Friday, May 15, 2015

सुन्‍दरता तू दुखी क्‍यूं है?

सुन्‍दरता के ही सपने होते हैं। न जाने सुन्‍दरता में ऐसी क्‍या बात है जो सपने देखने लगती है और जो सुन्‍दर नहीं है वे तो सपने भी नहीं देखते। उन्‍हें लगता है कि जो भगवान प्रसाद स्‍वरूप दे देगा वही श्रेष्‍ठ होगा। पोस्‍ट को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - http://sahityakar.com/wordpress/%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%A4%E0%A5%82-%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82%E0%A4%82/

4 comments:

ऋषभ शुक्ला said...

आपका ब्लॉग मुझे बहुत अच्छा लगा, और यहाँ आकर मुझे एक अच्छे ब्लॉग को फॉलो करने का अवसर मिला. मैं भी ब्लॉग लिखता हूँ, और हमेशा अच्छा लिखने की कोशिस करता हूँ. कृपया मेरे ब्लॉग पर भी आये और मेरा मार्गदर्शन करें.

http://hindikavitamanch.blogspot.in/
http://kahaniyadilse.blogspot.in

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (17-05-2015) को "धूप छाँव का मेल जिन्दगी" {चर्चा अंक - 1978} पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
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smt. Ajit Gupta said...

आभार ॠषभ शुक्‍ला जी। मैं जरूर आपका ब्‍लाग देखूंगी।

smt. Ajit Gupta said...

शास्‍त्रीजी आभार आपका।