Monday, February 8, 2010

साहित्‍यकार माता-पिता का स्‍मरण कौन करता है?

खुशबू हूँ मैं फूल नहीं जो मुरझा जाऊँगा
जब भी मुझको याद करोगे मैं आ जाऊँगा।
ये पंक्तियां रात को टीवी पर सुनी थी, मन से निकल नहीं रही। ऐसे लग रहा है जैसे दिल में समा गयी हों। टीवी पर संगीत का कार्यक्रम चल रहा था, उसमें प्रसिद्ध गायक शान अपने पिता का स्‍मरण करते हुए उनके ही गीत और संगीत को सुर दे रहे थे। आँखों में आँसू लिए और होठों पर मुस्‍कान लिए वे अपनी ही धुन में गाए जा रहे थे। उनकी पत्‍नी भी आँसू बहा रही थी। गुमनामी के अंधेरे में खो चुके अपने अप्रतिम पिता को जब शान ने याद किया तब लगा जैसे मन्दिर में घंटियां बज उठी हों। कोई बड़ी ही पवित्रता से भगवान को पुकार रहा हो।

आज न जाने कितना लिखा जा रहा है? लेकिन कितने बेटे हैं जिनके हाथों का स्‍पर्श उन शब्‍दों को मिलता है? कितने बेटे उन शब्‍दों का स्‍मरण कर पाते हैं और कितनी बहुएं उन शब्‍दों को सुनकर अपने आँसू नहीं रोक पाती? एक फिल्‍म आयी थी ‘यात्रा’ जिसमें नाना पाटेकर मुख्‍य भूमिका में थे। मैं उन दिनों अमेरिका अपने बेटे के पास गयी हुई थी। वहाँ सप्‍ताह में पाँच दिन तो घर पर बैठकर टाइम-पास के साधन ढूंढने पड़ते हैं तो इण्डियन स्‍टोर से किसी फिल्‍म की सीडी लाने का विचार बना। स्‍टोर के मालिक ने एक सीडी पकड़ा दी, नाम था ‘यात्रा’। पहले कभी नाम नहीं सुना था, फिर सोचा कि खाली बैठकर बोर होने से अच्‍छा है कोई अनजानी फिल्‍म ही देख ली जाए। उस फिल्‍म में नाना पाटेकर साहित्‍यकार बने थे, तो फिल्‍म के प्रति रुचि जागृत हो गयी। नाना पाटेकर का पात्र श्रेष्‍ठ साहित्‍यकार होने के बाद भी कहीं दुखी और कुंठित दिखायी पड़ता है। बेटा पूछता है कि भाई यह क्‍यों कुंठित है? मुझे भी समझ नहीं आता, मुझे लगता है कि साहित्‍यकार अधिकतर कुंठित ही रहते हैं तो शायद यही पात्र की मांग है। लेकिन अन्‍त में आभास हुआ कि उसका बेटा उसका साहित्‍य नहीं पढ़ता था शायद यह बहुत बड़ा कारण था उनकी कुंठा का।

हम अपने पिता या माता पर कब गर्व करते हैं? जब वे हमें भौतिक संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्‍ध करा सके? उनके आदर्श, उनके वचन, उनका साहित्‍य का क्‍या हमारे जीवन में कोई मौल नहीं? क्‍या ये सब बिना मौल की वस्‍तुएं हैं? हमारे द्वारा लिखा गया साहित्‍य क्‍या अभिमान करने का विषय नहीं है? कितने बेटे/बेटियां हैं जो एक सामान्‍य साहित्‍यकार माता-पिता का बड़े शान से परिचय कराते हैं? मैंने अक्‍सर देखा है कि वे परिचय के अभाव में कहीं खो जाते हैं। वे तरस जाते हैं उन शब्‍दों को सुनने के लिए जिन शब्‍दों को उन्‍होंने दुनिया को दिया है लेकिन जिन्‍हें वे बच्‍चों को शायद दे नहीं पाए। जब उनका परिचय ही नहीं है तो फिर उनके जाने के बाद उनका स्‍मरण तो शायद सपनों की बात होगी। फिर आज तो परिवार भी टूट गए हैं, श्राद्ध भी नहीं होते जो एक दिन ही याद कर लिया जाए। लेकिन फिर भी माता-पिता हमेशा ही कहेंगे कि जब भी मुझको याद करोंगे मैं आ जाऊँगा।

21 comments:

जी.के. अवधिया said...

एक सही और सामयिक चिंतन!

आधुनिकता की दौड़ में हम अपनी संस्कृति तो क्या माता पिता तक को भी भूलते जा रहे हैं।

महफूज़ अली said...

बहुत अच्छा लगा यह चिंतन....

श्यामल सुमन said...

भावपूर्ण चिन्तन। सोचने को विवश हो गया।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सटीक आलेख, शुभकामनाएं.

रामराम.

निर्मला कपिला said...

अजित जी आँखें नम हो गयी रात प्रोग्राम देख कर भी हुई थी मगर आपके इस सच मे पता नही कितना दर्द है जो शायद बहुधा शब्द शिल्पियों मे है। आज कल के बच्चों के पास समय ही नही है। फिर भी अभी कुछ बच्चे हैं जो अपने माँ बाप पर गर्व कर सकते हैं उन मे शायद बेटियाँ अधिक हैं । शायद आने वाले दिनो मे ये भी न रहें। दिल को छू गयी आपकी ये संवेदनशील पोस्ट। धन्यवाद्

पी.सी.गोदियाल said...

एकदम सही कहा आपने अजीत गुप्ता जी ! हालात ये है कि अपनी गाडी से परिवार संग कहीं घूमने जा रहे हो, और चलते-चलते आपने स्टीरियो पर एफएम की जगह पुराने गानों की सीडी चला दी तो पिछली सीट से कानो में बस यही मधुर आवाज पड़ती है कि " बस, कर दिया न रोना-धोना शुरू "!

वन्दना said...

sochne ko vivash karta chintan.

परमजीत बाली said...

बढिया आलेख।सोचने को मजबूर कर दिया...

डॉ टी एस दराल said...

उनके आदर्श, उनके वचन, उनका साहित्‍य का क्‍या हमारे जीवन में कोई मौल नहीं?

बिलकुल है जी , और बस इसी का मोल है।
लेकिन ये बात समझने वाले कम रह गए हैं।
अच्छी बात कही है आपने।

S B Tamare said...

जनाब,
बड़ी ही खूबसूरत बाते लिखी आपने, बहाना तो फिल्म का बनाया मगर निगाहें दरकते सामाजिक बुनावट पर रखी/
जिस नाशुक्रे मिजाज ने हमारे बिच जड़े जमाली है उसकी खौफनाक तासीर का सही सही अंदाजा हर घड़ी नयी बद-शक्ल अख्तियार करते समाज को अभी हुआ नहीं है की हालात में अभी और कितने मोड़ तो आने बांकी है / स्वामी विवेकानंद के विचार मैंने एक पुस्तक ''पूर्व और पाश्चात्य'' के तौर पर देखि थी जिसमे उनकी नसीहत थी की भारत के लिए मुनासिब होगा की वो अपनी प्रवृति के मोल पर फिरंगी मानसिकता ना खरीद-फरोख्त करे या फिर अंजाम भुगतने को तैयार रहे / और आपके बयान के अलावे समाज की हाहाकारी सूरत देख कर तो यही लगता है की चिकने घड़े पर पानी रूका नहीं /
पुनश्च, बेहतर लेख के लिए आपको मुबारकबाद देता हूँ /
थैंक्स/

shikha varshney said...

विचारणीय लेख ....माँ -बाप कैसे भी हो गर्व का विषय तो होने ही चाहिए.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

हाँ सही लिखा है आपने!
स्वार्थ रिश्तों पर हावी हो गया है!

Udan Tashtari said...

बिल्कुल सही लिखा..एक सटीक आलेख.

मनोज कुमार said...

विचारोत्तेजक!

दीपक राजा said...

maa baap ki yaado ko samate rahane aur unke value ko mahfuj rakhne wale kabhee gachcha nahi khate, ye mera manna hai. Mere Pita jee dunia chhod gaye. Aj bhee lagta hai wo mere pas hain dhoop men chhaya ki tarah.

Nalayak santan bhee maa-baap ko bhul nahi pata hai. udgaar vyakta bhale na kare

Thanx for again remembering my beloved father.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

माता , पिता हमारे ह्रदय में,
ईश्वर की तरह आज भी विद्यमान हैं
आलेख बहुत सही लिखा है
सादर स - स्नेह
- लावण्या

वाणी गीत said...

माता पिता गर्व करने लायक ही होते हैं ...इसमें भी किसी को कोई शक हो सकता है क्या ...बढती जरूरतों और बदलते समय के साथ दूर रहना हो सकता है मगर साथ रहकर दूर रहने से अच्छा दूर रह कर उनकी जरुरत के समय उनके पास होना ज्यादा बेहतर है ...नहीं क्या ... !!

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...
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Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

रिश्ते भी वन वे ही होते हैं खासकर माता-पिता और संतान के बीच. जो सदा देता है उसे कोई अपेक्षा ही क्या? और जो सदा लेता आया है उसे इस बात का ख्याल सपने में भी कहाँ कि दाता की भी कोई ज़रुरत हो सकती है.

rashmi ravija said...

'शान ' एक बहुत ही अच्छे गायक हैं ...और उस से भी बढ़कर अच्छे इंसान...बिलकुल जमीन से जुड़े हुए और विनम्र...मैं तो प्रोग्राम मिस कर गयी...पर आपके माध्यम से देख लिया...मुझे लगता है...माता-पिता के सामने भले ही बच्चे ना प्रकट करें पर मन ही मन वे गर्व महसूस करते हैं...और माता-पिअत के काम के प्रति सम्मान उनके मन में रहता है (हो सकता है...यह मेरी wishfull thinking ही हो,पर मन मानने को तैयार नहीं होता कि कैसे बच्चे भूल जा सकते हैं....
हमेशा की तरह बहुत ही सार्थक पोस्ट

आनन्द वर्धन ओझा said...

माननीया,
शानजी का वह गीत मैंने भी सुना था और आप यकीन मानिए मेरी और मेरी श्रीमतीजी की आँखें नम हुयी थीं... इस भौतिकतावादी युग में और जीवन की विसंगतियों में हम अपने माता-पिता को भी विस्मृत कर दें तो यह जीवन कैसा और जीवन में बसनेवाली सुगंध भी कैसी ? राम कहिये !
साभिवादन--आ.