Tuesday, September 15, 2015

विवाह आत्‍माओं का मिलन या कन्‍या का पुरुष को समर्पण

विवाह दो आत्‍माओं का मिलन है लेकिन सारी परिस्थियों को देखने के बाद लगता है कि कुछ लोगों ने भगवान रूपी पुरुष के समक्ष कन्‍या का समर्पण बना दिया है। समर्पण कैसे होगा, कब होगा, किन शर्तो पर होगा, सभी कुछ भगवान रूपी पुरुष की ईच्‍छा पर निर्भर है।
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Saturday, September 5, 2015

मैंने माँ-पिता से क्‍या सीखा?

प्रथम गुरु माँ होती है। मैंने माँ से क्‍या सीखा? माँ के बाद पिता गुरु होते हैं। मैंने पिता से क्‍या सीखा? देखें आज आकलन करें। मेरे पिता दृढ़ निश्‍चयी थे, उन्‍हें मोह-ममता छूते नहीं थे। हर कीमत पर अपनी बात मनवाना उनकी आदत में शुमार था। घर में उनका एक छत्र राज था। माँ उनके स्‍वभाव को सहजता से लेती थी। लेकिन घर में क्‍लेश ना हो इस बात से डरती भी थी। हम से बात बात में कहती थी कि तेरे पिता क्‍लेश करेंगे तो तुम थोड़ा डरो। हर पल हमें इस डर का हवाला दिया जाता था। तो हमने हमारी माँ से डरना सीखा।
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Sunday, August 16, 2015

छैनी-हथौड़ी और कागज-कलम ही हैं इतिहास की संजीवनी

गाँव-गाँव में पुरातन गाथायें कहीं भजनों में तो कहीं गीतों में संचित हैं। कहीं प्रस्‍तरों में आलेख उत्‍कीर्ण हैं, तो कहीं भित्ती चित्रों के माध्‍यम से हमारी सभ्‍यता और संस्‍कृति को दर्शाया गया है। लाखों राजाओं की गौरव-गाथा आपको गीतों के माध्‍यम से सुनने को मिल जाएंगी, आज ये ही गाथायें हमारा इतिहास बन गयी हैं। इस पोस्‍ट को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - http://sahityakar.com/wordpress/%E0%A4%9B%E0%A5%88%E0%A4%A8%E0%A5%80-%E0%A4%B9%E0%A4%A5%E0%A5%8C%E0%A5%9C%E0%A5%80-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%9C-%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A4%AE-%E0%A4%B9%E0%A5%80-%E0%A4%B9/

Wednesday, July 22, 2015

जीवन के अन्‍तरालों को खोजने की चाहत

हम रोज अपने अन्‍दर कुछ न कुछ तलाशते हैं, हम कौन हैं, हमें क्‍या अच्‍छा लगता है, हमें क्‍या करना चाहिए। रोज अपनी आदतों को खोजते हैं, रोज अपनी चाहतों को खोजते हैं और रोज अपने पाने को खोजते हैं। अपने आपके अलावा हम इंसानों को भी खोजते हैं, कौन अपना सा है? कौन है जिससे घण्‍टों बाते की जा सकती हैं? कौन है वह जिससे मन की बात की जा सकती है? 
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Tuesday, July 7, 2015

2 जी के जीवन को 4 जी के युग में चलाने की मुहीम

लोग कहते हैं जीवो, हमारा मन भी कहता है कि जिन्‍दगी ना मिलेगी दोबारा। लेकिन दुनिया कदम कदम पर आपको बता देती है कि आपका उपयोग समाप्‍त हो गया है, अब देख लीजिए आपको जीकर क्‍या करना है? किसी पेकेट पर लिखे एक्‍सपायरी डेट के समान हमारा जीवन भी हो गया है। डेट निकलने के बाद आप उपयोगी हो सकते हैं, आप पूरी तरह से खारिज नहीं हुए हैं लेकिन दुनिया कहती है कि हम तो खारिज करते हैं। आलेख को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - http://sahityakar.com/wordpress/2-%E0%A4%9C%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A5%8B-4-%E0%A4%9C%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%97-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82/ 

Wednesday, June 17, 2015

लोहे के पेड़ हरे होंगे, तू गीत प्रेम के गाता चल

मुझे लगता है जब आप एक स्‍थान पर हैं और वहाँ से आप अपने ध्‍येय की पूर्ति करने में सक्षम नहीं हो पाते तब उस स्‍थान को जितनी जल्‍दी हो छोड़ ही देना चाहिए। जिन्‍दगी ना मिलेगी दोबारा। पोस्‍ट को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - http://sahityakar.com/wordpress/%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%B9%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A5%87%E0%A5%9C-%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A5%87-%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%87-%E0%A4%A4%E0%A5%82-%E0%A4%97%E0%A5%80/

Monday, June 15, 2015

यह दो मिनट का लेखन और पठन धीमा जहर ही है

मुझे लग रहा है कि फेसबुक से दूर हो जाना चाहिए। या फिर उन लोगों से तो अवश्‍य ही दूरी बना लेनी चाहिए जो असभ्‍य और अमर्यादित भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। ब्‍लाग लेखन में इतनी अमर्यादा नहीं है, यहाँ कुछ भाषा के प्रति सभ्‍यता शेष है। पोस्‍ट को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - http://sahityakar.com/wordpress/%E0%A4%AF%E0%A4%B9-%E0%A4%A6%E0%A5%8B-%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A4%9F-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%A8-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%AA%E0%A4%A0%E0%A4%A8-%E0%A4%A7%E0%A5%80/ 

Friday, May 15, 2015

सुन्‍दरता तू दुखी क्‍यूं है?

सुन्‍दरता के ही सपने होते हैं। न जाने सुन्‍दरता में ऐसी क्‍या बात है जो सपने देखने लगती है और जो सुन्‍दर नहीं है वे तो सपने भी नहीं देखते। उन्‍हें लगता है कि जो भगवान प्रसाद स्‍वरूप दे देगा वही श्रेष्‍ठ होगा। पोस्‍ट को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - http://sahityakar.com/wordpress/%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%A4%E0%A5%82-%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82%E0%A4%82/

Saturday, April 18, 2015

स्‍लेट जब रिक्‍त हो जाए तब अपनापन ही रिक्‍तता को भरता है

हमारे पास अधिकार के कुछ नम्‍बर होते हैं, रात 2 बजे भी उन्‍हीं नम्‍बरों पर हम डायल करके उनकी बाँहों को आमन्त्रित कर लेते हैं। वे भी तुरन्‍त ही बिना विलम्‍ब किए आ जाते हैं और आश्‍वस्‍त कर देते हैं कि हम अकेले नहीं है। 
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Monday, March 30, 2015

बाहर के दायरों से घर तक

घर की दुनिया कितनी अपनी सी है। घर का कोना-कोना आपका होता है, दीवारें लगता है जैसे आपको बाहों में लेने के लिए आतुर हों। इस अपने घर में पूर्ण स्‍वतंत्र हैं, चाहे नाचिए, चाहे गाइए या फिर धमाचौकड़ी मचाइए, सब कुछ आपका है। बाहर की दुनिया में ऐसा सम्‍भव नहीं है। इस पोस्‍ट को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - http://sahityakar.com/wordpress/%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%98%E0%A4%B0-%E0%A4%A4%E0%A4%95/

Monday, March 23, 2015

कल तक थे चार पुरुषार्थ लेकिन अब हैं पाँच

श्रीराम और श्रीकृष्‍ण का जीवन देखिए, उनके जीवन का कृतित्‍व समझिए। उन्‍होंने राष्‍ट्र-सुरक्षा को ही सर्वोपरी माना और आततायियों का संहार ही उनका लक्ष्‍य रहा। रामायण और महाभारत काल इसी बात के साक्षी हैं कि सृष्टि पर श्रेष्‍ठ विचार पनपने चाहिए और निकृष्‍ट विचारों का नाश होना चाहिए। ना राम और ना ही कृष्‍ण ने कभी किसी कर्मकाण्‍ड या पूजा पद्धति को स्‍थापित किया, बस वे राष्‍ट्र की सुरक्षा के लिए ही संकल्पित रहे। इस पोस्‍ट को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - http://sahityakar.com/wordpress/%E0%A4%95%E0%A4%B2-%E0%A4%A4%E0%A4%95-%E0%A4%A5%E0%A5%87-%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%B7%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A5-%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%95/ 

Sunday, March 15, 2015

मन की किवड़िया खोल

मन की किवड़िया खोल - आलेख को पूरा पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - http://sahityakar.com/wordpress/%E0%A4%AE%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A5%9C%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%96%E0%A5%8B%E0%A4%B2/

Friday, March 13, 2015

मेरे शहर में -------

हर रोज ऐसी सुबह हो - अठखेलियां करता झील का किनारा हो, पगडण्‍डी पर गुजरते हुए हम हो, पक्षियों का कलरव हो, सूरज मंद-मंद मुस्‍कराता हुआ पहाड़ों के मध्‍य से हमें देख रहा हो, हवा के झोंकों के साथ पक रही सरसों की गंध हो, कहीं दूर से रम्‍भाती हुयी गाय की आवाज आ रही हो, झुण्‍ड बनाकर तोते अमरूद के बगीचे में मानो हारमोनियम का स्‍वर तेज कर रहे हों, कोई युगल हाथ में हाथ डाले प्रकृति के नजदीक जाने का प्रयास कर रहा हो - कल्‍पना के बिम्‍ब थमने का नाम ना ले ऐसी कौन सी जगह हो सकती है?  आलेख को पूरा पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - 
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