Friday, December 2, 2016

ढाई लाख ले लो

ढाई लाख ले लो – ढाई लाख ले लो, की आवाजें घर-घर से आ रही हैं। कुछ दिन पहले इन्हीं घरों से आवाजें आ रही थी – मेरे 15 लाख कहाँ है – 15 लाख कहाँ हैं? अब बाजी उलट गयी है, 15 लाख की मांग की जगह ढाई लाख देने की आवाज लगायी जा रही है। महिलाओं को लुभाया जा रहा है, अरे तुम तो गृहिणी हो तुम्हें तो ढाई लाख की छूट है तो हमारे ढाई लाख ले लो। जो लोग नौकरी करते हैं, जब ये आवाजें उनके घर से भी आना शुरू हो जाए तो मन कसैला सा हो जाता है। रिश्वत खोर है यह जग इतना तो मुझे पता था लेकिन तुम भी, तुम भी कहते हुए दिन निकालने पड़ेंगे यह पता नहीं था।
मेरे बचपन के एक पारिवारिक मित्र थे, हमारे ही शहर में रहने आ गये थे तो हमारे संरक्षक जैसे बन गये थे। रोज ही का आना जाना था एक दिन मेरे ही घर की एक बालिका ने उनकी शिकायत हम से कर दी, हम दंग रह गये। इतना धार्मिक और बड़ा व्यक्ति और ऐसी हरकत! जब मैं नौकरी में थी और चिकित्सा करना मेरा कार्य था, वहाँ भी देखती कि आसपास के रिश्ते या आसपड़ोस के कई किस्से मेरे पास आते, मैं तब भी दंग रह जाती। तब आँख को चौकन्ना रखने की इच्छा होती और पाती की न जाने कितने लोग चरित्र के पायदान पर फिसल रहे हैं, वे अपनों को ही शिकार बना रहे हैं।
समाज का चरित्र जानकर कल तक लोग चौकन्ना रहने लगे थे और आज समाज का रिश्वतखोर या चोर रूप देखकर लोग चौकन्ने हो रहे हैं। कैसे-कैसे मासूम चेहरे ढाई लाख ले लो- ढाई लाख ले लो की रट लगा रहे हैं। सहकारी बाजार में भीड़ भरी है, साल का दो साल का राशन खरीदा जा रहा है, हवाई यात्राएं की जा रही हैं, कहने का तात्पर्य है कि रूपये के रूप में जिन्दगी की गारण्टी ली जा रही है। दानवीर राजाओं के, त्यागी संतों के उदाहरण देते हम थकते नहीं हैं लेकिन जब खुद का नम्बर आता है तब ये उदाहरण चुपके से कोने में दुबक जाते हैं।
वस्तुतः हम सब लालची लोग हैं, दुनिया के सारे ही ऐश्वर्य को भोगना चाहते हैं। कोई इस दुनिया में भोग कर जाना चाहता है तो कोई दूसरी दुनिया में भोगने की इच्छा रखता है। लालची सभी हैं। जब हम स्वर्ग या जन्नत की इच्छा रखते हैं तो लालच को तो अपने अन्दर पनपने का अवसर दे ही रहे हैं। जैसे अपने घर वालों के समक्ष चरित्र उज्जवल रखने की चेष्टा करते हैं और दूसरी दुनिया दिखते ही चरित्र को धता बता देते हैं। अपने घर में चोरी को अपराध बताते हैं और नौकरी में चोरी करने को हक मान लेते हैं। इसलिये लालच इस दुनिया में सुख भोगने का करो या स्वर्ग के लिये करो, लालच तो हैं ही हम में। ढाई लाख की आवाजें आपको भी डिगा रही हैं, क्या पता लगेंगा रख लो। लेकिन आपके मन को तो पता है, आपका मन तो कहेगा ही कि तुमने चोरी नहीं की तो क्या, चोरी के रूपयों का भोग तो किया। कल तक जो लोग अपना कबाड़ आपको थमा रहे थे, उस कबाड़ के कारण आप कबाड़ी तो बनेंगे ही लेकिन कभी ऐसा ही प्रसंग दुबारा आया तो आप भी आवाज लगा रहे होंगे – ढाई लाख ले लो – ढाई लाख ले लो।

1 comment:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा आज शनिवार (03-12-2016) के चर्चा मंच

"करने मलाल निकले" (चर्चा अंक-2545)

पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'