Monday, February 1, 2010

ब्‍लागवाणी से हम पल्‍टी खा गए

आजकल फुर्सत में हैं, तो सारा दिन इधर-उधर ताक-झांक करते रहते हैं। कभी किसी की रसोई में और कभी किसी की रसोई में। देखते हैं कि किस ने आज क्‍या पकाया है और क्‍या परोसा है? थोड़ा-थोड़ा चख भी लेते हैं, लेकिन चखते ही सामने लिखा बोर्ड दिखायी दे जाता है ‘पसन्‍द का’, लिखा होता है कि पसन्‍द है तो चटका लगाएं। अब वहाँ चटका लगाना जरूरी हो जाता है। लेकिन तभी एक खिड़की खुल जाती है कि अब इस पर टिप्‍पणी भी करो। कई बार मन में आता है कि लिख दें कि नहीं करेंगे तो क्‍या करोगे? तभी दिख जाते हैं पतिदेव, चुपचाप बिना प्रतिक्रिया के खाना खाते हुए। हम गुस्‍से में भुनभुनाते हुए कहते हैं कि सब्‍जी और लोंगे? हाँ लेंगे, लेकिन इतने गुस्‍से में क्‍यों बोल रही हो? पति मुस्‍कराकर बोले। अरे आप कोई प्रतिक्रिया ही नहीं कर रहे, बस ठूसे जा रहे हैं, खा लिया तो टिप्‍पणी भी करो कि अच्‍छा लगा। यह सीन ध्‍यान आते ही झट की-बोर्ड पर अंगुलिया चल पड़ती है और तड़ातड़ टिप्‍पणियां लिख दी जाती हैं। सारा दिन यही क्रम चलता रहता है। इस बीच अपनी रसोई में भी झांक लेते हैं, अपने पकवान पर भी किसी ने टिप्‍पणी की है क्‍या? या फिर पसन्‍द है ऐसा छौंक लगाया है क्‍या? लेकिन क्‍या बताऊँ भाईसाहब और बहनजी कुछ लोग तो बड़े ही नुगरे होते हैं, हम तो उन्‍हें अच्‍छा है अच्‍छा कह-कह कर थक गए लेकिन वे कभी हमारे पकवान की ओर झांकते तक नहीं। हम ठहरे राजस्‍थान के लोग बड़ा सीधा-सादा भोजन बनाते हैं, ना तो हमारे यहाँ उत्तर भारतीयों की तरह ज्‍यादा चाट-पकौड़ी चलती हैं और ना ही दक्षिणी भारतीयों की तरह डोसे वगैरह हम तो अधिक से अधिक बाटी-चूरमे तक ही बना पाते हैं। ज्‍यादा से ज्‍याद चटनी बना ली, पापड़ तल लिया। राजस्‍थान में हरियाली भी कम ही है, तो हमारे पकवानों को हम हरा-भरा भी नहीं बता पाते, आप लोगों की तरह। चलो कोई बात नहीं, आप मत चखिए राजस्‍थानी चूरमा, हम तो आप लोगों के भाँति-भाँति के व्‍यंजन चखते रहेंगे और पसन्‍द है इसका छौंक भी लगाते रहेंगे। हमें तो अभी फुर्सत है। लेकिन कल बड़ा मजेदार वाकया हो गया, हम अपने पकवान पर सबसे पहले पसन्‍द का छौंक लगा देते हैं। एक रसोइए ने हमें बताया था कि आप दुबारा भी छौंक लगाएंगे तो तड़का दिखेगा। हमने ऐसा कर दिया, अरे यह क्‍या संख्‍या तीन की जगह दो हो गयी। भैया ब्‍लागवाणी को मेरा प्रणाम। मेरी रसोई और मेरा पकवान ही उन्‍हें मिला ऐसी ठिठोली करने को। पहली बार किया और पहली बार ही हम पल्‍टी खा गए। चलिए मेरा पकवान तो तैयार हो गया, आपके भी चख लूं। सीता-सीता।

28 comments:

पी.सी.गोदियाल said...

"लेकिन तभी एक खिड़की खुल जाती है कि अब इस पर टिप्‍पणी भी करो। कई बार मन में आता है कि लिख दें कि नहीं करेंगे तो क्‍या करोगे?"

हा-हा-हा-हा.. बहुत खूब कहा डा० साहब !
लेकिन एक बात यह भी तो है कि पहले हम लोह किताब, मैगजीन खरीदने में पैसे भी तो खर्च करते थे :)

विचारों का दर्पण said...

bahut badhiya lekh.....ye lekh ek majedaar pakwaan ki trh hai

यशवन्त मेहता "सन्नी" said...

हमे तो साल-दो साल मे जाकर दाल-बाटी, चटनी, चूरमा खाने को मिलता है......ब्लोगवानी का पसन्द वाला तरीका मुझे भी जटिल लगता है

Dr. Smt. ajit gupta said...

आपकी तो अभी खिड़की खुली ही नहीं, बहुत देर खड़े रहे फिर वापस लौटना पड़ा।

'अदा' said...

ha ha ha ...
Bahut zabardast pakwaan banati hain aap Dr. Sahiba ..
Is blog vani ke chakkar mein hi kyun rehna..jinko chakhna hota hai wo chakhenge hi aur pasand bhi karenge..
hamlog hamesha se hi pasand karte hain aapke pakwaan...haan chup-chap se kha kar nikal jaate hain..
:):)

अनूप शुक्ल said...

मजेदार पोस्ट!

जी.के. अवधिया said...

"हम ठहरे राजस्‍थान के लोग बड़ा सीधा-सादा भोजन बनाते हैं"

क्या कह रही हैं डॉक्टर साहिब आप? राजस्थानी भोजन का तो स्वाद ही निराला है। हम तो जब कभी भी कहीं बाहर जाते हैं तो खाने के लिये राजस्थानी या मारवाड़ी भोजनालय की ही तलाश करते हैं। कैर सांगली का तो जवाब ही नहीं है। और आपके ब्लोग वाली रसोई का स्वाद तो हमें बहुत ही भाता है!

"अरे यह क्‍या संख्‍या तीन की जगह दो हो गयी।"

एक बार फिर चटका लगा दीजिये संख्या फिर से तीन हो जायेगी। नये ब्लागवाणी में अब सिर्फ एक बार ही पसंद या नापसंद किया जा सकता है जिसे फिर से चटका लगाकर वापस भी लिया जा सकता है।

वाणी गीत said...

vराजस्थानी हैं तब तो चूरमा पसंद करना ही होगा ...मगर चूरमा एक दिन दबा कर खा ले तो पेट का क्या हाल होता है ...जानती ही होंगी ...इसलिए थोडा थोडा कर के खाते हैं ....हा हा हा .....

ये पसंद वाला मामला तो हम जैसे आलसियों के लिए बड़ा दुखद है ...दुखती रग पर हाथ रख दिया आपने ..ये ब्लोग्वानी को भी क्या फितूर सुझा है ...अच्छा खासा सीधा सदा काम मुश्किल बना दिया है ...

बहुत रोचक रही आपकी प्रविष्टी ....!!

rashmi ravija said...

हा हा हा...बिलकुल सही कहा आपने..ऐसे कैसे चुपचाप चले जायेंगे खाकर...नमक कम ज्यादा बताना तो पड़ेगा...और अच्छा लगे पकवान तो तारीफ भी करनी पड़ेगी...और फरमाईश भी तो करनी पड़ेगी...तो चलिए हम अपनी फरमाईश तो कर देते हैं...ऐसे ही अच्छे पकवान खिलाती रहा करें...शुक्रिया

संगीता पुरी said...

हम महिलाओं को ब्‍लागिंग करनी है .. तो हमें रसोई की शार्टकट विधियां अपनानी होगी .. मेरा एक रिसर्च इस दिशा में भी चल रहा है .. खाना जल्‍दी कैसे बने .. ताकि फटाफट प्रविष्टियों के पसंद भी बढाए जा सके .. और साथ ही साथ टिप्‍पणियां भी दी जा सके .. रिसर्च के पूरा होते ही शेयर करती हूं .. खाना बनाने में हमें बस दस मिनट लगेंगे .. अब उस खाने को खाने में खानेवालों को दो घंटे लग जाएं .. तो हमारी क्‍या गलती ??

Suman said...

nice

डॉ टी एस दराल said...

हा हा हा , अजित जी। बड़ी मजेदार पोस्ट लिखी है आज तो।
अब इतने लज़ीज़ पकवान पर भला कोई टिपण्णी कैसे नहीं करेगा।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

अब क्या कहें इस पोस्ट के बारे में!
मनोब्यथा को बड़ी चतुराई से
अंकित कर दिया आपने!

मनोज कुमार said...

विचार के स्वाद ही नहीं मनोरंजन की छौंक का ज़ायका भी मिला।

अविनाश वाचस्पति said...

अजित जी
ताकना झांकना
और
फिर आंकना
इतना सरल नहीं है
इसमें बहुत गरल है
वैसे तरल तरल है
पर सब्‍जी बेखरल है

संख्‍या घट जाए
तो न घबराएं
वापिस क्लिकाएं


रहस्‍य यही है
यही है मुस्‍कान
जान लो
पहचान लो
राज यही है
बेराज भी यही है।

सब सही है
सही सही है।

Mithilesh dubey said...

यहाँ तो हम आपसे बहुत नाराज है , आपने कभी निमंत्रण दिया ही नहीं , नहीं हम तो खाने के बहुत शौकिन हैं , देखिए दौड़ते हुये आये हैं ।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

ब्लोगवाणी का मामला कुछ ज़्यादा ही कोम्प्लिकेटिड हो गया है. मगर राजस्थानी खाना तो कहीं से भी कम नहीं है जी.

Mohanlal Gupta said...

रोचक ।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

:)

L.R.Gandhi said...

लज़ीज़ बाटी चूरमा .......राधे राधे......

Anil Pusadkar said...

हा हा हा हा हा चाट-पकौडी और इडली-डोसे पर भारी चूरमा-बाटी।ॐ मज़ा आ गया।हमको तो डकार भी आ गई।हा हा हा।

Mired Mirage said...

हाहा!ब्लॉगवाणी ने यह काम मजेदार किया है।
राजस्थान के व्यंजन तो बहुत स्वादिष्ट होते हैं।
घुघूती बासूती

दिगम्बर नासवा said...

ब्लोगवानी के तरीके को तो हम अभी तक नही समझ पाए ...... हां दाल-बाटी ज़रूर समझ में आती है ..... मौका मिला तो आपके हाथ की भी खाएँगे ..........

ताऊ रामपुरिया said...

मेरी रसोई और मेरा पकवान ही उन्‍हें मिला ऐसी ठिठोली करने को। पहली बार किया और पहली बार ही हम पल्‍टी खा गए। चलिए मेरा पकवान तो तैयार हो गया, आपके भी चख लूं। सीता-सीता।

वाह आपने भी कमाल कि रसोई बनायी है ब्लागवाणी की. सच कहें तो हमें आज तक इसका छौंक तडका लगाना नही आया. हमारा रजिस्ट्रेशन ही नही होता तो वहां कैसे तडका लगायें?:)

रामराम.

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) said...

कोई तारीफ़ करे या ना करे मगर हम तो अगर खायेगे तो अच्छा बतायेगे जरूर
आज तो बहुत अच्छा रहा
सादर
प्रवीण पथिक
9971969084

shikha varshney said...

अरे आप कोई प्रतिक्रिया ही नहीं कर रहे, बस ठूसे जा रहे हैं, खा लिया तो टिप्‍पणी भी करो कि अच्‍छा लगा। यह सीन ध्‍यान आते ही झट की-बोर्ड पर अंगुलिया चल पड़ती है और तड़ातड़ टिप्‍पणियां लिख दी जाती हैं।
.हाहाहा हः वाह ! क्या रसोई पकाई है....क्या पकवान हैं.जायके दार पूरे फुल बट्टा फुल नंबर आपके....मजा आ गया

श्याम कोरी 'उदय' said...

.... लजीज ... जायकेदार.... स्वादिष्ट व्यंजन!!!

अबयज़ ख़ान said...

Bilkul Thik kaha aapne.. Apke yahan to itne log aa bhi gaye Pakvan ko pasand karne.. Mere yahan to bura haal hai. Kuch bhi Banao.. log badi mushkil se aate hai.. Aur Pasand par click karne me apne saath bhi yahi hua tha..