Thursday, March 4, 2010

हँसी ने मित्र बनाया और हँसी ही गायब हो गयी

उसकी खनखनाती हँसी ऐसे लग रही थी जैसे झरना कलकल बह रहा हो, या सुदूर पहाड़ों के मध्‍य कहीं से मन्दिर की घण्टियां बज उठी हों। मैं उसकी तरफ खिचने लगी। मन कर रहा था कि यह ऐसी ही हँसती रहे और मैं उस निर्मल हँसी का पान करती रहूँ। मैंने अपनी दोस्‍ती का हाथ तत्‍काल ही बढ़ा दिया। उसने भी मेरा हाथ थाम लिया। दोस्‍ती की पींगे बढ़ने लगी, सारा दिन हँसी-ठहाकों में ही गुजरने लगा। लेकिन बस कुछ ही दिनों का यह खेल था, धीरे-धीरे मेरे कंधों पर उसके सर का बोझ बढ़ने लगा और मेरा आँचल उसके आँसुओं से सरोबार हो गया। अब हमारे बीच दोस्‍ती तो थी लेकिन जो हँसी हमारी दोस्‍ती का कारण बनी थी वो गायब हो गयी थी। बस सारा दिन रुदन सुनना ही मेरी नियति रह गयी थी।

ऐसा बहुत ही कम होता है जब कोई महिला खुलकर हँसती हो। मैंने अक्‍सर महिलाओं का रुदन ही सुना है। यदि कभी हँसने का मन हुआ भी तो आँचल को मुँह पर ढापकर दबे स्‍वर में हँसती हैं। झरने की तरह कलकल बहना या फिर मन्दिर की घण्टियों सा बजना कितने लोगों को नसीब होता है? बस मैं ऐसे अवसर पर महिला होकर भी महिला पर फिदा हो जाती हूँ। जिस डाल पर फूल झूम-झूम कर नाच रहा हो, जिसमें जीवन का उत्‍साह झलकता हो, चंचलता और शोखी हवा में बिखर जाती हो, ऐसे फूल को तो हर कोई अपनी बगिया में लगाना चाहता है। बचपन से ही जब भी घर की डाँट-डपट से मन दुखी होता था तब एकाध बार ऐसा भी हुआ कि ऐसी ही निर्मल हँसी कहीं से सुनायी दे गयी, बस मैं उस हँसी को देखती ही रहती थी। मुझे लगता था कि यहाँ बैठकर कुछ पल हँसी-खुशी से बिताए जा सकते हैं। सारे ही गम यहाँ भुलाए जा सकते हैं।

दोस्‍ती बढ़ने लगती, कुछ दिन बेहद अच्‍छा लगता। मैं बड़ी ही संजीदगी से हर रिश्‍ते को लेती लेकिन बस कुछ दिन ही निकलते और उस हँसी के पीछे का रुदन सामने आ खड़ा होता। सच्‍चा श्रोता जानकार मुझे छिपे हुए सारे ही क्‍लेष सुना दिए जाते और मुझे लगने लगता कि जिस हँसी के पीछे मैंने अपने रुदन छिपाए थे, आज दूसरों के रुदन को भी गले लगाना पड़ रहा है। ऐसा अक्‍सर हुआ, जितनी हँसी, उतना ही रुदन। लोग कहते भी हैं कि अपना रुदन छिपाने के लिए ही यह हँस रहा है। लेकिन यह आकर्षण जो होता है, वह मन का ऐसा भाव है कि बस जिस बात को भी पकड़ले मानता ही नहीं। अब मेरे मन ने इसी भाव को पकड़ा हुआ है। बस जहाँ भी निर्मल हँसी कान में पड़ी और मुझे लगता है कि यह दोस्‍ती के लायक है। लेकिन यह भ्रम बस कुछ ही दिन रहता है, शेष समय तो रुदन सुनने में ही निकलता है।

ब्‍लोगिंग करते समय भी रिश्‍ते तो बन ही जाते हैं। किसी की खनकदार हँसी आकृष्‍ट भी करती है। लेकिन मन डरने लगा है उसके पीछे छिपे रुदन से। क्‍या आपके साथ भी ऐसा ही होता है जब आप किसी जिन्‍दादिल इंसान को अपना मित्र बनाते हो और उसका रुदन आपके जीवन का सत्‍य बन जाता हो? अब तो मैं मित्र बनाने से डरने लगी हूँ लेकिन मन की फितरत कभी मिटती नहीं। क्‍या कुछ मुठ्ठी भर ऐसे लोग हैं दुनिया में, जो बस केवल जीवन को हँसी के सहारे ही गुजार दें? अपने गमों के लिए कंधा नहीं तलाशें। दुख की घड़ी में रो भी लें लेकिन वो स्‍थाई भाव नहीं बने। बस जिन्‍दगी में हर गम को हँसी में उड़ा दे। मैं ऐसा मित्र-मण्‍डल बनाना चाहती हूँ जहाँ केवल हँसी हो, बस हम हँसने के बहाने तलाश करें। कौन साथ देगा मेरा?

18 comments:

Arvind Mishra said...

मैं ऐसा मित्र-मण्‍डल बनाना चाहती हूँ जहाँ केवल हँसी हो, बस हम हँसने के बहाने तलाश करें। कौन साथ देगा मेरा?
यही तो मैं औरों से भी कहता रहता हूँ लेकिन कोई साथ ही नहीं देता दूर तक ...

खुशदीप सहगल said...

अजित जी,
जीवन तो चलते जाना है...अब आप इसे रोते हुए बिताओ या हंसते हुए...रोने से चुनौतियां कम नहीं हो जाएंगी...हंस कर सामने से हौसला ज़रूर मिल जाएगा...

इस मामले में मैं तो राजेश खन्ना की फिल्म आनंद को ही ज़िंदगी का सबसे बड़ा पाठ मानता हूं...अपना दुख जितना भी बड़ा क्यों न हो, दूसरों को खुशियां ही बांटो...

उस फिल्म की आखिरी पंक्ति मेरे जेहन से मिटाए नहीं मिटती...

आनंद मरा नहीं, आनंद कभी मरते नहीं...

जय हिंद...

जी.के. अवधिया said...

जीवन कष्टों से भरा हुआ है। कष्ट प्राणियों को रुलाता है। ऐसे में सदैव हँसने वाले बिरले ही मिल पाते हैं।

जी.के. अवधिया said...

मुख पर आँचल डालकर हँसने वाली बात पर एक सुन्दर छंद याद आ गयाः

भभूत लगावत शंकर को, अहिलोचन मध्य परौ झरि कै।
अहि की फुँफकार लगी शशि को, तब अंमृत बूंद गिरौ चिरि कै।
तेहि ठौर रहे मृगराज तुचाधर, गर्जत भे वे चले उठि कै।
सुरभी-सुत वाहन भाग चले, तब गौरि हँसीं मुख आँचल दै॥

(अज्ञात)

अर्थात् (प्रातः स्नान के पश्चात्) पार्वती जी भगवान शंकर के मस्तक पर भभूत लगा रही थीं तब थोड़ा सा भभूत झड़ कर शिव जी के वक्ष पर लिपटे हुये साँप की आँखों में गिरा। (आँख में भभूत गिरने से साँप फुँफकारा और उसकी) फुँफकार शंकर जी के माथे पर स्थित चन्द्रमा को लगी (जिसके कारण चन्द्रमा काँप गया तथा उसके काँपने के कारण उसके भीतर से) अमृत की बूँद छलक कर गिरी। वहाँ पर (शंकर जी की आसनी) जो मृगछाला थी वह (अमृत बूंद के प्रताप से जीवित होकर) उठ कर गर्जना करते हुये चलने लगा। सिंह की गर्जना सुनकर गाय का पुत्र - बैल, जो शिव जी का वाहन है, भागने लगा तब गौरी जी मुँह में आँचल रख कर हँसने लगीं मानो शिव जी से प्रतिहास कर रही हों कि देखो मेरे वाहन (पार्वती का एक रूप दुर्गा का है तथा दुर्गा का वाहन सिंह है) से डर कर आपका वाहन कैसे भाग रहा है।

Mithilesh dubey said...

आज तो आपकी पोस्ट दिल को छू गयी, आप वेफिक्र रहिए, हसते हुए चेहरे मिलते रहेंगे आपको ।

वाणी गीत said...

हम हूँ ना ....हमको कोई ग़म नहीं ...सिर्फ हँसते रहने का ...
और हमारी सखी अदा ...हम दोनों हंसा हंसा के आपका पेट ना दुखा दे तो कहियेगा ....!!

ताऊ रामपुरिया said...

लो जी, यह भी कोई बात हुई? हमारा तो ब्लागिंग करने का उद्देष्य ही यही है. लगता है आपने हमारा प्रोफ़ाईल ध्यान से नही पढा और हमारी पोस्ट तो आप पढती ही नही हैं शायद.

रामराम.

अन्तर सोहिल said...

हंसी एक संक्रमण है जो दूसरों को भी हंसने पर मजबूर कर देता है, चारों तरफ मित्र ही मित्र बिखरे हुये हैं, आपको मित्र ढूंढने की जरूरत ही कहां है?
यह हमारे ऊपर ही है कि हम जीवन को हंसते हुये गुजारते हैं या रोते हुये
अगर हम हंसते हैं तो सारी दुनिया हमारे साथ हंसती है, मगर रोना अकेले ही पडता है
लेकिन रोना भी जरूरी है जी
"बारिशों के बाद सतरंगी धनक आ जायेगी,
थोडा रो लोगे तो चेहरे पे चमक आ जायेगी"

कुछ लोगों की आदत होती है हर बात पे रोने की
रास्ते में बारिश शुरू हो गई तो उदास, ट्रेन लेट हो गई तो उदास, बस छूट गई तो उदास, मगर मेरे जैसे कुछ लोग ऐसी सभी चीजों को एन्ज्वाय करते हैं जी

प्रणाम स्वीकार करें

shikha varshney said...

चार दिन कि जिन्दगी मिलती है अब चाहे हंस का गुजार दो या रो कर ...हाँ मुश्किलें तो आती हैं पर रोने से वो हल नहीं होती उन्हें हंस कर झेलेंगे तो शायद दुःख का एहसास कम जरुर हो जायेगा.बहुत अच्छी पोस्ट है

रचना said...

अजित जी आप कि पोस्ट आम हंसी मजाक इत्यादि के बारे मे श्याद नहीं है । आप कहना चाहती हैं कि अमूमन जिन नारियों से आप इस लिये मित्रता करती कि वो हंसती हैं उनसे मित्रता होने के बाद आप को उनकी बातो मे एक रुदन सुनाई देता हैं । कारण हैं कि बहुदा जब तक हम किसी से अन्तरंग नहीं होते तब तक एक मुखोटा लगैय रहते हैं जिस मे हम एक हसमुख स्त्री दिखाई देते हैं लेकिन जहां हम अन्तरंग हुए वो मुखोटा उतर जाता हैं और हमारे अन्दर के कष्ट दिखते हैं । हो सकता हें आप कि शक्सियत मे कुछ ऐसा हो कि आप कि दोस्ते आप से अपने मन कि बात खुल कर कह सकती हो । आप ममता मयी हो सकती हैं और क्युकी उम्र मे अगर आप बड़ी हो तो आप मै आपकी दोस्ती एक माँ कि छवि भी देख सकती हैं ।
आप कि इस बात से सहमत हूँ कि बहुदा जिन कारणों से हम किसी से मित्रता करते हैं वो कारण बाद मे रहते ही नहीं हैं । नारी मन कि पीड़ा ज्यादा तर अनकही ही रहती हैं क्युकी किस के पास समय है किसी कि पीड़ा बांटने के लिये

डॉ टी एस दराल said...

अजित जी , दुनिया में हँसते रहने वाले लोग है ही कहाँ। जिसे देखो वही रोता हुआ नज़र आता है। और रोने वाला किसी को अच्छा नहीं लगता ।
इसलिए हम तो खुद हँसते रहने की कोशिश करते हैं , और दूसरों को हंसाते रहने की ।
इसी के तहत पढ़िए मेरी होली पर लिखी हास्य रचनाएँ।

निर्मला कपिला said...

वाह तो गुप्ता जी आइये ना मै हमेशा सब मे हंसती हूँ और कभी रोना पडे तो अकेले मे । क्यों कि मै हमेशा याद रखती हूँ सुख के सब साथी दुख मे न कोई रे प्रभू। वैसे भी अब जिन्दगी बची ही कितनी है? जो है उसे खुशी से गुजार लें ये कागज़ हैं न दुख सुनने के लिये।कम से कम आपस मे तो हँस खेल लें। कुछ हद तक रचना जी की बात भी सही है। आप छोडिये सब बातें आयें मिल कर हंसेँ । शुभकामनायें।

वन्दना said...

are kyun ghabrati hain yahan sabhi aapko hansayenge .........zindagi ka falsafa yahi hona chahiye.........hanste raho muskurate raho.......aur phir vani ji ne sahi kaha wo aur adaji hain na.

kshama said...

अपने गमों के लिए कंधा नहीं तलाशें। दुख की घड़ी में रो भी लें लेकिन वो स्‍थाई भाव नहीं बने। बस जिन्‍दगी में हर गम को हँसी में उड़ा दे। मैं ऐसा मित्र-मण्‍डल बनाना चाहती हूँ जहाँ केवल हँसी हो, बस हम हँसने के बहाने तलाश करें। कौन साथ देगा मेरा?
Bada nek khayal hai..itna kahungi,ki, jeevan me gam aur khushee saath,saath chalte hain...bas santulan na bigade..

Dr. Smt. ajit gupta said...

रचना जी
आपने मेरी बात को समझा है। मैं यही कहना चाह रही हूँ कि महिलाओं में हँसी का भाव स्‍थाई क्‍यों नहीं है? मित्रता होते ही वे अपना दुखड़ा सुनाने क्‍यों बैठ जाती है और फिर यह दुखी भाव ही स्‍थाई हो जाता है। आखिर हम मित्रता करे तो किनसे? हो सकता है यह मेरे साथ ही होता हो, शायद मैं रिश्‍तों को दिल से अपनाती हूँ। क्‍या पुरुषों के साथ भी ऐसा ही होता है? मित्रता होते ही अपना दुखड़ा रोने की? कृपया आप सभी बताएं।

Dr. kavita 'kiran' (poetess) said...

हम हँसने के बहाने तलाश करें। कौन साथ देगा मेरा?
HUM HAIN NAA DIDI.hansne aur hansane ke liye.jeewan ka sahi aanand muskan me hi to chhupa hai.

Rakesh said...

aapne sahi kaha ...wakai ye ajeeb hai magar sahi hai her hansi ka sum roodan per hi hota hai ....ye anivarya hai ...magar her roodan ka sum jarutri nahi m ki hansi hi ho...ye vuirodhabhas hai aur rehega ...haan achi mitrta us sam ko alag roop de sakti ho hansi ke antre ko bada ker sakti hai ...aap mitron ke roodan ka sum deri se aayeesliye unke saath bane rehiye ..moulik v prabhavi posst ke liye badhai

Akanksha~आकांक्षा said...

सुन्दर अभिव्यक्तियाँ..लाजवाब रचना..बधाई !!
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