Saturday, April 18, 2015

स्‍लेट जब रिक्‍त हो जाए तब अपनापन ही रिक्‍तता को भरता है

हमारे पास अधिकार के कुछ नम्‍बर होते हैं, रात 2 बजे भी उन्‍हीं नम्‍बरों पर हम डायल करके उनकी बाँहों को आमन्त्रित कर लेते हैं। वे भी तुरन्‍त ही बिना विलम्‍ब किए आ जाते हैं और आश्‍वस्‍त कर देते हैं कि हम अकेले नहीं है। 
पोस्‍ट की लिंक - http://sahityakar.com/wordpress/%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%9F-%E0%A4%9C%E0%A4%AC-%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%A4-%E0%A4%B9%E0%A5%8B-%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%8F-%E0%A4%A4%E0%A4%AC/

6 comments:

Kavita Rawat said...

बढ़िया प्रस्तुति ...

सु-मन (Suman Kapoor) said...

बढ़िया

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (19-04-2015) को "अपनापन ही रिक्‍तता को भरता है" (चर्चा - 1950) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

smt. Ajit Gupta said...

शास्‍त्रीजी, कविताजी, सुमन जी आपका आभार।

Sanju said...

सुन्दर व सार्थक प्रस्तुति..
शुभकामनाएँ।
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

रचना दीक्षित said...

सार्थक प्रस्तुति