पढ़ना और सुनना मेरे दोनों ही प्रिय विषय रहे हैं। परिवार में साहित्य पढ़ने का माहौल नहीं था,लेकिन साहित्य मेरी रगों मे कैसे घर कर गया मुझे ज्ञात नहीं। जैसी भी पुस्तक हाथ लगी, बस एक ही बैठकी में समाप्त करके ही चैन पड़ा। पुस्तकों का कहीं न कहीं से जुगाड़ हो ही जाता था। पुस्तकालय तो सबसे अच्छा स्रोत था ही। कभी विमल मित्र हाथ में होते तो कभी शरद चन्द्र, कभी बंकिम चन्द्र तो कभी ताराशंकर बंदोपाध्याय। कभी आशापूर्णा देवी तो कभी शिवानी। गुलशन नन्दा भी पढे जाते तो कर्नल रंजीत भी। बस पुस्तक मिलनी चाहिए थी। पत्रिकाओं में उन दिनों धर्मयुग और हिन्दुस्थान आता तो वे तो चट ही जाते थे। कुछ मनोंरंजन के नाम पर पढ़े जाते और कुछ ऐसे साहित्य के नाम पर जो दिल पर अपने हस्ताक्षर बना जाते। ऐसे कितने ही साहित्यकार होंगे जिनके लिए मन आज भी श्रद्धा से भरा हुआ है। कुछ साहित्यकार पूर्व परिचित नहीं होते थे लेकिन साहित्य हाथ लगा तो फिर यादों में हमेशा के लिए बस गये।
जब कुछ बड़े हुए तो घर से एक आवाज सुनायी दी कि आज फलां व्यक्ति का भाषण है और उसे सुनने जाना है। हम भी साथ चिपक लिए और फिर अच्छे व्यक्तियों को सुनने की भी लत लग गयी। कभी किसी राजनेता का भाषण तो कभी किसी समाज-सेवक का उद्बोधन तो कभी किसी संत का प्रवचन। बस पढ़ते और सुनते ही जीवन निकल गया। मन में अगाध श्रद्धा-भाव भर गया। ऐसे मनीषियों के विचार पर चिंतन भी होता और मनन भी। अपनाने की कोशिश भी यथासम्भव रहती। विमल मित्र की “खरीदी कौडि़यों के मौल” आप लोगों ने भी पढ़ी होगी, दो वोल्यूम में पूरा उपन्यास है। तीन-चार दिन में ही पूरा कर लिया और कई बार पढ़ा गया। लेकिन पन्ने पलटकर समाप्त करने वाली मानसिकता कभी नहीं बनी। ऐसे ही कभी एक घण्टे का भाषण सुना तो कभी तीन घण्टे तक भी सुना लेकिन आनन्द में कभी कमी नहीं आयी। ऐसे चिंतकों के प्रति मन के श्रद्धा-भाव में कभी कमी नहीं आयी।
शायद वह पीढ़ी श्रद्धा की ही थी। हम अपने माता-पिता के प्रति श्रद्धा रखते थे, गुरुजनों के प्रति श्रद्धा रखते थे और बड़ों के प्रति भी श्रद्धा रखते थे। कई बार इस बात पर बहस भी होती थी कि प्रेम क्या है? प्यार क्या है और श्रद्धा क्या है? लेकिन आज सबकुछ बदल गया सा नजर आता है। श्रद्धा शब्द कहीं चुक सा गया है। आज के आराध्य भी बदल गये हैं। अब अभिनेता और खिलाड़ियों के पीछे लोग दौड़ रहे हैं। क्यों दौड़ रहे हैं मालूम नहीं? कभी दौड़ते-दौड़ते वे हाथ आ जाते हैं तो समझ नहीं आता कि अब क्या करें? तब लगता है कि प्रमाण के रूप में ऑटोग्राफ ही ले लिए जाए! या अधिक सुविधा मिल जाए तो आलिंगन की ईच्छा बलवती हो जाती है। लेकिन उनके विचारों को कोई अपनाता नहीं, क्योंकि वे विचारवान तो हैं ही नहीं।
अपनी-अपनी पीढ़ी का सत्य है। आज श्रद्धा हमारे जीवन से गायब होती जा रही है। बराबरी का जमाना आ गया है। टेलीविजन पर हमेशा देखती हूँ और मन में एक टीस सी उभरती है, जब किसी नौजवान पत्रकार को किसी विचारवान व्यक्तित्व का उपहास करते हुए देखती हूँ। कैसा भी व्यक्तित्व सामने हो, वे उसे बौना सिद्ध करने पर तुल जाते हैं। कभी लगता है कि कैसी शिक्षा है आज की, जो ज्ञानवान व्यक्ति का उपहास करना सिखाती है! आप कहेंगे कि पहले जैसे आदर्श व्यक्तित्व आज कहाँ? लेकिन हमारी पीढ़ी तो अशिक्षित माता-पिता का भी सम्मान करती थी, उनका उपहास तो कभी नहीं उड़ाती थी। फिर आज क्या हो गया? तर्क और वितर्क हमारे जीवन में भी रहे हैं लेकिन किसी विषय के साथ रहे हैं ना कि व्यक्ति के साथ। व्यक्ति के साथ तो हमेशा श्रद्धा या विश्वास ही रहा है। मुझे तो लगता है कि सर्वाधिक सुखी व्यक्ति वे ही हैं जिनके मन में श्रद्धा है। इसलिए मैं हमेशा कहती हूँ कि आज भक्ति-मार्गी सबसे अधिक सुखी हैं, क्योंकि वे श्रद्धा से लबालब भरे हैं उनमें अविश्वास घर करता ही नहीं। जब अविश्वास ही नहीं है तब वे कैसे उपहास को माध्यम बनाएंगे। इसलिए आज मुझे लगता है कि आज का आदमी श्रद्धा और उपहास के बीच में झूल रहा है। एक हमारी पीढ़ी है जिसके पास अगाध श्रद्धा है और एक आज की नवयुवा पीढ़ी, जिसके उपहास को हम झेल रहे हैं। आपका क्या विचार है?