Sunday, May 17, 2020

मन की किवड़ियां खोल


समय काटे से कट नहीं रहा है, एक अनजान भय भी सभी के सर पर मंडरा रहा है, लोग अपनी जमापूंजी का बहीखाता लेकर बैठ गये हैं। सोना-चाँदी, बैंक डिपाजिट, रोकड़ा, जमीन, जायदाद सभी सम्भालने में लगे हैं। जीवन में लाभ-हानि का हिसाब लगा रहे हैं। अपनी शेष आयु को भी हिसाब में सम्मिलित कर लिया है। कितना उपभोग कर पाएंगे और कितना शेष रह जाएगा? मैं इस आपदा काल में ही नहीं पहले से करती आयी हूँ। अपने जीवन को सुव्यवस्थित रखने का हमेशा से ही प्रयास किया है। ऐसा कोई कर्तव्य नहीं जो पूर्ण नहीं किया हो और ऐसी जीवनचर्या का साधन नहीं जिसे प्राप्त नहीं किया हो! प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में एक स्तर होता है, समाज के अनुरूप वह स्तर रहता है, उसी स्तर के अनुरूप हम श्रेष्ठ करते रहे हैं। लाभ-हानि भी बहुत हुई है फिर भी बूंद-बूंद करके घड़ा भरता ही गया। सारी आवश्यकतों की पूर्ति करने के बाद, संतानों को अच्छा जीवन देने के बाद भी घड़ा भर गया। सोचा अब इस घड़े का सदुपयोग वृद्धावस्था में होगा। लेकिन किसे मालूम था कि कोरेना काल उपस्थित हो जाएगा और दुनिया को जीवन का मर्म समझा देगा!
जीवन की आवश्यकताएं मुठ्ठीभर अर्थ से पूर्ण हो जाती हैं, शेष तो प्रतिस्पर्धा है। इस काल में प्रतिस्पर्धा समाप्त हो गयी है, विलासिता कहीं मुँह ढककर सो गयी है, बस आवश्यकताएं ही शेष हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपने घड़े को टटोल रहा है, किसी के पास एक घड़ा है, किसी के पास दो हैं या फिर किसी के पास अनगिनत है। रात-दिन हिसाब लग रहा है, सभी आश्चर्य चकित भी हैं कि इतना वैभव संचित कर लिया! फिर उम्र का गणित देखते हैं, पता लगता है कि यह तो फिसलती जा रही है! जीवन क्षणभंगुर दिखने लगा है, अब?
मेरे पास चिंतन के लिये समय हमेशा रहा है, यह समय और यह चिंतन ही मेरी पूंजी है। लोग कह रहे हैं कि अब समय बहुत मिल रहा है लेकिन मेरे पास तो पूर्व में भी बहुत समय था। जीवन के प्रत्येक कदम पर मैंने चिन्तन किया है। मैंने जीवन के सारे ही उपादानों को संतोष पूर्वक जीया है और मन को भी संतुष्ट किया है। लेकिन अब सभी लोगों को कहते सुन रही हूँ कि यह अर्थ का संचय व्यर्थ गया! यह अब किसी काम का नहीं है। इस अर्थ के कारण ही तो हमने प्रेम की जगह अहंकार को चुना था, निरन्तर हम प्रदर्शन कर रहे थे। लोग कह रहे हैं कि रिश्तों की हमने कद्र नहीं की, यहाँ तक की अपनी गृहस्थी तक सुखपूर्वक भोग नहीं पाए! केवल अर्थसंग्रह में लगे रहे और सारा दिन यायावर बनकर घर से बाहर रहे। किसी के पास एक मिनट का समय नहीं था जो अपनों को दे सके! आज समय ही समय है, पति-पत्नी के पास इतना समय है कि वह इस छोटे से काल में ही सात जन्मों का समय व्यतीत कर सकते हैं। जिस संतान के पास माता-पिता के लिये समय ही नहीं था आज वे भी क्या बात करें, यह ढूंढ रहे हैं! अभी भी लोग खेलों का सहारा ले रहे हैं, अपने मन को नहीं खोल रहे हैं। अपने जीवन के आनन्द को नहीं पा रहे हैं। कितने बेटे हैं जो माँ की गोद में लेटकर सर में तैल लगवा रहे हैं, या कितनी बेटियाँ हैं जो माँ को कुर्सी पर बैठाकर उनकी चोटी बना रही हैं। सारे ही लाड़ आज भी अधूरे से खड़े हैं। कर लो इन्हें भी पूरा कर लो, जीवन के ये पल दो क्षण के ही सही लेकिन अमृत की दो बूंद जैसे लगेंगे। घड़े की ओर मत देखो वह तो इतिहास में किसी अन्य के काम आएगा लेकिन अपना सुख, अपना लाड़-प्यार अपने लिये ही है, इसे प्राप्त कर सको तो कर लो। बतिया लो अपनों से, जो आपको लाड़ दे सके, जो आपके अस्तित्व को स्वीकार कर सके। समय व्यर्थ मत करें, जहाँ विष है उसे जीवन से दूर रखे, बस अमृत की दो बूंद की तलाश करिये।

4 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सुन्दर।
सबका यही हाल है ।

Onkar said...

बहुत सुन्दर

अजित गुप्ता का कोना said...

शास्त्रीजी आभार

अजित गुप्ता का कोना said...

ओंकार जी आभार