Tuesday, September 11, 2018

नरम नेता चुनो और गुलामी का आनन्द लो


घर में  पिताजी सख्त हों और माताजी नरम तो पिताजी नापसन्द और माताजी पसन्द। स्कूल में जो भी अध्यापक सख्त हो वह नापसन्द और जो नरम हो वह पसन्द। ऑफिस में जो बॉस सख्त हो वह नापसन्द और जो हो नरम वह पसन्द। जो राजनेता सख्त हो वह नापसन्द और जो नरम हो वह पसन्द। जीवन के हर क्षेत्र में जो भी सख्त है, उसे कोई पसन्द नहीं करता इसके विपरीत जो नरम है उसे अधिकतर पसन्द किया जाता है। सख्त मतलब दो-टूक कहने वाला और नरम मतलब तेरे मुँह पर तेरी और मेरे मुँह पर मेरी। जिस किसी का भी घर सुधरा हुआ दिखायी देता है, वहाँ कोई ना कोई सख्त व्यक्ति का शासन होता है और जो घर बिगड़ा दिखायी देता है, वहाँ किसी नरम व्यक्ति का शासन रहता है। सख्त व्यक्ति दो-टप्पे की बात करता है, यह करना है और यह नहीं करना, बस। इस रास्ते पर चलना है और इसपर नहीं। दुनिया उसे समझने लगती है कि यह व्यक्ति यह काम तो करेगा और यह नहीं करेगा जबकि नरम व्यक्ति को कोई समझ नहीं पाता कि यह क्या तो करेगा और क्या नहीं करेगा। घर, सख्त व्यक्ति ही बनाता है लेकिन सबकी नाराजी का केन्द्र बिन्दू रहता है जबकि नरम व्यक्ति घर बिगाड़ता है लेकिन सबका चहेता रहता है। इसलिये कई बार लोग गुस्से में बोल भी देते हैं कि मैं ही क्यों बुरा बनू? घर जाए भाड़ में। लेकिन सब जानते हैं कि हम सब अपनी-अपनी आदतों से मजबूर हैं, हम चाहकर भी विपरीत कार्य कर ही नहीं सकते।
कुछ लोग मोदीजी से नाराज हैं क्योंकी मोदीजी सख्त है। वे नरम लोगों को ढूंढ रहे हैं और खोज-खोजकर उनका नाम उछाल रहे हैं। देश का नेता सख्त है वह देश बनाने में लगा है लेकिन आपको नरम नेता चाहिये! क्यों चाहिये नरम नेता? जिस राजनीति में मैं दूर-दूर तक भी भागीदार नहीं हूँ, तो मुझे क्यों चाहिये नरम नेता? मुझे तो बनते देश को देखकर खुश होना चाहिये लेकिन नहीं! इसी नहीं पर हर जगह पेच अटक जाता है। चाहे वह घर हो या देश। आपने अपने पिता के जमाने की शादी देखी होगी, शादी में केवल पिता का आदेश चलता था, सारे काम व्यवस्थित होते थे लेकिन तभी किसी एक बेटे को लगता था कि मेरी भी पूछ होनी चाहिये। वह छोटे भाई-बहनों को कभी नये कपड़ों के लिये तो कभी किसी और के लिये उकसा देता था। पिताजी का अनुशासन बिगड़ जाता था और लोग कहने लगते थे कि बच्चों की खुशी का भी ध्यान रखना चाहिये। शादी व्यवस्थित हो रही है, इस बात से ध्यान हटकर, बेटे की बात पर केन्द्रित हो जाता है। सभी को लगने लगता है कि यदि  पिताजी की जगह बेटे के हाथ में शादी का प्रबन्ध होता तो हम सब मजे करते। आज ऐसा ही देश में हो रहा है, मोदी जी का कोई साथी लोगों को उकसा रहा है कि इनकी सख्ती के कारण तुम मजे नहीं कर पा रहे हो। तुम्हारे घर में शादी  हो रही है और तुम्हीं मजे नहीं कर पा रहे हो तो फिर क्या फायदा घर की शादी का। जो हर जगह मजे लेने की फिराक में रहते हैं वे आज कह रहे हैं कि ऐसी सख्ती ठीक नहीं, हम मजे नहीं ले पा रहे हैं। मोदीजी की जगह नरम नेता को लाओ जो हमें मजे करा सके। अब या तो मजे ही करा दो या फिर देश को ऊँचा उठा दो। हमने वोट दिया और हम ही विशेष नहीं बने, भला यह भी कोई बात है! हमने इनके पक्ष में इतना लिखा, इतना कहा, फिर भी हम विशेष नहीं, यह भी कोई बात है! बस मोदी जी जैसे सख्त नेता नहीं चाहिये, नरम नेता को आगे लाओ। मजे की चाहत वाले लोग अब नरम नेता की खोज में लगे हैं। बस एक बात याद आ गयी, उसे लिखकर बात खत्म करती हूँ। एक व्यक्ति मेरे पास आया कि फला काम करना है, मैंने काम देखा और कहा कि यह सम्भव ही नहीं है। मेरी बात मेरा बॉस सुन रहा था, उसने इशारे से उसे अपने पास बुलाया और पूछा कि क्या काम है? अब नरम बॉस ने कहा कि ठीक है, मैं देखूंगा। मैं क्या देखती हूँ कि वह व्यक्ति बॉस का गुलाम बनकर रह गया, हमेशा अटेची उठाकर पीछे चलने वाला। काम तो होना नहीं था लेकिन उसने कई साल ऐसे ही निकाल दिये, गुलामी कर-कर के। तो भाई मजे की चाहत रखने वाले लोगों, नरम नेता तो कांग्रेसी बहुत थे, पूरा देश सालों से गुलाम की तरह उनको तोक रहा था, तुमको भी वही गुलामी की आदत पड़ चुकी है, तुम भी फिर से नरम नेता चुनो और गुलामी का आनन्द लो।
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6 comments:

Kavita Rawat said...

आजकल के नेता नरम हो गरम कुछ नहीं होने वाला, बस अपनी रोटियां सेंकने की फिक्र उन्हें हर वक्त सताती है। पहले जैसे नेता अब दुर्लभ है मिलना जो देश की सच्ची सेवा करने को तत्पर रहते हैं। आज तो ढोंग ज्यादा है नेताओं में। सही मायने में देश आज भी गुलाम है। नेता चुनना विवशता है वोटरों के लिए। आजकल तो दो बुराइयों में से कम बुरायी चुन ली हमने तो समझो बहुत अच्छा कर लिया

शिवम् मिश्रा said...

ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 11/09/2018 की बुलेटिन, स्वामी विवेकानंद के एतिहासिक संबोधन की १२५ वीं वर्षगांठ “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

anuradha chauhan said...

कुछ को चुनें किसको नहीं समझ से बाहर है वादे बड़े बड़े सब करते हैं बाद में सब चुप सच्चा और अच्छा नेता मिलना मुश्किल है पर चुनाव तो करना ही है किसी एक का सुंदर लेख लिखा आपने 👌

smt. Ajit Gupta said...

कविता जी आभारी हूँ।

smt. Ajit Gupta said...

शिवम् मिश्रा आभार।

smt. Ajit Gupta said...

अनुराधा चौहान आभार आपका।