Monday, March 15, 2010

कभी कुटिल व्‍यक्ति भी आपको सफलता दिला देते हैं

कभी आप किसी महत्‍वपूर्ण पद पर कार्यरत हैं और आप अपने कार्य द्वारा मंजिल प्राप्‍त करना चाहते हैं। लेकिन देखते हैं कि कोई एक व्‍यक्ति आपके पीछे पड़ जाता है। सारी कुटिलता लिए वह आपके हर अच्‍छे फैसलों को भी बेकार सिद्ध करने पर उतारू हो जाता है। अधिकतर ऐसा राजनैतिक पदों में होता है। जब राजनैतिक दृष्‍टि से ही हर कार्य को देखा जाता है। उस समय आपका सारा ध्‍यान उस कुटिल व्‍यक्ति पर केन्द्रित हो जाता है। कितनी ही अन्‍य बाधाएं, कितने ही प्रलोभन आपके मार्ग में खड़े होते हैं लेकिन आपका उनपर ध्‍यान नहीं जाता। आपका सारा ध्‍यान उस कुटिल व्‍यक्ति से स्‍वयं को मुक्‍त करने में लग जाता है। अंत में आप देखते हैं कि जो काम बहुत ही दुरुह था, अनेक बाधाओं से भरा था, वो काम आप पूर्ण कर लेते हैं। क्‍योंकि आपका लक्ष्‍य उस कुटिल व्‍यक्ति ने निर्धारित कर दिया था। आप पूर्ण उर्जा के साथ उसके द्वारा उत्‍पन्‍न की गयी बाधाओं को दूर करने में जुट जाते हैं और तब अन्‍य बाधाओं को आप देखते भी नहीं। क्‍या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है? हम साहित्‍य से जुड़े लोग कुछ न कुछ समाज से प्रेरणा प्राप्‍त करके लिखते हैं। ऐसी ही प्रेरणा से एक लघुकथा का जन्‍म हुआ, आपके लिए यहाँ प्रस्‍तुत कर रही हूँ। आप बताएं लघुकथा उपयोगी है या निरर्थक? क्‍योंकि मैं शीघ्र ही एक लघुकथा-संग्रह प्रकाशित कराना चाहती हूँ तो कुछ लघुकथाओं के बारे में आप सब का विचार जानने के बाद ही इसे प्रकाशक के हाथों में दूंगी।



लघुकथा-गन्दी मक्खी

मुझे शाम तक पहाड़ी पर बने मन्दिर तक पहुँचना था। अभी कदम बढ़े ही थे कि एक गंदगी में बैठने वाली बड़ी मक्खी, सिर के पास आकर भिन-भिनाने लगी। मेरा सारा प्रयास उसे अपने शरीर से दूर रखना था। क्योंकि वो अपने साथ नाना प्रकार के किटाणु लेकर आयी थी। कभी चाल धीमी हो जाती और कभी तेज। आखिरकार मैं अपने गंतव्य तक समय रहते पहुँच ही गयी।

मन्दिर में एक मित्र ने पूछा कि रास्ते का आनन्द कितना आया?

मुझे तो एक मक्खी के कारण रास्ता दिखा ही नहीं, बस केवल मंजिल मेरे सामने थी और मैं यहाँ तक पहुँच ही गयी।

अर्थात् आपने रास्ते में कुछ नहीं देखा?

नहीं।

अच्छा हुआ, क्योंकि रास्ते में जगह-जगह कीचड़ भरे गड्डे भी थे। इस गन्दी मक्खी के कारण आप का ध्यान उस ओर गया ही नहीं और आप उसकी बदबू से बच गयीं।

26 comments:

Anil Pusadkar said...

बिल्कुल सही जब आप परेशान जो और परेशानी से मुक्ति चाहें तो फ़िर उसके अलावा कुछ और नही सूझता।

अन्तर सोहिल said...

कथा पसन्द आयी जी
तभी तो कहा है - निंदक नियरे राखिये

प्रणाम

वन्दना said...

bahut hi sargarbhit.

ताऊ रामपुरिया said...

इसी लिये कहा गया है ज्ञानी आदमी रास्ते मे आये अवरोधों को दुश्मन के बाज्ये दोस्त मानता है. लघुकथा बहुत सटीक है. शुभकामनाएं.

रामराम.

जी.के. अवधिया said...

सुन्दर सन्देश देती हुई सार्थक लघुकथा!

वाणी गीत said...

सिर्फ राजनीति ही नहीं ....आम जीवन में भी ऐसा होता है ...
मगर गन्दी मक्खी क्यों ...खुनी मच्छर क्यों नहीं ....
(हास्य भरहै ...अन्यथा नहीं लीजियेगा )

अच्छा सन्देश देती लघु कथा ...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत बढ़िया!

अच्छा प्रेरक प्रसंग है!

Dr. Smt. ajit gupta said...

वाणी जी, मच्‍छर और मक्‍खी में अन्‍तर होता है। मक्‍खी और वो भी गन्‍दी को कोई मारता नहीं है, सिर्फ उड़ाता भर है। लेकिन मच्‍छर को मारने का प्रयास ही रहता है। ऐसे में मारने के चक्‍कर में हम दिशा ही भटक जाते हैं। और मच्‍छर के मरने के बाद खेल खत्‍म। फिर रास्‍ता कौन पार कराएगा? आपकी हँसी ने भी मुझे सोचने को मजबूर किया। आपका आभार।

shikha varshney said...

अच्छी सारगर्भित कथा.

दीपक 'मशाल' said...

Ekdam sarthak lekhan.. koi do ray nahin..
pustak prakashan ke liye agrim badhai sweekaren.. vaise jaldi hi main bhi laghukatha ka ek... ahem ahem.. :)

Udan Tashtari said...

सटीक कथा..अच्छा सार्थक ज्ञान!!

इन्तजार रहेगा आपकी अन्य लघुकथाओं का.

सतीश सक्सेना said...
This comment has been removed by the author.
सतीश सक्सेना said...

बहुत अच्छा लगा, हर एक द्रष्टान्त किसी किसी न किसी घटना से जुड़ा होता मिसेज गुप्ता, हर लेखन सफल है जब पाठक उसे आत्मसात करते हुए पढ़े ! आपकी लिखी हुई शुरुआत की लाइनें मेरे जीवनकाल के कुछ बेहद खराब समय का स्मरण करा गयी !
So you are successful ma'm ! congratulation!

M VERMA said...

बहुत सुन्दर लघुकथा.
नकारात्मकता में भी कुछ सकारात्मकता के अवशेष तो होते ही हैं

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

इस लघुकथा के माध्यम से आप जो सन्देश देना चाहती थी, उसमें पूर्णत: सफल रही...मन और मस्तिष्क की एकाग्रता ही बाधारहित लक्ष्य प्राप्ति में सहायक सिद्ध होती है.......

मनोज कुमार said...

विचारोत्तेजक!

JHAROKHA said...

yah baat bilkul satya hai ki jab aap ek dard se pareshan ho todusara dard uthane par pahale dard ki taraf dhyan hi nahi jaata hai.
poonam

sangeeta swarup said...

लघुकथा अच्छी लगी.....बधाई

'अदा' said...

bahut hi badhiya saargarbhit laghu katha...kabhi-kabhi chhoti pareshaani badi pareshaani se dhyan hata deti hai..
aacha laga padhna hamesha ki tarah...

हरकीरत ' हीर' said...

छोटी छोटी घटनाएं कई बार बड़ा मायना दे जाती हैं ......और हम बड़ी बाधाओं को भी आसानी से पार कर जाते हैं ....हाँ ये घटना कुछ अलग सी है .....मंदिर तक पहुंचा ही दम लिया होगा शायद मक्खी ने ......!!

विनोद कुमार पांडेय said...

कभी का हमारे जीवन में ऐसी घटनाएँ घट जाती है जिसे हम बहुत बड़ा समझते है पर ये भी हो सकता है की उसके वजह से हमारे सामने दूसरी बड़ी समस्या भी आ सकती थी जो नही आ पाई....कहानी बिल्कुल सार्थक है आख़िर उस मक्खी के वजह से बड़ी मुसीबत मतलाब राह की गंदगी से बच गये ना...सुंदर भाव...बढ़िया लघुकथा माता जी....प्रस्तुति के लिए धन्यवाद जो इस बढ़िया भाव को पढ़ पाया..

कुश said...

लघुकथाए और क्षणिकाए मुझे हमेशा से पसंद है..कम शब्दों में गहरी बात कहने हुनर ये रचनाये खूब जानती है..खैर आपने बात बात में काफी गहरी बात कही है..

अल्पना वर्मा said...

कम शब्दों में गहरी बात!
लघुकथा पसन्द आयी.

rashmi ravija said...

बहुत ही सुन्दर लघुकथा.....इसमें निहित सन्देश बखूबी पाठकों तक पहुँच गया..

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

निन्दक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाय! :)

प्रबन्धन की जरूरत भी है कि पहले सभी कमजोरी के बिन्दु लिख-निपट लिये जायें!

सुन्दर पोस्ट!

kulwant Happy said...

हमारे साथ अक्सर ऐसा ही होता है, कुछ लोग दुखों को पकड़कर बैठ जाते हैं, और सुखों का अनुभव ही नहीं कर पाते, और कभी कभी छोटी सी खुशी को इतना कसकर पकड़ लेते हैं कि दुखों भरी दुनिया नजर ही नहीं आती। छोटे छोटे पल को महसूस करना चाहिए, पूरी उर्जा के साथ। छोटी कहानी बेहद अच्छी लगी।