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Monday, January 10, 2011

श्रद्धा और उपहास के बीच झूलता आदमी -अजित गुप्‍ता

पढ़ना और सुनना मेरे दोनों ही प्रिय विषय रहे हैं। परिवार में साहित्‍य पढ़ने का माहौल नहीं था,लेकिन साहित्‍य मेरी रगों मे कैसे घर कर गया मुझे ज्ञात नहीं। जैसी भी पुस्‍तक हाथ लगी, बस एक ही बैठकी में समाप्‍त करके ही चैन पड़ा। पुस्‍तकों का कहीं न कहीं से जुगाड़ हो ही जाता था। पुस्‍तकालय तो सबसे अच्‍छा स्रोत था ही। कभी विमल मित्र हाथ में होते तो कभी शरद चन्‍द्र, कभी बंकिम चन्‍द्र तो कभी ताराशंकर बंदोपाध्‍याय। कभी आशापूर्णा देवी तो कभी शिवानी। गुलशन नन्‍दा भी पढे जाते तो कर्नल रंजीत भी। बस पुस्‍तक मिलनी चाहिए थी। पत्रिकाओं में उन दिनों धर्मयुग और हिन्‍दुस्‍थान आता तो वे तो चट ही जाते थे। कुछ मनोंरंजन के नाम पर पढ़े जाते और कुछ ऐसे साहित्‍य के नाम पर जो दिल पर अपने हस्‍ताक्षर बना जाते। ऐसे कितने ही साहित्‍यकार होंगे जिनके लिए मन आज भी श्रद्धा से भरा हुआ है। कुछ साहित्‍यकार पूर्व परिचित नहीं होते थे लेकिन साहित्‍य हाथ लगा तो फिर यादों में हमेशा के लिए बस गये।
जब कुछ बड़े हुए तो घर से एक आवाज सुनायी दी कि आज फलां व्‍यक्ति का भाषण है और उसे सुनने जाना है। हम भी साथ चिपक लिए और फिर अच्‍छे व्‍यक्तियों को सुनने की भी लत लग गयी। कभी किसी राजनेता का भाषण तो कभी किसी समाज-सेवक का उद्बोधन तो कभी किसी संत का प्रवचन। बस पढ़ते और सुनते ही जीवन निकल गया। मन में अगाध श्रद्धा-भाव भर गया। ऐसे मनीषियों के विचार पर चिंतन भी होता और मनन भी। अपनाने की कोशिश भी यथासम्‍भव रहती। विमल मित्र की खरीदी कौडि़यों के मौल आप लोगों ने भी पढ़ी होगी, दो वोल्‍यूम में पूरा उपन्‍यास है। तीन-चार दिन में ही पूरा कर लिया और कई बार पढ़ा गया। लेकिन पन्‍ने पलटकर समाप्‍त करने वाली मानसिकता कभी नहीं बनी। ऐसे ही कभी एक घण्‍टे का भाषण सुना तो कभी तीन घण्‍टे तक भी सुना लेकिन आनन्‍द में कभी कमी नहीं आयी। ऐसे चिंतकों के प्रति मन के श्रद्धा-भाव में कभी कमी नहीं आयी।
शायद वह पीढ़ी श्रद्धा की ही थी। हम अपने माता-पिता के प्रति श्रद्धा रखते थे, गुरुजनों के प्रति श्रद्धा रखते थे और बड़ों के प्रति भी श्रद्धा रखते थे।  कई बार इस बात पर बहस भी होती थी कि प्रेम क्‍या है? प्‍यार क्‍या है और श्रद्धा क्‍या है? लेकिन आज सबकुछ बदल गया सा नजर आता है। श्रद्धा शब्‍द कहीं चुक सा गया है। आज के आराध्‍य भी बदल गये हैं। अब अभिनेता और खिलाड़ियों के पीछे लोग दौड़ रहे हैं। क्‍यों दौड़ रहे हैं मालूम नहीं? कभी दौड़ते-दौड़ते वे हाथ आ जाते हैं तो समझ नहीं आता कि अब क्‍या करें? तब लगता है कि प्रमाण के रूप में ऑटोग्राफ ही ले लिए जाए! या अधिक सुविधा मिल जाए तो आलिंगन की ईच्‍छा बलवती हो जाती है। लेकिन उनके विचारों को कोई अपनाता नहीं, क्‍योंकि वे विचारवान तो हैं ही नहीं।
अपनी-अपनी पीढ़ी का सत्‍य है। आज श्रद्धा हमारे जीवन से गायब होती जा रही है। बराबरी का जमाना आ गया है। टेलीविजन पर हमेशा देखती हूँ और मन में एक टीस सी उभरती है, जब किसी नौजवान पत्रकार को किसी विचारवान व्‍यक्तित्‍व का उपहास करते हुए देखती हूँ। कैसा भी व्‍यक्तित्‍व सामने हो, वे उसे बौना सिद्ध करने पर तुल जाते हैं। कभी लगता है कि कैसी शिक्षा है आज की, जो ज्ञानवान व्‍यक्ति का उपहास करना सिखाती है! आप कहेंगे कि पहले जैसे आदर्श व्‍यक्तित्‍व आज कहाँ? लेकिन हमारी पीढ़ी तो अशिक्षित माता-पिता का भी सम्‍मान करती थी, उनका उपहास तो कभी नहीं उड़ाती थी। फिर आज क्‍या हो गया? तर्क और वितर्क हमारे जीवन में भी रहे हैं लेकिन किसी विषय के साथ रहे हैं ना कि व्‍यक्ति के साथ। व्‍यक्ति के साथ तो हमेशा श्रद्धा या विश्‍वास ही रहा है। मुझे तो लगता है कि सर्वाधिक सुखी व्‍यक्ति वे ही हैं जिनके मन में श्रद्धा है। इसलिए मैं हमेशा कहती हूँ कि आज भक्ति-मार्गी सबसे अधिक सुखी हैं, क्‍योंकि वे श्रद्धा से लबालब भरे हैं उनमें अविश्‍वास घर करता ही नहीं। जब अविश्‍वास ही नहीं है तब वे कैसे उपहास को माध्‍यम बनाएंगे। इसलिए आज मुझे लगता है कि आज का आदमी श्रद्धा और उपहास के बीच में झूल रहा है। एक हमारी पीढ़ी है जिसके पास अगाध श्रद्धा है और एक आज की नवयुवा पीढ़ी, जिसके उपहास को हम झेल रहे हैं। आपका क्‍या विचार है?  

Saturday, December 18, 2010

यादों के भँवर जब बनते हैं तो शब्‍द कहाँ-कहाँ टकराते हैं? - अजित गुप्‍ता


आज सुबह से ही मन में भँवर सा उमड़ रहा है। भावनाओं के तूफान में बेचारे शब्‍द तेजी से घूम रहे हैं। उन्‍हें कहीं कोई मार्ग ही नहीं मिल रहा कि बचकर किधर से निकला जाए? कभी यह भँवर गोल-गोल घूमता हुआ बचपन में ला पटकता है जहाँ कभी बस बालू के टीले ही टीले थे और उन्‍हीं टीलों पर चढ़ते उतरते जीवन में कैसे एक-एक पैर बालू रेत पर धंसाते हुए चढ़ा जाता है, सीख लिया था। तो कभी वर्तमान में हमारी यादों को ला पटकता है यह भ्रमर। जहाँ न‍हीं है मखमली बालू और नहीं है बालू जैसा स्‍वभाव, जब कोई भी मन का कलुष, दाग बनकर नहीं चिपकता था। कभी माँ का स्‍मरण हो जाता है तो कभी पिता का, इन्‍हीं के बीच एक जोरदार लहर आती है और यादों की सुई बच्‍चों पर आ अटकती है। कभी बचपन के संगी साथी याद आ जाते हैं और कभी भाई-बहन। दुश्‍वारियों में भी रोज ही इन्‍द्रधनुष निकल आया करते थे और आज कहीं दूर-दूर तक भी कोई रंग नहीं है।
एक-एक मौसम जीवन्‍त होने लगे हैं। बरसात में कौन से पेड़ पर कोयल आकर बोलेगी और कौन सी चिड़िया गाने लगेगी, सभी का हिसाब था। रेतीली धरती पर जैसे ही बरखा की बूंदे पड़ती बस शुरू हो जाता पहल-दूज का खेल। बरसते मेह में जैसे ही कहीं सूरज को खिड़की मिलती झट से अपना चेहरा दिखा जाता और हम सब ताली बजाकर नाच उठते कि सियार का विवाह हो रहा है। सर्दी आते ही सूरज कैसा तो प्‍यारा-प्‍यारा लगने लगता। सुबह से ही उसका इंतजार होता और शाम ढले तक उसकी चाहत रत्ती भर भी कम नहीं होती। तिल-गुड़, मूंगफली तो ऐसे खाये जाते जैसे अब दवाइयां खायी जाती हैं। दिन में तीन बार। पिताजी बोरी भरकर मूंगफली लाते और बोरी भरकर ही गुड़। अब तो आधा किलो ही पड़ा-पड़ा खराब हो जाता है। इन सबके बीच गर्मी भी क्‍या गर्मी थी? तपती रेत, यदि चने भी उसमें डाल दो तो भूंगडे बन जाए लेकिन हम तो उसी के बीच चलते रहे। मानो भगवान ने कहा हो कि तप लो जितना तपना है, जिन्‍दगी में इससे भी ज्‍यादा तपन है। तब ना कूलर थे और ना ही एसी। पंखा भी पूरे घर में एक। लेकिन बचपन ने कहाँ माना है गर्मी का कहना। बस जहाँ-जहाँ से धूप जाती वहाँ-वहाँ हम होते और गर्मी की राते तो इतनी हसीन थी कि भुलाए नहीं भूलती। हवा का पत्ता भी नहीं हिलता लेकिन न जाने कितने ही टोटके बता दिये जाते कि ऐसा करने से हवा चलेगी। कोई कहता कि सात काणों के नाम लो तो हवा चलेगी। अब हम सब लग जाते एकाक्षी को ढूंढने। रेत भी रात को ठण्‍डी हो जाती और हम उसमें लोट-पोट करते रहते। कैसी थी वह बालू रेत? हाथ से सर से सरक जाती, कुछ भी पीछे छोड़कर नहीं जाती। और अब? धूल, काली धूल, उड़ती है कभी कपड़े काले तो कभी मन काला। यह कार्बन वाली धूल ना दिन में ठण्‍डी होती है और ना रात को।
इन सारी यादों के बीच लग रहा है कि शायद यह उम्र यादों को समेटने की ही है। सारा वैभव आसपास फैला है लेकिन मन उस अभाव के चक्‍कर लगा रहा है। बच्‍चों का प्रेम भी टेलीफोन और नेट से खूब मिल ही जाता है लेकिन फिर भी पिताजी की डांट और मार क्‍यों याद आने लगती है? क्‍यों वो माँ याद आती है जिसने जिन्‍दगी में ह‍में केवल डरना ही सिखाया। अरे यह मत करो और वह मत करो बस यही हमेशा बोलती रही और हमें कभी पिताजी से कभी भाई से डराती रही। आज कोई नहीं है ना डराने वाला और ना डांटने-मारने वाला। समय के साथ वह डांट, वह डर कहीं दिखायी नहीं देता केवल अपने मन के अन्‍दर के अतिरिक्‍त। बच्‍चों को गुस्‍से में भी डांट दो तो वे सीरियसली नहीं लेते बस हँस देते हैं। जब डांट का ही असर नहीं तो डर तो कैसा? यहाँ जिन्‍दगी भर डांट और डर को दिल में बसाये रहे कि वसीयत आगे देकर जाएंगे लेकिन अब तो कोई इस फालतू चीज को अंगीकार ही नहीं करता। ओह मैं भी ना जाने किस भँवर में फंसकर बस यादों के बीच चक्‍कर काट रही हूँ, आप लोग भी सोच रहे होंगे कि हम भला क्‍यों उलझे इस भ्रमर में? लेकिन शायद हमें ऐसे ही भ्रमर जीने का मार्ग बताते हैं और कहते हैं कि दुनिया बदल गयी है सचमुच बदल गयी हैं। तुम तो अपनी नाव को पतवार से खेते आए थे लेकिन अब तो नाव का ही जमाना कहाँ रहा? 

Friday, July 16, 2010

आखिर हम ब्‍लाग पर क्‍यों लिखते हैं?

आखिर हम ब्‍लाग पर क्‍यों लिखते हैं? कभी आपने यह प्रश्‍न अपने मन से किया? एक ऐसा ही दूसरा प्रश्‍न है कि हम ब्‍लाग पर क्‍या पढ़ते हैं? यह दूसरा प्रश्‍न बहुत ही आसान है। सभी कहेंगे कि हम अपने मन के विषय पढ़ते हैं। आज ब्‍लाग जगत में असीमित लिखा जा रहा है। हिन्‍दी ब्‍लाग भी हजारों की संख्‍या में हैं। लेखन की सारी ही विधाओं में लिखा जा रहा है। ब्‍लाग आने से पहले हम सभी लिखते थे और अपनी रचना को किसी भी मंच पर सुनाने की आकांक्षा भी रखते थे। इसलिए ही प्रत्‍येक शहर में कई साहित्यिक संस्‍थाओं का जन्‍म हुआ। यहाँ प्रति सप्‍ताह या प्रति माह रचनाकर्मी एकसाथ बैठते हैं और अपनी रचनाओं को सुनाते हैं। इसके पहले कॉफी हाउस हुआ करते थे, जहाँ साहित्‍यकार नियमित रूप से एकत्र होते थे और विभिन्‍न रचनाओं पर चर्चा करते थे। आज का जमाना ब्‍लाग का आ गया है। लेखन वहीं खड़ा है लेकिन उसके श्रोताओं या पाठकों का स्‍थान बदल गया है।

मुझे नवीन विचारों को पढ़ना रुचिकर लगता है। इसकारण ब्‍लाग पर नवीनता को खोजने का क्रम भी चलता रहता है। कई बार बड़े अच्‍छे ब्‍लाग पर खोज-यात्रा टिक जाती है लेकिन जब टिप्‍पणी करने के लिए पोस्‍ट कमेण्‍ट के कॉलम पर जाती हूँ तो वहाँ किसी अन्‍य की टिप्‍पणी ही नहीं होती है। मेरी टिप्‍पणी पहली और आखिरी ही होती है। ऐसा एक बार नहीं अनेक बार हुआ है। तब मन में विचार आता है कि आखिर हम लिखते क्‍यों हैं? अपने लिखे को पढ़वाने के लिए कुछ तो परिश्रम करिए, क्‍योंकि इस ब्‍लाग-जगत में आप भी नए हैं और अन्‍य भी नए हैं। ऐसा नहीं है कि सीधे ही गुलजार जैसे व्‍यक्तित्‍व ने ब्‍लाग प्रारम्‍भ किया हो और लोग दौड़कर उनका स्‍वागत करेंगे। आप परिश्रम कर रहे हैं, समाज को श्रेष्‍ठ विचार दे रहे हैं तो उसके लिए कुछ तो प्रचार करिए। नहीं तो ब्‍लाग लिखने का मकसद ही अधूरा रह जाएगा। आपने किसी समस्‍या को अच्‍छी प्रकार से उठाया लेकिन आपको उसके समर्थक ही नहीं मिले तो क्‍या फायदा? इसलिए प्रारम्‍भ में मैं परिश्रम करना ही पड़ेगा। जब लोगों को समझ आने लगेगा कि आपके विचार श्रेष्‍ठ है तो वे अपने आप ही आपके ब्‍लाग पर आएंगे।

वैसे यह पोस्‍ट मैं जिन लोगों के लिए लिख रही हूँ, वे इस पोस्‍ट को पढेंगे नहीं। क्‍योंकि वे तो बस इतना कर रहे हैं कि अपनी बात लिख रहे हैं और खुश हो जाते हैं, कभी भूले से भी उस एकमात्र टिप्‍पणीकार के ब्‍लाग पर भी नहीं जाते। तो मुझे लगता है कि हमें एक प्रयोग करना चाहिए कि ऐसे लोगों को यह टिप्‍पणी भी करें कि आपके विचार श्रेष्‍ठ हैं लेकिन इनके प्रचार के लिए प्रारम्भिक परिश्रम आवश्‍यक है और इसलिए आप अपने सम-विचारकों के ब्‍लाग पर भी जाएं जिससे आपके ब्‍लाग के पाठक बढ़ सके नहीं तो आपका परिश्रम बेकार ही जा रहा है। ऐसे ही कुछ नवीन ब्‍लागर भी हैं जो हमेशा टिप्‍पणी नहीं मिलने से दुखी रहते हैं लेकिन स्‍वयं दूसरों के ब्‍लाग पर नहीं जाते। इसलिए ब्‍लाग लिखना केवल टिप्‍पणी प्राप्‍त करने का ही खेल नहीं है अपितु अच्‍छी रचनाओं को सांझा करने का मंच है। इसलिए ही इतने लोग परिश्रम करके ब्‍लाग-चर्चा करते हैं। कई बार ब्‍लाग-चर्चा में भी अच्‍छी पोस्‍ट छूट जाती है, उसके लिए भी हम यह कर सकते हैं कि जब हम किसी भी ब्‍लाग पर टिप्‍पणी कर रहे होते हैं तब उस पोस्‍ट का भी जिक्र कर दें जिससे लोग उसे पढ़ने के लिए उत्‍सुक हो सके। क्‍योंकि कई बार अच्‍छी पोस्‍ट निगाह से निकल जाती है। इसलिए हम सब मिलकर अच्‍छे विचारों का स्‍वागत करें और उन्‍हें विस्‍तार देने का प्रयास भी।

Wednesday, July 14, 2010

स्‍पष्‍ट लिखने वालों के पाठक होते हैं और जो अस्‍पष्‍ट लिखते हैं. . .

आज सुबह समाचार पत्र के पन्‍ने पलटते हुए एक वाक्‍य पर दृष्टि अटक गयी। ब्‍लाग जगत के लिए मुझे सटीक उक्ति लगी तो तुरन्‍त नोट कर ली गयी। लीजिए मैं अपनी बात एकदम स्‍पष्‍ट रूप से ही लिखूंगी, कोई घुमाव नहीं। तो पहले उक्ति ही पढ़ लीजिए –

AMERICA  के 16वें राष्‍ट्रपति [ PRESIDENT] अब्राहम लिंकन ने कहा था कि स्‍पष्‍ट लिखने वालों के पाठक होते हैं और जो अस्‍पष्‍ट लिखते हैं उन पर टिप्‍पणी करने वाले होते हैं। - राजस्‍थान पत्रिका - दिनांक 14 जुलाई 2010

मुझे कई बार लगता है कि आज के लेखक के पास सिवाय बंदिशों के और कुछ नहीं है। राजनैतिक क्षेत्र के बारे में कुछ लिखेगा तब उस पर यह आरोप लग जाएगा कि यह फला विचारधारा का है और जिन्‍हें भी अपनी विचारधारा से विपरीत बात लगेगी तो वे उसपर आक्रमण सा कर देंगे। इसी प्रकार सामाजिक क्षेत्र में तो इतने व्‍यवधान है जैसे एक बाधा दौड़ के धावक को बाधाएं पार करनी होती हैं वैसे ही बेचारे लेखक को बाधाओं से गुजरना पड़ता है। अब वह स्‍पष्‍ट कैसे लिखे? मैं भी इस विषय पर गोलमाल ही करने वाली हूँ। किसी धर्म की आलोचना आप नहीं कर सकते। किसी सम्‍प्रदाय के बारे में नहीं लिख सकते। बहुत सारे ऐसे शब्‍द हैं जिनका प्रयोग नहीं कर सकते। गांधी जी ने एक शब्‍द दिया “हरिजन” आज उसका प्रयोग नहीं कर सकते। ऐसे ही कितनी बाधाएं हैं जिसे लेखक को पार करनी होती है। कुछ बेचारे तो नए-नए भी होते हैं और उन्‍हें मालूम ही नहीं होता कि इन शब्‍दों का परहेज रखना है। एक और बड़ी समस्‍या मुझे दिखायी देती है कि केवल गरीब, महिला, दलित ही शोषित होते हैं, आप इनपर जी भरकर लिखिए। लेकिन यदि किसी अमीर, पुरुष, सवर्ण के शोषण के बारे में लिख दिया तो फिर आपकी शामत आ जाएगी। मैं देख रही हूँ कि गृहकार्य करने वाले सफाई कर्मचारियों की आज देश में बहुत बड़ी समस्‍या खड़ी है, उनकी मनमानी से पीड़ित लाखों लोग हैं लेकिन क्‍या किसी की हिम्‍मत है जो उनके बारे में लिख दे? सब यही लिखेंगे कि अमीर लोग ही उनका शोषण करते हैं।
तो आप बताइए, कैसे कोई स्‍पष्‍ट लिखे? अब्राहम लिंकन तो बोल गए लेकिन उन्‍होंने आधुनिक भारत की कल्‍पना नहीं की होगी। यहाँ सारा ही सामाजिक लेखन झूठ का पुलिन्‍दा है। जहाँ एकतरफा शोषण की बात लिखी जाती है। महिलाओं के बारे में इतना लिखा जाता है कि मेरी तो दृष्टि ही बदल गयी है। अब मैं जिस भी घर में जाती हूँ या जिस भी महिला से मिलती हूँ उसे बहुत देर परखती हूँ कि वह कितनी शोषित है। कुछ ही देर में उसकी दहाड़ने जैसी आवाज सुनायी देती है और बेचारे पुरुष की मिमियाती आवाज। लेकिन तुर्रा तो यही है कि बेचारी महिला शोषित है। पुरुषों को भी ऐसा लिखने में आनन्‍द आने लगा है क्‍योंकि एक तो ऐसा लिखने से उनका सच सामने नहीं आता फिर वे भी प्रगतिवादी कहलाने लगते हैं कि हमने महिला शोषण के खिलाफ लिखा। तो भाई अब आप देखे कि जिसके भी ब्‍लाग पर ज्‍यादा टिप्‍पणी आ रही हैं वे सब अस्‍पष्‍ट लिख रहे हैं, यह मैं नहीं कह रही, अब्राहम लिंकन कहकर गए हैं। मेरे ऊपर शस्‍त्रों का प्रयोग मत करना। मैं तो स्‍पष्‍ट लिखने का प्रयास कर रही हूँ जिससे इस पोस्‍ट के पाठक उपलब्‍ध हों। इस गम्‍भीर विषय पर चिंतन करिए कि हम समाज और देश की कैसी छवि प्रस्‍तुत कर रहे हैं?

Friday, April 23, 2010

मैं आज पुरुषों के मन की बात जानना चाह रही हूँ

मैं कल एक कार्यक्रम में भाग लेने छोटी-सादड़ी गयी थी। मेरे साथ हमारे पड़ोसी और सहकर्मी हमारे मित्र भी थे। वे अपने परिवार की निगाह में थोड़े अडियल माने जाते हैं, लेकिन उनके परिवार से ज्‍यादा वे स्‍वयं को अडियल स्‍वीकार करते हैं। शाम को जब कभी एकत्र बैठते हैं तो कई बार अपने मन की बात भी बता देते हैं और हम आपस में परामर्श भी कर लेते हैं। कार्यक्रम पश्‍चात वापस आते समय उन्‍होंने मुझे अपने मन की बात बतायी। शायद उसका कारण भी था कि मैंने परिवार पर अपना उद्बोधन दिया था। इसलिए वे बोले कि अभी दो दिन पहले मैंने स्‍वयं का आकलन किया। मैंने विचार किया कि क्‍या मैं अपने बेटे के साथ कहीं कठोर तो नहीं रहा? ऐसा तो नहीं कि मैंने उसका बचपन छीन लिया हो? वे बोले कि जब मैं कोई फिल्‍म देखता हूँ और उसमें पाता हूँ कि आज की युवा पीढ़ी बहुत मस्‍ती करती है लेकिन मैं तो उसे अनुशासन का पाठ पढ़ाता रहा हूँ, ऐसा तो नहीं है कि उसे आज लग रहा हो कि मैंने यह सब नहीं किया। वे बोले कि मैं अपराध-बोध से ग्रसित होकर अपनी पत्‍नी से पूछ रहा था। पत्‍नी ने कहा कि इस बात का उत्तर तो सोच-समझकर दूंगी। पत्‍नी तो पत्‍नी ही होती है भला पति को हीनभावना का शिकार कभी होने देती है? उसने कहा कि आपकी चिन्‍ता बेकार है, आपने बेटे को सभी कुछ दिया है। पत्‍नी ने अपनी बेटियों से भी बात की कि तुम्‍हारे पापा सेन्‍टी हो रहे हैं। बेटियों ने भी कहा कि नहीं उसने वो सारे कार्य किये है जो एक लड़का अपनी उम्र में करता है, इसलिए आप दुखी मत होइए।

उन्‍होंने जब ये सारी बाते मुझसे शेयर की तब मेरे मन में एक विचार कौंधा। अभी दो दिन पूर्व ही वे दोनो पति-पत्‍नी घर आए थे और उन्‍होंने बताया था कि बेटे की शादी पक्‍की कर दी है। आज उनका अपने बारे में आकलन करना कहीं बेटे की शादी अर्थात नयी-बहु के आगमन के कारण तो नहीं है? मुझे चार वर्ष पूर्व का काल याद आ गया। जब मेरे घर में भी बहु आने वाली थी। मैं अपने पतिदेव के स्‍वभाव से थोड़ा चिन्तित थी कि कहीं ऐसा ना हो कि वो बहु के सामने भी अपना स्‍वभाव नहीं बदले और एक पति ही बने रहे। लेकिन मेरे लिए परम आश्‍चर्य का विषय था कि मेरे पतिदेव एकदम ही बदल गए। माँ होने के नाते तो मुझे मालूम है कि एक स्‍त्री को उस समय कैसा अनुभव होता है। माँ तो उस समय इतना खुश होती है जैसे उसे कौन सा खजाना मिलने वाला हो? बस बेटे का घर बसेगा, शायद माँ के लिए सबसे बड़ा सुख यही होता है। उसके घर में भी फिर से मेंहदी लगे पैरों की छाप लगेगी। घर में जो यौवन बीत गया था वो वापस लौट आएगा। चारों तरफ बस खुशियां ही खुशियां होंगी।

मैं जब आप सभी पुरुषों से प्रश्‍न कर रही हूँ तब अपनी बात भी ईमानदारी से रखूंगी। माँ के मन में तो बस एक ही डर होता है कि आज जो मेरा घर है, जिसे मैंने बड़े प्‍यार से सजाया है कहीं उसमें कोई ग्रहण ना लगा दे? आज की सास का मन भी मैंने देखा है और अक्‍सर कहते सुना है कि हमारे दिन तो बीत गए लेकिन अब मैं अपनी बहु को हथेलियों पर रखूंगी। सास और बहु के रिश्‍ते में इतना प्‍यार भर दूंगी कि यह रिश्‍ता सबसे अधिक प्रिय हो जाए। लेकिन जब मैंने मेरे पड़ोसी को बदलते देखा और अपने पतिदेव को भी बदलते देखा तो आज स्‍वाभाविक रूप से यह चाहत जागी कि आप सभी से प्रश्‍न करूं कि क्‍या आप भी बदले थे या बदलेंगे? घर में नयी बहु के आगमन के समाचार से आपके मन में क्‍या विचार आए थे?