Friday, September 14, 2018

मेरे पहलवान को अखाड़े में नहीं उतारा तो????????

पहले गाँवों में एक अखाड़ा होता था, वहाँ पहलवान आते थे और लड़ते थे। जब दंगल होते थे तो गाँव वाले भी देखने आ जाते थे नहीं तो पहलवान तो रोज ही कुश्ती करते थे। जैसे ही पहलवान अखाड़े से बाहर आया वह अपनी दुनिया में रम जाता था। वह हर जगह को अखाड़ा नहीं बनाता था। लेकिन आज राजनीति का अखाड़ा ऐसा हो गया है कि वह भगवान की तरह कण-कण में बस गया है। कभी हम पढ़ा करते थे कि बंगाल में लोग यदि शादी की बात करने भी जाते थे तो जाँच-परख लेते थे कि सामने वाला व्यक्ति फुटबाल की कौन सी टीम का समर्थक है, यदि विपरीत टीम का समर्थक निकला तो झट से इशारा होता था और बातचीत बन्द हो जाती थी, अतिथि अपने घर को रवाना हो जाते थे। लेकिन आज इन खेलों का स्थान राजनीति ने ले लिया है, आप होली-दीवाली पर राम-राम करने को फोन करेंगे तो सामने से राजनीति का प्यादा चलकर बाहर आ जाएगा, मिलने जाओगे तो घोड़ा अपनी ढाई घर की चाल के साथ उपस्थित हो जाएगा। किसी जवान मौत पर भी चले जाओ, ऊँट की तरह तिरछी चाल से अपनी बात वहाँ भी कह दी जाएगी। और यदि साक्षात अपने प्रतिद्वंद्वी के घर चले जाओ तो शह और मात का खेल शुरू हो जाएगा। 
कुछ लोगों ने तो बकायदा ट्रेनिंग भी ली है और उन्हें किट भी दे दिया जाता है कि उन्हें कब-कहाँ-कैसे वार करना है। ट्रेनिंग के लिये आजकल फेसबुक सबसे सटीक जगह है, कोई उस्ताद जुमले गढ़ता है और उसके चेले सारा दिन वही जुमले बोलते हैं। मूर्ख चेले सभी ओर हैं, उन्हें पता ही नहीं कि यह जो जुम्ला आया है वह मेरे लिये है या नहीं है, बस वह किसी भी चाल से उलझ जाता है और किसी भी जुम्ले को अपने आका के विरोध में ही उछालने लगता है। यह खेल इतना मजेदार हो चला है कि बाकायदा जुम्ले बनाने का कारखाना खोल दिया गया है, लोग सारी तरह के जुम्ले बना रहे हैं और वे सब धड़ाधड़ बिक रहे हैं। कुछ लोगों को लग रहा है कि ऐसे स्वर्ण युग में भी यदि हमारी दुकान नहीं चली तो फिर क्या फायदा है हमारे लिखने का! उन्हें लगने लगा कि पहलवान तो लड़ ही रहे हैं लेकिन हम भी उनके लिये टुकड़ियों का इंतजाम कर दें। वे भांत-भांत की टुकड़ियाँ बनाने में जुट गये हैं। फौज में देखना कोई सिख बटालियन है तो कोई जाट रेजिमेंट, ऐसे ही बहुतेरी है। अब इन दंगलबाजों के लिये भी कई जातियों की बटालियन बनाने की होड़ लगी है। सभी ने मोर्चा सम्भाल लिया है। पहले गाँव का पहलवान गाँव के लिये लड़ता था लेकिन अब अलग-अलग बटालियन बना दी गयी हैं तो गाँव में ही एक-दूसरे को ललकारा जा रहा है। चारों तरफ ललकारने की आवाजें आ रही हैं, पहलवान समझ नहीं पा रहे हैं कि हमें किससे लड़ना है और किससे हाथ मिलाना है। लेकिन जुम्लों के तीर की तरह बारिश हो रही है, कोई अछूता नहीं रहना चाहिये। गाँव-गाँव, ढाणी-ढाणी, क्या पैदल, क्या घोड़ा, क्या हाथी और क्या ऊँट सारे ही मैदान में उतर आए हैं। जुम्लें बनाने वाले अचानक से व्यस्त हो गये हैं, वे सुध-बुध खो बैठे हैं, उन्हें पता ही नहीं कि सारे गाँव के लोग मिलकर ही एक गाँव बनाते हैं, यदि एक भी कड़ी टूट जाए तो गाँव बिखर जाता है। वे जो रोटी खा रहे हैं, उसका अन्न किसी दूसरे ने उगाया है, वह जो कपड़े पहने बैठे हैं, उसका सूत किसी ने काता है, वह जो जूते पहनकर अकड़कर चल रहे हैं, उस जूते को किसी ने बनाया है। लेकिन उन्हें लग रहा है कि मैं जुम्ले बना सकता हूँ तो मैं ही महान हूँ। भला अन्न उपजाने वाला, सूत कातने वाला, जूता बनाने वाला मेरी कैसे बराबरी कर सकता है, नहीं मुझे मेरा पहलवान ही चाहिये। यदि मेरे पहलवान को अखाड़े में नहीं उतारा गया तो मैं ????? उसे समझ नहीं आ रहा कि मैं क्या करूंगा? रोटी-कपड़ा तो दूसरे से मिल जाएगा, फिर???????????????

3 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (15-09-2018) को "हिंदी पर अभिमान कीजिए" (चर्चा अंक-3095) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हिन्दी दिवस की शुभकामनाओं के साथ...।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

smt. Ajit Gupta said...

शास्त्री जी आभार।

Jyoti Dehliwal said...

विचारणीय आलेख, दी।