमेशा सकारात्मक बोलने वाले, दूसरों को श्रेय देने वाले और कठिन परिस्थिति में भी धैर्य नहीं खोने वाले। असल में हम अपने स्वभाव के अनुरूप सरकार से व्यवहार चाहते हैं। हमारा स्वभाव है कि हम बच्चे को थप्पड़ मारकर सुधारना चाहते हैं तो सभी से यहा उम्मीद रखते हैं। यदि हम बच्चे को प्यार से समझाना चाहते हैं तो सरकारों से भी प्यार की भाषा की उम्मीद रखते है। सत्ताधीश अपने स्वभाव के अनुरूप चलता है और विजय प्राप्त करता है। उन्हें धैर्य का मार्ग ही अपनाना होता है लेकिन जनता चाहती है कि सत्ता शक्ति का प्रदर्शन करे। बस हम हमारे प्रिय नेता की भी आलोचना करने लगते हैं। जनता के पास केवल एक पक्ष होता है लेकिन सरकार के पास अनेक पक्ष होते हैं और सभी को ध्यान में रखते हुए स्थिति को क़ाबू करना होता है। मुझे अमेरिकी पुलिस का व्यवहार बहुत अच्छा लगा कि वे अपने ही लोगों के सामने झुके और हिंसा को रोक लिया। नहीं तो वे गोलीबारी भी कर सकते थे और फिर नफ़रत का खेल हमेशा के लिये स्थाई हो जाता। ट्रम्प भी इसी धैर्य के लिये मोदी का प्रशंसक है और वह प्रत्येक प्लेटफ़ॉर्म पर मोदी का साथ चाहता है। शाबाश अमेरिकी पुलिस।

नफ़रत सौंप रहे हैं हम

अमेरिका में नफ़रत का बाज़ार गर्म है। रंगभेद की नफ़रत को न जाने कौन-कौन सी ताक़तें हवा दे रही हैं! एक सिपाही आम नागरिक को पैर तले कुचल देता है और आम नागरिक अमेरिका में आग लगा देता है। यह दो रंगों के बीच बोयी गयी नफ़रत है जो सैंकड़ों सालों से पनप रही है। हम गौर वर्ण है तो काले को हेय मानेंगे और काले हैं तो संगठित होकर आक्रमण करेंगे! यह नफ़रत हमारे अन्दर बस गयी है। यहाँ तक की स्त्री- पुरुष के बीच भी युगल भाव के स्थान पर नफ़रत ने जगह बना ली है। रिश्तों का प्रेम कहीं छिप गया है। हम पीढ़ी दर पीढ़ी रिश्तों को दूसरी पीढ़ी को सौंपते जाते हैं लेकिन अब नफ़रत सौंप रहे हैं। कहाँ हमने वसुधैव कुटुम्बकम् की कल्पना की थी और कहाँ अब एक पीढ़ी तक ही परिवार सिमट गया है। बस दूसरी पीढ़ी को तो हम नफ़रत देकर जा रहे है। हम ही श्रेष्ठ हैं यह अहंकार हमें दूसरे को सम्मान और प्रेम देने ही नहीं देता, फिर प्रेम के अभाव में ग़ुस्सा और नफ़रत पनपने लगती है।
अमेरिका में जो हो रहा है, वह सारी दुनिया का सत्य है। किसी दूसरे की नफ़रत भी अपनी बन जाती है और फिर सभी अपनी-अपनी नफ़रतों से घिरने लगते हैं। कहीं ज्वालामुखी फूट पड़ता है तो कहीं भूकंप के झटके महसूस किये जाते हैं। अकेले व्यक्ति से लेकर देशों तक की नफ़रत आज देखी जा सकती है, व्यक्ति बस मौक़े की तलाश में है कि कब मौक़ा मिले और मैं आग लगा दूँ। भारत भी ज्वालामुखी के ढेर पर बैठा है, बस एक चिंगारी की देर है। अमेरिका की आग भारत की ओर कब मुँह मोड़ लेगी कुछ कहा नहीं जा सकता क्योंकि यहाँ तो हर व्यक्ति में आग है। हम इंच-इंच बँटे हुए हैं तो इंच-इंच बिखरने को तैयार हैं। एक तरफ़ कोरोना हमें निगल रहा है तो दूसरी तरफ़ हमारी नफ़रत हमें कोरोना का ग्रास बनाने को उकसा रही है। समय हमें देख रहा है और हम समय को देख रहे हैं। बस इन्तज़ार ही शेष है।

Thursday, May 21, 2020

भीड़ से अलग होना ही असाधारण है


भीड़ में खड़ा हर व्यक्ति साधारण है लेकिन मंच पर बैठा व्यक्ति असाधारण हो जाता है। साधारण व्यक्ति को हम नहीं जानना चाहते लेकिन असाधारण व्यक्ति को हम समझना चाहते हैं, उसे जानना चाहते हैं। कल मेरे हाथ में "अग्नि की उड़ान" पुस्तक थी। पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम की जीवनी पर लिखी पुस्तक। स्मपूर्ण पुस्तक पढ़ लीजिए आप को यही लगेगा कि एक साधारण व्यक्ति की कहानी है। हम में से हर उस व्यक्ति की कहानी है जो शिक्षित होना चाहता है, कुछ बनना चाहता है! कुछ भी अनोखा नहीं है। फिर कैसे कलाम असाधारण बन गये? दुनिया में दो तरह के लोग हैं, एक मंच पर बैठे हैं और दूसरे मंच से सामने है। मंच पर जो हैं वे नेतृत्व कर रहे हैं और वे सार्वजनिक जीवन जी रहे हैं, मंच के सामने वाले नेपथ्य में जीवन जी रहे हैं, बस। जब हमारा सार्वजनिक जीवन प्रारम्भ होता है तब हमें लोग जानना चाहते हैं, वे समझना चाहते हैं कि इसमें ऐसा क्या है, जो यह इस मंच तक जा पहुँचा! कई बार लगता है कि यह तो हम जैसा ही है, फिर मंच तक कैसे पहुँच गया? लोग कह उठते हैं कि भाग्य है भाई!
हो सकता है भाग्य हो लेकिन साधारण और असाधारण व्यक्तित्व में बस यही अन्तर होता है कि वह नेतृत्व के योग्य ठहराया जाता है और फिर उसके व्यक्तित्व की परते उघड़ने लगती है जब लगता है कि कुछ तो है! किसी भी क्षेत्र का भीड़ से अलग व्यक्ति हमेशा जानने योग्य रहता है। लोग उसकी जड़े तक खोद डालते हैं और फिर कलाम जैसे व्यक्ति असाधारण बन जाते हैं। सोचिये यदि कलाम राष्ट्रपति नहीं बनते तो क्या वे इतने असाधारण होते? वे अपने क्षेत्र में असाधारण होते लेकिन आमजन उनके जीवन में रुचि नहीं लेते। एक लड़का छोटे से गाँव में, गरीब परिवार में जन्म लेता है, पढ़ता है और वैज्ञानिक बन जाता है। सभी की कहानी तो ऐसी ही है। भीड़ से अलग हटने में उसने क्या प्रयास किये बस यही मूल्यवान है। कलाम ने हर कदम पर स्वयं को भीड़ के अलग रखा, वे सभी की दृष्टि में आते रहे। अपने काम की धुन के कारण, अपनी सोच के कारण या किसी ओर बात के कारण। बस जैसे ही हम भीड़ से अलग दिखने लगते हैं, वैसे ही स्वयं मंच पर पहुँच जाते हैं। साधारण से असाधारण बन जाते हैं और लोग हमें जानने की चाह करने लगते हैं।
कुछ लोग कहते सुने जाते हैं कि क्या है इस व्यक्तित्व में? हम भी ऐसे ही हैं, इससे ज्यादा शिक्षित हैं लेकिन यह क्यों नेतृत्व कर रहा है और मैं क्यों नहीं? वे समझ नहीं पाते कि भीड़ का हिस्सा बनकर रहना और भीड़ से अलग बन जाना ही अन्तर है! कलाम को पढ़ते हुए मुझे यही लगा कि जो भीड़ से अलग दिखने लगता है वह असाधारण बन जाता है और जो भीड़ में खो जाता है वह साधारण बनकर रह जाता है। जब भीड़ से पृथक खड़ा व्यक्ति सार्वजनिक जीवन के योग्य बन जाता है तब उसे असाधारण व्यक्ति मानकर उसे समझने की ललक पैदा होती है। आप या मैं सभी एक पृष्ठभूमि से आए हैं, सभी भीड़ का अंग हैं, बस कोशिश करिये कि भीड़ से पृथक होकर अपना अलग व्यक्तित्व बना सकें। इसलिये वैज्ञानिक कलाम और राष्ट्रपति कलाम में बस यही अन्तर है। किसी भी ऐसे ही व्यक्तित्व की आलोचना करने से पूर्व यह देख लीजिये की वह कहाँ खड़ा है! मैंने जब अपने पिता पर पुस्तक लिखी तो परिवार के एक सदस्य ने कहा कि एक साधारण व्यक्ति पर पुस्तक? मैंने तब समझा कि भीड़ से अलग खड़ा व्यक्ति ही असाधारण बन जाता है और उन्हीं पर लिखने का मन करता है। जब कलाम को  पढ़ा तो मैंने जाना कि साधारण और असाधारण में बस यही अन्तर  होता है।

Sunday, May 17, 2020

मन की किवड़ियां खोल


समय काटे से कट नहीं रहा है, एक अनजान भय भी सभी के सर पर मंडरा रहा है, लोग अपनी जमापूंजी का बहीखाता लेकर बैठ गये हैं। सोना-चाँदी, बैंक डिपाजिट, रोकड़ा, जमीन, जायदाद सभी सम्भालने में लगे हैं। जीवन में लाभ-हानि का हिसाब लगा रहे हैं। अपनी शेष आयु को भी हिसाब में सम्मिलित कर लिया है। कितना उपभोग कर पाएंगे और कितना शेष रह जाएगा? मैं इस आपदा काल में ही नहीं पहले से करती आयी हूँ। अपने जीवन को सुव्यवस्थित रखने का हमेशा से ही प्रयास किया है। ऐसा कोई कर्तव्य नहीं जो पूर्ण नहीं किया हो और ऐसी जीवनचर्या का साधन नहीं जिसे प्राप्त नहीं किया हो! प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में एक स्तर होता है, समाज के अनुरूप वह स्तर रहता है, उसी स्तर के अनुरूप हम श्रेष्ठ करते रहे हैं। लाभ-हानि भी बहुत हुई है फिर भी बूंद-बूंद करके घड़ा भरता ही गया। सारी आवश्यकतों की पूर्ति करने के बाद, संतानों को अच्छा जीवन देने के बाद भी घड़ा भर गया। सोचा अब इस घड़े का सदुपयोग वृद्धावस्था में होगा। लेकिन किसे मालूम था कि कोरेना काल उपस्थित हो जाएगा और दुनिया को जीवन का मर्म समझा देगा!
जीवन की आवश्यकताएं मुठ्ठीभर अर्थ से पूर्ण हो जाती हैं, शेष तो प्रतिस्पर्धा है। इस काल में प्रतिस्पर्धा समाप्त हो गयी है, विलासिता कहीं मुँह ढककर सो गयी है, बस आवश्यकताएं ही शेष हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपने घड़े को टटोल रहा है, किसी के पास एक घड़ा है, किसी के पास दो हैं या फिर किसी के पास अनगिनत है। रात-दिन हिसाब लग रहा है, सभी आश्चर्य चकित भी हैं कि इतना वैभव संचित कर लिया! फिर उम्र का गणित देखते हैं, पता लगता है कि यह तो फिसलती जा रही है! जीवन क्षणभंगुर दिखने लगा है, अब?
मेरे पास चिंतन के लिये समय हमेशा रहा है, यह समय और यह चिंतन ही मेरी पूंजी है। लोग कह रहे हैं कि अब समय बहुत मिल रहा है लेकिन मेरे पास तो पूर्व में भी बहुत समय था। जीवन के प्रत्येक कदम पर मैंने चिन्तन किया है। मैंने जीवन के सारे ही उपादानों को संतोष पूर्वक जीया है और मन को भी संतुष्ट किया है। लेकिन अब सभी लोगों को कहते सुन रही हूँ कि यह अर्थ का संचय व्यर्थ गया! यह अब किसी काम का नहीं है। इस अर्थ के कारण ही तो हमने प्रेम की जगह अहंकार को चुना था, निरन्तर हम प्रदर्शन कर रहे थे। लोग कह रहे हैं कि रिश्तों की हमने कद्र नहीं की, यहाँ तक की अपनी गृहस्थी तक सुखपूर्वक भोग नहीं पाए! केवल अर्थसंग्रह में लगे रहे और सारा दिन यायावर बनकर घर से बाहर रहे। किसी के पास एक मिनट का समय नहीं था जो अपनों को दे सके! आज समय ही समय है, पति-पत्नी के पास इतना समय है कि वह इस छोटे से काल में ही सात जन्मों का समय व्यतीत कर सकते हैं। जिस संतान के पास माता-पिता के लिये समय ही नहीं था आज वे भी क्या बात करें, यह ढूंढ रहे हैं! अभी भी लोग खेलों का सहारा ले रहे हैं, अपने मन को नहीं खोल रहे हैं। अपने जीवन के आनन्द को नहीं पा रहे हैं। कितने बेटे हैं जो माँ की गोद में लेटकर सर में तैल लगवा रहे हैं, या कितनी बेटियाँ हैं जो माँ को कुर्सी पर बैठाकर उनकी चोटी बना रही हैं। सारे ही लाड़ आज भी अधूरे से खड़े हैं। कर लो इन्हें भी पूरा कर लो, जीवन के ये पल दो क्षण के ही सही लेकिन अमृत की दो बूंद जैसे लगेंगे। घड़े की ओर मत देखो वह तो इतिहास में किसी अन्य के काम आएगा लेकिन अपना सुख, अपना लाड़-प्यार अपने लिये ही है, इसे प्राप्त कर सको तो कर लो। बतिया लो अपनों से, जो आपको लाड़ दे सके, जो आपके अस्तित्व को स्वीकार कर सके। समय व्यर्थ मत करें, जहाँ विष है उसे जीवन से दूर रखे, बस अमृत की दो बूंद की तलाश करिये।

Friday, May 8, 2020

डर कम होना चाहिए

दो खबरे एक साथ आयी, एक भाई ने बहन के कोरोना होने पर छत से छलांग लगायी और एक पोते ने दादी के कोरोना पोजेटिव होने पर फाँसी का फन्दा लगा लिया! डर हमारे रोम-रोम में समा रहा है, यह डर मृत्यु से अधिक दुर्दशा का डर है। कल ही एक खबर और आयी कि कोरोना पोजेटिव की मृत्यु हो गयी। उसे सीधे ही श्मशान ले गये लेकिन उसके बेटे ने हाथ लगाने की हिम्मत नहीं जुटायी! मृत्यु का यह सत्य सभी को दिखायी देने लगा है, घर से निकलते समय व्यक्ति इतना डरा रहता है कि आधी जंग तो वह वहीं हार जाता है। प्रशासन को थोड़ा संयम दिखाना चाहिये और समाज यदि इस देश में कहीं किस कोने में दुबका है तो उसे धीरज बंधाने के लिये आगे आना चाहिये।
पूरे देश में जो अफरा-तफरी मची है, वह भी इसी डर से मची है कि कब कौन किस शहर में गुमनाम सी मौत मर जाएंगे! कम से कम अपने घर तो पहुँच जाएं! हिन्दू दर्शन में मृत्यु को संस्कार माना गया है, अन्तिम संस्कार। मृत्यु को भी हमने जीवन की तरह महत्व दिया है इसलिये सम्मानपूर्वक संस्कार का महत्व है। लेकिन समाज का कोई भी अंग ऐसे परिवारों को ढांढस बंधाने आगे नहीं आ रहा है! व्यक्ति का डर समाप्त होना चाहिये, कि वह गुमनाम सी जिन्दगी अस्पताल में जीने को और मरने को मजबूर ना हो। उसे लगना चाहिये कि उसका परिवार और उसका समाज उसके साथ खड़ा है। संक्रमण को देखते हुऐ चाहे रोगी को पास ना जाएं लेकिन रोगी को लगना चाहिये की उसके अपने उसके पास हैं। यह काल ऐसा है कि जब अपने भी दूसरे शहरों में या विदेश में हैं तब समाज को और अधिक ध्यान देने की जरूरत हैं। समाज के लोगों के, लोगों के पास संदेश पहुँचने चाहिये कि कुशलता नहीं होने पर सूचित करें, किसी वस्तु की आवश्यकता होने पर सूचित करें। नागरिकों की सूची बनाकर कुशलक्षेम पूछना चाहिये। प्रत्येक व्यक्ति को लगना चाहिये कि वह अकेला नहीं है, उसके साथ समाज और देश खड़ा है। भारत में सरकार तो आज विश्वास दिलाने में सफल हो रही है लेकिन समाज अभी आगे नहीं आया है। सामाजिक नेतृत्व को समाज का संरक्षक बनकर आगे आना ही होगा नहीं तो यह डर बढ़ता ही जाएगा। बस डर कम होना चाहिये।

Monday, April 20, 2020

दोनों जीवन देख लिये


पुराने जमाने में विलासिता का प्रदर्शन दो जगह होता था – एक राजमहल तो दूसरा किसी गणिका का कोठा। हर आदमी लालायित रहता था कि कैसे भी हो एक बार राजमहल देख लिया जाए! इसी प्रकार जैसे ही जवानी की दस्तक हुई नहीं कि मर्द सोचने लगता था कि इस गणिका के कोठे पर नृत्य देखने तो जाना है! वक्त बदला और विलासिता ने पैर पसारे। विलासिता के दर्शन सभी के लिये सुलभ होने लगे बस पैसे फेंको और तमाशा देखो।
एक जमाना था जब भोजन सादगी लिये होता था लेकिन भोजन में भी राजमहलों जैसी विलासिता ने घर करना शुरू किया। आम आदमी के पास करने को दो ही कार्य रह गये, विलासिता पूर्ण वैभव को देखना और ऐसे जीवन का उपभोग करना। पर्यटन इसका सबसे सुन्दर साधन बन गया। एक सामान्य व्यक्ति से मैंने एक बार  पूछ लिया कि बहुत दिनों से दिखायी नहीं दिये, कहाँ थे? वे बोले कि हम साल में दो बार विदेश यात्रा पर जाते हैं, एक लम्बी दूरी की और दूसरी छोटी दूरी की। हमने सारा संसार देख लिया है, अच्छे से अच्छे होटल देख लिये हैं और मंहगे से मंहगा खाना खा लिया है।
मैं अपने शहर के जीवन पर नजर घुमाने लगी, देखा कि शनिवार-रविवार को कोई भी सभागार और होटल-रेस्ट्रा खाली नहीं है, सभी में कुछ ना कुछ कार्यक्रम चल रहे हैं। वहाँ भी अच्छे भोजन के लिये जा रहे हैं और मंचों पर मिलने वाले फूलों के हार का भी लालच है। कहीं पिकनिक है, कहीं किट्टी है, कही जन्मदिन मन रहा है तो कहीं विवाह की वर्षगाँठ। शहर में विवाह समारोह की तो धूम मची है, औसतन आदमी साल में 30-40 दिन तो समारोह में चले ही जाता है। याने की हर व्यक्ति विलासिता में डूब जाना चाहता है।
ऐसे जीवन के चलते अचानक ही हो गया लॉकडाउन। सब कुछ बन्द। विलासिता के दर्शन बन्द, पकवानों की वजह बन्द! एक तरफ डर पसर रहा था, जीवन के आनन्द छिन रहे थे तो दूसरी तरफ नई रोशनी भी हो रही थी। घर की मुंडेर पर चिड़िया चहकने लगी थी, धूल से पटा आंगन साफ रहने लगा था। सड़क के पार वाले घर से भी आवाजें सुनायी दे रही थीं। घर-घर में सादगीपूर्ण भोजन बन रहा था, सभी के पेट स्वस्थ हो रहे थे। कपड़ों से अटी पड़ी अल्मारी की ओर सुध ही नहीं थी! पैसे भी कृपणता से घर छोड़ रहे थे। बच्चों का जिद करना भी कम से कम होता जा रहा था।
पहले हम भाग रहे थे, अब घर में शान्त से बैठे हैं। विलासिता देखते-देखते हमने घर को भी अजायबघर बना डाला था। सादी दाल-रोटी खाना पुरातनपंथी लगती थी और विदेशी खाना हमारे लिये फैशन बन गया था। दुनिया की दौड़ में हम शामिल होकर अपना चैन खो बैठे थे। बस दौड़ रहे थे, दौड़ रहे थे। अपना स्वाद भूल गये थे, पराये स्वाद के पीछे पागल हो रहे थे! शाम 5 बजे बाद अब घर बसने लगते हैं, मर्द घर में आने लगते हैं, रात 9 बजे तक सारे घरों में अंधेरा होने लगता है। सड़कें खामोश हो जाती हैं। झिंगुर की आवाज भी सुनायी दे जाती है। लगता है जीवन का परम सुख पा लिया हो।  
विलासिता इतनी भी नहीं पैर पसारे कि कोरोना जैसा विषाणु हमारे अन्दर ही प्रवेश कर लें और वहीं बस जाएं! हम दौड़ना भूलकर घर में कैद हो जाएं! जीवन ने करवट बदली है, दोनों जीवन हमने देख लिये हैं, बस कौन सा कितना अच्छा है, यह आकलन हमें करना है। विलासिता के लिये कितनी दौड़ लगानी है और अपने घर के लिये कितनी हद बनानी है, यह निर्णय हम सबका है।

Friday, April 17, 2020

आते रहा करो


निंदक टाइप के लोग बड़े कमाल के होते हैं, किसी की बाल की खाल निकालनी हो तो ये ही याद आते हैं। क्या मजाल ऐसे बन्दे किसी की तारीफ कर दें, कोई ना कोई अवगुण निकाल ही लेते हैं। आप कहेंगे कि इसमें क्या कमाल है, मैं कहती हूँ की कमाल ही कमाल है। तभी तो कवि ने भी कह दिया कि निंदक नियरे राखिय़े। आंगन में अच्छी सी कुटिया बनाकर इन्हें जगह देनी चाहिये। अब कल की ही बात ले लीजिए, बन्दा लाकडाउन के आंदोलन की निंदा करके चले गया। एण्टी वायरस बनाने में जितना दिमाग चाहिये उतना ही दिमाग निंदा करने में लगता है, ऐसे ही नहीं कपिल सिब्बल जैसे लोग रोज उग आते हैं और लोग इन्हें हाथों हाथ लेते हैं। किसी के परचक्खे उड़ता देख आनन्द आता है लोगों को।
लेकिन बन्दा सच्चा होना चाहिये, यह नहीं की किसी ने कागज पर लिख दिया, थोड़ी मशक्कत करा ली और बन्दा आकर बक गया। ऐसे नहीं निंदक बन जाओगे प्यारे लाल। खुद का दिमाग  होना चाहिये तब जाकर अंगद की तरह पैर जमा पाओंगे! माना कि तुम तुरप के पत्ते के समान बोल गये कि लोकडाउन दवा नहीं है, लेकिन दवा से कम भी नहीं है! छूत की बीमारी को संक्रमण से बचा लो तो दवा जैसा ही काम करती है! ढूंढ-ढूंढकर लाते तो बहुत हो लेकिन खुद का दिमाग नहीं होने से सारा गुड़-गोबर हो जाता है। मेरे हीरालाल खुद को खुरचो, तब जाकर हीरे में चमक आएगी। कब तक कॉपी-पेस्ट करके काम चलाते रहोंगे! नेता बनना है तो खुद का ही दिमाग चाहिये नहीं तो ना घोड़ा और ना गधा, कुछ नहीं बन पाओगे।
खुद को कभी कन्हैया लाल बना लेते हो, कभी कजरी जैसा तो कभी अहमद पटेल की नकल करते हो, लेकिन सारे ही जतन बेकार हो जाते हैं क्योंकि ऑरिजिनल नहीं हैं ना! तुम ने कभी भी सुना है कि कोई भी व्यक्ति यह कह रहा हो कि मैं गाँधी परिवार के कुल दीपक जैसा बनना चाहता हूँ! बस तुम ही लगे पड़े हो, लोगों के पीछे! कभी यह बन जाऊँ, कभी वह बन जाऊँ! जब तक ऑरिजनल निंदक नहीं बनोंगे तब तक तुम्हारा कुछ नहीं होने का। कुछ और कुटिल लोगों के साथ रहो, उनको अपना गुरु मानो और धार पैनी करो। नकल से तो कुछ नहीं मिलने वाला। प्रेस के सामने आओ और मनोरंजन करके चले जाओ, बस यही काम रह गया है तुम्हारा। अब तो तुम्हारे पास माँ का बेटा होने के अतिरिक्त कोई आधार-कार्ड भी नहीं है, फिर भी तुम मनोरंजन करने चले आते हों और हमारी  प्रतिभा को भी लिखने को उकसा जाते हो, इसके लिये तो आभार बनता ही है। कब से सोशल मीडिया खामोश सी थी, तुम्हारे आने से हलचल तो हुई। आते रहा करो। निंदक तो नहीं बन सकते, हाँ वैसे ही आ जाया करो, कुछ तो मसाला मिल ही जाता है।

Thursday, April 16, 2020

बाहर आदमी है

न जाने कब से एक बात सुनी जा रही है - महिला को कहा जा रहा है कि अन्दर रहो, बाहर आदमी है! रात को बाहर मत आना क्योंकि बाहर आदमी है! दिन को भी मुँह छिपाकर आना क्योंकि बाहर आदमी है! अपने शरीर की अंगुली भी मत दिखाना क्योंकि बाहर आदमी है! चारों तरफ़ से कपड़े से लपेट दिया, घर में ताला लगा दिया क्योंकि बाहर आदमी है!
तभी अचानक एक दिन ऐसा हुआ कि आदमी को कहा गया घर में रहें , बाहर वायरस है, ख़तरा है। आदमी बिलबिला गया। मैं आदमी, भला मुझे किसका ख़तरा! मैं कैसे रहूँ घर की चारदीवारी में क़ैद! आदमी से भी कहा गया कि छूना मत, किसी को भी नहीं! मुँह ढककर रहना, वायरस कैसे भी, कहीं से भी शरीर में घुस सकता है! आदमी का बिलबिलाना वाजिब था। आदमी कहने लगा कि मैं इस धरती का भगवान और मुझे घर के अन्दर क़ैद करने वाला कौन? वह रोज़ बहाने ढूँढने लगा, बाहर निकलने के। कैसे भी वह बताना चाहता था कि मैं आदमी हूँ!
सदियों से महिला को घर में क़ैद रखा हुआ है लेकिन अब आदमी से यह व्यवहार बर्दाश्त नहीं हो रहा! मरता हूँ तो मर जाऊँगा लेकिन मुझे मुक्ति चाहिये, मुझे लाचार बनकर नहीं रहना। कभी भीड़ बनाकर निकल पड़ता है, कभी तमाशबीन बनकर और कभी आतंकी बनकर।
आदमी कह रहा है कि मैंने घर महिला के लिये बनाया था, मैं तो बाहर का प्राणी हूँ। मैं घर में नहीं रह सकता! निकालो मुझे बाहर निकालो! महिला कह रही है, देख घर के आनन्द देख! देख पर्दे के पीछे का सुकून देख! कैसे कपड़े से चारों तरफ़ से लिपट कर रहा जाता है, ज़रा देख तो ले! कुछ दिन तो मेरा जीवन जी कर देख!

Friday, March 27, 2020

बच्चों सुनाती हूँ तुमको कहानी


जब भी प्रश्न सामने खड़े हो जाते हैं हम अक्सर भूतकाल में चले जाते हैं, सोचने लगते हैं कि हमने पहले क्या किया था! हमारे बचपन में ना टीवी था, ना बाहर घूमने की इतनी आजादी! बस था केवल स्कूल और घर या फिर मौहल्ला। स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रम होते ही रहते थे लेकिन उनमें हिस्सा लेने की कूवत हम में नहीं थी। स्कूल में लड़कियाँ नाच रही होती और झूम-झूम कर गा रही होती कि म्हारी हथेलियाँ रे बीच छाला पड़ गया म्हारा मारूजी...... । हमारे मन में बस जाता वह गीत, कभी लड़कियाँ पेरोड़ी बनाकर कव्वाली करती तो कभी नाटक भी होता। हम सब देखते और हमारा मन भी कुलांचे मारने लगता। हम घर आते, मौहल्ले की सखी-सहेलियों से लेकर लडकों तक को एकत्र करते और फिर शुरू होता नृत्य, परोड़ी बनाना और नाटक खेलना। कभी सारे ही मौहल्ले को एकत्र कर लेते और फिर मंचन होता सारी ही कलाओं का।
हम देखते थे कि घर-घर में कहानियाँ सुनायी जाती थी, कहीं राजा-रानी थे, कहीं राम-सीता थे, कहीं श्रवण कुमार थे, कहीं चोर-सिपाही थे। ऐसे ही पौराणिक कथानकों से भरे होते थे सारे ही घर। महिलाएं भी हर बात में गीत गाती, मंगोड़ी बनानी हो तो सारा मौहल्ला एकत्र होता, पापड़ बनाने हो तो भी एकत्र होता और फिर गीत गाएं जाते। कभी भी घर से बाहर जाने का मन ही नहीं करता था, समय ही नहीं था कुछ और सोचने का। हमने कभी नहीं कहा कि हम बोर हो रहे हैं, शायद तब तक यह शब्द चलन में ही नहीं आया था!
दुनिया संकट के दौर में है, बच्चे घर में धमाचौकड़ी कर रहे हैं लेकिन उन्हें रास्ता कोई नहीं दिखा रहा है। मैं नातिन को कई  बार सिखाने की कोशिश करती हूँ कि तुम्हारी कहानी से नाटक तैयार करते हैं और तुम सब मिलकर नाटक खेलो, लेकिन लड़कियाँ रुचि नहीं लेती, पोता तो फिर कहाँ से रुचि लेगा। लेकिन अभी समय पर्याप्त है, हम उनमें रुचि जागृत कर सकते हैं। बच्चों की ऑनलाइन क्लासेस चालू हो चुकी है, मैंने कहने की कोशिश की कि दोनों माता-पिता अलग-अलग विषय के टीचर बन जाओ, अलग-अलग क्लासरूम लो और अलग-अलग ड्रेस पहनकर फन तैयार करो, बच्चों का मन लगेगा। उनकी ही किताब से कहानी लेकर नाटक तैयार कराओ, फिर मंचन करो।
कभी बागवानी का पाठ पढ़ाओ तो कभी रसोई में जा पहुँचों। जीवन से जुड़ी हर छोटी-बड़ी बात से बच्चों को रूबरू कराओ। हर बात कौतुक जैसी होनी चाहिये, तभी बच्चे आनन्द लेंगे। जीवन का नया रूप या पुराना रूप वापस लाने की जरूरत है क्योंकि मोबाइल और टीवी की दुनिया से बाहर निकलकर बिना बोर हुए नया कुछ करने का समय है। अपने अन्दर के कलाकार को बाहर निकलने की जरूरत है फिर लगेगा कि घर ही सबसे प्यारा है। बचपन का यह पाठ और ये दिन हमेशा यादों में रहेंगे और फिर कभी उनके जमाने में कोई विपत्ति आयी तो वे अपने बच्चों से कहेंगे कि आओ हम बताते हैं कि कैसे दिन को आनन्ददायक बनाएं। तब बोर होने जैसे शब्द सुनायी नहीं देंगे।

Thursday, March 26, 2020

लौकी-टिण्डे-तौरई से शिकायत नहीं!


आभास हो रहा है कि सभी को घर का भोजन रास आ रहा है! लौकी-टिण्डे-तौरई पर गाज नहीं गिर रही है! मंगोड़ी, कढ़ी आदि की पैरवी करते लोग घूम रहे हैं। रायता तो खूब फैला ही रहे हैं, नहीं-नहीं बना रहे हैं! ना चाइनीज याद आ रहा है और ना इटालियन याद आ रहा है, बस ढूंढ-ढूंढकर
भारतीय भोजन याद आ रहा है। नानी-दादी के जमाने के व्यंजन याद किये जा रहे हैं। रसोई आबाद हो रही है और बाजार बन्द हो रहे हैं। बाजार का स्वाद जीभ को याद भी आ रहा होगा लेकिन फिर ध्यान आता है कि नहीं घर की सिवैया ही स्वादिष्ट हैं।
रोटी अब मालपुएं जैसी लग रही है, बल्कि यूँ कहूँ कि रोटी पिजा से बेहतर स्वाद दे रही है। बाजरे की रोटी भी याद आ रही है, मक्की की, ज्वार की, मिस्सी की, सभी मुँह में पानी ला रही है। कोई भी बच्चा तक चूँ नहीं बोल रहा है! हवा में गूँज हो रही है कि भोजन मिल रहा है, खा लो, क्या पता कल यह भी मिले या नहीं। इस चुप सी गूँज को भी लोग सुन पा रहे हैं। अब कोई नहीं कह रहा कि सब्जी में नमक कम है और मिर्ची ज्यादा पड़ गयी है, बस स्वाद है इसी का स्वर सुन रहे हैं।
कल तक कुछ पति सास की भूमिका में थे, बेचारी सास तो पुरानी बात हो चली थी लेकिन उनकी जगह पतियों ने ले ली थी, अब वे भी जिन्न की तरह बोतल में उतर गये हैं। मटर आना बन्द हो गये हैं नहीं तो पतियों के हाथ में मटर छीलने का ही काम अवश्य रहता। मटर की जगह पालक ने ले ली है। पत्नी थाली में पालक रखकर दे रही है, जरा साफ कर दो। पति को चाकू पकड़ना सिखाया जा रहा है, वह ना-नुकर करने की कोशिश कर रहा है लेकिन पत्नी कह रही है कि नहीं जी यह तो सीख ही लो, क्या पता कल क्या हो! पति डरते-डरते चाकू पकड़ रहे हैं।
बच्चे पूछ रहे हैं कि मम्मी, पापा ने चाय बनाना सीख लिया क्या? मैं बात को टाल जाती हूँ, क्योंकि जो काम फैलेगा वह चाय बनाने से अधिक होगा। घर में बैठा आदमी चाय की तलब से भी अधमरा हो रहा है लेकिन जैसे ही ख्याल आता है कि चाय बनाने में एक अदद भगोनी काम आती है, चलनी भी लगती है तो भूल जाता है चाय को। पता नहीं देश में चाय की खपत बढ़ी है या घटी है, यह तो आप सभी बता पाएंगे। लेकिन इतना जरूर है कि नखरे कम हो चले हैं।
घर की महिला को तो पहले भी घर में ही रहना था, अब भी है तो खास फरक नहीं पड़ा है। करोड़ों ऐसी महिलाएं हैं जिनने महानगर नहीं देखें हैं, रेले नहीं देखी हैं। वे पहले भी घर में रहकर मंगोड़ी-पापड़ बना रही थी, अब भी बना रही है। लेकिन अब मंगोड़ी-पापड़ बना रही महिला को सम्मान की नजर से देखा जा रहा है। महिला को हेय दृष्टि से देखना बन्द हो गया है। उसका काम महान की श्रेणी में आता जा रहा है। मैं तो इस बात से खुश हूँ कि कहीं से भी लौकी-तौरई-टिण्डे के खिलाफ आवाज सुनाई नहीं दे रही है। हमारी प्रिय सब्जियाँ सम्मान पा रही हैं। पहले घर को सम्मान मिला फिर महिला को और अब सब्जियों को। बाजार और बाहर निकलने का डर अच्छा है। डरते रहो और खुश रहो।

Wednesday, March 25, 2020

मुट्ठी बांध लें


आज रात नींद नहीं आयी, न जाने कितनों को नहीं आयी होगी! महिलाएं कुछ सोच रही होंगी और पुरुष कुछ और! मुझे सारे काम एक-एक कर याद आ रहे थे, उन्हें व्यवस्थित करने का क्रम ढूंढ रही थी। लेकिन शायद पुरुषों को चिन्ता सता रही थी कि हाय! बाहर निकलना बन्द! देश के प्रधानमंत्री के माथे पर भी चिन्ता की लकीरें थीं, वे सारे देश को बचाने के लिये चिंतित थे। उन्हें पता है कि जनता बच्चे के समान है, इस जनता को घर में बन्द रखना बहुत कठिन काम है! लेकिन वे कर रहे हैं। हम भी जानते हैं कि पूरे घर को अकेले अपने कंधों पर लादकर ले जाना कठिन काम है, हम कह उठते हैं कि नहीं, हम से नहीं हो पाएगा। लेकिन मोदीजी नहीं कह पाते। मोदीजी को देखकर हमें हौसला आता है कि नहीं जब वे पूरे देश की चिन्ता कर रहे हैं तो हम केवल अपने परिवार की चिन्ता नहीं कर सकते?
अपनी बूढ़ी होती हड्डियों को टटोलती हूँ और पूछ लेती हूँ कि कितना जोश है? इन हड्डियों में ताकत तो शेष होगी लेकिन आराम की लत भी तो लगी है जैसे हम सब में घर से बाहर निकलकर तमाशा देखने की लता पड़ी हुई है, वैसे ही हड्डियों में भी लत लगी है। ये बड़े-बड़े घर अब आफत लगने लगे हैं। बंगलों की शान-शौकत अब जी का जंजाल बन गयी है। किसी के घर में कुत्ते हैं तो कहीं दूसरे पशु! घर में काम करने वाले दो हाथ और कैसे हो पशुओं का निर्वाह! नौकर-चाकर सब अपने घरों में कैद हो गये हैं और हम अकेले ही सारी दुनिया के संघर्षों का सामना करने को तत्पर हो रहे हैं।
रात नींद तो नहीं आ रही थी, लेकिन सड़कों का सन्नाटा भी अजीब सा भय पैदा कर रहा था। गाड़ियों के शोर में सारी ही आवाजों दब जाती थी लेकिन कल रात को सन्नाटे की आवाजें भी कान में टकरा रही थीं। चारों तरफ शान्ति थी, बस कहीं दूर कुत्ता बिलबिला रहा था। रात कान के पास मच्छर भी भिनभिना गया। मच्छर का आना तो ओर भी डरा गया, क्या पता इसकी भिनभिनाहट भी आज सुनायी दी या यह रोज ही शोर मचाता है!
लगभग एक माह तक सारे ही परिवारजन एक घर में बन्द रहेंगे। जब नया सवेरा होगा तब क्या दुनिया बदल जाएगी! सारी दुनिया कितनी बेगानी सी हो गयी थी तो क्या अब अपनेपन की खुशबू आने लगेगी! मेरे जैसे कितने लोग होंगे जो अपनेपन की बातें करने को तरस जाते होंगे, अब कर लो बातें जी भर के। पता नहीं मन का अहंकार कितनों का डटा रहेगा और कितनों का रफूचक्कर हो जाएगा। "मैं ही श्रेष्ठ हूँ" यह लेकर चलने वाले लोग क्या बदल जाएंगे? बात-बात में दूसरों को ठुकराने वाले लोग क्या सच में बदल जाएंगे? दुनिया ने देखा था कि जब हम 22 तारीख को एक साथ आए थे तब लोगों की आँखे  भर आयी थीं, शायद इस एकान्त की घड़ी में हम फिर अपना लें उन अपनों को जिन्हें हमने छोटा कहकर दुत्कार दिया था! यह देश और इस देश के लोग हमारा अपना खून हैं, हम सदियों से इन्हें अलग करते गये और इनकी आँखों में पानी भरते गये, लेकिन आज फिर हाथ बढ़ाने का अवसर आया है, हम सभी की आँखों से पानी पौंछ डालें। घर-घर में विभेद दिखायी देता है, आदमी-आदमी में विभेद दिखायी देता है, बस यह विभेद कम हो जाए, हम अपना लें अपनों को। मुट्ठी बांध लें।

Monday, March 23, 2020

अपने होने के लिये कभी घण्टी ना बजानी पड़े!


इटली में लोग मर रहे हैं, घरों की बालकनी में आकर बन्द गाड़ियों में जाते शवों को देख रहे हैं फिर उन्हें लगता है कि हमें किसने अभी तक बचाकर रखा है? वे सोचने लगते हैं और जो चेहरे सामने आते हैं, वे होते हैं डॉक्टर के, पेरामेडिकल स्टाफ के, पुलिस के, आर्मी के। और फिर घर से निकाल लाते हैं बर्तन, गिटार या जो भी मिल जाए। बजाने लगते हैं, आभार में उन सबके, जो सेवा कर रहे हैं, उन्हें बचाकर रख रहे हैं। मौत का सन्नाटा चारों तरफ फैल रहा है, जब इन घण्टियों की आवाजें चारों तरफ फैलने लगती है तब और घरों से भी ताली बज उठती है, घण्टी बज जाती है। कृतज्ञता क्या होती है, मनुष्य समझने लगता है। आँख से झरझर पानी बहने लगता है, सोचता है कि देखों इन लोगों को जो हमें बचाने के लिये रात-दिन लगे हैं, खतरों से खेल रहे हैं!
कई मौहल्ले ऐसे भी होंगे जहाँ लोग थाली बजाकर बता रहे होंगे कि हम है, यहाँ हम अकेले रह गये हैं! कितना दर्दनाक दृश्य होगा वहाँ! कल तक जहाँ खुशी के तराने बज रहे थे आज वहाँ मौत का सन्नाटा पसरा है। कोई इन फरिश्तों को दुआएं दे रहे हैं और कोई अपने होने का प्रमाण दे रहे हैं। कभी चौकीदार कहता था – जागते रहो और आज लोग कह रहे हैं जगाते रहो। घर में रहो और बताते रहो।
भारत के प्रधानमंत्री ने कहा कि इतने बड़े भारत में करोड़ों लोग फरिश्ते बनकर हम सब की सेवा कर रहे हैं, सभी को कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिये 22 मार्च को शाम 5 बजे घण्टे घड़ियाल बजा दो। आजतक भगवान के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करने के लिये हम शंखनाद करते हैं लेकिन आज इन देवदूतों के लिये भी शंखनाद कर दो। मोदी की बात दिल को छू गयी, लोग निकल पड़े घर की छत  पर और सारे गगन को गुंजायमान कर दिया। हमने आखिर आभारी होना सीख लिया।
भारत में कम ही लोग हैं जो किसी का आभार मानते हैं, किसी को श्रेय देते हैं, अक्सर लोग दूसरे को श्रेय देने में अपनी तौहीन मानते हैं, शायद कल कुछ लोगों ने ऐसा किया भी हो लेकिन भारत के अधिकांश लोग कृतज्ञ हुए। वे सेवा करने वाले हर उस इंसान के प्रति कृतज्ञ हुए जो हमें प्रकृति की मार से बचा रहा है और हमारी सेवा कर रहा है। वातावरण में कृतज्ञता की सुगन्ध आने लगी, आँखे नम हो गयीं। आँखे उस महान मोदी के लिये भी नम हो गयी जो हमारे लिये रात-दिन लगा है, आँखे हर उस व्यक्ति के लिये नम हो गयी जो इस दुख की घड़ी में हमें सांत्वना दे रहा है। हम भूल गये थे कि दुनिया सभी के सहयोग से चलती है, हमारा अहम् बहुत छोटा है, दुनिया का साथ बहुत बड़ा है। हम अकेले दुनिया में कुछ नहीं है, सब हैं तो हम हैं। सब के लिये हमेशा ताली बजाते रहिये, सभी की पीठ थपथपाते रहिये, प्यार देते रहिये और खुशियाँ बाँटते रहिये। न जाने कब हमें घण्टी बजाकर बताना पड़ जाए कि सम्भालों हमें, हम अभी शेष हैं। बस सभी को ऐसे ही कृतज्ञता ज्ञापित करते रहिये।

Sunday, March 22, 2020

एकान्तवास की बातें


मैंने बचपन से ही स्वयं से खूब बातें की हैं, मुझे कभी एकान्त मिला ही नहीं! मैं कभी अकेली हुई ही नहीं! क्योंकि मेरे साथ मेरा मन और मेरी बातें हमेशा रहती हैं। जब भी कोई सामने नहीं होता है, मेरा मन फुदककर मेरे पास आ जाता है और बोलता है – चल बातें करें। दुनिया जहान की बाते हैं मेरे मन के पास, कभी कहता है चल अपनी ही सुध ले ले, कभी कहता है कि देख दुनिया में क्या हो रहा है! मन इस होड़ में लगा रहता है कि मैं कहीं पिछड़ ना जाऊं! दुनिया में जितनी बातें चलती हैं उनका पूरा का पूरा विश्लेषण मुझ से कराकर ही दम लेता है। वह कहता रहता है कि नहीं इस तरह से सोच, नहीं इस तरह से सोच।
अब दुनिया अपने में सिमट रही है, सारे ही अपने घरों में आ गये हैं। मानो पक्षी अपने घरों में लौट आए हों। जब पक्षी अपने घरौंदों में लौटते हैं तो जिस पेड़ पर उनका घरौंदा होता है, वहाँ कभी शाम को जाना हुआ है आपका? कितनी चहचहाट होती है वहाँ, मानो हर पक्षी होड़ में लगा है कि अपनी बात कह ली जाए! मैं तो जब भी ऐसे पेड़ों के नीचे होती हूँ तो लगता है जैसे अपने ही मन का कोलाहल सुन रही हूँ। बस सुनती रहती हूँ। अब घर भी उस पेड़ की तरह लग रहे हैं, कोलाहल से भरे हुए। सभी को कुछ कहना है, किसी को किसी की नहीं सुननी। जब हम स्कूल/कॉलेज से आते थे तो बस अपनी बहन के साथ शुरू हो जाते थे, जितना दिन भर मन के अन्दर भरा था, सब निकाल देते थे। घर में चहचहाट सी हो जाती थी। फिर नम्बर आया हमारे बच्चों का, तब भी वहीं होता था। पहले मैं, पहले मैं की रट लग जाती थी। दोनों ही बच्चे सुनाने के बेताब रहते थे। भोजन की टेबल से उठकर वे मेरी गोद में घुसने की कोशिश में रहते थे और बतियाते रहते थे। जैसे ही पतिदेव की नजर पड़ती, बोलते कि पिल्ले माँ के साथ पड़े हुए हैं।
उन दिनों सारा घर ही बातें करता था, दूसरे कमरे में सास होती, ननद  होती, देवर होते, सारे ही बतिया रहे होते। मेरा मन तब कहता कि इतना शोर है घर में, मुझ से बात करने का अवसर ही नहीं है तेरे पास! लेकिन मैं तो मन से बात करने का मौका ढूंढ ही लेती। फिर लगा कि लिखना शुरू कर दो तब मन बिल्कुल मेरे पास आकर बैठ जाता और बोलता कि मैं जो कहूँ बस वही लिखना है। मैं उसी की लिखती रहती। तब मन को ऐसा सुगम रास्ता मिल गया कि मैं जैसे ही एकान्त पाऊं और मन कह दे कि चल मेरी बात लिख! अरे बाबा यह क्या है! कुछ थम जा। चल तू बात करते रहे, क्या पता कुछ अच्छा मिल जाए।
मेरा घर तो बरसों से एकान्तवास ही है, मेरे मन का पूरी तरह से कब्जा है मुझ पर। अब तो लिखने को प्लेटफार्म भी है, बस मन बकबक करता रहता है और मैं लिखती रहती हूँ। मुझे एकान्त तो कभी मिलता  ही नहीं। मैं अपने मन के साथ हमेशा धूणी रमाए रहती हूँ। रात को जब सोने जाती हूँ तब मन को कई बार डाँटना पड़ता है कि चुप हो जा, अब सोने दे। यह भी फेसबुक की तरह रात-दिन बतियाना ही चाहता है कमबख्त! मेरे दिन तो एकान्तवास में ही कटते हैं इसलिये मैं तो मजे में हूँ, आपको भी कह रही हूँ कि अपने मन से  बतियाना सीख लो और इस एकान्तवास के मजे लूटो।

Friday, March 20, 2020

वह घर जो सपने में आता है!


मेरे सपने में मेरे बचपन का घर ही आता है, क्यों आता है? क्योंकि मैंने उस घर से बातें की थी, उसे अपना हमराज बनाया था, अपने दिल में बसाया था। जब पिता की डाँट खायी थी और जब भाई का उलाहना सुना था तब उसी घर की दीवारों से लिपटकर न जाने कितनी बार रो लेती थी। लगता था इन दीवारों में अपनापन है, ये मेरी अपनी है। कभी किसी कोने में बैठकर बड़े होने का सपना देखा था और कभी चोर-सिपाही तो कभी रसोई बनाने का खेल खेला था! अपने घर के ठण्डे से फर्श पर न जाने कितनी गर्मियों की तपन से मुक्ति पायी थी! जब बरसात सभी ओर से भिगो देती थी तब इसी की तो छाँव मिलती थी। ठण्ड में कुड़कते हुए किसी कोने में सिगड़ी की गर्माहट से यही घर तो सुखी करता था! क्यों ना सपनों में बचपन का घर आएगा!
मेरा अपना घर जो मैंने अपने सारे प्रयासों में बनाया था, कभी सपनों में नहीं आता! मैं रोज आश्चर्य करती हूँ कि कभी तो आ जाए यह भी, आखिर इसे भी तो मैंने प्यार किया है! लेकिन नहीं आता! वह किराये का मकान जो वास्तव में घर था, हमारे सपनों में आता है और जो हमारा खुद का मकान है वह हमसे सपनों में भी रूठ जाता है! शायद इसे हमने घर नहीं बनाया! हमने यहाँ बैठकर बातें नहीं की, हमने यहाँ सपने नहीं संजोएं। बस भागते रहे अपने आप से, अपनों से और अपने घर से। सुबह उठो, जैसे-तैसे तैयार हो जाओ और निकल पड़ो नौकरी के लिये! वापस आकर कहो कि चल कहीं और चलते हैं, किसी बगीचे में या किसी रेस्ट्रा में! घर तो मानो रूठ जाता था, अरे तुम्हारे पास मेरे लिये दो पल का वक्त नहीं है! मैं भी तो सारा दिन तुम्हारी बाट जोहता हूँ और तुम मेरे पास आकर बैठते तक नहीं!
बच्चे आते हैं उनके पास घूमने जाने की लिस्ट  होती है, घर फिर रूठ जाता है, कहता है कि इतने दिन बाद बच्चे आए और ये भी मेरे साथ नहीं बैठे! घर तो निर्जीव सा हो चला है, हमारी आत्माएं इसमें प्रवेश ही नहीं कर पाती हैं। घर के कान भी बहरे हो चले हैं और जुबान भी गूंगी  हो गयी है। आखिर बात करे भी तो किस से करे! घर में दो लोग रह रहे हैं अबोला सा पसरा रहता है। आखिर एक जन ही कब तक बोले, घर में सन्नाटा पसर जाता है। घर भी हमारे साथ बूढ़ा हो रहा है, थक गया है बेचारा। यह कहानी मेरे घर की नहीं है, हम सबके घर  ही कमोबेश यही कहानी है। बड़े-बड़े घर हैं लेकिन रहता कोई नहीं है, जो भी रहता है वह बातें नहीं करता, बच्चों की खिलखिल नहीं आती। दरवाजे बन्द है तो चिड़िया का गान भी नहीं आता। बस चारों तरफ खामोशी है।
आखिर कल मोदीजी ने कहा कि 60 साल वाले घर के अन्दर रहो, घर से बातें करो इसे अपना बना लो। बहुत छटपटाहट हो रही है, कैसे रहेंगे घर के अन्दर! मुझे अच्छा लग रहा है, मैं बातें करने से खुश हूँ। मैं घर की बातें लिख रही हूँ, घर को महसूस कर रही हूँ, घर को आत्मसात कर रही हूँ। सोच रही हूँ कि घर नहीं होता तो क्या होता! क्या हम  बातें कर पाएंगे? इस मकान को क्या अपना प्यारा सा घर बना पाएंगे? क्या यह घर भी हमारे सपनों में आएंगा? इस महामारी के समय प्रयास कर लो, इसे ही अपना बना लो, जो बातें कभी नहीं की थी, अब कर लो, न जाने कब किसका साथ छूट जाए! जब हम ना होंगे तो यह घर ही तो है जो हमारी कहानी कहेगा, इसलिये बातें कर लो।

Tuesday, March 17, 2020

कुछ तो अच्छा ही हो जाए!


सारी दुनिया सदमें में एक साथ आ गयी है, ऐसा अजूबा इतिहास में कहीं दर्ज नहीं है। विश्व युद्ध भी हुए लेकिन सारी दुनिया एकसाथ चिंतित नहीं हुई। आज हर घर के दरवाजे बन्द होने लगे हैं, सब एक-दूसरे का हाथ थामे बैठे हैं, पता नहीं कब हाथ पकड़ने का साथ भी छूट जाए! जो घर सारा दिन वीरान पड़े रहते थे, वृद्धजनों की पदचाप ही जहाँ सुनायी पड़ती थी अब गुलजार हो रहे हैं। न जाने कितने लोग एक-दूसरे से पीछा छुड़ाने के लिये घर से बाहर निकल जाते थे। अब वे सब एक छत के नीचे हैं। हम गृहणियां कहती दिखती थी कि घर से बाहर जाओ तो हमें भी काम की समझ आए। पति कहता था कि कहाँ जाऊँ, अरे कहीं भी जाओ, बाजार जाओ, मन्दिर जाओ, किसी दोस्त के जाओ लेकिन जाओ। अब कोई कुछ नहीं कह रहा, सब घर में बन्द हैं। ऐसा लग रहा है कि दो दुश्मनों को एक कमरे में बन्द कर दिया है कि बस तुम हो और यह घर है! अब रूठ लो, झगड़ लो या समझदारी से सुलह कर लो! बस कुछ दिन तुम ही तुम हो एक दूसरे के साथ।
दो चार दिन बाद शायद नौकरानी भी आना बन्द हो जाए फिर? तब एक झाड़ू थामेगा और दूसरा पौछा! एक सब्जी काटेगा तो दूसरा रोटी सेकेगा। मिल-जुलकर काम करने का समय आ गया लगता है! नहीं यह सब्जी अच्छी नहीं है, और कुछ अच्छा सा बनाओ, अब कोई कहता हुआ नहीं देख सकोगे! बच्चे भी कहेंगे कि देखो घर में क्या बचा है, रोटी मिल जाए तो ठीक रहे। पिजा-पाश्ता तो दूर की कोड़ी हो जाएगी! अतिथि देवोभव: की जगह अतिथि तुम मत आना, प्रमुख बात हो जाएगी।
हर आदमी दुश्मन सा लगने लगा है और वह आदमी विदेशी हो तो फिर लगता है जैसे यमराज ही भैंसे पर सवार होकर सामने खड़े हों! जिन विदेशियों का हमेशा स्वागत था, अब डर को मारे पीछा छुड़ाना चाहते हैं। खाँसी – जुकाम तो सबसे बड़ा पाप हो गया है, ऐसा पाप जिसे कोई छूना भी नहीं चाहता। कभी मन करता है कि किसी पेड़ के तने को छूकर देख लें कि कितना स्निग्ध है लेकिन तभी डर निकलकर आ जाता है, नहीं किसी को मत छूना! पता नहीं किसने इसे छुआ होगा! हर चीज में कुँवारेपन की तलाश है।
दुनिया के सामने लड़ने के भी खूब अवसर हैं और प्यार से रहने के भी। लड़कर भी कब तक  रहेंगे, धीरे-धीरे समझौता होने लगेगा और शायद प्यार ही हो जाए! लोग फिर कहेंगे कि यह कोरोना प्यार है! वकील सुपारी लेना भूल जाएंगे। जब पति-पत्नी घर से बाहर के लिये मुक्त होंगे तब साथ होंगे, एक दूसरे का हाथ पकड़कर, गिले-शिकवे भूल कर साथ होंगे। मैं तो अच्छी कल्पना ही कर लेती हूँ कि इस महामारी में शायद कुछ अच्छा हो जाए। हम साथ रहना सीख जाएं। घर में रहना सीख जाएं। एक दूसरे से बात करना सीख जाएं। एक दूसरे का साथ निभाना सीख जाएं। काम में हाथ बँटाना सीख जाएं। इस बुरे समय में कुछ तो अच्छा हो जाए।

Saturday, March 14, 2020

बन्दर भाग रहे हैं


जब पहाड़ों पर बर्फ गिरती है तब मन झूमने लगता है, मन कह उठता है कि ठण्ड थोड़े दिन और ठहर जा। झुलसाने वाली गर्मी जितनी देर से आए उतना ही अच्छा है लेकिन इस बार होली जा चुकी है लेकिन पहाड़ों पर बर्फ पड़ने की खबरे आ रही हैं। मौसम सर्द बना हुआ है। लोग प्रार्थना करने लगे हैं कि गर्मी जल्दी से आ जा! गर्मी आएगी तो कोरोना मरेगा, सर्दी रहेगी तो कोरोना फलेगा-फूलेगा!
सारा विश्व चुप हो गया है, प्रकृति की ताकत समझ आने लगी है। पर्यटक स्थलों से बन्दर शहर की ओर भाग रहे हैं! क्यों भाग रहे हैं? मनुष्य ने प्रकृति को कितना बर्बाद किया है, धीरे-धीरे समझ आ रहा है, एक-एक परते खुल रही हैं। हम घूमने जाते हैं, साथ में बिस्किट, ब्रेड. रोटी, आटा आदि सामान भी ले जाते हैं, कहीं बन्दरों को खिलाते हैं, कहीं कुत्तों को खिलाते हैं, कही मछलियों को खिलाते हैं, बड़ी शान से कहते हैं कि पुण्य कर रहे हैं। लेकिन हमें पता ही नहीं जिसे हम पुण्य कह रहे हैं, वह तो पाप है। जैसे जिहादियों को पता ही नहीं कि वे लोगों को निर्ममता से मार रहे हैं कि वे पुण्य नहीं निरा पाप है! प्रकृति का चक्र बिगाड़ रहे हैं लोग!
अब ये बन्दर घरों में उत्पात मचाएंगे क्योंकि वे जंगल में जाना भूल गये हैं, हमने बिस्किट जो खिलाएं हैं, कुत्ते आदमी के पीछे लपक रहे हैं क्योंकि हमने रोटी खिलायी है। मनुष्यों को भी हम मुफ्त की रोटी बांट रहे हैं, अब कोरोना के कारण बन्द हो रही है मुफ्त की बन्दर-बाँट तो लोग चोरी करेंगे, डाका डालेंगे, पेट तो भरेंगे ही ना! हमने आदत तो बिगाड़ दी है। अकेले अमेरिका के न्यूयार्क शहर में ही 7 लाख बच्चे सरकार के भोजन पर आश्रित हैं और अब भोजन बनाने और बाँटने का संकट पैदा हो गया है तो क्या होगा? हमारे मिड-डे-मील भी बन्द हो जाएंगे तो क्या होगा?
होटल बन्द पड़े हैं, रेस्ट्रा बन्द हैं, प्रतिदिन के वेतन भोगी कर्मचारी घर बैठ गये हैं। करोड़ों लोग बेराजगार हो रहे हैं। असली बेराजगारी तो कोरोना के कारण आ रही है। फाइव-स्टार होटल विदेशी पर्यटकों की आवाजाही बन्द होने से खाली हो रहे हैं, होटल मालिकों का करोड़ो  का नुक्सान हो रहा है लेकिन कर्मचारी का हजारों का नुक्सान भी उसे रोटी के लिये मोहताज कर देगा! हमने जो हमारे पैतृक धंधों को छोड़कर नौकरी को अपनाया था, उसके दुष्परिणाम सामने अने लगे हैं।
हमारे देश में सब कुछ है, सारे ही खाद्य पदार्थ उपलब्ध हैं लेकिन जिन देशों में कुछ नहीं होता, वे क्या करेंगे? उन देशों में लूट मची है, जिसे जितना मिल रहा है, संग्रह कर रहा है। घर में यदि एक व्यक्ति को भी कोरोना ने डस लिया तो उसे भोजन देने वाला कोई नहीं होगा! कौन रोटी देगा? क्योंकि हमें काम आता नहीं! व्यक्ति दूसरे पर निर्भर हो गया है। प्रकृति के साथ जीना सीखना होगा, स्वयं को सक्षम बनाना होगा और दूसरे जीवों को भी मुक्त रखना होगा। बन्दर को बिस्किट खिलाना पुण्य नहीं पाप है, यह समझना होगा।

Thursday, March 12, 2020

सुन रहा है ना तू?


रथ के पहिये थम गये हैं। मुनादी फिरा दी गयी है कि जो जहाँ हैं वही रुक जाएं। एक भयंकर जीव मानवता को निगलने निकल पड़ा है, उसके रास्ते में जो कोई आएगा, उसका काल बन जाएगा! सारे रास्ते सुनसान हो चले हैं। जिसे जीवन का जितना मोह है, वे सारे लोग घरों में दुबक चुके हैं, जो जीवन को खेल समझते हैं वे अभी भी वृन्दावन में होली खेल रहे हैं।
विचार आया है मन में! यह वायरस अकेले मनुष्य पर ही आक्रमण क्यों करता है? लाखों पशु हैं, पक्षी हैं लेकिन सभी तो बिना वीजा और पासपोर्ट के स्वतंत्र घूम रहे हैं। ना साइबेरिया से आने वाले पक्षी रुके हैं और ना ही पड़ोस के पशु रुके हैं! मनुष्य के अलावा कहीं कोई भय व्याप्त नहीं है। अकेला मनुष्य ही क्यों इन सूक्ष्मजीवियों के गुस्से का शिकार होता है?
मनुष्य कभी भी किसी भी प्राणी को हाथ में पकड़ लेता है और अट्टहास करता है – तुझे निगल जाऊँगा..... हा हा हा। निरीह प्राणी कुछ नहीं बोल पाता लेकिन उसका आक्रोश जन्म लेता है, छोटे से सूक्ष्मजीवी के रूप में! मनुष्य ने किसी भी प्राणी को नहीं छोड़ा, सभी के साथ दुर्व्यहार किया, सूक्ष्मजीवी बढ़ते गये और मनुष्य का जीवन संकट में घिरता गया। हर घर के भोजन की टेबल पर सज गये हैं जीव! आक्रोश बढ़ता चले गया और सूक्ष्मजीवी पनपते गये! आज एक तरफ मनुष्य खड़ा है और दूसरी तरफ सारे ही प्राणी। मानो संग्राम छिड़ गया हो! मनुष्य के पास न जाने कितने हथियार हैं लेकिन सूक्ष्मजीवियों के पास केवल स्वयं की ताकत है।
सुबह हुई हैं, मुंडेर पर बैठकर चिड़िया गान गा रही है, कोयल भी कुहकने को तैयार है, गाय रम्भा रही है लेकिन मनुष्य खामोश बैठा घर में कैद है। केवल चारों तरफ से सायं-सायं की आवाजें आ रही हैं। मानो हर शहर कुलधरा गाँव जैसे सन्नाटे में तब्दील होना चाहता है। मनुष्य ने कहीं युद्ध छेड़ रखा है, वह कह रहा है कि मेरे रंग में रंग जाओ नहीं तो बंदूक से भून डालूंगा और दूसरी तरफ सूक्ष्मजीवी आ खड़ा हुआ है। बंदूकें भी बैरक में लौट गयी हैं, मानवता को अपने ही रंग में रंगने वाले भी दुबक गये हैं बस सूक्ष्मजीवी घूम रहा है, निर्द्वन्द्व! चेतावनी दे रहे हैं कोरोना जैसे हजारों सूक्ष्मजीवी, मनुष्य होश में आ जा, हिंसा छोड़ दे, नहीं तो तू सबसे पहले काल का ग्रास बनेगा। कोई नहीं बच पाएगा! अट्टहास बदल गया है, सूक्ष्मजीवी का अट्टहास सुनायी नहीं पड़ता लेकिन जब मनुष्य का रुदन सुनाई देने लगे तब समझ लेना की कोई जीव अट्टहास कर रहा है। रथ के पहिये थम रहे हैं लेकिन सूक्षमजीवी दौड़ रहा है, भयंकर गर्जना के साथ दौड़ लगा रहा है। मनुष्य अभी भी सम्भल जा। कहीं ऐसा ना हो कि डायनोसार की तरह तू भी कल की बात हो जाए? सुन रहा है ना तू?

Thursday, March 5, 2020

चुप रहो sss तुम महिला हो!



महिला दिवस के पूर्व ही एक बात लिखना चाह रही हूँ कि आखिर एक महिला को क्या चाहिए? महिला लड़ना भी चाहती है, हारना भी चाहती है, जीतना भी चाहती है लेकिन बस यह नहीं सुनना चाहती कि चुप रहो – तुम महिला हो! हर आदमी बस एक ही बात से सारे तर्क समाप्त कर देता है कि तुम महिला हो! मैंने एक पुस्तक लिखी – अपने पिता पर। मेरे सामने एक प्रश्न चिह्न खड़ा कर दिया गया कि पुस्तक क्यों लिखी गयी? मुझे भी लगा कि यह प्रश्न मुझे भी स्वयं से पूछना ही चाहिये कि आखिर क्यों लिखी गयी पुस्तक? मेरी पुस्तक में एक बात और थी कि मेरी माँ कहती है कि मेरे श्रीराम चले गये? जबकि मेरे पिता परशुराम की प्रतिकृति अधिक थे लेकिन मेरी माँ ने उन्हें विदाई देते समय कहा कि मेरे श्रीराम चले गये! महिला दिवस पर इन बातों की चर्चा करना चाहती हूँ। क्यों एक परशुराम जैसा व्यक्ति पत्नी के मन में श्रीराम की छवि लेकर बैठा है और क्यों एक पुत्री ऐसे पिता पर पुस्तक लिख देती है! मेरा जन्म आजादी के बाद हुआ, महिला शिक्षा का असर सीमित था, हमारे परिवार जैसे साधारण परिवार महिलाओं के लिये उच्च शिक्षा की कल्पना तक नहीं करते थे। यदि शिक्षा भी मिल गयी तो भी उनमें पुरुषोचित स्वाभिमान भरना नहीं जानते थे। मेरे पिता ने घोषणा की कि मैं संतानों को डॉक्टर-इंजीनियर बनाऊंगा। वे बेटा और बेटी में भेद नहीं कर सके और कहते कि मेरे सारे बेटे ही हैं। उन्होंने हमारे अन्दर स्वाभिमान कूट-कूटकर भर दिया। बस यही बात किसी भी बेटी को प्रभावित करती है। पिता फिर चाहे  परशुराम हो या फिर श्रीराम, लेकिन यदि वह अपनी बेटी में स्वाभिमान भरता है तब बेटी  हमेशा ऋणि रहती है। बेटों को इस ऋण का पता नहीं होता, क्योंकि वे इस परिस्थिति से कभी गुजरे ही नहीं! वे कभी दूसरे दर्जे के नागरिक रहे ही नहीं! उन्हें पता ही नहीं कि जब कोई धारा के विपरीत कार्य करता है, किसी में स्वाभिमान भरता है तब उसकी जगह क्या होती है? कोई भी व्यक्ति जब परिवार में महिला को सम्मान देता है तब उसका कृतित्व कितना बड़ा बन जाता है!
हमारे परिवार में पिता ने महिला को उसके अधिकार दिये। माँ से झगड़ा भी किया, घर में भूचाल भी लाया गया लेकिन माँ को दोयम दर्जा नहीं दिया गया। अपनी पुत्रवधुओं को कभी भी घूंघट में नहीं रहने दिया। उन्होंने हर महिला को वे सारे ही अधिकार दिये जो एक पुरुष को प्राप्त थे। हाँ वे झगड़ा करते थे लेकिन हमें  भी झगड़े का अधिकार देते थे! उन्होंने कभी नहीं कहा कि चुप रहो, तुम महिला हो! यही बात सब से अनोखी है। आज बात-बात पर सुनने को मिलता है कि चुप रहो तुम महिला हो! मैंने कई संगठनों में काम किया लेकिन सुनने को मिल ही जाता था कि चुप रहो तुम महिला हो! इसलिये महिला दिवस  पर मेरा एक ही प्रश्न है कि क्या अभी तक हम इसी वाक्य पर अटके हैं या हम आगे बढ़ चुके हैं? मेरे पिता ने  कभी यह वाक्य नहीं कहा, इसलिये मैंने उन पर पुस्तक लिखी, आज मैंने फिर मोदी को देखा जो महिला को कभी नहीं कहते कि चुप रहो, तुम महिला हो। आज यदि कोई भी पुरुष कितना भी बड़ा बन जाए लेकिन यदि वह महिला से कहे कि चुप रहो – तुम महिला हो, तब मुझे उस पर कोई सम्मान नहीं होता। मुझे जब-जब भी ऐसा सुनने और समझने को मिला, मैंने तत्काल वहाँ से पलायन कर लिया। आप हम से झगड़िये, हमें हराने की कोशिश भी कीजिए लेकिन हारने के डर से यह मत बोलिये कि चुप रहिये – क्योंकि तुम महिला हो! मैंने बचपन में ये शब्द नहीं सुने थे, मेरे पिता ने मुझे स्वाभिमान सिखाया था। उन्होंने सिखाया था कि सब बराबर हैं। यदि किसी के पास ज्ञान है तो वह ज्ञान महिला और पुरुष में विभाजित नहीं किया जा सकता है और ना ही भाषा में। ज्ञान किसी भाषा से भी बंधा नहीं होता कि यह भाषा नहीं आती तो आपका ज्ञान, ज्ञान नहीं है। इसलिये आज महिला दिवस पर मैं अपने पिता को नमन करती हूँ जिन्होंने मुझे स्वाभिमान सिखाया। महिला को कभी मत कहिये कि "चुप रहो – क्योंकि तुम महिला हो"।
मेरे पिता इसलिये ही मेरी नजर में महान थे और मेरी माँ की नजर में इसीलिये राम थे कि उन्होंने पत्नी को कभी नहीं कहा कि चुप रहो – तुम महिला हो। मेरे लिये मोदी भी इसीलिये महान है कि वे कभी नहीं कहते कि चुप रहो क्योंकि तुम महिला हो। महिला दिवस पर मेरे लिये हर वह व्यक्ति महान है जो कभी नहीं कहता कि चुप रहो, तुम महिला हो।

Wednesday, March 4, 2020

अटकलें ही शेष हैं


हमें आखिर इतनी जल्दी क्या है? दूध को समय दीजिये तभी दही जमेगा। जल्दबाजी में या बार-बार अंगुली करने से दही नहीं जमने वाला! लेकिन हमें हथेली पर सरसों बोने की आदत पड़ गयी है। समय देना तो हम भूल ही गये हैं! हमें आखिर जल्दी किस बात की है? नहीं हमें जल्दी भी नहीं है, बस हम फालतू टाइप के लोग हैं। समय बिताने के लिये गॉसिप करते हैं हम। मोदीजी के कहा कि मैं एक दिन के लिये रविवार को सोशल मीडिया एकाउंट छोड़ूगा तो अटकलों का बाजार गर्म हो गया। जितनी सनसनी फैला सकते थे, जितने कयास लगा सकते थे, सारे ही कयास और सनसनी फैलाकर देख ली। फिर आया मोदी जी का जवाब कि एक दिन महिलाओं के नाम रहेगा उनका सोशल मीडिया! अब! चारों तरफ निराशा! लोग कह रहे हैं कि खोदा पहाड़ और निकली चुहिया!
घर के चूल्हे पर दूध चढ़ा है, सड़क पर बारात निकल रही है, बस कृष्ण की बांसुरी सुनकर जैसे गोपियाँ सुध-बुध खो जाती थी वैसे ही रसोई से निकलकर गृहिणी दौड़ पड़ी बारात देखने और दूध उबल-उबल कर नीचे गिरता रहा, पतीला जलता रहा लेकिन होश किसे! दुनिया में कितनी खबरे हैं, कितना कुछ हो रहा है, उधर कोरोना वायरस ही कहर मचा रहा है लेकिन मीडिया को और सोशल मीडिया को मोदीजी की खबर की अटकलें लगानी है! आज मोदी नाम सबसे बड़ी खबर की दुकान हो गया है! खिलाड़ी छूट गये, अभिनेता छूट गये सारे ही सेलेब्रिटी छूट गये बस मोदी की खबर होनी चाहिये। मोदी की खबर से शेयर बाजार उछलने लगता है या टूटने लगता है। हमारे पास मुद्दे ही नहीं है, बस अटकलें ही शेष हैं। ऐसा होता तो कैसा होता और ऐसा नहीं होता तो कैसा होता? सारा देश फालतू हुआ बैठा है, बस एक मोदी के सहारे सारे ही बैठे हैं। दिल्ली में बिल्ली ने खूनी पंजे गड़ा दिये हैं लेकिन हम अटकलें-अटकलें खेल रहे हैं। कोई भी संगठन समाज को बचाने के लिये आगे नहीं आ रहा है, किसी ने भी रक्षा दल नहीं बनाया है। हम सदियों से अटकलों के सहारे जी रहे हैं, कभी गुलाम बन जाते हैं, लुट जाते हैं फिर कोई मोदी जैसा आ जाता है, वापस स्वतंत्र हो जाते हैं और फिर अटकलों में जीने लगते हैं। शायद हमारी जिन्दगी ही अटकलों की मोहताज  हो गयी है। जितनी जल्दी हम अटकलों से जूझते हैं उतनी ही जल्दी यदि हम समस्या से जूझने लगे तो हम सुरक्षित हो सकेंगे। लेकिन हम नहीं कर सकेंगे! अटकलों में हम माहिर है लेकिन समस्या का सामना करने में हम बहुत पीछे हैं। समाज को एकजुट कर लो नहीं तो अटकलें लगाने के लायक भी नहीं रहोगे!

Tuesday, February 25, 2020

कोने की धूप

कल तक जिन आँखों में उदासी थी, आक्रोश भी उन्हीं आँखों से फूट पड़ता था, झुंझलाकर पति-पत्नी दोनों ही कह उठते थे कि नहीं अब बेटे से आस नहीं रखनी, वह पराया हो गया है! लेकिन कल उन आँखों में मुझे चमक दिखायी दे गयी। पति-पत्नी दोनों झील किनारे टहल रहे थे, पत्नी अलग टहल रही थी और पति अलग। पति ने पत्नी के पास आकर कहा कि चलो घर चलते हैं। बेटे का फोन आया है, कहीं बाहर गया था, रात आठ बजे तक बहु और पोते को लेकर लौटेगा। मैंने उससे कह दिया कि घर पर ही भोजन करना, रास्ते का खाना ठीक नहीं होता। बच्चे के लिये दलिया-खिचड़ी बन जाएगी। फिर पत्नी की ओर देखकर बोले की तुम ऐसा करना कि दलिया ही बना लेना उसमें गाजर मटर भी डाल देना, पोते को अच्छा लगेगा। आज उन्हे जाने की जल्दी थी, शीघ्रता से ही ड्राइवर को आदेश दे दिया कि गाड़ी निकालो। मैं उनकी आँखों की चमक को देख रही थी, कल तक ये ही आँखे उदास थी लेकिन आज ममता टपक रही थी। एक ही बेटा है, कल भी वही था और आज भी वही है!
सर्दियों की जाती धूप में हम एक कोने में सिमटी धूप को तलाशते हैं और गर्मी में किसी पेड़ के नीचे मुठ्ठी भर छाँव को। बस एक कोने में धूप मिल जाए और किसी छज्जे के नीचे छाँव मिल जाए तो जीवन में आस बँधी रहती है। सारे दिन की सर्दी की गलन या धूप की तपन से मुक्ति मिल जाती है और यह क्षणिक मुक्ति का सुख सारे दिन की और कभी-कभी ढेर सारे दिनों की पूंजी बन जाती है। माता-पिता शिकायत कर रहे हैं कि बेटा-बहु साथ नहीं रहते, हमें धमकाते भी हैं, बुढ़ापे में जीवन दूभर लग रहा है, क्या करें? निराश दम्पत्ती अपने बीते दिनों की परछाई ढूंढ रहे हैं, सुख के क्षणों को ओने-कोने में तलाश रहे हैं। बेटा-बहु ने साथ रहने से साफ इंकार कर दिया है, सारे ही सम्बन्धों को धता बता दी है। लेकिन एक सम्बन्ध शायद अभी टिमटिमा रहा है! माँ-बाप की रसोई में आज ऐसा कुछ बना है, जिसे बेटा कभी बड़े चाव से खाता था, तो फोन पर अंगुलियाँ मचल ही जाती हैं। बेटा कहता है कि ठीक है, मैं आ रहा हूँ। पत्नी को समझाता है कि माँ ने भोजन बनाया है, बुला रही है। देखो तुम्हें आज भोजन की किट-किट नहीं करनी होगी। पत्नी तैयार हो जाती है और चल देते हैं दोनों। माँ-बाप की ममता निहाल हो जाती है और संतान को भोजन मिल जाता है, बस यही सम्बन्ध टिमटिमाता रहता है। माँ उस बाती में तैल डालती रहती है और दीपक टिमटिमाने लगता है।
यह ममता भी एक तरफा होती है, केवल माता-पिता के दिल को ही घर बनाती है। संतान तो केवल उस झरने में नहाती ही है। झरना तो बहता ही रहता है, नहाने वाली संतान को उस झरने की कब परवाह होती है। यह ममता हमें हर माँ-बाप की आँखों में दिखायी दे जाती है और बेपरवाही की झलक संतानों में। जब संतान बिल्कुल ही मुँह फेर ले तब मुठ्ठी भर छाँव को तलाशने में ही माँ-बाप लगे रहते हैं। जब वह मुठ्ठी भर छाँव माता-पिता की आँखों में दिखायी देती है, तब एक नयी आशा जन्म लेती है और इसी आशा के सहारे रोज ही माता-पिता कभी किसी कोने धूप तलाश लेते हैं और कभी छाँव पा जाते हैं।