Saturday, December 3, 2016

पंखुड़ी बनते ही बिखर जाएंगे

कल फतेह सागर झील के ऊपर कुछ पक्षी कतारबद्ध होकर उड़ रहे थे, उनका मुखिया सबसे आगे था। मुखिया को पता है कि उसे कहाँ जाना है, उसकी सीमा क्या है। किस पेड़ पर रात बितानी है और कितनी दूर जाना है। सारे ही पक्षी अपने मुखिया पर विश्वास करते हैं। सभी को पता है कि हमारी भी एक सीमा है, हम सीमा के हटकर कुछ भी करेंगे तो जीवन संकट में पड़ जाएगा। हम अपने घर में, समाज में, देश में सीमाएं या नियम इसीलिये बनाते हैं कि सब सुरक्षित रहें लेकिन कुछ लोग अपनी सीमाओं को तोड़ने का दुस्साहस करते हैं। वे स्वयं की सुरक्षा को तो ताक पर रख ही देते हैं साथ ही पूरे परिवार की, समाज की और देश की सुरक्षा को भी ताक पर रख देते हैं। आज कुछ पत्रकार, कुछ साहित्यकार और कुछ सोशल मीडियाकार सीमाओं से परे जाकर सभी की सुरक्षा से खिलवाड़ कर रहे हैं। वे देश के नागरिक को अपने कानून बनाने के लिये उकसा रहे हैं, जिससे वे समूहबद्ध ना रहकर तितर-बितर हो जाएं और फिर किसी का भी आसान शिकार बन जाएं।
पक्षी अपने झुण्ड से यदि बिछुड़ जाता है तो वह अपने जीवन को सुरक्षित नहीं रख पाता, ऐसे ही कोई भी नागरिक अपने देश की पहचान से विलग हो जाता है तब वह आसान शिकार बन जाता है। उसे अपनी पहचान के लिये कुछ राष्ट्रीय प्रतीकों को धारण और सम्मान करना पड़ता है, जैसे राष्ट्रीय झण्डा, राष्ट्र गान, राष्ट्रीय मुद्रा आदि। इनका अपमान देश का अपमान होता है और वह व्यक्ति देश के हित में ना होकर अहित में खड़ा होता है।
हमारे देश में थियेटर में राष्ट्र गान की परम्परा पुरानी है, सुप्रीम कोर्ट ने इसी परम्परा को बनाये रखने का आदेश दिया है लेकिन कुछ सिरफिरे लोग जिन्हें शायद परिवार की भी सीमाओं का ज्ञान नहीं हैं वे राष्ट्रगान का अपमान करके अपनी कलम की धार पैनी करने का ख्वाब देख रहे हैं। ऐसे लोग उस पक्षी की तरह हैं जो झुण्ड से बिछुड़कर खो जाता है। हमारा देश नहीं हैं तो हम भी नहीं हैं। हम विदेश में भी जाकर अपने देश के बलबूते पर ही बस सकते हैं, हमारा अस्तित्व केवल मात्र देश से ही है। इसलिये देश के प्रतीक चिह्नों का सम्मान करना हमारे लिये सुरक्षा की चाबी है। कुरान की आयतें बोलकर आप आतंक के आकाओं से तो बच जाएंगे लेकिन जब देश की पड़ताल होगी तब राष्ट्रगान ही आपको बचा पाएगा। ऐसे बुद्धिजीवियों से बचिये जो आपको गैर जिम्मेदार नागरिक बनाने के लिये उकसा रहे हों। आप फूल है जब तक सुरक्षित हैं, पंखुड़ी बनते ही बिखर जाएंगे।

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (04-12-2016) को "ये भी मुमकिन है वक़्त करवट बदले" (चर्चा अंक-2546) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

smt. Ajit Gupta said...

आभार।