Saturday, January 27, 2018

यही अन्तर है पूरब और पश्चिम का

कभी-कभी ऐसा भी होता है जब आपके पास कहने को या लिखने को कुछ होता है लेकिन आप लिख ही नहीं पाते हैं! बस यही सोचकर रह जाते हैं कि पहले नकारात्मक पक्ष लिखा जाए या पहले सकारात्मक पक्ष, और इसी उधेड़बुन में गाड़ी छूट जाती है। खैर आज सोच ही लिया की अब और नहीं। कभी आप सभी ने अपने बचपन को टटोला है और यदि यह टटोलना भी अपनो के बीच हो तो आनन्द दोगुना हो जाता है। हमारी पीढ़ी का बचपन भी क्या था! आज जो साधन दिखते हैं, उसमें से एक भी तब नहीं था, इसलिये समय सभी के पास था। साधनों की चकाचौंध में खोए हुए हैं आज हम और उसमें डूबते जा रहे हैं, अब किसी की जरूरत नहीं! बतियाने की भी जरूरत नहीं और किसी की सहायता की भी जरूरत नहीं। मैं मेरे एक आत्मीय परिवार के साथ याद कर रही थी कि कैसे हम सब एक दूसरे के काम आते थे, एक घर में फोन हुआ करता था और सारे ही मौहल्ले को आवाज देकर फोन आया है, बुलाया जाता था। सारे ही मौहल्ले को दो कारों की सोवाएं प्राप्त थी। सारी ही अच्छी बातें हम कर रहे थे, लेकिन उन अच्छी बातों में भी जो बात निकलकर आयी वह मेरे लिये लिखने का कारण बन गयी। एक युवा ने कहा कि यदि हम आज करोड़ों रूपया भी खर्च कर दें तो वैसा जीवन लौटाकर नहीं ला सकते। उस पुराने जीवन की लिये ललक, जहाँ समृद्धि नहीं थी, माता-पिता का कठोर अनुशासन था, उस ललक को देखकर दिल में ठण्डक सी पड़ गयी। लेकिन तभी कई दूसरे युवक सामने आ खड़े हुए। अन्तर दिखने लगा एक पीढ़ी का, नजरिये का। 
अमेरिका जब भी जाना हुआ, युवाओं से सामना होता रहा। मन तरस जाता था यह सुनने के लिये कि हमें वो जमाना याद आता है। लेकिन जब एक दिन एक युवा से सुना- अब भारत जाने का मन नहीं करता, मैं तो माता-पिता से कहता हूँ कि जब मिलने का मन हो तब आप ही चले आना। यह शब्द तीर की तरह चुभ गए और अभी तक मन में रिस रहे हैं। फिर सुनायी दिया कि भारत में अव्यवस्थाएं बहुत हैं इसलिये जाने का मन ही नहीं करता। कैसा है यह मन! जो अपने अतीत से पीछा छुड़ाना चाहता है! हमें तो अतीत को सहलाने में ही स्वर्ग सा आनन्द आता है। जहाँ समृद्धि नहीं थी, फिर भी उसमें हम खुद को खोज रहे हैं, जहाँ अनुशासन की दीवार इतनी सशक्त थी कि प्रेम कहीं खो जाता था, उसमें भी हम प्रेम खोजकर आनन्दित हो लेते हैं और विदेश के मोह में फंसी पीढ़ी जो समृद्धि के दौर में पैदा हुई है, उसके लिये बचपन का परिसर महत्व ही नहीं रखता! हम पड़ोस के किए सहयोग को याद करके उनका अहसान मान रहे थे और विदेश में बसी पीढ़ी अपनों का भी अहसान नहीं मानती। वह कहती है कि देखो मैंने कितनी उन्नति की है, मैं कहाँ और तुम कहाँ। मुझे बचपन का सबकुछ याद है, यहाँ के युवाओं को याद है, वे सभी कुछ तो गिना रहे थे लेकिन उन्हें कुछ याद नहीं। मन तो कभी थपेड़े मारता ही होगा, वे तब क्या कहते होंगे मन को! जब मैं परिवार के बीच बैठकर पुराने बीते हुए कल में जी लेती हूँ तब लगता है कि यह समय यहीं थम जाए और जब पुराने को बिसराने की होड़ लगी होती है तब लगता है कि समय दौड़ जाए और मैं वहीं पुराने समय में चली जाऊं। एक कहता है कि करोड़ो रूपये में भी वह माहौल नहीं मिल सकता और अब सुन रही हूँ कि उस माहौल में जिया नहीं जाता। बस यही अन्तर है पूरब और पश्चिम का। सारी चकाचौंध के बीच अपनापन कहीं नहीं है, सभी साधनों को भोग रहे हैं, बस मशीन बन गये हैं। एक मशीन से उतरते हैं और दूसरी की ओर दौड़ पड़ते हैं। दौड़ रहे हैं, हाँफ रहे हैं लेकिन सुकून नहीं तलाश पा रहे। हम यहाँ ठहरे हुए हैं लेकिन कभी अतीत में खो जाते हैं तो कभी अपनों में खो जाते हैं और अतीत व अपनों के इस जीवन से मकरंद निकाल लाते हैं। हम खुश हैं कि हमारे पास हमारा अतीत है, अतीत के उस परिसर को हम छू सकते हैं, देख सकते हैं और पल दो पल उसके साथ होने का सुख बंटोर सकते हैं। बस तुम्हारे पास सुख के साधन हैं लेकिन खुशी के वे पल नहीं हैं। सुखी तो हर कोई हो सकता है लेकिन खुश कितने हो पाते हैं! हमारे पास खुश रहने और हँसने का कारण है और इस हँसी-खुशी को हम आपस में मिलकर दोहराते रहते हैं। हम समृद्धि से अधिक अपनों का साथ चाहते हैं और उनके योगदान को अपनी थाती मानते हैं। काश आज फिर मिल जाए, वही माहौल!

2 comments:

HARSHVARDHAN said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन भारत भूषण और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

Team Book Bazooka said...

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