Tuesday, January 9, 2018

ताजी रोटी – बासी रोटी

यदि आपके सामने बासी रोटी रखी हो और साथ में ताजी रोटी भी हो तो आप निश्चित ही ताजी रोटी खाएंगे। बासी रोटी लाख शिकायत करे कि मैं भी कल तुम्हारे लिये सबकुछ थी लेकिन बन्दे के सामने ताजी रोटी है तो वह बासी को सूंघेगा भी नहीं। जब दो दिन पहले भारत याने अपने देश में पैर रखा तो खबर आयी की एक बेटे ने माँ को छत से फेंक दिया। सारे भारत में तहलका मच गया कि अरे कैसे कलियुगी बेटे ने यह अपराध किया लेकिन मुझे तो न जाने कितने घरों में माँ को बासी रोटी मान फेंकते हुए बेटे दिखायी देते हैं, किसी ने साक्षात फेंक दिया बस अपराध यही हो गया। लेकिन कहानी में नया मोड़ आज सुबह आ गया जब दो महिने बाद अखबार हाथ में था और ताजा खबरे पढ़ने का सुख बटोर ही रही थी कि आखिरी पन्ने पर नजरे थम गयी, सऊदी अरब में एक पत्नी ने पति को इसलिये तलाक दे दिया कि उसने माँ को छोड़ दिया था। जज साहब के सामने कहा कि जो आदमी अपनी माँ को छोड़ सकता है वह भला मुझे कब छोड़ देगा, इसका क्या पता! लो जी ताजा रोटी ने ही बासी रोटी का पक्ष ले मारा और वह भी सऊदी में! 
मुझे लगने लगा है कि माँ का यह चोंचला अब बन्द हो जाना चाहिये, भाई माना की आपने संतान को जन्म दिया है लेकिन इसका यह तो मतलब नहीं कि आपने सेवा की ठेकेदारी ले ली। आपकी संतान युवा है और आप वृद्ध, आपके लिये वानप्रस्थ आश्रम है, संन्यास आश्रम हैं, कहीं भी ठोर-ठिकाना कीजिये लेकिन युवा लोगों को सांसत में मत डालिये। बेचारे वे तो वैसे ही ताजा रोटी की गर्म भांप के मारे हैं, फूंक-फूंककर हाथ लगाते हैं, हमेशा डरते रहते हैं कि कहीं जल ना जाएं और आप हैं कि उनके सामने समस्या बनकर खड़े हो जाते हैं! मेरी मानिये, मेरे साथ आइए और बासी रोटी का संसार बसाते हैं। उन्हें भी मुक्त कीजिये और खुद भी मुक्त हो जाइए। बस एक बार मुक्त होकर देखिये, लगेगा कि दुनिया फिर से मिल गयी है। आपके पक्ष में खड़ा होने वाला कोई नहीं है, किसी एक महिला ने आपका पक्ष लिया है तो क्या लेकिन लाखों माँओं को तो रोज इसी तरह फेंका जा रहा है! कब तक फिकेंगी आप? बस एक बार मोह जाल से बाहर निकलकर आइए, दुनिया के न जाने कितने सुख आपकी राहों में बिछ जाएंगे।
सच मानिये यह चोंचला भारत में ही अधिक है, विदेशों में माँ सावचेत हैं, उसने कभी भी अपेक्षा नहीं पाली, इसलिये आज अपना संसार बसाकर रहती हैं। भारत लौटते हुए हवाई जहाज में दर्जनों माता-पिता थे, बस वे अपना कर्तव्य पूरा करने गये थे। कितनी कठिनाई के साथ सफर कर रहे थे, यह मैं ही जानती हूँ लेकिन फिर भी संतान मोह में भटक रहे थे। एक वृद्ध महिला की तो सिक्योरिटी जाँच में जामा-तलाशी ली गयी, बड़ी दया भी आयी और गुस्सा भी लेकिन क्या किया जा सकता था! उसकी जगह कोई भी हो सकता था, मैं भी। मेरी बिटया की सहेली से बात हो रही थी, वह बोली कि मुझे बहुत शर्म आने लगी है कि हम अपने मतलब के लिये माता-पिता को बुलाते हैं, वे कितना दुख देखकर आते हैं! इसलिये इस ममता को पीछे धकेलिये और खुद को खुद के लिये समर्पित कीजिए। तब लगेगा कि कल भी आप का था और आज भी आप का है और कल भी आपका ही होगा। कोई नहीं कह सकेगा कि हम बासी रोटी क्यों खाएं और इसे फेंकने के लिये तैयार हो जाएंगे। बस अपना स्वाभिमान बनाकर रखिये। अपनी लड़ाई आपको स्वयं ही लड़नी होगी। 

3 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (10-01-2018) को "आओ कुत्ता हो जायें और घर में रहें" चर्चामंच 2844 पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’ऐतिहासिकता को जीवंत बनाते वृन्दावन लाल वर्मा : ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

smt. Ajit Gupta said...

आभार शास्त्रीजी और सेंगर साहब।