Wednesday, July 14, 2010

स्‍पष्‍ट लिखने वालों के पाठक होते हैं और जो अस्‍पष्‍ट लिखते हैं. . .

आज सुबह समाचार पत्र के पन्‍ने पलटते हुए एक वाक्‍य पर दृष्टि अटक गयी। ब्‍लाग जगत के लिए मुझे सटीक उक्ति लगी तो तुरन्‍त नोट कर ली गयी। लीजिए मैं अपनी बात एकदम स्‍पष्‍ट रूप से ही लिखूंगी, कोई घुमाव नहीं। तो पहले उक्ति ही पढ़ लीजिए –

AMERICA  के 16वें राष्‍ट्रपति [ PRESIDENT] अब्राहम लिंकन ने कहा था कि स्‍पष्‍ट लिखने वालों के पाठक होते हैं और जो अस्‍पष्‍ट लिखते हैं उन पर टिप्‍पणी करने वाले होते हैं। - राजस्‍थान पत्रिका - दिनांक 14 जुलाई 2010

मुझे कई बार लगता है कि आज के लेखक के पास सिवाय बंदिशों के और कुछ नहीं है। राजनैतिक क्षेत्र के बारे में कुछ लिखेगा तब उस पर यह आरोप लग जाएगा कि यह फला विचारधारा का है और जिन्‍हें भी अपनी विचारधारा से विपरीत बात लगेगी तो वे उसपर आक्रमण सा कर देंगे। इसी प्रकार सामाजिक क्षेत्र में तो इतने व्‍यवधान है जैसे एक बाधा दौड़ के धावक को बाधाएं पार करनी होती हैं वैसे ही बेचारे लेखक को बाधाओं से गुजरना पड़ता है। अब वह स्‍पष्‍ट कैसे लिखे? मैं भी इस विषय पर गोलमाल ही करने वाली हूँ। किसी धर्म की आलोचना आप नहीं कर सकते। किसी सम्‍प्रदाय के बारे में नहीं लिख सकते। बहुत सारे ऐसे शब्‍द हैं जिनका प्रयोग नहीं कर सकते। गांधी जी ने एक शब्‍द दिया “हरिजन” आज उसका प्रयोग नहीं कर सकते। ऐसे ही कितनी बाधाएं हैं जिसे लेखक को पार करनी होती है। कुछ बेचारे तो नए-नए भी होते हैं और उन्‍हें मालूम ही नहीं होता कि इन शब्‍दों का परहेज रखना है। एक और बड़ी समस्‍या मुझे दिखायी देती है कि केवल गरीब, महिला, दलित ही शोषित होते हैं, आप इनपर जी भरकर लिखिए। लेकिन यदि किसी अमीर, पुरुष, सवर्ण के शोषण के बारे में लिख दिया तो फिर आपकी शामत आ जाएगी। मैं देख रही हूँ कि गृहकार्य करने वाले सफाई कर्मचारियों की आज देश में बहुत बड़ी समस्‍या खड़ी है, उनकी मनमानी से पीड़ित लाखों लोग हैं लेकिन क्‍या किसी की हिम्‍मत है जो उनके बारे में लिख दे? सब यही लिखेंगे कि अमीर लोग ही उनका शोषण करते हैं।
तो आप बताइए, कैसे कोई स्‍पष्‍ट लिखे? अब्राहम लिंकन तो बोल गए लेकिन उन्‍होंने आधुनिक भारत की कल्‍पना नहीं की होगी। यहाँ सारा ही सामाजिक लेखन झूठ का पुलिन्‍दा है। जहाँ एकतरफा शोषण की बात लिखी जाती है। महिलाओं के बारे में इतना लिखा जाता है कि मेरी तो दृष्टि ही बदल गयी है। अब मैं जिस भी घर में जाती हूँ या जिस भी महिला से मिलती हूँ उसे बहुत देर परखती हूँ कि वह कितनी शोषित है। कुछ ही देर में उसकी दहाड़ने जैसी आवाज सुनायी देती है और बेचारे पुरुष की मिमियाती आवाज। लेकिन तुर्रा तो यही है कि बेचारी महिला शोषित है। पुरुषों को भी ऐसा लिखने में आनन्‍द आने लगा है क्‍योंकि एक तो ऐसा लिखने से उनका सच सामने नहीं आता फिर वे भी प्रगतिवादी कहलाने लगते हैं कि हमने महिला शोषण के खिलाफ लिखा। तो भाई अब आप देखे कि जिसके भी ब्‍लाग पर ज्‍यादा टिप्‍पणी आ रही हैं वे सब अस्‍पष्‍ट लिख रहे हैं, यह मैं नहीं कह रही, अब्राहम लिंकन कहकर गए हैं। मेरे ऊपर शस्‍त्रों का प्रयोग मत करना। मैं तो स्‍पष्‍ट लिखने का प्रयास कर रही हूँ जिससे इस पोस्‍ट के पाठक उपलब्‍ध हों। इस गम्‍भीर विषय पर चिंतन करिए कि हम समाज और देश की कैसी छवि प्रस्‍तुत कर रहे हैं?

47 comments:

सतीश सक्सेना said...

अंतिम पैराग्राफ हर घर की कहानी है, इस सत्य को कोई लिखना चाहता क्योंकि लोकप्रियता में कमी आ जायेगी !
आपने लिख दिया है.... मुझे अच्छा लगेगा अगर इमानदारी से लोग इस विषय पर अपने कमेंट्स दें !

वाणी गीत said...

घर बनाये रखने के लिए अगर प्यार और विश्वास के साथ थोडा समझौता और अधिकार और कर्तव्य का सही तालमेल जिंदगियों को खुशनुमा बनाता है ...महिलाएं शोषित भी रही ही होंगी ...लेकिन पिछले दस वर्षों में इसमें काफी बदलाव आया है ...महिला शोषण के नाम पर यदि सिर्फ अधिकार की ही बात की जाये तो यह भी उचित नहीं है ...इस बात पर मेरी सखी रश्मि से भी कई बार स्वस्थ बहस हो जाती है ...!
मैं स्त्रियों के स्वयं अपनी इच्छानुसार जीवन व्यतीत करने की इच्छा की पक्षधर तो हूँ क्यूंकि इसके अभाव में वे कुंठा और मनोविकारों से ग्रस्त होती हैं ...लेकिन अपने इच्छानुसार जीवन व्यतीत किया जाने के लिए दूसरे पर अनावश्यक दबाव नहीं बनाया जाना चाहिए ...

यदि विवाह से पहले दोनों पक्षों द्वारा प्राथमिकतायें तय कर ली जाएँ तो ज्यादा उचित हो ...!

ललित शर्मा said...

समय के साथ प्रकृति भी बदलती है और विषय भी।कल जिन्हे शोषक कह कर लानत भेजी जाती थी,वह आज शोषितों की श्रेणी में खड़े दिखाई देते हैं।

समय चक्र का परिवर्तन है,लेकिन कुछ विषय ऐसे हैं जि्नके लिए स्पष्ट कहने से लोग बचते हैं। क्योंकि सदियों से बनी धारणा का एकाएक बदलना संभव नहीं है।

अच्छा विषय चुना आपने
आभार

PN Subramanian said...

स्पष्ट और अस्पष्ट लेखन के अंतर को अब्राहाम लिंकन के हवाले आपने स्पष्ट कर दिया.चलिए अपनी पोस्टों पर टिप्पणियां नहीं आने पर अब आत्मग्लानि से मुक्त रहेंगे.आभार.

निर्मला कपिला said...

कुछ ही देर में उसकी दहाड़ने जैसी आवाज सुनायी देती है और बेचारे पुरुष की मिमियाती आवाज। लेकिन तुर्रा तो यही है कि बेचारी महिला शोषित है।
हा हा हा हा
लेकिन शोशित रही हैं और अभी भी हैं इसमे शक नही इसी लिये तो दहाडती हैं कि पुरुष समझ ले कि वो घायल शेरनी है।
स्पष्ट अस्पष्ट का सूत्र एक दम सही। शुभकामनायें

Suresh Chiplunkar said...

"…आप देखे कि जिसके भी ब्‍लाग पर ज्‍यादा टिप्‍पणी आ रही हैं वे सब अस्‍पष्‍ट लिख रहे हैं,…"

हिन्दी ब्लॉग जगत की पोल खोलने का हक आपको किसने दिया… हा हा हा हा :) :) :)

सूर्यकान्त गुप्ता said...

इस कटु सत्य को निर्भीकता से प्रस्तुत करने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद, ……आभार।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

लिंकन जी की बात तो लिंकन जी ही जाने...लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता कि अधिक टिप्पणी पाने वाले लोग अस्पष्ट लिखते हैं....बल्कि उनकी बात आम लोग ज्यादा स्पष्ट समझते होंगे तभी उनको पढने जाते हैं...
हाँ यह सही है कि यदि लोग वाद - विवाद से बचते हैं ..और अपनी बात को शायद घुमा फिर कर कहते हों...और यदि वो ऐसा करते भी हैं तो शायद उनके मन में यही धारणा होगी कि किसी की भावनाओं को ठेस ना पहुंचे...
और रही स्त्रियों के दहाडने और शोषण की बात तो शायद वो दहाड़ शोषण कही नतीजा हो...चलती तो घर में पुरुषों की ही है...बहुत सी बातों के लिए स्त्रियों को अपनी खुशी कुर्बान करनी पड़ती है....आपने भी दहाड़ ऐसी महिला की सुनी होगी जो कम से कम १५-२० साल पति के साथ गुज़ार चुकी होगी...और ऐसे पति दूसरों के सामने ही मिमियाते से नज़र आते हैं...और बेचारगी का खिताब पाते हैं....पर असलियत कुछ और ही होती है...
आपका लेख बहुत कुछ कह गया...आभार

शोभना चौरे said...

कभी शोषित रहे लोग इसमें सभी वर्ग ,पुरुष, महिलाये जिनको ये समझ में आने लगा है की हमारे शोषण से बहुत से लोग प्रसिद्धी पाने लगे है तो वे ब्लैक मेल करना शुरू कर ने लगे है |
आपका आलेख बिलकुल स्पष्ट है और जो बात जुबान पर आते आते रह जाती है उसे बहुत विस्तार से प्रस्तुत कर दिया है |
आभार

वन्दना said...

इस विषय पर तो जितना लिखो थोडा ही है………………अगर दुनिया स्पष्ट कहने लगे ना तो आधी आबादी तो लड्ते लडते खत्म हो जाये इसीलिये कुछ बातें घुमा कर कहनी पडती हैं…………यहाँ ब्लोग पर भी यदि कोई स्पष्ट कहने की कोशिश करता है तो देखिये ना कितनी जल्दी हंगामा खडा हो जाता है तो सोचिये बाकी जगह क्या हाल होगा।

Raviratlami said...

"...अब्राहम लिंकन ने कहा था कि स्‍पष्‍ट लिखने वालों के पाठक होते हैं और जो अस्‍पष्‍ट लिखते हैं उन पर टिप्‍पणी करने वाले होते हैं। ..."

:), तब तो मैं भयंकर स्पष्ट लिखता हूं. कुछ अस्पष्टता सीखनी होगी !

उन्मुक्त said...

अस्पष्ट या गोल, गोल तभी लिखा जाता है जब आपके विचार स्पष्ट नहीं होते हैं। इसलिये लिखने के अपने विचारों में स्पष्टता लानी जरूरी है।

प्रवीण पाण्डेय said...

आपने इतनी स्पष्ट बात लिखी है। पाठक बन पढ़ी, फिर भी टिप्पणी देने की इच्छा है। लिंकन जी का संदर्भ कदाचित अलग हो।

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर लिखा आप ने, यह दलित नाम से यह लोग हम सब का शॊषण कर रहे है, एक सफ़ाई कर्म चारी का काम है सफ़ाई करना, लेकिन भारत के किसी भी शहर गांव कस्बे मै जा कर देखे गंदगी के ठेर लगे है, ओर सफ़ाई कर्मचारी अपनी हाजिरी तो जरुर लगवाते है, पुरी तन्खाह भी लेते है...लेकिन काम के वक्त इन का शोषण हो जाता है, अरे भाई काम नही करना तो जाओ, दुसरे बहुत है काम करने को, लेकिन तब भी इन का शोषण होता है, इन्हे चाहिये बिन पडे लिखे डा० की डिग्री, इन्जिंयर की पोस्ट, एक गजेटेट पोस्ट,
आप की पोस्ट पढ कर आंके खुलती है.
धन्यवाद

kshama said...

तो आप बताइए, कैसे कोई स्‍पष्‍ट लिखे? अब्राहम लिंकन तो बोल गए लेकिन उन्‍होंने आधुनिक भारत की कल्‍पना नहीं की होगी।
Par yah baat to America ke liye bhi laagu padti hai...wahan to seedhe goli se udaye jane ka bhay rahta hai....yahan kuchh gali galauch aur dhamki se baat ban jati hai! Waise is mulk me Arun Shourie aut Nalini Singh jaise bhai bahan bhi hain! Nalini Singh ne san 88/89 me booth capturing ko apne camere me band kar liya tha!

डॉ टी एस दराल said...

हम तो जितना लिखते हैं , स्पष्ट लिखते हैं
लेकिन स्पष्ट भी कितना कम लिखते हैं ।

क्या करें मजबूरियां ही ज्यादा इतनी हैं ।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

सही कहा आपने, स्पष्ट सोच और स्पष्ट विचार ही समाज को सही दिशा में ले जाते हैं और ऐसे ही लोग याद रह जाते हैं।
................
पॉल बाबा का रहस्य।
आपकी प्रोफाइल कमेंट खा रही है?.

रश्मि प्रभा... said...

समानता, अन्याय के विरोध में जो कदम उठे तो सशक्त स्त्री भी यही झूठ बोलने लगी, .... शांत , स्थिर , संतुलित मानसिकता वाले पति की भी बेचारगी उतनी ही दुखदाई है, जितनी एक स्त्री की होती है, पर समूह में वह कुछ बोल नहीं पाता.
रही बात स्पष्ट, अस्पष्ट की तो स्पष्टता तो किसी समाचार की ही हो सकती है न.... कल्पना के तो पंख ही होते हैं .

अजय कुमार झा said...

आज तो धार इतनी तेज़ लगी कलम की,कि लग रहा है कि एकदम करारा सान चढाया गया है ।

वो तो लिंकन इस लिए लिख गए क्योंकि वे हिंदी ब्लॉगर नहीं थे,होते............तो ...........हा हा हा टिप्पणी से पता चल जाता ।वैसे ये बात टिप्पणीकारों पर भी लागू होती है क्या ।मतलब कि जो टिप्पणी करते हैं वे पाठक नहीं होते ..और जो पाठक होते हैं वे टिप्पणी नहीं करते .....

जी.के. अवधिया said...

"अब्राहम लिंकन तो बोल गए लेकिन उन्‍होंने आधुनिक भारत की कल्‍पना नहीं की होगी।"

अब्राहम लिंकन ने यह बात भारत के सन्दर्भ में नहीं की होगी, यदि की होती तो आपके इस पोस्ट में इतनी सारी टिप्पणियाँ नहीं होतीं।

Mired Mirage said...

कुछ दहाड़ती स्त्रियों व मिमियाते पुरुषों से मैं भी मिलना चाहूँगी। कहाँ पाए जाते हैं ये?
वैसे काफी टिप्पणियाँ आ गईं! शायद अस्पष्ट लिखा है!
घुघूती बासूती

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

इस कला में माहिर हम तो नही हैं जी!

मो सम कौन ? said...

आप तो स्पष्ट लिख गईं, हम कन्फ़्यूज़ हो गये। लिंक्न साहब ने जो भी कहा लिखा होगा, वो समय, स्थान और काल के सापेक्ष ठीक ही होगा, लेकिन एक भी आयाम के बदलते ही परिस्थितियां बदल जाती हैं और किसी का भी कहा हुआ शाश्वत सत्य ही हो, ये जरूरी भी नहीं।
लेकिन रोचक लगा विषय, आभार।

अमित शर्मा said...

@कुछ ही देर में उसकी दहाड़ने जैसी आवाज सुनायी देती है और बेचारे पुरुष की मिमियाती आवाज।

>>>>>>>>एक व्यक्ति से उसके दोस्त ने पूछा की तू ऑफिस में तो हम पर शेर की तरह दहाड़ता है, पर घर जाते ही बकरी क्यों बन जाता है. तो उस व्यक्ति ने ज़वाब दिया की मैं बकरी नहीं बन जाता हूँ, घर में भी शेर ही हूँ. फर्क सिर्फ इतना होता है की घर जाते ही शेर पे "दुर्गा" सवार हो जाती है.....


इस कटु सत्य को प्रस्तुत करने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद!

Prabodh Kumar Govil said...

bahut din baad aapko padh paya .madhumati mein hi padha karta tha .ab jab se amerika aa gaya hoon, madhumati nahi dekh pata. shoshon to ab vyaktigat cheeze ho gayee hai.jo log bhee guton mein rehna jaan gaye hain shoshan se bachte hi shoshak ki bhoomika mein aa jate hain .

महेन्द्र मिश्र said...

आपके विचारों से सहमत हूँ.... आभार

सुज्ञ said...

आप भी माहिर है,लिंकन जी के नाम चढा कर, अस्पष्टता से सब कुछ स्पष्ट कर गई।
पूर्वशोषितों को इतना समर्थन प्राप्त है कि आज शोषक
गुप्त शोषितों में शुमार है।
इस कटु सत्य को निर्भीकता से प्रस्तुत करने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद, ……आभार।

अविनाश वाचस्पति said...

तो हम तो टिप्‍पणीकार ही हुए
पर यह भूल गए कि टिप्‍पणी किसलिए कर रहे हैं।

अजय कुमार said...

लेखन तो स्पष्ट होना ही चाहिये,और जब पाठक आयेंगे तो टिप्पणी भी---

अनूप शुक्ल said...

आपने तो बहुत स्पष्ट लिखा फ़िर भी खूब टिप्पणियां आईं। लगता है अब्राहम लिंकन जी की बात आपके ब्लॉग पर लागू नहीं होती।

गिरिजेश राव said...

आप ने स्पष्ट लिखा है।
बहुत बार मैं आलस के मारे टिप्पणी नहीं करता लेकिन यहाँ अपने को रोक नहीं पाया क्यों कि आप ने बहुत स्पष्ट लिखा है।

गिरिजेश राव said...

हाँ, लिंकन वाली बात मुझ पर लागू नहीं होती :)

Divya said...

Straight trees are cut first. Still i like those who are very clear in their thoughts and opinion.

Arvind Mishra said...

देखिये न टिप्पणियों ने आपकी स्पष्टता को खंडित कर दिया :) जबकि लिखा अपने बहुत स्पष्ट और वस्तुनिष्ठ था -लिंकन के गुजरे ज़माना हो गया -तब नेट नहीं था अब है थोबड़ा थामने को ...

डा० अमर कुमार said...


@ डॉ. दराल
सँदर्भ : क्या करें मजबूरियां ही ज्यादा इतनी हैं

उन मज़बूरियों का क्या.. जो अपने स्पष्ट करने से रोकें ?
अस्पष्टता केवल वहीं हो सकती है, जहाँ विचारों का घुमाव हो, स्थिति के आकलन में अदूरदर्शिता हो, अपना निहित स्वार्थ हो या स्वयँ में नैतिक साहस का अभाव हो ।
यह उक्ति आप पर कतई नहीं है, किन्तु मैं मानता हूँ कि अपने को सुरक्षित रखने की ऎसी शुतुरमुर्गी सोच नें देश और समाज की दुर्दशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है । एक ओर आजके विकसित देश भारतीय जीवट और मेघा से इतने अचँभित हैं, कि आँतरिक विरोध के बावज़ूद हमारे देश से ब्रेन ड्रेन करने को उत्सुक हैं, दूसरी ओर हमारे यहाँ कुटिल राजनैतिक कारणों से ड्रेन से ब्रेन उठा कर जिम्मेदार पदों पर बैठाया जा रहा है ।
अब कोई यह न जड़ दे कि यह टिप्पणी कुँठित मानसिकता की देन है ।

अनामिका की सदाये...... said...

बहुत स्पष्ट बात तो कह ही दी आपने..और बहुत अच्छा लेख प्रस्तुत किया है ये स्पष्ट बात कह कर...

और अब एक स्पषट बात जो मुझे महसूस हो रही है लिख ही दू...सोच रही हू ...

जब से आप लौट कर आई हैं बहुत सीरिअस टाइप की हो गयी हैं..सेरिउस लिखती हैं.

क्यों जी ???

प्रवीण शाह said...

.
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हा हा हा हा,

आपने तो बड़ा स्पष्ट लिखा है सब कुछ... और अभी तक ३७ कमेंट!... लगता है, लिंकन साहब मूर्ख बना गये सबको!... ;)

मैंने तो महिलाओं द्वारा पुरूष पर किये जा रहे अत्याचार के बारे में पोस्ट तक लिखी थी, पर मैं अभागा... आप की टीप आई और चार और...बाकी की टिप्पणियों को तरस गया मैं...:( क्या यह स्पष्ट लिखने का सिला है ?

आभार!

दीपक 'मशाल' said...

चलिए कोशिश करता हूँ कि इस मिथक को तोड़ सकूं..

ajit gupta said...

अब्राहम लिंकन ने जब यह बात कही थी तब ब्‍लोगिंग नहीं थी। इसलिए उनका संदर्भ होगा कि कुछ लेखन वस्‍तुपरक होते हैं जैसे विज्ञान का कोई लेखन जिसे लोग पढ़ते ह‍ै उस पर बहस नहीं होती लेकिन अन्‍य ऐसे मुद्दे हैं जिन पर अनेक विचार होते हैं इसलिए उन पर सब अपनी टिप्‍पणी देते हैं। आप सभी के अपने विचार है, उनका स्‍वागत है। दुनिया में विचारों की भिन्‍नता रहने से ही विचार आगे बढ़ते हैं। इस बहस से निश्चित ही बहुत आनन्‍द आया। बहुत सारी बातों का उत्तर नहीं दे रही हूँ क्‍योंकि सब कुछ एक बारगी ही तो नहीं कहना है ना? हम ऐसे ही स्‍वस्‍थ मन से विचारों को आगे बढ़ाते रहें और एक दूसरे से कुछ सीख लें बस यही ब्‍लागिंग का अर्थ मुझे समझ आता है।

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

आपने सत्य वचन कहा ... हो सकता है किसी को पसंद न आये .. पर विचारों में भिन्नता भी ज़रूरी है ...

विनोद कुमार पांडेय said...

माता जी, बात तो बिल्कुल सही कहा आपने पर कभी कभी स्पष्ट और अस्पष्ट का निर्धारण कुछ लोग नही कर पाते ऐसे में बड़े रचनाकार को आगे आकर उनकी समीक्षा करनी चाहिए ताकि उनमें सुधार हो सकें...वैसे मैं तो बहुत कोशिस करता हूँ कि स्पष्ट लिखूं....बढ़िया आलेख के लिए धन्यवाद....प्रणाम

शिवम् मिश्रा said...

एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
आपकी चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं

अफ़लातून said...

अपने घर के संडास की सफ़ाई न करने वाले सफ़ाई कर्मचारियों से त्रस्त हैं ! जिस देश में दूसरे का पैखाना सिर पर उठाने की परिस्थिति बदस्तूर जारी हो ,वहां लोग त्रस्त रहेंगे। जिन मुल्कों में श्रम की प्रतिष्ठा वर्ण-प्रभावित नहीं है वहां के घरों में क्या आपको सफ़ाई कर्मचारी भी मिले,कमोड साफ करने वाले???

बेचैन आत्मा said...

..अब्राहम लिंकन ने कहा था कि स्‍पष्‍ट लिखने वालों के पाठक होते हैं और जो अस्‍पष्‍ट लिखते हैं उन पर टिप्‍पणी करने वाले होते हैं। ..

..मुझे तो लगता है कि अब्राहम लिंकन की बात का गलत अर्थ लगाया जा रहा है। मेरी समझ से ..अस्‍पष्‍ट लिखते हैं उन पर टिप्‍पणी करने वाले होते हैं ..'टिप्पणी' से आशय़ य़हाँ आलोचना से है।
...वैसे आपने स्पष्ट लिखा है, इसीलिए आपके पास इतने पाठक हैं।

हरीश प्रकाश गुप्त said...

tippaniya likhane walo ki sankhya aur pathako ki sankhya me kahi koi anupat nahi hai. ha itna jarur hai tippaniyo ki sankhya ka rasta pathako ki sankhya se hi gujar kar jata hai.
rahi baat istriyon ke ghar me purusho par dahadne ki baat to ghar parivaar ke sanskar, vyaktigat sanskar, swabhav, parivesh aadi bahut si chijo par nirbhar karta hai. hamare samaj me istriyon ki aaj jo isthi hai uske liye pehle ki bahut si paristhiya karan hai. hame is vishay par bahut vyapak drishtikon rakhate hue vichar karna chahiye.

Shah Nawaz said...

पोलें खोलता हुआ एक बेहतरीन लेख ;-)

वैसे आपके लेख पर भी कमेंट्स करने वालों का ताँता लगा हुआ है....... :-)

Vinay Prajapati 'Nazar' said...

वाह जी क्या बात है